Sunday, February 18, 2018

अशोकजी : हमने पकड़ी पत्रकारिता की वह अंगुली-1




वह 16 फरवरी, 1996 का दिन था. 20, विधान सभा मार्ग पर ‘स्वतंत्र भारत’ का दफ्तर खाली किया जा रहा था. एल एम थापर ग्रुप ने पायनियर लिमिटेड का यह हिंदी अखबार किसी अनाम एग्रो फिनान्स नामक कम्पनी को बेच दिया था, हम हिंदी पत्रकारों की सेवाओं समेत. एग्रो ग्रुप ने जॉपलिंग रोड पर नया प्रेस और कार्यालय खोला था. उस दिन सुबह अचानक आदेश हुआ कि आज रात से ‘स्वतंत्र भारत’ जॉपलिंग रोड में छपेगा और पायनियर लिमिटेड वाला दफ्तर तुरन्त खाली करना होगा.

जरूरी सामान समेटा जा रहा था. हड़बड़ी और बेतरतीबी से सामान गाड़ियों में लदवाया जा रहा था. हम सम्पादकीय विभाग का जरूरी सामान छांट रहे थे. अफरा तफरी मची थी. अचानक किसी पुराने रैक में ठुंसी फाइलें, शब्दकोश, रजिस्टर, वगैरह लुढ़क कर फर्श पर छितरा गये. कई छोटी-छोटी पर्चियां रजिस्टरों के पन्नों से निकल कर उड़ने लगीं. पुराने पीले नेपा कागज के टुकड़ों में चीटीं की चाल जैसी लाल-नीली लिखावट चमक उठी. हम सब कुछ छोड़ कर वे रजिस्टर और पर्चियां बटोरने लगे. कुछ प्रमोद जी ने, कुछ मैंने और मनोज तिवारी ने जितनी जल्दी था, उन्हें बटोरा और अपनी-अपनी स्कूटर की डिक्की में सम्भाल लिया.

वह अखबारी दुनिया की जमीन थी जिसमें हमने ससंकोच पांच धरा था. पत्रकारिता की वह अंगुली थी जिसे हमने डरते-डरते लेकिन कसकर पकड़ा था. वह एक सम्मानित परम्परा का हमारा हिस्सा था, हमारी विरासत. वह हमारे दिल-ओ-दिमाग में था लेकिन कागज के उन चिंदों में इतिहास के रूप में साक्षात था. उसे हम कैसे कबाड़ में जाने दे सकते थे.

वह अशोक जी हैं, आज भी हमारे साथ मौजूद, अपने हाथ से लिखे उन पुर्जों के रूप में, जिनमें डांट-फटकार है, सम्पादकीय निर्देश हैं, सही शब्द और वर्त्तनी हैं, भाषा-शैली है, विदेशी शब्दों-नामों के सही उच्चारण और मायने हैं. और तो और, हमारी लिखी या अनूदित-सम्पादित खबरों का बहुत ध्यान से किया गया सम्पादन है, दुरस्त की गयी गलतियां हैं और हाशिये पर लिखा हमारा नाम है ताकि वह हम तक पहुंचे और हम सीखें.
अशोक जी मेरे पहले सम्पादक थे. वे मिल गये तो मैं पत्रकार बन गया, पत्रकारिता में टिक गया. इस पेशे से प्यार कर सका. चालीस साल बाद भी बिना किसी अफसोस के.
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अगस्त, 1977 में  दो दिन के लिए नैनीताल से लखनऊ आये शेखरदा (आज के हिमालयविदऔर ‘पहाड़’ के सम्पादक प्रो शेखर पाठक) के हाथ में एक नई किताब थी- “भारतीय जेलों में पांच साल.” लेखिका- मेरी टाइलर, वह अंग्रेज युवती जो नक्सल आंदोलन के दौरान अपने बंगाली मित्र अमलेंदु के साथ कलकता आयी थी. पुलिस ने उन्हें बंगाल के एक गांव से नक्सलवादी बताकर गिरफ्तार करके जेल में ठूंस दिया था.

मेरी ने बंगाल की जेलों में पांच साल बिताये और इमरजेंसी के दौरान ब्रिटिश सरकार की पहल पर जेल से रिहा की गयी. लंदन लौट कर मेरी ने यह किताब लिखी जो भारतीय जेलों के अमानवीय हालात का जीवंत दस्तावेज है. वास्तव में, कैदियों के हालात के बहाने यह तत्कालीन भारतीय समाज और उसे नियंत्रित करने वाले तंत्र की हृदय-विदारक तस्वीर है. उस दौर में यह किताब बहुत चर्चित हुई थी. अंग्रेजी से आनन्द स्वरूप वर्मा के अनुवाद में हिंदी में किताब तभी आयी ही थी. मैंने शेखरदा से यह किताब पढ़ने के लिए मांग ली. वह खुद उसे नैनीताल की परिचित दुकान से पढ़ने के लिए मांग लाया था और अगली शाम उसे वापस लौटना था. सो, मैंने रात भर जाग कर वह किताब पढ़ी. वह बहुत विचारोत्तेजक किताब थी और मैंने उसके कई उद्धरण भी डायरी में नोट किये.

अगली रात शेखरदा के नैनीताल चले जाने के बाद मैंने मेरी टाइलर और इस किताब पर एक लेख लिखा. सुबह विश्वविद्यालय जाते समय वह लेख में ‘स्वतंत्र भारत’ के कार्यालय में समाचार सम्पादक चंद्रोदय दीक्षित की मेज पर रख गया, जहां उस समय झाड़ू लगायी जा रही थी. साल-डेढ़ साल पहले ‘स्वतंत्र भारत’ कहानी प्रतियोगिता में मेरी कहानी पुरस्कृत हो चुकी थी. इसी कारण चंद्रोदय जी से थोड़ा परिचय था. प्रमोद जोशी से भी ‘स्वतंत्र भारत’ में तभी पहचान हुई थी जो कविता-कहानियों के साथ रेखा-चित्र भी बनाया करते थे.

1975 में बीएससी करने के बाद मैंने एमए (अर्थशास्त्र) में प्रवेश लिया था. इरादा था कि पहाड़ लौट कर मास्टर बनूंगा. बहुत मन से पढ़ाई की जा रही थी लेकिन विश्वविद्यालय का माहौल बहुत अराजक हो गया था. इमरजेंसी उठने के बाद हुए चुनाव में केंद्र और राज्यों में जनता पार्टी की सरकारें बन गयी थीं. तरह-तरह के ‘छात्र-नेता’ विश्वविद्यालय में अपनी राजनीति चमकाने में लगे थे. कक्षाओं से अध्यापकों को खदेड़ कर वे अपनी जेल-यातनाओं के किस्से बढ़-चढ़ कर सुनाते. परीक्षाएं शुरू हो चुकी थीं लेकिन उनमें भी व्यवधान पैदा किया जा रहा था. अर्थशास्त्र प्रथम वर्ष के एक पर्चे के दिन कई उद्दण्ड लड़के नारे लगाते हुए परीक्षा-कक्ष में घुस आये और उन्होंने हमसे कॉपियां छीन कर फाड़ दी थीं. इन वजहों से मन बहुत खिन्न रहा करता था.

