Saturday, October 02, 2010

गिर्दा : खुद को बटोरे बिना ही चल दिये, गुरू!

नवीन जोशी
‘नैनीताल समाचार’ की फाइलें पलट रहा था। पीले और भुरभुरे हो चुके पन्नों से गिर्दा महकने लगे। ‘अच्छा ऐसा ऽऽऽ!’ कहकर गिर्दा किसी पन्ने के बीच से चहकने लगते, ‘हड़ि ’ कहकर जैसे पूरी व्यवस्था को दुत्कारने लगे। ‘शिबौ-शिब’ उच्चार कर सत्ताधारियों की खिल्ली उड़ाने लगते। किसी शीर्षक से उनका रौद्र रूप प्रकट होता तो होली के बोलों पर आधारित कोई हेडिंग हिया में कुरकुताली लगाने लगती। नंदप्रयाग में गोली चलती तो गिर्दा की गजल-गोली ‘समाचार’ के पन्नों से जवाबी फायर करने लगती- ‘गोलियाँ कोई निशाना बाँधकर दागी थीं क्या/खुद निशाने पर पड़ी आ खोपड़ी तो क्या करें।’ कहीं फैज, कहीं साहिर, कहीं कबीर, कहीं नजीर, कहीं गौर्दा, कहीं सीधे लोक से बनाए गए प्रयोग-‘जब से दशरथ ललन एम पी हो गए, हुए कृष्ण एमएलए तो मैं क्या करूं…।’ अभिव्यक्ति को सटीक और मारक बनाने के लिए कहाँ-कहाँ उड़ जाता था गिर्दा और क्या-क्या चुन लाता था….। ट्रेडिल प्रेस पर छपने वाले अखबार में पीतल के रूल को मोड़-मरोड़ कर देश का नक्शा छापने की जिद वही सफल करा सकता था।

पर यह तो बहुत बाद की बातें हैं।

मैंने पहले-पहल गिरीश तिवाड़ी को 1971 में आकाशवाणी, लखनऊ के स्टूडियो में देखा था। कुमाउंनी-गढ़वाली बोली का ‘उत्तरायण’ कार्यक्रम, स्वतंत्रता दिवस, वसंत पंचमी आदि मौकों पर आमंत्रित श्रोताओं के समक्ष लोक कवि गोष्ठी आयोजित किया करता था। वह ऐसी ही एक कवि गोष्ठी थी, जिसके बारे में मुझे चन्द्रशेखर पाठक नामक उस लम्बे-पतले युवक ने बताया था जो पीडब्ल्यूडी में दिहाड़ी पर क्लर्की करते हुए संयोग से हमारी कैनाल कालोनी में सनवाल जी के कमरे में रहने आ गए थे और जो कुछ समय बाद दफ्तर में किसी बात से आहत होकर, अस्थाई नौकरी को लात मार कर वापस अल्मोड़ा लौट गए थे और कालान्तर में इतिहासविद प्रो. शेखर पाठक के नाम से विख्यात हुए।

खैर, तो ‘उत्तरायण’ की कवि गोष्ठी में उस शाम बृजेन्द्र लाल साह, पार्वती उप्रेती, चारु चन्द्र पाण्डे, लीलाधर जगूड़ी, जीवानन्द श्रीयाल, गोपाल दत्त भट्ट आदि के बीच एक गिरीश तिवाड़ी नाम्ना सुदर्शन कवि भी थे, जिन पर तब तक ध्यान नहीं गया था जब तक कि कविता सुनाने की उनकी बारी नहीं आ गई। उन्होंने उस दिन अपनी ‘वसंत’ कविता सुनाई, बल्कि गाई- ‘रात उज्याली, घाम निमैलो, डान-कानन केसिया फुलो। हुलरी ऐगे वसंत की परी, फोकीगो जाँ-ताँ रंग पिंहलो ऽऽऽ…।’ उनके मीठे गले ने, गीत ने, शब्दों को उच्चारने, हाथों को नचाने और चेहरे पर वसंत का उल्लास उतार लाने के अंदाज ने उस दिन आकाशवाणी, लखनऊ के पुराने स्टूडियो के कक्ष नंबर एक में बीस-पच्चीसेक श्रोताओं के बीच वह समा बाँध दिया था जिसे कहते हैं-महफिल लूट लेना!

