Sunday, October 15, 2017

सिर्फ जुर्माने के नियम से क्या होगा

क्या आपको पता है कि सरे आम कहीं भी थूकने और पेशाब करने पर 500 रु जुर्माना देना होगा? सार्वजनिक स्थलों यानी घर के बाहर कूड़ा फेंकने और नाली जाम करने पर भी इतना ही जुर्माना आपसे वसूला जाएगा? पता है? बहुत अच्छी बात है. क्या जनता को इस नियम का डर है? क्या वे अपनी आदत बदल रहे हैं?
क्या आप किसी ऐसे व्यक्ति को जानते हैं जिस पर सड़क पर थूकने, पेशाब करने, कचरा फेंकने के लिए कभी जुर्माना किया गया हो? आप ऐसे किसी व्यक्ति को तलाश करने पर भी नहीं ढूंढ पाएंगे. लखनऊ नगर निगम ने आज तक किसी व्यक्ति पर शहर को गंदा करने के लिए जुर्माना लगाया ही नहीं.
22 मार्च, 2016 को लखनऊ नगर निगम की कार्यकारिणी ने अपनी बैठक में शहर को गंदा करने वालों पर यह जुर्माना लगाना तय किया था. राजधानी को स्मार्ट बनाना है, स्वच्छ भारत अभियान में योगदान करना है, सफाई के मानकों पर आगे बढ़ना है, इसलिए. बैठक में मुम्बई नगर निगम के नियमों का हवाला दिया गया, जहां इन गंदी आदतों के लिए नागरिकों पर एक हजार रु का दण्ड लगाने की व्यवस्था है. जोश में कहा गया था कि लखनऊ में भी एक हजार रु के जुर्माने की व्यवस्था की जानी चाहिए. हमारे सभासदों को अपनी जनता पर दया आ गयी. उन्होंने दलील दी थी कि मुम्बई की तुलना लखनऊ से नहीं की जा सकती. यहां जुर्माने की राशि आधी कर दी जाए. तब प्रस्ताव पास हुआ कि अगर कोई सार्वजनिक स्थान पर थूकता, पेशाब करता, कचरा फेंकता पाया गया तो उससे तत्काल 500 रु का जुर्माना वसूला जाएगा.
नियम बनाना एक बात है और उस पर अमल करना दूसरी बात. आज तक किसी व्यक्ति पर जुर्माना नहीं लगाया गया. गन्दगी फैलाने के लिए कुछ दुकानों व प्रतिष्ठानों से जरूर जुर्माना वसूला गया लेकिन किसी व्यक्ति पर यह दण्ड नहीं लगा. क्यों? नगर निगम के अधिकारियों का जवाब होता है कि इतने कर्मचारी ही नहीं हैं जो सारे शहर में घूम-घूम कर गन्दगी करने वालों को पकड़ें और जुर्माना वसूलें. शहर की सफाई व्यवस्था देखने की जिम्मेदारी सफाई निरीक्षकों की है और उनकी संख्या इतनी भी नहीं है कि वे नगर निगम के ठीक पड़ोस में लालबाग की एक गली को पेशाब में डुबो देने वालों को टोक सकें.
नतीजा यह है कि आधे से ज्यादा शहर खुले में कचरा फेंक रहा है, दीवारों पर धार मार रहा है, नालियों में प्लास्टिक की प्लेटें-थैले और जूठन फेंक रहा है. 19 मार्च 2016 के अपनी इसी स्तम्भ में हमने हिसाब लगाकर लिखा था कि सिर्फ पत्रकारपुरम चौराहे पर ही रोजाना करीब तीन हजार लोग खुले में लघु शंका निपटान करते हैं. इतने लोगों से जुर्माना वसूलने के लिए तो माओ की जैसी फौज चाहिए. सुनते हैं उन्होंने चीन की सड़कों पर लाखों की संख्या में कार्यकर्ता तैनात कर दिये थे. कोई भी कचरा फेंकने लगता तो वे अपने हाथ का कूड़ेदान उसके सामने कर देते. धीरे-धीरे सबकी आदत सुधर गयी.

असल में यह शुद्ध दिमाग का मामला है. न नियम बनाने से होगा न फौज-फाटे से. हाल ही में छपी वह फोटो याद होगी जिसमें एक केंद्रीय मंत्री किसी स्कूल की दीवार पर निपट रहे हैं और स्टेनगन धारी जवान उस वक्त भी  उनकी सुरक्षा में तैनात हैं. उनसे कौन जुर्माना वसूल लेगा? तो, जतन ऐसा चाहिए कि सफाई का विचार लोगों के जेहन में सदा के लिए बैठ जाए. यह कैसे होगा?
(नभाटा, सिटी तमाशा, 14 अक्टूबर, 2017) 

Friday, October 06, 2017

टॉयलेट- एक विस्फोट कथा


डिस्कवरी चैनल वालों ने एक बार टॉयलेट में विस्फोट की सम्भावना को नकारते हुए कहा था कि ऐसा तभी हो सकता है जब वहां बारूद डाल कर तीली सुलगा दी जाए. डिस्कवरी वालों को लखनऊ आ कर जिला एवं सत्र न्यायालय का वह टॉयलेट देखना चाहिए जहां बुधवार को जोर का धमाका हुआ. पुलिस और फॉरेंसिक टीम को वहां किसी तरह का विस्फोटक पदार्थ नहीं मिला. जो कुछ वहां टूटा-फूटा और छितराया हुआ मिला  उसमें बीयर के कैन, नशे की शीशियां, नमकीन के पाउच, सिगरेट की डिब्बियां, वगैरह थे. विदेशी विशेषज्ञों को हैरानी होगी कि टॉयलेट में दारू की शीशियों  का क्या काम! क्या हिंदुस्तानी इतने सफाई-पसंद हो गये हैं कि नशा करने के बाद शीशियां यहां-वहां फेंकने की बजाय टॉयलेट में जमा कर आते हैं?

वे क्या जानें कि हिंदुस्तानी पियक्कड़ों की पसंदीदा जगह शौचालय है. बीड़ी-सिगरेट-खैनी के अलावा वह दारू पीने और नशे के इंजेक्शन लगाने की सबसे सुरक्षित जगह है. किसी को विश्वास न हो तो सुलभ शौचालय के रखवालों से पूछ लीजिए या हैरान-परेशान बीवियां तस्दीक कर देंगी कि बाथरूम जाने से पहले तो येअच्छे-भले होते हैं मगर वहां से निकलने पर जाने क्यों लखड़ाने लगते हैं. नशेड़ियों की बीवियां बाथरूम में सिस्टर्न का ढक्कन खोल कर देख पातीं तो रहस्य खुलता.

अदालत की टॉयलेट में नशे का सामान कैसे आया, यह रहस्य किसी से छुपा नहीं. कुछ कैदियों को नशा चाहिए और पुलिस आदत से लाचार. सो, अदालत परिसर का टॉयलेट सबसे सुरक्षित जगह. कैदी बार-बार टॉयलेट जाने की जिद करता है. पुलिस वाला इशारा समझ कर पहले खुद टॉयलेट जाता है या उसके इशारे पर कोई सूत्र. उसके बाहर आते ही कैदी की हाजत तेज हो जाती है. टॉयलेट की सिटकनी चढ़ाने के बाद वह सिस्टर्न का ढक्कन उठाता है. वहां रखा नशे का पसंदीदा सामान पा कर उसकी बांछें खिल जाती हैं. जब कैदी टॉयलेट से निकलता है तो पुलिस वाले को कोई हैरानी नहीं होती कि वह जेलर जैसी अकड़ क्यों दिखाने लगा.  कैदी ही क्यों, वहां से कई और लोग भी इसी तरह निकलते हों तो क्या आश्चर्य.