दोपहर बाद विश्वविद्यालय से लौटते हुए मैं फिर ‘स्वतंत्र भारत’ के कार्यालय गया. मेरी टाइलर पर अपने लेख के बारे में जानने की बड़ी उत्सुकता थी. चंद्रोदय जी अपनी कुर्सी पर नहीं थे. साथ लगे सम्पादक के कक्ष से जोर-जोर से बोलने की आवाज आ रही थी जिसमें मेरी टाइलर का नाम भी सुनाई दे रहा था. समझ गया कि भीतर मेरे ही लेख पर चर्चा हो रही है. थोड़ी देर में चंद्रोदय जी बाहर निकले तो मैंने हाथ जोड़े. उन्होंने फौरन मेरी बांह पकड़ी और लगभग घसीटते हुए सम्पादक के कमरे में ले गये- ‘यही है नवीन जोशी.’

सफेद कुर्ते, सफेद टोपी और चश्मे में छोटे कद का एक व्यक्ति अपनी कुर्सी में धंसा हुआ था. वह अशोक जी थे, जिनके माथे पर बल और तनाव था, जो हमने बाद में जाना कि सदा बना रहता है. उन्हें हंसते हुए देखने की याद ही नहीं. उनके सामने पड़ते ही हम  सहम जाते थे. उस समय तो उनसे पहला सामना हो रहा था. इस अकस्मात मुलाकात से मेरी घिग्घी-सी बंधी हुई थी. नमस्कार करना क्या याद रहता.

-‘मेरी टाइलर की किताब कहां पढ़ी, किसने बताया?’ उन्होंने पूछ तो मैंने अटकते-अटकते बता दिया.

-‘तुम्हारा लेख छापेंगे. क्या करते हो?’

-‘जी, एमए कर रहा हूँ.’

-‘हमारे साथ काम करोगे?’ उनके सवाल ने मुझे चौंकाया ही नहीं भारी असमंजस में भी डाल दिया था.

-‘जी, अभी परीक्षा देनी है.’

-‘ठीक है.’ उन्होंने कहा. साथ ही मेज पर रखी ‘द पायनियर’ (स्वतंत्र भारत का सहयोगी अंग्रेजी दैनिक) की इतवारी मैगजीन की प्रति मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा- ‘जनार्दन ठाकुर का लेख अनुवाद कर लाइए, कल-परसों में.’

मैं दीक्षित जी के साथ चुपचाप बाहर आ गया. उन्होंने शायद पीठ ठोकी हो, या कुछ कहा हो, मुझे याद नहीं. घर आकर एकांत में धीरे-धीरे ही अहसास हुआ होगा कि कुछ अच्छी बात हुई है.

चर्चित पत्रकार जनार्दन ठाकुर ने इंदिरा गांधी और इमरजेंसी के दिनों पर एक किताब लिखी थी- “ऑल द प्राइम मिनिस्टर्स मेन.” पुस्तकाकार प्रकाशन से पहले वह ‘द पायनियर’ में धारावाहिक छपना शुरू हुई थी. उसी की पहली किश्त अशोक जी ने मुझे अनुवाद करने को दी थी. मैंने बहुत मेहनत से सारी क्षमता झौंक कर वह अनुवाद किया, दो बार ‘फेयर’ किया और दूसरी ही दोपहर अशोक जी के कमरे के बाहर खड़ा हो गया. अशोक जी को अनुवाद पसंद आया. बाकी हिस्से अनुवाद को मिले और अगले रविवार से वह साप्ताहिक परिशिष्ट में धारावाहिक छपने लगा.

-‘परीक्षा देने के बाद तुम हमारे साथ काम करोगे.’ अगली मुलाकात में अशोक जी ने फैसला सुना दिया और डेढ़ सौ रु महीने पगार बता दी. खुद ले जाकर मैनेजिंग एडिटर केपी अग्रवाल से भी मिला दिया.
पत्रकार क्या होता है, यह मैं जानता न था लेकिन बिल्कुल अचानक पत्रकार बन गया था. सबसे बड़ी खुशी डेढ़ सौ रु महीने की थी, जो अभी हाथ में नहीं आये थे लेकिन जिसने पंख उगा दिये थे.

मैंने जैसे-तैसे परीक्षा निपटाई और सितम्बर, 1977  के पहले या दूसरे सप्ताह से ‘स्वतंत्र भारत’ की डेस्क पर नियमित काम करने लगा. पत्रकारिता के रोमांच में ऐसा रमा कि एमए भी पूरा नहीं किया. पहाड़ लौट कर मास्टरी न कर पाने की कसक आज भी होती है लेकिन चालीस साल की पत्रकारिता में इस पेशे पर कभी पछतावा नहीं हुआ.
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‘स्वतंत्र भारत’ में अशोकजी की यह दूसरी पारी थी और 1977-78 में वे नयी टीम तैयार कर रहे थे. 15 अगस्त, 1947 को लखनऊ से ‘स्वतंत्र भारत’ का प्रकाशन उन्हीं के सम्पादन में शुरू हुआ था. 1953 में वे इसे छोड़कर केंद्र सरकार के  सूचना विभाग में दिल्ली चले गये. प्रकाशन विभाग में उप निदेशक होते हुए 1971 में फिर ‘स्वतंत्र भारत’ लौट आये. 1977 में नॉदर्न इण्डिया पत्रिका ने इलाहाबाद से ‘अमृत प्रभात’ अखबार निकालने का फैसला किया. ‘स्वतंत्र भारत’ तब हिन्दी के अच्छे पत्रकारों की नर्सरी-जैसा था ही. सत्यनारायण जायसवाल के नेतृत्व में सात-आठ पत्रकारों की टीम ‘अमृत प्रभात’ के लिए चुन ली गयी थी. उस टीम के जाते-जाते अशोक जी नयी टीम बना रहे थे. मेरी नियुक्ति इसी का हिस्सा थी.

युवा शचींद्र त्रिपाठी, प्रमोद जोशी और विजयवीर सहाय करीब दो-ढाई साल से वहां काम कर रहे थे. मेरे आगे पीछे विनोद घिल्डियाल, ताहिर अब्बास, मनोज तिवारी, रवींद्र जायसवाल, दीपक पाण्डे, आदि अशोक जी की नजरों से गुजर कर आये. बीच-बीच में और भी युवा साथी आते रहे. अशोक जी की पैनी नजर हम युवाओं पर रहती.

