रविवार, 24 जनवरी 2016 को अमित शाह
सर्वसम्मति से भाजपा अध्यक्ष चुन लिए जाएंगे. इस बार पूरे तीन साल के लिए. 09
जुलाई, 2014 को जब उन्होंने पहली बार भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी
सम्भाली थी तो वह तत्कालीन अध्यक्ष राजनाथ सिंह की खड़ाऊं पहनने जैसा था. राजनाथ
सिंह ने मोदी सरकार में शामिल होने के बाद अध्यक्ष पद छोड़ दिया था. लोक सभा चुनाव
में यूपी के प्रभारी रहे अमित शाह के लिए 80 में से 73 सीटें जिताने का यह बड़ा
इनाम था. मगर इस बार कुछ किंतु-परंतु भी उनके आड़े आ गये थे जिन्हें दूर करने के
लिए खुद प्रधानमंत्री तथा संघ प्रमुख को हस्तक्षेप करना पड़ा.
नेतृत्व पर उठे सवाल
जुलाई 2014 से जनवरी 2016 आते-आते
नरेंद्र मोदी और अमित शाह की कीर्ति फीकी पड़ी है. अजेय समझी जाने वाली इस जोड़ी को
दिल्ली विधान सभा चुनाव में ‘आप’ के हाथों बड़ी पराजय के बाद बिहार में शर्मनाक हार का सामना
करना पड़ा. बिहार चुनाव में भाजपा के सेनापति और रणनीतिकार नरेंद्र मोदी और अमित
शाह ही थे. हाशिए पर धकेल दिए गए लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और यशवंत सिन्हा जैसे वरिष्ठ
नेताओं ने बिहार की हार पर मोदी और शाह के खिलाफ बगावती तेवर अपनाए. शाह की
नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठाए गए. इसी दौरान देश में बढ़ती असहिष्णुता, अभिव्यक्ति की आजादी पर
खतरे और बहुलतावादी परम्परा को नष्ट किए जाने की साजिशों के आरोपों से मोदी सरकार की
प्रतिष्ठा और भाजपा की स्वीकार्यता को आघात लगे. इसलिए भाजपा और संघ के भीतर यह
चर्चा भी चली कि क्या किसी और नेता को पार्टी की बागडोर दी जाए.
मगर पलड़ा भारी
इस कुहासे के बावजूद अमित
शाह का पलड़ा कई कारणों से भारी रहा. शाह को संघ के वरिष्ठों का पूर्ण समर्थन हासिल
है. 2014 के लोक सभा चुनाव और उसके बाद हुए कई विधान सभा चुनावों में शाह ने संघ
के कार्यकर्ताओं का बखूबी इस्तेमाल किया. पार्टी और संघ के जमीनी कार्यकर्ताओं से
उनका सीधा सम्पर्क है. शाह बहुत ऊर्जावान और मेहनती नेता हैं. जिन राज्यों में
भाजपा कमजोर है वहां पार्टी का जनाधार बनाने के लिए उन्होंने रणनीति बना रखी है. प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी के वे पुराने सहयोगी और विश्वासपात्र हैं. दोनों में बहुत अच्छी
समझदारी है और मोदी फिलहाल और किसी को पार्टी अध्यक्ष के रूप में नहीं देखना
चाहते.
शाह के पक्ष में एक तुरुप
चाल यह भी रही कि अगर इस समय अमित शाह की बजाय किसी और नाम पर विचार भी किया जाता
है तो इसका अर्थ आडवाणी और जोशी की बगावत को महत्व देना होगा. इस तरह शाह के नाम
पर फाइनल मुहर लग गई.