विशेषज्ञों का अंदाजा है कि सिस्टर्न के भीतर दारू और कफ सीरप की शीशियों में कोई गैस बनती रही. उसी से धमाका हो गया. अगर ऐसा है तो अपने घरों के टॉयलेट में निश्चिंत होकर दारू गटकने वालों को सावधान हो जाना चाहिए. उनकी त्वरित बुद्धि सामान छुपाने के लिए दूसरी सुरक्षित जगह ढूंढ ही लेगी.

उत्सुकतावश गूगुल की शरण जाने पर हमें टॉयलेट में विस्फोट होने की कई खबरें और मनोरंजक किस्से मिले. चीन से लेकर यूरोप और अमेरिका में  ऐसी कई वारदात हो चुकी हैं. उनमें मौत भी हुई और कई कमर से नीचे घायल मिले. कारण कहीं पानी की पाइपलाइन में हवा का भारी दवाब था तो कहीं चोक सीवर से उमड़ी गैस ने टॉयलेट की सीट ही उड़ा दी. लेकिन सिस्टर्न में विस्फोट कहीं नहीं हुआ, न ही कहीं दारू या कफ सीरप की शीशियों के टुकड़े बरामद हुए. यह निखालिस हिंदुस्तानी नवाचार है!

टॉयलेट आजकल तरह-तरह से चर्चा में है. मोदी जी ने टॉयलेट-अभियान क्या छेड़ा, उस पर फिल्म भी बन गयी. कम हो रहा कहने को लखनऊ के एक टॉयलेट में धमाका भी हो गया. खुले में शौच जाने वालों को नया बहाना मिल गया- कहीं कुण्डी बंद करते ही धमाका हो गया तो! महानायक अब उन्हें क्या गा कर समझाएंगे

(सिटी तमाशा, नभाटा, 07 अक्टूबर 2017) 

Tuesday, October 03, 2017

स्वच्छ भारत टेंसन


रांची नगर निगम के हल्ला बोल, लुंगी खोलअभियान को पिछले हफ्ते राष्ट्रीय मीडिया में जगह मिली. खुले में शौच जाने वालों की लुंगी उतरवाने के लिए सुबह-सुबह नगर निगम की टीमें तैनात हैं. हल्ला बोल, घर से दूर छोड़भी इसी का हिस्सा है. खुले में शौच के लिए जाने वालों को पकड़ो और दूर ले जा कर छोड़ दो. मकसद है कि लोग शर्मिंदा हों और खुले में शौच जाना बंद करें. अपने घर में शौचालय बनवाएं और उसका इस्तेमाल करें.

पहले उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले से खबर थी कि जिलाधिकारी के आदेश से वहां खुले में शौच कर रहे लोगों पर टॉर्च चमकाए गये और सीटियां बजायी गयीं. इसके लिए पुरुषों और महिलाओं की टीम सुबह-सुबह टॉर्च और सीटी लेकर तैनात रहती हैं. ताजा खबर मध्य प्रदेश के बैतूल जिले की है. वहां अमला विकास खंड के सात गांवों में बिना शौचालय वाले घरों पर 250 रु प्रति व्यक्ति, प्रतिदिन के हिसाब से महीने भर का अर्थ दण्ड लगाया गया है. एक परिवार पर तो 75 हजार रु का दण्ड लगा है. इन परिवारों के मुखिया तनाव और अवसाद में हैं. उनका कहना है कि भले ही जेल जाना पड़े, इतना जुर्माना कहां से दें. पैसे होते तो शौचालय नहीं बनवा लेते?

देश को स्वच्छ बनाने के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संकल्प की समय-सीमा ज्यों-ज्यों समीप आती जा रही है, राज्यों और उनके प्रशासन पर यह लक्ष्य हासिल करने का दबाव बढ़ता जा रहा है. 2014 में प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद नरेंद्र मोदी ने देश में जिन कार्यक्रमों पर सबसे ज्यादा जोर दिया उनमें देश को स्वच्छ बनाना भी शामिल है. उन्होंने आह्वान किया था कि 2019 तक पूरे देश को साफ-सुथरा बनाना है. खुद उन्होंने दिल्ली की एक सड़क पर झाड़ू लगा कर स्वच्छ भारत मिशन की शुरुआत की थी. उनके मंत्रिमण्डलीय सहयोगियों और भाजपाई राज्यों के मुख्यमंत्रियों एवं मंत्रियों ने विभिन्न शहरों में झाड़ू पकड़ कर स्वच्छता का संकल्प लिया था.

इसमें दो राय नहीं कि स्वच्छ भारत मिशन अत्यंत आवश्यक और पवित्र संकल्प है. गांवों से लेकर शहरों तक भीषण गन्दगी फैली है. पीने का साफ पानी मयस्सर होना तो बहुत दूर की बात है, कूड़े-कचरे, मलबे और मानव उच्छिष्ठ के कारण गांवों से लेकर शहरों-महानगरों तक की आबादी घातक रोगों की चपेट में आती रहती है. बिहार का कालाजार हो या पूर्वी उत्तर-प्रदेश का जापानी इंसेफ्लाइटिस, जिनसे हर साल सैकड़ों-हजारों बच्चों की मौत होती है, इन बीमारियों के होने और फैलने प्रमुख कारण गन्दगी है. पूर्व की कांग्रेस सरकारों और यूपीए शासन में निर्मल भारत योजना चलायी जरूर गयी, लेकिन किसी प्रधानमंत्री ने इस अभियान को ऐसी प्राथमिकता और इतना ध्यान नहीं दिया.

सरकारी आंकड़ों पर विश्वास करें तो देश का सफाई-प्रसार (सैनिटेशन कवरेज) जो 2012-13 में 38.64 फीसदी था वह 2016-17 में 60.53 फीसदी है. 2014 से अब तक करीब तीन करोड़ 88 लाख शौचालय बनवाए गये हैं. एक लाख 80 हजार गांव, 130 जिले और तीन राज्य- सिक्किम, हिमाचल और केरल- खुले में शौच मुक्त घोषित कर दिये गये हैं. दावा है कि इस वर्ष के अंत तक गुजरात हरियाणा, पंजाब, मिजोरम और उत्तराखण्ड भी इस श्रेणी में आ जाएंगे.

जमीनी हकीकत बहुत फर्क है. देश में शायद ही ऐसा कोई नगर निगम, नगर पालिका या पंचायत हो जिसके पास अपने क्षेत्र में रोजाना निकलने वाले कचरे को उठाने और कायदे से उसे निपटाने की क्षमता हो. जो कचरा उठाया जाता है, किसी बाहरी इलाके में उसका पहाड़ बनता जाता है. सिर पर मैला ढोने की कुप्रथा आज भी कायम है. खुले में शौच की मजबूरी का नारकीय उदाहरण तो रोज सुबह ट्रेन की पटरियों और खेतों-मैदानों में दिखाई ही देता है.

प्रधानमंत्री और सारे मंत्री चाहे जितना झाड़ू उठा लें, कचरा प्रबंधन और नगर निगमों-नगर पालिकाओं की क्षमता बढ़ाए बिना शहर और कस्बे साफ नहीं हो सकते. नागरिकों को सफाई अपने व्यवहार का हिस्सा बनानी होगी. इन मोर्चों पर क्या हो रहा है?

