Monday, July 21, 2014

नियम-कानून माने तो नेता कैसा!




चंद रोज़ पहले की खबर है कि व्यापारी नेता बनवारी लाल कंछल को अदालत ने फरार घोषित करके उनके नाम गैर जमानती वारण्ट भी जारी किया है। कंछल साहेब को खुले आम राजधानी में घूमते देखा जा सकता है। वे अक्सर सार्वजनिक समारोहों में शामिल हो रहे हैं जहां वरिष्ठ पुलिस अधिकारी भी मौजूद रहते हैं और उनको सलाम बजाते हैं। उनके खिलाफ फ़रारी का आदेश और गिरफ्तारी का वारण्ट किसी सामान्य से मुकदमे में कई बार बुलाए जाने के बावजूद अदालत में हाजिर नहीं होने के कारण जारी किया गया है। यह मुकदमा पिछले करीब 17 वर्ष से चल रहा है और उन्होंने कभी अदालत में पेश होने की या जमानत करा लेने की ज़रूरत नहीं समझी। ऐसा ही एक मामला समाजवादी पार्टी के विधायक रविदास मेहरोत्रा का था जो करीब 25 वर्ष से अदालती नोटिसों और वारण्ट के बावजूद अदालत में हाजिर नहीं हुए थे। इसलिए अदालत को मजबूर होकर उन्हें फरार घोषित करते हुए गैर जमानती वारण्ट निकालना पड़ा था। तब कहीं जाकर रविदास महरोत्रा ने अदालत में पेशी दी और जमानत करवाई थी। यह अभी चंद महीने पहले की बात है।

कंछल और मेहरोत्रा किसी भी रूप में अपराधी नहीं हैं। कंछल वर्षों से व्यापारियों की राजनीति कर रहे हैं और आंदोलनों में जेल जाते रहे हैं और इस कारण उन पर मुकदमे भी हुए तो आश्चर्य नहीं। (उनकी अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएँ भी है जिसके लिए वे अवसरानुकूल राजीतिक पार्टियां बदलते रहते हैं, यह अलग बात है) रविदास मेहरोत्रा लखनऊ विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति में खूब सक्रिय रहे हैं और पिछले कोई चालीस बरस से राजधानी लखनऊ में विविध धरना-प्रदर्शनों-गिरफ्तारियों में शामिल रहे हैं। उनका दावा है कि जेल जाने का कीर्तिमान उन ही के नाम है। सो, उनके खिलाफ मुकदमे होना स्वाभाविक ही है।

कंछल और रविदास यहाँ सिर्फ दो उदाहरण हैं। सवाल यह है कि सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्रों में सक्रिय ये नेता बरसों-बरस अदालती नोटिसों और वारण्ट की भी जानबूझ कर अनदेखी क्यों करते हैं? ये सामान्य से मुकदमे होते हैं जिनमें खुद अदालत में पेश होने की जरूरत नहीं होती. आपका वकील ही सारी औपचारिकता पूरी कर देता है, व्यक्तिगत पेशी से छूट दिला देता है और ज़रूरत पड़ने पर जमानत भी करा लेता है। फिर ऐसा क्यों होता है कि कंछल 17 वर्ष और रविदास उससे भी कई बरस ज़्यादा अदालती फरमान का संज्ञान ही नहीं लेते और फरार घोषित किए जाने के बावजूद उनके चहरे पर शिकन तक नहीं आती?

इसका सच यह है कि हमारे देश में नेता नाम के जीवों को नियम-कानून नाम की चिड़िया से ही बहुत नफरत है और यह कई-कई रूपों में प्रकट होता है। इस देश में यह अकल्पनीय है कि किसी नेता की गाड़ी चौराहे की लालबत्ती पर नियमानुसार ठहर जाए लेकिन यह दृश्य बहुत आम हैं कि नियमानुसार वाहन के कागजात दिखाने को कहने या सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक गाड़ियों के शीशों से गाढ़ी काली फिल्म उतारने या नियम तोड़ने पर चालान करने वाले किसी सिपाही या बड़े पुलिस अधिकारी को नेता छाप लोग धमकाएँ या निलंबन और ट्रांसफर कराते मिलें। यहाँ नियम का पालन करना तौहीन मानी जाती है। इसलिए डंके की चोट पर नियम तोड़ने वाला बड़ा और रौबदार माना जाता है। जो नियम माने और कानून से डरे वह बेचारा और गऊ छाप समझा जाता है। तभी तो छुटभय्ये लोग नियम तोड़ना नेता बनने की पहली सीढ़ी मानते हैं।