मुझे याद है, उस दिन आमंत्रित कवियों को दो दौर में अपनी कविताएँ पढ़नी थीं। रिकॉर्डिंग का समय निर्धारित था। वंशीधर पाठक जिज्ञासु और जीत जरधारी की जोड़ी बारी-बारी से संचालन कर रही थी। 40-45 मिनट की निर्धारित अवधि में रिकार्डिंग पूरी कर गोष्ठी का औपचारिक समापन कर दिया गया था, लेकिन अपनी बोलियों के काव्य-रस से सराबोर प्रवासी श्रोता और भी सुनना चाहते थे। सो, रिकार्डिंग बन्द करने के बाद देर तक गोष्ठी चलती रही। चारु चन्द्र पाण्डे, जगूड़ी, जीवानन्द श्रीयाल और गोपाल दत्त भट्ट की उस दिन सुनी कुमाउंनी-गढ़वाली कविताओं की मुझे आज थोड़ी-थोड़ी याद है। लेकिन गिरीश तिवाड़ी की कविताएँ ही नहीं, उनका उस दिन का पूरा गेट-अप भी स्मृति में जस का जस टँगा हुआ है। इसका एक कारण यह भी जरूर होगा कि कालान्तर में उनसे संबंध प्रगाढ़ होने पर वे कविताएँ कई बार सुनीं लेकिन उस दिन काली टोपी, गोरे मुखड़े पर करीने से बनी घनी काली दाढ़ी और काली शेरवानी में सबसे अलग और खूब फब रहे गिरीश तिवाड़ी की वह छवि मन से कभी उतरी ही नहीं। तब भी नहीं जबकि बाद में वे बिल्कुल अराजक, बल्कि अघोरी जैसा जीवन जीने लगे थे और हम सबके आत्मीय हो चुके फक्कड़ गिर्दा का उस सुदर्शन कवि गिरीश तिवाड़ी से रिश्ता जोड़ना अकल्पनीय जैसा लगने लगा था। हाँ, अपने फक्कड़पन के शुरूआती दिनों में भी गिर्दा को अपनी दाढ़ी से कुछ-कुछ लगाव रह गया था और तल्लीताल डाँठ के नुक्कड़ वाली नाई की दुकान में कभी-कभार वे लखनउवा खत बनवा लिया करते थे। नाई की दुकान के ठीक बगल में कबाब की दुकान भी हुआ करती थी, जहाँ से गाहे-ब-गाहे कबाब खाना-खिलाना भी उन्हें पसंद था।

तो, 1971 की उसी कवि गोष्ठी में गिर्दा ने अपनी ‘चिट्ठी’ कविता भी सुनाई थी, जिसने पहाड़ की नराई में व्याकुल रहने वाले मुझ किशोर को भीतर तक छू लिया था। अपने घर-गाँव और इजा-दीदी की नराई फेरने के लिए मैं तब अपने कमरे के एकान्त में कागज काला किया करता था। कविता, कहानी, उपन्यास से मेरा कोई वास्ता पड़ा न था। उस दिन जब गिर्दा ने सुनाया-‘पै के करूँ, पापी पेटैल् छोड़ै दे म्योर मुलुक मैथैं/नन्तर क्वे काटि लै दिनो मैं कैं ताँ नि छोड़न्यू मैं’ तो मेरी नराई को जैसे किसी ने वाणी दे दी हो। वहाँ उतने लोग न होते तो मैं शायद रो ही पड़ता।

कवि गोष्ठी के बाद सब लोग कवियों को बधाई दे रहे थे, बात कर रहे थे। परम संकोची मैं एक कोने में खड़ा गिरीश तिवाड़ी को देखे जा रहा था और उनसे बात करना चाहता था। चन्द्रशेखर पाठक शायद उस शाम वहाँ पहुँच नहीं पाए थे। किसी तरह हिम्मत करके गिरीश तिवाड़ी के पास गया और ‘चिट्ठी’ कविता की बाबत पूछने लगा। वे बहुत स्नेह से मिले थे, जैसा कि उनका स्वभाव अन्त तक सबके लिए बना रहा। प्यार से बोले थे-‘‘भुला, एक किताब छपी छु-शिखरों के स्वर। वी में छु ये चिट्ठी। तु जिज्ञासु ज्यु थैं माँगि ल्हिये। उनार पास छन किताब।’’

जिज्ञासु जी से भी इतना परिचय कहाँ था। उस कवि गोष्ठी की मीठी स्मृतियाँ और ‘चिट्ठी’ कविता की कसक मन में भरे लौट गया था। उस दिन से मैं भी उसी तरह की कविताएँ-गीत लिखने की कोशिश करने लगा था, हालाँकि एक भी पंक्ति कायदे की नहीं बनती थी। लेकिन तब तो यही लगता था कि बस, अब बन ही गया कवि…..।

कुछ समय बाद जिज्ञासु जी से परिचय भी चन्द्रशेखर पाठक ने ही करवाया, जो तब तक मेरा शेखर दा या ददा बन चुका था। शेखर दा तब दफ्तर से बचे समय में कहानी-कविता लिखता, दिनमान पढ़ता और नाक की डण्डी में उग आए एक दाने को अंगुली से लगातार घिसता हुआ अरविन्दो या चे ग्वेवारा की, मेरे लिए अबूझ-सी किताबों, में डूबा रहता था। बीच-बीच में मैं उसे अपने रचे ‘महान साहित्य’ से तंग किया करता था। शेखर दा का साल भर या शायद आठ-दस महीने ही लखनऊ के हमारे मुहल्ले में रहना मेरे लिए दिशा-निर्देशक बन गया।

