Sunday, August 23, 2026

स्कूलों की दशा छुपाने से नहीं सुधरेगी

सरकारी स्कूलों की दशा छुपाने से नहीं सुधरेगी। सरकार को चाहिए कि वह सबको बुलाए, कहे कि देखिए, हम ऐसे चला रहे हैं स्कूलों को। कोई कमी दिखे, कुछ सुझाव हों तो सहर्ष दीजिए। हम उन्हें लागू करेंगे।

लेकिन सरकार क्या कर रही है? उसने स्कूलों में बाहरी लोगों के आने पर रोक लगा दी है। खबरदार, कोई पत्रकार, कोई विपक्षी स्कूलों में कुछ देखने न पाए।

इसका सीधा अर्थ ही यह है कि स्कूलों में भारी गड़बड़ है और सरकार उसे ठीक करने की बजाय छुपाना चाहती है। 

बड़ी खामियां न होतीं तो प्रदेश भर में (और कई अन्य राज्यों में भी) बच्चे आंदोलन करने पर क्यों आमादा होते? पिछले चंद दिनों में लखनऊ, कन्नौज, फतेहपुर, महोबा, उन्नाव, आजमगढ़, हमीरपुर समेत कई स्कूलों के बच्चों ने सड़क पर उतरकर प्रदर्शन किए, अधिकारियों का घेराव किया, गुस्से में नारे लगाए। 

क्या मांग रहे हैं बच्चे? पढ़ाने के लिए पर्याप्त शिक्षक हों, पीने का पानी मिल जाए, शौचालय हो और लड़कियों के लिए तो अवश्य हो, मध्याह्न भोजन मानक के अनुसार मिले, स्कूल भवन इतना जर्जर न हो कि छत ही सिर पर गिर पड़े, स्कूल जाने का रास्ता ठीक-ठाक हो और पढ़ाई की बेहतर व्यवस्था हो। 

क्या सरकार सच में कह सकती है कि हमारे स्कूलों में यह सब है?  

स्कूलों की यह दुर्दशा नई नहीं है। अक्सर खबरें आती रही हैं कि स्कूल की इमारत ढह गई, स्कूल के कमरों में भैंसों का तबेला है, मास्टर नहीं हैं, रास्ते में कीचड़-कीचड़ है, मध्याह्न भोजन में कीड़े हैं और दाल में ढेर पानी है, लड़कियां शौचालय न होने से स्कूल छोड़ रही हैं, वगैरह। 

इन खबरों का संज्ञान लेकर स्कूल सुधारे गए होते तो बच्चे क्यों विरोध प्रदर्शन करते? बच्चे पहले भी चुपचाप शिकायत करते थे। कुछ शिक्षक भी बदहाली गिना देते थे। पहले वे अपना अधिकार मांगने से डरते थे। जंतर-मंतर पर विद्यार्थियों के प्रदर्शन ने डर खत्म कर दिया है। अब प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों के बच्चे भी सड़क पर आ रहे हैं। 

क्राक्रोच जनता पार्टी और कुछ यूट्यूब वाले भी स्कूलों की बदहाली देखने निकल पड़े हैं। वे स्कूलों में जाकर उनकी खस्ताहाली सामने लाना चाहते हैं। सरकार पोल खुलने से डर गई है। वह मामला छुपाए रखना चाहती है। ठीक करना चाहती तो उन्हें क्यों रोकती?

वैसे भी, सरकारों ने (इसमें पिछली सरकारें भी शामिल हैं) सरकारी स्कूलों को दीन-हीन बच्चों के लिए बेसहारा छोड़ रखा है। जिनके पास थोड़ा भी पैसा है, उनके लिए शिक्षा की दुकानों के रूप में निजी स्कूल खूब खोल दिए हैं। लोग जमीन बेचकर, कर्ज़ा लेकर भी बच्चों को शिक्षा खरीदने के लिए भेजने को मजबूर हैं। वही आगे बढ़ने का रास्ता दिखाई देता है। 

किंतु, जो बहुत गरीब हैं, महंगी शिक्षा नहीं खरीद सकते, वे सरकारी स्कूलों में अपने बच्चों को भेजते हैं। ऐसे लोगों की अभी बहुत बड़ी संख्या है। 

ये गरीब सरकारों की चिंता में शामिल नहीं हैं। इसीलिए सरकारी स्कूल सबसे उपेक्षित हैं। वैसे भी उन्हें धीरे-धीरे बंद किया जा रहा है। बहाना यह है कि सरकारी स्कूलों में बच्चे कम होते जा रहे हैं। अरे, स्कूल और पढ़ाई बदहाल बना दी है आपने। इसलिए बच्चे कम होते जा रहे हैं। 

स्कूलों में शिक्षकों की भर्ती नहीं की जा रही । जो शिक्षक हैं भी, उन्हें पढ़ाने के अलावा बहुत सारे दूसरे कामों में लगा दिया जाता है। मतदाता सूची, मतदान, जनगणना, तरह-तरह के सत्यापन, जाने क्या-क्या काम उनसे लिए जाते हैं।

यह सरकार वैसे भी जनता को शिक्षित नहीं बनाना चाहती। इसका जोर धर्मांधता पर अधिक है। शिक्षित जनता सवाल करती है, अपने अधिकारों की बात करती है और सरकार यही नहीं होने देना चाहती। 

बहरहाल, सरकारी स्कूलों को वास्तव में दुरस्त करने की नीयत हो तो उन्हें पर्याप्त बजट, शिक्षक, संसाधन और सुविधाएं देनी चाहिए। फिर, नेताओं और आला अफसरों के बच्चों के सबसे पहले इन स्कूलों में भर्ती किया जाना चाहिए। जिस दिन प्रभुत्व वर्ग के बच्चे इन स्कूलों में पढ़ने जाने लगेंगे, उसी दिन पूरी शिक्षा व्यवस्था का कायाकल्प हो जाएगा। 

सरकार ऐसा नहीं करेगी क्योंकि इससे शिक्षा की बड़ी-बड़ी दुकानें बंद हो जाएंगी। वह ऐसा कभी नहीं चाहती। 

सरकार 'बाहरी' लोगों को सरकारी स्कूलों में जाने से रोक लेगी। उसके पास ताकत है लेकिन बच्चों को आंदोलन करने से वह कैसे रोक पाएगी?  

ध्यान रहे, एक दिन ये बच्चे यह सवाल भी जरूर पूछेंगे कि किसी मंत्री-एमपी-एमएलए और सचिव-डीएम के बच्चे हमारे साथ पढ़ने क्यों नहीं आते। 

-न जो, 24 अगस्त 2026, लखनऊ  

  

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