तकलीफदेह बात यह है कि नियम-कानून का पालन कराने वाली पुलिस को खुद इस विसंगति पर कोई क्षोभ नहीं होता, बल्कि वह स्वयं नियम-कानून तोड़ने वाले नेताओं की सुरक्षा में लगी होती है। कंछल के प्रकरण में जब लखनऊ के एसएसपी से पूछा गया तो उनका जवाब था कि अभी उन्हें कोर्ट का आदेश नहीं मिला है और न ही आदेश की जानकारी है। रविदास के मामले में तो इधर गिरफ्तारी का आदेश था और उधर पुलिस के आला अफसर तक उनके बेटे की शादी की दावत में मेहमानों संग मेजबान को भी फर्सी सलाम बजा रहे थे।

यह हमारे नेताओं की ही महिमा है कि कानून-व्यवस्था की रखवाली करने के लिए बनी पुलिस ठीक उलटी भूमिका में दिखाई देती है। वह निरीह और लुटती-पिटती जनता की रक्षा में तैनात नहीं दिखाई देती लेकिन पहले से सी बहुत सुरक्षित नेताओं को जाने किस खतरे से बचाने के लिए मजबूत सुरक्षा घेरा बनाए चलती है। जिन दिनों प्रदेश विधान सभा का सत्र चलता है उन दिनों  पूर्वाह्न करीब ग्यारह बजे विधान भवन में जाते विधायकों के काफिले देख लीजिए। उनकी सरकारी और निजी सुरक्षा बलों की फौज आम जनता को, महिलाओं और स्कूली बच्चों तक को ऐसे घुड़कती चलती है जैसे कि वे दुश्मन हों! इसी रौब-दाब से हमारे नेताओं का खून बढ़ता है। तभी तो सुरक्षा दस्ता छिनते ही जैसे उनके प्राण ही सूख जाते हैं।

यही वह बड़ी वजह भी है कि नेताओं, उनके बेटे-भतीजों और चमचों के अपराधों में शामिल होने के बावजूद पुलिस उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं करती, बल्कि उनके बचाव में पैतरेबाजी करती रहती है। आज प्रदेश की सपा सरकार कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर विफलता के लिए जो ज़लालत झेल रही है, उसका मुख्य कारण भी यही है कि न तो पुलिस में राजनीतिक संरक्षण प्राप्त अभियुक्तों को पकड़ने का मनोबल है और न ही राजनीतिक नेतृत्व ने उसे इतनी स्वतन्त्रता दे रखी है।  

नतीजा कुल मिला कर यह कि नियम-कानून नेताओं और दबंगों के पैरों की ठोकर खाते लुढ़के पड़े हैं। सामान्य जनता ही है जो नियम-क़ानूनों से डरती है। 



       

Tuesday, July 01, 2014

नौकरी से रिटायर


पत्रकार के रूप में 37 साल की नौकरी के बाद 30 जून को मैं औपचारिक रूप से रिटायर हो गया. अगस्त 1977 में ‘स्वतंत्र भारत’, लखनऊ  से यह सिलसिला शुरु हुआ था जहां से ‘नव भारत टाइम्स’, फिर वापस ‘स्वतंत्र भारत’, उसके बाद एक साल ‘दैनिक जागरण’ और पिछले 15 वर्ष ‘हिंदुस्तान’ में बीते. छह महीने के लिए कानपुर और दो साल के लिए पटना का कार्यकाल छोड़ कर सारा समय लखनऊ में ही तैनात रहा. दिल्ली-मुम्बई समेत दूसरे शहरों में जाने से यह संकोची पहाड़ी बचता, बल्कि भागता ही रहा लेकिन लखनऊ में ही कुछ कम नहीं मिला.

