अपने तीखे तेवरों और अक्सर
धारा के विरुद्ध लिखने-बोलने के लिए चर्चित साहित्यकार-नाटककार मुद्राराक्षस पिछले
काफी समय से बीमार हैं. उनकी आर्थिक हालत कतई अच्छी नहीं है. लेखक बिरादरी ने
पिछले दिनों प्रदेश सरकार से उनकी सहायता और इलाज की बेहतर व्यवस्था करने के लिए
गुहार लगाई. बिरजू महाराज के प्रख्यात शिष्य और कथक की लखनऊ शैली को देश-विदेश में
लोकप्रिय बनाने वाले गुरु अर्जुन का गम्भीर बीमारी से लड़ते हुए पिछले ही मास निधन हुआ
है. उनकी मदद करने के लिए भी कलाकारों ने आवाज उठाई थी.
मुद्राराक्षस की मदद करने
की अपील पर शासन की तरफ से उस समय कहा गया कि राज्य में पंचायत चुनावों की
अधिसूचना लागू है. इसलिए उनकी सहायता करने में अड़चन है. लेकिन इसी दौरान प्रदेश
मंत्रिमण्डल ने यह फैसला कर दिया कि यू पी के पद्म पुरस्कार और यश भारती पाने
वालों को सपा सरकार 50 हजार रु मासिक पेंशन देगी. पद्म पुरस्कार पाने वालों में
शायद ही कोई विपन्न और लाचार व्यक्ति होता हो. यश भारती पुरस्कार मुलायम सिंह के
नेतृत्व वाली सरकार ने सन 1994 में शुरू किए थे. बीच में बसपा की मायावती सरकार ने
इन पुरस्कारों को रोक दिया था. 2012 में फिर सत्ता में आने अखिलेश सरकार ने फिर से
यश भारती पुरस्कार देना शुरू किया. 2013-14 और 2014-15 के लिए इसी साल फरवरी में
56 लोगों को यह पुरस्कार दिया गया. साहित्य, फिल्म, कला, खेल, आदि विविध क्षेत्रों के नामी लोगों को यह
पुरस्कार दिया जाता है. पहले इसमें सम्मान पत्र के अलावा पांच लाख रु दिए जाते थे
जो अब बढ़ा कर 11 लाख रु कर दिए गए हैं. अब इन्हें 50 हजार रु प्रतिमास पेंशन देने
का ऐलान भी कर दिया गया है. चर्चा रही कि प्रदेश सरकार ने यह फैसला इस कारण किया
कि यश भारती प्राप्त कोई व्यक्ति इस सम्मान को लौटाने की घोषणा न कर दे. प्रदेश
सरकार के काम-काज से नाराज लोगों की भी कमी नहीं है, खैर.
यू पी से ताल्लुक रखने वाले
मुम्बई फिल्म जगत के नामचीन अभिनेता-अभिनेत्री, क्रिकेट खिलाड़ी, पहलवान, आदि भी यश भारती से सम्मानित हैं. इनमें अमिताभ बच्चन का
पूरा परिवार, खुद अमिताभ, पत्नी जया और बेटा अभिषेक बच्चन, शामिल है. बच्चन परिवार को पेंशन की क्या जरूरत (उन्होंने
अपनी पेंशन राशि लेने से इनकार करते हुए इसे सरकार से गरीबों के हित में उपयोग
करने की अपील की है) यश भारती की लम्बी सूची में ज़्यादातर ऐसे नाम हैं जो आर्थिक
रूप से बेहतर स्थिति में हैं. उन्हें सरकारी पेंशन की जरूरत नहीं लेकिन मुद्राराक्षस
जैसे जरूरतमंद रचनाकारों को कोई पेंशन या मदद मयस्सर नहीं. उन्हें यश भारती पुरस्कार
भी नहीं मिला है कि अब पेंशन का सहारा हो. कभी भोजपुरी के लोकगायक बालेश्वर जैसों
को यश भारती से सम्मानित किया गया तो इसलिए कि समाजवादी पार्टी ने चुनाव-सभाओं में
उनका इस्तेमाल किया था.
