Friday, July 13, 2018

पॉलीथीन-प्रतिबंध की पंचतंत्र-कथा



पढ़ने-सोचने का ज्यादा चलन तो रहा नहीं, फिर भी अपने महान ज्ञान कोश पंचतंत्रका नाम काफी सुना-सुना लगता होगा. वैसे, बता दें कि पंचतंत्रहै गजब की चीज. हल काल में प्रासंगिक. जैसे, एक कथा-प्रसंग है. वर्धमान नगर के राजा के शयन कक्ष में सुबह-सुबह सफाई करते समय गौड़म किसी से दुश्मनी निकालने के लिए धीरे से कुछ बड़बड़ा देता था, इस तरह कि अधजागे राजा के कान सुन लें. राजा चौंक कर उठता. पूछता- ये तूने क्या कहा, गौड़म?’ गौड़म अनजान बन कर कह देता- पता नहीं हुजूर, मैं रात भर जुआ खेलता रहा. झाड़ू लगाते-लगाते झपकी आ गयी. पता नहीं नींद में मैंने क्या कह दिया. क्षमा, महाराज.

राजा सोचता- गौड़म ने नींद में जो कहा, वह सही होगा. रियल फीडबैक. बस, उस बंदे का काम लग जाता. पिछले हफ्ते जब राज्य सरकार ने पॉलीथीन पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की तो हमें गौड़म की याद आ गयी. विष्णु शर्मा से लेकर हमारे जमाने तक हर सरकार में गौड़मों की कमी नहीं. वे रात भर जुआ खेलें, न खेलें, हर साल-दो साल में एक बार पॉलीथीन पर प्रतिबंध लगाने की बात सरकार के कान में फुसफुसा जरूर देते हैं.

हुआ तो उससे पहले भी है लेकिन दो वर्ष पूर्व सपा सरकार ने पॉलीथीन पर रोक लगाने की जोर-शोर से घोषणा की थी. प्रदेश मंत्रिमण्डल ने बकायदा फैसला लिया था, अधिसूचना जारी की गई थी. सख्ती से अमल के लिए जिला प्रशासन, नगर निगम, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, आदि कुछ विभागों की कमेटी बना दी गई थी. फैक्ट्रियों पर छापे पड़े थे. बड़ी-बड़ी दुकानों की तलाशी में जुर्माना वसूला गया था. खोंचे-ठेले वाले पॉलीथीन के थैले छुपा कर रखने के लिए पीटे गये थे. लोग बाजार में घर से लाए गए थैलों के साथ दिखने लगे थे. दुकानों में कागज के लिफाफों की आमद बढ़ गई थी. फैसले को पलटवाने-बदलवाने के लिए पॉलीथीन लॉबी बड़ी सक्रिय रही थी.

फिर जल्दी ही हमने देखा कि धड़ल्ले से पॉलिथीन बनने-बिकने और इस्तेमाल होने लगी. रोक पर अमल के जिम्मेदार विभाग एक-दूसरे पर  टालते रहे. फिर सब शांत बैठ गए. कहा गया कि प्रतिबंध को लागू करने के लिए जरूरी नियमवाली ही नहीं बनी. खैर, विधान सभा चुनाव भी नजदीक थे. फिर किसको याद रहता. क्यों याद रहता.

अब भाजपा सरकार ने पॉलीथीन पर प्रतिबंध की घोषणा दुगुने जोश से की जा रही है. कहा जा रहा है कि इस बार और भी सख्त आदेश आएगा. पॉलीथीन बंद हो कर रहेगी. अब पता नहीं, यह सिर्फ संयोग है कि इस बार फिर चुनाव नजदीक हैं, लोक सभा के.

खैर, पंचतंत्र की उस कथा का अगला प्रसंग यह है कि कुछ समय बाद गौड़म को लगता है कि मैने अमुक बंदे से पूरा बदला ले लिया है. वह शरणागत हो गया है. तब वह अगली सुबह राजा के कान के पास उसकी तारीफ में फुसफुसा देता है. राजा सोचता है, मैंने गौड़म की नींद में कही बात को सच मान कर उस बेचारे पर बड़ा अन्याय किया. बस, स्थितियां दूसरे दिन से ही बदल जाती हैं.

पंचतंत्र की कथाओं में नीति-वाक्यभी खूब आते हैं. वनराज पिंगलक चतुर मंत्री दमनक की बुद्धिमानी से खुश होकर यह नीति-वाक्य बोलता है- गहरी पैठ वाले सरल-चित्त और बुरी आदतों से बच कर रहने वाले, पहले से जांचे-परखे हुए मंत्री राज्य को उसी तरह सम्भाले रहले हैं जैसे पकी, सीधी, बिना गांठ वाली आजमाई हुई लकड़ी का खम्भा छत को सम्भाले रहता है.

विष्णु शर्मा ने उस काल के दरबारी मंत्री देखे थे. आज राज-काज अफसर चलाते हैं. पद-प्रतिष्ठा बदली है, गौड़मों का स्वभाव नहीं. फिलहाल तो वह फिर गुस्से मेंंलगता है. 

(सिटी तमाशा, नभाटा, 14 जुलाई, 2018)

आस्था के केन्द्र, अव्यवस्था के मंदिर


पुरी के जगन्नाथ मंदिर की व्यवस्था ठीक करने के बारे में सुप्रीम कोर्ट के हाल के फैसले ने हमारे बड़े और प्रसिद्ध मंदिरों के हालात, प्रबंधन और दर्शनार्थियों की दिक्कतों की ओर शासन-प्रशासन ही का नहीं पूरे देश का ध्यान आकृष्ट किया है. शीर्ष अदालत ने उड़ीसा सरकार को निर्देश दिये हैं कि इस मंदिर में भक्तों से दुर्व्यवहार, और सेवकों का उन्हें परेशान करना बंद हो. अतिक्रमण एवं गंदगी दूर करने के साथ ही मंदिर के प्रबंधन में पर्याप्त सुधार किये जाएं. यह भी कहा है कि दर्शनार्थी जो चढ़ावा चढ़ाते हैं उसका दुरुपयोग नहीं होना चाहिए. भक्तों को बिना परेशानी के दर्शन करने का अवसर दिया जाए. वहां सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं.

देश की सर्वोच्च अदालत के इस हस्तक्षेप से देश के कई अन्य मंदिरों में व्याप्त अव्यवस्था और दर्शनार्थियों के उत्पीड़न की ओर ध्यान जाना स्वाभाविक है. वैष्णो देवी जैसे कुछ प्रख्यात और बेहतर प्रबंधन वाले मंदिरों को छोड़ दें तो हिंदुओं के ज्यादातर मठों-मंदिरों में धर्मावलम्बियों का शोषण-उत्पीड़न होता है. पण्डे-पुजारियों से लेकर दर्शन कराने के नाम पर दलाल तक भक्तों से जोर-जबर्दस्ती करते हैं, चढ़ावे के नाम पर उनसे लूट होती है, चढ़ावे का कोई हिसाब-किताब नहीं होता, मंदिरों का रख-रखाव ठीक नहीं है, गंदगी और अतिक्रमण है, कई जगह पुजारियों के भेष में असामाजिक, नशेड़ी और अपराधी भी छुपे होते हैं. बड़ी श्रद्धा-भक्ति के साथ दूर-दूर से आने वाले दर्शनार्थियों को इससे न केवल घोर असुविधा होती है, बल्कि उनकी आस्था पर भी चोट पहुंचती है.