जब शेखरदा पहाड़ लौट गया और अल्मोड़ा महाविद्यालय से इतिहास में एम.ए. करने लगा तब भी ‘लक्ष्मेश्वर, अल्मोड़ा’ से उसके पोस्टकार्ड बराबर आते रहते। जब भी वह लखनऊ आता मुझसे मिलने कैनाल-कालोनी जरूर आता। एक बार उसके साथ युवकों की पूरी टोली ही थी। अपने ही अंदाज में शेखरदा ने परिचय कराया-‘ये शमशेर सिंह बिष्ट, अध्यक्ष हैं अल्मोड़ा डिग्री कालेज छात्र संघ के। ये विनोद जोशी-महामंत्री, ये हरीश जोशी…।’ पहाड़ के उन ऊर्जावान युवकों से मिलना रोमांचक अनुभव था। वे पहाड़ के किसी विधायक के यहाँ रॉयल होटल में रुकते थे, जो आकाशवाणी भवन के पड़ोस में ही था। मैं अधिक से अधिक समय उन युवकों के साथ बिताता.
एक बार ऐसा संयोग हुआ कि गिरीश तिवाड़ी आकाशवाणी के कवि सम्मेलन में आए और अल्मोड़ा से शमशेर, आदि भी विधायक निवास में ठहरे थे। उस पहली कवि गोष्ठी को दो-तीन बरस हो गए थे। ‘चिट्ठी’ कविता मन में गूँजती रहती थी और जिज्ञासु जी से ‘शिखरों के स्वर’ माँगने की हिम्मत पड़ी न थी। उस बार मैंने अपने प्रिय कवि से ही कहा-‘गिर्दा, शिखरों के स्वर मुझे मिली नहीं।’ उन्होंने क्या कहा मुझे याद नहीं। कवि सम्मेलन के तुरन्त बाद मैं शमशेर के साथ कहीं चला गया। गिर्दा बाद में शमशेर से मिलने गए होंगे मगर कमरे में कोई नहीं मिला। गिर्दा को उसी रात वापस लौटना था। दो चार दिन बाद जब मेरी जिज्ञासु जी से भैंट हुई तो वे मुझे अपने घर ले गए और एक किताब मुझे दी। किताब का नाम था-‘शिखरों के स्वर।’ मैं बहुत खुश हो गया। किताब खोली तो उसके भीतर एक छोटा सा पत्र रखा था-

‘प्रिय नवीन! शम्भू कैं चाँण हूँ वीक कमार में गैयाँ, उ नि मिल। उ थैं कै दियै गिरदा न्है गो कै। त्वील ‘शिखरों के स्वर’ जिज्ञासु दाज्यू थैं मांङी न्हैं। मांङि ल्हियै। बाँकि फिर भैंट हुण पर। पहाड़ आलै तो भैंट करियै।’

पत्र के नीचे हस्ताक्षर थे जो मैंने पहले कभी नहीं देखे थे लेकिन समझना भी मुश्किल नहीं था कि किसके हैं। ‘ग’ में खूब लहरदार होकर काफी ऊपर तक चली गई छोटी ‘इ’ की मात्रा से शुरू हुए वे हस्ताक्षर बाद में हमारे बहुत अजीज दस्तखत बने। वह चिट्ठी ‘शिखरों के स्वर’ की उस प्रति में आज तक मेरे पास सुरक्षित है। उसमें तारीख नहीं पड़ी है लेकिन यह शायद 1975 की बात है।

आज वह चिट्ठी देखता हूँ तो पाता हूँ कि अंत तक गिर्दा का हस्तलेख और हस्ताक्षर वैसे के वैसे बने रहे। सिर्फ ‘गिरीश’ हस्ताक्षर में भी बदल कर ‘गिर्दा’ हो गया, बस। लम्बी चिट्ठियाँ तो उसने शायद ही कभी लिखी हों, लेकिन छोटी-छोटी चिट वह खूब लिखता था। बिल्कुल जुदा अंदाज में ‘अ’ लिखना और मात्राएँ खींचना। लिखता बहुत तबीयत से था वह और हाँ, कलम भी बहुत प्रिय थे उसे। कलम की भेंट वह बहुत लाड़ से स्वीकार करता था और नए कलम से कागज में इधर-उधर अपने हस्ताक्षर करके खुश हो जाता था। उसकी जेब में कलम न लगा हो, ऐसा शायद ही कभी हुआ हो।

इतने वर्षों में उसके लिखे चिटों में सिर्फ एक फर्क आया था-‘प्रिय नवीन’ का संबोधन ‘नबुवा’ या ‘नब्बू’ में बदल गया था। ज्यादा लाड़ में हो तो ‘स्साले नबुवा!’ काफी दिनों बाद मिलने पर कस कर गले लगाते हुए ‘तुमर नष्ट है जौ, तुमर’ तो उसने कहना ही ठैरा! यह उसके लाड़ जताने का तरीका था। यह अद्भुत बात है कि रचनाकार गिर्दा का मूल स्वर प्रखर प्रतिरोधी और बेमुरव्वत था लेकिन इन्सान गिर्दा के भीतर बेपनाह मुहब्बत का दरिया बहता था और कोई एक या कुछेक ही उसके दावेदार न थे। वह सबको हासिल था। और इश्क ? हाँ, उसे इश्क भी हुआ था और उसकी चोट उसमें बहुत गहरे टीसती रहती थी लेकिन इसका जिक्र करना तो दूर, वह अपने बारे में ही कहाँ कुछ बताता था। यह बात फिर कभी।