व्यवस्था की पोल खोलने वाली ‘चमारों की गली’ जैसी कविता और ‘सौ में सत्तर आदमी फिलहाल
जब नाशाद हैं/ दिल पे रख कर हाथ कहिए देश क्या आज़ाद है’ जैसी धारदार गज़लें लिखने
वाले अदम गोंडवी ने अत्यंत दयनीय हालात में दम तोड़ा, क्योंकि उन्हें सत्ता प्रतिष्ठान या अकादमियों
ने किसी पुस्कार या पेंशन के लायक नहीं समझा था. ऐसे कई नाम हैं, और होंगे. जागरूक और
जिम्मेदार विपक्ष की भूमिका निभाने वाला रचनाकार सरकार की नज़र में बागी या ‘विरोधी दल का एजेण्ट’ होता है!
बड़ी संख्या में साहित्य
अकादमी सम्मान लौटाने और उसी पैमाने पर लेखकों की निंदा-आलोचना के
कारण साहित्यकार आजकल खबरों में हैं. चैनलों की तीखी बहसों में वे लेखक भी
दिखाई-सुनाई दे रहे हैं, आम तौर पर जिनका नोटिस मीडिया नहीं ही
लेता. केंद्र सरकार के भी कई वरिष्ठ मंत्रियों ने पिछले दिनों लेखकों के बयानों का
नोटिस लेते हुए बड़े-बड़े बयान जारी किए. सोशल मीडिया में तो खैर लेखकों का मुद्दा
छाया ही हुआ है. कुल मिलाकर लेखक इन दिनों बहसों के केंद्र में हैं, उनका लिखा साहित्य भले ही प्रकाशकों की कृपा से छपी महंगी किताबों में
लाइब्रेरियों में बंद हो. कलम के सिपाहियों की माली हालत पर तो खैर उनके जीते-जी
कभी चर्चा ही नहीं होती.
बीमारी और वृद्धावस्था के दौरान हमारे ज्यादातर साहित्यकार-कलाकार
लाचार दिखते रहे हैं. भारतीय भाषाओं के लेखक कमा ही क्या पाते हैं! कई-कई पुस्तकों
के प्रख्यात लेखकों को भी प्रकाशकों से मिलने वाली रॉयल्टी का हाल सुनकर हंसी और
रोना एक साथ आते हैं. लेखकों की किताबों से प्रकाशक मालामाल हो रहे हैं लेकिन
रचनाकार की माली हालत दयनीय ही रह गई. जो लेखक नौकरी या किसी रोजगार में रहे उनका
काम तो चल जाता है लेकिन सिर्फ लेखन पर निर्भर लेखक की स्थिति संकट के समय अत्यंत
दयनीय हो जाती है. यही वजह है कि अक्सर लेखक बिरादरी बहुत जरूरतमंद
साहित्यकार-कलाकार की मदद के लिए सरकारों से लेकर संस्थाओं-व्यक्तियों से भी अपील
करती दिखती है. मुक्तिबोध से लेकर धूमिल तक और शैलेश मटियानी से लेकर त्रिलोचन तक
ऐसे कई प्रसंग याद आते हैं. अपनी रचनाओं में समय के क्रूर सत्य और व्यवस्था से टकराने
वाले रचनाधर्मियों को असहायता में व्यवस्थामुखी हो जाना पड़ता है. तब उसकी निष्ठा
और प्रतिरोधी तेवरों पर सवाल भी उठने लगते हैं. लेखन से ही रोजी-रोटी कमाने वाले शैलेश
मटियानी ने कभी उत्तर प्रदेश सरकार से आर्थिक सहायता का प्रस्ताव ठुकरा दिया था
हालांकि वे हमेशा गर्दिश में रहे. बाद में बीमारी और लाचारी में उनके परिवार को सरकार
से आर्थिक मदद स्वीकार करनी पड़ी थी. तब उनकी आलोचना भी की गई थी. सवाल यह है कि
लेखक ऐसी स्थिति में क्या करे?
किसी समय आकाशवाणी में रहते हुए व्यवस्था के विरुद्ध
आक्रामक तेवर अपनाने और लेखन में भी व्यवस्था विरोधी मुद्राराक्षस, उनके
परिवारीजन और साथी लेखक आज अगर सरकार से उनकी मदद की अपील करने को मजबूर हैं तो
सोचना चाहिए कि हमारे समाज में लेखक की स्थिति ऐसी क्यों है?