अशोक जी का लिखित निर्देश था कि नये लड़के जो भी खबर बनाएं, लिखें या सम्पादित करें, उसकी मूल प्रति उनके देखने के लिए रख दी जाए. हर कॉपी पर बनाने वाले का नाम लिखा हो. जब भी समय मिलता, बल्कि वे इसके लिए निश्चित ही समय निकालते कि हमारी कॉपी (खबरों को इसी नाम से पहले भी जाना जाता था) देखें, उसे अपने हाथ से संशोधित-सम्पादित करें, उस पर अपनी टिप्पणी दर्ज करें और हमारे पास वापस भेज दें. हमसे अपेक्षा होती थी कि हम अशोक जी से वापस आयी अपनी खबरों को ध्यान से देखें और सीखें.

यह सिलसिला चलता रहता था मगर उनकी कोशिश होती थी कि वे हमें अपने कक्ष में बुला कर सामने बैठा कर हमारी कॉपी जांचते. तब होती थी असली कक्षा. वे शब्दों, उनके प्रयोग, मुहावरों, अंग्रेजी और हिंदी की प्रकृति के अंतर, आदि की व्याख्या करते. समझाते कि खबर किस बारे में है, उसमें समाचार क्या है, उसे किस तरह लिखा जाए ताकि समाचार सटीक सम्प्रेषित हो. भाषा अपनी हो, सरल हो, बोलचाल के शब्द हों लेकिन इस प्रयास में समाचार का मूल आशय जरा भी इधर-उधर न हो और न कोई तथ्य छूटे .

यह आसान न था. वर्षों बाद समझ सका कि जो सबसे आसान है, उसे कहना-लिखना सबसे कठिन है. कठिन और उलझाऊ लिखना सबसे आसान है. तब तो हमें लगता था कि जरा-सी बात के पीछे अशोक जी क्यों पड़े हैं, अपना और हमारा समय क्यों खराब कर रहे हैं. एक शब्द को काट कर उसी तरह का दूसरा शब्द लिख कर क्या फर्क पड़ गया. वाक्य की संरचना बदल कर क्या नयी बात कर दी.

आज जब शब्द, भाषा, व्याकरण सब गड्ड-मड्ड हो गये हैं, यह समझा पाना मुश्किल है कि तब पत्रकारिता में इनको कितना महत्त्वपूर्ण माना जाता था. भाषा ही पत्रकारिता यानी अभिव्यक्ति का औजार है. औजार ही सही और सटीक नहीं होगा तो अभिव्यक्ति कैसे सही होगी. बात शुद्धता की नहीं, सटीकता की है जो किसी भी भाषा की पत्रकारिता का प्राण है.

उस समय की स्थितियां आज से बहुत ही बहुत भिन्न थीं. समाचार-स्रोतों के नाम पर सिर्फ एजेंसियां थीं और आकाशवाणी के समाचार बुलेटिन. अंग्रेजी में पीटीआई और यूएनआई की विश्वसनीयता थी. हिंदी में ‘हिंदुस्थान समाचार’ और ‘समाचार भारती’ नाम की एजेंसियां संसाधन-गरीब ही नहीं, सूचना एवं ज्ञान-दरिद्र भी थीं. उनके भरोसे अखबार निकाला ही नहीं जा सकता था. (आपातकाल में सेंसर बोर्ड ने अपनी सुविधा के लिए चारों को मिलाकर ‘समाचार’ नाम से एक एजेंसी बना दी थी, जो आपातकाल हटने के बाद फिर स्वतंत्र हो गयी थीं). मुख्य उप-सम्पादक या डेस्क प्रभारी एजेंसियों के टेलीप्रिण्टर से निरंतर आते समाचारों (तार कहा जाता था इन्हें) को छांटता और अपने अखबार में प्रकाशन योग्य तारों का बण्डल उप-सम्पादकों को देता रहता.

एक खबर बनाने के लिए हमारे पास तीन एजेंसियों के तार होते. ‘स्वतंत्र भारत’ में अंग्रेजी की दोनों और हिंदी में हिंदुस्थान समाचार की सेवा थी. अंग्रेजी तारों के बिना काम न चलता. तार पढ़ना, खबर को समझना और फिर अलग कागज पर अपने शब्दों में खबर लिखनी होती. कुछ काबिल मुख्य उप-सम्पादक सारा संदर्भ और सार समझा देते. बाकी तारों का ढेर पकड़ा कर कहते- सिंगल (एक कॉलम), डी सी (दो कॉलम) या टीसी (तीन कॉलम) बना दो. हम सब हिंदी माध्यम से पढ़े थे. पारिवारिक पृष्ठभूमि में भी अंग्रेजी कहीं नहीं थी. पीटीआई-यूएनआई के तार हैरान करते. खबर विदेशी या आर्थिक हो तो कई बार आकाश-देखनी हो जाती. डेस्क पर अंग्रेजी-हिंदी शब्दकोश रखे रहते, जिनके लिए आपस में खींचातान मचती. अनेक बार शब्दकोश में दिये गये अर्थ खबर के संदर्भ से मेल न खाते. देश-दुनिया के बारे में अध्ययन ही मददगार होता. इसलिए अखबार-पत्रिकाएं पढ़ना और रेडियो पर समाचार सुनना जरूरी लगता.

इतनी मेहनत के बाद जो खबर हम बना पाते, अक्सर संशय रहता कि सही बनी है या नहीं. जल्दी भी करनी पड़ती थी, वर्ना टोके जाते थे. और उम्र क्या थी! सन 1977 में मैं 21 साल का था. बाकी भी आस-पास. जिंदगी के तमाम आकर्षण अखबार के दफ्तर के बाहर थे. किसी से सिनेमा में मिलने का वादा है. कोई गेट पर चाय की दुकान में कबसे इंतजार कर रहा है. किताबों की दुकान में जाना है, रवींद्रालय में नाटक भी, आर्ट्स कॉलेज में एक प्रदर्शनी लगी है, पता-नहीं क्या-क्या.

अब सोचिए, इन हालात में बनायी खबर अशोक जी मुझे अपने सामने बैठा कर जांच रहे हैं. उनसे हमारी सिट्टी-पिट्टी वैसे ही गुम रहती थी. सुबह उनकी फिएट कार नीचे पोर्च में रुकती तो ऊपरी मंजिल पर सम्पादकीय विभाग में बैठे वरिष्ठ साथियों में भी सन्नाटा छा जाता. वे घर से अपना अखबार लाल कलम से रंग कर लाते थे. हर पेज पर ढेरों संशोधन, सुझाव, टिप्पणियां. सीढ़ियों से चढ़कर सीधे सम्पादकीय डेस्क पर आते और क्लास शुरू हो जाती.

