Friday, December 15, 2017

तो फिर कैसे कम हो भ्रष्टाचार ?


गोण्डा जिले के ऐलनपुर प्राथमिक विद्यालय में छात्रवृत्ति में गबन की एक शिकायत 2007 में लोकायुक्त कार्यालय में दर्ज की गयी. विद्यालय के तत्कालीन कार्यवाहक प्रधानाचार्य, एक ग्राम पंचायत अधिकारी और सहायक बेसिक शिक्षाधिकारी पर गबन का आरोप था. प्रदेश के तब के उप-लोकायुक्त ने इस शिकायत की जांच की. 2008 में उन्होंने अपनी जांच रिपोर्ट सरकार को सौंपी जिसमें तीनों को गबन का दोषी करार देते हुए उचित दण्ड देने की सिफारिश की गई थी.
लोकायुक्त या उप-लोकायुक्त जांच कर सकते हैं लेकिन दोषियों पर कार्रवाई का अधिकार उन्हें नहीं दिया गया. यह जिम्मेदारी सरकार ने अपने पास ही रखी. 2010 तक भी जब इस दोषियों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई तो उप-लोकायुक्त ने तत्कालीन सरकार को याद दिलाया कि गबन के दोषियों को दण्ड दिया जाना है. फिर भी फाइल दबी रही.
अब शिकायत के दस साल बाद और जांच रिपोर्ट सौंपे जाने के नौ साल बाद बीते गुरुवार को वर्तमान सरकार के पंचायती राज मंत्री ने विधान सभा को बताया कि फैजाबाद मण्डल के उप-निदेशक से जांच कराई गई तो उस मामले में गबन की शिकायत सही नहीं पाई गयी.
लोकायुक्त या उप-लोकायुक्त की जांच रिपोर्टों का क्या हश्र होता है, यह प्रसंग साफ बता देता है. अव्वल तो सरकारें उनकी रिपोर्ट पर कार्रवाई नहीं करतीं, सिफारिशें धूल खाती रहती हैं. यह मामला तो और भी अद्भुत है. उप-लोकायुक्त की जांच के बाद जिले के एक छोटे अफसर से जांच कराई गयी जिसमें गबन मिला ही नहीं. फिर, उप-लोकायुक्त की जांच का अर्थ ही क्या रहा?  
प्रशासनिक सुधार आयोग (1966-1970) ने सिफारिश की थी कि राजनैतिक और प्रशासनिक भ्रष्टाचार पर अंकुश के लिए केंद्र में एक लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्त नियुक्त किये जाने चाहिए जो अधिकारियों से लेकर मंत्रियों तक के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायतों की जांच कर सकें. केंद्र सरकार ने तो लोकायुक्त की तैनाती नहीं की लेकिन 1971 में सबसे पहले महाराष्ट्र सरकार ने अपने यहां लोकायुक्त नियुक्त किया. उसके बाद धीरे-धीरे कई राज्यों ने लोकायुक्त एवं उप-लोकायुक्त की तैनाती की. आज उत्तर-प्रदेश समेत 22 राज्यों में लोकायुक्त एवं उप-लोकायुक्त तैनात हैं. लोकायुक्त से कोई भी शिकायत कर सकता है. वे मंत्रियों से लेकर अधिकारियों तक के खिलाफ शिकायतों की जांच कर सकते हैं.
लोकायुक्तों की जांच में अनेक बार मंत्री तक दोषी पाये गये हैं लेकिन उन पर कार्रवाई नहीं हुई. ताजा गम्भीर मामला पिछली अखिलेश सरकार में मंत्री रहे गायत्री प्रजापति का है. उनके खिलाफ पद के दुरुपयोग और भ्रष्टाचार की कई शिकायतें थीं. कुछ लोकायुक्त तक भी पहुंची. लोकायुक्त की जांच में गायत्री दोषी पाये गये. उनके खिलाफ कार्रवाई करना तो दूर जांच रिपोर्ट तक विधान सभा में पेश नहीं की गयी, जिसका संवैधानिक प्रावधान है. उलटे, गायत्री की हैसियत सरकार में बढ़ती गयी. राज्यमंत्री से कैबिनेट मंत्री बनाये गये. पारिवारिक विवाद के कारण एक बार अखिलेश ने उन्हें हटाया भी तो मुलायम के दवाब में फिर रख लिया था.

जाहिर है, लोकायुक्त की तैनाती सिर्फ दिखावा है. बहुत कम मामलों में छिट-पुट कार्रवाई कभी हो गयी तो अलग बात, वर्ना कोई भी सरकार उनकी जांच रिपोर्टों को गम्भीरता से लेती नहीं. प्रदेश के पूर्व लोकायुक्त एन के मेहरोत्रा ने राज्य के कुछ चर्चित भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ जांच करके कारवाई के लिए सरकार को लिखा. कई बार सख्त चिट्ठियां लिखीं लेकिन सरकार मौन बैठी रही थी.
(सिटी तमाशा, नभाटा, 16 दिसम्बर, 2017) 