मृणालिनी पाधी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर पुरी के जगन्नाथ मंदिर में भक्तों की कई दिक्कतों, उनके साथ सेवकों के दुर्व्यवहार और चढ़ावे के दुरुपयोग के साथ ही गंदगी और अतिक्रमण का मुद्दा उठाया था. जस्टिस आदर्श कुमार गोयल और अशोक भूषण की अवकाशकालीन पीठ ने आठ जून को इस याचिका पर सुनवाई की. अदालत ने केंद्र सरकार, उड़ीसा सरकार और मंदिर प्रबंधन को नोटिस देकर कहा कि यह नागरिकों के मौलिक अधिकारों और संविधान के दिशा-निर्देशक सिद्धानतों का मामला है. हमारे ये मंदिर धार्मिक, सामाजिक, ऐतिहासिक, पुरातात्विक और सांस्कृतिक महत्त्व के हैं. लाखों यात्री पर्यटन और आस्था के लिए यहां आते हैं. वे बड़ी मात्रा में चढ़ावा चढ़ाते हैं. उन्हें निर्विघ्न रूप से दर्शन करने का अवसर मिलना चाहिए, चढ़ावे का सदुपयोग हो और सेवकों को मंदिर प्रबंधन उचित मेहनताना दे.

शीर्ष अदालत ने पुरी के जिला जज को निर्देशित किया है कि वे 30 जून तक अंतरिम रिपोर्ट दाखिल करें कि दर्शनार्थियों को क्या दिक्कतें होती हैं, चढ़ावे का क्या होता और प्रबंधन में क्या दिक्कतें हैं.  कोर्ट ने पुरी के कलेकटर से लेकर उड़ीसा सरकार तक को विस्तार से कई निर्देश दिये हैं.

सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्देश के दो दिन बाद ही जगन्नाथ मंदिर का एक दिन का चढ़ावा दस लाख 47 हजार 501 रुपये हो गया. पिछले कई सालों में यह एक दिन का सबसे ज्यादा चढ़ावा है. इससे पहले आम दिनों में दो लाख और पर्वों पर चार लाख तक ही दैनिक चढ़ावा आता था. बाकी रकम सेवक और पण्डे-पुजारी दर्शनार्थियों से झटक लेते थे और वह उनकी जेब में चला जाता था. सुप्रीम कोर्ट के चाबुक के बाद एक दिन का चढ़ावा साढ़े दस लाख होने से समझा जा सकता है कि कितनी बड़ी रकम सेवक या पुजारी सीधे हड़प जाते थे.

नयी व्यवस्था लागू होने से मंदिर के सेवक आंदोलित हैं. उनका कहना है कि उनके पेट पर चोट हुई है. बड़ी मात्रा में उनकी कमाई बंद हो काने से उनका नाराज होना स्वाभाविक है. सुप्रीम कोर्ट ने सेवकों को मंदिर प्रबंधन की ओर से उन्हें निश्चित पारिश्रमिक दिये जाने का निर्देश दिया है.आशा की जानी चाहिए कि आने वाले दिनों में सेवकों को पर्याप्त मेहनतान मिलने लगेगा, मंदिर की आय बढ़ेगी, व्यवस्था सुधरेगी और दर्शनार्थियों को भगवान जगन्नाथ के दर्शन आसानी से हो सकेंगे.

सुप्रीम कोर्ट ने जगन्नाथ मंदिर मामले में उड़ीसा सरकार को निर्देश दिया है कि वह देश के कुछ महत्त्वपूर्ण मंदिरों की व्यवस्था का अध्ययन करे. उदाहरण के लिए अदालत ने वैष्णो देवी मंदिर, सोमनाथ मंदिर और  स्वर्ण मंदिर के नाम सुझाये हैं. इन मंदिरों की बहुत अच्छी व्यवस्था और दर्शनार्थियों की सुविधाओं की चर्चा होती रहती है. यहां जाने वाले दर्शक प्रसन्न होकर लौटते है. कोर्ट ने कहा है कि इन मंदिरों के प्रबंधन से सीख लेकर जगन्नाथ मंदिर के प्रबंधन को सुधारा जाए.

सुप्रीम कोर्ट के सुझाये चंद मंदिरों के अलावा भी कुछ देश में कुछ मंदिर अच्छी व्यवस्था के लिए जाने जाते हैं. शिरडी का सांई मंदिर अपनी सहज, सस्ती, साफ-सुंदर व्यवस्था के लिए जान जाता है. वहं न केवल दर्शनार्थियों को आराम से दर्शन हो जाते हैं बल्कि भक्तों को बहुत सस्ते में रहने की अच्छी व्यवस्था और सुस्वादु भोजन भी उपलब्ध होता है.

इस सन्दर्भ में मैं पटना के हनुमान मंदिर का विशेष रूप से उल्लेख करना चाहूंगा. पटना रेलवे स्टेशन से बाहर निकलते ही आज हम जिस भव्य, साफ-सुथरे, व्यवस्थित हनुमान मंदिर के दर्शन करते हैं, कोई देढ़ दशक पहले तक वह घोर अव्यवस्था, अराजकता और गंदगी के कारण कुख्यात था. चढ़ावे की रकम का कोई हिसाब-किताब न था. बिहार के अपराधियों पर नकेल कसने के लिए चर्चित आईपीएस अधिकारी किशोर कुणाल ने जब पुलिस सेवा छोड़ कर धर्म-अध्यात्म का रास्ता पकड़ा तो  सबसे पहले इस मंदिर के कायाकल्प का बीड़ा उठाया.

अब आचार्य कहे जाने वाले किशोर कुणाल ने शीघ्र ही मंदिर की व्यवस्था इतनी सुधार दी कि साफ-सफाई के अलावा वहां बनने वाला प्रसादमभी प्रसिद्ध हो गया. भक्तों की भीड़ बढ़ी और मंदिर की कमाई भी कई गुना बढ़ गयी. मंदिर के चढ़ावे से पटना में एक कैंसर अस्पताल का संचालन होने लगा. आज यह बड़ा अस्पताल है जो बिहार जैसे गरीब राज्य में मरीजों को बहुत कम कीमत पर बेहतर इलाज उपलब्ध कराता है. कई मामलों में नि:शुल्क भी. हनुमान मंदिर के चढ़ावे से और भी जन-सेवा के काम होते हैं. किसी मंदिर की कमाई से कितना अच्छा सेवा-कार्य हो सकता है, पटना का हनुमान मंदिर इसका सर्वोत्तम उदाहरण है.