मैं सहमा-सा उनके सामने बैठा रहता. उनकी लाल कलम मेरी बनायी खबर पर चलती रहती. शब्द बदले जाते, वाक्य तराशे जाते और बीच-बीच में तीखी नजरें मेरे चेहरे पर भी गड़ जातीं कि ध्यान दे रहा हूं कि नहीं. संशोधन करते जाते और बताते जाते- “ ‘मिक्स्ड रिएक्शन’ के लिए ‘मिश्रित प्रतिक्रिया’ लिखने से अर्थ स्पष्ट नहीं होता. मतभेद या भिन्न-मत या समर्थन और विरोध ज्यादा समझ में आएगा. तो, ‘मिस्र-इसरायल समझौते पर मिश्रित प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि ‘मिस्र-इसरायल समझौते का समर्थन और विरोध’... ठीक ?”


बोलने में तीखापन होता मगर समझाने का तरीका मीठा. शिष्य समझ रहा हो और सुधार दिखने लगा हो तो स्वर में प्यार की छुपी लहर भी पहचानी जाती. शाबाशी नहीं मिलती थी लेकिन ज्यादा बुलाया जाने लगे और लिखने-पढ़ने का काम मिलने लगे तो मतलब होता कि अशोक जी हमसे खुश हैं. इससे हमारा विश्वास बढ़ा. पत्रकारिता में, लेखन में, भाषा में आनंद आने लगा. (जारी)

Saturday, February 17, 2018

अपनी भाषा से कटी पीढ़ी कहां टिकेगी?


उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद की दसवीं और बारहवीं की परीक्षाओं में करीब दस लाख छात्रों के परीक्षा छोड़ने की खबर में एक तथ्य आश्चर्य से कहीं ज्यादा सदमा पहुंचाता है. वह यह कि इम्तहान में नहीं बैठने वाले छात्रों की बहुत बड़ी संख्या हिंदी विषय चुनने वालों की है. यानी हिंदी की परीक्षा से सबसे ज्यादा छात्र भागे. यह क्या बताता है?

हम यह मान रहे हैं, जैसा प्रदेश की योगी सरकार जोर-शोर से दावे कर रही है कि उसने नकल विहीन परीक्षा कराने के लिए जो सख्त कदन उठाए हैं, उनकी वजह से परीक्षा छोड़ने वाले छात्रों की संख्या बढ़ी है. हर साल बडी संख्या में छात्र परीक्षा छोड़ते हैं. पिछले वर्ष कोई साढ़े‌ पांच लाख छात्र गायब रहे. इस बार उनकी संख्या सबसे ज्यादा है. नकल रोकने के उपायों का असर हुआ लगता है.

पहले आंकड़ों की बात. बोर्ड परीक्षाएं छह फरवरी को शुरू हुईं. पहली पारी में दसवीं के गृह विज्ञान का पर्चा था. दूसरी पारी में इण्टर के हिंदी साहित्य का पर्चा था. पहले दिन जिन एक लाख 80 हजार छात्रों ने इम्तहान छोड़ा, उनमें एक लाख 27 हजार इण्टर के थे. यानी एक लाख 27 हजार विद्याविद्यार्थियों ने इण्टर,हिंदी साहित्य का पर्चा छोड़ दिया. दूसरे दिन, सात फरवरी को 10वीं और12वीं के सवा दो लाख परीक्षार्थी अनुपस्थित रहे. इनमें से 99 प्रतिशत छात्र 10वीं के थे जिन्हें उस दिन प्रारम्भिक हिंदी का पर्चा देना था. तीसरे दिन दो लाख 53 हजार छात्र इम्तहान देने नहीं गये. इनमें दोनों कक्षाओं के दो लाख 34 हजार छात्रों को हिंदी और सामान्य हिंदी का पर्चा देना था.

परीक्षा में अनुपस्थित होने के कई कारण होते हैं. स्कूल-कॉलेज कई कारणों से परीक्षार्थियों का फर्जी पंजीकरण कराते है. प्रवेश-पत्र न मिलने के भी हजारों मामले सामने आते हैं. नकल करने-कराने की सुविधा न मिलना बड़ा कारण है.

तो, क्या यह निष्कर्ष सदमा नहीं पहुंचाता कि हाई-स्कूल-इण्टर के बहुत सारे विद्यार्थी हिंदी में भी नकल करना चाहते हैं. विज्ञान के विषय, गणित, अंग्रेजी, आदि कठिन माने जाते हैं लेकिन ‘अपनी’ हिंदी? हिंदी में भी नकल?
यह स्कूलों की पढ़ाई पर तो सवाल है ही. उससे ज्यादा अपनी भाषा के मामले में भी हमारी नयी पीढ़ी की दरिद्रता का परिचायक है. हिंदी भाषी प्रदेश के अधिकसंख्य बच्चों को हिंदी नहीं आती. हिंदी पढ़ने में भी उनकी रुचि नहीं. 10वीं और 12वीं के हिंदी पाठ्यक्रम में क्या होता है? हिंदी साहित्य से कुछ कहानी, कविता, साहित्यकारों की जीवनी, व्याकरण, निबंध लेखन, आदि. सामान्य हिंदी का पाठ्यक्रम और सरल होता है. नयी पीढ़ी को इसमें कोई रुचि नहीं. इसके अलावा और क्या निष्कर्ष निकाला जा सकता है? स्कूलों में ठीक से पढ़ाई नहीं होती, मान लिया. मगर रुचि होती तो बच्चे खुद भी हिंदी पढ़ते.

आम किस्सा है कि मध्यवर्ग के बच्चे भी हिंदी की गिनती, पहाड़ा, आदि नहीं जानते. उन्हें ‘अट्ठाईस’ जैसी गिनती अजूबा लगती है. ‘ट्वैण्टी एट’ कहना पड़ता है. ऐसा नहीं, कि वे अंग्रेजी अच्छी तरह जानते हों. अच्छी अंग्रेजी जानने वाले को भी हिंदी आनी ही चाहिए. वह अपनी भाषा है. यहां तो अंग्रेजी-गणित तो छोड़िए, हिंदी में भी नकल का ही सहारा है.

अपनी भाषा से कटी और निरंतर दूर होती यह कैसी पीढ़ी तैयार हो रही है? जड़ें खोखली हो जाएंगी तो वृक्ष कैसे पनपेगा-बढ़ेगा और कैसे टिकेगा?   
(सिटी तमाशा, नभाटा, 17 फरवरी 2018) 



Friday, February 09, 2018

जनता मूर्ख और झोला छाप दोषी, बस?