स्वच्छ भारत मिशन का सारा जोर खुले में शौच को बंद करना है. जिलाधिकारियों पर अपने जिले को इससे मुक्त घोषित करने का दवाब है. उसी दवाब के चलते कहीं लुंगी खुलवाई जा रही है, कहीं टोर्च चमकाया जा रहा है और कहीं भारी जुर्माना थोपा जा रहा है. क्या ऐसे अपमान और आतंक से लोगों को समझाया जा सकता है? स्वच्छ भारत मिशन की दिशा-निर्देशिका कहती है कि गांव-गांव स्वच्छता-दूत तैनात किए जाएं जो लोगों को समझाएं कि खुले में शौच के क्या-क्या नुकसान हैं. लोगों को मोटीवेट करना है, अपमानित नहीं. कहां हैं स्वच्छता दूत और वे क्या कर रहे हैं?

बहुत सारे लोग शौचालय बनवा लेने के बावजूद खुले में जाना पसंद करते हैं. पुरानी आदत के अलावा ऐसा शौचालयों की दोषपूर्ण बनावट के कारण भी है. सरकारी दबाव और मदद से जो शौचालय बनवाए गये हैं, अधिसंख्य में पानी की आपूर्ति नहीं है. सोकपिटवाले शौचालयों में पानी कम इस्तेमाल करने की बाध्यता भी है. नतीजतन दड़बेनुमा ये शौचालय गंधाते रहते हैं. कपार्टके सोशल ऑडिटर की हैसियत से इस लेखक ने देखा है कि लोग ऐसे शौचालयों का प्रयोग करना ही नहीं चाहते. बल्कि, उनमें उपले, चारा और दूसरे सामान रखने लगते हैं.

एक बड़ी आबादी है जो शौचालय बनवा ही नहीं सकती. उनके लिए दो जून की रोटी जुटाना ही मुश्किल है. उत्तराखण्ड से लेकर बंगाल तक गंगा के तटवर्ती गांवों को खुले में शौच- मुक्त कर लेने के सरकारी दावे की पड़ताल में इण्डियन एक्सप्रेसने हाल ही में पाया कि लगभग सभी गावों में ऐसे अत्यंत गरीब लोग, जिनमें दलितों की संख्या सबसे ज्यादा है, अब भी खुले में निपटने जा रहे हैं. वे शौचालय बनवा पाने की हैसियत ही में नहीं हैं. सरकारी सहायता तब मिलती है जब शौचालय बनवा कर उसके सामने फोटो खिंचवाई जाए.

एक बड़ी आबादी शहरों-महानगरों में झुग्गी-झोपड़ियों में रहती है. मेहनत-मजदूरी करने वाले एक बोरे में अपनी गृहस्थी पेड़ों-खम्भों में बांध कर फुटपाथ या खुले बरामदों में गुजारा करते हैं. ऐसे लोगों के लिए सामुदायिक शौचालय बनवाने के निर्देश हैं. अगर वे कहीं बने भी हों तो उनमें रख-रखाव और सफाई के लिए शुल्क लेने की व्यवस्था है, जो इस आबादी को बहुत महंगा और अनावश्यक लगता है.

खुले में शौच से मुक्ति का अभियान सचमुच बहुत बड़ी चुनौती है. इसका गहरा रिश्ता अशिक्षा और गरीबी से है. सार्थक शिक्षा दिये और गरीबी दूर किये बिना सजा की तरह इसे लागू करना सरकारी लक्ष्य तो पूरा कर देगा लेकिन सफलता की गारण्टी नहीं दे सकता.  (प्रभात खबर, 04 अक्टूबर 2017)
  

  

दो मस्जिदें- जवाहरलाल नेहरू

(फरवरी 1935 में लिखा गया जवाहरलाल नेहरू का यह लेख उस दौरान हुए लाहौर शीशगंज गुरुद्वारा बनाम मस्जिद के विवाद पर केंद्रित था. मूल लेख , जिसका शीर्षक "दो मस्जिदें" था, का यह सम्पादिन अंश आज के साम्प्रदायिक और तनावपूर्ण माहौल में बहुत प्रासंगिक है- नवीन जोशी)  

आजकल अखबारों में लाहौर की शहीदगंज मस्जिद की प्रतिदिन कुछ-न-कुछ चर्चा होती है। शहर में काफी खलबली मची हुई है। दोनों तरफ महजबी जोश दिखता है। एक-दूसरे पर हमले होते हैं, एक-दूसरे की बदनीयती की शिकायतें होती हैं और बीच में एक पंच की तरह अंग्रेज-हुकूमत अपनी ताकत दिखलाती है। मुझे न तो वाकयात ही ठीक-ठाक मालूम है कि किसने यह सिलसिला पहले छेड़ा था या किसकी गलती थी और न इसकी जांच करने की ही मेरी कोई इच्छा है। इस तरह के धार्मिक जोश में मुझे बहुत दिलचस्पी भी नहीं है, लेकिन दिलचस्पी हो या न हो, जब वह दुर्भाग्य से पैदा हो जाए, तो उसका सामना करना ही पड़ता है। मैं सोचता था कि हम लोग इस देश में कितने पिछड़े हुए हैं कि अदना-सी बातों पर जान देने को उतारू हो जाते हैं, पर अपनी गुलामी और फाकेमस्ती सहने को तैयार रहते हैं।

