Wednesday, August 03, 2011

रचनावली के बहाने नंद कुमार उप्रेती की याद

यह टिप्पणी नैनीताल समाचार के लिये लिखी गई थी और वहीं से साभार प्रस्तुत है- नवीन जोशी



उन्नीस जून 2011 की उमस भरी शाम लखनऊ के भारतेन्दु नाट्य अकादमी के प्रेक्षागृह में ज्यादा लोग नहीं थे, लेकिन वहाँ जो भी आए वे या तो स्व. नंद कुमार उप्रेती को बहुत करीब से जानते थे या उनके बारे में सुन-सुन कर प्रभावित थे। उस शाम उप्रेती जी की कुमाउनी रचनाओं के संग्रह का विमोचन हो रहा था और उस बहाने उस विलक्षण व्यक्ति के रचना संसार के साथ-साथ उनके जीवन संघर्ष और जीवट पर भी अंतरंग-सी चर्चा की गई।

वृद्धावस्था के साथ-साथ बीमारी से भी त्रस्त और कृशकाय वंशीधर पाठक ‘जिज्ञासु’ पूरे ढाई घण्टे वहाँ बैठे रहे तो सिर्फ इसलिए कि नंद कुमार उप्रेती से 40 वर्ष उनका याराना रहा था और पहली मुलाकात में नंद कुमार को बंगाली समझने वाले जिज्ञासु ने ही उन्हें कुमाउँनी में लिखने को ‘धकियाया’ था- वर्ना तो किशोरावस्था में पहाड़ से भागकर लखनऊ में ठौर-ठिकाना खोज रहे नंद कुमार पहाड़ियों से कोई मदद न पाकर (‘ल्याखै नै लगाय’-वे कहते थे) किसी कृपालु बंगाली के यहाँ शरण और शिक्षा पाते हुए युवा होने तक स्थापित बंगाली लेखक बन ही चुके थे। जरा-सा बोलने में थक जा रहे और सुन सकने में लगभग असमर्थ हो गए जिज्ञासु जी ने उस दिन अपने उस सखा को बेतरह याद किया और उनके बारे में तब तक बोलते ही चले गए जब तक कि मैंने चिंतित होकर उन्हें रोक नहीं दिया। फिर कार्यक्रम के अंत में घर जाते हुए जिज्ञासु जी ने मुझसे कहा- ‘नब्बू, अब मुझसे किसी कार्यक्रम में आने को मत कहना।’ मैं समझ सकता हूं कि यह बीमारी और कमजोरी की लाचारी से ज्यादा उनका भावुक हो जाना ही था।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करने खुशी-खुशी चले आए वयोवृद्ध यज्ञदेव पण्डित अपने से दो-तीन वर्ष छोटे रहे नंद कुमार उप्रेती के लेखन और व्यक्तित्व से भी ज्यादा इस बात से प्रभावित थे कि उन्हें तंत्र, ज्योतिष और कुण्डलिनी जागरण जैसे गूढ़ विषयों के परेशान करने वाले सवालों का संतोषजनक उत्तर उप्रेती जी से मिल जाया करता था। 1953 में आकाशवाणी लखनऊ से प्रादेशिक समाचार बुलेटिन शुरू करने वाले पण्डित जी ने उप्रेती जी के इसी ज्ञान पर प्रकाश डाला। पहाड़ से भटकते हुए लखनऊ आने के बीच किशोर नंद कुमार जोगियों-तांत्रिकों के सान्निध्य में भी कुछ समय रहे थे और बाद में लखनऊ से भी वे द्रोणागिरि पर्वत के इर्द-गिर्द रहने वाले कुछ साधुओं के पास अक्सर जाया ही करते थे। हृदयरोगी हो चुके यज्ञदेव पण्डित को भी एक बार उन्होंने ऐसे ही अपने ‘गुरु’ से मिलाने के लिए पहाड़ की कठिन चढ़ाई चढ़वा दी थी।

‘बाबा’ की किताब छप जाने की खबर से उत्साहित उप्रेती जी की बड़ी बेटी, पार्श्व गायिका सपना अवस्थी इस कार्यक्रम के लिए मुंबई से भागी-भागी तो आई लेकिन मंच से बोलने में बहुत भावुक हो गई और इतना ही कह पाई कि जो काम मुझे करना चाहिए था वह डॉ. प्रयाग जोशी ने करके बहुत बड़ा उपकार किया है। बाबू के जिन्दा रहते किताब छपती तो वे कितना खुश होते।

रचनावली के सम्पादक डॉ. प्रयाग जोशी ने विस्तार से बताया कि किस तरह उनकी रचनाएँ एकत्र हो पाईं। पर्चियों में कविता, वगैरह लिखने वाले उप्रेती जी की रचनाओं को जैसे-तैसे उनकी पत्नी श्रीमती बसंती उप्रेती ने ही बण्डल बनाकर यहाँ-वहाँ ठूँस रखा था, यानी ठेठ पहाड़ी अंदाज में संभाल रखा था, हालाँकि उन्हें पतिदेव के रचनाकर्म से खास वास्ता न था। प्रयाग जोशी ने उप्रेती जी की कुमाउनी कविताओं, कहानियों, लेखों-संस्मरणों और नाटकों का विश्लेषण भी पेश किया कि किस खूबी से उप्रेती जी समाज पर सोद्देश्य कटाक्ष करते हैं और कुमाउनी बोली के प्रति कितने सजग हैं। उप्रेती जी के शब्द प्रयोग साबित करते हैं कि कुमाउनी बोली की विविध शैलियों में सम्प्रेषण की अद्भुत क्षमता है। उप्रेती जी की इस कुमाउनी रचनावली में 53 कविताएँ, 9 लेख-कहानी-संस्मरण और 13 नाटक संग्रहीत हैं।

