Monday, March 01, 2021

कुमाउनी काथ/ बघैन

 

नवीन जोशी

किलै रे शेरू, आज नि खानै र्‍वट? खै ले यार, खै ले। कि चितूणौछै बास जसि, यां को ऊनेर भै? उ ले यो रात में? … अरे, बघैन त नि ऊणै? होय यार, चितूण त मी ले रयूं। बाघै हुनेल। आब त्वे तैं गिदि रौछ। और के छ यां वीक खाणै तें! चुप रौ, त भौं-भौं नि लगा। त्यार भौं-भौंलि डरौंछ उ? चणी रौ। मी छोड़ुल एक टुक्याव...हो-हो-हो-होssss… आब भाजि जाल।

अब खा। और सुण, तु बचि बेर रये हां! तुकें ले टिपि ली गयो त? कभतै न्हें जांछै बानरना पिछाड़ि, कभतै सुंगर भजूण... बड़ै ठारि राखंछै आपूं कें! जब पड़छै बाघा हात। त्यर बाब, तेरि महतारि, त्यार भै-बैणी कां गई, के खबर छ? सब यो बाघा पेट में गईं। टप्प टिपि ल्ही गो, एक-एक कै बेर। पत्त ले चलनेर नी भै। नंतरी और कां जानेर भै उं?

त्यर बाब, शिबौ हड़्यूड़, भौतै मोहिल छि। सफेद आड्. में काव-काव बुट, जाणी कैले बराबर छापी हो।  कां बटि ला हुनेल नाकाक मलि में उ पिठ्यां जस लम्ब काव टिक! कस सुंदर फबनेर भै! तुमि भै-बैणिन कैं मिलै नै उस बुट। सब महतारि परि गया तुमि। मोहिल यदु भै कि सिद्द काखि में ऐ बैठनेर भै। पैल गास आपण हाथलि खवूण भै। नंतरी खै दिनेर नि भै। रत्तै ब्याण मी कें बिजूणै तैं आपण टैण थोव म्यार खुटन लगै दिनेर भै, रजै भितेर मुख हालि बेर। नड़क्याइ साल कें तो रिसै जानेर भै। फिर मनूण भै।

वीक जाइयांक बड़ दुख लागौ, यार। तु नानू-नान छियै। ब्याव कै खुटकूण में बैठ रौछी। देई मुड़ि बै  बैठि रूनेर भै म्यार र्‍वाट पकूण बखत। नज़र सिद्द चुलै तरफ। बात करनेर भयूं मी वी थैं- ओ ठप्पू,  र्‍वट खालै, हां!ठप्पू धर्यू भै मील वीक नौं। कभतै उ आंखनलि जवाब दिनेर भै, कभतै पुछ्ड़ि हिलै बेर कूं-कूं करि दिनेर भै।

, उ ब्याव ले बैठी भै वी खुटकूण में। मी ताव में र्‍वट हालणैछ्यु। मेरि नज़र भे चुलै उज्याणि। न वील कूं-कां करि, न नाकैलि सूं-स्वां। मील देई तरफ चायो त वां नि भै। पटाड्.ण में जै रौ हुनेल कै सोच मील। र्‍वट पकै बेर हाथ ध्वीणै तैं भ्यार गयू त वां ले नि भै।

, ठप्पू,’ धात लगै मील। धता-धात करि दे। हुनो तब ऊंन। वीक बानौ र्‍वट धरियै रौ। रत्तै ले नी देखीण। पुर गौं में चाय मील। चार दिन बाद मलि जंगव में वीक सुकीं खाल मिली। कावा-काव बुट उसीकै चमकणाय। तब जाणी मील कि उ ब्याव बाघ टिपि ल्ही गो उकें।  

तेरि महतारि, सुबदारिणि! होय यार, सुबादारिणि धरीं भै मील वीक नौं। असलि सुबदारिणि सुणनी तो भौतै मैक्यूनि। मगर गौं में हुनी त सुणनि। जब बटि सुबदारज्यू राठ गईं यां बटि, उनारै पटाड्‍.ण में बैठ रूनेर भै। र्‍वट खाणै तें ऊनेर भै यां, फिर वैं। जाणी बांजि कुड़ीक पहर करण हुं कै जै रौ हुन्याल सुबदार ज्यू! रात उनारै गोठ में पड़ि रूनेर भे। वी गोठ में जन्मा तुमि सब। ललाड्‍. रंग भै। बाकि आड्‍. में एक छिट ले नै। जस तु छै। आपणी महतारी पर गया तुमि सब। बाबूकि एक निशाणी नि मिलि तुमनकें।

ठप्पूक जाइयांक द्वी-तीन म्हैण बादै बात हुनेलि। तुमि भै-बैणी मणी ठुल-ठुल है गोछिया। पांच तुमि भै-बैणी भया, द्वी तुमार मै-बाब। अठूं मी। र्‍वाट पाथन-पाथनै हाथ पटै जानेर भाय, यार। हाथलि जातर पिसण हुनो त को करि सकनछी। चार मील तलि सड़कै दुकान बटि पिस्यूं बोकि लूण तब ले सितुल भै। दिन में हम लगूनेर भयां गौंक एक फ्यर। सबन है पैली छुरमल ज्यूक थान में। घंटी सुणि बेर तुम सब ऐ जानेर भया। फिर सबना मोव थें जाण भै हमिल, कभतै तुम म्यार अघिल, कभतै पछिल। और करण ले कि भै हमिल यां!

एक रत्तै र्‍वट खाणै तें नी ऐ। मील धात लगै- ओ सुबदारिणि, र्‍वट नी खानी आज?’ तब ले नी ऐ। द्यप्तामड़ै घण्टी सुणि बेर तुमि सब ऐ गया, मगर वीक पत्त नी भै। सुबदारज्यूक गोठ में जै बेर चाय, कें बीमार-हीमार त नि है रै कै। वां ले नी भे। फिर कभै नि देखीणि, यार! बाघ साल्‍ तुमार घातन लागि रूनेर भै। जब तु यकलै रै गये तब समझ ऐ। तबै त तुकें भीतेर धरि राखूं मी।  तुकें अकलै न्हांति। कभतै बानरन हकूंण न्है जांछै, कभतै सुंगरन। त्यारै चक्कर में गिदि रौ यो बाघ। समझि गोछै?

, आब खै ले र्‍वट। न्है गो बाघ।

।।।।।।    

होय, होय, उठणयूं, यार! त टैण थोव हटा म्यार खुटन बटि। आपण बाबूकि यो आदत खूब मिली तुकें। मालूम छ मी कें उज्याव है गो कै। मगर करण कि है रौ रत्तै ब्याण उठि बेर। न गोठ में गोर बाछ अलाणईं, न प्वर्स गाड़ण भै, न घा-पात हुं बण जाण भै। बण आब घर तक ऐ पुजि गो। सो, लकाड़ना इफरात भै। विकास वाल नल ले लगै गई मोव थें। उं त झाड़-पिशाबै तैं एक कुठ्यर ले बणै जै रईं। शौचालय कूनी बल। रात-अधरात और चौमासै तें भलै भै।  

अच्छा-अच्छा, समझि गयूं। तुकै भ्यार जाण हुनेल। हिट, द्वार खोलि द्यूल, मगर दूर झन जाए, हां! ... आहा! कतु भल घाम ऐ रौ पार हिमाल में। जाणी, सुन ढोली रौ हुनेल। पैलिया जमान हुनो त गौं में हकाहाक पड़ी हुन। कें सासु-ब्वारी कज्जी लागी हुन, क्वे आपण हली कें धात लगूण हुन कि कां मरि गो छै रे! क्वे आपण मांड्‍. में पैठी पाल गौंक घस्यारिन भजूण दौड़ लगून और छुरमल ज्यूक मंदिर में घंटी बाजन टन्‍-टन-टन्‍ ...

अरे, भलि फाम ऐ, यार! आज छुरमल ज्यूक थान लिपण छ। कतु दिन है गईं। एकादशि-पुन्यूं त आब याद नि रूनि। जै दिन करि सक। देवताक थान भै। लिपाई-घसाई करि दी, द्यू जगै दी। ऐपण-सैपण म्यार कयां कि हुनी। कि राय छ तेरि? हिट, यो भुंकर और चंवर देखि बेरै तु समझि गो हुनेलै। तबै लागि रौछै अघिल-अघिल। छुरमल ज्यू भै हमार गौंक द्याप्त। उनरि सेवा-टहल करण चैं। जतु ले है सकि। 

जय हो, छुरमल ज्यू! तुमरि जय हो! दैण है रया। भूल-चूक माफ करिया। देस-परदेस में जो-जां ले छन, रक्षा करिया। यो तुमर नामक द्यू जगै हैछ। सब गौं वालनै तरफ बटी। यो भुंकर बजै द्यूल- टु- ढ्वां-टू-टू-टू...। यो चंवर, यो शंख-घण्टएक फौजी छनै छ आजि तुमरि सेवा लिजी। तुमी भया पालनहार।

देखणाछा छुरमल ज्यू, यो घण्टिन कें? कतु घण्टी छन! टन्-टनन‍-टनन्‍ ...यो वालि ठुलि घण्टी अमेरिका वालनलि चढ़ै राखी...टन्न-टन्न-टन्न... यो दिल्ली वाल लाईं... टन-टन-टन..यो लखनऊ वाल चढ़ै गईं... यो मुरादाबाद वाल लाईं... वां बणनेर भै पितला घण्टी... और, पार उ जो मलि-मलि बादि राखी, वीकें बम्बई वाल दी गईं। आब त मुम्बई कूनी क्याप। वी तरफ वालि आगरा वालनैकि छ...।  कतु जागनाक नौं पाड़ूं! चार-पांच या आठ-दस हुना तो बतै ले दिन्यूं... टन-टन-टन-टन.... चारों तरफ घण्टी-घण्टी छन, नई-पुराणि। कां-कां नि पुज हमार गौं वाव। जतु ठुलि घंटी, उतु ठुल मैंस। घण्टी बतूनेर भै उनरि बरकत। परदेसै जै बेर हुनेर भै पहाड़िनै बरकरत। पै, तुमन कें भुलि जै कि गईं। आपण द्याप्त कें को भुलि सकौं! आब कभतै भूल-चूक है गई त हारी-बीमारी में फाम आई जानेर भै तुमरि। तब तुमर नामक उचैण धरनेरै भै। मौक मिलण पर पुज-पाठ करि घण्टी चढ़ै जानेर भै।

शेरुआ रे, सुणणौछै तु ले? छुरमल ज्यू थै आशीष मांगण भै कि ईश्वरौ भगवान, देस-परदेस में सबनकि कुशल करिया, भल करिया। द्वी-चार साल में मौक मिलण पर एक बार ऊंनै छन बिचार। और, जो लाचारी में नि ऐ सकन तुमार थान जाणै, मोटर सड़क बटी चार मीलौ उकाव सितुल जै कि भै, उं ले कैका हाथ भेजि दिनी तुमरि भेट-दक्षिण। सड़क जाणै मोटर-कार ऐ जानेर भै। वैं बटी जोणि जानी हाथ कि प्रभू भूल-चूकै माफी दिया, तुमार थाण जाणे नि ऐ सकना, शरीरै लाचारी छ। यो भेट, यो पोखव स्वीकार करिया। परदेस में हमर जतन करिया।

होय रे, शेरू, द्याप्त यां बैठीं-बैठीं सबनकि सुणनेर भै। उ जै कि जानेर भै कें। यें थापीं भै उनन कें हमार पुरुखनलि। यें भै उनर वास। मैसनै चारि द्याप्त जै कि जानेर भै परदेस!