इस मस्जिद से मेरा ध्यान भटककर एक दूसरी मस्जिद की तरफ जा पहुंचा। वह बहुत प्रसिद्ध ऐतिहासिक मस्जिद है और करीब चौदह सौ वर्ष से उसकी तरफ लाखों-करोड़ों निगाहें देखती आई हैं। वह इस्लाम से भी पुरानी है और उसने अपनी इस लंबी जिंदगी में न जाने कितनी बातें देखीं। उसके सामने बड़े-बड़े साम्राज्य गिरे, पुरानी सल्तनतों का नाश हुआ, धार्मिक परिवर्तन हुए। खामोशी से उसने यह सब देखा। बुजुर्गी और शान उसके एक-एक पत्थर से टपकती है। क्या सोचते होंगे उसके पत्थर, जब वे आज भी अपनी ऊंचाई से मनुष्यों की भीड़ को देखते होंगे- बच्चों के खेल, बड़ों की लड़ाई, फरेब और बेवकूफी? हजारों वर्षो में इन्होंने कितना कम सीखा! कितने दिन और लगेंगे कि इनको अक्ल और समझ आए?
ईसा की चौथी सदी खत्म होने वाली थी, जब कांसटेंटिनोपल (उर्फ कुस्तुंतुनिया) का जन्म हुआ। कुस्तुंतुनिया में सम्राटों की आज्ञा से बड़ी-बड़ी इमारतें बनीं और बहुत जल्दी वह एक विशाल नगर हो गया। उस समय यूरोप में कोई दूसरा शहर उसका मुकाबला नहीं कर सकता था- रोम भी बिल्कुल पिछड़ गया था। वहां की इमारतें नई तर्ज की बनीं, भवन बनाने की नई कला का प्रादुर्भाव हुआ, जिसमें मेहराब, गुंबज, बुजिर्यां, खंभे इत्यादि अपनी तर्ज के थे और जिसके अंदर खंभों आदि का बारीक मोजाइक (पच्चीकारी) का काम होता था। यह इमारती कला बाइजेंटाइन कला के नाम से प्रसिद्ध है। छठी सदी में कुस्तुंतुनिया में एक आलीशान कैथीड्रल (बड़ा गिरजाघर) इस कला का बनाया गया, जो सांक्टा सोफिया या सेंट सोफिया के नाम से मशहूर हुआ। सेंट सोफिया का केथीड्रल ग्रीक चर्च-धर्म का केंद्र था और नौ सौ वर्ष तक ऐसा ही रहा।
15वीं सदी में उसमानवी तुर्को ने कुस्तुंतुनिया पर फतह पाई। नतीजा यह हुआ कि वहां का जो सबसे बड़ा ईसाई केथीड्रल था, वह अब सबसे बड़ी मस्जिद हो गई। सेंट सोफिया का नाम आया सुफीयाहो गया। उसकी यह नई जिंदगी भी लंबी निकली- सैकड़ों वर्षो की। वह आलीशान मस्जिद एक ऐसी निशानी बन गई, जिस पर दूर-दूर से निगाहें आकर टकरातीं थीं और बड़े मंसूबे गांठती थीं। उन्नीसवीं सदी में तुर्की साम्राज्य कमजोर हो रहा था। रूस कुस्तुंतुनिया की ओर लोभ भरी आंखों से देखता था। रूस के जार अपने को पूर्वी रोमन सम्राटों के वारिस समझते थे और उनकी पुरानी राजधानी को अपने कब्जे में लेना चाहते थे। रूस को यह असह्य था कि उसके धर्म का सबसे पुराना और प्रतिष्ठित गिरजा घर मस्जिद बनी रहे।
धीरे-धीरे 19वीं सदी में जारों का रूस कुस्तुंतुनिया की ओर बढ़ता गया, लेकिन उनके ये मंसूबे पूरे नहीं हुए। उसके पहले जारों का रूस ही खत्म हो गया। वहां क्रांति हुई और हुकूमत व समाज दोनों में उलट-फेर हो गया। बोलशेविकों नेघोषणा की कि वे (बोलशेविक) साम्राज्यवाद के विरुद्ध हैं और किसी दूसरे देश पर अपना अधिकार नहीं जमाना चाहते। हरेक जाति को स्वतंत्र रहने का अधिकार है। लेकिन अंग्रेजों ने कुस्तुंतुनिया पर कब्जा किया। 486 वर्ष बाद इस पुराने शहर की हुकूमत इस्लामी हाथों से निकलकर फिर ईसाई हाथों में आई। सुल्तान खलीफा जरूर मौजूद थे, लेकिन वह एक गुड्डे की भांति थे। जिधर मोड़ दिए जाएं, उधर ही घूम जाते थे। आया सुफीया भी हस्बमामूल खड़ी थी और मस्जिद भी, लेकिन उसकी वह शान कहां, जो आजाद वक्त में थी, जब स्वयं सुलतान उसमें जुमे की नमाज पढ़ने जाते थे। सुलतान ने सिर झुकाया, खलीफा ने गुलामी तसलीम की, लेकिन चंद तुर्क ऐसे थे, जिनको यह स्वीकार न था। उनमें से एक मुस्तफा कमाल थे, जिन्होंने गुलामी से बगावत को बेहतर समझा।
मुस्तफा कमाल पाशा ने अपने देश से ग्रीक फौजों को बुरी तरह हराकर निकाला। उन्होंने सुलतान खलीफा को, जिसने अपने मुल्क के दुश्मनों का साथ दिया था, गद्दार कहकर निकाल दिया। उन्होंने अपने गिरे और थके हुए मुल्क को हजार कठिनाइयों और दुश्मनों के होते हुए भी खड़ा किया और उसमें फिर से नई जान फूंक दी। पुरानी राजधानी कुस्तुंतुनिया का नाम भी बदल गया-वह इस्ताम्बूल हो गया।
और आया सुफीया? उसका क्या हाल हुआ? वह चौदह सौ वर्ष की इमारत इस्ताम्बूल में खड़ी है और जिंदगी की ऊंच-नीच को देखती जाती है। नौ सौ वर्ष तक उसने ग्रीक धार्मिक गाने सुने और अनेक सुगंधियों को, जो ग्रीक पूजा में रहती है, सूंघा। फिर चार सौ अस्सी वर्ष तक अरबी अजान की आवाज उसके कानों में आई। और अब?
एक दिन कुछ महीनों की बात है, इसी साल-1935 में-गाजी मुस्तफा कमाल पाशा के हुक्म से आया सुफीया मस्जिद नहीं रही। बगैर किसी धूमधाम के वहां के मुस्लिम-मुल्ला वगैरा हटा दिए गए और अन्य मस्जिदों में भेज दिए गए। अब यह तय हुआ कि आया सुफीया बजाय मस्जिद के संग्रहालय हो, खासकर बाइजेंटाइन कलाओं का। बाइजेंटाइन जमाना तुर्को के आने से पहले का ईसाई जमाना था। इसलिए अब आया सुफीया एक प्रकार से फिर ईसाई जमाने को वापस चली गई, मुस्तफा कमाल के हुक्म से।
आजकल जोरों से खुदाई हो रही है। जहां-जहां मिट्टी जम गई थी, हटाई जा रही है और पुराने पच्चीकारों के नमूने निकल रहे हैं। बाइजेंटाइन कला के जानने वाले अमेरिका और जर्मनी से बुलाए गए हैं और उन्हीं की निगरानी में काम हो रहा है। आप अंदर जाकर इस प्रसिद्ध पुरानी कला के नमूने देखिए और देखते-देखते इस संसार के विचित्र इतिहास पर विचार कीजिए, अपने दिमाग को हजारों वर्ष आगे-पीछे दौड़ाइए। क्या-क्या तस्वीरें, क्या-क्या तमाशे, क्या-क्या जुल्म आपके सामने आते हैं! उन दीवारों से कहिए कि वे आपको अपनी कहानी सुनावें, अपने तजुर्बे आपको दे दें। शायद कल और परसों जो गुजर गए, उन पर गौर करने से हम आज को समझों, शायद भविष्य के परदे को भी हटाकर हम झांक सकें।
लेकिन वे पत्थर और दीवारें खामोश हैं। उन्होंने इतवार की ईसाई-पूजा बहुत देखी और बहुत देखी जुमे की नमाजें। अब हर दिन की नुमाइश है उनके साये में! दुनिया बदलती रही, लेकिन वे कायम हैं। उनके घिसे हुए चेहरे पर कुछ हल्की मुस्कराहट-सी मालूम होती है और धीमी आवाज-सी कानों में आती है-इंसान भी कितना बेवकूफ और जाहिल है कि वह हजारों वर्ष के तजुर्बे से नहीं सीखता और बार-बार वही हिमाकतें करता है।
(राजनीति से दूर- जवाहरलाल नेहरू से साभार) 


