Sunday, July 26, 2026

ए भाई, हिंदी बरतो तो ऐसे बरतो!

जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारी युवाओं की भाषा के बारे में पूरा समाज उद्वेलित दिखाई दे रहा है। एक बड़े वर्ग के भाषाई संस्कार की जड़ें हिल गई हैं। अच्छा है, इसी बहाने भाषा पर, शब्दों पर चर्चा हो रही है। 

मैं यहां युवाओं के नारों-पोस्टरों की भाषा पर बात करने नहीं जा रहा हूं। इस समय मेरे हाथ में है भाषा विज्ञानी और भाषा/शब्दों के लिए सतत चिंतित रहने वाले डॉ सुरेश पंत जी की नई पुस्तक 'साधो, शब्द विचारो'।  किताब की भूमिका (कहे बिना रहा न जाए) में वे लिखते हैं- 'भाषा एक व्यक्ति की नहीं, पूरे समाज की सम्पत्ति होती है।' तो, जंतर-मंतर में जो गालियां थीं, वे भी पूरे समाज की सम्पत्ति हैं! शर्मिंदा होना है तो पूरा समाज हो। खैर। 

यह देखना सुखद और संतोषप्रद है कि पिछले कुछ वर्षों में सुरेश पंत जी ने सोशल मीडिया (विशेष रूप से फेसबुक और पहले ट्विटर, अब X) के सामान्यत: आत्ममुग्ध मंच पर भाषा को बहस-मुबाहसे का बड़ा मुद्दा बना दिया है। सोशल मीडिया और मुख्य धारा के मीडिया की भाषा और वर्तनी पर उनकी सतर्क टिप्पणियों ने बहुत बड़ा वर्ग तैयार कर दिया है जो अब शब्दों व व्याकरण के प्रयोग पर सावधान रहता है अथवा उनसे अपनी शंकाओं का समाधान चाहता है। 

इसी विमर्श और शंका समाधानों  के अब भी जारी सिलसिले का एक और सुखद परिणाम है, शब्दों के प्रयोग और व्याकरण सबंधी आम त्रुटियों/सावधानियों पर उनकी चार पुस्तकों का प्रकाशन। 'शब्दों के साथ-साथ' के भाग एक एवं दो, 'भाषा के बहाने' तथा अब 'साधो, शब्द विचारो'। वास्तव में ये चारों पुस्तकें एक ही सिलसिले की कड़ियां हैं। 

भाषा के प्रति घोर लापरवाही के इस दौर में यह जानना और भी सुखद है कि डॉ पंत की पिछली तीन पुस्तकें 'बेस्ट सेलर' का दर्ज़ा पा चुकी हैं और अब भी लोकप्रियता के पायदान पर बहुत ऊपर बनी हुई हैं। इसमें संदेह नहीं कि हाल में प्रकाशित चौथी पुस्तक भी शीघ्र उसी श्रेणी में शामिल हो जाएगी। इसे देखते हुए मेरा यह कहना संदेह के दायरे में रखा जाना चाहिए कि यह दौर भाषा के प्रति घोर लापरवाही का है। 

'साधो, शब्द विचारो' में मुख्यत: 'किसी शब्द विशेष की उत्पत्ति, अर्थ और व्यावहारिक प्रयोग पर ही चर्चा केंद्रित है कि यह शब्द आया कहां से, उसके प्रयोग में क्या भ्रम है और क्यों आदि। फिर भी इसमें पिछली पुस्तकों की अपेक्षा एक स्पष्ट अंतर भी है। पिछली पुस्तकों में व्याकरण विषयों को प्राय: नहीं उठाया गया, क्योंकि भाषा में शब्दों का प्रयोग मुख्य है, व्याकरण तो आते-आते आता है।'

डॉ पंत रूढ़ अर्थों में भाषा विद‍ नहीं हैं, जो भाषा एवं शब्दों को परम्परा और व्याकरण की लाठी से हाँकने में भरोसा करते हैं। शब्दों के निर्मल बहाव की तरह वे भी उदार और लचीले हैं।  उनका मानना है कि 'जीवित भाषाएं निरंतर नए शब्दों को ग्रहण करती रहती हैं और पुराने को भी नए-नए अंदाज़ में उलटती-पुलटती रहती हैं। व्याकरण भाषा के समकालीन प्रयोग को देख-परखकर उसके लिए कुछ नियम बनाता है, किंतु समय के साथ-साथ धीरे-धीरे भाषा का प्रवाह अपने कूल-कगारों को लांघता हुआ आगे बढ़ जाता है।'

