'तद्भव' पत्रिका में राजू शर्मा के नए उपन्यास 'उर्फ कीड़ा' का पाठ और जंतर-मंतर में जेन-जी के आंदोलन की (आंशिक) जीत मेरे लिए एक साथ ही हुए। क्या शानदार और आनंददायी संयोग रहा!
यह व्यवस्था, यह क्रूर तंत्र अपने समस्त अंगों के दमनात्मक व्यवहार से निर्दोष, सचेत और खरे नागरिकों को कीड़ा बना देना चाहती है- अस्तित्वहीन, नगण्य। शासन-प्रशासन एवं न्यायतंत्र के वैभव को स्थापित करने के लिए उन्हें कठोरतम धाराओं में जेल में ठूंस देती है- वर्षों तक बिना सुनवाई, आरोप पत्रों के अम्बार में ही उसकी हस्ती खत्म कर देती है, उसका मजाक बनाती है।
लेकिन वही व्यक्ति जब खत्म हो जाने से इनकार कर देता है, अपने विलीन होते अस्तित्व में, किंचित ठसक के साथ, और अधिक सिकुड़ने या पूरी तरह मिट जाने से इनकार कर देता है, तो वही अदना नागरिक इस तंत्र के लिए , इस सत्ता संरचना के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन जाता है।
यह 'उर्फ कीड़ा' उपन्यास की कथा का सार है और यही कल जंतर-मंतर में जेन-जी ने कर दिखाया। खुद को सबसे ताकतवर मानने वाले को, कभी न झुकने वाले को, बर्बर दमन से आतंक मचाने वाले इस तंत्र को 'कॉक्रोचों' ने हरा दिया! कॉक्रोचों ने जब खत्म हो जाने से इनकार कर दिया, जब डर को झटक दिया तो तंत्र डर गया।
'उर्फ कीड़ा' में भी यही होता है। राजू शर्मा ने अपने समय की क्या खूब कथा कही है।
एक निर्दोष, सामान्य व्यापारी को राष्ट्रद्रोह और कई अन्य खतरनाक अपराधों का मुल्जिम बनाकर जेल में ठूंस दिया गया है। पांच साल से ऊपर हो गए हैं, उसकी कोई सुनवाई नहीं होती। हजारों पृष्ठों का आरोप पत्र दाखिल किया गया है, उसमें और पन्ने जुड़ते जा रहे हैं, अदालत में पेशी के समय जज उसकी ओर देखते तक नहीं। जज, दोनों पक्षों के वकील, पूरा तंत्र अच्छी तरह जानता है कि वह निर्दोष है लेकिन उन्हें अपने न्यायतंत्र की उपयोगिता और शक्ति दिखानी है। तंत्र अपना काम पूरी शक्ति से करता है।
एक दिन अपने निर्दोष साबित होकर रिहा होने की उम्मीद टूट जाने पर मुल्जिम सिकुड़ने लगता है। छह फुट का उसका कद रोज एक सेंटीमीटर की निश्चित दर से कम होने लगता है। यह नोटिस करने के बाद पूरे तंत्र में हड़कम्प मच गया है। हजारों करोड़ रु के बजट से और शासन-प्रशासन से लेकर सेना और समस्त विज्ञान शाखाओं के वरिष्ठ अधिकारी इस अलौकिक रहस्य का पता करने में जुट जाते हैं।
राजू शर्मा मानव-विज्ञान की वास्तविकताओं, शोधों और कल्पनाओं की उड़ान से इस सब का विस्तार से जबर्दस्त आख्यान रचते हैं। इस पढ़ने के लिए तनिक धैर्य भी चाहिए ही। वे बार-बार काफ्का और उसकी रचनाओं का, विशेष रूप से 'द ट्रायल' का उल्लेख करते हैं, जिसका पात्र 'के' ऐसी ही मनस्थितियों से गुजरता है। काफ्का की विख्यात कथा 'मेटामॉर्फोसिस' का नायक एक सुबह नींद खुलने पर पाता है कि वह इनसान से एक बड़े कीड़े में बदल गया है। खैर।
'उर्फ कीड़ा' का नायक मुल्जिम धीरे-धीरे दो इंच तक सिकुड़ चुका है। छह फुट का आदमी दो इंच का रह गया है लेकिन उसकी समस्त संवेदनाएं एवं मानवीय चेतना जाग्रत हैं। वह पूरा का पूरा मनुष्य ही है, हालांकि तंत्र उसे घिनौना कीड़ा, छछूंदर, गिलहरी, और भी जाने क्या-क्या कहता है। उससे नफरत करता है लेकिन डरता भी है कि कहीं यह किसी शत्रु देश का जासूसी यंत्र-मानव तो नहीं, कहीं कुछ अनिष्ट न कर बैठे। तंत्र अपनी शंकाओं में सब कुछ मानने लगता है, लेकिन उसे मानव मानने को तैयार नहीं है।
कहानी तब और रोचक हो उठती है, जब मुल्जिम दो इंच के बाद सिकुड़ना बंद कर देता है। उसका कद यहां स्थिर हो गया है। उसकी मानवीय चेतना, मेधा और संवेदनाएं और भी प्रखर हो गई हैं। वह अब परेशान नहीं है, बल्कि तंत्र के डर का, उसकी बेचैनियों, नींद-हर चिंताओं और दिन-प्रति दिन बढ़ते भय का आनंद ले रहा है। उसे सुदूर किसी द्वीप के गहन सुरक्षा-व्यवस्था से घिरे किले में हर वक्त की निगरानी में कैद कर दिया गया है। पूरा तंत्र उससे भय खाता है। चौकस रहता है।
उपन्यास के अंत का दृश्य है कि उस दो इंची 'कीड़े' के सामने विशाल सिंहासन पर उच्चस्थ पदधारक, तंत्र का शक्तिशाली मुखिया बैठा हुआ है। दो इंच का वह मुल्जिम (हालांकि अब वह मुल्जिम नहीं रहा, उसके विरुद्ध सारे अभियोग बंद या स्थगित कर दिए गए हैं।) एकटक उसे देख रहा है। उच्चस्थ व्यक्ति उसकी ओर देखने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा। बीच-बीच में चोरी से उसे देखता है और तुरंत अपना मुंह घुमा लेता है। उसके चहेरे पर हवाइयां उड़ रही हैं।
कीड़ा मुस्करा रहा है। शायद हंसने भी वाला है!
जब ये पंक्तियां पढ़कर मेरे होंठों पर तिर्यक मुस्कान तैर रही थी, उसी समय जंतर-मंतर में 'कॉक्रोच' जश्न मनाने लगे थे।
इतना अच्छा, झिंझोड़ने वाला उपन्यास लिखने के लिए राजू शर्मा जी और 'तद्भव' में प्रकाशित करने के लिए अखिलेश जी को बधाई।
- न जो, 26 जुलाई, 2026, लखनऊ
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