वहीं दूसरी तरफ बिहार के गया में स्थित विष्णुपाद मंदिर में गंदगी, अतिक्रमण और दर्शनार्थियों के साथ दुर्व्यवहार की शिकायतें आती रहती हैं. गया हिंदुओं के लिए महत्त्वपूर्ण तीर्थ है. वहां लाखों की संख्या में यात्री जाते हैं.  इन पंक्तियों के लेखक को एक बार एक बड़ी कम्पनी के सर्वोच्च अधिकारी के साथ इस मंदिर जाने का मौका मिला. मंदिर के पण्डे-पुजारियों और अन्य कर्मचारियों को उनके आने की पूर्व सूचना थी. जैसे ही हम मंदिर प्रागण में पहुंचे हमें घेर लिया गया. सभी उस बड़े आसामीसे अधिकाधिक दक्षिणा लेने के लिए धक्का-मुक्की करने लगे. बड़ी मुश्किल से उन्होंने पूजा निपटाई और वहां से निकल कर राहर की सांस ली. मंदिर के चारों ओर और नदी तट तक इतनी गन्दगी थी कि हमें नाक पर रुमाल रखना पड़ा. पैरों के नीचे कीचड़ बजबजा रहा था. वहां जाकर मन में किसी तरह की श्रद्धा नहीं हुई. यह कोई एक दशक पहले की बात है. आजकल पता नहीं क्या हाल है.

गया की तुलना में पड़ोस ही में स्थित बोध गया के बोधि वृक्ष और बुद्ध मंदिर में जाकर अद्भुत शांति और सुखद अनुभूति मिलती है. वहां इतनी सफाई और शांति है कि उस प्रांगण में बैठ कर ध्यान लगाने का मन हो आता है. यही हाल पड़ोसी जिले नालंदा के पावापुरी का है जहां भगवान महावीर को मोक्ष प्राप्त हुआ था. अत्यंत शांत, स्वच्छ और व्यवस्थित. गुरुद्वारे भी अपनी व्यवस्था से बड़ी श्रद्धा जगाते हैं. अमृतसर के स्वर्ण मंदिर का तोकहना ही क्या. वैसी सुंदर व्यवस्था हिंदू मंदिरों में क्यों नहीं हो सकती?

कुछ वर्ष पहले एक विदेशी मित्र के साथ मिर्जापुर के विन्ध्यवासिनी देवी के मन्दिर जाने का अवसर मिला. हमारी गाड़ी वहां पहुंची ही थी कि हमें चारों तरफ से घेर लिया गया. कुछ लोग हाथ पकड़ कर खींचने लगे. विदेशी मित्र को खींच कर एक तरफ ले गये. उसे उनसे छुड़ाना मुश्किल हो गया. हम अंतत: मंदिर में नहीं जाए बिन ही लौट आये. विंध्यकासिनी मंदिर की बड़ी प्रतिष्ठा है. वहां हजारों दर्शनार्थी जाते हैं. ऐसे व्यवहार से उनकी आस्था को कितनी ठेस पहुंचती होगी. कोई दो वर्ष पहले उत्तर प्रदेश सरकार ने विंध्यवासिनी मंदिर की व्यवस्था ठीक करने की कोशिश की थी तो पण्डा समुदाय रुष्ट होकर आंदोलन करने पर उतारू हो गया था.

जगन्नाथ मंदिर हो या विंध्यवासिनी, पण्डों-पुजारियों-सेवादारों की रोजी-रोटी उससे जुड़ी है, इसमें कोई संदेह नहीं. धर्मावलम्बियों के लिए जो आस्था है, वह इनके लिए रोजगार है. किंतु इसके भी नियम होने चाहिए. निश्चित व्यवस्था होनी चाहिए. श्रद्धालुओं को वीआईपी दर्शन के नाम पर तंग करने, अनुचित मांग करने, चढ़ावा जेब में रख लेने और मंदिर की अन्य सुविधाओं की घोर उपेक्षा के नाम पर इसकी इजाजत नहीं दी जा सकती. सभी मंदिरों को व्यवस्थित तरीके से चलाया जाना चाहिए ताकि दर्शन में सुविधा हो और चढ़ावे का सदुपयोग हो. सुप्रीम कोर्ट ने ठीक ही कहा है कि जगन्नाथ मंदिर की व्यवस्था वैष्णोदेवी मंदिर की तरह चलायी जाए. वास्तव में यह आदेश देश के सभी मंदिरों पर लागू किया जाना चाहिए. 

(सुपर आयडिया, जुलाई, 2018)   


Tuesday, July 10, 2018

फिर उग्र ध्रुवीकरण ही सहारा?



स्वाभाविक है कि भारतीय जनता पार्टी 2019 में केंद्र की सता में बहुमत से वापसी की कोशिश करे, जैसे कि विरोधी दल उसे बेदखल करने के प्रयत्न में लग रहे हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष काफी समय से चुनावी मोड में हैं. अंदरखाने तैयारियां हैं ही, सरकारों के स्तर पर खुल्लमखुला लुभावनी चुनावी घोषणाएं होने लगी हैं. चर्चा यहां यह करनी है कि मोदी सरकार क्या उपलब्धियां लेकर जनता के पास जाना चाहती है और स्वयं जनता-जनार्दन उसके लिए कैसा प्रश्नपत्र तैयार कर रही है?

2014 में देश की जनता कांग्रेस-नीत यूपीए शासन के भ्रष्टाचार और नाकारापन से त्रस्त थी. वह बदलाव चाहती थी. भाजपा में तेजी से उभरे नरेंद्र मोदी ने अपनी वक्तृता, तेजी और ताजगी से भ्रष्टाचार मिटा कर, काला धन वापस लाने एवं चौतरफा परिवर्तन के वादों से जो लहर पैदा की उसने भाजपा को विशाल बहुमत से सत्ता में ला बिठाया. आज जब वे चार साल पूरे कर चुकने के बाद पांचवें वर्ष में जनता की परीक्षा में बैठने वाले हैं तो पास होने की कसौटी क्या होगी? सरकार के पास तो उपलब्धियां गिनाने के लिए हमेशा ही बहुत कुछ होता है. मोदी सरकार ने भी अपना चार साल का प्रभावशाली लेखा-जोखा पेश किया है. मगर पास-फेल करना जनता के हाथ में है.

आर्थिक मोर्चे पर मोदी सरकार ने नोटबंदी जैसे दुस्साहसिक और जीएसटी जैसे साहसिक कदम उठाये. इनके नतीजों पर विवाद हैं. तमाम दावों के बावजूद अर्थव्यवस्था अच्छी हालत में नहीं है, विशेष रूप से वह हिस्सा जो सीधे जनता को प्रभावित करता है. महंगाई लगातार बढ़ी है. पेट्रोल-डीजल के ऊंचे भावों ने उसे अनियंत्रित किया है. बैंकों पर डूबे हुए कर्ज का बोझ बढ़ा किंतु प्रयासों के बावजूद वसूली के प्रयास सफल होते न दिखे. बेरोजगारों की संख्या बढ़ने की तुलना में रोजगारों का सृजन अत्यंत सीमित हुआ. युवा वर्ग में आक्रोश है जो तरह-तरह के असंतोषों में फूटा. देश भर का किसान इस पूरे दौर में क्षुब्ध और आंदोलित रहा. बदहाली के कारण उनकी आत्महत्याओं का सिलसिला बिल्कुल कम न हुआ. हाल ही में खरीफ फसलों के समर्थन मूल्यों में अब तक की सबसे बड़ी वृद्धि की जो घोषणा की गयी है, उससे भी वृहद किसान समुदाय प्रसन्न नहीं लगता.

