Friday, May 18, 2018

ताकि किसी कीमत पर सरकारी बंगला न छूटे



अंतत: सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक पूर्व मुख्यमंत्रियों को जीवन भर के लिए आवण्टित सराकारी बंगले खाली करने का आदेश दे दिया. उम्मीद की जानी चाहिए कि समानता के सिद्धांत का उल्लंघनअब बंद होगा. आलांकि आशंकाएं अब भी बनी हुई हैं. सपा के संरक्षक और पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने जिस तरह मुख्यमंत्री आदित्य नाथ योगी से मिलकर एक चोर दरवाजासुझाया था, वह हैरत ही नहीं करता, बल्कि आशंका भी पैदा करता है.

खबरों के मुताबिक मुलायम सिंह ने योगी जी को सुप्रीम कोर्ट के आदेश से बचने का रास्ता यह सुझाया कि उनकी और अखिलेश की कोठियां राम गोविंद चौधरी और अहमद हसन के नाम कर दी जाएं जो क्रमश: विधान सभा में नेता-प्रतिपक्ष और विधान परिषद में विपक्ष के नेता हैं. कागज में आवण्टी का नाम बदल जाएगा. सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पालन हो जाएगा और कोठियों में दोनों पूर्व मुख्यमंत्री काबिज रह जाएंगे. सांप मर जाएगा और लाठी भी नहीं टूटेगी.

ऐसा हुआ तो कागजी खानापूरी हो जाएगी लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश की प्रकारांतर से अवहेलना ही होगी. उत्तर प्रदेश में कई पूर्व मुख्यमंत्रियों के पास भव्य सरकारी बंगले हैं, जिनका किराया बहुत मामूली है जबकि उनके रख-रखाव पर जनता की गाड़ी कमाई खर्च की जाती है. पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम रूप से फैसला दिया है कि राज्य में पूर्व मुख्यमंत्री सरकारी बंगले के हकदार नहीं हैं. यह समानता के सिद्धांत का उल्लंघन है.

क्या यह हैरत की बात नहीं है कि मुलायम जैसे बड़े कद के नेता सुप्रीम कोर्ट के फैसले को धता बताने की राह सुझाने के लिए मुख्यमंत्री से मिलते हैं? ऐसा क्यों नहीं हुआ कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के सम्मान में खुद ही सरकारी कोठी खाले कर देने का ऐलान किया? क्या उन्हें कोठियों और किसी दूसरी चीज की कमी है? यह बात सिर्फ मुलायम पर ही नहीं लागू होती. भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री और राजस्थान के वर्तमान राज्यपाल कल्याण सिंह ही क्यों नहीं सरकारी कोठी खाली कर देते? वे संवैधानिक पद पर हैं. उन्हें अवश्य ही शीर्ष अदालत का सम्मान करना चाहिए.

राजनीति में मर्यादा और नैतिकता की बातें अब बेमानी लगती हैं लेकिन क्या यह पीड़ादायक नहीं है कि इतने बड़े नेता इस तरह के अनैतिक रास्ते सुझाएं? जब कोई सरकारी कर्मचारी रिटायर होता है तो राज्य सम्पत्ति विभाग उसे आवण्टित मकान खाली जल्दी कराने के लिए पीछे पड़ जाता है. किसी मजबूर कर्मचारी को कुछ दिन की मोहलत भी नहीं दी जाती. पूर्व मुख्यमंत्रियों को किस हैसियत से जीवन भर के लिए विशाल कोठी दी जाती  है? कोर्ट ने इसीलिए कहा कि इससे समानता के अधिकार का उल्लंघन होता है.

सन 2016 में भी सुप्रीम कोर्ट ने यही फैसला दिया था तो इससे बचने के लिए तत्कालीन अखिलेश यादव सरकार ने नियमों में इस तरह परिवर्तन कर दिया था कि पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी बंगले खाली न करने पड़ें. लोक प्रहरीसंगठन ने इस नियम परिवर्तन को चुनौती दी और इस बार सर्वोच्च अदालत ने कह दिया कि पूर्व मुख्यमंत्रियों को बंगले खाली करने ही होंगे.

1997 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भी अपने आदेश में पूर्व मुख्यमंत्रियों को आजीवन सरकारी बंगले आवण्टित करने को अवैध ठहराया था. तब मायावती की सरकार थी. उन्होंने भी उच्च न्यायालय के आदेश से बचने का रास्ता निकाल दिया था. यानी इस मामले में सभी दल और उनके नेता परस्पर सहमत और मिले हुए हैं. 
सरकारी कोठियां जनता की सम्पत्ति हैं. उनका उपयोग कुछ नेता जीवन भर जनता के खर्च से शान से रहने के लिए कैसे कर सकते हैं?
(सिटी तमाशा, नभाटा, 19 मई, 2018)

Tuesday, May 15, 2018

राजनैतिक बिसात पर एमबीसी



दलित और पिछड़ी जातियों को आरक्षण का लाभ वास्तव में कितना मिला और किसे-किसे, यह शुरू से विवाद का विषय रहा है. कालांतर में यह तथ्य सामने आते गये कि दलितों और पिछड़ों में कुछ गिनी-चुनी, करीब एक तिहाई जातियों ही को आरक्षण का सर्वाधिक लाभ मिला. आरक्षित श्रेणी की बाकी दो तिहाई जातियों के लोग इस लाभ से वंचित ही रहे या बहुत कम लाभ पा सके. इस असंतुलन ने दलितों में भी दलित यानी महादलितऔर पिछड़ों में अत्यधिक पिछड़ी जातियों (एमबीसी) का नया वर्ग बना दिया. चूंकि जाति हमारे देश में राजनीति के केंद्र में रही और सायास बनाये रखी गयी, इसलिए आरक्षण के असंतुलित लाभ ने पिछड़ों और दलितों के भीतर नयी राजनीतिक हलचल को जन्म दिया. यह हलचल बढ़ते-बढ़ते आज देश की चुनावी राजनीति पर पूरी तरह छा गयी है.