हाय, किलै भुकणौछै मलि कै चै बेर? क्वे नि ऊंन यां। अच्छा-अच्छा, उ धुंड्‍.-माट देखणौछै? स‌ड़क बणनै, यार! बतै तो हाछी तुकें। पहाड-काटणई मजूर। डायनामाइट लगै बेर फोणनई पहाड़। सरकार बणूनै त सड़क। त्यार भौं-भौं करियलि बंद नि हो यो काम। चणी रौ। ठीकै भै, सड़क बणि जाली त हमार गौं ऊंण जरा आसान है जाल। यो सड़कनलि मैसन कें भ्यार ल्हिजाणक काम खूब करौ। कि पत्त आब यो सड़कलि क्वे वापस फरकंछ। एक ले बंद कुड़िक द्वार खुलि सका त एक गास त्यर ले बढ़ि जाल। कस भै? छुरमल ज्यू हो, म्यार शेररुवाक एक गास बढ़ै दिया, हां!

हिट, आब गौंक फ्यर लगूनूं। आज कै तरफ जाण छ? बेली त मायाराम ज्यूक यां गयां। उनर पटाड्‍.ण साफ करौ। कस बांज पड़ि रौछी। मायाराम ज्यू कें साफ-सफै भौत पसन्द भै। पाथरन कें ले चमकै राखंछी। आब म्यार कया उस कां है सकौं...। कां लागि रौछै वी तरफ? अच्छा, नारायण कका यां जानू कुणौछै? हिट पै, हिट। आज नारायण ककाक पाख देखि ऊंनू। पाथर रड़ि गो हुन्याल। पोरी बेर चौमास में पाख च्वीणौछी। मकान कें देखभाल चैंछ। पाख च्वीण बैठो त पाणि दार पैठ जांछ। पाणि भै दारक दुश्मण। हिट, आज उनार पाथर पजोरि दिनूं। ठीक फाम करी त्वील, शेरुआ! पाख ठीक रौलो त दार बचि रौल, कुड़ि बचि रौलि। कुड़ि बचि रौली त मैंसकि फरकणैकि आस्‍ बचि रौलि।

ओहो, शेरुआ, यां तो कतुकै पाथर गजबजी रईं, रे! रड़ि रईं अपणि ठौर बटी। टुटि ले रईं क्वे-क्वे। तबै पाख च्वीण रौ। टुटी पाथर बदलि द्यूं। धुरि में तबै धरि राखनी थ्वाड़ पाथर। आब यो कसिक पत्त लागल कि पाणि कां बटि पैठणौ भितेर? शेरूआ, तु यतु कामक ले नी भये कि भितेर बटी एक जांठलि ठक-ठक करि दिनै जां पाणि च्वीणाक दाग पड़ी हुन्याल। मी मलि बटि समझि जान्यूं कि वां पाथर रड़ि रईं कै। आब यसीकै देखण पड़ल। यो पाख बचूंण होल शेरुआ। आपण गौंकि, आपण बिरादरकि कुड़ि भे।

नारायणका ले जोरदार मैंस छी, यार। तु कि जाणनेर भये। भौत पुराणि, म्यार नानछनाकि बात भे। यो कुड़ी दारा तें उनूलि बिशन सिंहक टुणी बोट काटि दे। औरी झगड़ मचि गे। तमाश है गे। फिर पंचैत बैठी। पंचना कौण पर नारायणकालि बोटाक डबल और जुर्मान भरि दे। बाद में पत्त चलौ कि नारायणका कें टुणी कै दार चैंछी। बिशन सिंह आपण बोट दिणै तें राजी नी छी। तब नारायणकालि एक दिन, जब बिशन सिंह कें जै रौछी, वीक टुणी बोट गिनै दे। टुणी दारा लिजि यस प्रपंच रच नारायणकालि। टुणी लाकड़ हुनेर भै भौते मजबूत। सौ-सौ साल के हुनेर नी भै येकें। देख ले, आज जाणै उस्सै छ यो दार। एक्कै पाणी नि पैठण चैन। तबै बीच-बीच में पाथर पजोरन जरूरी भै। जरूरी त शेरू, धुंड्‍. ले भै। रतै-ब्याव चुल जगाय, धुंड्‍. लाग, तब मकान सांस ल्हिनेर भै। आब यां को जगाओ चुल! हफ्त-दस दिन में एक बार सगड़ में आग जलै बेर हमि कि करि सकनूं?

अच्छा, त्यार तास मौज है रईं रे शेरू! मेहला सेव बैठ रौछै ठाठलि। मी यां पाख में घाम में भुटी गयूं। बैठ रौ, बैठ रौ, शेरू। मी ले ऐ गयूं तैं। त्यार दगाड़ सेव बैठ बेर एक बीड़ि खै ल्हिनूं। कस होल? बीड़ि ले सगीण रै क्याप! भोल जूंल बजार। राशनै दुकान में ग्यूं-चावो ले ऐ गो हुन्याल। गुड़-तेल ले लूणै भै...। तसी के चाणौछै मीकें? बजारै कौ त र्‍वाट–भात खाण रौछै तु। यो बांज गाड़न में के होल कै है रौछै!     

हिट आब, दोफरि है गे। द्वि दिन बै र्‍वाटै खाण रयां। आज भात पकूनुं। छां हुनी त झोइ पकाईन। झोइ-भात खाईं ले एक जमान है गो। झोइ-भात सुणि बेर ततु लम्ब जिबड़ नै गाड़। यो बांज गोठन बै दूद-दै-छां आल कै ठारि ल्हि रौछै? भट ला रैछ्यु पछिल म्हैण लछम सिंहै दुकान बै, जब पिनशन ल्हिण हुं गेछ्युं। वीक बणूंनु चुड़काणि। कें गनरैण धरीं हुनेली छौंक लगै द्यूंल्। यस बखत आय रे शेरू, भट-मडु ले मोल ल्ही खाण रयां! के कईं जां...। बाड़ में उगला पात है राछी, टपकी बड़ै द्यूंल्। ब्वै त पिनालु ले राखछी, बैगण ले राखछी, पै बानर-सुंगरना ख्वार आग लागि रौछ। के रूणै नि दिन। कां बै आ हुन्याल सुंगर? नानछना हमुलि इनर नामै सुणी नि भै। मैस भाजि गया त सुंगर-बाघ-भालुना कै राज हुण भै।   

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ओ हो, शेरू! यो कि भौ रे? कभत ढईणौ यो शोबदाक कुड़! शिबौ! बेली ब्याव जाणै त ठीकै देखीणौछी... च्च-च्च-च्च। रात में ढईणौ शैत। त्वील ले के भौ-भां नि करि। नि चिताये? खन्यारि है गे रे, शोबदा तुमरि ले कुड़ि। साल भरि में यो अठूं खन्यार छ। हिसाब लगै राखौ मील। शेरुवा, आब दुकान नि जईन आज। मन उदासी गो बज्यूण। इनार गोल्ल ज्यू ले च्यापी गई क्याप! चानू धैं, कि पत्त हाथ ऐ गया जब! जाग-जाग, तु कां जाणौछै वां? यथ कै औ। क्वे ढुंग फरकलो वैं क्वांक्कि है जालि तेरि। ये बाट औ, यां देखीणौ भितेर जाणौ बाट्। मील पैलिए कै हाछी शोबदा च्यालन थें। वी साल द्याप्त पुजण ऐ रौछी। ठुलकि घरवाइ बीमार रूंछि। नानैकि चेलिक ब्या नि ठैरीणौछी। तब आईं पूछ करण हूं। मील तबै कै हाछी कि यारो, तीन भै छौ, छुरमल ज्यूकि कृपालि दिल्ली, आगरा में भल कमूणौछा। कभतै यो कुड़ि सुदारि जावो। पाथर त मिलनेर नि भै आब, पाख में टीन खिति जाओ। दार ठीकै छा आजि तुमर। टीन पड़ि जालो, कुड़ि बचि रौलि। हां-हां, करते हैं-करते हैं, कै गईं। फिरि पलटि बेर नि चाय। आज न्हैगे यो कुड़ि। आब कि सुदारछा!

शेरुवा, तु त तब छियै नि जब शोबदा कें जाण पड़ौ यो गौं छोड़ि बेर। यकलै भै बुड़ और बीमार ले रूंछी। यै मरुंल कूनेर भै मगर ठुल च्यल उठै ल्हि गो आपण दगाड़ दिल्ली। वैं मरौ। शिबौ, जाण बखत कसि डड़ा-डाड़ करि गो। सौ रुपें नोट थमै गोछी म्यार हाथ में कि आनंद भुला, रोज ब्याव कै गोल ज्यू थान में एक बात जगै दिए म्यार नामक। परदेसक रूंण भै, द्याप्तै की आस भे। मील पुर द्वी साल बात जगा रे शेरू, उनर नामक। कब जाणे करछ्युं! यां सबनाकै द्य्याप्त यकलै रै गईं रे!