Tuesday, December 12, 2017

टुकड़े-टुकड़े हो बिखर चुकी मर्यादा


साल 2014 का आम चुनाव नरेंद्र मोदी ने परिवर्तनसुशासनविकासअच्छे दिन और भ्रष्टाचार के खिलाफ युद्ध के नारे से लड़ा था. यूपीए-2 की विफलताओं और घोटालों से आजिज जनता ने बड़ी आशा से मोदी के नेतृत्त्व में भाजपा को भारी विजय दिलवाई. उसके बाद बिहार और उत्तर प्रदेश विधान सभा के चुनावों में मोदी ने खूब चुनाव-प्रचार किया. जब गिरिराज सिंह तथा संगीत सोम से लेकर अमित शाह तक अनर्गल प्रलाप के अलावा साम्प्रदायिक रंग वाले भाषण दे रहे थे तब मोदी ने चुनाव सभाओं में अपने को काफी संतुलित रखा. कतिपय हिंदूवादी उद्गारों के अलावा अपनी सरकार की उपलब्धियांकड़े फैसले और भ्रष्टाचार पर हमले ही उनके भाषणों के केंद्र में रहे.
लेकिन गुजरात का चुनाव प्रचार समाप्त होते-होते मोदी को क्या हो गया? ‘हूं विकास छूंहूं गुजरात छूं’ से शुरू प्रचार देश के खिलाफ साजिश के अनर्गल आरोपोंगुजरात के चुनाव में पाकिस्तानी साठ-गांठ की कल्पित कथापाकिस्तानियों को अपने सफाये की सुपारी देने के अजब इल्जामनीच जाति के बखानपूजा के लिए नमाज की तरह बैठने के किस्सेनाना-दादी पर लांछनोंआदि-आदि में क्यों बदल गयाक्यों हमारे प्रधानमंत्री अपनी पार्टी के उन अंकुशहीन नेताओं की तरह अमर्यादित भाषा बोलने लगेजिनकी जिह्वा पर कुछ लगाम लगाने की अपील अक्सर उनसे की जाती रही?
शालीन और अक्सर मौन रहने वाले पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अगर अत्यंत आहत होकर कहा कि “मोदी जी हर संवैधानिक पद पर कालिख पोतने की अपनी अदम्य इच्छा से जो नजीर पेश कर रहे हैं वह बहुत खतरनाक है “ और उनसे माफी मांगने की मांग के साथ “जिस पद पर वे बैठे हैं उसके अनुरूप परिपक्वता और गरिमा-प्रदर्शन” की अपील की है तो क्या गलत कियाभाजपा के वरिष्ठ मंत्री अब बचाव की मुद्रा में भांति-भांति के तर्क पेश कर रहे हैं.
जिस निजी भोज-चर्चा में पूर्व प्रधानमंत्रीपूर्व उप-राष्ट्रपतिपूर्व सेनाध्यक्षपूर्व राजनयिक और पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री के साथ चंद वरिष्ठ पत्रकार शामिल रहे होंऔर ऐसी बैठकें मोदी जी की जानकारी में पहली बार नहीं हुई हैंउसे गुजरात चुनावों से जोड़कर पाकिस्तानी दखल और एक मुसलमान (अहमद पटेल) को राज्य का मुख्यमंत्री बनाने की पाकिस्तानी साजिश में कांग्रेस के शामिल होने का आरोप लगाकर प्रधानमंत्री ने निश्चय ही अपने पद की गरिमा गिराई है. उन्होंने अनावश्यक रूप से पाकिस्तान को यह कहने का मौका दे दिया कि “चुनाव अपनी क्षमता से जीतेंअपनी चुनावी बहसों में पाकिस्तान को न घसीटें और भारत के प्रधानमंत्री थोड़ा सयानापन दिखाएं”
निश्चय ही प्रधानमंत्री को ये आपत्तिजनक बातें कहने के लिए वरिष्ठ कांग्रेसी नेता मणिअशंकर अय्यर के अत्यंत निंदनीय बयान ने उकसाया. अय्यर ठीक से हिंदी न जानने के बहाने प्रधानमंत्री को “नीच” कहने की सफाई भले देंइस मुंहफट नेता ने सर्वथा आपत्तिजनक बात कही. किंतु ऊटपटांग बोलने के लिए कुख्यात किसी विरोधी नेता के बयान से प्रधानमंत्री पद पर बैठे नेता का मर्यादा भूल जाना क्या कहलाएगाफिर, “नीच आदमी” को “नीच जाति का आदमी” बना देनाउसे “गुजराती अस्मिता” से जोड़कर “गुजरात और गुजराती का अपमान” बता कर चुनाव-सभाओं में “वोट से बदला लेने” के लिए ललकारना क्या प्रधानमंत्री को शोभा देता है?
पिछले दिनों प्रधानमंत्री हफ्ते में पांच दिन गुजरात में सघन चुनाव-प्रचार में जुटे रहे. जैसे-जैसे प्रचार का समय बीतता गया उनकी वाणी संतुलित होती गयी और उसी तेजी से विकास के दावे और वादे नदारद हो गये. कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में अपने मुवक्किल की तरफ से रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद मामले की सुनवाई टालने की दलील क्या दीमोदी जी ने उसे भी कांग्रेस के खिलाफ चुनावी मुद्दा बना लिया. राहुल के नाना और दादी के किस्से तो वे सुना ही रहे थे. राहुल की ताजपोशी पर अय्यर ने औरंगजेब का जिक्र क्या कियामोदी उनके बयान का आधा हिस्सा लेकर “कांग्रेस के औरंगजेब राज” तक पहुंच गये.
नोटबंदी से “काले धन और भ्रष्टाचार की कमर तोड़ने” और जीएसटी के “साहसी फैसले” का जिक्र करना वे गुजरात में क्यों भूल गये? अपने तीन साल के शासन की उपलब्धियां गिनाना भी उनसे नहीं हो पाया. वे कांग्रेस पर इस कदर हमलावर हो गये कि राहुल ने तंज कर डाला कि “मोदी जीआप तो कांग्रेस को खत्म करने का दावा करते हैंफिर हर समय कांग्रेस की ही बात क्यों करने लगे?” भाजपाई बागी शत्रुघ्न सिन्हा ने पूछा कि “आदरणीयक्या किसी भी कीमत पर चुनाव जीतने के लिएवह भी प्रचार के अंतिम दौर मेंअपने राजनैतिक विरोधियों के विरुद्ध बिल्कुल नयीअप्रमाणित और अविश्वसनीय कथाएं गढ़ना बहुत जरूरी हो गया है?” मोदी के अविश्वसनीय आरोपों पर  भाजपा के सहयोगी दल जद (यू) के पवन वर्मा को कहना पड़ा कि यह “कुछ ज्यादा ही हो गया”
विपक्षी दलोंविशेष रूप से कांग्रेस की हौसला अफजाई करता हुआ यह तथ्य भी गुजरात के इस चुनाव-प्रचार से निकला है कि राजनीति के लिए अनुपयुक्त ठहराये जा रहे राहुल गांधी कहीं बेहतरजिम्मेदार और शालीन नेता के रूप में उभरे हैंजबकि अजेय-सा माने जा रहे नरेंद्र मोदी की छवि अपने ही कारण धुंधली हुई है. स्वयं उनके कई समर्थकों ने उनके हाल के बयानों पर आश्चर्य प्रकट किया है.
संयोग है कि इसी हफ्ते राहुल कांग्रेस अध्यक्ष भी निर्वाचित घोषित किये गये हैं.  मोदी की तुलना में राहुल ने ज्यादा संयम और जिम्मेदारी वाले बयान दिये. जब मोदी कांग्रेस पर अजब-गजब आरोप लगा रहे थे तब राहुल कह रहे थे कि “हम प्रधानमंत्री पद का सम्मान करते हैंइसलिए प्रधानमंत्री की मर्यादा के विपरीत कुछ नहीं कहेंगे. हम उन्हें प्यार से हराएंगे.” बड़बोले अय्यर को कांग्रेस से निलम्बित करने का राहुल का फैसला भी काफी सराहा गया. इससे भी मोदी पर जवाबी दवाब बनाहालांकि साम्प्रदायिक-घृणा-जनित हत्याओं पर भी प्रधानमंत्री मौन ही रहे.
गुजरात का चुनाव नतीजा चाहे जो होउसने राजनैतिक मतभेदों को निजी वैमनस्यता, अनर्गल-अविश्वसनीय आरोपों तथा संवैधानिक पदों के मर्यादा-भंग के निम्न-स्तर तक पहुंचाया. खेद है कि इस अनैतिक संग्राम में प्रधानमंत्री स्वयं भी शामिल हो गये. यह याद रखा जाना जरूरी है कि राजनैतिक प्रतिद्वंद्वियों में मर्यादा और परस्पर सम्मान हर हाल में बनाये रखने का अलिखित लोकतांत्रिक नियम है. नेताओं को आत्मनिरीक्षण करना चाहिएवर्ना 2019 आते-आते भारत विश्व-गुरु नहींहंसी का ही पात्र बनेगा.
“अंधा युग” में धर्मवीर भारती की पक्तियां स्मरण हो आती हैं- “टुकड़े-टुकड़े हो बिखर चुकी मर्यादाइसको दोनों ही पक्षों ने तोड़ा है. पाण्डव ने कम, कौरव ने कुछ ज्यादायह रक्तपात अब कब समाप्त होना है.”
मर्यादा का यह रक्तपात गुजरात में ही थम जाए तो अच्छा. संविधान हमारे नेताओं को सदबुद्धि दे. 
(प्रभात खबर, 13 दिसम्बर, 2017)  






Friday, December 08, 2017

बाअदब, बामुलाहिजा होशियार!


लखनऊ की ग्राम पंचायत सुबंशीपुर की कभी प्रधान रही अमरकली की हमें बड़ी याद आ रही है. वह 2005 का साल था. प्रदेश में उस समय ग्राम पंचायतों के चुनाव हो रहे थे. उसी सिलसिले में गांवों का दौरा चल रहा था.  अनपढ़ अमरकली दस साल से ग्राम प्रधान थीं. अपने गांवों को उन्होंने सड़कों, नालियों, खड़ंजों, हैण्डपम्पों, स्कूल, आदि से विकसित कर रखा था. 350 से ज्यादा गरीब परिवारों को इंदिरा आवास योजना के अन्तर्गत पक्के कमान दिलवा दिये थे. वे खुद कच्चे मकान में रह रही थीं. अपने लिए पक्का घर बनवाना उनकी प्राथमिकता में था ही नहीं.

सीतापुर के बीहट गौड़ गांव के तब के प्रधान मुन्ना सिंह की भी हमें खूब याद है. उन्होंने अपनी पंचायत के गांवों को इतना विकसित कर दिया था कि 50 किमी दूर तक उसकी चर्चा होती थी. उस समय प्रधानी के उम्मीदवार वादा कर रहे थे कि हम मुन्ना सिंह की तरह ही गांवों का विकास करेंगे. गांव में सब तरफ सड़क थी लेकिन मुन्ना सिंह के घर के सामने कच्चा रास्ता था. पूछने पर उन्होंने बताया था कि मैं अपने घर के सामने की सड़क सबसे बाद में बनवाऊंगा, जब सब तरफ सड़कें बन जाएंगी. श्रद्धा और आदर से हम ऐसे प्रधानों के आगे विनत हो गये थे.