मुद्दे के दो पहलू हैं. एक तो यह मांग कि आरक्षण की व्यवस्था का सम्यक विवेचन और संशोधन होना चाहिए ताकि अब तक वंचित रहे आये वर्गों को सामाजिक-आर्थिक मोर्चे पर आगे बढ़ने का मौका मिले. सिर्फ कुछ शहरी पढ़े लिखे वर्ग तथा गांवों में आर्थिक-सामाजिक रूप से ताकतवर जातियां ही लाभ उठाती रहेंगी तो आरक्षण देने का उद्देश्य अधूरा रह जाता है. इससे पैदा हुआ वंचित वर्ग का आक्रोश समझ में आता है लेकिन जब गुजरात के पाटीदार, हरियाणा एवं उत्तर प्रदेश के जाट और महाराष्ट्र के मराठा जैसे अपेक्षाकृत समर्थ और सम्पन्न वर्ग भी आरक्षण के लिए आंदोलित होते हैं तो आरक्षण के अपने मूल ध्येय से भटक जाने के कटु सत्य से हमारा सामना होता है.

दूसरा पहलू चुनावी लाभ के लिए आरक्षण को राजनीतिक चाल की तरह इस्तेमाल करना है. दुर्भाग्य से यही पहलू सर्वोपरि हो गया है. इसी कारण आरक्षण व्यवस्था की ईमानदारी से समीक्षा की बजाय अलग-अलग ढंग से पार्टियों ने इसे अपने हित में भुनाना जारी रखा.

अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण का ही उदाहरण लें. मण्डल आयोग की रिपोर्ट लागू होने के बाद 27 फीसदी आरक्षण का सर्वाधिक लाभ लेने वाले उत्तर-प्रदेश तथा बिहार में यादव व कुर्मी या कर्नाटक में वोक्कालिंगा हैं, जो पहले ही शेष पिछड़ी जातियों से कहीं बेहतर स्थिति में थे. मण्डल-बाद की समय में समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल (एस) जैसे जिन दलों की राजनीति चमकी उन्होंने भी मुख्यत: इन्हीं समर्थ जातियों का प्रतिनिधित्व किया. अपने-अपने राज्यों में ये दल ताकतवर बने. सत्ता पर उनकी पकड़ मजबूत रही. स्वाभाविक ही, ओबीसी आरक्षण का लाभ लेने में पिछड़ गयी दूसरी पिछड़ी जातियों में रोष उत्पन्न हुआ. उनके नेतृत्त्व ने या तो इन दलों पर दवाब बना कर आशिंक लाभ लेने की रणनीति अपनायी या ओबीसी-दलों से विमुख होकर अन्य दलों का दामन थामा.

सीएसडीएस (सेण्टर फॉर द स्टडीज ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज) के एक अध्ययन के अनुसार मण्डल रिपोर्ट लागू होने के बाद जिन राज्यों में क्षेत्रीय दल नहीं उभरे यानी जहां कांग्रेस और भाजपा की सीधी टक्कर होती आयी, यथा मध्य प्रदेश, राजस्थान, आदि वहां 2009 तक आरक्षण-लाभ-वंचित पिछड़ी जातियों ने 2009 के चुनावों तक कांग्रेस को तरजीह दी.  2014 के आम चुनाव में यह समीकरण बदल गया. कारण नरेंद्र मोदी का स्वयं पिछड़ी जाति का दांव चलना हो या कांग्रेस से मोहभंग, उपेक्षित पिछड़ी जातियों के मतदाताओं ने भारी संख्या में भाजपा को चुना. बिहार विधान सभा चुनाव में लालू और नीतीश के एक हो जाने से इस प्रवृत्ति पर विराम लगा लेकिन 2017 में उत्तर प्रदेश के चुनाव में भाजपा एक बार फिर उपेक्षित पिछड़ी एवं दलित जातियों का बड़े पैमाने में समर्थन हासिल करने में कामयाब हुई. बसपा और सपा की भारी पराजय के कारण इसी तथ्य में निहित थे.

2019 के आम चुनाव में भाजपा यही करिश्मा बनाये रखना चाहती है. उसने एमबीसी तथा उपेक्षित दलित जातियों का समर्थन पाने की हर जुगत बैठाने की कोशिश जारी रखी. नरेंद्र मोदी सरकार ने पिछले वर्ष ओबीसी आरक्षण में श्रेणी विभाजन पर विचार करने के लिए जो समिति बनायी थी, वह इसी का हिस्सा थी. इस प्रयास में बड़ा व्यवधान उत्तर प्रदेश से आया. पिछले दिनों सम्पन्न गोरखपुर और फूलपुर संसदीय उप-चुनाव में सपा-बसपा एक हो गये. इस अप्रत्याशित गठबंधन ने भाजपा को हरा दिया. पिछड़ी और दलित जातियों का प्रतिनिधित्व करने वाले इन क्षेत्रीय दलों को इस दोस्ती में भाजपा के दलित-पिछड़ा दांव की काट दिखायी दी. इसलिए इसे वे 2019 तक चलाने को राजी हो गये. भाजपा को इस जातीय गठबंधन का मुकाबला करने के लिए किसी बड़े दांव की जरूरत थी.

