Thursday, July 23, 2026

बुद्ध के जीवन, धर्मोपदेश और विचारों पर रोचक पुस्तक

 

भगवान बुद्धप्रसिद्ध इतिहासकार और पुरातत्वविद्‍ डॉ किरण कुमार थपल्याल की हाल में प्रकाशित पुस्तक है। बुद्ध के जीवन, धर्म-दर्शन तथा संघ पर उनके गहन अध्ययन और शोध का परिणाम है यह पुस्तक। लखनऊ विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्व विभाग के अध्यक्ष एवं छात्रों में लोकप्रिय शिक्षक रह चुके प्रो थपल्याल की सिंधु सभ्यता पुस्तक (डॉ संकटा प्रसाद शुक्ल के साथ सह-लेखन) चर्चित हुई थी। 1976 में पहली बार प्रकाशित इस पुस्तक के अब तक नौ संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं।

बुद्ध के जीवन और बौद्ध धर्म-दर्शन पर अनेकानेक पुस्तकें उपलब्ध हैं। अब भी उसके विविध पक्षों पर पुस्तक-प्रकाशन तथा विद्वानों के बीच विमर्श जारी रहता है। बुद्ध और उनके धर्म-दर्शन ने दक्षिण एशिया ही नहीं, सुदूर यूरोप और अमेरिका तक बहुत बड़ी आबादी को सदियों तक प्रभावित किया। आज भी उसकी विविध शाखाओं-मार्गों के अनुयायियों की काफी बड़ी संख्या इन देशों में है। कालांतर में विविध कारणों से, जिनमें भारतीय महाद्वीप में हिंदू धर्म का आक्रामक विस्तार भी शामिल है, बौद्ध धर्म का पराभव होता गया लेकिन उसकी जड़ें इतनी मजबूत और गहरी पड़ चुकी थीं कि उसकी सशक्त उपस्थिति सभी जगह जमी रह गईं। आज भी उसके प्रति आकर्षण अनुभव किया जाता है। हिंदू धर्म की अनेक जड़ताओं से परेशान लोग बुद्धम् शरणम् गच्छामिउच्चारते हुए उधर का रुख करते हैं। बाबा साहब भीमराव आम्बेडकर ने इसी कारण बौद्ध धर्म अपना लिया था। बहुजन समाज में बौद्ध धर्म के प्रति अतिरिक्त आकर्षण स्वाभाविक ही पाया जाता है।

प्रो थपल्याल की यह पुस्तक बुद्ध के प्रारम्भिक जीवन, मानव जीवन के दुख से दुखी होकर उनके गृह-त्याग और लम्बी भटकन, अंतत: ज्ञान प्राप्ति, प्रारम्भिक शिष्यों को प्रवचन, संघ की स्थापना, धर्म प्रचार, अंतिम दिन और परिनिर्वाण, धर्म के मूल आधार, उसके सैद्धांतिक पक्ष, बुद्ध के उपदेशों, बुद्धकालीन बौद्ध संघों, विभिन्न मुद्दों पर बुद्ध के विचार, आदि-आदि पर विस्तार से चर्चा करती है। नौ अध्यायों और पांच परिशिष्टों वाली यह पुस्तक बुद्ध के जीवन और उनके धर्म व संघ को सम्पूर्ण रूप में देखती है। कहीं-कहीं आलोचनात्मक निगाह से भी। बुद्ध को चूंकि बाद में भगवान का दर्ज़ा दे दिया गया था, इसलिए उनके बारे में अनेक किंवदंतियां प्रचलित हो गईं और बहुत सारे मिथक गढ़ लिए गए। पुस्तक में उन सबका जिक्र है, साथ ही उस संदर्भ में विभिन्न विद्वानों के अलग-अलग मत और कहीं-कहीं उसके संभावित कारणों का भी उल्लेख किया गया है।