अमरकली और मुन्ना सिंह जैसे प्रधानों की याद हमें उस दिन बहुत ज्यादा आई जब हमने जाना कि संयुक्ता भाटिया के मेयर निर्वाचित होते ही लखनऊ नगर निगम ने उनके घर की तरफ जाने वाली सड़क दुरस्त कर दी. वह सड़क टूटी-फूटी न रही होगी तब भी संयुक्ता जी के मेयर बनते ही नगर निगम ने आनन-फानन उसे ठीक कर दिया. अमरकली और मुन्ना सिंह में कोई मेयर बनता तो कहते- नहीं, पहले सारे शहर की सड़कें ठीक करो, मेरे घर सबसे बाद में आना.

जनता की, उन लोगों की जिनकी सेवा के लिए जन-प्रतिनिधि चुने जाते हैं, अब कोई फिक्र नहीं करता. लखनऊ का वायु प्रदूषण स्तर इन दिनों बहुत ज्यादा बढ़ा हुआ है. प्रदूषण कम करने के लिए पानी छिड़कने की बात आई तो सबसे पहले राजभवन, मुख्यमंत्री निवास, सचिवालय के आस-पास के पेड़ और सड़कें तर की गईं. खानापूरी के लिए शहर के दूसरे इलाकों में भी छिड़काव का रोस्टर बनाया और प्रचारित किया गया लेकिन शायद ही कभी वहां छिड़काव किया गया हो. राजभवन, सचिवालय और कालिदास मार्ग की तरफ रोज शाम को सड़कें धोयी जा रही हैं. अग्निशमन की गाड़ियों से ऊंचे पेड़ों पर पानी फेंका गया. हरियाली होने के कारण इन वीआईपी इलाकों में बाकी शहर की तुलना में वैसे भी प्रदूषण कम होगा.

कोई वीवीआईपी कभी नहीं कहता कि पहले पूरे शहर में छिड़काव करो. पहले पूरे शहर की सड़कें ठीक करो. बिजली जाने से अस्पतालों में ऑपरेशन तक ठप हो जाएंगे लेकिन वीवीआईपी इलाकों का बल्ब कभी नहीं बुझता. कुछ दिन बाद जब शीत लहर चलेगी तो अलाव के लिए लकड़ियां लेकर नगर निगम की गाड़ी सबसे पहले मंत्रियों के बंगलों पर जाएगी. कोई मंत्री नहीं कहता कि हमारे बंगलों में अलाव की जरूरत नहीं. पहले पूरे शहर की गरीब जनता के लिए लकड़ियां पहुंचाओ. उलटे, वीआईपी फोन करके अपने बंगलों पर ज्यादा लकड़ी गिरवाते हैं.


कहने को हम लोकतंत्र हैं लेकिन इसका प्रशासनिक तंत्र वीआईपी की सेवा के लिए बन गया है. जनता की सुविधा-सेवा नहीं देखी जाएगी. वीआईपी काफिला फर्राटा मारते हुए गुजर जाए, इसके लिए जनता को जहां-तहां जाम में ठेल दिया जाएगा. गम्भीर मरीज की एम्बुलेंस के लिए सिर्फ अब्दुल कलाम नाम के राष्ट्रपति ने अपना काफिला रुकवाया था. बस. बाकी सब जन-प्रतिनिधि ठहरे बादशाह!  
(सिटी तमाशा, नभाटा, 09 दिसम्बर, 2017)

Thursday, December 07, 2017

किस्सा पिडी के ट्वीट का


अक्टूबर के अंतिम और नवम्बर के शुरुआती दिनों में राहुल गांधी का पिडीट्विटर पर ट्रेण्ड कर रहा था. पिडी कौन? राहुल का डॉगी. कुत्ता कहने का चलन नहीं रहा. कुत्ते सड़क वाले होते हैं. खैर, पिडी ने ट्विटर पर बताया कि राहुल गांधी के ट्वीट और रिट्वीट के पीछे उसका हाथ है. उस ट्विटर हैण्डल पर पिडी का वीडियो भी अपलोड हुआ था. फिर तो ट्विटराती को मजा आ गया. ट्विटराती नहीं जानते? अरे, वही ट्विटर वाली आबादी. जैसे बारात में शामिल बाराती, वैसे ट्विटर वाले ट्विटराती!
चलिए, मजाक छोड़िए. आखिर पिडी को ट्वीट क्यों करना पड़ा? इसलिए कि जबसे राहुल गांधी ने गुजरात का मोर्चा जोर-शोर से सम्भाला है, तब से सोशल मीडिया पर उनके फॉलोवर एकाएक बहुत बढ़ गये. मुश्किल से देढ़ लाख फॉलोवर थे, जो एकाएक बढ़कर चार लाख से ऊपर हो गये. उनके ट्वीट को रिट्वीट करने वाले भी कई गुणा ज्यादा हो गये. भाजपा वाले चिंतित हो गये. वे राहुल को जोकर बनाए रखने के लिए ऐ‌ड़ी-चोटी का जोर लगाए हुए हैं. इतनी बड़ी संख्या में फॉलोवर कहां से आ गये?
सो, भाजपा वाली सोशल मीडिया सेना ने पूछ लिया- राहुल के ट्वीट के पीछे है? मतलब भाजपाई कहना चाहते थे कि राहुल बाबा को तो इतनी अक्ल है नहीं. उनकी मदद करने कौन आ गया? जवाब में राहुल के ट्विटर हैण्डल पर पिडी और पिडी का वीडियो दिखाई दिया, यह कहते हुए कि – राहुल के पीछे मैं हूँ. भाजपाई चित्त! हालांकि खिसियाए मुंह इसका मजाक बनाना भी उन्होंने जारी रखा. 
मालूम होता है कि भाजपाई वास्तव में परेशान हैं. सोशल मीडिया तो उनका प्रिय अखाड़ा है, जहां वे अपनी विशाल पेड-अनपेड सेना के जरिए विरोधियों पर सच्चे कम-झूठे ज्यादा हमले करते रहते हैं. नरेंद्र मोदी का उभारऔर भाजपा का ताजा अवतार सोशल मीडिया अभियानों की देन है. अब उसी के अखाड़े में राहुल की चुनौती उन्हें पच नहीं रही.  राहुल हैं कि लगता है ठान बैठे हैं कि मोदी को उनकी ही शैली में जवाब देंगे.
जब राहुल ने जीएसटी को गब्बर सिंह टैक्सकहा तो उन्हें सोशल मीडिया से लेकर प्रिंट, डिजिटल और इलेक्ट्रानिक मीडिया में खूब चर्चा मिली. वाह, जीएसटी का क्या ही बढ़िया फुल फॉर्म निकाला- गब्बर सिंह टैक्स! “ये टैक्स मुझे दे दे, ठाकुर” वाले अंदाज में. राहुल का यह जुमला भी सोशल साइटों में हिट हो गया. 
अब तक मोदी और उनकी देखा-देखी भाजपा वाले ही चुटीले जुमले निकाला करते थे. मोदी के जुमले हिट होते रहे हैं. भाषणबाजी और जुमले बनाने में अपने प्रधानमंत्री का जवाब नहीं. लेकिन हाल की अपनी अमेरिका यात्रा में राहुल ने जाने कौन सी घुट्टी पी कि जुमलों में मोदी का मुकाबला करने डट गये.
अब देखिए, मोदी की हाल की एक गुजरात यात्रा की सुबह-सुबह राहुल ने क्या मजेदार ट्वीट किया- “आज होगी आसमान से जुमलों की बारिश”. लीजिए, राहुल का यह ट्वीट भी हिट हो गया. ट्रेण्ड करने लगा. राहुल ने कहीं नहीं लिखा था कि यह मोदी के बारे में है. मगर लोगों ने सीधा मोदी से जोड़ लिया. गुजरात में मोदी की सभा होनी थी उस दिन. मानसून विदा हो चुका. घन-घमण्ड नभ हो रहा होता तो भी जुमले बादलों से नहीं बरसते. मतलब मोदी ही करेंगे जुमलों की बारिश. राहुल का ट्वीट बिल्कुल निशाने पर बैठा. इसे रिट्वीट और लाइक करने वालों का आंकड़ा सोशल मीडिया पर मोदी की लोकप्रियता तक पहुंच गया.
जाहिर है कि यह सुनियोजित पलटवार है. नरेंद्र मोदी और अमित शाह समेत तमाम भाजपा नेताओं ने पिछले तीन-चार सालों में बड़े नियोजित ढंग से राहुल गांधी की  पप्पू-छविखूब प्रचारित की. उतने लल्लू तो राहुल नहीं ही हैं जितने बना दिये गये हैं. उन पर मजाकिया किस्से और चुटकुले रचने में बड़े-बड़े दिमाग लगे. पूरी सोशल मीडिया टीम लगी. नतीजा यह कि राहुल अगम्भीर एवं नासमझ राजनैतिक नेता माने जाने लगे. उनकी पप्पू-छवि बन गयी. इसके लिए कुछ जिम्मेदार खुद राहुल भी रहे. न संसद सत्र छोड़ कर चुपचाप विदेश जाते न नानी वाले चुटकुले चलते.  
खैर, किसी को आप कब तक लल्लू या पप्पू बनाए रख सकते हैं. गुजरात चुनाव नजदीक आते ही राहुल गांधी की टीम  सक्रिय हो गयी. अमेरिका के विभिन्न शहरों में हुई उनकी सभाओं और टीवी-वार्ताओं की काफी सराहना हुई. वह  नियोजित अभियान था. मोदी की अपनी सोशल मीडिया टीम है तो अब राहुल ने भी सोशल मीडिया टीम बना ली. उनके ट्वीट और भाषण बाकायदा समय और स्थिति देख कर तैयार किये जा रहे हैं. राहुल की छवि में इधर आया सुधार सभी ने यूं ही नोट नहीं किया.
अभी हाल में अहमदाबाद आईआईटी के छात्रों की सभा में मोदी ने कहा था कि “मैं आईआईटीयन तो नहीं, लेकिन टीयन अवश्य हूं”. उन्होंने चायवालाके लिए टीयन शब्द गढ़ा. “टीयनसमझने में आईआईटी वालों को भी कुछ समय लग गया था लेकिन जब राहुल ने कहा कि मोदी जी ने देश की अर्थव्यवस्था पर दो-दो टॉरपीडो चला दिये- नोटबंदी और जीएसटी, तो टॉरपीडो ने अच्छा धमाका किया.  
अब समझ में आ रहा है कि अमित शाह ने अपनी एक सभा में युवकों से यह अपील क्यों की होगी कि सोशल मीडिया की हर बात पर पूरा भरोसा मत करो, अपना दिमाग लगाओ. सोशल मीडिया को अपना बड़ा हथियार बनाने वाली पार्टी के अध्यक्ष की इस अपील ने उस समय चौंकाया था. अब लगता है कि उन्हें राहुल की ट्विटर और जुमला-तैयारियों का अंदाजा था.
यह तो कोई नहीं मान रहा कि  भाजपा गुजरात में हार जाएगी. राहुल के सोशल मीडिया में छा जाने मात्र से मतदाता कांग्रेस के पाले में नहीं चला जाएगा. भाजपा की चिंता इसलिए है कि राहुल का सोशल मीडिया पर लोकप्रिय होना भी उसे मंजूर नहीं.
राहुल तो राहुल, उनका पिडी भी ट्विटर पर ट्रेण्ड करने लगे तो उधर नींद उड़ने लगती है.    
(स्तम्भ, दस्तक टाइम्स, दिसम्बर, 2017) 