Friday, September 29, 2017

पत्रकारिता का ‘पेट’ और दिमाग


पत्रकारों पर इधर हमले ही बहुत नहीं हुए, दलगत और व्यक्तिगत निष्ठाओं के लिए भी उनकी खूब लानत-मलामत हो रही है. आरोप-प्रत्यारोप और व्यक्तिगत हमलों तक पहुंचे इस संग्राम से सोशल साइट्स भरे पड़े हैं. कई वरिष्ठ पत्रकार भी इस अप्रिय विवाद में जूझे हुए हैं. पत्रकारिता के स्तर, पत्रकारों की नयी पीढ़ी की भाषा, विषयों की उसकी समझ, आदि पर चर्चा कम ही होती है. वैसे तो संस्कृति, अपराध, संसदीय, लगभग सभी क्षेत्रों की रिपोर्टिंग में कई बार रिपोर्टर के अज्ञान और सम्पादन की लापरवाहियों से हास्यास्पद खबरें छपी मिलती हैं. मेडिकल रिपोर्टिंग की स्थिति तो अक्सर बड़ी दयनीय दिखाई देती है.
बीते शुक्रवार की सुबह लखनऊ के एक हिंदी दैनिक में यह खबर पढ़कर हम चौंके कि लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान में पेट की सीटी मशीनलगाने की स्वीकृति मिल गयी है. खबर कह रही थी कि “संस्थान के निदेशक डॉ दीपक मालवीय ने बताया कि पेट की सीटी मशीन......” कोई डॉक्टर तो ऐसा नहीं कह सकता. हमने एनबीटी समेत कुछ दूसरे अखबार देखे तो बात साफ हुई. बात “पेट की सीटी मशीन” की नहीं, “पेट” जांच मशीन की है. पोजिट्रॉन एमीशन टोमोग्राफी यानी पी ई टी जांच को संक्षेप में “पेट” कहा जाता है, जिससे कैंसर समेत शरीर की विभिन्न जटिल व्याधियों की पहचान आसानी से हो जाती है. बेचारे उस रिपोर्टर ने पेट” को शरीर का अंग, पेट समझ लिया, लिख दिया और छप गया.
बताने-समझाने-सिखाने वाले सम्पादक और वरिष्ठ पत्रकार अब कम होते जा रहे हैं. पठन-पाठन, शोध, सलाह-मशविरे, और सीखते रहने की प्रवृत्ति नये पत्रकारों में लगभग गायब है. कभी अपनी कॉपी’ (खबर) जंचवाने में नयी पीढ़ी के पसीने छूटते थे. क्लास लग जाती थी. कुछ गुस्सैल सम्पादक रिपोर्टर के मुंह पर कॉपी दे मारते थे. अब लाखों की फीस लेने वाले पत्रकारिता संस्थानों से प्रशिक्षितयुवाओं की बड़ी फौज आने के बावजूद यह हाल है. आखिर वे वहां क्या सीखते हैं और सिखाने वाले क्या सिखाते हैं? इतना तो सिखाया ही जाना चाहिए कि जो बात आपको खुद समझ में नहीं आ रही, उसे पाठक क्या समझेंगे? इसलिए या तो पूछ कर समझ लीजिए या फिर उस बात को लिखिए ही नहीं.  
टूटे-फूटे स्ट्रेचर से लेकर डॉक्टर की लापरवाही से मरीज की मौतजैसी खबरों तक सीमित मेडिकल रिपोर्टिग के बारे में वरिष्ठ डॉक्टर कभी शिकायत और हंसी-मजाक किया करते थे. पीजीआई के एक प्रोफेसर ने कभी मेडिकल रिपोर्टिंग पर कार्यशाला का सुझाव दिया था. एक डॉक्टर मित्र ने हाल में एक खबर दिखाकर सवाल उठाया था कि डॉक्टर ने ऑपरेशन में लापरवाही कीलिखने वाला रिपोर्टर यह भी तो लिखे कि क्या गलती हुई. तब मन में सवाल उठा था कि मेडिकल रिपोर्टर डॉक्टर न सही, पैरा-मेडिकल स्टाफ की तरह प्रशिक्षित  क्यों नहीं होना चाहिए? और यह बात हर बीट पर लागू क्यों नहीं होनी चाहिए? ऐसा दिन कभी आएगा?
पत्रकारों के लिए पहले एक कहावत मशहूर थी- “जैक ऑफ ऑल ट्रेड्स एण्ड मास्टर ऑफ वन.” यानी उन्हें हर विषय के बारे में थोड़ा-थोड़ा जानना चाहिए लेकिन एक विषय का विशेषज्ञ होना चाहिए. अब तो लगता है कि पत्रकारों ने अपने को हर विषय का पैदाइशी विशेषज्ञ मान लिया है. सीखने की जरूरत ही नहीं. वैसे भी रिपोर्टर जो लिख देता है, वैसा ही छप जाता है. ज्यादातर जगह सम्पादन नाम की चिड़िया फुर्र हो गयी.
निष्ठा जताने के लिए भी आखिर कुछ समझ और भाषा की जरूरत होती होगी!
(सिटी तमाशा, नभाटा, 30 सितम्बर 2017)


  


Friday, September 22, 2017

स्वच्छ भारत बनाम ट्रेन की पटरियां


लखनऊ में मेट्रो ट्रेन शुरू होने के चंद रोज बाद सोशल साइट्स पर एक वीडियो वायरल हुआ. एक प्रौढ़ व्यक्ति अपनी धोती समेटे डिब्बे के भीतर सू-सू करने के अंदाज़ में बैठे हुए हैं. निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता कि वे सचमुच वही कर रहे थे जो करते-जैसे दिखाई दे रहे हैं या यह भी कोई सोशल साइट्स का फोटोशॉप तमाशा है? कर भी रहे हों तो क्या आश्चर्य. ट्रेनें हमारे यहां लघु और दीर्घशंका के लिए बहुत उपयुक्त जगह मानी जाती रही हैं. ट्रेन प्लेटफॉर्म पर खड़ी हो या यार्ड में या आउटर पर सिगनल हरा होने का इंतजार कर रही हो, आस-पास के लोग दीर्घ न सही लघु शंका तो फटाफट निपटा ही लेते हैं.
टॉयलेट- एक प्रेम कथामें भी आपने देखा होगा कि नायक अपनी नव-ब्याहता को रोज सुबह शौच के लिए स्टेशन ले जाता है, जहां दो मिनट के लिए एक ट्रेन रुकती है. ट्रेनों के शौचालय बहुत सारे लोगों के लिए ऐसी ही राहत होते हैं. अपने मेट्रो वालों ने विदेशी कोच मंगवा लिए या उसकी तर्ज पर अपने यहां कोच बना लिए. उन्होंने भारतीय यात्रियों का ध्यान रखा ही नहीं. यहां मेट्रो ट्रेन के डिब्बों में भी शौचालय चाहिए, पीकदान चाहिए. नहीं बनाएंगे तो कहीं भी निपटा जाएगा, ओने-कोने थूका जाएगा. वैसे, पीकदान में थूकना भी हम तौहीन ही समझते हैं.
स्वच्छ भारत अभियानचलाने वाले हमारे प्रधानमंत्री और उस पर जोर-शोर से अमल कराने वाले अपने मुख्यमंत्री योगी को चाहिए कि वे ट्रेन-पटरियों के किनारे-किनारे हर आधा किमी पर शौचालय बनवा दें. हमारे देश में पटरियों के किनारे सुबह-सुबह जो दृश्य दिखाई देता है, वह विश्वविख्यात है. कई विदेशी यात्री उस पर रोचक टिप्पणियां लिख चुके हैं. पटरियों के दोनों तरफ रेलवे की जमीन पर अवैध रूप से बसी झुग्गी-झोपड़ियों वाले ही नहीं, साहबों की कोठियों के चाकर भी डबा-बोतल लेकर सुबह-सुबह पटरियों की तरफ दौड़ते हैं.
अगर खुले में शौच-मुक्त देश बनाना है तो रलवे बजट में विशेष प्रावधान करना होगा ताकि पटरियों के किनारे-किनारे शौचालय बनाए जा सकें. इसका एक अतिरिक्त लाभ रेलवे को हो सकता है. पटरियों के किनारे शौच करने वालों को पटरियों की देखभाल का जिम्मा दिया जा सकता है. आजकल वैसे भी ट्रेनों के पटरियों से उतरने के मामले बहुत बढ़ गये हैं. पटरियों के सतत निरीक्षण के लिए इतना विशाल अमला रेलवे नियुक्त नहीं कर सकता. शौच के लिए रेलवे की शरण आने वाले पटरी-सुरक्षा के अवैतनिक मुस्तैद सिपाही हो सकते हैं.
जहां तक लघुशंका निवारण का सवाल है, उसके लिए भारतीय पुरुषों के पास अनंत आकाश के नीचे जगह ही जगह है. टेलीफोन और बिजली के खम्बों की दुर्गति के लिए हम बेवजह ही बेचारे कुत्तों को दोष देते हैं. आदमियों ने तो दीवारों का सीमेण्ट-प्लास्टर तक गला डाला है. किसी भी ब्राण्ड का सीमेण्ट निरंतर प्रवहमान उस धार के सामने टिक नहीं सकता.
पिछले साल उत्तर प्रदेश परिवहन निगम ने फैसला किया था कि राज्य के सभी बस स्टेशनों में खुफिया कैमरे लगाए जाएंगे जो दीवारें खराब करने वालों की तस्वीर (पीछे से) खींच लेंगे. ये तस्वीरें सोशल साइटों पर डाली जाएंगी ताकि ऐसा करने वाले शर्मिंदा हों और दूसरों को भी सबक मिले.
मुझे पूरी उम्मीद है कि परिवहन निगम ने अपने फैसले पर अमल नहीं किया होगा. इससे यहां कौन शर्मिंदा होता है. उलटे, लोग खुद ही सेल्फी अपलोड करने लगेंगे. मेट्रो वाले साहबान सुन रहे हैं?    