सो, उतर प्रदेश की योगी सरकार ने एक पुराना फॉर्मूला सरकारी फाइलों से बाहर निकाल दिया. इसमें एमबीसी की 17 उप-जातियों को अनुसूचित जाति की सुविधाएं देने का प्रस्ताव है. मजे की बात यह है कि यही प्रस्ताव उत्तर प्रदेश के चार पूर्व मुख्यमंत्री पांच बार ला चुके हैं. 1995 और 2004 में सपा के मुलायम सिंह, 2008 में बसपा की मायावती और 2013 में सपा के अखिलेश यादव ने यही प्रस्ताव मंजूरी के लिए केंद्र सरकार को भेजा था. सन 2001 में  भाजपा के तत्कालीन मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह ने भी थोड़ा बदल कर इसे केंद्र को भेजा था. ऐसा चुनावों के मौके पर एमबीसी जातियों का समर्थन हासिल करने के लिए किया गया था. सभी को मालूम था कि केंद्र में सत्तारूढ़ दूसरे दलों की सरकार इस प्रस्ताव को मंजूरी नहीं देगी. ऐसे में एमबीसी जातियां उनके पक्ष में और केंद्र में सत्तारूढ़ दल के खिलाफ हो जाएंगी. इस बार योगी सरकार की यह चाल उनके खिलाफ भी जा सकती है क्योंकि केंद्र और राज्य दोनों में भाजपा की सरकार है. प्रस्ताव मंजूर न हुआ तो पांसा उलटा भी पड़ सकता है.

आशय यह कि चुनाव के समय ही राजनैतिक दलों को एमबीसी की याद आती है. दुर्भाग्य यह कि ओबीसी आरक्षण पिछड़ी जातियों के वास्तविक उत्थान की बजाय राजनीतिक दांव ही बनता आया है. 1990 में तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने जब मण्डल आयोग की रिपोर्ट लागू करके ओबीसी आरक्षण का रास्ता खोला था तब भी वह उनका राजनैतिक ब्रह्मास्त्रथा. बाहरी समर्थन पर टिकी उनकी अल्पमत वाली सरकार अधर में थी और अयोध्या में राम मंदिर बनाने के अभियान से भाजपा हिंदू-ध्रुवीकरण में लगी हुई थी. उनकी इस चाल को कमण्डलके जवाब में मण्डलका जबर्दस्त दांव कहा गया था. आरक्षण-विरोध की आग में देश उबला था. आज तक वह राजनैतिक दांव ही बना हुआ है. स्थितियां इतनी बदली हुई हैं कि आरक्षण का विरोध कोई पार्टी नहीं कर रही. कभी मण्डलका भारी विरोध करने वाली भाजपा आज कमण्डलके साथ मण्डलको भी चतुराई से साध रही है.   

(प्रभात खबर, 16 मई, 2018)




Saturday, May 12, 2018

बोर्ड परीक्षा परिणामों का त्रासद पक्ष



यूपी बोर्ड के हाईस्कूल-इण्टर के परिणामों ने एक बार फिर साबित किया कि समाज के वंचित तबके की नई पीढ़ी में पढ़ने और आगे बढ़ने की ललक हिलोरें मार रही है, कि प्रतिभा का रिश्ता गरीबी-अमीरी से नहीं है. अभावों में जी रहे और किसी भी तरह परिवार को पाल रहे माता-पिताओं में अपने बच्चों को पढ़ाने की आकांक्षा तीव्र हुई है. घर-घर चौका-बर्तन करके, रिक्शा चला कर और मेहनत मजदूरी करके वे बच्चों को पढ़ा रहे हैं. इनमें से बहुत सारे बच्चे अव्वल नम्बरों से पास हो रहे हैं.

यह तथ्य मन में खुशी और उत्साह का संचार करता है लेकिन उससे दोगुनी तकलीफ यह जान कर होती है कि सरकारें दूर-दराज के गांवों-कस्बों तक शिक्षा की बेहतर सुविधाएं उपलब्ध करा पाने में असमर्थ रही हैं. बहुत से सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूल-कॉलेजों का बहुत बुरा हाल है. बोर्ड के परिणामों का उपर्युक्त सुखद पहलू तो प्रचारित होता है लेकिन इसके दुखद हिस्से पर कम ही रोशनी पड़ती है.

इस बार के यूपी बोर्ड के नतीजे यह भी बताते हैं कि प्रदेश के 150 स्कूल-कॉलेजों में एक भी विद्यार्थी पास नहीं हुआ. इनमें से 98 स्कूलों में हाईस्कूल के सारे विद्यार्थी फेल हो गये. इण्टर के सभी छात्र-छात्राओं के फेल होने के निराशाजनक नतीजे 52 कॉलेजों के हिस्से आये. इसके अलावा 167 स्कूल ऐसे हैं जहां 80 फीसदी बच्चे फेल हुए. इनमें सहायता प्राप्त और गैर-सहायता प्राप्त दोनों तरह के विद्यालय हैं.