Tuesday, December 05, 2017

यूपी में दलित-मुस्लिम एका के नये संकेत


उत्तर प्रदेश के नगर निकाय चुनाव नतीजों के विश्लेषण से दो विशेष तथ्य उभरे हैं, जो राजनैतिक रूप से महत्त्वपूर्ण हैं. पहला यह कि भारतीय जनता पार्टी  (भाजपा) की विजय वास्तव में उतनी बड़ी नहीं है, जितनी कि मीडिया में बताई गयी. इससे बड़ा दूसरा तथ्य यह है कि मुस्लिम-बहुल शहरी इलाकों में भाजपा को हराने के लिए मुसलमानों ने एकजुट होकर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) को वोट दिये.
मुस्लिम मतदाता का नया रुझान
यह नया रुझान है. पिछले विधान सभा चुनाव में मायावती ने इसके लिए बड़ी कोशिश की थी लेकिन वे कामयाब नहीं हुईं. क्या अब उनकी कोशिश रंग ला रही है?
1992 में बाबरी मस्जिद-ध्वंस के बाद से मुसलमानों के वोट समाजवादी पार्टी (सपा) को मिलते रहे हैं. ताजा प्रयोग का संदेश दूर तक गया तो समाजवादी पार्टी के लिए बड़ी मुश्किल होगी. चिंता की लकीरें अखिलेश यादव के माथे पर पड़ गयी होंगी.
प्रदेश के 16 नगर निगमों के मेयरों के चुनाव में 14 पर भाजपा और दो पर बसपा को विजय मिली.  मुख्य विपक्षी दल सपा के हिस्से सिर्फ निराशा आयी.  उधर बसपा ने भाजपा से दो मेयर पद छीन लिए.  इसके अलावा तीन नगर निगमों में बसपा दूसरे नम्बर रही जबकि सपा को कुछ जगह चौथे स्थान पर रह जाना पड़ा. बसपा की यह सफलता दलित-मुस्लिम वोट मिलने से ही हो सकी.
बीते 22 नवम्बर को ही अपने जन्म दिन पर मुलायम सिंह यादव ने कहा था कि मुसलमान आज तक सपा का साथ देते रहे हैं लेकिन इधर पार्टी के नेता उनका समर्थन बनाये रखने के प्रयास नहीं कर रहे. क्या मुलायम को नये रुझान का भान था? ध्यान रहे कि समाजवादी पार्टी की बगडोर अब अखिलेश यादव के हाथ में है. मुलायम पार्टी के संरक्षक भर हैं.
क्या कहता है वोट-गणित?
बसपा ने अलीगढ़ और मेरठ नगर निगमों के मेयर पद जीते हैं. वहां पड़े वोटों का गणित देखिए- बसपा को एक लाख 25 हजार और भाजपा को एक लाख 15 हजार वोट मिले. सपा मात्र 16,510 वोट पा सकी. करीब ढाई लाख मुस्लिम और पचास हजार दलित मतदाता वाले अलीगढ़ में भाजपा की हार सिर्फ दस हजार वोटों से हुई. जाहिर है भाजपा को हराने के लिए मुसलमानों ने दलितों के साथ बसपा को चुना, सपा को नहीं.
मेरठ का हाल भी ठीक ऐसा ही रहा. बसपा को दो लाख 34 हजार और भाजपा को दो लाख पांच हजार वोट मिले. सपा सिर्फ 47 हजार वोट जुटा सकी. इस मुस्लिम बहुल नगर निगम में मुसलमान मतदाताओं की एकमात्र पसंद बसपा बनी. सहारनपुर में बसपा बहुत कम अंतर से हारी. समाजवादी पार्टी 16 निगमों में से सिर्फ पांच पर दूसरे नम्बर पर रही. बाकी जगह उसे तीसरे-चौथे स्थान पर रहना पड़ा.
मुसलमान मतदाताओं का बसपा की ओर यह झुकाव पूरे प्रदेश में नहीं दिखाई दिया लेकिन सपा से उनकी दूरी ज्यादा परिलक्षित हुई. सपा के गढ़ फिरोजाबाद में, जहां से रामगोपाल यादव के बेटे अक्षय सांसद हैं, मुस्लिम मतदाताओं ने असददुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इण्डिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के प्रत्याशी को तरजीह दी, जो दूसरे नम्बर पर रही. मुरादाबाद और सहारनपुर नगर निगमों में भी सपा के मुस्लिम उम्मीदवार बुरी तरह पिछड़े. मुरादाबाद में मुस्लिम मतों के विभाजन के कारण भाजपा जीती लेकिन दूसरे नम्बर पर कांग्रेस रही, सपा नहीं.
ओवैसी की पार्टी का इन निकाय चुनावों में 29 सीटें जीतना भी सपा के लिए खतरे की घण्टी है.
भाजपा जीत बड़ी नहीं  
प्रदेश के नगर निकाय चुनावों के परिणामों पर नजर डालें तो भाजपा की जीत उतनी चमकदार नहीं दिखती जितनी कि प्रचारित की जा रही है.  नगर निगमों के मेयर चुनाव में जरूर उसे भारी सफलता मिली लेकिन यह कोई नई बात नहीं है. 2012 के निकाय चुनावों में, जब यूपी की सत्ता में समाजवादी पार्टी थी और भाजपा का खेमा मोदी अथवा योगी के जादू से प्रफुल्लित नहीं था, तब भी नगर निगमों के 12 में से 10 मेयर पद भाजपा ने जीते थे. शहरी क्षेत्रों में पहले से उसका दबदबा रहा है.
2017 के नगर निकात चुनाव मोदी और योगी के दौर में इसी वर्ष मार्च में भाजपा की प्रचण्ड विजय के बाद लड़े गए जिनमें मुख्यमंत्री योगी और उनके पूरे मंत्रिपरिषद ने खूब चुनाव प्रचार किया. नगर निगमों के नतीजें छोड़ दें तो बाकी निकायों में भाजपा का प्रदर्शन फीका ही कहा जाएगा. भाजपा से कहीं ज्यादा सीटें निर्दलीयों ने जीतीं. समाजवादी पार्टी का कुल प्रदर्शन भी बहुत खराब नहीं रहा, हालांकि अपने परम्परागत गढ़ों में भी उसे पराजय देखनी पड़ी. बसपा ने भी ठीक-ठाक उपस्थिति दर्ज की.
नगर पालिका परिषद अध्यक्ष के 198 पदों में भाजपा सिर्फ 70 (35 %)  पर जीती. सपा ने 45, बसपा ने 29 और निर्दलीयों ने 43 पर विजय पायी. नगर पंचायत अध्यक्ष  के 438 पदों में मात्र 100 (करीब 23 प्रतिशत)  भाजपा के हिस्से आए. सपा ने 83, बसपा ने 45 और निर्दलीयों ने 182 पद  जीते. नगर पालिका परिषद सदस्यों के 64.25% पद और नगर पंचायत सदस्यों के 71% पद निर्दलीयों ने जीते.
यह स्थिति तब है जब मुख्यमंत्री योगी समेत पूरी प्रदेश सरकार प्रचार में जुटी थी. अखिलेश यादव और मायावती ने अपने को चुनाव प्रचार से दूर रखा. ये चुनाव पहली बार पार्टी और चुनाव चिन्ह के आधार पर लड़े गये. इससे पहले पार्टी-मुक्त चुनाव होते थे. सत्तारूढ़ दल अधिकसंख्य निर्वाचित अध्यक्षों एवं सदस्यों को अपना बता देता था. इस बार इसकी कोई सम्भावना नहीं है. नतीजे साफ बता रहे हैं कि भाजपा को वैसी विजय कतई नहीं मिली जैसी कि बताई जा रही है. उसका वोट प्रतिशत भी विधान सभा चुनाव की तुलना में गिरा है.
सपा-बसपा गठबंधन भारी पड़ेगा
ये चुनाव नतीजे एक और संकेत देते हैं. सपा-बसपा मिल कर चुनाव लड़ें तो 2019 में भाजपा को यू पी में आसानी से हरा सकते हैं. पिछले विधान सभा चुनाव में ऐसी चर्चा चली भी  थी. अखिलेश यादव ने तो सार्वजनिक रूप  से ऐसी सम्भावना जताई थी. मायावती ने भी नहीं की थी. तब बात आगे नहीं बढ़ पायी थी. मायावती विपक्षी दलों के महागठबंधन के लिए भी सशर्त तैयार थीं.
क्या 2019 के लोक सभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में मोदी और योगी की भाजपा को हराने के लिए सपा-बसपा गठबन्धन करेंगे? यह सवाल हवा में जरूर है लेकिन अभी बहुत दूर की कौड़ी लगता है.  


 (Firstpost/Hindi, 05 दिसम्बर, 2107) 

निकाय चुनाव: यूपी सही में क्या बोली?