 (सिटी तमाशा, नभाटा, 23 सितम्बर 2017)

शिवपाल की बेचैनी है सपा के नये संग्राम का कारण


समाजवादी पार्टी के आपसी संग्राम का नया मोर्चा खुल गया है तो यही मानना चाहिए कि शिवपाल अपने सगे बड़े भाई मुलायम की तरह राजनीति के नेपथ्य में जाने करने को तैयार नहीं हैं. इसीलिए उन्होंने मुलायम को आगे करके शांत लग रही चिंगारियों को हवा दे दी है.
मुलायम के मन में चिंगारी हो, न हो, शिवपाल के मन में तो लावा उबल रहा है. उन्हें अपनी खोयी राजनैतिक जमीन पाने के लिए कुछ न कुछ करते रहना है. इसलिए अब लोहिया ट्रस्ट के सचिव पद से रामगोपाल यादव को हटा दिया गया है. उस जगह पर मुलायम ने शिवपाल यादव को नियुक्त कर दिया है. रामगोपाल मुलायम के चचेरे भाई हैं और अखिलेश के साथ डट कर खड़े हैं.
शिवपाल की ताजा बेचैनी यह है कि 23 सितम्बर को समाजवादी पार्टी का प्रदेश सम्मेलन हो रहा है. उसमें सपा का नया प्रदेश अध्यक्ष चुना जाना है. पांच अक्टूबर को आगरा में राष्ट्रीय सम्मेलन भी होने वाला है. शिवपाल को औपचारिक निमंत्रण तक नहीं मिला है, जबकि वे मांग कर रहे हैं कि मुलायम को फिर से सपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया जाए.
उन्हें लगता होगा कि अखिलेश पर दवाब डालने का यह बढ़िया मौका है और दवाब डालने के लिए उनके पास एक ही तुरुप है- मुलायम सिंह. चूंकि मुलायम सीधे अखिलेश पर निशाना साधेंगे नहीं, इसलिए वार हुआ रामगोपाल पर. मुलायम भी रामगोपाल ही को सारे झगड़े की जड़ मानते हैं.
रामगोपाल की पहल पर ही समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर मुलायम सिंह की जगह अखिलेश को चुना गया. रामगोपाल ने ही निर्वाचन आयोग में पैरवी करके सपा का चुनाव निशान साइकिल अखिलेश खेमे को दिलावा दिया था. मुलायम आयोग के समक्ष कुछ भी साबित नहीं कर सके थे.
इसलिए रामगोपाल को लोहिया ट्रस्ट से निकाल दिया गया है. वैसे, लोहिया ट्रस्ट कोई राजनैतिक संगठन है नहीं. वह लोहिया जी के विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए बना ट्रस्ट है. मुलायम जरूर इसे पार्टी का महत्वपूर्ण संगठन मानते हैं. अखिलेश ने मुख्यमंत्री बनने के बाद छोटे लोहिया कहलाने वाले जनेश्वर मिश्र के नाम पर भी ऐसा ही संगठन बनाया है.
तो, अखिलेश पर दवाब बढ़ाने के लिए शिवपाल ने एक और दांव चला है. उन्होंने बताया कि नेता जी 25 सितम्बर को (सपा के प्रदेश सम्मेलन के दो दिन बाद) सम्वाददाता सम्मेलन में महत्त्वपूर्ण घोषणा करेंगे. अब सभी यह कयास लगाने में लगे हैं कि मुलायम कौन सी महत्वपूर्ण घोषणा कर सकते हैं.
क्या वे नयी पार्टी बनाने का ऐलान करेंगे? इसके आसार नहीं हैं, क्योंकि उनके अत्यंत करीबी और कट्टर समर्थक भी मान चुके हैं कि मुलायम अब नयी पार्टी खड़ी करने की स्थिति में नहीं है. भविष्य तो अखिलेश हैं. इसीलिए लगभग सभी अखिलेश के साथ चले गये. एक बार शिवपाल ने नयी पार्टी बनाने का ऐलान भी किया था, लेकिन तब मुलायम ने जानकारी न होने की बात कह कर उन्हें एक तरह से बरज दिया था.
मुलायम सपा के संरक्षक होने के नाते अखिलेश को यह आदेश भी नहीं देंगे कि शिवपाल को पार्टी में सम्मानजनक स्थान दीजिए. मुलायम जानते हैं कि अखिलेश और रामगोपाल उनकी यह बात नहीं मानेंगे. ऐसी असफल कोशिश वे पहले कर चुके हैं. खुद शिवपाल दोयम दर्जे के नेता के रूप में अब नहीं लौटना चाहेंगे.
तो, क्या वे शिवपाल को आशीर्वाद देंगे कि वह एक समाजवादी मोर्चा बना लें? शिवपाल की तो ऐसी ही इच्छा है, जो वे एकाधिक बार व्यक्त भी कर चुके हैं. अब तक मुलायम उन्हें इसके लिए हतोत्साहित करते रहे हैं. अलग मोर्चा बनाकर शिवपाल सपा का अपना खेमा बढ़ाने और अन्य दलों से हाथ मिलाने की कोशिश कर सकते हैं. राजनैतिक दांव-पेच के लिए कम से कम एक अखाड़ा उन्हें मिल जाएगा.
यह भी हो सकता है कि 25 सितम्बर को नेता जी कोई खास ऐलान करें ही नहीं. यह सिर्फ शिवपाल की कोरी घोषणा साबित हो. इधर काफी समय से मुलायम अक्सर अपनी बातों से पलटते रहे हैं. और, 25 सितम्बर को किसी ऐलान की बात खुद मुलायम ने कही भी नहीं है. 
दरअसल, सेहत और उम्र का तकाजा देख कर मुलायम ने शायद अब अपना वानप्रस्थ मान लिया है. अखिलेश ने उनके सम्मान में कोई कमी भी नहीं की है. उन्हें पार्टी का संरक्षक बनाया है.
लेकिन शिवपाल अभी कैसे वानप्रस्थ में चले जाएं? राजनीति के हिसाब से वे अभी युवा ही हैं और महत्वाकांक्षा भी कोई कम नहीं. उन्हें लड़ना है और राजनीति में अपनी जगह बनानी है. मुलायम के साथ कंधे से कंधा मिला कर जो पार्टी खड़ी की थी, जिस संगठन पर उनकी पकड़ होती थी, उसे भतीजा ले गया. अब अकेले मुलायम ही उनके सहारा हैं. तुरुप का बड़ा पत्ता, जिसे वे जब-तब दिखाते रहते हैं.
इसीलिए वे बार-बार मांग करते हैं कि मुलायम सिंह को सपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष पद लौटाया जाए. विधान सभा चुनाव में सपा की बड़ी पराजय के बाद तो उन्होंने यह मांग जोर-शोर से उठाई थी. उनका तर्क था कि मुलायम के रहते पार्टी की यह हालत नहीं होती.
लेकिन उनकी सुन कौन रहा है, मुलायम के सिवा!
(http://hindi.firstpost.com/politics/shivpal-singh-yadav-uneasiness-and-fear-is-main-cause-of-new-and-fresh-dispute-of-samajwadi-party-pr-55539.html) 