उन्नाव के एक झोला छाप डॉक्टर को दोषी ठहराया जा रहा है कि उसने एक ही सुई से कई मरीजों को इंजेक्शन लगाया. इससे दर्जनों लोगों में खतरनाक एचआईवी का संक्रमण हो गया. इसके दूसरे कारण भी होंगे लेकिन झोला छाप की भूमिका तो है ही.

झोला छाप ‘डॉक्टर’ ने बहुत बड़ा अपराध किया है. ऐसे कई झोला छाप जगह-जगह इलाज कर रहे हैं. उन्हें सजा जरूर मिलनी चाहिए. शासन-प्रशासन में बैठे लोग यह भी उपदेश दे रहे हैं कि जनता को जागरूक किया जाना जरूरी है कि वे इलाज के लिए ऐसे जल्लादों के पास नहीं जाएं. वाजिब बात है.

लेकिन क्या ये छोला छाप ही असली दोषी हैं? या क्या हमारी गरीब, ‘नासमझ’ जनता दोषी है?

उन्नाव के जिस इलाके में इलाज के नाम पर यह भयावह काण्ड हुआ है, जरा वहां के लोगों की बात सुन ली जाए. बांगरमऊ के लोग बताते हैं कि वहां के सामुदायिक केंद्र में दवाएं नहीं मिलतीं. वहां के डॉक्टर मरीज को देख कर पर्चे पर दवाएं लिख देते हैं. जब मरीज पास की दवा की दुकान में जाते हैं तो एक बार की दवा में कम से कम दो सौ रु खर्च हो जाते हैं. गरीब आदमी के लिए दो सौ रु की दवाएं कहां से खरीदे? वे या तो एक बार किसी तरह दवा लेकर इलाज बीच में छोड़ देते हैं या कोई सस्ता उपाय ढूंढते हैं.

सस्ते उपाय बहुत आसानी से मिल जाते हैं. जिस छोला छाप जल्लाद को एक ही सुई कई मरीजों को लगाने का दोषी ठहराया जा रहा है, वह सिर्फ दस रु में इलाज करता था. एक सुई और तीन पुड़िया दवा. उसके पास एक दिन में कम से कम डेढ़ सौ मरीज आते थे. सुबह नौ बजे से रात 10-11 बजे तक. ये मरीज सरकारी सामुदायिक केंद्र या प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र क्यों नहीं जाते? वे नासमझ नहीं हैं. गरीब हैं, इसलिए.

तो, असली दोषी कौन है? वे सरकारें क्या जिम्मेदारी से मुक्त हो सकती हैं जो आज तक गरीब-गुरबों के लिए सस्ती और सुलभ चिकित्सा व्यवस्था नहीं कर सकीं? वादे और घोषणाएं बहुत हुईं लेकिन असलियत यह है कि गरीब जनता (को हमारी सरकारें ही झोला छाप जल्लादों के पास जाने को मजबूर किये हैं. असली डॉक्टर और सस्ती दवाएं जनता को उपलब्ध होतीं तो क्या वे जल्लादों के पास जाते?

हाल में पेश केंद्रीय बजट में पचास करोड़ लोगों के लिए स्वास्थ्य बीमा योजना का ऐलान किया गया है. यह लागू कैसे होगी, बीमा का प्रीमियम कौन भरेगा और कहां से? बहुत से सवाल हैं. लुभावनी घोषणाएं पहले की सरकारों ने खूब कीं. यह सरकार भी कर रही है. ऐसी घोषणाओं से वोट मिल जाएंगे लेकिन इनसे न जनता का पेट भरेगा, न खाते में धन आयेगा, न सस्ता व अच्छा इलाज मिलेगा. इस तंत्र को सरकारें आम जनता के लिए चला ही नहीं रही हैं.

इसलिए झोला छाप ‘डॉक्टरों’ के खिलाफ अभियान चलाने और जनता को जागरूक करने की बातें सिर्फ अपनी जिम्मेदारी से भागने का बहाना हैं. पूरा चिकित्सा तंत्र धनिकों के वास्ते है. शहरी मध्यवर्ग भी सरकारी अस्पतालों में मारा-मारा फिरता है. इसीलिए बड़े-बड़े लुटेरे नर्सिंग होम खुले हैं. कस्बों-देहातों में इसीलिए डॉक्टर के नाम पर जल्लाद फैले हैं.

माननीयो, आप अपने वेतन-भत्ते बढ़ाओ. झोला छाप तो रहेंगे और इलाज के नाम पर जनता मरेगी भी.
(सिटी तमाशा, नभाटा, 10 फरवरी, 2018)

ये चराग जल रहे हैं/ माता महेश गिरि-2



मैं चिट्ठी पढ़ता जाता और वहां बैठी सभी स्त्रियों के आंचल भीगते जाते. कई बार उनकी सिसकियां मेरी आवाज से ऊंची हो जातीं तो मुझे रुकना पड़ता. फिर-फिर पढ़नी पड़ती कई लाइनें. उस दिन और उसके बाद भी दसियों बार वह चिट्ठी मुझे पढ़नी पड़ी थी. जो आता वही पूरी सुनाने को कहता और जो सुनता वही चला आता.
उसके शब्द याद नहीं हैं लेकिन उनका दर्द याद है. एक-एक शब्द दर्द का पुलिंदा था. उस दर्द को उतनी तीव्रता से अपने शब्दों में भर पाना मेरे वश की बात नहीं.

‘नमोनारायण’ से शुरू हुई थी वह चिट्ठी. उस चिट्ठी का चित्र हू-ब-हू याद है मुझे, जैसे मोहिनीदी की याद है, जब उसके बाल काटे गये थे.

हां, वह चिट्ठी मोहिनीदी की थी. मोहिनीदी ने नहीं लिखी थी. कैसे लिखती, कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा था उसने. बोल कर लिखवायी थी उसने. उसकी ईजा, हमारी जेड़जा का नाम बसंती था, यह हमने उसी दिन जाना.

यह भी मैंने उसी दिन जाना कि कोई साल-सवा साल पहले मोहिनीदी की शादी हो गयी थी. तब हम लखनऊ रहे होंगे. ईजा ने चिट्ठी में लिखा होगा तो मुझे याद न था. उन सुदूर गांवों के गरीब परिवारों में लड़कियों का ब्याह बड़ी समस्या होता था. कोई हाथ मांगने आ गया तो कुल-गोत्र अच्छा सुन कर ही खुश हो जाते और बिना ज्यादा पूछ-ताछ के लड़की ब्याह दी जाती. नेत्रहीन मां की बेटी और पितृहीन मोहिनीदी का रिश्ता भी ऐसे ही कहीं हो गया होगा.