अव्वल तो ऐसी अपील की जरूरत ही नहीं पड़नी चाहिए थी. आज़ादी के 68 सालों बाद आदर्श
स्थिति यह होती कि किसी भी नागरिक के बेहतर इलाज के लिए मदद की गुहार ही नहीं करनी
पड़ती. लेखक हो या मजदूर या फुटपाथ पर गुजर कर रहा भिखारी, हर
एक के समुचित इलाज की व्यवस्था सरकारी अस्पतालों में होती. दुर्भाग्य से ऐसा हुआ
नहीं और न ही निकट भविष्य में ऐसा होने के आसार हैं. हमारी सरकारों ने, चाहे वह किसी भी दल या गठबन्धनों की रही हों, जन-स्वास्थ्य
और हर नागरिक के लिए न्यूनतम आवश्यक चिकित्सा की व्यस्था पर ध्यान ही नहीं दिया.
जनता के धन से चल रहे सरकारी अस्पतालों की सारी मुफ्त सुविधाएं वीआईपी के लिए हैं.
जो वीआईपी नहीं है उसे मामूली इलाज या डॉक्टर से मिलने के लिए भी सिफारिश लगानी
पड़ती है.
क्या विडम्बना है कि जेल भेजे गए वीआईपी अपराधी कैद की
तकलीफ न सहन कर सरकारी अस्पतालों के गहन चिकित्सा कक्ष में आराम फरमाते रहते हैं. अमीरों
के लिए पंचतारा निजी अस्पताल धड़ाधड़ खुल रहे हैं. सर्दी-जुकाम में भी राजनीतिक नेताओं
के दरवाजे पर विशेषज्ञ डॉक्टरों की फौज दौड़ी चली जाती है लेकिन बकौल प्रेमचंद, ‘साहित्य के आगे चलने वाली मशाल’ निर्मित करने वाला
रचनाकार गम्भीर बीमारी में भी लाचार पड़ा रहता है. उसके इलाज में मदद के लिए साथी
रचनाकारों की अपील का असर हो ही जाए, इसकी भी कोई गारण्टी
नहीं. दिक्कत इसलिए और बढ़ जाती है क्योंकि बहुत सारे दूसरे देशों की तरह हमारे देश
में स्वास्थ्य बीमा अनिवार्य नहीं है.
हमारी व्यवस्था को चलाने वाला तंत्र इतना
लोकतांत्रिक आज तक न हो सका कि प्रतिरोधी स्वरों का सम्मान करे या कम से कम धैर्य
से सुन ले. सत्ता, संस्थानों और राजनीति पोषित संगठनों की असहिष्णुता किस हद तक
बढ़ गई है, यह आज के माहौल से स्पष्ट है. इस देश की
बहुलतावादी परम्परा को ध्वस्त करने की कोशिशों के खिलाफ आवाज उठाने वाले लेखकों को
सुनने की बजाय उन पर तरह-तरह से हमले हो रहे हैं. ऐसे लेखकों-कलाकारों की मदद कोई
सरकार क्यों करेगी जो उसकी गलत और जनविरोधी नीतियों के विरोध में खड़ा हो? लेखक का तो काम ही प्रतिरोधी स्वरों को मुखर करते हुए समाज को सचेत करना
है.
तो भी क्या यह उम्मीद की जाए कि सरकार पद्म
पुरस्कार या यश भारती पाने वालों को बड़ी पेंशन देने की बजाय रचनाकारों-संस्कृतिकर्मियों, आदि
का किसी न्यूनतम अर्हता के आधार पर चिकित्सा बीमा कराए ताकि उन्हें आवश्यक इलाज के
लिए गुहार न लगानी पड़े. इसमें उनके विचार या वाद के आधार पर भेदभाव न किया जाए. तर्क, विचार और लेखन से आगे की दिशा दिखाने तथा पीछे ले जाने वाली प्रवृत्तियों
का विरोध करने वाले रचनाकारों का तो सत्ता और समाज को शुक्रगुज़ार होना चाहिए. ‘निंदक नियरे राखिए’ की तर्ज पर उनकी समुचित देखभाल
करनी चाहिए.
(15 नवम्बर,2015)
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