समझा जा सकता है कि इन विद्यालयों में कैसी पढ़ाई होती होगी. यह आंकड़े उपलब्ध नहीं है कि इन स्कूलों में कितने अध्यापक हैं, हैं भी कि नहीं. ऐसे में पास होने की तमन्ना लेकर विद्यार्थी या उनके मां-बाप नकल-माफिया की शरण में जाते हैं तो क्या आश्चर्य? सभी सरकारें नकल रोकने के जतन करती हैं. वर्तमान भाजपा सरकार ने दावा किया कि उसने नकल-माफिया की रीढ़ तोड़ दी है. नकल न कर पाने के डर से कई लाख विद्यार्थी परीक्षा में नहीं बैठे. इन दावों में कुछ सच्चाई भी होगी लेकिन सवाल यह है कि इतनी बड़ी संख्या में विद्यार्थी नकल के भरोसे क्यों रहते हैं? नकल कराने वाला पात-पात तंत्र क्यों विकसित हुआ? क्या इसके पीछे ऐसे ही विद्यालय नहीं है जहां न काबिल शिक्षक हैं, न पढ़ाई होती है और न उन पर कोई नियंत्रण है? कई विद्यालयों का नाम नकल करा कर पास कराने के लिए जाना जाता है. वे खोले ही इसलिए जाते हैं

शिक्षा और चिकित्सा हमारी सरकारों की प्राथमिकता में अब भी नहीं हैं. इसी कारण दोनों क्षेत्रों में दलालों और माफिया का बोलबाला है या साधन-सम्पन्न वर्ग के लिए महंगे स्कूल और अस्पताल बन गये. अमीरों-गरीबों के बीच सम्पत्ति की खाई ही चौड़ी नहीं है, शिक्षा और चिकित्सा सुविधाओं का अंतर भी उतना ही बड़ा है.

शिक्षा का अधिकार अब संविधान-प्रदत्त है. जिंदा रहने का अधिकार हर तरह से मौलिक है. हमारे यहां इसे वास्तविकता में प्रदान करने की जिम्मेदारी सरकारों की है और वे इसमें विफल रही हैं. चुनाव के मुद्दे ये कभी नहीं बनते. सरकारों का प्रदर्शन भी इनसे नहीं आंका जाता. हर चुनाव में धर्म-जाति के मुद्दे उछाले जाते हैं. भावनाएं भड़काने वाले बयान दिये जाते हैं. जीवन के जो मूल मुदे हैं, जिन क्षेत्रों से देश वास्तव में तरक्की करता है, जिनसे जनता का जीवन सुंदर बनता है, वे भुला दिये गये हैं.

संविधान की मूल भावना और लोकतंत्र के साथ यह सबसे भद्दा खिलवाड़ है.
(सिटी तमाशा, नभाटा, 5 मई, 2018)



कुत्तों को गोली से उड़ाने वाला प्रशासन



सीतापुर जिले में खैराबाद के अस-पास गांव वालों को लगा कि दिशा- मैदान जाते बच्चों पर हमला करने वाला कुत्तों का कोई झुण्ड है. तेरह बच्चों की जान जाना अत्यधिक गम्भीर मामला है. ग्रामीणों की आशंका और चिंता स्वाभाविक है. उनका डण्डे लेकर कुत्तों को मार डालना भी समझा जा सकता है  लेकिन जिला प्रशासन के अधिकारियों को क्या हो गया जो वे बंदूकें लेकर गांव के कुत्तों के शिकार पर निकल पड़े? कुछ मित्रों ने गोली से मारे गये कुत्तों की तस्वीरें भेजीं तो देख कर प्रशासनिक अधिकारियों की बुद्धि पर तरस और क्रोध आया. आखिर वे इतने क्रूर और नासमझ कैसे हो सकते हैं? क्या उन्होंने अपनी बुद्धि को ताक पर रख दिया? ऊपरी दवाब में जनाक्रोश को शांत करने के लिए वे कुत्ते जैसे निरीह जानवरों को गोलियों से भून उतर पड़े?

कोई बारह साल पुरानी घटना याद आ गयी. उन्नाव के एक गांव में सत्रह वर्ष की किशोरी अचानक लापता हो गयी थी. किसी ने अफवाह उड़ा दी कि एक अजगर ने लड़की को निगल लिया है. गांव वाले अजगर की आशंका से आतंकित हो गये. उन्होंने लखनऊ-कानपुर मार्ग जाम करके मांग की कि प्रशासन अजगर को पकड़े, क्योंकि उससे और लोगों को भी खतरा है. अखबारों में भी यही छप रहा था कि लड़की को अजगर निगल गया. अखबार वाले कहीं से यह भी पता कर लाये थे कि लड़की को पलक-झपकते निगल जाने वाला अजगर एनाकोण्डाहोगा.

गांव वालों की मांग पर जिला प्रशासन अजगर को खोजने निकला. उन दिनों लखनऊ-कानपुर मार्ग चौड़ा किया जा रहा था. कई खुदाई मशीनें तैनात थीं. प्रशासन जेसीबी लेकर गांव की जमीन खुदवाने में जुट गया. एक-दो अजगर मिले तो उन्हें मार डाला गया. कोई चार दिन की मेहनत के बाद उस समय के हमारे सम्वाददाता ने यह खोज निकाला था कि सत्रह साल की उस लड़की को किसी अजगर ने नहीं निगला था, बल्कि ट्यूबवेल के चौकीदार ने उसे अपनी कोठरी में कैद कर रखा था. लड़की सकुशल बरामद कर ली गयी थी.