ओ हो, बुं तरफ बटी पाख में पाणि पैठौ क्याप्। तबि सड़ौ दार। वां नि जा कूण रयू, सुणनौछै? हिट भ्यार कै, नि देखीणाय इनार गोलज्यू। माफ करि दिया हो गोलज्यू, यो खन्यार में कां च्यापी रौछा कि पत्त। जां छौ, वें पड़ि रौवो। द्याप्त भया तुमि, मनखीक मजबूरी जाणनेरै भया। शोबदाक नांतिनन ले माफ करिया। उनर ले कि दोष। दुन्नीक रीतै यसि चलि गे।        

कि कूंछै शेरू, जानूं दुकान तक? घाम लागल, पै माठू-माठ ऐ जूल ब्याव जाणै। यां ले कि करण है रौ हमुलि। हिट।

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पटै बिसै ल्हिनू यार शेरू, झिट घड़ि। बुड़्‍याकाव भै आब। धार ले यो विकट छु। पचीसेक किलो सामव ले भये। तु त सिद्द हिट दिणौछै! तेरि जाग बाकर हुनो त वीक पुठ में धरि दिन्यू मणी बोज्। अरे नै यार, नै, तु रिसाये झन। खालि खेल कार मील। बाकरक के भरोस्। बाघ कब्बै टपकै हालन वीकें। म्यारा त्वी येर बखतक दगड़ू, म्यर सुख-दुख सुणि दिणी। आ, पार उ बुड़ बांजा सेव बैठ जानूं। कां बै आ हुनेल सल्यूणि में इकलकट्ठू बांज! ना, पैली यो बांजाणी छि बल। साला बोटनैलि खै दे पुरि बांजाणि। एक योई बांजौ रूख बचि रौ। हमरी चारि लड़ल यो ले जब जाणे लड़ि सकल। ले, यो बिस्कुट खा। भल लागने तुकें, तबै मोल लायूं।

दुकानदार लछम सिंह के कुणौछि, सुणी त्वील? कां बै सुणनेर भये तु! सड़क में पुजते ही लागि जानेर भए उ कवुलिक पिछाड़ि। उ ले त्यर बाट चै रूंछि। तुकैं देखि बेर कसि पुछड़ हिलानी ऐ जें! पै कां बै सुणनेर भए तु हमरि बात।

कतु बरस है गईं, हर बखत योई कूनेर भै लछम सिंह कि आनंद गुरू, उजाड़, बांज गौं में किलै पड़ि रौछा? क्वे मुख बलाणी ले नि भै। म्यर जवाब तु जाणनेरै भये- छ त यो म्यार दगड़ू, शेरू! हंसि दिनेर भै लछम सिंह- तुमर जस मनखी नि देख हो आनंद गुरू! बांज गौंक पहर में बैठ रौछा। जाणी क्वे लौटणी हो! क्वे नि फरकन आब। यतु साल पल्टण में रौछा। कें तलि शहरन में बणै ल्हिना मकान्। हल्द्वाणी में लगै ल्हिना द्वी कम्र। सबै फौजी तसै करनी। मैंस गौं छाड़ि-छाड़ि बेर तली हुं जाणईं और तुमि इकलै बैठ रौछा उ उजाड़ गौं में। ब्या तुमील कर न्हांति, एक भै छि त उ भौत पैली गुजरि गय। नानतिन वीक लखनौ बसि गाय। जब जाणै द्वि-चार मौ छि गौं में तब जाणे त ठीक छि। मुख बलाण बाट छि। आब किलै बैठ रौछा वां? पगालना चारि बांज कुड़िन में धुंड्‍. लगूंछा, कैका पाखा पाथर पंजोरि दिंछा। तसी कै बचंछौ गौं? क्या, तुमि ले...! यें ऐ जाओ धैं सड़का तिर, मनखीक मूख तो देखला।

मगर शेरू, आज लछम सिंहलि दुहरी बात कै दे। कूण बैठो- आनंद गुरू, तुमार गौं बार में एक खबर सुणी। सुणी कि, अखबार में छपि रै छी, त सही हुनेलि। तुमर जो गौं छ मल्लासेरा, अब खालि है गय। नै-नै, तुमि भया मगर एक तुमरि कि गणती भे! मल्लासेराकि जमीन सरकार एक कम्पनी कें दिणै बल। क्वे भ्यारकि पराभेट कम्पनी छ बल, यां इस्कूल खोललि। सुंदर जाग भे तुमार यां। सामणि हिमालय देखीनेर भै। इस्कूल होल, हॉस्टल होल, स्टेडियम ले होल बल...। देस-बिदेसाक अमीरना नानतिन पढ़ाल। क्याप-क्याप लेखि राखछी अखबार में। तुमार यां जाणै सड़क ले तबै बणणै बल।

के कूंछै शेरू, हमार गौं में इस्कूल बणौल तो भलै भै क्याप? नानतिन आल, खूब कलाट कराल। गौंकि उदासि मिटि जालि। नि भयो? त ट्यढ़ मूख किलै करणौछै? तुकैं भलि नि लागी यो खबर? आजि खांछै बिस्कुट? खा यार, त्यार लिजि त लायूं। हिट आब, न्है जानू। चहा अमल ले है गो।

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कि भौ शेरू, यो अधराति में किलै उठछै? कि भौ?... ओ हो, फिरि बघैन...। यो बाघ त्यार पछिलै पड़ि गो यार। रोज रात में लगूणौ फ्यार्। पड़ि रौ चुपचाप। द्वार पट्ट बंद छन। पड़ि जा।

मी कें कि सोच पड़ि रईं, बतू तुकें? लछम सिंहै बात रिटि रै मन में। दिन में त मील त्वीथें कै दे कि  गौं में इस्कूल खोलल त भलि भै कै। फिर ब्याव बटी बड़ि खुद-बुद लागि गे मन में। सरकार हमरि जमीन पराभेट कम्पनी के दी देली त हमर गौं कां रै जाल? जमीन जै न्है गई त कि बचल? यो गाड़-भिड़-इजर भै तबै हमर गौं ले भै, बांजै सही। नि भयो? पराभेट कम्पनी खै जालि गौं कें। के नि बचौ। यो सोच पड़ी बै बड़ी फिकर है गे। ये में के भलि बात नि भे यार। आफत भे यो, भारि आफत। तबै नीन भाजि गे।

आज जांलै मी कें यो फिकर है रैछी कि यो बाघ तुकें खै जालो त कि होल। आब और ले ठुल बाघ ऐ जाल। हम सबन कें, हमर गौं कें खाणी बाघ। किलै दिणै हुनेलि सरकार यो जमीन पराभेट कम्पनी कें? त कसि सरकार हुनेलि रे शेरू, जो हमनै कें खाण रै? त सराकर ले एक बाघ है गे। पराभेट कम्पनी ले बाघै भे।

बाघै-बाघ है गईं रे शेरू, चारों तरफ़। पैली एक विकासक बाघ आ। उ शहरन में रूं बल। विकासौ बाघ गौनन खै गो, कुड़िन बांजि करि गो। जस ले छि पै, गौं छि। जमीन बची छि। कभै त क्वे फरकन। आब दुसार बाघ ऊण रईं। उ हमार गौं कें नेइ जाल। हमरि जड़ै उपाड़ि जाल। यस अन्यो!

डर लागणै तुकें? नै-नै डर नै यार! के होल डरि बेर?

भोलै जानूं लछम सिंहा यां। उ जो छ नै तेरि कउलि, सड़क में...। हा-हा, नाम सुणि बेरै त्यार आंखन में कसि चमक ऐ गे! लछम सिंह थें मांगि लूनूं उ कउलि कें। वी दगड़ि करुंल त्यर ब्या। कस भै? आठ-दस प्वाथ ले पैलि फ्यार में है गया, त गौं में है जालि रौनक। क्वे यां बै करल कूं-कूं, क्वे वां बै करल भौं-भौं...। हकाहाक है जाल गौं में।

एक टुक्याव तो मारणी भे पै!

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(पहरू, दिसम्बर, 2020 अंक में प्रकाशित)

     

      

Saturday, February 27, 2021

मानसिक मंदित बच्चों के स्नेही अभिभावक सुरेश पंत नहीं रहे

 

गुरुवार, 25 फरवरी, 2021 को सुरेश चंद्र पंत के निधन के साथ मानसिक मंदित बच्चों को सम्मानजनक और आत्मनिर्भर जीवन जीने की राह दिखाने वाला एक समर्पित इनसान इस दुनिया से उठ गया। 91 वर्षीय श्री पंत पिछले कुछ समय से अस्वस्थता के कारण मुम्बई में अपने बड़े बेटे के पास रह रहे थे। देह दान के उनके संकल्प के अनुसार उनकी पार्थिव देह मुम्बई के एक अस्पताल को दे दी गई। कुछ वर्ष पहले उनके छोटे बेटे मुकेश का निधन हुआ तो उसकी देह भी लखनऊ मेडिकल कॉलेज को दान दी गई थी।

 मुकेश मानसिक मंदित बालक था। पंत दम्पति उसे बेहतर जीवन जीने लायक और यथासम्भव आत्मनिर्भर बनाना चाहते थे। वे देखते थे कि ऐसे बच्चों के माता-पिता अपनी किस्मत को कोसते रहते हैं और हताशा में अपने बच्चों को मार-पीट व डांट-डपट से ठीक करना चाहते हैं। इसलिए उन्होंने ऐसे बच्चों और उनके अभिभावकों के लिए प्रशिक्षण केंद्र या स्कूल खोलने का सपना देखा। कुछ अन्य मानसिक मंदित बच्चों के अभिभावकों के साथ मिलकर एसोसिएशन का गठन किया जिसका नाम है- यू पी पेरेण्ट्स एसोसिएशन फॉर द वेलफेयर ऑफ मेण्टली हैण्डीकैप्ड सिटीजेंस

 1989 में नाबार्ड के मुख्य महाप्रबंधक पद से रिटायर होने के बाद सुरेश पंत जी ने अपनी जीवन संगिनी मोहिनी पंत के साथ लगकर 'आशा ज्योति' स्कूल शुरू किया। शुरू में सिर्फ चार बच्चे थे। इस दम्पति की लगन और समर्पण से वह शीघ्र ही मानसिक मंदित बच्चों और उनके अभिभावकों के लिए एक नई रोशनी बनने लगा।

 आशा ज्योतिमें  न केवल मानसिक मंदित बच्चों को आत्म निर्भर बनाने बेहतर जीवन जीने का प्रशिक्षण दिया जाता है, बल्कि उनके अभिभावकों को प्रशिक्षित करने में और भी अधिक ध्यान दिया गया। मुख्य बात यह है कि अधिकतर अभिभावक समझ ही नहीं पाते कि ऐसे बच्चों से कैसा व्यवहार करें, उन्हें कैसे पालें। हैरान-परेशान और अपनी किस्मत को कोसते अभिभावक ऐसे बच्चों का ही नहीं अपना जीवन भी नारकीय बना लेते हैं। पंत जी ने मानसिक मंदित बच्चों के लालन-पालन शिक्षण के लिए डॉक्टरों, मनोचिकित्सकों और विशेषज्ञों की सलाह से मानवीय और वैज्ञानिक तरीका अपनाया। इस तरह ये अपना काम स्वयं करने लगे, समझदार बने और परिवार में मिल-जुल कर शांति से रहने लगे। इस पहल ने मानसिक मंदित बच्चों और अभिभावकों को नई राह मिली। उनका जीवन सहज होना शुरू हुआ।