चिट्ठी बता रही थी कि मोहिनी अब महेश गिरि हो गयी थी, बल्कि बना दी गयी थी. महेश गिरि ने लिखा था- ” ईजा, अब मैं तुम्हारी बेटी नहीं हूँ. किसी की बेटी, बहन, पत्नी या बहू, कुछ  नहीं हूँ. मैं अब जोगिया वस्त्र पहनने वाली, अलख जगाने वाली महेश गिरि हूँ.... मुझे तुम्हें ईजा भी नहीं कहना चाहिए. जोग्याणी की कोई ईजा नहीं होती. पर क्या करूं. तुम्हें ईजा कह कर गले लगाने को मन करता है. खूब रोने का मन करता है.

“मैं महेश गिरि कैसे बनी, यह किस्सा कहने का अब कोई अर्थ नहीं है. पर ईजा, यह जान ले कि अपनी बेटी को दुल्हन बना कर तूने जिस आदमी के साथ विदा किया था, वह आदमी नहीं व्यापारी निकला. तेरी देहली से दुल्हन बन कर निकली मोहिनी उसके घर पहुंच कर जानवर भी नहीं रही. उसने चार दिन मोहिनी का शरीर नोचा, फिर उसके गहने छीने, मारा-पीटा और एक दिन इस आश्रम में लाकर जबरदस्ती गुरु मंत्र दिलवा दिया. महेश गिरि रख दिया गया मेरा नाम. यह मुझे बाद में पता चला कि वह पहले भी एक शादी कर चुका था. उसकी पहली वाली भी यहीं मेरे साथ आश्रम में है.

“मैं आश्रम में नहीं आना चाहती थी. कौन लड़की अपने मन से आना चाहेगी यहां! मुझे कितना मारा-पीटा-सताया, अब क्या बताऊं. यह सब बताना अब बेकार है, मगर एक बार मन था तुझे बताने का. अब कुछ हो भी नहीं सकता. उस हैवान के पास कागज हैं कि मैंने अपनी मर्जी से गुरु मंत्र लिया है. तब बहुत रोयी, बिलखी और तड़पी थी. जोगिया वस्त्र काट खाते थे. सोचती कि मेरा कोई आकर मुझे यहां से ले जाता. तुम कहोगी, मुझे खबर क्यों नहीं की. कैसे करती! कितनी कोशिश की मैंने. तब पहली बार इस बात का अफसोस हुआ था कि मुझे लिखना क्यों नहीं आता. आश्रम से बाहर जाने की इजाजत नहीं थी . जेल जैसी थी शुरू में. आश्रम में जिससे भी लिख देने को कहती वही मना कर देता. सबको मना कर रखा था.  गुरुमंत्र लेने के बाद एक साल तक कहीं भी सम्पर्क करने की सख्त मनाही थी.

“अब मैं एक माता हूँ, महेश गिरि. एक जोग्याणी. अब यही मेरा जीवन है, बाकी किसी से कोई रिश्ता नहीं. सब कुछ हरि चरणों में. मेरा दुख, मेरी माया मत करना. सोचना, मोहिनी मर गयी....”

छुरमल के मंदिर-प्रांगण में जितने भी थे उस समय, सब के सब रो रहे थे. मोहिनीदी की ईजा का रो-रोकर बुरा हाल हो गया था. उसे सम्भालने की कोशिश होती तो वह और भी दहाड़ मारने लगती. पोस्टमैन की भी आंखें भीग आयी थीं और मेरे गले में कुछ अटक-सा गया था. चिट्ठी पढ़ते-पढ़ते गला भर गया था.  यह शायद पहली घटना थी जिसने मेरे किशोर मन की सम्वेदना को गहरे छुआ था. खेतों-जंगलों में काम करते लोग विलाप सुन कर दौड़े आये थे. मुझे कई बार चिट्ठी पढ़ कर सुनानी पड़ी थी और हर बार उन शब्दों का दर्द गहरा होता जाता. सब स्तब्ध थे और रो रहे थे. अगर कोई नहीं रोया तो वह छुरमल देवता थे.

-‘शिब-शिब! बाप जिंदा होता तो कुछ खोज-खबर लेता बेचारी की.’ महिलाएं कह रही थीं.

-‘मां अंधी ठहरी. कोई जाए भी तो कहां जाए? किससे क्या कहे?’

-‘इतनी बड़ी दुनिया में कोई तो होता जो मेरी मोहिनी को मेरे पास पहुंचा देता. उन दुष्टों को नहीं रखना था तो यहां भेज देते. सीधे जोग्याणी कैसे बना दिया. नाश हो उनका, एक न रहे उनका!’ मोहिनी दी की ईजा का विलाप थमता न था.

-‘शिबौ, बेचारी के साथ बचपन ही में अशगुन हो गया था. लड़की के सिर में भी कोई ब्लेड लगाता है!’  लोगों को तब याद आया कि बहुत छोटी उम्र में अत्यधिक जूं हो जाने के कारण मोहिनीदी के बाल उतार दिये गये थे.
कई दिन तक यह दुख गांव पर छाया रहा. उसकी मां तो हर वक्त विलाप ही करती रहती. सयानी औरतें उसे समझातीं- ‘अब चुप हो जा. इतना रोने से बिल्कुल ही फूट जाएंगी तेरी आंखें.’

छुट्टियां बीतीं तो हम वापस लखनऊ आ गये और पढ़ाई-खेल-कूद में मस्त हो गये. मगर ईजा को कभी चिट्ठी लिखता तो मोहिनीदी के बारे में पूछना नहीं भूलता. जवाब आता कि फिर उसकी कोई चिट्ठी नहीं आयी. अगली या उसकी अगली गर्मियों में हम गांव पहुंचे तो पता चला कि मोहिनीदी की चिट्ठी कुछ दिन पहले आयी थी. उसने लिखा था कि अब वह मंदिरों-मठों-गांवों में घूमती है. मौका निकाल कर कभी गांव आएगी. पता नहीं क्यों मैं मोहिनीदी का इंतजार करने लगा था. मनाता कि वह मेरे गांव में रहते ही आ जाए. ईजा से उसके बारे में इतनी बार पूछा कि डांट तक सुननी पड़ी थी.

जल्दी ही एक दोपहर सामने की पहाड़ी से गांव को आने वाली पगडण्डी पर कोई गेरुआ वस्त्रधारी नमूदार हुआ.

-‘कोई जोगी आ रहा शायद आज.’ लोगों ने कहा.