एमए-हैमे करके पहाड़ लौट कर मास्टर बनने की ख्वाहिश थी. संयोग कि पढ़ाई के दौरान ही पत्रकार बन गया और इसी में रम गया मगर कभी पछतावा नहीं हुआ. हां, पहाड़ न लौट पाने का मलाल बना हुआ है.

छात्र जीवन में छिट-पुट लिखने की कोशिश करते इस युवक को ठाकुर प्रसाद सिंह और राजेश शर्मा ने बहुत प्रेरित और उत्साहित किया. अशोक जी पहले सम्पादक और पत्रकारिता के गुरु मिले. उन्होंने खूब रगड़ा-सिखाया. नई पीढ़ी अशोक जी के बारे में शायद ही जानती हो. वे दैनिक ‘संसार’ में पराड़कर जी के संगी रहे और उन ही की परम्परा के और विद्वान सम्पादक थे. उन्होंने हिंदी टेलीप्रिण्टर के की-बोर्ड को तैयार करने में बड़ी भूमिका निभाई थी, हिंदी में क्रिकेट कमेण्ट्री की शुरुआत की थी और भारत सरकार के प्रकाशन विभाग में रहते हुए हिंदी में तकनीकी शब्द कोशों के विकास का मार्ग प्रशस्त किया था. फिर राजेंद्र माथुर मिले जिनके मन में आधुनिक हिंदी पत्रकारिता का विराट स्वप्न (विजन) था और ज़ुनून भी जिसे वे अपनी टीम के नवयुवकों के साथ शायद ज़्यादा बांटते थे. 1983 में ‘नव भारत टाइम्स’ का लखनऊ संस्करण शुरू करते वक़्त पत्रकारों की भर्ती के लिए जो विज्ञापन उन्होंने खुद लिखा था उसके शब्द आज भी दिमाग में गूंजते हैं- “…वे ही युवा आवेदन करें जो स्फटिक-सी भाषा लिख सकें और जिन्हें खबरों की सुदूर गंध भी उत्साह और सनसनी से भर देती हो.” (नई पीढ़ी के पत्रकार और पत्रकारिता के छात्र गौर फरमाएं ) आज जब मीडिया में भाषा ही सबसे ज़्यादा तिरस्कृत हो रही हो तो अशोक जी और राजेंद्र माथुर बहुत याद आते हैं. यहां मृणाल (पाण्डे) जी का भी ज़िक्र करना चाहूंगा जिनके साथ अखबार की भाषा (चंद्रबिंदु को लौटा लाने तक की कवायद) पर काम करने से लेकर रचनात्मक और सार्थक पत्रकारिता के सुखद अवसर भी मिले.

पिछले 15 वर्ष ‘हिंदुस्तान’ में अत्यंत चुनौती भरे, उत्साह पूर्ण और बहुत कुछ सीखने-सिखाने वाले रहे. यह ऐतिहासिक अखबार जो (बिहार को छोड़कर) गिनती में भी कहीं नहीं था, आज हिंदी के अग्रणी पत्रों में शामिल है. इसमें सम्पादकों से लेकर कुशल प्रबंधकों की एक बड़ी टीम का योगदान है. गर्व रहेगा कि मैं भी इस टीम में शामिल रहा.

अपनी 37 वर्षों की पत्रकारिता में मीडिया संस्थानों का स्वरूप बदलते करीब से देखा. सम्पादकों-पत्रकारों की प्राथमिकताएं और सफलता के पैमाने बदलते देखे. लम्बी गाथा है यह लेकिन संतोष है कि सम्पूर्णता में भारतीय पत्रकारिता आज भी अपना फर्ज़ निभा ले जाती है और संवेदनशील मानवीय मुद्दों के लिए हाशिए भी बचे हुए हैं.  