 बच्चे बढ़े तो पंत दम्पति ने स्कूल के लिए किराए का एक मकान लिया लेकिन पड़ोसियों ने 'पागलों का स्कूल' खोलने पर आपत्ति करनी शुरू कर दी। दुखी होकर पंत जी ने अलीगंज, लखनऊ का अपना मकान बेच दिया और आवास-विकास परिषद से इंदिरा नगर में एक भूखण्ड खरीद लिया। उसमें कुछ कमरे बनवाए। इस तरह 'आशा ज्योति' इंदिरा नगर, सेक्टर-सी में शुरू हुआ और क्रमश: बढ़ता गया। सन 2006 में दिल के दौरे से मोहिनी पंत का निधन हो गया। अभिभावकों की एसोसिएशन के कुछ संवेदनशील सदस्यों के साथ पंत जी 'आशा ज्योति' को चलाते-बढ़ाते रहे। चंदा और दान के लिए दौड़ते रहे। धीरे-धीरे मानसिक मंदित बच्चों को छोटे-छोटे व्यावसायिक कामों और खेलों का प्रशिक्षण देना भी शुरू किया गया। उम्र से बड़े लेकिन मानसिक रूप से नन्हे बच्चे अंतर्राष्ट्रीय खेल स्पर्धाओं में हिस्स्सा लेने लगे। वहां से पदक जीतकर लाते तो उनकी खुशी देखते बनती। दीपावली और अन्य पर्व-त्योहारों पर उनकी बनाई अनगढ़ मोमबत्तियां, दीये, खिलौने, आदि बिकते तो उनका मेहनताना बच्चों में बांटा जाता। अपनी कमाई के चंद रुपए बंद मुट्टठी में घर ले जाते बच्चों का आत्मविश्वास देखकर जी जुड़ा जाता।

पंत जी में अपार धैर्य था। वे कभी विचलित नहीं हुए। आशा ज्योतिकी राह में आई कई अड़चनों, बच्चों एवं अभिभावकों की विविध परेशानियों और धीरे-धीरे बढ़ गए स्टाफ और प्रशासनिक ज़िम्मेदारियों को वे अत्यंत शांति, समझ और संयम से निपटाते रहे। आशा ज्योतिकी ख्याति और सफलता के पीछे उनका यही समर्पण है। पंत दम्पति आज दुनिया में नहीं हैं लेकिन 'आशा ज्योति' बहुत सारे परिवारों और जीवन की दौड़ में पीछे छूट गए बच्चों के लिए सचमुच आशा का बड़ा केंद्र बना खड़ा है।

 'आशा ज्योति' की ज्योति जलती और राह दिखाती रहे, यह ज़िम्मेदारी अब असोसिएशन की है।

 

Friday, February 26, 2021

ठगी आज का सबसे बड़ा रोजगार है

शायद ही कोई दिन जाता हो जब नौकरी दिलाने के नाम पर लोगों को ठगने की खबरें न मिलती हों। रोजाना पढ़ने को मिलता है कि केंद्र सरकार की नौकरी दिलाने के नाम पर किसी युवक से दस लाख रु ठग लिए। किसी युवती को सचिवालय में नौकरी दिलाने का झांसा देकर बारह लाख रु ठग लिए। चार युवकों को रेलवे की नौकरी दिलाने का लालच देकर दस-दस लाख रु ठग लिए। कोई पुलिस सिपाही बनने के लिए तो कोई सीधे दरोगा बनने के लिए आसानी से ठग लिया जाता है।

ठगों के पास तरह-तरह के लुभावने प्रस्ताव होते हैं। कोई अपने को किसी मंत्री का रिश्तेदार बताता है। कोई मुख्य सचिव के हस्ताक्षर से नियुक्ति पत्र दिखाता है। कोई सत्तारूढ़ पार्टी के बड़े नेता से सीधे फोन पर बात करके रुतबा झाड़ता है। कोई स्वयं ही आईएएस अधिकारी बनकर होटल के कमरे में इण्टरव्यू करता है। अभी हाल में ठगों ने चार युवकों को झारखण्ड ले जाकर एक महीने की ट्रेनिंग भी करा दी। नियुक्ति पत्र देकर कोई सचिवालय में तो कोई दूर जिलों में जॉइनिंग के लिए भेज दिया जाता है।

कुछ बातें बहुत साफ उभरती हैं। पहली यह कि बेरोजगारी रेगिस्तान की तरह फैलती जा रही है। हर तरफ बेरोजगारों की भीड़ है और वे एक अदद नौकरी के लिए मारे-मारे घूम रहे हैं। इसलिए वे बहुत आसान शिकार हैं। नौकरी पाने की लालसा इतनी तीव्र है कि पढ़े-लिखे या डिग्री धारी होने के बावजूद वे झांसे में आ जाते हैं। कई बार यह जानकर भी कि ठगे जाने की आशंका बहुत अधिक है, वे नौकरी पाने की क्षीण आशा में भरोसा कर जाते हैं। दूसरी बात यह कि सरकारी नौकरी का बहुत बड़ा आकर्षण है। बेरोजगार व्यक्ति कर्जा लेकर, खेत या गहने बेचकर या किसी भी तरीके से जुगाड़ करके दस-बीस लाख रुपए ठगके हाथ में रख देते हैं क्योंकि सरकारी नौकरी का वादा होता है। रेलवे जैसी केंद्रीय सरकार की नौकरी का लालच सबसे अधिक दिया जाता है। ठगे गए कई लोग निजी क्षेत्र में नौकरी कर रहे थे लेकिन सरकारी नौकरी के लिए लगातार प्रयास में लगे थे।  

तीसरा तथ्य यह है कि हर बेरोजगार नौकरी पाने के लिए किसी तगड़ी सिफारिश, किसी विश्वस्त दलाल और घूस लेकर नौकरी दिलाने वाले किसी सहीव्यक्ति की तलाश में रहता है। सीधे रास्ते पर किसी का भरोसा नहीं। बिना लाखों रु दिए नौकरी मिलेगी नहीं, यह सब मानते हैं। चौथी बात यह कि ठगने वाले खुद बेरोजगार हैं और उनमें कई स्वयं ठगे जा चुके हैं। नौकरी पाने की उन्होंने इतनी तिकड़में की, इतने रास्तों से गुजरे कि शातिर ठग बनना उनसे सध गया। आए दिन नए ठग पैदा हो रहे हैं। वे ठगी के नए-नए विश्वसनीय तरीके खोज लाते हैं।

ऑनलाइन ठगी खूब फल-फूल रही है। रोजाना लोगों को बेवकूफ बनाकर उनके बैंक खातों से बड़ी रकम उड़ाई जा रही है। जादू की तरह ठगी हो रही है। फोन मंगाइए तो अन्दर से साबुन निकलता है।ईमेल पर लॉटरी निकलने की सूचना मिलना पुरानी बात हो गई। अब हार्वर्ड जैसे विश्वविद्यालय में नौकरी मिलने की खबर पाकर बड़े-बड़े सूरमा ठग लिए जाते हैं। ठगों से बड़ा मनोविश्लेषक और कौन होगा! 

ठगीआज का सबसे बड़ा रोजगार है। हमारे चारों तरफ ठग हैं। यह बात अपराध जगत के लिए ही नहीं, बाजार, तकनीक और राजनीति के लिए भी बराबर सत्य है। बस, एक फर्क है। राजनीति में ठगे जाने की शिकायत जनता नहीं करती। वह तरह-तरह से ठगे और बरगलाए जाने के बावजूद फिर-छले जाने के लिए खुशी-खुशी प्रस्तुत हो जाती है।

(सिटी तमाशा, नभाटा, 27 फरवरी, 2021)

   

Friday, February 19, 2021

हमारे पुलिस थाने और महिला शौचालय

1970 के दशक से पुलिस में महिलाओं की भर्ती शुरू हुई थी। 1972 किरन बेदी पहली आईपीएस अधिकारी बनी थीं। एक साल बाद दूसरी आईपीएस अधिकारी कंचन चौधरी भट्टाचार्य कालांतर में उत्तराखण्ड की पहली पुलिस महानिदेशक बनीं। सिपाही से लेकर महानिरीक्षक स्तर की महिला पुलिस अधिकारी यहां आनुपातिक रूप से कम, लेकिन गिनाने को काफी हैं हालांकि उत्तर प्रदेश को अभी पहली महिला पुलिस महानिदेशक बनने की प्रतीक्षा है।

यह पृष्ठभूमि देने का संदर्भ यह है कि सन 2021 में, महिलाओं की पुलिस में भर्ती शुरू होने के कोई पचास साल बाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने प्रदेश सरकार को निर्देश दिया है कि राज्य के सभी थानों में महिला शौचालय तत्काल बनवाए जाएं। इलाहाबाद के कुछ विधि छात्रों ने इसके लिए अदालत में जन हित याचिका दायर की थी।

बड़े शहरों के कुछेक थानों को छोड़कर प्रदेश के पुलिस थाने आज भी बदहाल हैं। राजधानी लखनऊ में ही कई थानों में सिपाही बरामदे या पेड़ के नीचे बसेरा करते और खुले में नहाते दिख जाते हैं। दूर-दराज के पुलिस थानों की स्थिति और भी दयनीय है। ऐसे में महिलाओं के लिए पृथक शौचालय बनवाने के बारे में कौन सोचता। अदालती आदेश के बाद अब कुछ हलचल होगी। वैसे, अदालत को आश्वासन देने या थोड़ा बहुत काम करके आदेश की खानापूर्ति कर लिए जाने की परिपाटी यहां अधिक दिखती है।

महिला सिपाही किन स्थितियों में काम करती हैं, इसकी बानगी पिछले साल दो वायरल तस्वीरों में खूब दिखती है। पहली तस्वीर नोएडा की थी, जहां मुख्यमंत्री के दौरे के समय सिपाही  प्रीति रानी अपने नन्हे बेटे में गोद में पकड़े वीआईपी ड्यूटी में तैनात थी। यह तस्वीर खूब वायरल हुई और तब सवाल उठे थे कि थानों में शिशु गृह (क्रेच) क्यों नहीं बनवाए जाते। फिर झांसी के एक थाने की सिपाही अर्चना सिंह की फोटो वायरल हुई जिसमें वह अपनी दुधमुंही बिटिया को मेज पर लिटाकर काम में व्यस्त थी। सोशल मीडिया की अति-सक्रियता के इस दौर में इन महिला सिपाहियों की कर्तव्य परायणता की प्रशंशा हुई और पुलिस प्रशासन की भर्त्सना। अर्चना की फोटो देखकर पुलिस महानिदेशक ने तत्काल उसका तबादला उसके घर के पास करवा दिया और यह भी घोषणा की थी कि वे क्रेच बनवाने की व्यवस्था कराएंगे।