बाद के वर्षों की तो बेशुमार यादें हैं, एक-दूसरे में गुँथी और झंझावात की तरह दिमाग में बवण्डर मचाती हुईं। इस बवण्डर के शांत होने में काफी समय लगेगा।

अभी तो एक रील सी है। एक कोलाज, एक मोन्ताज सा। नैनीताल में पहले प्रमोद साह के साथ का कमरा, फिर नैनीताल क्लब के नीचे वाली वह ऐतिहासिक कोठरी और उसमें भी राजा की रसोई और रात गए तक गिर्दा का हारमोनियम, हारमोनियम तक पहुँचने से पहले की बेहिसाब बहसें और मयनोशी। ‘नैनीताल समाचार’ की उत्तेजक और झगड़ा-मचाऊ बैठकें, तर्क-वितर्क, ‘नशा नहीं रोजगार दो’ आन्दोलन के दौर की यात्राएँ, अल्मोड़ा में शमशेर की कोठरी का रात्रिवास, नाटक की वे रिहर्सलें और अभिनव प्रयोग। नाटक या कविता या लोकगीतों की किताबें छापने की ऐसी योजनाएँ जो उनके गीत-संगीत का कैसेट बनाकर आखिरी जिल्द की जेब में रखने की कल्पना तक जाती थी, हालाँकि तब तक ऐसे प्रयोग हमारे देखने में नहीं आए थे। हर प्रस्तुति को उसके सभी पक्षों में सम्पूर्णता तक ले जाने की उसकी जद्दोजहद। कभी अचानक, गीत-नाटक प्रभाग के दौरों के बीच से उसका आधी-आधी रात को लखनऊ आना, बदहवासी में थोड़े-बहुत पैसे का जुगाड़ और उसी तरह लौट जाना।

कभी फुर्सत से लखनऊ आना तो सारी-सारी रात बैठे-लेटे-पसरे भीतर के रचनात्मक बाँध का फूटते जाना। ‘उठो, अब चलो,’ कहने पर वह शायराना अंदाज ‘…..जरा खुद को बटोर लूँ तो चलूँ…। जाने कहाँ-कहाँ बिखरा पड़ा हूँ …..लेकिन समेटू कैसे, नबू’। पहाड़ी होलियों की एक विशद मंचीय प्रस्तुति लखनऊ में करने की वह तमन्ना, जिसमें मंच तीन स्तरीय होना था। एक स्तर बैठी होली का, दूसरा खड़ी होली का और तीसरा महिला-होली का और तीनों की प्रस्तुतियों का सिंक्रोनाइजेशन…..। रचनात्मकता की ऐसी उड़ानें जो कभी बहुत अव्यावहारिक लगतीं तो कभी दुस्साध्य और कभी खिझाने वाली भी। मगर साथ में यह टेर भी-‘गो कि हमारी बात मानना कतई जरूरी नहीं, हाँ!……रिजेक्ट करो स्साले को अगर बात में दम नहीं है तो…।’ अपने समय से बहुत आगे का उसका चिंतन!

इन बिन्दास बैठकों-बातों में वह जितना डूबता जाता, उतना ही उसका कलाकार, उसका विचारक, उसके भीतर बैठा आलोचक प्रखर होता जाता वह बोलता-बजाता-गाता जाता और हम जैसे लहरों पर तैरते रहते। नशा गिर्दा को डबल गिर्दा बना देता था। दरअसल वह सिर्फ नशा करना नहीं होता था। शराब उसकी रचनात्मकता को भड़का देती थी हालाँकि अति तक भी जाती थी। तब उसको रोकना-टोकना बेकार ही जाता। हम अक्सर सोचते, इस समय टेप रिकार्डर होना चाहिए था। लेकिन हर बार हम चूक जाते। गिर्दा इतना करीब था कि कभी उसका ठीक-ठाक इण्टरव्यू भी करने की हमने नहीं सोची। उसके पास इतना खजाना था कि उसे सँजोने की अच्छी से अच्छी योजनाएँ ही बनती रह गईं। हमेशा लगता था, गिर्दा तो यहीं है। जा कहाँ रहा है!