प्रशासन को न तब शर्म आयी थी न आज आयेगी. तब उन्नाव के अधिकारियों ने यह सोचने की जहमत नहीं उठायी थी कि सत्रह साल की लड़की को कोई अजगर कैसे पलक-झपकते निगल सकता है! आज सीतापुर के अधिकारियों ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि आखिर कुत्ते अचानक इतने खूंखार कैसे हो गये? क्या बच्चों को मार डालने वाले वास्तव में कुत्ते ही हैं? और अगर कुत्ते ही ऐसा कर रहे हैं तो क्या वे गांव में पलने वाले कुत्ते हैं? बिना किसी तर्क और खोज-बीन के करीब एक सौ कुत्ते मार डाले गये.

कई प्रत्यक्षदर्शियों का बयान सामने आया है कि बच्चों पर हमला करने वाला झुण्ड कुत्ते जैसा दिखने वाले जानवरों का है. पशु-विज्ञानियों की टीम ने भी इस दिशा में जांच की है. कई लोगों ने गांव में पले कुत्तों को मारने का विरोध किया. कुछ ने उन्हें बचाने के लिए उनके गले में पट्टे बांधे. जाहिर है, गांव वाले भी एकमत नहीं थे कि हमलावर कुत्ते ही हैं.  

बच्चों पर हमला कर उन्हें मार डालने वाले जानवरों की पड़ताल अवश्य होनी चाहिए. प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह तुरंत प्रभावी कार्रवाई करे. अगर प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी भी अफवाहों पर कान देकर हर किसी कुत्ते  को गोली से उड़ाने लगे तो क्या कहा जाए?

इस घटना ने खुले में शौच-मुक्त गांवों के दावे की भी असलियत सामने रखी है. मारे गये ज्यादातर बच्चे खुले में शौच के लिए गये थे. 

(सिटी तमाशा, नभाटा, 12 मई, 2018) 

Saturday, April 28, 2018

‘कूड़ेवाली’ की रोजी और निजी कम्पनी का ठेका



कई साल से वह रविवार के अलावा हर सुबह घर से कूड़ा ले जाने आती है. एक ठेलिया पर दो बांस फंसा कर  एक बड़ा-सा थैला उस पर फैलाती है. वह थैला कई बोरों को एक में सिल कर बनाया हुआ है. उसके भी दो हिस्से हैं, जिनमें वह अलग-अलग तरह का कूड़ा छांट कर रखती हे. उसका कोई नाम रखा गया होगा मगर अब वह सिर्फ कूड़ेवाली है. साथ में तीन छोटे-बड़े बच्चे भी होते हैं. सब मिलकर हर घर से कूड़ा मांगते हैं, उसे ठेलिया फैला कर बीनते हैं. फिर ठेलिया धकेल कर ले जाते हैं.

बच्चे, बच्चे ही होते हैं. वे कूड़े में अपने लिए खेल की चीजें तलाश लेते हैं. खेलते हैं, आपस में लड़ते हैं और डांट खाते हैं. बच्चे हर घर की तरफ उम्मीद से देखेते हैं. कुछ घरों से बासी-तिबासी मिल जाता है. कूड़ेवालीजब कभी छुट्टीपर अपने देस जाती है तो किसी कूड़ेवाली को तैनात कर जाती है. सम्भवत: बांग्लादेशी मूल की है और पूर्वोत्तर भारत के किसी ठिकाने अपना घरया देसकहती है.

तीस रुपये से शुरू हुआ उसका मासिक मेहनताना अब पचास रुपये है, जिसके लिए वह पहली तारीख की सुबह ही तगादा कर देती है. इस शहर में वह जहां भी रहती है, वहां पानी की कोई व्यवस्था नहीं है. हमारे मुहल्ले से पानी के बर्तन भर ले जाती है. इसके लिए उसने टूटी बाल्टियां, टूटे-फूटे डिब्बे जमा कर रखे हैं. गर्मियों में ठण्डे पानी का आग्रह भी वह कुछ घरों से करती है. जाड़ों में सूखा कूड़ा जला कर तापती है.
इधर कुछ समय से डरी हुई है कि उसका रोजगार छिन न जाए. कई बार वह दयनीय चेहरा बना कर आग्रह कर चुकी है- वो गाड़ी वाला आएगा, उसको कूड़ा नहीं देना.हुआ यह कि एक-दो बार कूड़ा उठाने वाली एक गाड़ी मुहल्ले में दिखाई दी. गाड़ी में सवार नौजवानों ने कहा, अब हम कूड़ा ले जाया करेंगे. हालांकि उसके बाद वह दिखाई नहीं दिये.

नगर निगम ने एक निजी कम्पनी को हर घर से कूड़ा उठाने का ठेका दे दिया है. कूड़ेवाली को लगता है कि अब उसका काम छिन जाएगा. कूड़ेवाली के पास कूड़े के निस्तारण की कोई व्यवस्था नहीं होगी. प्लास्टिक, आदि कबाड़ के भाव बेच कर वह बाकी कहीं फेंकती होगी. यह शहर की सफाई के लिए अच्छा नहीं है. निजी कम्पनी के पास बेहतर व्यवस्था होगी. कूड़ा उसे ही दिया जाना चाहिए लेकिन कूड़ेवाली का क्या करें? उसके जैसे कितने ही परिवार इस तरह गुजारा कर रहे हैं.