कतिपय आरोपों  के अलावा मोदी सरकार को भ्रष्टाचार के मामलों में क्लीन चिट हासिल है. यूपीए के दूसरे दौर की सरकार के लिहाज से यह बड़ी राहत है लेकिन आम जनता को रोजमर्रा के कामों में भ्रष्टाचार से मुक्ति मिल गई हो, ऐसा बिल्कुल नहीं है. काले धन पर अंकुश नहीं लग सका. डिजिटल लेन-देन के मोर्चे पर भी शुरुआती उपलब्धि हाथ से फिसल गयी. नोबेल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने यह कह कर मोदी सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है कि 2014 के बाद देश की अर्थव्यवस्था सबसे तेज गति से पीछे की ओर गयी है.

सामाजिक क्षेत्र में सरकार बहुत कुछ करती दिखाई दी लेकिन वास्तव में परिवर्तन कितना आया? हाशिए पर जीने वाली बड़ी आबादी के हालात कितना सुधरे? स्वच्छता अभियान और 2019 तक देश को खुले में शौच-मुक्त करने की महत्वाकांक्षी, सराहनीय योजना पर स्वयं प्रधानमंत्री ने बहुत रुचि ली किंतु आंकड़ों से इतर व्यवहार में वह कितना उअतर पायी? दलितों के कल्याण के वास्ते घोषणाएं बहुत हुईं लेकिन उन्हें सचमुच कितनी आजादी और सामर्थ्य मिली? महिलाओं के प्रति समाज और राजनीति के नजरिए एवं व्यवहार में कितना फर्क आया?

दैनंदिन जीवन में अनुभव करने के कारण जनता इन मुद्दों से सीधे जुड़ी रहती है. वह क्या महसूस करती है? यहां यह कहना आवश्यक है कि देश की ये बहुतेरी समस्याएं न आज की हैं, न इनके लिए सीधे मोदी सरकार जिम्मेदार है. चूंकि स्वयं मोदी ने व्यक्तिगत रूप से भी इस बारे में जनता में बहुत ज्यादा उम्मीदें जगाईं, बढ़-चढ़ कर दावे किये थे, इसलिए उनकी सरकार की जवाबदेही निश्चय ही बढ़ जाती है.

पिछले दिनों की चंद घटनाओं ने संकेत दिये हैं कि मोदी सरकार इन कसौटियों पर शायद असहज अनुभव कर रही है. प्रधानमंत्री का जोर आज भी परिवर्तन और विकास के मुद्दों पर है. उनकी लोकप्रियता अधिक कम नहीं हुई है. लेकिन उनके मंत्री और भाजपा नेता क्या कर रहे हैं? केंद्रीय नागरिक उड्डयन राज्यमंत्री जयंत सिन्हा ने चंद रोज पहले झारखण्ड में उन आठ लोगों को जमानत पर छूटने पर माला पहना कर मिठाई खिलाई जिन्हें अदालत ने गोरक्षा के नाम पर हत्याओं का दोषी पाया है. उसी दिन केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह की खबर आयी कि वे बिहार के अपने निर्वाचन क्षेत्र में दंगा भड़काने के आरोप में जेल में बंद बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं के घर गये, उनके साथ हुए अन्यायपर रोये और बिहार की अपनी ही सरकार को ही दोष देने लगे.

इन्हें हम इन नेताओं की स्फुट भटकनों के रूप में भी देख सकते थे परंतु वरिष्ठ भाजपा नेता, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की अपने ही कैडर के हाथों अब तक जारी ट्रॉलिंग को किस रूप में देखें, जबकि पार्टी-नेतृत्त्व और सरकार उनके पक्ष में आना तो दूर, मौन साधे रहे? राजनाथ सिंह और गडकरी उनके बचाव में आये जरूर मगर काफी बाद में. फिर, पिछले मास जम्मू-कश्मीर सरकार से भाजपा के अचानक अलग होने के फैसले से क्या समझा जाए, जबकि कश्मीर में शांति बहाली भाजपा सरकार का प्रमुख एजेण्डा था?

तो, क्या इसे उग्र हिंदुत्त्व और प्रखर राष्ट्रवाद के पुराने एजेण्डे को प्रमुख स्वर देने के रूप में देखा जाए? यह आशंका इसलिए बलवती होती है कि 2014 के चुनाव की पूरी तैयारी भाजपा ने इसी एजेण्डे के तहत की थी. प्रधानमंत्री-प्रत्याशी के रूप में नरेंद्र मोदी परिवर्तन लाने, विकास करने तथा भ्रष्टाचार और परिवारवाद मिटाने की गर्जनाएं कर रहे थे तो उनके कई नेता नेता गोहत्या, खतरे में हिंदुत्त्व, देशद्रोह, जैसे मुद्दे उछालने में लगे थे. खूबसूरत सपने दिखाने और भावनाओं के उबाल का यह चुनावी मिश्रण-फॉर्मूला सफल रहा था. अब जबकि सपनों को साकार करने के प्रयासों की परीक्षा होनी है, तब क्या फिर से धर्म और राष्ट्रवाद की भावनाओं का ज्वार उठाना भाजपा को आवश्यक लग रहा है? विपक्षी मोर्चेबंदी की काट के लिए उपलब्धियां पर्याप्त नहीं लग रहीं? ध्रुवीकरण का सहारा लिए बिना रास्ता कठिन लग रहा है?

सरकारों की परीक्षा का पैमाना जनता कब क्या बनाती है, यह अक्सर स्पष्ट नहीं होता. 2004 में एनडीए का शाइनिंग इण्डियाआशा के विपरीत उसने नकार दिया था. 2009 में यूपीए को अप्रत्याशित विजय दे दी थी. 2014 में जनता ने विशाल बहुमत से भाजपा को सत्ता सौंपी. 2019 के लिए प्रश्न-पत्र वह बना ही रही होगी.      
 
(प्रभात खबर, 11 जुलाई, 2018) 

Saturday, July 07, 2018

असली मुद्दा तो एडमिशन का था



प्राध्यापकों से मारपीट एवं कुलपति पर हमले के प्रयास की दुर्भाग्यपूर्ण एवं निंदनीय घटना के बाद लखनऊ विश्वविद्यालय को अनिश्चितकाल के लिए बंद कर दिये जाने की आड़ में मूल मुद्दा दब जाएगा या दबा दिया जाएगा. अब मामला राजनैतिक और कानून-व्यवस्था का बन गया है.

कुछ छात्र-छात्राओं को इस वर्ष विश्वविद्यालय ने अगली कक्षाओं में प्रवेश देने से इनकार कर दिया था. कारण यह कि पिछले वर्ष उन छात्र-छात्राओं ने मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी के विश्वविद्यालय आगमन पर उन्हें विरोध स्वरूप काले झण्डे दिखाये थे. इस अपराधमें उन्हें गिरफ्तार किया गया, जेल में रखा गया और विश्वविद्यालय से निष्काषित कर दिया गया था. बाद में कुछ को परीक्षा देने दी गयी थी लेकिन परीक्षाफल रोक लिया गया. फिर कुछ छात्र-छात्राओं का परीक्षाफल इस शर्त के साथ जारी किया गया कि वे इस विश्वविद्यालय में अगली कक्षाओं में प्रवेश नहीं लेंगे. कुछ ने शायद ऐसा लिख कर भी दिया.