उतर प्रदेश के नगर निकाय चुनावों में “विपक्ष का सफाया करने वाली विजय” का सिंहनाद करने के लिए भारतीय जनता पार्टी एक विजेता टीम मुख्यमंत्री योगी के नेतृत्त्व में गुजरात पहुंच रही है. वहां यह संदेश देना है कि भाजपा सरकारों को जनता कितना पसंद कर रही है और जो कांग्रेस गुजरात-विजय का दिवास्वप्न देख रही है वह राहुल गांधी की अमेठी में नगर निकायों की एक सीट नहीं जीत सकी.
क्या वास्तव में भाजपा ने उत्तर प्रदेश के नगर निकायों में विपक्ष का सफाया कर दिया है, जैसा कि उसके नेताओं के अलावा मीडिया का बड़ा तबका भी बता रहा है? क्या खुद विपक्ष ने, विशेष रूप से बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी ने, इन चुनाव नतीजों को गौर से देखा और विश्लेषित किया है? आखिर वे क्यों ईवीएम में गड़बड़ी करने का आरोप लगाकर खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचेकी कहावत चरितार्थ कर रहे हैं?
विपक्ष को खिसियाने की कतई जरूरत नहीं है. उसे तो भाजपा से सवाल पूछना चाहिए कि आखिर वह सिर्फ 16 नगर निगमों के चुनाव नतीजों का प्रचार कर क्यों फूली नहीं समा रही? नगर पालिका परिषदों और नगर पंचायतों के परिणामों की बात क्यों नहीं कर रही? बल्कि, विपक्ष चाहे तो इन चुनाव नतीजों से संदेश ग्रहण कर 2019 के लिए भाजपा के मुकाबले साझा मंच बनाने की पहल कर सकता है. हैरत है कि न मायावती और न ही अखिलेश यादव ने इस तरह देखा और सोचा है. लगता है वे भाजपाई प्रचार के सामने असहाय-से हो गये हैं.
क्या कहते हैं नतीजे
सोलह नगर निगमों में मेयर के 14 पद भाजपा ने जीते हैं. पार्षदों के करीब 46 फीसदी पद भी उसे हासिल हुए हैं. यह निश्चय ही बड़ी जीत है लेकिन यह कोई नई बात नहीं. नगर निगमों में भाजपा का पहले से ही कब्जा रहा है. 2012 में जब न मोदी राष्ट्रीय परिदृश्य नें थे, न योगी और यूपी में शासन समाजवादी पार्टी का था, तब के 12 नगर निगमों में मेयर के दस पद भाजपा ने जीते थे. पार्षदों में भी उसी का बहुमत था. इसलिए इस बार की विजय विशेष नहीं जबकि मुख्यमंत्री योगी समेत पूरा मंत्रिपरिषद चुनाव प्रचार में जुटा था. अकेले योगी ने ही 26 चुनाव सभाएं कीं. अखिलेश यादव और मायावती दोनों ही प्रचार करने नहीं निकले.
बड़े शहरी क्षेत्र से बाहर निकल कर नगर पालिका परिषदों और नगर पंचायतों के नतीजों पर निगाह डालते ही भाजपा की प्रचण्ड विजय का दावा फीका पड़ने लगता है. नगर पालिका परिषदों के 198 अध्यक्ष पदों में सिर्फ 70 भाजपा जीत सकी. बाकी 128 पद निर्दलीयों और विपक्षी दलों के हिस्से आये. परिषद सदस्यों के 5261 पदों में मात्र 922 (17.53%) भाजपा जीती. यहां निर्दलीयों ने 3380 (64.25%) पद जीते. सपा, बसपा ने बहुत खराब प्रदर्शन नहीं किया. नगर पंचायत अध्यक्ष के 438 पदों में भाजपा को सिर्फ 100 (22.53%) पर जीत मिली. सपा ने 83, बसपा ने 45 और निर्दलीयों ने 182 (41.55%) पद हासिल किये. पंचायत सदस्यों के 5434 पदों में केवल 664 (12.22%) भाजपा ने जीते. निर्दलीयों ने 3875 (71.31%), सपा ने 453 और बसपा ने 218 पद जीते.
निश्चित ही भाजपा ने पिछली बार की तुलना में बेहतर नतीजे हासिल किये. सभी राजनैतिक दलों में वह शीर्ष पर रही लेकिन निर्दलीयों ने उसे बहुत पीछे छोड़ा. मोदी और योगी राज में पूरा जोर लगाने के बाद मिली यह जीत “विपक्ष का सफाया करने वाली” तो नहीं ही है. बल्कि 2014 के लोक सभा और इसी वर्ष मार्च में हुए विधान सभा चुनावों के परिणामों की तुलना में भाजपा का यह प्रदर्शन फीका ही कहा जाएगा.
मुस्लिम मतदाताओं का रुझान
लोक सभा और विधान सभा चुनाव में भारी पराजय झेल चुकी बसपा की निकाय चुनावों से वापसी हुई है. दो नगर निगमों के मेयर पद उसने भाजपा से छीन कर जीते और दो में दूसरे नम्बर पर रही. इससे साबित हुआ कि शहरी इलाकों में भी उसका प्रभाव बढ़ा है. एक और महत्त्वपूर्ण संकेत यह है कि भाजपा को हराने के लिए कुछ जिलों में मुसलमानों ने एकजुट होकर बसपा को वोट दिये. दलित-मुस्लिम एका से ही बसपा को बढ़त मिली. विधान सभा चुनाव में मायावती ने इसके लिए पूरा जोर लगाया था. क्या अब उस प्रयोग का असर हो रहा है? समाजवादी पार्टी के लिए यह चिंता की बात होगी. मुलायम सिंह यादव ने कुछ दिन पहले आगाह भी किया था कि पार्टी नेतृत्त्व मुसलमानों को अपने साथ बानये रखने के प्रयास नहीं कर रहा. असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इण्डिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन ने भी पहली बार यूपी में अपना खाता खोला है. निकाय चुनावों में कई स्थानीय कारक महत्त्वपूर्ण होने के बावजूद मुस्लिम मतदाताओं के रुझान में परिवर्तन के संकेत इससे मिलते हैं.
समाजवादी पार्टी का प्रदर्शन नगर निगमों में खराब रहा लेकिन नगर पालिका परिषद और नगर पंचायतों में उसने ठीक-ठाक प्रदर्शन किया. पार्टी नेतृत्त्व ने पता नहीं क्यों इन चुनावों को गम्म्भीरता से नहीं लिया. अखिलेश यादव और दूसरे प्रमुख नेता चुनाव प्रचार के लिए निकले ही नहीं, जबकि भाजपा ने मुख्यमंत्री समेत सभी मंत्रियों को प्रचार में झौंक रखा था. मायावती ने भी न तो प्रचार किया और न ही मतदान. नतीजों के आधार पर भाजपा के दावों की पोल खोलने से भी उन्हें परहेज-सा है.