नगर निगम से लेकर निजी कम्पनियों तक को यह अक्ल कभी नहीं आएगी कि वे घर-घर से कूड़ा उठाने के काम में इन कूड़ेवालियों को शामिल करें. उनका रोजगार छीनने की बजाय उन्हें कूड़ा उठाने वाली गाड़ियां दें. बेहतर कपड़े और बेहतर मजदूरी दें. शहर की सफाई-व्यवस्था में उन्हें भी शामिल करें. ये बेहतर और परिश्रमी साबित होंगे. नियमित आएंगे. निजी कम्पनी ने जिन्हें भी कूड़ा उठाने के काम में रखा है, हर वार्ड से शिकायत है कि वे आते ही नहीं. जहां जाते भी हैं, वहां जमीन में कूड़ा गिरने पर उठाते नहीं. सभासद तक उनकी शिकायत कर रहे. कूड़ेवाली घर के सामने भी झाड़ू लगा देती है.

किसी भी योजना से विस्थापित होने वालों को उस योजना का हिस्सा नहीं बनाया जाता. समावेशी विकासभाषणों में होता है. इसलिए गरीब और उजड़ते जाते हैं. नेताओं-अफसरों को गरीबों का उजड़ना दिखाई नहीं देता. फिलहाल निजी कम्पनी के नाकारापन से कूड़ेवालियों का रोजगार चल जा रहा है.

(सिटी तमाशा, नभाटा, 28 अप्रैल, 2018)


Friday, April 20, 2018

हमारे समाज का पानी मर गया है


मुहल्ले में सड़क किनारे सुबह-शाम पानी का फव्वारा-सा फूटता देख कर हमने अपने एक पड़ोसी से कहा- शायद यह आपका कनेक्शन लीक कर रहा है. तपाक से उनका जवाब आया- हमने तो बोरिंग करवा रखी है. पब्लिक कनेक्शन जुड़वाया ही नहीं. वे इस तरह हंसे जैसे कि हम पर दया कर रहे हों- जल संस्थान के कनेक्शन पर निर्भर बेचारा! खैर, हमने जल संस्थान में शिकायत दर्ज कराई और पानी का वह रिसाव बंद करा दिया गया.

कॉलोनी के ज्यादातर घरों में डीप बोरिंग है. राजधानी में बिजली की बहुत समस्या नहीं होती. चौबीस घण्टे पानी की बहार. जब चाहिए बटन दबाइए, गाड़ी धोइए और सड़क तर कीजिए, लेकिन कब तक? जिनकी बोरिंग कुछ साल पुरानी है वे शिकायत करते हैं कि पहले जैसा पानी नहीं आता या बोरिंग बेकार हो चुकी, रि-बोर कराना पड़ेगा.

पिछले दिनों नगर निगम के अधिकारियों के हवाले से एक रिपोर्ट पढ़ी थी कि लखनऊ के हर दूसरे-तीसरे घर में सब-मर्सिबल पम्प लगे हैं. जल संस्थान के नलकूप अलग हैं, जिन्हें हर कुछ वर्ष में और गहरा करना पड़ता है. नगर निगम ने खुद भी सभासदों या किसी बड़े की सिफारिश पर कई जगह सब-मर्सिबल पम्प लगाये हैं.
पानी का व्यापार करने वालों ने भी जघ-जगह बोरिंग करा रखी हैं. जमीन से पानी का निरंतर दोहन करके वे पानी बेचते हैं. पानी की मांग साल भर बनी रहती है. गर्मियों में बहुत बढ़ जाती है. पानी के बड़े-बड़े जरकिन लेकर सप्लाई पर निकली गाड़ियां शहर में कहीं भी देखी जा सकती हैं. शहर के कई मुहल्ले पानी को तरसते हैं. वे चार-पांच सौ रु महीने पर इन्हीं से पानी खरीदते हैं. बाजारों-मुहल्लों में वैध-अवैध दुकानों में पानी के यही व्यापारी जरकिन सप्लाई करते हैं.

साल में करीब दो हजार रु जल-कर चुकाने वाले हमारे जैसे लोग जल संस्थान की दो टाइम की सप्लाई के भरोसे बैठे पानी का यह अंधाधुंध दोहन आउर अनियंत्रित व्यापार देखते रहते हैं. सब-मर्सिबल वालों को कोई कर नहीं चुकाना पड़ता. किसी सरकारी एजेंसी के पास यह रिकॉर्ड नहीं है कि राजधानी में कितने निजी सब-मर्सिबल लगे हैं और वे जमीन से मुफ्त में कितना पानी खींच रहे हैं. आपके पास पैसे की कमी नहीं है तो बोरिंग करवा लीजिए. कोई पूछने वाला नहीं. न किसी से इजाजत लेनी है, न कोई कर चुकाना है और जब जितना चाहे पानी उड़ाइए.

यह हमारी नगरीय व्यवस्था का सच है. हर साल पानी का संकट बढ़ता जा रहा है. जमीन में पानी का स्तर निरंतर घट रहा है और बारिश का पानी भूमि में जाने के रास्ते लगभग बंद हो चुके हैं. हम बड़े पानी संकट के मुहाने पर खड़े हैं. पैसे वाले सोचते हैं कि वे पैसे के बल पर सब कुछ खरीद सकते हैं. अभी तो खरीद ही रहे हैं. बाद की, अपनी ही अगली पीढ़ियों की किसे चिंता है.