वह लखनऊ में ही था, दस साल पहले जब उसे दिल का दौरा पड़ा था। सुबह 10 बजे उसे दिखाने पीजीआई ले जाना तय था। नौ बजे प्रेस क्लब से फोन आया कि गिर्दा जी के सीने में बहुत दर्द है, आप फौरन आइए। वह प्रेस क्लब में ही ठहरना पसन्द करता था। घरबारी हो जाने के बावजूद घरों के लिहाज और बंदिशें उसे पसन्द न थे। प्रेस क्लब में भी पत्रकारों से कहीं ज्यादा वहाँ के कर्मचारियों से उसका याराना रहता था। सो, उस सुबह रंगलाल ही उसे रिक्शे पर लाद कर अस्पताल ले गया था, हमारे पहुँचने से पहले।

दिल अच्छा-खासा घायल हो चुका था और शरीर कुछ शिथिल पर गिर्दा का दिमाग और भी तेज चलने लगा था। ‘रयूमेटाइड आर्थ्राइटिस’ ने उसे बहुत तंग किया, पंगु बना देने की हद तक। दवाओं के दुष्प्रभावों ने उसे जितना हो सकता था, सताया परन्तु वह शरीर की गुलामी मानने वाला जीव था ही नहीं। वह विचारों की स्वच्छन्द और रचनात्मक उड़ान वाला परिन्दा था, हमेशा चैतन्य और रचनारत। इसीलिए हम सबको लगता था कि वह कमजोर तो है पर ठीक है। हीरा भाभी की सेवा-टहल ने उसे जिस तरह सँभाला था, उससे भी हमारी आश्वस्ति बढ़ती ही थी।

पेट में अल्सर फटने से वह बेहद तकलीफ में रहा होगा लेकिन एम्बुलेंस में नैनीताल से हल्द्वानी ले जाए जाते समय भी फोन पर मुझसे कह रहा था-‘ठीक हूँ….चिंता मत करना…दास बाबू ( लखनऊ मेडिकल कालेज के डा. सिद्धार्थ दास जो उसकी गठिया का इलाज कर रहे थे) को बता देना…..।’

हम सबकी तरह खुद उसे भी अस्पताल से ठीक-ठाक लौट आने का पक्का भरोसा रहा होगा। वह यूँ चला जाने वाला जीव था ही नहीं। लेकिन देखो, एकदम सटक गया। पिछले कुछ समय से फोन पर बात खत्म करते हुए वह कहा करता था-‘घर में सबको मलास देना, पलास देना। मेरे हाथों से अपने गाल मलास लेना। नबुआ, मैं ठीक हूँ। मेरी चिंता मत करना। फिर बात होगी। ओक्के। ’
ओक्के, गिर्दा। ओक्के।

अब क्या कहें, सृष्टि के नियम से परे तो तुम भी नहीं थे न!

Monday, March 29, 2010

प्यासी पौड़ी अर्थात तपते-सूखते पहाडों की पीडा

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25 मार्च 2010 को पूरे बीस साल बाद मैं पौड़ी (गढ़वाल) में था। सन् 1988 में युवा और जोशीले पत्रकार उमेश डोभाल की हत्या के बाद पत्रकारों-संस्कृतिकर्मियों-समाजसेवियों के लम्बे संघर्ष से अपराधी कटघरे में आने लगे थे और 25 मार्च 1990 को उत्तराखण्ड के पत्रकारों ने पहला उमेश डोभाल स्मृति समारोह पौड़ी में आयोजित किया था। उसी समारोह में शामिल होने मैं चंद पत्रकार मित्रों के साथ तब पहली बार पौड़ी गया था, लेकिन मैं उमेश डोभाल या पत्रकारों के सरोकारों के बारे में लिखने नहीं जा रहा। यहाँ मैं बिल्कुल दूसरी ही चिन्ता में आपको शामिल करना चाहता हूँ।

25 मार्च 1990 को जब हम कोटद्वार से दोगड्डा, सतपुली होते हुए पौड़ी पहुँचे थे तो खिली धूप के बावजूद दोपहर में अच्छी ठण्ड थी। सड़क के नीम-अंधेरे कोनों, छायादार घाटियों में कुछ दिन पहले गिरी बर्फ तब भी जमी थी और हवा में उसका तीखापन मौजूद था। पौड़ी से हिमालय की हिमाच्छादित चोटियों की लम्बी श्रृंखला ताजा गिरी बर्फ से चमक रही थी। वर्तमान में उत्तर-प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के प्रमुख सचिव शैलेष कृष्ण तब पौड़ी के जिलाधिकारी थे और लखनऊ के पत्रकार मित्रों से उनका अच्छा परिचय था। सो, उन्होंने हमें अगली सुबह चाय-नाश्ते के लिए आमंत्रित किया था। पौड़ी के जिलाधिकारी की कोठी शहर से काफी ऊँचाई पर है। जब हम सुबह करीब नौ बजे उनके घर पहुँचे तो पूरी कोठी की ढलुवा छत पर जमी बर्फ पिघलकर लगातार टपक रही थी। हम एक तरफ छत पर जमी बर्फ देखकर रोमांचित हो रहे थे तो दूसरी तरफ हिमालय की विशाल श्रृंखला हमें सम्मोहित कर रही थी। जाहिर है, जिलाधिकारी की कोठी सबसे मनोरम स्थान पर बनाई गई है। तब हम दो दिन पौड़ी में रहे थे और हर वक्त अच्छे गर्म कपड़े पहनने पड़े थे।