   

Tuesday, September 19, 2017

बड़े बांध विरोधी स्वर तेज हो रहे


कई तकनीकी एवं कानूनी रुकावटों और लम्बे जन-आंदोलनों के बावजूद सरदार सरोवर बांध अंतत: अपनी पूरी ऊंचाई के साथ हकीकत बन गया. मगर एक आदिवासी के विस्थापन की तुलना में सात आदिवासियों को लाभ पहुंचाने’ के दावे वालेदुनिया के दूसरे सबसे बड़े इस बांध के उद्घाटन के साथ बड़े बांधों के व्यापक नुकसान की चर्चा थम नहीं गयी है. बड़े बांधों के खिलाफ आवाज बुलंद करने वालों के तेवर और तर्क अपनी जगह कायम हैं. बल्किसरदार सरोवर के उद्घाटन के बाद वे और ज्यादा गूंजने लगे हैं.
यह सवाल और भी शिद्दत से पूछा जाने लगा है कि क्या विकास के लिए बड़े बांध जरूरी हैंक्या बड़े बांधों के आर्थिक लाभ एक विशाल आबादी के अपने समाजसंस्कृतिपेशेजमीनरिश्तोंजीवन शैली और पर्यावरण से बेदखल होने की भरपाई कर सकते हैंक्या छोटे-छोटे कई बांध उनका विकल्प नहीं हो सकते?
यह संयोग नहीं है कि सरदार सरोवर बांध के उद्घाटन के दरम्यान उत्तराखण्ड में नेपाल सीमा पर महाकाली नदी पर प्रस्तावित पंचेश्वर बांध के विरोध में जनता आंदोलन कर रही है. पंचेश्वर दक्षिण एशिया की सबसे बड़ी जल विद्युत परियोजना बतायी जाती है. यह टिहरी बांध से तीन गुणा बड़ा होगा जो पिथौरागढ़चम्पावत और अल्मोड़ा जिलों की चौदह हजार जमीन पानी में डुबो देगा. 134 गांवों के करीब 54 हजार लोग विस्थापित हो जाएंगे. विस्थापित होने वाले लोगों के समूल उजड़ने की त्रासदी सिर्फ आंकड़ों से नहीं समझाई जा सकती. त्रासदी को कई गुणा बढ़ा देने वाली सच्चाई यह है कि विस्थापित लोगों के लिए राहत और पुनर्वास की ठीक-ठाक व्यवस्था करने में हमारी सरकारें कुख्यात हैं.
विरोध टिहरी बांध का भी बहुत हुआ था लेकिन 2007 में उसे पूरा कर दिया गया. दावा था कि उससे 2400 मेगावाट बिजली बनेगी. हकीकत यह है कि आज उससे बमुश्किल 1000 मेगावाट बिजली पैदा हो पा रही है. सैकड़ों गांवों के जो हजारों लोग विस्थापित हुए थे उनमें से बहुत सारे आज भी उजड़े ही हैं. टिहरी नगर की जो प्राचीन सभ्यता डूबी उसकी क्षति का कोई हिसाब नहीं. टिहरी बांध से विस्थापित नहीं होने वाले किंतु उस प्राचीन नगर से जुड़े कई गांवों की आर्थिकी और जीवन शैली नष्ट हो गईउसका भी कोई सरकारी हिसाब नहीं.
हिमालय की कमजोर शैशवावस्था और भूकम्प के बड़े खतरों के तर्क भी टिहरी बांध के समय नहीं सुने गये थे. अब पंचेश्वर बांध के समय तो बांध विरोधी जनता के तर्क सुनने का धैर्य भी नहीं दिखाया जा रहा. इस सवाल का जवाब देने वाला कोई नहीं है कि अगर टिहरी बांध अपनी घोषित क्षमता का एक तिहाई ही विद्युत उत्पादन कर पा रहा है तो क्या गारण्टी है कि पंचेश्वर बांध से 5040 मेगावाट बिजली बन ही जाएगी? और उत्तराखण्ड के बेहतर आबाद, उपजाऊ क्षेत्र से बड़ी आबादी का विस्थापन और पर्यावरण की व्यापक क्षति उसके लिए किस तरह उचित है?
बड़े बांध बनाने के मामले में भारत का दुनिया में तीसरा नम्बर है. राहत और पुनर्वास के मामले में वह फिसड्डी ही ठहरेगा. आजादी के बाद हीराकुण्ड बांध पहला था, जिसका उद्घाटन करते हुए जवाहरलाल नेहरू ने बांधों को ‘आधुनिक भारत के मंदिर’ बताया था. विस्थापितों की समस्या पर तब उन्होंने राष्ट्रीय भावनाओं से ओत-प्रोत वक्तव्य दिया था कि देश के हित में तकलीफ उठानी चाहिए.’ देश के हित में तकलीफ उठाने का हाल यह है कि हीराकुंड और भाखड़ा नंगल बांधों से विस्थापित होने वाले लाखों लोगों में से कई के वंशज आज भी पुनर्वास का इंतजार करते हुए रिक्शा चला रहे हैं या मजदूरी कर रहे हैं. बाद-बाद में नेहरू जी बांधों से विस्थापित होने वाली जनता के प्रति ज्यादा संवेदनशील हो गये थेसन 1958 में भाखड़ा नंगल बांध का उद्घाटन करते हुए उन्होंने कहा था कि भारत विशालता के रोग’ से पीड़ित हो रहा है. उसी दौरान मुख्यमंत्रियों को लिखे एक पत्र में उन्होंने इस बात पर जोर दिया था कि विकास परियोजनाओं की जरूरत और पर्यावरण की सुरक्षा की आवश्यकता में संतुलन बनाया जाना चाहिए.
जब सरदार सरोवर बांध की योजना बनी थी यानी आज से सात-आठ दशक पहले तब बड़े बांधों के बारे में  समझ एकतरफा थी. सोचा यह गया था कि नदियों की क्षमता का बेहतर उपयोग होगाप्रदूषण-मुक्त बिजली मिलेगी और दूर-दूर तक खेतों की सिंचाई हो सकेगी. लेकिन पचास के दशक तक आते-आते इससे उपजने वाली बड़ी समस्याएं सामने आने लगी थीं. नेहरू जी का विचार-परिवर्तन इसी का नतीजा था.
अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी बड़े बांधों  के तुलनात्मक लाभों पर सवाल उठने लगे थे. दुनिया भर में एक बड़ा वर्ग बड़े स्तर पर जन-जीवन के अस्त-व्यस्त होने के अलावा बांधों के क्षेत्र में जैविकी एवं पर्यावरण के तहस-नहस होने का मुद्दा उठाने लगा. उनकी आवाज को व्यापक समर्थन मिला. अकेले अमेरिका में अब तक करीब एक हजार बांध ध्वस्त किये जाने की चर्चा करने वाले लेख इण्टरनेट पर मौजूद हैं. अब तो वहां मध्यम आकार के बांधों को भी पानी की गुणवत्ता और नदी की सम्पूर्ण जैविकी को नष्ट करने वाला माना जाने लगा है. मिस्र में नील नदी के प्रवाह-क्षेत्र में व्यापक क्षरणकृषि-उत्पादन में गिरावट और कई परजीवी-जनित रोगों के लिए आस्वान बांध को जिम्मेदार ठहराया जाता है.
हमारे देश में बड़े बांधों से उपजी समस्याएं और भी ज्वलंत इसलिए हैं  क्योंकि विस्थापित जनता को राहत देने  और उनके पुनर्वास के मामले में घोर संवेदनहीनता बरती गयीं. सरदार सरोवर और टिहरी बांधों के विरोध में छिड़े व्यापक आंदोलनों ने इन मुद्दों को जोर-शोर से उठाया. उन्हें समर्थन भी काफी मिला. नर्मदा बचाओ आंदोलन का ही नतीजा था कि सरदार सरोवर बांध के लिए मदद दे रहे विश्व बैंक ने बाद में अपनी शर्तें काफी कड़ी बना दीं जो भारत सरकार को मंजूर नहीं हुईं और मदद अस्वीकार कर दी गयी.
सरदार सरोवर बांध के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने भी राहत और पुनर्वास के सवालों को अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना. एक समय तो उसने बांध के निर्माण पर रोक लगा दी थी. बाद में पूरी ऊंचाई तक निर्माण की इजाजत देते हुए विस्थापितों के पर्याप्त पुनर्वास और राहत प्रक्रिया की नियमित देख-रेख करते रहने के निर्देश दिये थे.