सोशल मीडिया में जितनी तेजी से मुद्दे उठते हैं, उतनी ही शीघ्रता से भुला भी दिए जाते हैं। महिला सिपाहियों की सुविधा के लिए क्रेच बनवाने की बात अब तक पुलिस महकमे के ज़िम्मेदार भूल गए होंगे। अब जनहित याचिका के बहाने थानों में महिला शौचालय न होने का मुद्दा उछला है। गोद में बच्चा लेकर वीआईपी ड्यूटी करती या मेज में बिटिया को सुलाकर काम करती महिला सिपाहियों की फोटो की तरह शौचालय का मुद्दा वायरल नहीं हो सकता। इस मुद्दे में वह अपीलन मुख्य धारा के मीडिया को दिखती है न सोशल मीडिया के अति सक्रिय हरकारों को। तो भी अदालती चाबुक के कारण शायद कुछ पुलिस थानों में महिला शौचालय बन जाएं।     

पुलिस थाने ही क्यों, ऐन लखनऊ में ही कई सरकारी कार्यालयों में महिलाओं के शौचालयों का कोई पुरसा हाल नहीं है। गंदे शौचालयों से महिलाओं को संक्रमण होने शिकायतें आम हैं और डॉक्टर इसकी पुष्टि करते हैं। शौचालय जाने से बचने के लिए दिन भर पानी न पीने वाली कामकाजी महिलाएं अपना दर्द आपस में ही कह पाती हैं। जरा-जरा सी बात पर नारे लगाने वाले कर्मचारी संगठन भी इसे मुद्दा नहीं बनाते। यह समझ और सम्वेदना की बात है।

महिलाओं के लिए साफ-सुथरे, सुविधा युक्त शौचालय कितने आवश्यक हैं, यह वही व्यवस्था समझ सकती है जो अत्यंत संवेदनशील हो। पुलिस विभाग तो वैसे भी सर्वाधिक संवेदनहीन माना जाता है। (सिटी तमाशा, नभाटा, 20 फरवरी, 2021)           

 

   

Saturday, February 13, 2021

स्कूल जाते बच्चों की खुशी और हीनता ग्रंथि

कोरोना काल की लम्बी बंदी के बाद स्कूल खुले हैं। कोई ग्यारह मास बाद कक्षा छह-सात-आठ के बच्चों को स्कूल जाते देखना सुखद था। वे बड़े उत्साह सें जा रहे थे। उनके चेहरे की खुशी मास्क के छुपाए नहीं छुप रही थी। आंखों में चमक थी। स्वाभाविक ही यह उमंग पढ़ाई के लिए नहीं थी। दोस्तों, टीचरों से मिलने और एक सुपरिचित वातावरण में निश्चिंत होकर भाग-दौड़ करने की ललक सबसे अधिक रही होगी। लम्बी कैद के बाद आज़ादी की अनुभूति।

कोरोना का प्रकोप आंकड़ों में कम होता दिखता है लेकिन निश्चिंत होने का समय नहीं है। आशंका बनी हुई है कि संक्रमण कभी भी बढ़ सकता है। केरल समेत कुछ राज्यों में बढ़ा हुआ है। यूं, सारी गतिविधियां लगभग सामान्य रूप से चलने लगी हैं। सिनेमा हॉल भी पूरी क्षमता से चल गए हैं। बाजारों में भीड़ पहले की तरह उमड़ रही है। जनता आवश्यक सावधानियों का पालन नहीं कर रही। प्रशासन ने भी जैसे हाथ-पैर छोड़ दिए हैं। ऐसे में कई अभिभावकों का संकोच या डर गलत नहीं है।

तो भी, बड़ी उमंग से स्कूल जाते बच्चों को देखना आश्वस्तिदायक है। यह स्थितियों के सामान्य होते जाने का भरोसा-सा देता है। हमने एक परिचित अध्यापक से पूछा- इतने लम्बे समय बाद बच्चों से मिलना कैसा लगा?’ उत्तर देते हुए उनकी आंखें जैसे भर आईं- ऑनलाइन क्लास होती थी लेकिन बच्चों को सामने देखने और सुनने की बात ही और होती है। हर बच्चा कुछ न कुछ अजब-गजब बताने को व्याकुल था। कोरोना ने उनके मनोविज्ञान पर असर डाला है।

मनोविज्ञान पर तो लगभग सभी के असर पड़ा है। कोई सिर्फ घर में कैद रहने के कारण मनोरोगी बना तो कोई मृत्यु कै भय से। जिनकी नौकरियां चली गईं, वेतन कटौती हो गई और ज़िंदगी की गाड़ी को किसी तरह खींचते रहने के लिए जो दिन-रात परेशान हैं, उनके मनोविज्ञान को कौन देख रहा है? यह सुनते ही टीचर जी गम्भीर हो गईं। कहने लगीं कि कुछ बच्चे जो ऑनलाइन पढ़ाई के लिए स्मार्ट फोन नहीं जुटा सके या देर से इंतज़ाम कर सकें, स्कूल आने की खुशी के बावजूद उनके भीतर कुण्ठा पहले ही दिन से दिखने लगी है। एक तो पढ़ाई में पिछड़ने का बोध और दूसरे स्मार्ट फोन न होने की हीनता ग्रंथि।

याद आया कि ऑनलाइन पढ़ाई के शोर में कुछ खबरें यह भी बता रही थीं कि निजी स्कूलों के भी चौथाई से अधिक  (एनसीआरटी के सर्वे में 28 फीसदी) बच्चों को स्मार्ट फोन या लैपटॉप की सुविधा उपलब्ध नहीं थी। कई घरों में सिर्फ एक मोबाइल था जिससे माता-पिता और बच्चे किसी तरह काम चला रहे थे।सरकारी स्कूलों में तो कहीं-कहीं नब्बे फीसदी बच्चे फोन, लैपटॉप, इंटरनेट या बिजली के बिना थे। फोन के लिए घरों में बच्चों ने माता-पिता से झगड़े किए। किशोर वय बच्चों के मानस पर इसका असर पड़ना अत्यंत स्वाभाविक था।

कोरोना ने सिर्फ शारीरिक एवं मानसिक रूप से ही बीमार नहीं बनाया, असमानता और उससे उपजा हीनता बोध भी बढ़ाया। पिछले महीने ही वह रिपोर्ट आई थीं की कोरोना काल में भी देश के अमीरों की सम्पत्ति कई गुणा बढ़ गई। जब बेरोजगार कामगार मीलों पैदल चलकर अपने गांव लौट रहे थे, जब नौकरियां जा रही थीं, जब बहुत सारे घरों में चूल्हे बुझ रहे थे, तब देश के अमीर और अमीर हो रहे थे। उसी दौर में कई बच्चे अपनी गणित या भौतिकी का ऑनलाइन पाठ नहीं पढ़ पा रहे थे क्योंकि वे फोन और नेट कनेक्शन से वंचित हैं।

जिस नव उदारवादी नीतियों पर देश आगे बढ़ रहा है उसमें गरीब-गुरबों के लिए जीवन निरंतर कठिन और मारक होते जाना है।

(सिटी तमाशा, नभाटा, 13 फरवरी, 2021)             

Friday, February 05, 2021

किसान बहस के केंद्र में हैं लेकिन किस लिए?



सुबह दूध की दुकान पर जबर्दस्त बहस छिड़ी हुई थी। कुछ बूढ़े
, कुछ प्रौढ़ और दो-तीन युवा पॉलीथीन के थैलों में दूध के पैकेट लिए घर जाते-जाते बहस में उलझ गए थे। जैसा कि इन दिनों हर जगह हो रहा है, वे किसानों पर बात कर रहे थे। एक धड़ा आंदोलनकारी किसानों को  सरकार विरोधी, विपक्ष का भड़काया हुआ और देशद्रोही तक बता रहा था। बाकी लोग उन्हें नए कानूनों से उत्पीड़ित देश का अन्नदाता बता रहे थे।

आज़ादी के बाद शायद ही कभी किसान इतनी व्यापक और विविध चर्चा  का कारण बने हों। अकाल, बाढ़, सूखे और दूसरी आपदाओं के दौर में किसानों पर बहुत कम बात होती रही। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्डब्यूरो के अनुसार 1995 से अब तक करीब तीन लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं। यह आंकड़ा वास्तविकता में कहीं अधिक है। इतनी बड़ी संख्या में किसानों के जान देने के बावजूद किसान और खेती की समस्याओं से शहरी मध्य-निम्न मध्य वर्ग का कोई वास्ता नहीं है। महंगाई पर वह अपनी जेब पर बोझ के कारण फिक्र करता है लेकिन इस पर माथा पच्ची नहीं करता कि आलू-प्याज-टमाटर के भाव कभी आसमान और कभी सड़क पर क्यों आ जाते हैं। क्यों किसान बड़ी मेहनत से उगाई अपनी फसल कभी खेत में सड़ने को क्यों छोड़ देते हैं या सड़कों पर बहाकर अपना कैसा दुख दिखाते हैं।

पिछले कुछ समय से तीन नए कृषि कानूनों के विरोध में चल रहे किसान आंदोलन और दिल्ली की घेराबंदी के बहाने आज हर कोई किसानों के बारे में बात कर रहा है। अब भी बातचीत का केंद्र किसान और किसानी की मूल समस्याएं नहीं हैं। बात उनके समर्थन और विरोध के बहाने सरकार के समर्थन और विरोध की हो रही है। यह दौर ही ऐसा हो गया है कि प्रत्येक मुद्दा सरकार के समर्थन और विरोध पर आकर टिक जाता है। मूल  मुद्दे पर चर्चा ही नहीं होती।

आज बहुत बड़ी आबादी गांवों और खेती से विमुख होकर शहरों में बसी हुई है। उद्योग-धंधों के विकास, रोजगार के दूसरे अवसरों के विस्तार और तीव्र शहरीकरण ने कई पीढ़ियों को खेती-किसानी से दूर कर दिया। ऐसी पीढ़ियां हमारे बीच हैं जिन्हें शाक-सब्जियों और गेहूं-धान की पहचान नहीं रही। यह भी पता नहीं कि बाजार में बिकने वाला चावलकहां से आता है। शायद किसी फैक्ट्री में बनता होगा, हालांकि उनके बाबा-दादा किसान ही थे।