बोलने की अपनी बारी आने पर मैं जब अपने किशोरावस्था के दिनों में उप्रेती जी और जिज्ञासु जी में होने वाली अंतरंग बातचीत का लगभग मूक श्रोता होने की चर्चा करने लगा तो अनायास ही वह प्रसंग याद आ गया। दुःख-तकलीफों की चर्चा ज्यादा देर चल जाने पर एक रोज उप्रेजी जी ने बड़े तेवर के साथ कहा था- ‘यार, मैंने तो तमाम दुखों की पोटली बनाकर उन्हें भेल के नीचे च्याप दिया है और कहता हूँ अब दबाओ सालो मुझे!’ मैं जब यह किस्सा सुना रहा था तो सभागार की पहली पंक्ति में बैठीं श्रीमती उप्रेती आँचल से आँखें पोछने लगी थीं। जाहिर है, वे उन कष्टों की गवाह ही नहीं भागीदार भी रही थीं। छोटी बेटी पुष्पा को उप्रेती जी बहुत प्यार करते थे। वह भी वहाँ भीगी आँखें और पसीजा मन लिए मौन बैठी थी। यूँ, ‘बाबा’ की किताब का छपना और ससमारोह विमोचित होना उनके लिए गर्व और खुशी का भी मौका था और वह पूरे परिवार के चेहरे पर तब साफ दिखाई दिया जब विमोचित पहली प्रति सबके हस्ताक्षर के बाद श्रीमती उप्रेती को ससम्मान सौंपी गई।

उप्रेती जी की युवावस्था के दौर के अंतरंग मित्र और वरिष्ठ पत्रकार रामकृष्ण को, जो पैरों से लाचार होने के कारण घर में ही कैद रहने को मजबूर हैं, हम चाह कर भी कार्यक्रम में नहीं ला सके। लेकिन उप्रेती जी की कई यादें उन्होंने लिख कर ईमेल से हमसे साझा कीं। रामकृष्ण ने अपनी एक किताब में भी विस्तार से उप्रेती जी और संगीत उस्तादों से उनके याराने पर लिखा है। उप्रेती जी के फटे पाजामे से लेकर ‘कुमाऊँ डेयरी’ के पीछे की छोटी-सी कोठरी में कुछ मशहूर सितार वादकों, तबला वादकों और कथक नर्तकों के साथ उनकी दोस्ती के साक्षी रहे हैं रामकृष्ण।

आकाशवाणी, लखनऊ और नजीबाबाद में कई वरिष्ठ पदों पर रह चुके नित्यानंद मैठाणी, महेश पाण्डे, पियूष पाण्डे, गोविन्द राजू और धन सिंह मेहता ने भी उप्रेती जी को अपने-अपने ढंग से याद किया और कौन कह सकता है कि सभागार में श्रोता रूप में चुपचाप बैठे प्रद्युम्न सिंह (जिन्होंने 1968 में पहली बार लखनऊ में कुमाउनी लोक धुनों पर आधारित नृत्य नाटिका ‘मालूशाही’ प्रस्तुत की थी), हरीश सनवाल, हरीश पंत, ज्ञान पंत, आदि, जिन्होंने उप्रेती जी को कई भूमिकाओं में देख-सुना था, के मन में भी उनकी विविध यादें उमड़-घुमड़ नहीं रही होंगी।

सन् 2005 में उप्रेती जी के निधन के समय से ही यह संकल्प जैसा था कि जब कभी उनका संग्रह छपेगा तो उसका विमोचन हम अवश्य लखनऊ में उनके मित्रों-संबंधियों के बीच कराएँगे। डा. प्रयाग जोशी ने संग्रह का सम्पादन करके, प्रकाश बुक डिपो, बरेली वालों ने उसे छापकर और रंगकर्मी ललित सिंह पोखरिया की अध्यक्षता वाली साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था ‘निसर्ग’ ने संग्रह के लोकार्पण के आयोजन का हमारा आग्रह सहर्ष मान कर इस संकल्प को पूरा करा दिया।

2 comments:

V.K. Joshi said...

यह निसर्ग और आप लोगों का प्रयास था की नन्द कुमार जी जैसे विलक्षण व्यक्ति के बारे में पता चला. अन्यथा वह गुमनामी के अँधेरे में खो गए होते! उनकी रचनाओं का संकलन उस दिन मैं भी लाया था. अभी पूरा तो नहीं पढ़ पाया हूँ पर जितना भी पढ़ा है उससे यही अनुमान है की वह स्वयं चलते-फिरते ज्ञानकोष रहे होंगे.
निसर्ग को और आप सबको बधाई.

आशुतोष उपाध्याय said...

मन भीग गया पढ़ कर... पर्वत वासियों की इस पीढ़ी की स्मृतियाँ सहेजने योग्य हैं. बहुत आभार..