पंत जी इतने उदार हैं कि प्रचलन में स्वीकार कर लिए कुछ गलत शब्दों को भी खारिज नहीं करते। जैसे, सही शब्द है 'धूमपान'। 'धूम्रपान' गलत है क्योंकि 'धूमपान' करने वाले 'धूम' (धुएं) का पान करते हैं, 'धूम्र' (धुएं के रंग) का नहीं। लेकिन लम्बे समय से प्रयोग में आते-आते 'धूम्रपान' का वही अर्थ ग्रहण कर लिया गया है जो वास्तव में 'धूमपान' का है। इसलिए वे इसे स्वीकार्य मानते हैं। 

वास्तव में यही व्यावहारिक है और पंत जी की पुस्तकें शब्दों और व्याकरण का व्याहारिक-तार्किक प्रयोग सिखाती हैं। वे समय में पीछे जाकर जमाने भर की अशुद्धियों को डंडा लेकर सुधारने में विश्वास नहीं करते। लेकिन अगर आप 'अज्ञान' के लिए 'अज्ञानता' लिखते हैं, तो पंत जी  उसे स्वीकार्य नहीं मानते क्योंकि 'अज्ञान' अपने आप में भाववाचक विशेषण है, उसमें 'ता' जोड़कर फिर से भाववाचक विशेषण बनाने की न जरूरत है, न ग्राह्य। 

पंत जी कहते हैं कि हिंदी संस्कृत से उपजी जरूर है लेकिन हिंदी का अपना व्याकरण है, जो संस्कृत व्याकरण से कई मायनों में फर्क है । उस पर जबरन संस्कृत का व्याकरण क्यों ठूंसना? संस्कृत' में 'दम्पती' सही हो सकता है, लेकिन हिंदी का व्याकरण 'दम्पती' को नहीं पचा पाता। उसमें 'दम्पति' ही सही ठहरता है। 

'साधो, शब्द' विचारो' सहित उनकी सभी पुस्तकें रोचक शैली और व्यंग्य व हास्य-पुट के साथ लिखी गई हैं। इसीलिए इन्हें पढ़ना भाषा और व्याकरण की बोझिल पुस्तकों की तुलना में बहुत आनंददायी भी है। अपनी फेसबुक एवं X पोस्टों में भी वे बड़ी चुटीली शैली का प्रयोग करते हैं। 'अरे, बाप रे', 'इन तिलों में तेल कहां!', 'कट्टी-बट्टी के दिन', 'ए भाई, जरा देख के चलो' जैसे शीर्षक पढ़ने की उत्सुकता जगाते हैं और बिल्कुल सहज-सरल ढंग से सही वर्तनी की चूक और व्याकरण की भूल समझा जाते हैं। 

क्या ही अच्छा हो कि प्रिंट और टीवी मीडिया के समाचार कक्षों में पंत जी की चारों पुस्तकें रखवा दी जाएं और सम्पादकों-पत्रकारों में इतनी विनम्रता आ जाए कि वे समय-समय पर उन्हें पढ़ते रहें। आज हिंदी की सर्वाधिक दुर्दशा मीडिया ही कर रहा है।

हमारे समय के न्यूज-रूम शब्दकोशों और संदर्भ ग्रंथों से समृद्ध रहते थे। सम्पादकों की ओर से भी लगभग प्रतिदिन भाषा और वर्तनी प्रयोग के निर्देश मिलते रहते थे।  

बहरहाल, पंत जी को बहुत-बहुत बधाई। शुभकामनाएं भी वे कि वे अस्थिर स्वास्थ्य और उम्र की बाधाओं पर विजय पाते हुए भाषा-विमर्श के मोर्चे पर सक्रिय बने रहें।   

- नवीन जोशी, 27 जुलाई 2026, लखनऊ।

'साधो, शब्द विचारो', पेंग्विन स्वदेश,2026, पृष्ठ-299, मूल्य- 399/- इस क्रम में उनकी अन्य पुस्तकें हैं- 'शब्दों के साथ-साथ, भाग 1 एवं भाग 2' -दोनों पेंग्विन स्वदेश और 'भाषा के बहाने' (नवारुण प्रकाशन)   

 

 

 

 

 

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