विपक्षी एकता के सूत्र
भाजपा के खिलाफ विपक्षी एकता की वकालत करने वालों के लिए ये नतीजे उत्साहवर्धक संदेश देते हैं. निकाय चुनावों में मतदाता का रुझान सर्वथा स्थानीय मुद्दों और सम्बंधों से तय होता है. इसके बावजूद ये नतीजे संकेत देते हैं कि यदि भाजपा के मुकाबले विरोधी दलों का महागठबंधन बने तो वह 2019 में उसे कड़ी टक्कर दे सकता है. सप-बसपा भी मिलकर लड़ें तो भाजपा की राह मुश्किल हो सकती है लेकिन इन दलों के साथ आने में रोड़े ही रोड़े हैं.
राज्य में पहली बार निकाय चुनाव पार्टी और चुनाव चिह्न के आधार पर लड़े गये हैं. पहले राजनैतिक दल निर्दलीयों को अपना बताने के दावे किया करते थे. इस बार उनकी जमीनी ताकत की तस्वीर खुली है. नगर पालिकाओं और नगर पंचायतों में 65-70 प्रतिशत निर्दलीय उम्मीदवार जीते हैं. 
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की हालत सुधरने के संकेत अब भी नहीं हैं. निकाय चुनावों में उसका प्रदर्शन बहुत दयनीय रहा. सोनिया की रायबरेली ने लाज रखी लेकिन राहुल की अमेठी में कहीं उसके प्रत्याशी ही नहीं थे और जहां थे, वहां हार गये. वाम दलों ने भी कई प्रत्याशी उतारे थे. साबित यही हुआ कि उत्तर प्रदेश में उनका जनाधार समाप्त प्राय है. आपको भी कोई खास सफलता नहीं मिली.
(प्रभात खबर, 06 दिसम्बर, 2017)





Friday, December 01, 2017

अपराध की राजधानी


1980 के दशक तक बहुत सारे लोग राजधानी लखनऊ में इसलिए बसना चाहते थे कि यहां बेहतर सुविधाओं के अलावा अपराध भी कम होते थे. यहां सरकार बैठती है. बड़ा प्रशासनिक अमला रहता है. राजधानी में अपराध होता तो बड़ा हो-हल्ला मचता. विपक्षी विधायक विधान सभा में मुद्दा उठाते और सरकार पर तीखा हमाला करते. सरकार पुलिस प्रशासन के पेच कसती. जवाब में अपराधियों पर शिकंजा कसा जाता.
इसलिए छुटभैय्ये अपराधी ही नहीं गिरोह भी लखनऊ से दूर-दूर रहते थे. दो-चार माफिया टाइप गिरोह कभी-कभार जरूर टकरा जाया करते थे. वर्ना ज्यादातर अपराध राजधानी से दूर-दूर होते थे. प्रदेश के पूर्वी, पश्चिमी और बुंदेलखण्ड इलाकों से अपराध की काफी खबरें आतीं. डकैत गिरोह भी सक्रिय रहते थे.
अस्सी के दशक से यह परिदृश्य बदलने लगा. अपराधियों का राजनैतिक इस्तेमाल बढ़ा. सत्ता प्रतिष्ठान और विधायक निवासों से अपराधियों को संरक्षण मिलने लगा. दूर-दराज के इलाकों में वारदात करके अपराधी राजधानी आने लगे. पुलिस को पता होता कि अपराधी कहां छुपे हैं लेकिन नेताओं के ठिकानों पर वह छापा डाल नहीं पाती. नेताओं के साथ-साथ पुलिस को अपराधियों की भी रक्षा करनी पड़ती. कभी-कभार कोई पकड़ा भी जाता तो ऊपर के दबाव से छोड़ दिया जाने लगा. सरकार जनहित में मुकदमे भी  वापस लेने लगी. अपराधियों में राजधानी का खौफ जाता रहा.
फिर एक और दौर आया जब बड़े अपराधी खुद चुनाव लड़कर विधान सभा पहुंचने लगे. नेताओं को चुनाव जिताने वाले अपराधी खुद चुनाव जीतने लगे. मंत्री बनने लगे. मीडिया ने उन्हें माफियाजैसा सम्मानजनकनाम दे दिया. अब वे सरकारी सुरक्षा में रहने लगे. उनके गिरोह सक्रिय रहे. उनके अधीन अपराधी सत्ता के गलियारों में सीना चौड़ा कर घूमने लगे. पुलिस उनका बाल बांका न कर सकी. उलते, अपराधी उसका कॉलर पकड़ने लगे. जिन पर ढेरों संगीन मुकदमे चल रहे हैं, पुलिस अफसरों को उन्हें सलाम करना पड़ता है.
अब अगर राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के ताजा आंकड़े बता रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा अपराध लखनऊ में हो रहे हैं तो क्या आश्चर्य? ब्यूरो ने सन 2016 के अपराध-आंकड़ों के आधार पर बताया है कि देश के 19 महानगरों में अपराध के मामलों में लखनऊ का नम्बर छठा है. गाजियाबाद और कानपुर का नम्बर क्रमश: 11वां और 16वां है. इसका निष्कर्ष क्या यही नहीं कि अपराधी राजधानी ही में सबसे ज्यादा बेखौफ हैं?
अबकी पहली बार जाति आधारित अपराधों के आंकड़े भी जारी किये हैं. इनके अनुसार दलित अत्याचार के मामलों में उतर प्रदेश देश में शीर्ष पर है. शहरों में यह दर्जा लखनऊ को मिला है. बिहार और पटना का नम्बर दूसरा है. 2016 में बिहार की तुलना में उत्तर प्रदेश में दोगुना दलित अत्याचार के मामले दर्ज हुए.
मायावती के नेतृत्त्व में बहुजन समाज पार्टी के एक बार पांच-साला शासन और तीन अन्य बार सत्तारोहण के बावजूद उत्तर प्रदेश में दलित-अत्याचार के मामले कम नहीं हुए. यह उस पार्टी के शासन पर एक टिप्पणी है. वैसे, सच यह भी हो सकता है कि दलितों में बढ़ी सामाजिक-राजनैतिक चेतना ने दमन के प्रतिकार में आवाज उठाई और जवाब में दमन तेज हुआ.
अपराध के ये आंकड़े हमेशा विवाद का विषय बनते हैं. विपक्ष विफलता का आरोप लगाता है और सरकार कहती है कि अपराध बढ़ते इसलिए दिख रहे हैं कि हम अपराध छुपाते नहीं, हर किसी रिपोर्ट दर्ज की जाती है. मगर सच कहीं और होता है जिसकी छाया आम जन-जीवन पर पड़ती है.