कुछ छात्र-छात्राओं को लगा और बिल्कुल सही लगा कि यह अन्याय और अलोकतांत्रिक है. मुख्यमंत्री शिवाजी से सम्बद्ध जिस कार्यक्रम में भाग लेने विश्वविद्यालय जा रहे थे, उसमें विश्वविद्यालय के धन का इस्तेमाल गलत है., इस आधार पर विरोध किया गया था. यह विशुद्ध रूप से वैचारिक आंदोलन था. काले झण्डे दिखाना या काफिले के सामने आ जाना प्रतिरोध पुराना लोकतांत्रिक तरीका है. विश्वविद्यालय में इससे पहले कई बार हो चुका है.

इसकी आड़ में दूसरे बहानों से अगली कक्षाओं में प्रवेश न देने का फैसला अलोकतांत्रिक है. इसलिए कुछ छात्र-छात्राएं कुलपति कार्यालय के पास शांति पूर्वक धरने पर बैठे थे. उनके समर्थन में कई वरिष्ठ शिक्षाविद, लेखक, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता भी धरने पर बैठे थे. धरने के तीसरे दिन कुछ बाहरी लोगों ने पास ही में प्राध्यापकों पर हमला कर दिया. उसके बाद धरना देने वालों और उनके समर्थकों को पकड़ कर पुलिस थाने भेज दिया गया. विश्वविद्यालय को अनिश्चितकाल के लिए बंद कर दिया गया. अब मामला कुछ और ही बन गया है.

असल मुद्दा, जिस पर बहस होनी चाहिए थी, यही है कि छात्र-छात्राओं से लोकतांत्रिक विरोध करने का अधिकार कैसे छीना जा सकता है जबकि कई बड़े आंदोलन, जिनमें स्वतंत्रता संग्राम और 1974-75 का इंदिरा सरकार विरोधी उग्र आंदोलन भी शामिल है, विश्वविद्यालायों और कॉलेजों से शुरू हुए और फैले? प्रत्येक राजनैतिक दल की छात्र इकाइयां हर कॉलेज और विश्वविद्यालय में सक्रिय हैं. राजनैतिक दलों की छात्र इकाइयों के रूप में ही  वे छात्र संगठनों के चुनाव लड़ते हैं. अक्सर सामाजिक-राजनैतिक मुद्दों पर सार्थक आंदोलन भी करते रहे हैं. विश्वविद्यालय के छात्र संगठनों से राजनैतिक पाठ पढ़ कर निकले कई विद्यार्थी आज विभिन्न दलों में ऊंचे पदों पर और सरकारों में शामिल हैं.

विश्वविद्यालय राजनीति का अखाड़ा नहीं बनने चाहिए लेकिन राजनैतिक सोच को विकसित होने, समाज और राजनीति में सार्थक हस्तक्षेप करने से वयस्क छात्र-छात्राओं को कैसे वंचित किया जा सकता है? वे प्राथमिक कक्षाओं के मासूम विद्यार्थी नहीं हैं. पढ़ाई का सवाल हो या फीस वृद्धि, हॉस्टल की अव्यवस्थाएं हों या सम-सामयिक मुद्दे, वे अपनी आवाज उठाएंगे ही. प्रशासन को उनकी बात सुननी चाहिए. समाधान नहीं निकाला जाएगा तो मामला भड़केगा. तब सारा दोष आवाज उठाने वालों के मत्थे कैसे मढ़ा जा सकता है? यह क्यों नहीं पूछा जाना चाहिए कि समय रहते उनकी बात सुन कर समाधान क्यों नहीं निकाला गया?

परिसर में हिंसा के बाद ये सवाल विमर्श से बाहर हो गये हैं. यह और भी दुर्भाग्यपूर्ण है.


(सिटी तमाशा, नभाटा, 7 जुलाई, 2018)

Friday, June 29, 2018

सरकारी फाइलों में पेड़ों की खेती के कीर्तिमान


जुलाई 1950 में तत्कालीन केंद्रीय कृषि एवं खाद्य मंत्री कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने देश भर में वन महोत्सव मनाने की शुरुआत की थी. उस समय राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भी दिल्ली में पौधे लगाये थे. राज्यों में राज्यपालों तथा मुख्यमंत्रियों ने यह शुभ कार्य करके जनता को पर्यावरण की सुरक्षा करने का संदेश दिया था. तब से पूरे देश में सरकारें जुलाई के पहले सप्ताह में वन-महोत्सव मनाती आयी हैं. इस बार 69वां वन-महोत्सव मनाया जाने वाला है.

मुंशी जी की पहल पर उस बार देश भर में कितने पौधे रोपे गये थे, इसका कोई आंकड़ा हमें नहीं मिला है. शायद वे लोग आंकड़े जुटाने में विश्वास नहीं करते थे. आजकल आंकड़े ही आनक्ड़े जुटाए जाते हैं. उदाहरणार्थ,  सन 2015 में अकेले उत्तर प्रदेश ने एक दिन में दस लाख से ज्यादा वृक्षारोपण का विश्व कीर्तिमान बनाया था. गिनीज बुक ऑफ वर्ड रिकॉर्ड्स के अधिकारियों ने तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को ऐसा प्रमाण-पत्र सौंपा था. अन्य राज्यों ने भी कुछ न कुछ कीर्तिमान बनाये ही होंगे. आंकड़ों और कीर्तिमानों के हिसाब से पिछले 68 वर्षों में देश में पेड़ ही पेड़ होने चाहिए थे. कौन पूछे कि वे कहां गये?

इस साल की जो तैयारी है, उसे देखिए. अकेले राजधानी लखनऊ में करीब 21 लाख पौधे लगाने का सरकारी लक्ष्य रखा गया है. नौ लाख के आसपास वन विभाग और बाकी अन्य विभाग लगाएंगे. इन पौधों की संख्या तो कागजों में ठीक-ठीक दर्ज है लेकिन इतने पौधे कहां, किस जमीन पर लगेंगे, इसका हिसाब नहीं है. राज्यपाल और मुख्यमंत्री और कुछ अन्य वीवीआईपियों के लिए गड्ढे तय कर दिये होंगे जहां उनको वृक्षारोपण करना है, लेकिन बाकी पौधे लखनऊ में तारकोल की किस सड़क और कंक्रीट के किस जंगल में रोपे जाएंगे? पौधों को जड़ें फैलाने और बढ़ने के लिए जमीन और आसमान चाहिए होते हैं, यह जानकारी सरकारी विभागों को होगी ही.

पता नहीं गिनीज वर्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड्स वाले पौधारोपण के बाद उनके जीवित बचने और बड़े हो जाने का भी रिकॉर्ड रखते हैं या नहीं लेकिन हम सबके देखे इस देश में जो बेहिसाब बढ़े हैं, वें हैं सड़केंऔर, इमारतें है. जो लगातार कम होते गये, वे हैं मिट्टी, हरियाली, तालाब, नदियां. विकास के नाम पर पेड़ों की लगातार बलि ली जाती रही. अभी ऐन दिल्ली में रिहायसी इमारतें बनाने के लिए 16500 पेड़ काटे जाने वाले हैं. उत्तराखण्ड में प्रधानमंत्री के वादे के मुताबिक बन रही चार धाम ऑल वेदर रोडके लिए 33,000 से ज्यादा पेड़ों की बलि ली जा रही है. पर्यावरण की चिंता करने वाले विरोध कर रहे हैं मगर कौन सुनता है. सरकारें वन-महोत्सव की तैयारी में मगन हैं.

लखनऊ में हरियाली और तालाब लगभग गायब हैं. सड़कों के किनारे नीम, पीपल, इमली, पाकड़, आदि बड़े-बड़े पेड़ पिछले दशक तक भी थे. अब किसी राहगीर को इन तपती दुपहरियों में कुछ पल खड़े होने के लिए छांह नहीं मिलती. सजावटी पौधे छांह नहीं देते. तालाबों की जगह बहुमंजिली इमारतें खड़ी हैं. कुछ जगहों में घनी छाया वाले पेड़ बचे हैं लेकिन वे आम जन की पहुंच से दूर वाले वीआईपी इलाके हैं.

किसी जिज्ञासु, शोध-प्र्वृत्ति वाले पत्रकार या सामाजिक कार्यकर्ता को सूचना के अधिकार के तहत यह जानकारी मांगनी चाहिए कि पिछले दस वर्षों में वन महोत्सवों के विभिन्न मदों में विभागवार कितना व्यय हुआ, कितने पौधे कब और किस जमीन पर लगाये गये, उनके रख-रखाव और सिंचाई, आदि की क्या व्यवस्था थी और उनमें से वास्तव में कितने जीवित रह गये. देखें क्या-कैसा जवाब आता है.

 (सिटी तमाशा, नभाटा, 30 जून, 2018)

Tuesday, June 26, 2018

एक साथ चुनाव के जटिल प्रश्न



देश में सभी चुनाव एक साथ कराने की चर्चा अक्सर छिड़ जाती है. कई कारणों से इस चर्चा को समर्थन भी मिलता रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने चार साल के कार्यकाल में इसे एक मुद्दे की तरह बार-बार उठाया. वे लोक सभा और विधान सभाओं के चुनाव एक साथ कराने की वकालत करते हैं. कुछ समय पहले उनके सुझाव पर केंद्रीय विधि आयोग ने तीन पेज का एक सार-पत्र तैयार किया है. उसका उद्देश्य इस बारे में जनता, बुद्धिजीवियों और राजनैतिक दलों की राय लेना है. पिछले दिनों विधि आयोग ने इस पत्र को सभी मान्यता प्राप्त राजनैतिक दलों के विचारार्थ भेजा है. उनसे इसी 30 जून तक आयोग के साथ चर्चा करने या अपनी राय लिखित रूप में भेजने का आग्रह किया गया है.

अब जबकि लोक सभा चुनावों को एक साल से भी कम समय रह गया है, भाजपा सरकार इस मुद्दे पर कुछ तेजी दिखाती लगती है. मोटा-मोटा प्रस्ताव यह है कि जिन राज्य विधान सभाओं के चुनाव आने वाले साल-दो साल में होने हैं, उन्हें 2019 के लोक सभा चुनाव के साथ करा दिया जाए. बाकी विधान सभाओं के चुनाव 2024 के आम चुनावों के साथ हों. कुछ लोग इसे नरेंद्र मोदी की चाल के रूप में देख रहे हैं कि वे अपनी छीझती लोकप्रियता को यथाशीघ्र अगले कुछ समय के लिए भुना लेना चाहते हैं या लोक सभा चुनाव में राष्ट्रीय मुद्दों के शोर में स्थानीय मुद्दों को भुला कर  लाभ उठाना चाहते हैं.

मोदी-विरोधियों की इस व्याख्या से इतर एक साथ चुनाव कराने का सुझाव नया नहीं है. 1983 में स्वयं निर्वाचन आयोग ने यह सुझाव रखा था. 1999 में केंद्रीय विधि आयोग ने अपनी 170वीं रिपोर्ट में इसकी वकालत की थी. दिसम्बर 2015 में संसद की  एक स्थायी समिति ने एक साथ चुनाव कराने के वैकल्पिक और व्यावहारिक मार्ग तलाश करने की सिफारिश की थी. पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने पिछले वर्ष संसद के संयुक्त सत्र में इस बारे में चर्चा की थी.

इस सुझाव के पक्ष में कुछ तर्क बड़े ठोस हैं. एक साथ चुनाव कराने से बार-बार चुनाव आचार संहिता लागू नहीं करनी पड़ेगी, जिससे विकास कार्यों में रह-रह कर रुकावट नहीं आएगी. चुनाव आयोग, प्रशासनिक तंत्र और सुरक्षा बलों से लेकर सरकारी कर्मचारियों एवं अध्यापकों तक को हर बार निर्वाचन कार्यों में व्यस्त नहीं होना पड़ेगा. चुनाव-नियमितता सुनिश्चित होगी तो सरकारें अपना ध्यान पूरी तरह विकास कार्यों की तरफ लगा सकेंगी. राजनैतिक स्थिरता रहेगी. चुनावों में खर्च कम होगा. सुशासन को बढ़ावा मिलेगा और राजनैतिक भ्रष्टाचार कम होगा, आदि.

1967 तक देश में लोक सभा और विधान सभाओं के चुनाव एक साथ ही हुआ करते थे. उसके बाद भारतीय राजनीति में नया दौर आया. कांग्रेस के वर्चस्व को चुनौती मिली, क्षेत्रीय राजनैतिक दलों का उदय हुआ, मध्य जातियों और दलितों के राजनैतिक उभार से नये समीकरण बने. दल-बदल और गठबंधन की राजनीति बढ़ने से संसदीय अस्थिरता का दौर आया. कई राज्यों में हफ्ते भर से लेकर साल-छह महीने की सरकारें बनीं. बार-बार राष्ट्रपति शासन और जल्दी-जल्दी चुनावों का सिलसिला शुरू हुआ.

73वें-74वें संविधान संशोधनों  के बाद त्रिस्तरीय नगर निकायों और पंचायतों के चुनाव शुरू हुए तो राज्यों में हर साल कोई न कोई चुनाव होने लगे. मतदाता सूचियां भी अलग-अलग हैं. सतारूढ़ दल से लेकर विपक्ष तक और पूरे प्रशासनिक तंत्र का ध्यान चुनावों पर रहता है. शिक्षकों का यह हाल है कि वे स्कूलों में कम, विभिन्न चुनावी कार्यों में  ज्यादा तैनात रहते हैं. इस सब ने एक साथ चुनाव कराने की चर्चा को बल ही प्रदान किया.