-‘अरे, मोहिनी तो नहीं आ रही!’ किसी को याद आया कि उसने आने को लिखा था. सुनते ही मैं दौड़ पड़ा. मेरे पीछे कुछ और बच्चे भी दौड़े. हमारे साथ शेरू कुत्ता भी भौंकते हुआ दौड़ा और काफी आगे निकल गया.
वह मोहिनीदी ही थी. हमने देखा शेरू भौंकना बंद कर पूंछ हिला रहा है और वह उसे पुचकार रही है. मुझे मोहिनीदी का चेहरा याद नहीं था. वैसे भी उसे उन भगवा वस्त्रों में पहचान पाना आसान नहीं होता. पूरे तन पर गेरुआ वस्त्र, माथे से पीछे गरदन तक बालों को बांधे गेरुआ कपड़ा. हाथ में कमण्डल, कंधे में लम्बा गेरुआ झोला. गले में माला, रुदाक्ष की. माथे पर चंदन और रोली का तिलक.

अनायास मेरे हाथ जुड़ गये- ‘मोहिनीदी, नमस्कार.’

-‘नमोनारायण’ उसने कहा- ‘कब आया तू लखनऊ से?’ मुझे सुखद आश्चर्य हुआ कि उसने मुझे पहचान लिया- ‘तूने पहचान लिया मुझे!’

उसने मेरा हाथ पकड़ लिया- ‘अपने घर-गांव के बच्चों को कौन नहीं पहचानेगा रे!’ मोहिनीदी का हाथ मैंने रास्ते भर नहीं छोड़ा. घर पहुंचते ही उसे महिलाओं ने घेर लिया और रोना-धोना मच गया तो मुझे वहां से हटना पड़ा.
मोहिनीदी ने किसी से ‘पैलागा’ नहीं कहा. किसी-किसी ने उसे गले लगाना चाहा लेकिन उसने ‘भौत कै’ भी नहीं कहा. ‘नमोनारायण’ कहते हुए वह चाख में खिड़की के पास बैठ गयी. उसकी मां दहाड़ मार कर रोने लगी- 

‘कैसी सुंदर दुल्हन बन कर गयी थी और कैसे भेष में लौटी है!’ सभी औरतों के आंचल आंखों से लग गये. कोई उसके हाल-चाल पूछ रहा था, कोई जानना चाह रहा था कि ससुराल में हुआ क्या था. मोहिनीदी के भीतर कोई तूफान चल रहा होगा तो भी वह शांत बनी रही. तब तक वह अपने संन्यासी जीवन को पूरी तरह स्वीकार कर चुकी होगी. बस, बीच-बीच में कह उठती- ‘जैसी हरि इच्छा!’ या ‘हरि इच्छा बलवान!’ सभी के अभिवादन का उसके पास एक ही प्रत्युत्तर था- ‘नमोनारायण.’

जितने दिन मोहिनीदी गांव में रही मेरा ज्यादातर समय उसी के साथ बीतता. उसके साथ ही लगा रहता. पता नहीं उससे कैसा मोह हो गया था.

मैं पूछता- ‘मोहिनीदी तुम धोती क्यों नहीं पहनती?’

वह बताती- ‘हमारे लिए यही कपड़े हैं, रे!’

-‘हमेशा यही पहनोगी?’

-‘हां’

उसका कमण्डल हाथ में लेकर पूछता- ‘इससे क्या करते हैं?’

-‘गांव-गांव घूम कर इसमें भिक्षा मांगते हैं.’

-‘तुम मांग कर खाती हो मोहिनीदी?’ तो वह हंस देती. एक दिन हम छुरमल के मंदिर में बैठे थे. मैंने कहा- ‘मोहिनीदी, अब तू यहीं रह जा.’

कहने लगी- ‘जोग्याणी एक जगह नहीं रह सकती.’ मैंने कहा था- ‘तू जोग्याणी मत बन. ये कपड़े छोड़ दे.’ वह चुप रही. कुछ देर बाद बोली थी- ‘तू मुझे मोहिनीदी क्यों कहता है? मैं महेश गिरि हूँ. जोग्याणी किसी की दीदी नहीं होती. वह माता होती है सबके लिए. मैं माता हूँ. माता महेश गिरि.’ मगर मैं उसे माता नहीं कह सका, महेश गिरि दीदी भी नहीं.

उस दिन वह मुझे एकटक देखती रही थी. उसके भरे-भरे मुख पर कई भाव आये-गये. पहली बार मुझे वह सुंदर भी लगी थी. मालूम नहीं, वह क्या सोच रही थी. फिर अचानक ही ‘नमोनारायण’ कहते हुए उठ खड़ी हो गयी.

-‘अरे, सोलह की थी जब शादी हुई. अभी बीस की भी नहीं हुई है. इसकी उम्र की लड़कियों के घर बच्चे जनम रहे हैं. कैसे दान किये होंगे इस अभागी ने!’ महिलाएं उसके पीछे कहतीं. कभी उसके सामने भी. सुन कर वह ‘नमोनारायण’ के अलावा और कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करती.

मोहिनीदी ने कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा था मगर महेश गिरि बन कर उसने तमाम भजन-कीर्तन और संस्कृत के कई श्लोक कंठस्थ कर लिये थे. सुबह-शाम व श्लोक पढ़ती, भजन गाती और आंखें बंद करके माला जपती. उसकी उम्र की गांव की महिलाएं दिन भर घर-बाहर के काम करतीं, बोलतीं-हंसती-झगड़तीं, अपने बच्चों को दूध पिलातीं-पुचकारतीं. मोहिनीदी शायद ही कभी खुलकर हंसती थी. बहुत गम्भीर हो गयी थी वह. उसे देख कर मन उदास हो जाया करता था.

जैसे वह गांव आयी थी वैसे ही एक दिन चली गयी, अपना झोला-कमण्डल लटकाए और सबसे ‘नमोनारायण’ कहते हुए. बहुत सारे लोग उसे गांव की सीमा तक छोड़ने गये थे. उनमें मैं भी शामिल था. उस दिन भी मैंने उसका हाथ पकड़ रखा था. जाने से पहले अपने झोले से निकाल कर उसने मुझे रुद्राक्ष का एक दाना दिया था. वह रुद्राक्ष आज भी मेरे पास सुरक्षित रखा है.

उस पहाड़ी पर खड़े सब लोग उसे जाते देखते और रोते रहे. उसकी ईजा की सिसकियां थमती न थीं.

-‘ऐसे ही आते रहना, मोहिनी!’ रोती महिलाओं ने उस जाती हुई जोग्याणी से कहा था- ‘अपनी मां से मिलने जरूर आना.’  उसने सुना होगा पर कोई जवाब नहीं दिया. पीछे मुड़ कर भी नहीं देखा. धीरे से ‘जैसी हरि इच्छा’ या ‘नमोनारायण’ कहा भी होगा तो किसी को सुनाई नहीं दिया था.