बुद्ध के मांसाहार सबंधी विचार और विशेष रूप से स्त्रियों के बारे में उनकी बातें विवादास्पद भी रहीं। वे मांसाहार का निषेध करते थे लेकिन अगर भोजन मात्र के लिए जीव हत्या न की गई हो तो अनुमति भी देते थे, ऐसे प्रसंग मिलते हैं। स्त्रियों के बारे में उनके विचार अत्यंत विवादास्पद और स्त्री-विरोधी रहे हैं। हालांकि उन्होंने सुजाता और आम्रपाली को उपदेश दिया, उन्हें उपदेश देकर संघ में शामिल होने की अनुमति दी और भिक्षुणी संघ की भी स्थापना की, लेकिन वे भिक्षुणियां हमेशा और हर हाल में भिक्षुओं से निचले पायदान पर रखी गईं। बुद्ध का यह कथन बहूद्धृत है- एक बार उनके प्रिय शिष्य आनंद ने उनसे पूछा- स्त्रियों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए, बुद्ध ने कहा- स्त्रियों की ओर देखो ही मत, अगर दिख जाए तो उनसे बात मत करो, यदि वे बात करें तो सतर्क एवं सावधान रहो। वे स्त्रियों को आसक्ति का भण्डार मानते थे और कहते थे कि पत्नी का दायित्व हर प्रकार पति की सेवा करना है, वगैरह। यह विचार्णीय है कि क्या बुद्ध-पश्चात हिंदू धर्म में स्त्रियों की पुरुष की दासी जैसी स्थितियां बुद्ध के उपदेशों के प्रभाव के कारण बनीं!

खैर, बुद्ध के उपदेशों की विस्तार से चर्चा करते हुए प्रो थपल्याल विभिन्न विद्वानों द्वारा की गई व्याख्याएं तथा स्पष्टीकरण भी प्रस्तुत करते हैं। पुस्तक के मुख्य अध्यायों के अंत में संलग्न पाद टिप्पणियां इस संदर्भ में उल्लेखनीय हैं। यहां वे बौद्ध साहित्य के विपुल भण्डार से विविध मत-सम्मत उद्धृत करते हैं और पाठक के सामने विकल्प छोड़ देते हैं कि वह इन मत-मतांतरों से गुजरने के बाद अपनी स्वतंत्र धारणा बना सके।

बुद्ध के उपदेशों और धर्म के मूलाधारों का वर्णन करते हुए प्रो थपल्याल स्पष्ट कह्ते हैं कि –“यह पूर्णतया निश्चित करना कठिन है कि बौद्ध ग्रंथों में बुद्ध के नाम से जो उपदेश उपलब्ध हैं, उनमें से कौन वास्तव में उन्हीं के द्वारा दिए गए थे और कौन बाद में जोड़े गए। इस कृति में यथासम्भव उन्हीं को स्थान दिया गया है, जिन्हें अधिकांश विद्वान उनके द्वारा दिए गए मानते हैं।”

बुद्ध ने अपने प्रथम प्रवचन में चार आर्य सत्यबताए थे- दुख है, दुख का कारण है, कारण है इसलिए दुख का निवारण भी सम्भव है, और ऐसा अष्टांगिक मार्गों पर चलने से सम्भव है। ये अष्टांगिक मार्ग हैं- सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाक् (वाणी), सम्यक कर्मांत, सम्यक आजीव, सम्यक व्यायाम, सम्यक स्मृति और सम्यक समाधि। प्रो थपल्याल इन सब की विस्तार से व्याख्या करते हैं और तत्पश्चात बौद्ध धर्म के सैद्धान्तिक पक्ष की विवेचना करते हैं। इसमें दस शीलों का वर्णन है- प्राणियों की हिंसा से विरति, जो न दिया गया हो उसे न लेना, काम में मिथ्याचार से विरति, झूठ बोलने से विरति, सुरा-मैरेय-मद्य आदि नशीले पदार्थों से विरति, असमय भोजन से विरति, नृत्य-गीत-वादित और तमाशे से विरति, माला-सुगंधित पदार्थ का लेपन-धारण और अलंकरण से विरति, आरामदेह बिछावन से विरति तथा सोने-चांदी के परिग्रहण से विरति। अहिंसा पहला शील है लेकिन बुद्ध के अनुसार अनजाने में हुई हिंसा, यहां तक कि हत्या भी, अपराध नहीं है।