विधि आयोग के सार-पत्र के अनुसार 2019 के लोक सभा चुनावों के साथ कुछ विधान सभाओं के चुनाव कराने के लिए या तो उनका (मसलन, अभी राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़) कार्यकाल कुछ बढ़ाना होगा या कुछ (जिनका कार्यकाल 2020 या 2021 में खत्म हो रहा हो) का कार्यकाल घटाना होगा. बाकी विधान सभाओं को भी 2024 के आम चुनाव तक खींचना होगा. इसके लिए संविधान संशोधन की जरूरत होगी. निर्वाचन सम्बंधी कानून बदलने होंगे. उप-चुनाव लम्बे समय तक टालने होंगे. क्या कुछ क्षेत्रों की जनता को जन-प्रतिनिधि विहीन रखना लोकतंत्र की मूल भावना के विपरीत नहीं होगा? क्या गारण्टी है कि एक बार साथ-साथ चुनाव करा लेने के बाद कुछ राज्यों में मध्यावधि चुनाव की नौबत नहीं आएगी? केंद्र में भी चरण सिंह (1979) और अटल बिहारी बाजपेयी (1996) की सरकारों जैसी नौबत नहीं आएगी? कोई सरकार अविश्वास प्रस्ताव से गिर गई तो?

विधि आयोग का सार-पत्र कहता है कि अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान के साथ सांसदों अथवा विधायकों को वैकल्पिक सरकार के लिए भी मत देना होगा ताकि सदन भंग करने की नौबत न आए. यह कितना व्यावहारिक होगा? सुझाव यह भी है कि त्रिशंकु सदन होने पर सभी दलों के निर्वाचित सदस्य मिल कर एक नेता का चुनाव करें. जो हालत हमारे राजनैतिक दलों की है, उसमें यह कैसे हो पाएगा? फिर, इसमें दल-बदल कानून आड़े आ जाएगा. तो, क्या दल-बदल कानून भी बदला या रद्द किया जाएगा? केंद्र में राष्ट्रपति शासन का विकल्प भी रखना होगा. एक साथ चुनाव से खर्चे कम हो सकते हैं लेकिन बहुत बड़ी संख्या में ईवीएम एवं वीवीपैट मशीनों  की आवश्यकता होगी. उसके लिए भी बड़ी रकम चाहिए.

ब्रिटेन ने 2011 से अपने यहां हर पांच साल बाद संसदीय चुनाव की तारीख निश्चित की है. दक्षिण अफ्रीका और स्वीडन जैसे देशों में चुनाव एक साथ कराए जाते हैं किंतु ज्यादातर बड़े लोकतंत्रों में एक साथ चुनाव नहीं हो पाते. हमारे यहां राजनैतिक दलों में इस पर अलग-अलग राय हैं. कांग्रेस इसे व्यावहारिक मानती है. तृणमूल कांग्रेस ने इसे अलोकतांत्रिक कहा है तो भाकपा और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी मानते हैं कि इसे लागू करना ही सम्भव नहीं है. माकपा ने भी व्यावहारिक दिक्कतें गिनाई हैं. अन्नाद्रमुक और असम गण परिषद समर्थन में हैं.
एक साथ चुनाव कराने से कुछ समस्याएं दूर हो सकती हैं किंतु यह देखना ज्यादा जरूरी है कि कहीं इससे हमारे संघीय लोकतांत्रिक ढांचे में कुछ मूलभूत परिवर्तन तो नहीं हो जाएंगे? इतने विशाल और विविध देश में जनता के भिन्न-भिन्न स्थानीय मुद्दों की उपेक्षा तो नहीं होने लगेगी?

तमाम नकारात्मकताओं के बावजूद हमारा लोकतंत्र और संघीय स्वरूप कायम रहा है. जो बुराइयां आ गयी हैं क्या उनको दूर करने का उपाय दूसरा नहीं हो सकता? चुनाव सुधारों की बात क्यों भुला दी जा रही है? संवैधानिक संस्थाओं को और सुदृढ़ क्यों नहीं बनाया जा रहा है? राजनैतिक दल स्वयं अपने भीतर सुधार लाने की बात क्यों नहीं करते? बहुत सारी खामियां उन्हीं की पैदा की हुई हैं.

 (प्रभात खबर, 27 जून, 2018) 


Friday, June 22, 2018

नहीं, यह कुपाठ हमें नहीं पढ़ना है



दो महीने पहले विश्व हिंदू परिषद के एक मीडिया सलाहकार ने अपने ट्विटर पर बड़े गर्व से यह टिप्पणी लिखी थी कि जो ओला-टैक्सी मैंने बुक की, उसका ड्राइवर मुसलमान निकला, इसलिए मैंने बुकिंग रद्द कर दी. मैं जिहादियों को पैसा नहीं देना चाहता.

चंद रोज पहले लखनऊ की एक अच्छी पढ़ी-लिखी और सेवारत युवती ने एयरटेल कम्पनी से अपने डिश कनेक्शन की समस्या दूर करने को कहा. कम्पनी ने उन्हें संदेश भेजा कि शोएब नाम का टेक्नीशियन आपकी शिकायत देखने पहुंचेगा. उस युवती ने फौरन ट्वीट किया कि प्रिय शोएब, चूंकि तुम मुसलमान हो और मुझे मुसलमानों की कार्यशैली पसंद नहीं है, इसलिए कृपया कोई हिंदू टेक्नीशियन भेजिए.

दो दिन पहले एक पति-पत्नी को लखनऊ पासपोर्ट कार्यालय के एक कर्मचारी ने इसलिए अपमानित किया कि पत्नी हिंदू और पति मुसलमान है. उसने ऐसे विवाह पर आपत्ति जताते हुए दोनों के पासपोर्ट रोक लिए.

तीनों ही मामले सोशल साइटों और अखबारों में उछले, उनका व्यापक विरोध हुआ. पासपोर्ट बनवाने वाली महिला ने इसके खिलाफ आवाज उठाई, विदेश मंत्री तक को ट्वीट किया. वरिष्ठ अधिकारियों के हस्तक्षेप से उनका पासपोर्ट जारी हो गया. मुसलमान ड्राइवर पर आपत्ति जताने वाले विहिप के मीडिया सलाहकार को सेवा प्रदाता कम्पनी ने काफी हुज्जत के बाद जवाब दिया कि हम सेवा देते समय धर्म के आधार पर फैसले नहीं करते. एयरटेल कम्पनी ने पहले उस युवती को मुसलमान की बजाय सिख टेक्नीशियन देने का और भी निंदनीय प्रस्ताव किया लेकिन चूंकि सोशल साइट पर काफी हंगामा मच चुका था, इसलिए बाद में उन्होंने अपना रुख बदलते हुए कहा कि हम अपने ग्राहकों, कर्मचारियों और सहयोगियों में धर्म के आधार पर कोई अंतर नहीं करते.

इन तीन बिल्कुल ताजा मामलों का उल्लेख करने का मंतव्य यहां यह सवाल उठाना है कि हमारे देश में यह प्रवृत्ति क्यों दिखाई देने लगी है? पिछले कुछ दशक से यह तो अक्सर सुनने-देखने में आने लगा था कि मुसलमानों को किराये का मकान ढूंढने में बहुत दिक्कत आती है. हिंदू मकान मालिक उन्हें किरायेदार नहीं रखते. यह भी अपेक्षाकृत नयी चिंताजनक प्रवृत्ति है, लेकिन यह तो सुनने में कभी नहीं आया था कि मुसलमान ड्राइवर के साथ नहीं जाएंगे या मुस्लिम कारीगर को घर में नहीं आने देंगे या हिंदू पत्नी और मुसलमान पति का पासपोर्ट बनाने में आपत्ति की जाएगी.