25 मार्च 2010 को भी हम लखनऊ से पर्याप्त गर्म कपड़े लेकर पौड़ी पहुँचे लेकिन सुबह-शाम को थोड़ी देर हल्के हाफ-स्वेटर के अलावा कुछ गर्म पहनने की जरूरत नहीं पड़ी। कई साथियों ने तो कोई भी गर्म कपड़ा नहीं पहना। वे टी-शर्ट और कमीज में आराम से थे। दिन में तो बाकायदा गर्मी महसूस हो रही थी। पौड़ी में बर्फ पड़ने का कोई नामोनिशान नहीं था। लोगों ने बताया कि मार्च छोड़िये, दिसंबर-जनवरी में भी बर्फ नहीं गिरी। दरअसल, अब वहाँ हिमपात बहुत कम होता है। पहले दो फुट तक बर्फ गिरना आम बात थी। इस बार हिमालय की बर्फीली चोटियों के दर्शन भी नहीं हुए। पर्वत श्रृंखलाओं पर धुंध की मोटी परत छाई हुई थी और हिम-शिखर भी उसी में ओझल थे। यह धुंध व्यापक है और बराबर बनी हुई है। चौकोड़ी, गोपेश्वर और नागनाथ-पोखरी की यात्रा से तभी लौटे शेखर पाठक ने बताया कि हिमालय के दर्शन कहीं से नहीं हो रहे। पहले ऐसी धुंध मई-जून के महीनों में ही पड़ती थी। फिर भी अक्सर सुबह-शाम हिमालय दिख जाता था। लेकिन अब पर्वत शिखरों पर धुंध की मोटी पर्त फरवरी-मार्च और अक्टूबर के महीनों में भी छाने लगी है, जबकि इन महीनों में हिमालय सबसे निर्मल और खिला-खिला दिखा करता था।

इस बार पौड़ी में पेयजल संकट की विकरालता से सामना हुआ। पीने के पानी का संकट अब लगभग सभी पहाड़ी शहरों को खूब सताने लगा है। पौड़ी में जगह-जगह हैण्डपम्प लगे हैं और दो-दो महिलाएँ उन्हें पूरे जोर से चलाती दिखीं जबकि वे बहुत कम पानी दे रहे थे। गोविन्द ने मजेदार किंतु त्रासद बात बताई। पौड़ी के ढाबों में पीने के लिए पानी मांगिए तो छोटी केतली सामने रख दी जाएगी। आप केतली से पानी की धार मुँह में डालिए और प्यास बुझाइए। न तो जरा भी पानी बरबाद होगा और न ही जूठा गिलास धोने में पानी जाया करना पड़ेगा। वैसे, केतली से पानी देने का चलन और कई जगहों में भी है। कोई संयोग नहीं कि इस बार के उमेश डोभाल स्मृति समारोह में चर्चा के दो विषयों में एक ‘पानी का संकट’ ही था।

26 मार्च की सुबह हम खिरसू गए। पौड़ी से 17 किमी दूर मनोरम स्थल। हिमालय तो खैर धुंध के मारे नहीं ही दिखना था, सेब के बगीचों के लिए कभी मशहूर रहे खिरसू में सेब का एक भी पेड़ नहीं मिला। चाय का ढाबा चला रहे युवक ललित ने बताया कि मेरे बच्चे सेब का पेड़ पहचानते तक नहीं। सेब के बगीचे कब के उजड़ गए। कारण? अब गर्मी बढ़ गई है और बर्फ लगभग नहीं पड़ती। हम सिर्फ अफसोस कर सकते थे। अलबत्ता पौड़ी से खिरसू का रास्ता घने बाँज-बुरांश वन से गुजरता है। ऐसे घने जंगल कम ही मिलते हैं। हवा अद्भुत रूप से ताजी और विविध खुशबुओं से भरी थी। सड़क के दोनों तरफ खूब बुरांश खिला था। बड़े-बड़े लाल-सुर्ख फूलों से लदे पेड़। मुझे बचपन में सुना लोकगीत याद आ गया-‘पारा भीड़ा बुरूंशी फुली रै, मींझे कूनूं मेरि हीरू ऐ रै।’ (सामने के वन में बुरांश फूले हैं और मुझे लगा जैसे कि मेरी हीरा वहाँ खड़ी हो!)

हमने गाड़ी रुकवाकर बुरांश के कुछ फूल तोड़े और उनकी पत्तियाँ चबाईं। बुरांश गुणकारी माना जाता है और अब उसके शर्बत का व्यवसाय उत्तराखण्ड में काफी होने लगा है। इस बार अच्छी बारिश न होने और बर्फ न पड़ने से बुरांश के फूल भी उतने रसीले और पुष्ट नहीं लगे। मगर पहाड़ में इस मौसम में बुरांश के फूल सम्मोहित करते हैं। हमारे साथी, पीयूसीएल, उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष चितरंजन सिंह तो बुरांश के दो फूल लखनऊ तक लाए।