आज़ादी के बाद से ही खेती ऐसा निकृष्टधंधा बना दी गई कि किसान के बेटे जमीन बेचकर नौकरी ढूंढने शहरों का रुख करते रहे। आर्थिक उदारीकरण के दौर ने किसानों और भी नुकसान पहुंचाया। आत्महत्याओं का दौर उसी के बाद बहुत तेज़ हुआ। उपेक्षा, शोषण और क्रूर नीतियों की कहानी लम्बी है। कृषि इस देश की अर्थव्यवस्था का सबसे मजबूत आधार हो सकती थी। किसान को सर्वाधिक सम्मानित नागरिक बनना चाहिए था। विकास की वह राह हमारी राजनीति ने चुनी ही नहीं। जो राह तय की उसमें खेती मध्यस्थों के हाथों कॉरपोरेट हाथों में जानी ही है। बोने-काटने-बेचने का फैसला किसान के हाथ में नहीं रह जाना है।

शहरी मध्यवर्ग को इससे कोई सरोकार नहीं। उसके लिए खेती सुपर मार्केट और ई-कॉमर्स के रूप में उपलब्ध है। किसान का असली दर्द वह नहीं जानना चाहता। वह सरकार के समर्थन और विरोध में बंट गया है या बांट दिया गया है। जिन्हें खेती और किसान के बारे में कुछ नहीं मालूम या बहुत कम जानते हैं, वे किसानों पर सबसे अधिक जोर से बात कर रहे हैं।

(सिटी तमाशा, नभाटा, 06 फरवरी, 2021)   

 

 

 

 

 

  

  

Friday, January 29, 2021

कचरे की गाड़ी, गाना और स्वच्छता सर्वेक्षण

पिछले सप्ताह समाचार पत्रों में प्रमुखता से यह छपा था कि स्वच्छता सर्वेक्षण-2021 में नागरिक फीडबैक के मामले में लखनऊ नम्बर एक बन गया है। उसने इंदौर को पछाड़ कर पहला स्थान पाया है।मध्य प्रदेश का इंदौर शहर पिछले कुछ सालों से लगातार इस सर्वेक्षण में देश में सबसे साफ-सुथरा शहर घोषित होता आ रहा है। लखनऊ का उसे पछाड़ना बड़ी बात थी लेकिन समाचार वास्तव में सर्वेक्षण के परिणाम के बारे में नहीं था। सूचना मात्र इतनी थी कि पिछले सप्ताह तक इंदौर के नागरिकों से अधिक संख्या में लखनऊ के नागरिक इस सर्वेक्षण में भाग ले चुके थे।

हास्यास्पद ही सही यह नम्बर एक होना, लेकिन पंद्रह जनवरी तक लखनऊ के पौने दो लाख से अधिक नागरिक अपने शहर के बारे में राय दे चुके थे। उन्होंने क्या और कैसी राय दी, यह तो बाद में पता चलेगा। पिछले सर्वेक्षणों में लखनऊ वालों की भागीदारी भी बहुत कम रही थी। शहरों की साफ-सफाई की श्रेणी तय करने के लिए केंद्र सरकार पिछले कुछ वर्षों से यह सर्वेक्षण कराती है। स्वच्छता ऐप डाउनलोड करके पूछे गए सवालों का जवाब देना होता है। शामिल होने वाले नागरिकों की कुल संख्या  पर भी नम्बर मिलते हैं।

लखनऊ नगर निगम को यह श्रेय देना होगा कि इधर के वर्षों में शहर की सफाई पर काफी ध्यान दिया जा रहा है। कुछ खास इलाकों में तो सफाई कर्मी रोजाना आते हैं। उनके काम का निरीक्षण भी होता है। बहुत सारे क्षेत्र इससे बिल्कुल वंचित भी हैं या वहां कभी-कभार ही सफाई होती है। गाड़ी वाला आया कचरा निकालगीत बजाते हुए गाड़ियां कई इलाकों में घूमती देखी जा सकती हैं। सूखा, गीला और जैविक कचरा अलग-अलग रखने की व्यवस्था इन गाड़ियों में है। ये गाड़ियां कितनी मुस्तैदी ने कचरा ले जाती हैं और नागरिक कचरा देने में कितना सहयोग करते हैं, यह देखना कष्ट देता है। दोनों तरफ के पूर्ण समर्पण के बिना शहर की सफाई सम्भव नहीं।

इंदौर के साथी बताते हैं कि वहां नगर निगम का सिद्धांत और उसका अधिकतम पालन यह है कि कचरा जमीन पर गिरने ही नहीं दिया जाता। प्रत्येक घर से कचरा सीधे नगर निगम की गाड़ियों में डाला जाता है। बाजारों में कूड़ेदान नियमित रूप से साफ किए जाते हैं। नागरिकों का सहयोग सर्वोपरि है। वे अपने शहर की स्वच्छता पर गर्व करते हैं। अपने यहां मामला दोनों तरफ से उपेक्षा भरा है। एक ही कॉलोनी के अलग-अलग घरों में कूड़ा फेंकने की अलग-अलग काम चलाऊ व्यवस्थाएं हैं। नगर निगम की गाड़ियां कचरा लेने रोजाना आएंगी, ऐसा भरोसा ही नहीं बन पाया है। कोशिश भी नहीं हो रही। अधिकतर घरों से निजी ठेला गाड़ियां कचरा ले जाती हैं। खुले में कूड़ा फेंकने वाले भी कम नहीं हैं।

बांग्लादेशीकहलाने वाले श्रमिकों की बड़ी आबादी पचास-साठ से एक सौ रु तक महीना लेकर घर-घर से कूड़ा उठाते हैं। यही उनकी रोजी-रोटी है। नगर निगम ने इन्हें कभी अपने सफाई अभियान में शामिल नहीं किया हालांकि उनके ठेले में नगर निगम लिखवा दिया गया। नगर निगम की गाड़ियां जितना जोर-शोर से गाना बजाती हैं, उसका आधा ध्यान भी घर-घर से कूड़ा उठाने में नहीं लगातीं। यह जानने-समझने का कष्ट कोई नहीं करता कि नगर निगम की गाड़ियों को सभी घरों से कचरा क्यों नहीं दिया जाता।

इस बार अधिक संख्या में लखनऊ वालों ने स्वच्छता सर्वेक्षण में भाग लिया, अच्छी बात है लेकिन वे वास्तविक स्वच्छता बनाए रखने में कब भागीदार बनेंगे? नगर निगम कब यह भरोसा जीत सकेगा कि वह घर-घर से कचरा उठाने में वास्तव में गम्भीर है?          

(सिटी तमाशा, नभाटा, 30 जनवरी, 2021)  

किसान आंदोलन को तोड़ने की साजिश तो नहीं हुई थी?

गणतंत्र दिवस पर ट्रैक्टर रैली के लिए स्वीकृत पथ का उल्लंघन करके आंदोलनकारी किसानों या उनके बीच पैठे अराजक तत्वों ने दिल्ली में आईटीओ और लाल किले पर जो बवाल किया सबसे पहले उसकी कड़ी निंदा की जानी चाहिए। पिछले दो महीने से दिल्ली की सीमाओं पर शांति पूर्ण आंदोलन चला रहे संयुक्त किसान मोर्चा ने एक स्वर से इस हिंसा को अराजक तत्वों की करतूत बताते हुए इससे पल्ला झड़ा है। लोकतंत्र में शांतिपूर्ण आंदोलन और प्रतिरोध की जगह है लेकिन हिंसा और अराजकता की नहीं। उससे आंदोलन कमजोर होता है और भटकता है। छब्बीस जनवरी को नई दिल्ली में जो हुआ उससे नए कृषि कानूनों के विरुद्ध किसानों का संघर्ष, जो अब तक निरंतर मजबूत और व्यापक जन-समर्थन वाला होता जा रहा था, निश्चय ही कमजोर हुआ है।

इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना के कई पहलू हैं। उनसे कई सवाल भी उठते हैं। संयुक्त किसान मोर्चा हिंसा की सिर्फ निंदा करके नहीं बच सकता। उसकी बड़ी नैतिक ज़िम्मेदारी बनती है। ऐसा क्यों हुआ कि पिछले दो महीने से बहुत अनुशासित चले रहे आंदोलनकारी किसानों में से कई ट्रैक्टर रैली में अनुशासनहीन हो गए? खबर है कि पच्चीस जनवरी की रात टिकरी सीमा पर बने आंदोलन के मंच पर कुछ ऐसे उग्र तत्वों ने कब्जा कर लिया था जो नेतृत्वकारी मोर्चे का हिस्सा नहीं थे और किसानों को दिल्ली कूचके लिए उकसा रहे थे। अगर यह सच है तो सवाल संयुक्त किसान मोर्चा के नेताओं पर भी उठते हैं। उन्होंने इसे नियंत्रित करने और रैली को अनुशासित रखने के लिए क्या किया?

निर्धारित पथ का उल्लंघन कर लाल किले तक जाने और हिंसा फैलाने वाले आंदोलनकारीया अराजक तत्व बहुत बड़ी संख्या में नहीं थे। बड़ी ट्रैक्टर रैली निर्धारित पथ पर ही शांतिपूर्ण तरीके से निकली। बैरियर तोड़कर लाल किले की तरफ जाने की खबर फैलने के बाद रैली से कई किसान उस तरफ दौड़े। दो महीने से वार्ताओं का कोई नतीज़ा नहीं निकलते और केंद्र सरकार की टाल-मटोल की नीति देखकर भी कई किसानों का धैर्य टूटा होगा। कुछ ऐसे चेहरे सामने आ रहे हैं जो किसानों को उकसाने और पुलिस बल पर हमला करने के लिए उकसा रहे थे। ये कौन लोग थे?

सरकार को आशंका थी कि किसान रैली में स्वीकृत पथ का उल्लंघन करने की कोशिश हो सकती है। इस आशंका पर लगातार गृह मंत्रालय विचार कर रहा था। बैठकें हो रही थीं। फिर इतनी अराजकता कैसे हो गई? क्या इसके लिए गृह मंत्रालय और दिल्ली पुलिस उत्तरदाई नहीं हैं? सारा दोष किसानों और उनके नेताओं का ही है? इसे सरकार और प्रशासन की विफलता क्यों नहीं कहा जाना चाहिए? गौर किईजिए कि यह सामान्य दिन नहीं था। राजपथ पर गणतंत्र दिवस की परेड हो रही थी। सारी सुरक्षा एजेंसियां और गुप्तचर इकाइयां पूर्ण सतर्क रही होंगी। इस अत्यंत संवेदशील समय पर दिल्ली की सड़कों पर अराजकता हो जाए तो ज़िम्मेदारी किसकी है?