हमारा समाज ऐसा क्यों होने लगा? गांवों-कस्बों से लेकर शहरों तक मिश्रित आबादी शांति-सद्भाव से रहती आयी है. अपने-अपने नियम-धरम बरतते हुए सब में भाईचारा कायम रहा. एक-दूसरे के त्योहारों में शामिल होना तो आम है ही, खान-पान का परहेज बरतने वालों के लिए शादियों में अलग से रसोइये लगाए जाते थे, लेकिन न्योता अवश्य निभाया जाता था. यह साझा विरासत सदियों से चली आ रही है. ब्रिटिश हुकूमत के दौरान इसे तोड़ने की कोशिशों और कालान्तर में बढ़ते साम्प्रदायिक तनावों के बावजूद यह साझा बना रहा. ड्राइवर और टेक्नीशियन का धर्म पूछ कर उसकी सेवा लेने से मना करना कभी नहीं सुना गया.

स्पष्ट है दिमागों में जहर कहीं से भरा जा रहा है. सदियों से चले आ रहे सामाजिक ताने-बाने को उधेड़ने की साजिश है. देश के संविधान की मूल भावना का मखौल उड़ाया जा रहा है. हमारी बहुलता को बनाये रखने की कोशिश करने वालों को कटघरे में खड़ा किया जा रहा है. इतिहास की मनमानी व्याख्या की जा रही है. सोशल साइटों पर झूठ फैला-फैला कर विष घोला जा रहा है. तकलीफ इस बात से और बढ़ जाती है कि ऐसी निंदनीय हरकतों के समर्थक भी खूब निकल आते हैं.

यह खतरनाक सबक पढ़ाने वाले कौन हैं? उनकी और उनके इरादों की पहचान जरूरी है. इससे भी जरूरी है कि यह कुपाठ हमें नहीं पढ़ना है.

(सिटी तमाशा, 23 जूम, 2018) 

Friday, June 15, 2018

बड़े मकानों के छोटे इनसान


वरिष्ठ पत्रकार और कवि सुभाष राय को एसटीएफ के एक इंस्पेक्टर ने जिस तरह अपमानित किया और धमकाया उसके खिलाफ राजधानी के पत्रकारों-साहित्यकारों में आक्रोश स्वाभाविक था. उस इंस्पेक्टर का निलम्बन काफी नहीं है. कड़ी सजा मिलनी चाहिए. इस स्तम्भ में उस घटना का जिक्र आक्रोश से इतर उस नागर व्यवहार के लिए किया जा रहा है जो इस अशोभन एवं निंदनीय घटना के मूल में है.

सुभाष राय के पड़ोसी ने ट्रक भर मौरंग उनके घर के ऐन फाटक पर गिरवा दी. एकाधिक बार कहने के बावजूद उसे हटवाया नहीं, जबकि वे अच्छी तरह देख रहे थे कि श्री राय मौरंग के कारण अपनी कार बाहर नहीं निकाल सकते. अव्वल तो उन्हें अपने पड़ोसियों की सुविधा-असुविधा का बराबर ध्यान रखना चाहिए था. ट्रक वाले ने मौरंग गलत जगह गिरा दी थी तो यथाशीघ्र उसे हटवा कर इसअसुविधा के लिए माफी मांगनी चाहिए थी. ऐसी अपेक्षा सामान्य नागरिक व्यवहार है. उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया होगा?

एक महीना पुरानी बात है. हमारे मुहल्ले में एक डॉक्टर और उनकी बेगम ने अपने पड़ोसी के मकान के गेट के दोनों तरफ पौधा लगाने के लिए बनवाये जा रहे गमले अपनी गाड़ी चढ़ा कर ध्वस्त कर दिये. उससे पहले वे बालकनी में खड़े होकर चिल्ला रहे थे कि वह हमारी गाड़ी खड़ी करने की जगह है. उनकी बड़ी गाड़ी के लिए वहां पर्याप्त जगह है,  तो भी एक पौधा वे रात में चुपके से पहले उखड़वा चुके हैं. गमले दोबारा बनवाये गये. फिलहाल पौधे सुरक्षित हैं.

शहरों में कार खड़ी करने और ‘डॉगी’ को पॉटी कराने पर पड़ोसियों के झगड़े आम हैं. गाली-गलौज और मार-पीट के बाद अक्सर थाना-पुलिस की नौबत आती है. एक-दूसरे के गेट के सामने जाने-अनजाने कार खड़ी कर देने और हटाने को कहने पर तू-तू-मैं मैं. एक-दूसरे का सम्मान छोड़िए, सामान्य शिष्टाचार भी नहीं. कोई मकान बनवाये तो सहयोग करने वाले पड़ोसी कम, नाक-भौं सिकोड़ने और बवाल करने वाले ज्यादा हैं. रिश्तों की मानवीयता मरती जा रही है. दूसरे को छोटा समझा जाता है. मकान और कार से हैसियत नापी जाती है. अब अगल-बगल के घरों में तीज-त्योहार और विशेष अवसरों पर पकवानों की तस्तरियों का आदान प्रदान शायद ही होता हो.

गोमती नगर में रहते तीस साल हो गये. कॉलोनियों में धीरे-धीरे महंगी कारें आती गयीं. मकान बड़े और भव्य बनते गये. उनमें रहने वाले छोटे, और छोटे होते जा रहे हैं. इन छोटे लोगों की नाक बहुत बड़ी है. वह सबसे आगे रहती है और हर जगह टकराती है. घरों से बाहर निकलते लोगों के चेहरों पर मुस्कराहट नहीं दिखती. पहले कौन ‘हैलो-हाय’ करे, इस चक्कर में संवादहीनता पनपती गयी. घरों की दीवारों पर लगे महंगे पेण्ट से बदगुमानी की बू आती है. इस बू पर वे इतराते हैं. सब वीआईपी हैं. पड़ोसियों को डराने-धमकाने के लिए कभी मंत्री-विधायकों के गुर्गे आ जाते हैं, कभी एसटीएफ के इंस्पेक्टर.

यह वह मध्य-वर्ग है जो सारी कायनात को ठेंगे पर रखे हुए है. वह बिना जरूरत धरती के गर्भ से खींच कर बेहिसाब पानी खर्च करता है और खुश होता है. वह खूब पेट्रोल फूंकता है, कमरे-कमरे एसी चलाता है, प्लास्टिक का ढेर कचरा उगलता है, मिट्टी से उसे घिन आती है और हरियाली से दुश्मनी मानता है. गरीबों, ग्रामीणों और भूखों से उसे नफरत है, जिन्होंने इस देश का कबाड़ा किया हुआ है. वह पूरी सृष्टि को अपने जीते-जी अकेले भोग लेना चाहता है.

दुर्भाग्य कि वही हमारी अर्थव्यव्स्था के केंद्र में है. वही ‘विकास’ का पैमाना है. सो मित्रो, कीजै कौन उपाय? 

(सिटी तमाशा, नभाटा, 16 जून, 2018)