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Tuesday, July 28, 2026

मुहब्बत और बगावत, रसोई और व्यंजनों का औपन्यासिक आस्वाद

अगर आप चॉकलेट का अर्थ भारत भर के बाजारों में बच्चों और युवाओं की पसंदीदा चॉकलेट से न लगाएं तो मैं आपको बताऊं कि उत्तरी अमेरिका का जगप्रसिद्ध चॉकलेट पेय  बनाने के लिए पानी को एकाधिक बार उबालना पड़ता है। किस चरण में कितना उबालना है, यह पाक-कला ही चॉकलेट का स्वाद तय करती है। 

मैक्सिको की विश्वविख्यात उपन्यासकार लॉरा एस्कीवेल के उपन्यास 'जैसे चॉकलेट के लिए पानी'  में चॉकलेट के पानी की ही तरह मुहब्बत का उबाल है, उसके दमन का उबाल है, विद्रोह का उबाल है और अंतत: मुहब्बत ज़िंदाबाद का उबाल है और  क्या स्वाद है! 

विश्व साहित्य में मुहब्बतों पर असंख्य उपन्यास लिखे गए हैं। किशोरावस्था में दीवानों की तरह पढ़े गए एरिक सीगल  के उपन्यास 'लव स्टोरी' से लेकर जादुई यथार्थवाद के लिए जाने गए गैब्रिएल गार्सिया मार्खेज के 'लव इन द टाइम ऑफ कॉलरा' तक। और भी तमाम।  किंतु, लॉरा एस्कीवेल का 'जैसे चॉकलेट के लिए पानी' इन सबमें अलग ही जगह रखता है। 

यहां मुहब्बत रसोई में दादी-नानियों के परम्परागत ज्ञान और अनुभवों से सराबोर विविध व्यंजनों की तैयारी और उनके पकने के साथ उबलती, भुनती, ठंडाती और स्वाद ग्रहण करती है। यहां वह प्याज काटने में निकलने वाले आंसुओं के साथ बहती है, आटे को बेकाबू गीला करती जाती है, खुबानियों के साथ लुढ़क पड़ती है, अंडों की ज़र्दी में फिंटती है, मामा एलेना के रोष में जलती-मुर्झाती है, बटेरों-बत्तखों के पंखों के साथ झड़ती है, मुर्गों की गर्दनों के साथ मरोड़ी जाती है और स्वाहा हो गए रैंच की राख के नीचे से नवजीवन पाकर असंख्य मोमबत्तियों के उजाले के बीच एक अनंत सुरंग में समा जाती है। 

मुहब्बत कथा का प्रधान तत्व है लेकिन उसमें तत्कालीन मैक्सिकी क्रांति, उस समाज की आंतरिक संरचना, परिवार में स्त्रियों की स्थिति, पुराने सामाजिक मूल्यों की जकड़न और टूटन, भाषाई सौंदर्य और मुहावरे और पर्मोअरागत पाक-कला, सभी का धड़कता स्पर्श अनुभव किया जा सकता है। 

प्यार, देह पर अपने अधिकार और मनचाहे विवाह की स्त्रियों की स्वतंत्रता की वकालत यहां नारे की तरह नहीं, बल्कि कथा में अनुस्यूत लहर की तरह अभिव्यक्त होती है। तीता और पेद्रो के प्यार की मुख्य धारा के समानांतर अन्य पात्रों के भी प्रेम के झरने फूटते हैं, जो कहीं मिलन और कहीं वंचना में रसोई में पकते व्यंजनों की भांति स्वादिष्ट या विषाक्त हो उठते हैं।   

लॉरा एस्कीवेल का यह पहला ही उपन्यास छपने (1989) के साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लाखों प्रतियों में बिका और पुरस्कृत हुआ।  हिंदी में इसे हमारे प्यारे, 'लप्पूझन्ना' वाले अशोक पांडे ने सीधे स्पेनिश से अनूदित किया है। उनसे इस उपन्यास के बारे में एकाधिक बार सुना था, अनुवाद भी काफी पहले कर लिया गया था लेकिन कॉपीराइट के चक्कर में प्रकाशित हुए बिना पड़ा हुआ था। अब सम्भावना प्रकाशन के अभिषेक अग्रवाल ने प्रकाशन अधिकार हासिल कर इसे हिंदी पाठकों के लिए उपलब्ध करा दिया है। 