बौद्ध भिक्षु के लिए निर्वाण की प्राप्ति सर्वोच्च आदर्श है। यही उसकी आध्यात्मिक यात्रा का अंत है। निर्वाण का अर्थ है- तृष्णा का अंत। जैसे दीपक की लौ बुझने पर समाप्त हो जाती है, इधर-उधर या ऊपर-नीचे नहीं जाती, उसी तरह निर्वाण होने पर जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति मिल जाती है। तात्विक दृष्टि से यह अहम् का अंत है और नैतिक दृष्टि से लोभ, घृणा और अज्ञान का नाश करने वाला है।बुद्ध यह भी कहते थे कि केवल मेरे उपदेश सुनने से ही दुख का निरोध और निर्वाण की प्राप्ति नहीं हो सकती। उसके लिए मेरे बताए हुए मार्ग पर चलने का निरंतर प्रयास करना होगा। मेरा काम मार्ग बताना है, उस मार्ग पर चलना लोगों का काम है।

अनात्मवाद, अनित्यवाद और अनीश्वरवाद बौद्ध धर्म के प्रमुख सिद्धांत हैं। वे मानते हैं कि आत्मा की स्वतंत्र सत्ता नहीं होती। अनित्यवाद यह है कि सभी वस्तुएं अनित्य हैं यानी शाश्वत नहीं हैं। उनमें हर पल परिवर्तन होता रहता है और बुद्ध की शिक्षाओं में ईश्वर के लिए कोई स्थान नहीं है। मनुष्य अपने कर्मों के लिए स्वयं उत्तरदायी है और अपना आप भाग्यविधाता है।

यह त्रासदी ही कही जाएगी कि अनीश्वरवादीबुद्ध के भक्तों/भिक्षुओं ने बुद्ध को ही भगवान का दर्ज़ा दे दिया! बुद्ध को भगवान बनाने में हिंदू धर्मों के मठाधीशों का भी बड़ा हाथ है। जब बौद्ध धर्म तेज़ी से चारों ओर फैलने लगा तो उसकी लोकप्रियता से चिंतित हिंदू मठाधीशों ने बुद्ध को भगवान विष्णु का अवतार घोषित कर दिया और बौद्ध धर्म को हिंदू धर्म का ही एक अंग बता दिया।  

पुस्तक में बुद्ध के आचरण, उनसे जुड़ी दंतकथाओं, उनके उपदेशों की व्याख्या, उनकी यात्राओं, मुलाकातों, उनके निर्वाण से लेकर निर्वाण पश्चात अस्थियों के वितरण और स्तूपों के निर्माण, आदि के विवरण भी रोचक शैली में दिए गए हैं। पुस्तक में बुद्धकालीन संघों और भिक्षुओं से आचरण की अपेक्षाओं के अलावा परिशिष्ट में विभिन्न सामाजिक-आर्थिक मुद्दों पर बुद्ध के विचार व्याख्या सहित शामिल हैं।

भगवान बुद्धपुस्तक बहुत परिश्रम और अध्ययन के साथ लिखी गई है। इसीलिए वह पठनीय और रोचक भी बन पड़ी है। किताब के अंत में बुद्ध के जीवन के विविध अवसरों को दर्शाते 20 प्राचीन मूर्तिशिल्पों के चित्र भी परिचय सहित दिए गए हैं। ये चित्र अजंता, सारनाथ, भरहुत, सांची, आदि में प्राप्त हुए थे।

-    नवीन जोशी

(पुस्तक- भगवान बुद्ध, लेखक- प्रो किरण कुमार थपल्याल, प्रकाशक- उ प्र हिंदी संस्थान, पृष्ठ- 350। मूल्य- 445/-)       

 

No comments: