Tuesday, August 25, 2026

'पुष्कर-कविता में विछोह नहीं, प्रेम की सार्थकता है'

प्रिय भाई नवीन,

बड़ी मुश्किल से जुटा पाया हूं अपने को यह पत्र लिखने के लिए। चाहता तो तुमसे मिलकर 'बहुत अच्छा, बहुत अच्छा'


करके तुम्हारे 'दावानल' की औपचारिक प्रशंसा कर सकता था। मगर उससे मन कहां मानता। उपन्यास मुझसे कम पढ़े जाते हैं। कुछ कहानी-कविता पढ़ता भी हूं तो ज़्यादा याद नहीं रख पाता। मौके पर तो बिल्कुल नहीं। तुम्हारी कुछ कहानियां भी पढ़ीं। मंचन करने का तत्काल मन भी किया मगर फिर वही पहाड़ियों की मारगांठ वाली स्थिति। खैर...। 

'दावानल' पढ़कर दरअसल में बहुत भावुक हो गया। सोचा इस गीली स्थिति में कुछ बोल-लिख न पाऊंगा। फिर रख दिया। कुछ दिन लग गए। कुछ उबरा तो लगा, ये इतना आसान नहीं है। उपन्यास के खास तौर पर नहर दफ्तर, हुसेनगंज के दृश्य, लोग, उनके रेखाचित्र जाने-पहचाने लगे। अच्छा लगा। पहली बार पढ़ते समय जो-जो मन जुड़ा गया, वो नोट कर लेता तो अच्छा था। अब वही याद है जो नहीं भूल पाता। 

यद्यपि उपन्यास में वन आंदोलनों पर तुम्हारी व्याख्या, विवरण, इतिहास और समीक्षा अद्भुत, जानकारीपूर्ण और मन में गुस्सा उपजाने वाले हैं, मगर छपछपी पड़ी ईजा व बाबू वाले प्रसंगों पर। तुम्हारी निस्संग स्वभाव की भावुकता इसीलिए रुलाती है कि यहीं अब तक पहाड़ी लड़के (भले ही वे अधेड़ या वृद्ध हो गए हों) स्वयं को आडेंटीफाई करते हैं। 


हमारी और हमारे कुछ बाद की पीढ़ी के ईजा-बाबू लगता है एक ही घराने के होते थे। उनके कष्ट, भले ही उन्होंने शहर में सहे हों, होते पहाड़ के ही थे। बहुत रुलाई आई यार खास तौर पर उनके तर्पण प्रसंगों में। जाने क्यों, अगर ये बुराई हो तो हो मगर, वन आंदोलन के प्रकरणों उतना नहीं झकझोरा, जितना ईजा-बाबू या इनसे मिलते-जुलते प्रसंगों ने, जैसे कि बाघ वाला प्रसंग।

हां, एक बात और जुड़ा गई। पुष्कर और कविता के सम्बंध। यहां तुम गज़ब के हो गए। न केवल शरतचंद्रीय गलदश्रु भावुकता से भी और अज्ञेय की क्रांतिकारिता से  भी (बचा ले गए)। ऐसी आदर्श स्थिति रची कि मैं भी फेल हो गया। पुष्कर-कविता में तुमने विछोह नहीं, प्रेम की सार्थकता रची है। ये मेरा पहले पढ़ा हुआ नहीं है। एक मेच्योर विचारक की छवि बनाई तुमने। यद्यपि चेहरे से तुम किशोर पुष्कर ही लगते हो। वर्षों पहले मेरे देखे, हुसेनगंज वाले। 

सबसे बड़ी बात तो ये कि उपन्यास पढ़कर मुझे अपना अब तक का किया पूरा फरमाइशी लेखन और ओढ़ा हुआ रंगमंच अचानक बहुत सतही लगने लगता है। तुमने वाकई हम सब जैसे मीडियाकरों पर लोहार की चोट की है। ये हुआ संगठित सोच, खूब छना हुआ विचार, खूब खंगाली हुई दृष्टि और मेच्योर लेखन। 

'दावानल' में उसका अपना स्वभाव व प्रकृति है। चूंकि तुम्हारा लेखन प्राकृतिक है, इसलिए मौलिक है। ऐसा नहीं कि वन आंदोलन वाले प्रसंगों ने मुझे खदबदाया नहीं, गुस्सा भी आया मगर एक रूपवादी-कलावादी होने के कारण मुझे भावुकता ही अधिक सुरक्षा देती है। शायद पहाड़ियों की दुखती रग यही है।

उपन्यास का कैनवस काफी बड़ा था मगर तुम कुशल चित्रकार निकले। कहीं अनावश्यक स्ट्रोक नहीं। सभी रंग संतुलित। मुझे नहीं पता, उत्तराखण्ड में उपन्यास को क्या प्रतिक्रिया मिली। क्या इसे बहुगुणा जी-भट्ट जी ने पढ़ा होगा? न हो तो पढ़ाओ। गिर्दा से तुम्हारा दीर्घजीवी जुड़ान पहले पता नहीं था।

'दावानल' से उठे प्रश्न क्या उत्तराखण्ड बनने के बाद उतने पैने रह गए हैं या नहीं? क्या अलग राज्य बनने के बाद 'दावानल' के आरोपों का कोई मतलब नहीं रहा? 'नैनीताल समाचार' अभी भी पुष्कर निकाल रहा है क्या? 

कहना बहुत था। 'दावानल' फिर से पढ़कर कह पाऊंगा।

नवीन, हुसेनगंज से गोमती नगर तक तुमने बहुत सार्थक रचनात्मक सृजनशील यात्रा तय की है। ऐसी तप:पूत साधना कभी समाप्त नहीं होती। बहुत-बहुत बधाई और आशीर्वाद। * 

तुम्हारा- उर्मिल कुमार थपलियाल  

* बहुत आश्चर्य होता है तुम्हारी रिसर्च और वन आंदोलनों की संदर्भ सामग्री जुटाने पर्। इस रूप में मुझे तुम शेखर पाठक से दिखे। तथ्यगत उपन्यास तो डॉक्यूमेण्ट्री लगने लगते हैं। पहाड़ की स्थिति तुमने दलित आत्म कथाओं की तरह महिमावर्णन करते हुए नहीं लिखी। तुम्हारी भाषा में चेग्वेरा और वामपंथियों की ललित ललकार नहीं है। भाषा की पहुंच सरलता-तरलता और सहज सम्प्रेषण से आती है। यह सिद्ध हुआ।

वाकई नैनीताल में रहने से कुमाऊं औरमेरी तरह देहरादून में रहने से गढ़वाल नहीं जाना जा सकता। पता नहीं तुम्हें पढ-अने के बाद मैं जिस हीनभावना से गुजरा हूं, वहां से कब उबर पाऊंगा। शायद वो सभी पहाड़ी जो तुम्हारी तरह का गम्भीर और सार्थक काम नहीं कर पा रहे हैं।   

इस पत्र को पुराना पोस्टकार्ड ही समझना, क्योंकि लिखना ख्तम करते ही और कुछ लिखना याद आने लगता है। जहां तक कागज हो, वहां तक। बिखराव इसी को कहते हैं।  

(प्रसिद्ध रंगकर्मी उर्मिल कुमार थपलियाल ने मेरा उपन्यास 'दावानल' पढ़कर यह पत्र मुझे 20 मई 2008 को लिखा था और फिर खुद ही चलकर मुजेह देने आए थे। आज पुराने कागजों में मिला तो यहां लगा दे रहा हूं ताकि सनद रहे- न जो

  

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