बांध-विरोधी आंदोलनकारी टिहरी बांध का बनना रोक सके न सरदार सरोवर बांध को. सरकारों के तेवर से लगता है कि पंचेश्वर बांध भी बन कर रहेगा. इतने वर्षों के आंदोलन की सफलता यह है कि राहत और पुनर्वास के मुद्दों पर राष्ट्रव्यापी जागरूकता फैली है. इस तर्क को भी व्यापक स्वीकृति मिली है कि बड़े बांधों या विशाल परियोजनाओं वाले विकास-मॉडल का विकल्प अपनाया जाना चाहिए.
(प्रभात खबर, 20 सितम्बर 2017) 

Friday, September 15, 2017

बच्चों की घुट्टी में डर और सतर्कता ?


मुझे कुछ दिन से रवींद्रनाथ टैगोर की कहानी काबुलीवालाबहुत याद आ रही है. काबुलीवाला जैसे मुहब्बत वाले इनसान बहुत होंगे और इनसान के रूप में शैतान बहुत कम मगर क्या अब कोई बच्ची किसी काबुलीवाले को प्यार से पुकार नहीं सकेगी? क्या सभी बच्चों को सिखाना होगा कि हर बाहरी आदमी खूंखार हत्यारा और बलात्कारी है? कोई काबुलीवाला किसी नन्हीं बच्ची में अपनी बिटिया का चेहरा नहीं देख सकता? छोटे बच्चे, या हम बड़े भी नकली और असली काबुलीवाला में भेद कैसे करें
गुड़गांव के एक स्कूल में सात साल के बच्चे की हत्या ने सबकी रूह कंपा दी है. एक हफ्ते से ज्यादा हो गया, यह दर्दनाक खबर सुर्खियों में बनी हुई है. इस बहाने बच्चों की सुरक्षा पर हर छोटे-बड़े शहर में हर कोण से विमर्श हो रहा है. केंद्र से लेकर राज्यों की सरकारें तक बच्चों की सुरक्षा के उपाय सुझाने में लगी हैं. सरकारें, प्रशासन. स्कूल प्रबंधन और अभिभावक सभी चिंतित और सतर्क दिखाई दे रहे हैं.
स्कूलों में जगह-जगह खुफिया कैमरे लगाने, स्कूल-वाहनों के ड्राइवर-कण्डक्टर से लेकर सभी टीचरों एवं बाकी कर्मचारियों का पुलिस सत्यापन कराने जैसे उपायों पर जोर दिया जा रहा है. अभिभावकों को सलाह दी जा रही है कि वे अपने बच्चों पर निगाह रखें, उनकी बात ध्यान से सुनें और उनके साथ समय बिताएं.  
बेतहाशा भागती आज की दुनिया में अबोध बच्चे सबसे ज्यादा खतरे में हैं. अभिभावकों की आपा-धापी ने इस खतरे को बढ़ाया है. बच्चे आज अकेले और भावनात्मक रूप से उपेक्षित हैं. टेक्नॉलॉजी ने एक झटके में सारी दुनिया उनके सामने खोल दी है. इस रहस्य को साझा करने या समझाने वाले उनके पास नहीं हैं. स्कूल पवित्र स्थान नहीं, दुकान है. महंगी दुकान में बच्चे को पहुंचा कर गौरवान्वित माता-पिता को इस गोरखधंधे की तरफ देखने की फुर्सत नहीं. दुकान वालों को सिर्फ धंधे के मुनाफे से मतलब है. 
गुड़गांव के स्कूल में सुरक्षा की चूक थी कि कण्डक्टर बच्चों के शौचालय में चला गया. उसे स्कूल परिसर में प्रवेश की अनुमति नहीं होनी चाहिए थी.  परंतु जब स्कूल का ही चौकीदार या अध्यापक बच्चों को हवस का शिकार बनाए तो क्या कहेंगे? उसे किस चौकसी से रोकेंगे? खुफिया कैमरा अपराधी को पकड़ने में सहायक हो सकता है लेकिन अपराध होने को कैसे रोकेंगे?
मनुष्य के भीतर का शैतान  क्या अब ज्यादा जागने लगा है? क्या आजकल वह ज्यादा विवेकहीन और सम्वेदनहीन हो गया है? हमने स्कूल आते-जाते बच्चों से रिक्शा वालों और ड्राइवर-कण्डक्टरों के बड़े मोहिले रिश्ते देखे हैं. अनेक बार वे उनके सबसे अच्छे और निश्छल दोस्त होते हैं. अब क्या हर ऐसे रिश्ते को शक की निगाह से देखना होगा? क्या बच्चों से कहना होगा कि वे रिक्शा वाले से, स्कूल बस वाले से डरे-डरे रहें, उनसे बातचीत या दोस्ती न करें?
सात साल के बच्चे को क्या, किसी बड़े को भी यह कैसे समझाया जा सकता है कि दोस्त लगने वाला स्कूल बस का कण्डक्टर उसका गला रेत सकता है? या पांच साल की बच्ची को स्कूल के माली और चौकीदार या क्लास टीचर को शैतान समझना कैसे सिखाया जा सकता है? उनका बचपन ही कुचल देना होगा क्या? हमेशा सतर्क और डरे रहने की घुट्टी बच्चों को पिलानी होगी? इनसानी रिश्तों और कोमल भावनाओं की कोई जगह ही इस जमाने में नहीं होगी?
यह सोच कर भी तो रूह कांपती है!
(सिटी तमाशा, 16 सितम्बर, 2017)