एक रैंच पर बेहद सख्त मां और उसकी तीन बेटियों  की यह कहानी सबसे छोटी तीता और एक युवक पेद्रो की मुहब्बत से शुरू होती है। कठोर मां उस परम्परा का हवाला देकर विवाह से इनकार कर देती है, जिसमें सबसे छोटी बेटी को मां के जीवित रहने तक उसकी सेवा करनी होती है और उसका ब्याह नहीं किया जाता। इसके बाद कहानी में यह मुहब्बत जो रास्ता पकड़ती है, वह तो चौंकाता ही है, उसके कहन, उसकी शैली और मैक्सिकी रसोई की पृष्ठ भूमि में उसके अद्भुत निर्वाह का अनुभव उपन्यास पढ़कर ही किया जा सकता है। 

जनवरी से शुरू करके साल के बारह महीनों  के बारह अध्याय हैं और प्रत्येक अध्याय का प्रारम्भ किसी मैक्सिकी विशिष्ट व्यंजन बनाने की सामग्री और विधि बताने से शुरू होता है। सामग्री और विधि के वर्णन में कब कथा पिरो दी गई, कब अपने अद्भुत स्वाद के साथ व्यंजन तैयार हुआ और कब कथा अगला सोपान चढ़ गई, यह इतने संश्लिष्ट और अंतर्गुम्फित रूप में रचा गया है कि पाठक ऐसी कोई आवाजाही अनुभव नहीं कर पाता।  सब कुछ कथा रस में भीगा-भीगा हुआ परोसा गया है। 

जादुई यथार्थ की लेखन शैली मुहब्बत और विद्रोह की कथा में अजब-गजब उड़ानें पैदा करती है, जिसमें न केवल पात्र बल्कि पाठक भी झनझनाने लगता है। यह मार्खेज के जादुई यथार्थ की तरह जटिल नहीं, बल्कि भिन्न और तरल-सा प्रतीत होता है।  

अगर हिंदी में भी यह उपन्यास अपनी समस्त खूबियों के साथ आया है तो इसे अशोक पाण्डे के अनुवाद का कमाल मानना चाहिए। किताब की परिचयात्मक भूमिका में अमित श्रीवास्तव ने इस बारे में लिखा है कि "एक अच्छा अनुवादक भाषाई तकनीशियन नहीं, बल्कि एक किस्म का सांस्कृतिक मध्यस्थ या फिर एक मौन सह-लेखक होता है, जो मूल रचना की आत्मा को संरक्षित करते हुए उसे दूसरी भाषा -संस्कृति की दुनिया में एक जैविक संरचना बना देता है।" 

अशोक पाण्डे ने सचमुच यह कमाल किया है। उनके अन्य अनुवादों में भी हम ऐसा मौलिक आस्वाद पाते हैं।  

हिंदी में प्रतिवर्ष असंख्य उपन्यास और कहानी संग्रह छपते हैं। कुछ अच्छी रचनाएं अलक्षित रह जाती हैं, कुछ औसत रचनाएं  चर्चा पा जाती हैं। 'जैसे चॉकलेट के लिए पानी' जैसी कमाल की रचनाएं कम ही सामने आती हैं। अच्छा लिखने-पढ़ने के इच्छुक और अनुवाद में हाथ आजमाने वालों के लिए यह उपन्यास अनिवार्य होना चाहिए। 

- नवीन जोशी, 28 जुलाई 2026, लखनऊ

(जैसे चॉकलेट के लिए पानी- लॉरा एस्कीवेल, अनुवाद- अशोक पाण्डे, सम्भावना प्रकाशन (7017437410), पृष्ठ-166, मूल्य- 285/- )