साल भर लखनऊ में पढ़ाई और गर्मी की छुट्टियों में गांव जाने का हमारा सिलसिला चलता रहा. गांव के तमाम लोगों के हाल-चाल हमें तभी हमें मिलते. कैशौर्य की चंचलता जाने के साथ हमारा गांव के लोगों से मिलना-बतियाना, सुख-दुख पूछना, वगैरह शुरू हो गया था. किसी साल पता चलता कि मोहिनीदी की चिट्ठी आयी थी. कभी सुनने को मिलता- ‘कहां चिट्ठी-पत्री! अब क्या माया-मोह रह गया होगा उसे.’

एक बार चौंकाने वाली खबर सुनी. कोई बटोही बता गया था बल, कि इस गांव की लड़की जो जोग्याणी बन गयी थी, किसी के साथ भाग गयी, बल!

इस पर सभी महिलाओं ने उसे कोसा. भला-बुरा कहा- ‘अरे, बना दिया था जोग्याणी तो उसे ही निभाती. पता नहीं किसके साथ किया मुंह काला.’

-‘ये तो एक दिन होना ही था. भरी-पूरी जवान उमर. कब तक नहीं फिसलती. आसान जो क्या हुआ संन्यास निभाना!’

-’मेरी तरफ से तो मर ही गयी’ उसकी ईजा ने भी रोते हुए कहा था.

सच कहता हूँ, यह खबर सुन कर मुझे बहुत अच्छा लगा था. मेरी कल्पना में मोहिनीदी साड़ी पहन कर घूमने लगी थी. जोगिया वस्त्रों में वह मुझे बिल्कुल अच्छी नहीं लगती थी और उसका ‘नमोनारायण’ कहना तो जैसे काट खाता था.

इसके बाद मोहिनीदी की चर्चा नहीं ही होती थी. मैं भी उसे भूलने लगा था. कभी उसका दिया रुद्राक्ष दिख जाता तो याद आती. यह सोच कर संतोष जैसा होता कि अब तो वह घर-गृहस्थी वाली होगी.

इसके चंद बरस बाद ‘मिले बसंती देवी’ और ‘भेजने वाले महेश गिरि’ करके फिर उसकी चिट्ठी आयी तो सब चौंके. ‘नमोनारायण’ के बाद उसने लिखवाया था- ‘इधर कुछ साल से हम पूरे देश में घूम रहे थे. बहुत सारी जगहों और तीर्थों में गये- गंगा सागर, रामेश्वर, उज्जैन, प्रयाग, हरद्वार, काशी, बहुत जगह. नासिक के कुम्भ में भी गये.’

उस चिट्ठी में तीर्थों की महत्ता का विस्तार से वर्णन था. ईश्वर-महात्म्य का बखान था. अपनी ईजा की कुशल की कामना की थी और उससे भी ईश्वर भजन करने की अपेक्षा की थी. यह भी लिखा था कि वह ईजा के लिए धोती-पेटीकोट-ब्लाउज का पार्सल अलग से भेज रही है. पंद्रह रुपए का मनी ऑर्डर भी.

मोहिनीदी के किसी आदमी के साथ भाग जाने की खबर सुनाने वाले उस बटोही को गांव की महिलाओं गालियां दीं. उसकी ईजा ने दसियों बार कहा- ‘उस बदमाश के मुंह में कीड़े पड़ जाएं.’ मोहिनीदी के प्रति उन सबके मन में श्रद्धा भर आयी. उसके जालिम पति को कोसते हुए वे कहते- ‘उस राक्षस ने तो उसका जनम बिगाड़ना चाहा था, मगर मोहिनी ने अपना लोक-परलोक सुधार लिया. खूब पुण्य कमा रही है.’

उसकी खबर आने में लम्बा अंतराल हो जाता तो चिंता करने की बजाय कहा जाता कि कहीं आश्रम में या तीर्थों में तपस्या में लगी होगी. माया-मोह से दूर पक्की जोग्याणी हुई अब.

फिर हमसे गांव छूट गया. ईजा भी हमारे साथ लखनऊ आ गयी. गांव से कभी-कभार आने वाली चिट्ठियां कई खबरें लातीं. धीरे-धीरे लोग गांव छोड़ रहे थे. मोहिनीदी की छोटी बहन भागुली की शादी हो गयी. कुछ समय बाद वह अपनी ईजा को भी अपने साथ ले गयी. दिल्ली में कहीं उसकी आखें दिखाईं, बल. कुछ रोशनी लौटी, बल. सुनी-सुनाई खबरें.

मोहिनीदी की फिर कोई खबर मुझे नहीं मिली. मेरे पास सुरक्षित वह रुद्राक्ष उसकी याद दिलाता रहता है. सन 2000 के प्रयाग कुम्भ की कवरेज के लिए मैं एक हफ्ता कुम्भ नगरी के शिविर में रहा. वहां  ‘माताओं’ को देख कर मोहिनीदी याद आती. मैं रोज देर रात तक गंगा पार झूंसी में लगे अखाड़ों-महंतों के आश्रमों में घूमता. इण्टरव्यू करता. कभी सोचता, क्या पता मोहिनीदी भी यहां हो. क्या पता, कहीं मिल जाए! अब वह कैसी दिखती होगी? कई संन्यासिनियों को गौर से देखता. फिर सोचता, कहीं हो भी तो क्या मैं उसे पहचान पाऊंगा? वही क्या मुझे पहचान सकेगी? हरद्वार के कुम्भ में भी एक बार में इस उधेड़बुन से गुजरा था.

बहुत साल पहले जब किसी बटोही ने उसके भाग जाने की खबर सुनाई थी, तब मैंने मोहिनीदी पर एक कहानी लिखी थी. ‘माता’ शीर्षक से प्रकाशित इस कहानी में कई बातें सच थीं और कुछ कल्पित भी. कहानी का अंत इस प्रकार है- “मन करता है देश के किसी शहर, किसी कस्बे, किसी गांव में मोहिनीदी से भेंट हो जाए. मेरी 

‘नमस्ते’ के जवाब में वह ‘नमोनारायण’ न कहे. मुझे अपने घर ले जाए, जहां एक आदमी से मिलाते हुए वह कहे- ‘ये तेरे जीजाजी हैं’ और तभी एक बच्चा दौड़ता हुआ आकर उसकी गोद में चढ़ जाए.

“काश, ऐसा हो!

“और, इस कहानी में कम से कम यह झूठ न हो!”

यह मेरे एक कहानी-संग्रह में शामिल एक कथा ही रह गयी. अब भेंट होने की आशा बहुत क्षीण ही है.
एक मासूम किशोरी से जबरन भक्तिन बना दी गयी हमारी मोहिनीदी को मोक्ष मिल गया हो, तो भी कैसे पता चले.