सबसे बड़ी चुनौती यूपी
अमित शाह के सामने कई बड़ी
चुनौतियां हैं. इसी साल अप्रैल-मई में पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम, केरल और पुडुचेरी में चुनाव होने हैं. लोक सभा
चुनाव में भाजपा को पश्चिम बंगाल में पैर रखने का जो मौका मिला था, उसे पसारना है. असम में बोडो
पीपल्स फ्रण्ट से गठबंधन के बाद बढ़ी उम्मीदों को परवान चढ़ाना है. 2017 में यूपी, उत्तराखण्ड, पंजाब, गोवा और मणिपुर की बारी
है. शाह की सबसे बड़ी चुनौती 2017 में उत्तर प्रदेश ही होगी जहां मजबूत वोट आधार
वाली सपा और बसपा मुकाबिल हैं. लोक सभा चुनाव में मिली सफलता का कीर्तिमान
विधान सभा चुनाव में मदद नहीं करने वाला.
इसलिए यू पी में शाह और संघ कई मोर्चों पर काम कर रहे हैं.
बसपा के दलित आधार में सेंध लगाने के लिए आम्बेडकर के महिमामंडन का अभियान पहले से
चल रहा है. 22 जनवरी को खुद प्रधानमंत्री ने लखनऊ दौरे में डा भीम राव आम्बेडकर
महासभा के कार्यालय जाकर बाबा साहेब के अस्थि कलश पर फूल चढ़ाए. कुछ दलित नेताओं को
भाजपा में लाने की रणनीति के तहत बसपा के पूर्व राज्य सभा सदस्य जुगल किशोर को ऐन
मायावती के जन्म दिन पर पार्टी में शामिल किया गया. चंद रोज पहले संघ के अवध
प्रांत की समन्वय बैठक में सह-सरकार्यवाह ने स्वयंसेवकों से अपील की कि वे दलितों
के लिए ‘सेवा कार्य’ करें. कल्याण सिंह मुख्यमंत्री पद के उमीदवार
नहीं ही होंगे लेकिन इसका शिगूफा छोड़ कर लोधों को खुश करने की कोशिश हुई है.
अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की हवा पहले ही बनाई जा चुकी
है. पत्थरों की नई खेप मंगवाना और तराशने काम तेज करवाना बताता है कि यू पी के समर
के लिए नरेंद्र मोदी सरकार के विकास के वादे पर ही अमित शाह निर्भर नहीं करेंगे.
बिहार में विकास का यह नारा फेल हुआ और बीच चुनाव में भाजपा को जातीय व
साम्प्रदायिक पत्ते खलने पड़े थे. नीतीश की तरह यूपी में अखिलेश विकास-पुरुष के रूप
में ख्याति अर्जित नहीं कर सके हैं लेकिन लखनऊ मेट्रो,
समाजवादी पेंशन स्कीम, आई टी सिटी और लखनऊ-आगरा एक्सप्रेस-वे
जैसी महत्वाकांक्षी योजनाओं में तेजी लाकर इधर वे विकास के मुद्दे को चर्चा में
लाने का पूरा प्रयास कर रहे हैं. इसलिए शाह की रणनीति है कि मोदी सरकार की नामामि
गंगे, स्वच्छ भारत अभियान एवं बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ जैसी
योजनाओं के प्रचार के साथ-साथ जातीय और धार्मिक मुद्दों को उभारा जाए. इसके लिए
अमित शाह संघ की टीम का पूरा उपयोग कर रहे हैं. यूपी में उनके विश्वस्त सहयोगी
पार्टी के प्रदेश महामंत्री (संगठन) सुनील बंसल हैं, जो संघ
के ही पठाए हुए हैं.
यूपी के भाजपाइयों में प्रकट तौर पर शाह का कोई विरोध नहीं
दिखता लेकिन नाराजगियां तो हैं ही. उनकी मनमानी कार्यशैली के
अलावा पार्टी पदाधिकारियों के लिए भी अनुपलब्धता उनकी आलोचना के मुख्य बिंदु हैं. अमित
शाह पार्टी पधाधिकारियों से अलग अपनी दूसरी टीम की मार्फत काम करने के लिए भी
जाने जाते हैं.
बहरहाल, यूपी फतह हो सकी तो शाह फिर ‘शाह’ होंगे. अन्यथा पार्टी में शांत पड़े विरोधी सजोर
सिर उठाएंगे और तख्त डोलेगा.
(बीबीसी.कॉम में 24 जनवरी, 2016 को)
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