इस बीच खबर आयी कि लोक भवन (मुख्यमंत्री के नये दफ्तर) के पीछे खुदाई में एक पुराना कुआं निकला. कुआं गहरा था तो सुरंग होने की अफवाह उड़ी. सब-मर्सिबल के जमाने में कुओं को सुरंग ही समझा जाएगा! अधिकारियों ने उसे बंद करवा दिया. यह हमारी व्यवस्था की समझ का हाल है. कुएं और तालाब पाट दो और वाटर हार्वेस्टिंग के लिए नालियां खोदो. लखनऊ के तालाब और कुएं ही बचा लिए होते तो न पानी की इतनी किल्लत होती न वाटर हार्वेस्टिंग का ड्रामा करना पड़ता.

अपनी नदियों, तालाबों, कुओं को कंक्रीट से पाट देने वाले समाज का पानी मर ही जाता है.   

(सिटी तमाशा, नभाटा, 21 अप्रैल, 2018)


Friday, April 13, 2018

जन सुनवाई पोर्टल पर शिकायत का हश्र



‘’आपका आवेदन पत्र संख्या 40015718017892, जो अपर मुख्य सचिव/प्रमुख सचिव/सचिव को सम्बोधित है, पोर्टल पर दर्ज हो गया है.” अपने मोबाइल पर यह संदेश देख कर हम बहुत खुश हुए. यह टेक्नॉलॉजी का जमाना है. प्रदेश सरकार ने भी अपना पोर्टल बनाया है.  उस पर लॉग-इन कीजिए और शिकायत दर्ज करा दीजिए. अधिकारियों-मंत्रियों तक भाग-दौड़ की जरूरत नहीं.

सुबह 10.12 बजे शिकायत दर्ज हुई थी और रात 10.14 पर संदेश प्राप्त हुआ कि आपका आवेदन पत्र सचिव, स्टाम्प एवं रजिस्ट्रेशन को अग्रिम कार्यवाही हेतु प्रेषित कर दिया गया है. हमें सरकार की तेजी पर दांतों तले अंगुली दबानी पड़ी. किस्सा यह कि हमने सन 2007 में एक निजी बिल्डर से दो कमरे का एक फ्लैट खरीदा. बैंक से ऋण लेकर बिल्डर को पूरा भुगतान कर दिया. दो-ढाई साल में फ्लैट देने का वादा था. समय पर न दे पाने की स्थिति में दण्ड स्वरूप कुछ भुगतान का वादा भी था.

बहुत दौड़-भाग करने पर करीब नौ साल के बाद  2016 में रोहतास प्लूमेरिया में फ्लैट का कब्जा मिला. सुविधाविहीन आधे-अधूरे परिसर में भी कब्जा मिल जाने पर खुशी हुई थी. पूर्ण अग्रिम भुगतान के बावजूद आज तक न पार्किंग मिली, न क्लब बना, न समुचित सफाई, सुरक्षा की व्यवस्था, आदि-आदि. उससे बड़ी समस्या यह कि रोहतास बिल्डर फ्लैट की रजिस्ट्री कराने को राजी नहीं. हजार के आस-पास आवंटी परेशान. धरना-प्रदर्शन, लविप्रा, डीएम, आदि को ज्ञापन का बिल्डर पर कोई असर नहीं. फिर सबने मिलकर एफआईआर करा दी.

जनसुनवाई पोर्टल का ढोल बज रहा था. सबने पोर्टल पर अलग-अलग शिकायतें दर्ज कराईं और खुश हुए कि अब तो कुछ नतीजा निकलेगा. बीते सोमवार को मोबाइल सन्देश प्राप्त हुआ कि “संदर्भ संख्या 40015718017892 का निस्तारण कर दिया गया है. निस्तारण आख्या जनसुनवाई पोर्टल/मोबाईल ऐप के माध्यम से देखी जा सकती है.” हमने अत्यंत प्रसन्नता से पोर्टल खोला. आख्या में लिखा है –“प्रश्नगत प्रकरण का परीक्षण किया गया. स्टाम्प एवं रजिस्ट्रेशन विभाग को किसी प्रकार की दण्डात्मक कार्यवाही के लिए विलेख की आवश्यकता होती है. बिना किसी लेखपत्र के किसी प्रकार की स्टाम्प वसूली या दण्डात्मक कार्यवाही किया जाना सम्भव नहीं है.....”

सरकारी हिंदी समझने में पाठकों का मानसिक श्रम बचाने के लिए हम आगे के संदेश का आशय बता दें. लिखा है कि अगर बिल्डर जानबूझ कर रजिस्ट्री नहीं कर रहा है या इसके लिए अनुचित धन मांग रहा है तो उसके खिलाफ एफआईआर करानी चाहिए और कानूनी सलाह लेकर अदालत में मुकदमा दर्ज कराना ठीक रहेगा. हरेक शिकायतकर्ता को यही जवाब भेजा गया है.

हमारी  उम्मीदों पर पानी फिरना ही था. पोर्टल पर जो दस्तावेज मांगे थे वे हमने अपलोड कर दिये थे. और क्या विलेखचाहिए, यह बताते तो वह भी उपलब्ध करा देते. एफआईआर पहले ही दर्ज कराई जा चुकी थी. कुछ आवण्टी अदालत की शरण भी जा चुके हैं. सामूहिक रूप से अदालत जाने पर भी एसोसियेशन विचार कर रही है. जनसुनवाई पोर्टल ने हमें क्या नया बताया? हमारी क्या मदद की? हमारी समस्या का क्या समाधान किया?