 (सिटी तमाशा, नभाटा, 2 दिसम्बर, 2017)

Wednesday, November 29, 2017

नरेंद्र मोदी का भीतरी विपक्ष


गुजरात में सत्ता विरोधी रुझान और कुछ जातीय समूहों के भाजपा-विरोध को अपनी लोकप्रियता से शांत करने के लिए गुजरात-पुत्रनरेंद्र मोदी जब चंद रोज पहले धुंआधार चुनाव प्रचार के लिए निकल रहे थे तब उनके मुखर विरोधी भाजपा नेता अरुण शौरी बोल रहे थे कि नरेंद्र मोदी सरकार की खासियत है झूठ. मोदी भी विश्वनाथ पताप सिंह की तरह अवसरानुकूल झूठ बोलते हैं. वे रोजगार सृजन जैसे कई वादे पूरा करने में विफल रहे हैं. एनडीए की अटल-सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे और प्रखर पत्रकार के रूप में चर्चित अरूण शौरी ने दिल्ली में एक कार्यक्रम में यह भी कहा कि नरेंद्र मोदी और आज का प्रधानमंत्री कार्यालय डरा हुआ है’.
यह तथ्य कम रोचक नहीं कि जो नरेंद्र मोदी विपक्ष के सफाये की नीति पर चल रहे हैं, स्वयं उनकी पार्टी में उनका विपक्ष खड़ा हो रहा है. अरूण शौरी काफी समय से मोदी सरकार की नीतियों की तीखी आलोचना करते आये हैं. नोटबंदी और जीएसटी की जितनी तीखी आलोचना यशवंत सिन्हा ने की, उसने भाजपा ही नहीं विपक्ष को भी चौंकाया. सिन्हा भाजपा के वरिष्ठ नेता हैं और एनडीए सरकार में वित्त मंत्री रहे हैं. फिल्म अभिनेता से राजनेता बने शत्रुघ्न सिन्हा भी भाजपा में बढ़ते मोदी विरोध का हिस्सा हैं.
2014 के बाद भाजपा में सर्वशक्तिमान बन कर उभरे नरेंद्र मोदी का उनकी ही पार्टी के भीतर यह मुखर विरोध चौंकाता नहीं है. तमाम कमजोरियों के बावजूद लोकतंत्र की यह बड़ी खूबी है. आप विपक्ष को जितना दबाना चाहेंगे, वह मिट्टी के भीतर अंकुआते बीज की तरह पनपता जाएगा. आप अपनी पार्टी में कितने ही ताकतवर हो जाएं, विरोध के स्वर वहां भी फूटेंगे जरूर.
अपने समय के कई अत्यंत प्रभावशाली नेताओं के बावजूद तत्कालीन कांग्रेस और सरकार में पूरी तरह छाये जवाहरलाल नेहरू का विरोध कम न था. नेहरू बहुत लोकतांत्रिक नेता थे और कम से कम प्रकट में अपना विरोध सहते, सुनते और कई बार प्रोत्साहित भी करते थे. इंदिरा गांधी अपने पिता की राजनैतिक परम्परा से उभरी थीं. शुरू से ही उन्होंने विरोध झेला और उस पर विजय पाई, हालांकि पार्टी विभाजित हुई. कालांतर में उनमें अपने विरोध को सहने-समझने की सामर्थ्य कम होती गयी. यहां तक कि वे विरोधी नेताओं की घोर उपेक्षा करने लगीं. फिर तो अपने देशव्यापी विरोध को कुचलने के लिए उन्होंने आपात-काल लागू किया और संविधान तक को निलम्बित कर दिया. इसकी उन्हें और देश बड़ी कीमत चुकानी पड़ी, यद्यपि इससे हमारा लोकतंत्र मजबूत ही हुआ. आपातकाल में संगठित लोकतांत्रिक विरोध का प्रतिमान बना.
पहले जनसंघ और फिर भारतीय जनता पार्टी में अटल-आडवाणी-जोशी की तिकड़ी बरसों-बरस छायी रही. कई चुनावों में भारी विफलताओं के लिए वह भी निशाने पर रही ही. वंशवादीकांग्रेस में सोनिया और राहुल विरोधी स्वर यदा-कदा आज भी उठ जाया करते हैं, जिन्हें स्वस्थ दृष्टि से देखने-समझने की समझ उसके नेतृत्त्व में है, ऐसा नहीं कहा जा सकता. पिछले कुछ दशक से हमारे सभी राजनैतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र काफी कमजोर हुआ है. वाम दल अपवाद कहे जा सकते हैं.
अपने को वंशवाद-मुक्त और लोकतांत्रिककहने वाली भाजपा में इन दिनों नरेंद्र मोदी की जैसी सर्वशक्तिमानहैसियत है, उसे देखते हुए ही कई राजनैतिक टिप्पणीकारों ने उनकी तुलना इंदिरा गांधी से की है. उनका आशय यह कि नरेंद्र मोदी न केवल विपक्षी दलों को कमजोर करने पर तुले हैं, बल्कि इंदिरा गांधी ही की तरह अपनी पार्टी एवं सरकार के भीतर वैकल्पिक नेतृत्त्व और विरोधी विचार पनपने देना नहीं चाहते. वहां कोई नम्बर-दो की हैसियत में नहीं है. एक से दस नम्बर तक मोदी ही मोदी हैं.
भारतीय जनता पार्टी में नरेंद्र मोदी के उदय से ही ऐसी प्रवृत्ति दिखाई देती है. गुजरात की राजनीति में नरेंद्र मोदी के साथ-साथ संजय जोशी का भी ग्राफ तेजी से बढ़ रहा था. फिर कैसे संजय जोशी हाशिए पर डाल दिये गये, इसकी कई कथाएं अब तक कही-सुनी जाती हैं. 2002 के गुजरात-दंगों के समय राजधर्मनिभाने की अटल की सलाह उन्होंने अनसुनी कर दी थी. 2012 में तीसरी बार गुजरात फतह करने वाले नरेंद्र मोदी जब 2014 के आम चुनाव में प्रधानमंत्री प्रत्याशी बनना चाहते थे, तब वे मुख्यमंत्री होने के साथ-साथ चुनाव-अभियान समिति के प्रभारी भी थे. भाजपा के सयाने नेता लाल कृष्ण आडवाणी  ने उसी समय एक आदमी, एक पदके सिद्धांत की वकालत करते हुए नरेंद्र मोदी का विरोध किया था. उसके बाद आडवाणी किस तरह किनारे किये गये और कई अवसरों पर अपमानित भी, यह सब ताजा इतिहास है.
2014 में लोक सभा चुनाव के नतीजे भाजपा की बड़ी जीत से कहीं अधिक नरेंद्र मोदी की प्रचण्ड विजय साबित हुए. आडवाणी-शिविरके रूप में भाजपा के भीतर नरेंद्र मोदी का जो भी थोड़ा विरोध था, वह अपने-आप दब गया. आडवाणी के साथ दिखे नेता मोदी-रोष का शिकार बने या उन्हें घुटने टेकने पड़े. भाजपा-अध्यक्ष के रूप में अमित शाह की ताजपोशी के लिए मोदी का एक इशारा काफी हुआ. फिर एक के बाद एक राज्यों में भाजपा की जीत ने मोदी को भाजपा में सर्वशक्तिमान बना दिया.
दिल्ली और बिहार की पराजयों ने कुछ समय को चमक फीकी पड़ने का भ्रम पैदा किया मगर उत्तर-प्रदेश समेत कुछ अन्य राज्यों में भाजपा को प्रचण्ड बहुमत मिलने से अमित शाह और उनके साहेबमोदी की पार्टी पर पकड़ जकड़ में बदल गयी. आज मोदी पार्टी और सरकार में पूरी तरह काबिज हैं और अपनी कार्यशैली में बहुत आक्रामक हैं. वहां किसी दूसरे विचार या लोकतांत्रिक बहस की सम्भावना नहीं.
यह स्थिति आंतरिक विपक्ष के अंकुरित होने के लिए पर्याप्त और उपयुक्त होती है. वही हो रहा है. आडवाणी ने सम्भवत: अपनी नियति स्वीकार कर ली है लेकिन अरुण शौरी, यशवंत सिन्हा, शत्रुघ्न सिन्हा खूब मुखर हैं. पार्टी के भीतर मोदी के अन्य मौन-विरोधी नहीं होंगे, ऐसा नहीं कहा जा सकता. यह मोदी के नेतृत्त्व को चुनौती देने से कहीं अधिक उनकी कार्यशैली के प्रति असहमति जताने के लिए है. आश्चर्य ही है कि शौरी व सिन्हा के विरुद्ध अब तक अनुशासनहीनताकी कारवाई नहीं की गयी.
भाजपा का आंतरिक विपक्ष बहुत कुछ गुजरात के चुनाव परिणाम पर निर्भर करता है. भाजपा की पराजय, जिसकी सम्भावना नहीं बताई जा रही, मोदी की चमक फीकी कर देगी. जीत का अंतर कम होने से भी उनकी स्थिति कुछ कमजोर होगी और भीतरी विपक्ष मजबूत होगा. यही कारण है कि मोदी गुजरात में अपनी पूरी ताकत लगा रहे हैं. आक्रामक तो वे हैं ही, भावनात्मक तीर भी कम नहीं चला रहे. एक निशाने से दो शिकार करने हैं- बाहरी और भीतरी विपक्ष.   

