Tuesday, July 28, 2026

'जिज्ञासु' जी की कुमाउँनी सेवा पर केंद्रित पुस्तक

बंसीधर पाठक 'जिज्ञासु' जी को मैं एक कवि के रूप में बहुत पहले से जानता रहा हूँ। उनकी कविताएँ पहाड़ से निकलने वाले साप्ताहिक अखबारों और कुमाउँनी पत्रिकाओं में पढ़ता आया हूँ। लेकिन कुमाउँनी-गढ़वाली साहित्य, संस्कृति और भाषा के लिए उन्होंने जो अपार कार्य किया, उसकी गहराई मुझे पहली बार वरिष्ठ साहित्यकार नवीन जोशी जी द्वारा संपादित पुस्तक ‘बंसीधर पाठक जिज्ञासु : कुमाउँनी का अप्रतिम सेनानी’ से पता चली।

उनका व्यक्तित्व और कृतित्व का वर्णन करने वाली यह पुस्तक अत्यंत रोचक है। उत्तराखंड से बाहर रहकर भी अपनी मातृभाषा और संस्कृति के लिए उनका योगदान वाकई कमाल का है। उन्हें ‘कुमाउँनी का अप्रतिम सेनानी’ कहना बिलकुल सटीक और उपयुक्त है। अंतिम समय तक जिस समर्पण से वे कुमाउँनी की सेवा में लगे रहे, ऐसे उदाहरण विरले ही मिलते हैं।

इस पुस्तक को पढ़ते हुए मुझे कुमाउँनी के प्रतिष्ठित साहित्यकार और ‘दुदबोलि’ के संपादक मथुरा दत्त मठपाल जी का स्मरण हो आया। उनमें भी भाषा-साहित्य के प्रति वैसा ही जुनून था। वे अपना धन खर्च कर अंतिम दिनों तक पत्रिका के अंक निकालते रहे।

हर लोक-भाषा प्रेमी को यह किताब अवश्य पढ़नी चाहिए। इसमें सिर्फ जिज्ञासु जी के योगदान को ही नहीं रेखांकित किया गया, बल्कि कुमाउँनी-गढ़वाली पत्रिका ‘आँखर’ के 23 अंकों में प्रकाशित रचनाओं का भी उल्लेख है। इस पत्रिका को प्रकाशित करने में उन्होंने कितने संघर्ष झेले, उसकी व्यथा-कथा भी विस्तार से वर्णित है।

एक संपादक को पत्रिका निकालने के लिए कितनी मेहनत करनी पड़ती है, लेखकों से रचनाएँ कैसे जुटानी पड़ती हैं—इन सबका जीवंत चित्रण इस पुस्तक में मिलता है। वे न केवल ‘आँखर’ के लिए, बल्कि आकाशवाणी के ‘उत्तरायण’ कार्यक्रम के लिए भी अथक परिश्रम करते थे। वक्ताओं के घर-घर जाकर उन्हें तैयार करना—यह भी एक अद्भुत कहानी है, जो पुस्तक में पढ़ने को मिलती है।

कितनी बड़ी बात है कि बचपन में ही पहाड़ छोड़कर बाहर चले गए एक व्यक्ति को कुमाउँनी ठीक से बोलना भी नहीं आता था, फिर भी मातृभाषा के प्रति लगाव के कारण उन्होंने उसे सीखा और उसके लिए ढेर सारा काम किया। वाकई गजब!

नवीन जोशी जी ने अपने विस्तृत संस्मरणात्मक आलेख में कुमाउँनी पत्रिकाओं के इतिहास का विहंगम अवलोकन भी किया है। उन्होंने वर्तमान में निकल रही कुमाउँनी-गढ़वाली पत्रिकाओं का परिचय देते हुए प्रकाशित सामग्री पर विचारणीय टिप्पणी की है, जिसे एक महत्वपूर्ण सुझाव के रूप में लिया जाना चाहिए। पुस्तक में आकाशवाणी लखनऊ केंद्र से लगभग 31 वर्ष तक प्रसारित ‘उत्तरायण’ कार्यक्रम, ‘शिखर संगम’ और ‘आँखर’ संस्था के इतिहास तथा उत्तराखंड की भाषा-संस्कृति के प्रसार में उनके योगदान का भी वर्णन है।

जिज्ञासु जी के छोटे भाई गणेश चंद्र पाठक जी, पुत्र दिव्य रंजन पाठक जी के संस्मरण तथा पत्नी देवकी जी के साक्षात्कार से पता चलता है कि उनकी अच्छी रचनात्मकता के पीछे एक बड़ा कारण उनकी गहन पढ़ने की आदत थी। घर पर वे या तो पढ़ते दिखते या लिखते। उनके पास ‘धर्मयुग’, ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’, ‘कादम्बिनी’, ‘नवनीत’, ‘सरिता’ जैसी अनेक साहित्यिक पत्रिकाएँ नियमित आती थीं।

उनके जीवन से प्रेरणा मिलती है कि अच्छा लिखने के लिए पढ़ाई कितनी आवश्यक है। पुस्तक में हिंदी और कुमाउँनी के प्रतिष्ठित साहित्यकारों—शेखर पाठक जी, बिना तिवारी जी, बहादुर बोरा ‘श्रीबंधु’ जी, गोपाल भट्ट जी, प्रयाग जोशी जी, रुक्मिणी शर्मा जी, आलोक जोशी जी, घनानंद पांडे ‘मेघ’ जी, धन सिंह मेहता ‘अनजान’ जी, एम. जोशी ‘हिमानी’ जी, पार्थ सारथी डबराल जी, त्रिलोचन पांडे जी और जगदीश जोशी जी—के लगभग डेढ़ दर्जन आलेख, संस्मरण तथा साक्षात्कार संकलित हैं। साथ ही जिज्ञासु जी की कुछ प्रतिनिधि रचनाएँ भी शामिल हैं।

लोक-भाषा और संस्कृति को बचाने में लगे एक व्यक्ति की क्षोभ, हताशा और निराशा भी पुस्तक में झलकती है। कुमाउँनी-गढ़वाली भाषा, साहित्य और संस्कृति के आंदोलन में सक्रिय लोगों के लिए यह पुस्तक न केवल पठनीय, बल्कि संग्रहणीय भी है। यह नए विचार देती है और प्रेरित करती है। यह 260 पृष्ठों की पुस्तक नवारुण प्रकाशन से प्रकाशित हुई है। मूल्य 400 रुपये है और छपाई काफी अच्छी है।

-महेश पुनेठा, पिथौरागढ़ (पेशे से अध्यापक पुनेठा जी हिंदी के प्रतिष्ठित कवि हैं और पुस्तक संस्कृति के विकास में निरंतर लगे रहते हैं)  

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