तो, एक सवाल यह भी है कि क्या अराजकता करवाई गई या होने दी गई? यह सवाल उठने के पर्याप्त कारण हैं और पूर्व के उदाहरण भी। किसान पिछले दो महीने से दिल्ली की सीमा पर डटे हुए थे। आंदोलन अत्यंत शांतिपूर्ण और अनुशासित था। दिल्ली की ओर ज़बर्दस्ती बढ़ने की कोई कोशिश नहीं हुई। पुलिस से टकराव कहीं नहीं दिखता था। टिकरी और सिंघु सीमा पर किसानों का आंदोलन प्रतिरोध के सांस्कृतिक मेले में बदल गया था। धीरे-धीरे बाकी देश में उसके प्रति सहानुभूति बढ़ने लगी थी। बहुत सारे संगठन उनके समर्थन में जुट रहे थे। सरकार और उसके समर्थकों की ओर से आंदोलन को बदनाम करने की कोशिशें जारी थीं। कहा जा रहा था कि उसमें खालिस्तानी आतंकवादी घुस आए हैं। उसे खाए-अघाए अमीर किसानों और आढ़तियों का आंदोलन करार दिया जा रहा था। इस सबके बावजूद आंदोलन शांतिपूर्ण बना रहा।    

आंदोलन का शांतिपूर्ण और अनुशासित बना रहा उसकी सबसे बड़ी ताकत थी तो उसका टूटना-बिखरना हिंसक हो जाने से ही सम्भव था। 26 जनवरी को वह हो गया। आंदोलन न केवल कमजोर हुआ बल्कि उसे मिल रहा जन-समर्थन भी एकाएक विरोध में बदल गया। गणतंत्र दिवस के दिन लाल किले पर जो हुआ उसका सारा दोष किसानों के मत्थे आ गया। जनता उसके विरुद्ध हो गई। सरकार को क्लीन चिट मिल गई कि उसने तो पहले बातचीत की, कृषि कानूनों को स्थगित करने का प्रस्ताव दिया, फिर गणतंत्र दिवस के दिन ट्रैक्टर रैली की इजाजत भी दे दी। किसान ही ज़िद्दी और अतिवादी हैं। वे गणतंत्र दिवस के दिन हिंसा करने ही आए थे।      

क्या यह सोची-समझी रणनीति नहीं हो सकती? साल भर पहले भी ऐसा हुआ था। संशोधित नागरिकता कानून (सीएए) और नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) के खिलाफ देश में जगह-जगह बेमियादी धरना-प्रदर्शन चल रहे थे। दिल्ली का शाहीनबाग इन विरोध-प्रदर्शनों का सबसे बड़ा अड्डा बन गया था, जहां इस देश के संविधान में आस्था रखने वाले विविध संगठन, समूह और स्वतंत्र चेता नागरिक भी बड़ी संख्या में शामिल हो रहे थे। कड़ाके की सर्दी, बारिश और बीमारियों के बावजूद शाहीनबाग का मोर्चा डटा रहा था। प्रदर्शन बहुत व्यवस्थित, शांतिपूर्ण और नियोजित था। प्रदर्शनकारी संविधान की उद्देश्यिका का पाठ करते और राष्ट्रीय ध्वज लहराते थे। किसी तरह की अराजकता और बाहरी उपद्रवी तत्वों पर निगरानी करने के लिए कार्यकर्ताओं की टीम तैनात थी। सरकार और विरोधियों को शाहीनबागों’ (विभिन्न शहरों-कस्बों के प्रदर्शन को भी यही नाम मिल गया था) को बदनाम करने का बहाना नहीं मिल रहा था, हालांकि वे उसे पाकिस्तान-समर्थक, देशद्रोही और आतंकवादियों का जमावड़ा बताने में लगे थे।

तभी एक दिन तत्कालीन केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर की सभा में नारे लगे- देश के गद्दरों को, गोली मारों सालों...।इसी के ठीक बाद दो घटनाएं एक के बाद एक हुईं। पहला, सीएए के विरुद्ध शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे जामिया मिलिया के छात्रों पर एक अवयस्क लड़के ने देसी कट्टे से गोलियां चला दीं। उस घटना की तस्वीरें आज भी गवाह हैं कि पुलिस वाले उसे गोली चलाते हुए खड़े-खड़े देख रहे थे। दूसरा, कपिल बैसला नाम के युवक ने शाहीनबाग में प्रदर्शकारियों बीच घुसकर जयश्री रामके नारे लगाए और गोली चलाई। दोनों घटनाओं को सरकार और प्रशासन की ओर से इस तरह पेश किया गया था कि जामिया मिलिया और शाहीनबाग के प्रदर्शनकारी हिंसक, देशद्रोही और उग्रवादियों से मिले हुए हैं। इसकी पोल भी बहुत ज़ल्दी खुल गई थी, जब कपिल बिसारिया को भाजपा में शामिल कर लिया गया और बवाल मचने पर निकाल भी दिया गया था।

क्या ऐसे स्पष्ट संकेत नहीं थे कि जामिया मिलिया और शाहीनबाग के शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को बदनाम करने, जनता की नज़रों में उन्हें देशद्रोही साबित करने के लिए इन हमलों की साजिश रची गई थी? ऐसा ही जेएनयू में हुआ था जब बाहरी लोगों ने परिसर में घुसकर छात्रों-अध्यापकों के साथ मार-पीट और तोड़फोड़ की। पुलिस फाटक पर मूकदर्शक बनी रही थी। हमलावरों के वीडियो उपलब्ध होने के बावजूद आज तक किसी को पकड़ा नहीं गया।

जिस तरह शाहीनबाग संविधान से छेड़छाड़ के विरुद्ध राष्ट्रीय प्रतिरोध का प्रतीक बन गया था, उसी तरह दिल्ली की सीमाओं पर किसानों का बेमियादी जमावड़ा कृषि कानूनों और उन्हें पास कराने की सरकार की तानाशाहीके खिलाफ राष्ट्रीय मंच बन गया था। शाहीनबाग आंदोलन को कुछ अदालती निर्देशों और बाकी कोरोना के कारण वापस होना पड़ा था। किसान आंदोलन कोरोना के बावजूद जोर पकड़ता जा रहा था। गणतंत्र दिवस पर जो हुआ उसने उसे कमजोर और बदनाम कर दिया।

इसके पीछे किसका हाथ था और किसने क्या भूमिका निभाई, क्या इसकी निष्पक्ष जांच होगी? अराजकता फैलाने में जिन लोगों के नाम और फोटो सामने आ रहे हैं, क्या उनके विरुद्ध कार्रवाई होगी?        

(नवजीवन साप्ताहिक, 31 जनवरी, 2021) 

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Friday, January 22, 2021

तो, कम होने लगे हैं गांव और प्रधान!

क्या अपने प्रदेश या देश में  कभी ऐसा होगा कि एक भी ग्राम पंचायत नहीं होगी? ‘गांव और प्रधान जी नहीं होंगे? यह सवाल यूं ही नहीं उठा। प्रदेश में ग्राम पंचायतों के चुनाव पिछले साल हो जाने चाहिए थे लेकिन महामारी ने सब कुछ ठप कर दिया। अब इन्हें अगले कुछ महीनों में पूरा कराने की तैयारी शुरू हो गई है। पंचायती राज विभाग ने ग्राम पंचायतों का नया परिसीमन करके जो रिपोर्ट राज्य निर्वाचन आयोग को सौंपी है, उसके मुताबिक पिछली बार (2015) की तुलना में ग्राम पंचायतों और ग्राम प्रधानों की संख्या काफी कम होने वाली है।

पंचायती राज विभाग की ताज़ा रिपोर्ट और उसकी वेबसाइट के आंकड़ों में तनिक अंतर दिखता है (2015 में 59062 ग्राम पंचायतों का चुनाव हुआ था या 59074 का?) जो भी सही होसन 2021 में 880 (या 868ग्राम पंचायतें कम होंगी। इतने ही ग्राम प्रधान कम चुने जाएंगे। ऐसा इसलिए हो रहा है कि साल-दर-साल ग्रामीण इलाके शहरी निकायों में शामिल होते जा रहे हैं और उनसे ग्राम’ का दर्ज़ा छिनता जा रहा है।

विकास’ का जो रास्ता हमने चुना हैउसमें गांवों को गांव रहते उतना विकास’ या बजट’ नहीं मिलता जितना उससे ऊपर के क्षेत्र’ और नगर को। उन्हें और विकसित’ होने के लिए गांव’ की परिभाषा से निकलना होता है। इसलिए गांव वाले नगर निकायों का हिस्सा बनना चाहते है। उधरनगरों के तेजी विकास’ का आलम यह है कि उन्हें फैलते रहने के लिए गांवों को निगलने की आवश्यकता पड़ती है। साल-दर-साल नगरों से लगे गांवों को उनकी सीमा में शामिल कर लिया जाता है। गांव वाले प्रसन्न होते हैं कि अब वे नगर’ हो गए हैंउन्हें भी नगरों वाला तेज विकास’ मिलेगा। यह अलग मुद्दा है कि हाल के वर्षों में जो गांव नगर सीमा में शामिल हुएउनका जमीनी हाल क्या है। कई गांव कहीं के नहीं रह गए, ‘गांव से बाहर निकल गए और नगर उन्हें अपना कुछ दे नहीं पाया। बीच में फंसे हुएउपेक्षित।

त्रिस्तरीय पंचायतों की जो संवैधानिक व्यवस्था की गई थीउसमें गांवों को शहर बना देने का विचार नहीं था। विचार यह था कि गांवों की अपनी छोटी-सी सरकार होगी जो अपना खुद विकास करेगी। लोकतंत्र द्वार-द्वार पहुंचेगा और स्थानीय संसाधनों से ग्राम सभाएं अपने लिए सारी सुविधाएं जुटाएंगी। गांधी जी ने कभी गांवों को स्वावलम्बी बनाने का सपना दिखाया था। आज के हमारे प्रधानमंत्री भी आत्मनिर्भर भारत की बात करते हैं लेकिन इतने वर्षों में हमारे निर्वाचित सांसदों-विधायकों ने जो किया वह पंचायती राज व्यवस्था का अपहरण ही कहा जाएगा। पंचायतों को वे अधिकार दिए ही नहीं जो संविधान के अनुसार देने थे। बड़े बजट और अधिकतर अधिकार प्रदेशों की बड़ी सरकारों और अफसरशाही ने अपने कब्जे में रखे। गांव वंचित ही रहे आए।

गांव, ‘गांव ही रहते लेकिन वहां का जीवन सुविधापूर्ण और सुकून भरा रहताखेती विकसित होती और छोटे किसान जमीन बेचकर शहरी मलिन बस्तियों में भागने को मजबूर न होतेशिक्षा से लेकर चिकित्सा तक के लिए शहर भागना मजबूरी न होती और ग्राम पंचायंतें सिर उठाकर बड़ी सरकारों के सामने खड़ी हो पातीं। ऐसा होने नहीं दिया गया और जो होने दिया गया उनमें गांवों को कागजी परिभाषा में बचना नहीं है।

गांव आज भी इस देश की आत्मा हैं। कोरोना काल में महानगरों से भाग’ कर गए शहरी’ लोगों ने यह खूब अनुभव किया। इसके बाद भी गांवों को गांव’ रहने देकर विकास’ का रास्ता पकड़ाया जाएइस बारे में कोई सोच-विचार नहीं हो रहा। ऐसे में गांवों और प्रधानों को धीरे-धीरे गायब ही होना होगा। 

(सिटी तमाशा, नभाटा, 23 जनवरी, 2021)

Friday, January 15, 2021

प्रकृति की पूजा के पर्व और यह हा-हाकार!