लाल फीते वाली फाइलें हों या टेक्नॉलजी का नया जमाना, सरकारी तंत्र की मानसिकता नहीं बदलती. उसे जनता की समस्याओं के वास्तविक समाधान से कोई मतलब नहीं. उसे बस शिकायती पत्र का निस्तारण कर देना होता है. कई बिल्डर इसी तरह आवण्टियों और सरकार को ठग रहे हैं. रजिस्ट्री की पूरी रकम सरकारी खजाने में जानी है. तब भी सरकार रजिस्ट्री न कराने वाले बिल्डरों पर कार्रवाई नहीं कर रही.  

जनसुनवाई पोर्टल पर निस्तारित शिकायतोंकी बढ़ती संख्या देख कर सरकारी तंत्र अपने गाल बजा रहा होगा. जनता समस्या के जस का तस रहने पर माथा पीटने के अलावा क्या कर सकती है?

(सिटी तमाशा, 14 अप्रैल, 2018)


Friday, April 06, 2018

दलित-राजनीति और दलित की बारात



इक्कीसवीं सदी का यह 19वां वर्ष है. दलित हितों के लिए लड़ने का दावा और वादा करने के लिए सभी राजनैतिक दलों में होड़ मची है. आम्बेडकर जयंती करीब है. सभी राजनैतिक पार्टियां उसे धूमधाम से मनाने की तैयारियां कर रही हैं. एससी-एसटी एक्ट पर मारामारी मची है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चंद रोज पहले कहा कि सरकार आम्बेडकर के दिखाये रास्ते पर आगे बढ़ रही है. मुख्यमंत्री योगी कह रहे हैं कि उनकी सरकार दलितों की रक्षा के लिए कोई कसर नहीं छोड़ेगी.

इस सब के बीच एक दलित युवक अपनी बारात गांव के बीच से ले जाने के लिए अदालत से लेकर आला पुलिस अधिकारियों तक गुहार लगा रहा है. वह धूमधाम से बारात ले जाना चाहता है. उसकी मंगेतर चाहती है कि उसका दूल्हा घोड़ी पर चढ़ कर उसे ब्याहने आये. गांव के सवर्णो ने चेतावनी दी है कि वह उनके घरों के सामने से बारात नहीं ले जा सकता. चाहे तो लड़की के घर से दूर एक छोटे मैदान में शादी कर सकता है. लड़के-लड़की दोनों का कहना है कि वह मैदान बहुत छोटा है. वहां धूमधाम से ब्याह नहीं हो सकता.  

मामला कासगंज जिले के निजामपुर गांव का है. हाथरस के जाटव युवक संजय कुमार की शादी इस गांव की शीतल से 20 अप्रैल को होनी तय हुई है. संजय कानून का विद्यार्थी है. शीतल के गांव वालों की आपत्ति के बाद संजय ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की कि उसे बारात निकालने की इजाजत दी जाए, उसकी सुरक्षा की जाए. अदालत ने कहा कि वह ऐसा आदेश नहीं दे सकती. संजय को पुलिस प्रशासन के पास जाना चाहिए.

पुलिस ने उससे कहा कि गांव की कुछ परम्पराएं होती हैं. उन्हें नहीं तोड़ना चाहिए. उससे कानून व्यवस्था बिगड़ सकती है. चूंकि मामला अदालत तक जा चुका था इसलिए कासगंज पुलिस ने संजय को बारात ले जाने के लिए गांव के बाहर-बाहर का रास्ता सुझाया, जो करीब एक किमी और लम्बा है.

लड़के का कहना है कि वह गांव की सीमा से लड़की के घर तक बारात ले जाएगा. उसका मासूम-सा सवाल है कि अगर सवर्ण हमारे लोगों के घरों के सामने से बारात ले जा सकते हैं तो हम उनके घरों के सामने से क्यों नहीं? न गांव वाले राजी हैं, न पुलिस उन्हें राजी करने का प्रयास कर रही है. पुलिस संजय के सामने पिछले कुछ उदाहरण रख रही है जिनमें दलितों की बाहर से आई बारातों ने गांव की परम्परानहीं तोड़ी थी, यानी बारात सवर्णों के घर के सामने से नहीं ले गये थे.

इसे लिखते वक्त यह पता चला है कि कासगंज के डी एम और एसएसपी ने लड़की के घर वालों से कहा है कि आपकी बेटी शीतलअवयस्कहै.उनके पास उस स्कूल के प्रधानाचार्य का हस्तलिखित पत्र है, जहां लड‌की बचपन में पढ़ती थी. उसके अनुसार शीतल 18 साल से दो महीने छोटी है. अब अवयस्क लड़की की शादी होने देकर प्रशासन कानून का उल्लंघन कैसे होने दे सकता है. कानून-व्यवस्था और गांव की परम्पराबनाये रखने के लिए यह शानदार उपाय निकल आया. घर वाले इसे अड़ंगा लगाने का तरीका बता रहे हैं.

बीस अप्रैल को क्या होगा मालूम नहीं लेकिन हम पाठकों से आग्रह करेंगे कि वे पहले पैराग्राफ को एक बार फिर पढ़ें, अपने समाज, राजनीति और प्रशासन के हालात के बारे में थोड़ा विचार करें.
(सिटी तमाशा, नभाटा, 7 अपरिल 2018