वापसी में हम लैंसडाउन रुके। चौतरफा ऊँची चोटियों के बीच अपेक्षाकृत छोटी पहाड़ी की पीठ पर बसा खूबसूरत लैंसडाउन भारतीय सेना में वीरता के लिए ख्यात गढ़वाल रायफल्स के मुख्यालय के लिए अंग्रेजों ने विशेष रूप से चुना था। इस छावनी क्षेत्र में बहुत कम सिविल आबादी है और इसीलिए अतिक्रमण से मुक्त भी। लैंसडाउन के बारे में बहुत सुना था। पहली बार देखा और तय किया कि फिर आऊंगा, कम से कम दो दिन यहाँ रहने। है ही इतनी प्यारी जगह। बाबा नागार्जुन को यह स्थान बहुत प्रिय था। इसके जयहरीखाल इलाके में वाचस्पति शर्मा के घर वे महीनों रहा करते थे। अब बाबा नागार्जुन तो रहे नहीं, वाचस्पति जी भी रिटायर होकर शायद बनारस चले गए। लैंसडाउन बाजार की कुछ दुकानों में अब भी बाबा को याद किया जाता है, जहाँ वे अक्सर चाय पीने बैठा करते थे।

हमें नजीबाबाद से लखनऊ के लिए ट्रेन पकड़नी थी। दोगड्डा आते-आते बहुत गर्मी लगने लगी। मार्च के महीने में पहाड़ जितने गर्म लगे, जिस तरह पौड़ी (जो नैनीताल के बराबर या ज्यादा ही ऊँचाई पर है) बर्फ और पानी को तरस रही है, जिस तरह हिमालय के शिखर वसंत में भी धुंध की मोटी पर्तों में खो गए हैं, वह पूरी यात्रा में हमारी चर्चा का विषय था और अब भी बना हुआ है। जितनी भी नदियाँ इस यात्रा में हमने देखी उनका सूखता पानी हमें भारी चिंता में डालता गया। सन् 2030 तक हिमालय के सम्पूर्ण गल जाने की गलत भविष्यवाणी करने के लिए डॉ. पचौरी की चाहे जितनी मलायत की गई हो, भारी गड़बड़ तो हो ही रही है। हमारे बचपन में किसी पहाड़ी शहर में पंखे या फ्रिज नहीं थे। आज नैनीताल-मसूरी में पर्यटक एसी कमरों की माँग करते हैं।

बीस साल में पौड़ी के बदलते मौसम का जो रूप हमने देखा वह डर पैदा करता है। आज से बीस वर्ष बाद क्या होगा?

Sunday, March 21, 2010

कैसे बचे और कहां चहके गौरैया



गौरैया को बचाने की एक पहल शुरू हुई है। 20 मार्च 2010 को पहली बार विश्व गौरैया दिवस मनाया गया। अच्छा है कि इस धरती पर और हमारे जीवन में गौरैया चहकती रहे। दरअसल गौरैया हमारी घरेलू चिड़िया है। हमारे घरों में और आस-पास ही रहती है, खिड़की और दरवाजे पर बैठकर चहकती है, आंगन में फुदकती है और चावल का दाना बीनने बड़े अधिकार से रसोई में चली आती है। वह हमारे देखते-देखते रोशनदान या आले या चौखट के कोटर में घोंसला बना लेती है और उसकी चहचहाहट हमारी दैनंदिन बातचीत में तानपूरे-सी शामिल रहती है।

लेकिन मैं ‘है’ क्यों कह रहा हूं? गौरैया भी अब लुप्तप्राय है। विरले ही दिखती है। मैं पिछले बाइस वर्षों से जिस तरह के मकानों में रह रहा हूं, उसमें गौरैया के लिए कोई जगह नहीं है । गौरैया बड़े पेड़ों पर नहीं रहती, जंगलों में भी नहीं। वह हमारे आस-पास रहना चाहती है और हमारे मकानों से धन्नियां, भीत, आले, छज्जे, कोटर, रोशनदान सब गायब हो गए। वह कहां घोंसला बनाए और कहां से हमारे जीवन में झांके!

बीती 29 जनवरी को हमने ‘हिन्दुस्तान’ के इलाहाबाद संस्करण की वर्षगांठ मनाई थी। अगली सुबह थोड़ा समय मिलने पर मैं मशहूर कथाकार शेखर जोशी से मिलने चला गया। वे इलाहाबाद के लूकरगंज में टण्डन जी के हाते में रहते हैं- वर्षों से। उस दिन वहां कवि हरिश्चन्द्र पाण्डे भी मिल गए। हम लोग बातें कर ही रहे थे कि सहसा मुझे लगा, हमारी चर्चा में एक प्यारी चहचहाहट भी शामिल है। नजरें घुमाई तो बैठक और भीतर के कमरे के बीच वाले दरवाजे की चौखट में बन गए एक छोटे कोटर से गौरैया झांक रही थी। ‘अरे, गौरैया!’ मैं साहित्य चर्चा भूलकर पुलकित हो उठा। सच कहता हूं, मैंने उस दिन कई साल बाद गौरैया देखी। उसका पूरा परिवार वहां था- कोई दरवाजे पर, कोई खिड़की पर। तब मैंने मकान पर गौर किया। वह धन्नियों, आलों, रोशनदानों और आंगन वाला पुराना मकान है। पूरे हाते में बड़े-बड़े पेड़ हैं। गौरैया इतमीनान से उड़कर बाहर जाती है, अहाते में निश्चिन्त उड़ती है और जब मन किया खुले दरवाजों-खिड़कियों-रोशन दानों से भीतर चली आती है। मैं गौरैया देख पाने से बहुत उत्साहित हो गया था और शेखर जी मुझे बताने लगे कि यहां तो खूब चमगादड़ भी हैं जिन्हें घर के भीतर से बाहर भगाने के लिए हमने बैडमिण्टन का रैकेट रखा हुआ है। इलाहाबाद का वह ‘टण्डन जी का हाता’ अभी तो सरल हृदय मनुष्यों के साथ-साथ वृक्षों, वनस्पतियों, गौरैयों, चमगादड़ों और अन्य पक्षियों से गुलजार है। ‘विकास’ की अन्धी दौड़ में कभी वहां भी अपार्टमेण्ट जरूर बनेंगे और तब कैसे बचेगी और कहां चहकेगी गौरैया?