 

मकर संक्रांति हो गई। दिन पहले ही बड़े होने लगे थे। अब धीरे-धीरे सूरज की तिरछी किरणें धरती पर सीधा पड़ना शुरू होंगी। ताप बढ़ेगा और जीव-जंतुओं से लेकर वनस्पतियों तक में नए प्राण का संचार करेगा। वसंत के गर्भादान का भी यही समय है। कुछ ही समय में हमें सूखी शाखाओं पर नई कोपलें फूटती दिखाई देंगी। सूर्य की ऊर्जा ही इस सृष्टि की संचालक शक्ति है।

पूरी प्रकृति का जाग्रत होना इस पर्व के केंद्र में है। हमने भी उत्तरायणी (घुघुतिया) मनाई। कौवे के लिए पूरी, बड़े, साग, तरह-तरह के घुघुते (पकवान) पकाए और दूसरी सुबह-सुबह छत पर जाकर उसे पुकारा- काले कौवा, काले। यो घुघुते खा ले!उत्तराखण्ड के आबाद बचे गांवों में तड़के यह पुकार गूंजी होगी। कौवों के झुण्ड के झुण्ड का-का-काकरते हुए खूब दावत उड़ाने आए होंगे। उसकी अनुगूंजें अब तक मन में उठती रहती हैं। उनसे ऊर्जा मिलती है।

नीम की डाल पर बैठा कौवा छत की मुंडेर पर रखे पकवानों को गर्दन टेढ़ी कर देखता रहा। उससे थोड़ी दोस्ती है। पता नहीं किस दुर्घटना या हमले में एक पैर गंवा बैठा। उचक-उचक कर तिरछा दौड़ता है। एक पंख भी टेढ़ा है लेकिन उड़ लेता है। वैसे भी रोज अपनी रोटी की प्रतीक्षा करता है। आज तो दावत का दिन था। उसकी पुकार पर तत्काल तीन-चार और कौवे आ गए। फाख्ते का एक जोड़ा भी ललचाई नज़रों से देख रहा था लेकिन कौवे किसी को पास फटकनें दें तब तो! छत पर देर तक का-का-का होती रही। कौवों ने हमारी उत्तरायणी मना दी। सुबह आनंद से भर गई।

जीवन का यह ढंग, जिसमें हमारे पुरखों ने बड़ी आत्मीयता से पशु-पक्षियों-वनस्पतियों को बराबर साझीदार बना रखा था, क्रमश: लुप्त हो रहा है। प्रकृति के अत्यंत निकट रहे समाजों में, वनवासियों के बीच यह साझा अब भी बना हुआ है। शहरी आपाधापी में खो जाने के बावजूद परम्पराओं-स्मृतियों में वह साथ चला आया और अक्सर जोर मारता है। वहां प्रत्येक संक्रांति एक पर्व है। वह फसलों से, पशुओं से, पक्षियों से, जंगल से, नदियों से जुड़ा है। ये सब मानव के संगी-साथी और जीवन-आधार हैं। पर्वों के बहाने उन्हें जीवन में बराबर शामिल रखना है।

वास्तव में हो यह रहा है कि यह जीव-जगत हमारे जीवन से बाहर हो रहा है। पशु-पक्षियों से लेकर नदियों तक का कितना और कैसा स्थान रह गया है जीवन में? मकर संक्रांति पर हर नदी गंगा बन जाती है लेकिन देखिए तो इसी लखनऊ में बहुत सारे लोगों ने कैसी गोमती में डुबकी लगाई! श्रद्धा बची रही, नदियां नहीं। मानव कोरोना से जूझ रहा है और पक्षी एवियन फ्लूसे मर रहे हैं। उस दिन यह खबर सुनकर मन कैसा तो खराब हो गया था कि कानपुर चिड़िया घर के सारे पक्षियों को मार देने का आदेश हुआ है। उसकी नौबत नहीं आई लेकिन क्या भरोसा! कितनी बार तो हो ही चुका है। अब तो लगता है मनुष्य के हाथ से दुनिया निकली जा रही है।

कोरोना का आधा-अधूरा (उसके पूरे परीक्षण, प्रभाव और सुरक्षा पर अभी परीक्षण जारी हैं) टीका लगाकर उस बीमारी को जीतने के दावे किए जा रहे हैं जिसको अभी ठीक से पहचाना भी नहीं गया है। विज्ञानियों को अभी कई सवालों का जवाब देना है; लेकिन आज की दुनिया को बहुत ज़ल्दबाजी है।

एक तरफ प्रकृति से जुडे आत्मीय पर्व और दूसरी तरफ यह मारा-मारी। अपने होने की यात्रा के किस मुकाम पर आ पहुंचा है मनुष्य?

(सिटी तमाशा, नभाटा, 16 जनवरी, 2021)    

Friday, January 08, 2021

अमरूद खाने के और दिखाने के और?

धूप में अमरूद खाने न बैठे तो जाड़े का क्या आनंद! चौराहे के ठेले वाले ने ललकार कर बुलाया और डेढ़ किलों में दो तोल दिए! हम आधा किलों में पांच-छह दाने लाते थे। कुछ नायाब ले आने के गुरूर से भरे घर आए तो सुनने को मिला- अमरूद लेने गए थे, ये क्या ले आए? हमने कुछ ठेले वाले की, कुछ दोस्तों से सुनी और कुछ अपनी पढ़ी सुना दी।

यह जम्बो अमरूद है और नाम है इसका वीएनआर-बिही। रायपुर (छतीसगढ़) के नारायण चावड़ा की खोज है जिन्होंने कभी थाइलैण्ड के अमरूद से ललचा कर इसे विकसित किया। अब पूरे देश में इसकी  खूब खेती हो रही है और अच्छा मुनाफा भी दे रही है। कुछ युवा कम्प्यूटर इंजिनीयरों ने भी नौकरी छोड़कर इसे उगाना शुरू किया है, ऐसा गूगल बता रहा है। ठेले वाले अस्सी रु किलो बेच रहे हैं तो फलों की दुकान में उसे जालीदार टोपी पहना कर सौ रु किलो तक बेचा जा रहा है। एक अमरूद कम से कम आधा किलो का है, कोई कोई तो पौन से एक किलो तक का।

तत्काल मुस्किया कर सुनाया गया- लेकिन अपने लखनउवा और कनपुरिया के सामने न टिकेगा। बात ठीक निशाने पर जा लगी। छोटे-छोटे, सफेद, मीठे और खुशबूदार लखनउवा-कनपुरिया अमरूदों की याद जोर मारने लगी। स्वाद ने रंग कुछ और चोखा किया। ऊपर चित्तीदार और अन्दर से लाल-गुलाबी इलाहाबादी अमरूद तो इसकी तरफ देखे भी न! बड़ा हुआ तो क्या हुआ, वह मौलिक स्वाद और रूप-रस कहां से लाओगे? अमरूद हो तो तरबूज की तरह क्यों फूल रहे? गूदा खूब भरे हो, बीज भी कम हैं और सुना है कि दस-पंद्रह दिन तक खराब भी नहीं होते हो! मियां छतीसगढ़ी, यह अमरूद की तासीर नहीं। वह भी कोई अमरूद हुआ जो डाल से टूटते ही कहे, फौरन खा लो नहीं तो बासी हो जाउंगा!

पौन किलो का अमरूद क्या बोलता! वह प्लेट में वैसे ही फब नहीं रहा था। गोल-मटोल, जैसे धानी बैगन! ऐसा भी क्या कि एक काटो तो पूरा परिवार खा ले और फिर भी बचा रहे! हम लखनऊ वाले तो अमरूद को छोटा, प्यारा और मीठा बनाए रखने के लिए उसे अरमूदकहते आए हैं। और भला, इत्ते बड़े को जेब में कैसे छुपाएं, दांत से काटकर कैसे खाएं!

हमारा पुराना अपना दर्द उभर आया। एक-एक कर देसी स्वाद पिट रहे हैं। कितने बाग थे लखनऊ में अमरूदों के, क्या हुए? बचपन में रेजीडेंसी के आस-पास खूब चुरा कर खाए। कानपुर से चला आता था अपनी अलग ही खुशबू लिए और गंगा किनारे झव्वा-झव्वा बिका करता था। एकदम मद्दा। स्वाद में निराला। एक बार में पूरा गप्प और आधा किलों एक बार में चट। तनिक हरी धनिया और हरी मिर्च की लहसुन वाली चटनी मिल जाए फिर देखो!

अभी चंद रोज पहले खबर पढ़ी थी कि इलाहाबादी अमरूद संकट में है। उसे किसी रोग ने धर लिया। कई साल हुए वैसा इलाहाबादी न मिला जो हुआ करता था। झोले में छुपा कर लाओ तो बाजार और मुहल्ला महक जाए। इधर कभी मिला भी तो खराब और कीड़े पड़ा हुआ।

क्यों भई उपोष्ण फल-विज्ञानियो, अपने देसी अमरूदों को क्यों नहीं बचा रहे? हाइब्रिड तो बहुत लोग बना ले रहे हैं। देसी टपका आम के पेड़ काट-काट कर कलमी लगा लिए। यही अमरूदों का हो रहा। प्रयोग दर प्रयोग। कलमी को इनाम मिले मगर स्वाद नदारद। हुआ तो नकली ही! हम तो दशहरी को भी देसी न मानें।

यह बढ़ती उम्र का दोष है या जीभ के स्वाद तंतुओं का कि वापस चौराहे पर गए और साठ रु किलो वाले देसी दाने बीन लाए। वह मुटल्ला छतीसगढ़ी दिखाने-सजाने के काम आ रहा!

(सिटी तमाशा, नभाटा, 09 जनवरी, 2021)