 (प्रभात खबर, 29 सितम्बर, 2017)

Friday, November 24, 2017

निकाय चुनावों का स्याह-सफेद पक्ष


लखनऊ नगर निगम का चुनाव परिणाम चाहे जिस पार्टी के पक्ष में जाए, जीतेगी एक महिला ही. सौ साल में यह पहली बार होगा जब महापौर की कुर्सी पर एक महिला बैठेगी. महिला प्रत्याशियों ने चुनाव पहले भी लड़ा लेकिन लखनऊ के नागरिकों ने हमेशा पुरुष को ही अपने महापौर की कुर्सी सौंपी. इस बार महिला महापौर चुनी जाएगी तो उसका श्रेय नागरिकों के चयन को नहीं आरक्षण को मिलेगा. चक्रानुक्रम आरक्षण के कारण इस  बार लखनऊ महापौर का पद महिला के लिए आरक्षित हुआ. ऐसा नहीं होता तो ज्यादातर प्रत्याशी पुरुष ही होते.
नगर निकायों-ग्राम पंचायतों में 33 फीसदी महिला आरक्षण लागू होने के लाभ हुए हैं. कम से कम इसने महिला सशक्तीकरण खूब किया है. ऐसे किस्से तो अब भी बहुत हैं कि महिला प्रधान का सारा काम-काज उनका पति या कोई करीबी पुरुष सम्बंधी करता है, जबकि निर्वाचित महिला चूल्हे-चौके और परिवार की जिम्मेदारियों ही में उलझी रहती है. मगर यह किस्से खूब हैं कि महिलाओं में राजनीति और प्रशासन की समझ किस तरह बढ़ी है. वे जागरूक हुई हैं. कई महिलाओं ने स्वयं प्रधानी व सभासदी के काम बखूबी सम्भालने शुरू किये हैं. 
क्या महिला मेयर के आने से नगर निगम का माहौल बदलेगा? क्या नगर निगम सदन की कार्रवाही बेहतर चल पाएगी? पुरुष सभासदों की उद्दण्डता और अनुशासनहीनता में कुछ सुधार आएगा? इन सवालों का जवाब बाद में मिलेगा. आम महिलाओं की समस्याओं, उदाहरण के लिए बाजारों में शौचालय की बड़ी कमी, की तरफ महिला महापौर का कितना ध्यान जाएगा, यह अभी कहना मुश्किल है लेकिन इस संकट को उनसे बेहतर और कौन समझ सकता है.
मुख्यमंत्री योगी और उनके सभी मंत्री इन निकाय चुनाओं में जितना सघन प्रचार करने में लगे हैं, उससे साफ है कि भाजपा पंचायत से संसद तक सभी चुनावों को जीतने के लिए पूरा जोर लगाने की नई रणनीति पर काम कर रही है. बाकी दलों के बड़े नेता प्रचार में नहीं उतरे हैं. इतना जोर निकायों की हालत बदलने में भी लगती तो क्या बात थी. ज्यादातर नगर निगम पहले भी भाजपा के कब्जे में रहे हैं. निकायों की आर्थिक हालत ठीक नहीं है. भ्रष्टाचार का बोलबाला है. बड़े शहरों से लेकर छोटे नगर तक गन्दगी और अतिक्रमण से त्रस्त हैं. पॉलिथीन प्रतिबंध हो या तहबाजारी नियम, खुले आम उल्लंघन हो रहा है. चुनाव जीतने जैसा जोर इन समस्याओं के निराकरण में भी लगे तो शक्ल बदले.
एक त्रासदी यह है कि पंचायती राज कानून की भावना का कोई भी दल सम्मान नहीं करता. निकायों को ताकतवर और आर्थिक रूप से सम्पन्न होना चाहिए था. सरकारों ही ने उसे नहीं होने दिया. उदाहरण के लिए, लखनऊ विकास प्राधिकरण को पूरी तरह नगर निगम के अधीन होना चाहिए. पहले तो ऐसे विकास प्राधिकरण बनने ही नहीं चाहिए थे. जो काम प्राधिकरणों के हवाले कर दिया गया है, वह सारा नगर निगम के पास होना चाहिए था. प्राधिकरण बनाने से आला अधिकारी ताकतवर हो गये, लगभग सभी आर्थिक अधिकार उनके पास चले गये. पंचायती राज कानून की मंशा के अनुसार ये समस्त अधिकार  और पूरा बजट नगर निगम के निर्वाचित जन-प्रतिनिधियों के पास होने चाहिए थे.
इस महत्वपूर्ण तथ्य को अब पूरी तरह भुला दिया गया है. बदलाव का नारा देने वाली भाजपा भी इस पर चर्चा तक नहीं करती. खस्ता हाल नगर निकाय लाचार बने हुए हैं. भ्रष्टाचार और अकर्मण्यता ने उन्हें और भी निष्प्रभावी बना दिया. नगरों की हालत सुधरे भी तो कैसे?  (सिटी तमाशा, नभाटा, 25 नवम्बर, 2017)