लखनऊ की जिस कैनाल-कालोनी में मैंने बचपन और जवानी के दो-ढाई दशक बिताए वह भी एक बड़ा हाता था। कमरे में खिड़की थी, रोशनदान भी और आंगन भी। चारों तरफ पेड़ थे। नीम, अमरूद और छोटी झाड़ियां भी। गौरैया निस्संकोच वहां आती-जाती-रहती थीं। हम पढ़ते या सोते होते तो वह धीरे से रोशनदान से चहकती-जैसे कुछ कह रही हो। वह हमारी रसोई में चावल का बिखरा दाना उठाने ऐसे आती जैसे उस पर उसी का नाम लिखा हो। बचपन में हमने खिड़की-दरवाजे-रोशनदान बन्द करके तौलिये से गौरैया पकड़ी हैं और स्याही या स्कूल के कलर-बॉक्स से उनके पंख रंगे हैं। मुहल्ले भर के बच्चे मिलकर यह खेल-खेलते थे। हर बच्चा अपनी गौरैया अलग रंग से रंगता और फिर उन्हें छोड़ दिया जाता। उनके पंखों का रंग कई दिन तक मेरी-तेरी-उसकी गौरैया की पहचान बनकर हमारे आस-पास मंडराता रहता। कुछ बच्चे गौरैया के पैर में पतंग का धागा बांधकर उड़ाते मगर वे बड़ों से खूब डांट खाते। यह खेल क्रूर माना जाता था।

घरों के भीतर गौरैया की स्वच्छन्द उड़ान पर पहला हमला बिजली के पंखों ने किया। कैनाल कालोनी वाले हमारे क्वार्टर में 1973 तक बिजली नहीं थी, लेकिन जब हम बिजली वाले मकान में रहने गए तो तेज रफ्तार पंखे से टकराकर गौरैया घायल होने लगीं। ‘थच्च’ की आवाज आती और तड़पती गौरैया कमरे के फर्श पर पड़ी होती। सारा घर विचलित हो जाता। कमरे में उड़ती गौरैया देखकर घर के सभी लोग पंखा बन्द करने दौड़ते। अक्सर, हवा के झौंके के साथ रोशनदान से गौरैया का पूरा घोंसला नीचे आ गिरता। कभी अण्डे फूट जाते और कभी मासूम-लिजलिजे-पंखविहीन बच्चे को नीचे गिरा देखकर गौरैया चीं-चीं-चीं कर पूरा घर सिर पर उठा लेती। कभी झाड़ू लगाने में चीटियों की कतार गौरैया के मरे बच्चे का पता बताती। गौरैया के दुख में घर-भर शामिल होता।

प्रकृति से, प्रकृति की सुन्दर रचनाओं से, जीव-जन्तुओं से मनुष्य का यह साझा अब नहीं रहा।

हाते पट गए, पेड़ कट गए, पुराने घर-आंगन तोड़कर अपार्टमेण्ट बन गए। एसी, वगैरह ने रोशनदानों की जरूरत खत्म कर दी और खिड़की-दरवाजे सदा बन्द रखने की अनेक मजबूरियां निकल आईं। कीटनाशकों-उर्वरकों ने कीट-पतंगों और पक्षियों पर रासायनिक हमला बोल दिया। प्रकृति से दूर होते जाते हमारे जीवन से बहुत कुछ बाहर चला गया। गौरैया भी।

अब यह सब सिर्फ यादों में है। मेरे बच्चे गौरैया को नहीं पहचानते। उनके बचपन में गौरैया का खेल और चहचहाना शामिल नहीं रहा। नीची छतों और आंगन विहीन घरों में गौरैया नहीं आती। बहुमंजिला अपार्टमेण्ट्स के आधुनिक फ्लैटों में गौरैया की जगह नहीं और इन फ्लैटों के बिना हमारा ‘विकास’ नहीं।

गौरैया को बचाने की, घरों में उसे लौटा लाने की नेक और मासूम पहल का साधुवाद। लेकिन गौरैया की चीं-चीं-चीं किस खिड़की, किस रोशनदान, किस आंगन और किसी धन्नी से हमारे घर में लौटेगी?