मेरे लिए यह कम आह्लाद की बात नहीं है कि अपने सभी सम्पादकों और प्रबंधन से मुझे बहुत स्नेह और सम्मान मिला. सबसे महत्वपूर्ण हासिल वे सहयोगी हैं जो इस दौरान मिले-बिछुड़े और जिनसे बहुत कुछ सीखा और गुस्सा व प्यार पाया. कुछ के साथ गाढ़ी दोस्ती हुई और पारिवारिक रिश्ते भी बने. स्वाभाविक है कि गिले-शिकवे भी बहुतों को होंगे और रहेंगे. चूंकि मैं सिर्फ एक नौकरी से रिटायर हुआ हूँ, इसलिए मेरे मन में उनकी जगह वैसी ही बनी रहेगी. मेरे बारे में क्या-कैसा सोचना या न सोचना पूरी तरह उनका विशेषाधिकार है.  

सभी का शुक्रिया.

-    नवीन जोशी, लखनऊ, 2 जुलाई, 2014     

Thursday, June 19, 2014

बाबू और जामुन का यह पेड़




इस बार भी जामुन खूब फला है, मेरे घर के ठीक सामने पार्क में लगे पेड़ में. दिन भर पके जामुन टप-टप टपकते रहते हैं. कई तो जामुनी रंग बिखेरते हुए सड़क, फुटपाथ,पार्क की दीवार या छांह में खड़ी किसी कार की छत में फूट पड़ते हैं और जो साबुत रह जाते हैं उन्हें आते-जाते लोग बीन ले जाते हैं. बच्चे दिन भर ढेले मार कर कच्चे-पके फल गुच्छों समेत तोड़ने की फिराक़ में रहते हैं जिन्हें कभी-कभी भगाना भी पड़ता है. किसी दिन सुबह-सुबह कुछ लोग पेड़ पर चढ़े नज़र आते हैं पॉलीथिन की थैलियों में जामुन तोड़ते हुए. एक दिन तो चौराहे पर फल बेचने वाले पेड़ पर चढ़े दिखे. सौ-डेढ़ सौ रु किलो के भाव जो बिक रहा है.कभी-कभी लगता है कि इस पेड़ पर हमारा हक़ है. फिर ख्याल आता है कि कैसा हक़! बचपन में पहाड़ में सुनते थे कि पेड़ में पके फल पर सबका हक़ होता है. खैर,हमारे घर के सामने करीब एक महीना यह हलचल-हंगामा चलता रहेगा, जब तक जामुन पकते रहेंगे. फिर साल भर कोई इसकी ओर नहीं देखेगा. हां, इसकी छांह में बहुत सारे लोग बैठते हैं, ट्यूशन पढ़ने वाले बच्चों से लेकर घर-घर सामान बेचने वाली महिलाओं के जत्थे तक.

यह पेड़ बाबू का लगाया या कहिए कि बचाया हुआ है. इसे देख कर उनकी याद आती है.


हम मई 1988 में पत्रकारपुरम के इस मकान में रहने आये थे. एक सौ मकानों की कॉलोनी में हम पहले थे जो यहां रहने आए. कई मकान अभी बन ही रहे थे जिनमें विलासपुरी मज़दूर परिवार समेत अपना ठिकाना भी बनाए हुए थे. उसके अलावा ठेकेदार का चौकीदार कैलाश था जिसकी गालियों और झग़ड़ों से अक्सर कॉलोनी गूंज जाती थी. बस! सांय-भांय करती तेज़ हवा चलती और पूरा घर बालू से भर जाया करता था. आज कॉमर्सियल हो चुकी इस कॉलोनी की भीड़, शोर और अट्टालिकाओं को देख कर कल्पना करना मुश्किल है कि शुरू में यह कितनी शांत और सुकून भरी रिहायश थी. कितनी तेज़ी से शहरीकरण हुआ है और इस प्रक्रिया में लखनऊ के मास्टर प्लान की निर्मम हत्या करने वाले खुद लखनऊ विकास प्राधिकरण और नगर निगम ही हैं.



बहरहाल, हमारे घर के सामने का पार्क तब ऊबड़-खाबड़ और उजाड़ था. इसे विकसित करने के नाम पर एलडीए ने कांटेदार तार से इसे घिरवा कर चारों कोनों पर एक-एक पौधा लगवा दिया था. कांटेदार तार कई जगहों से झूल गया था और आस-पास के गांवों की बकरियां और गाय-भैंसें अक्सर पार्क में घुस आतीं. बाबू ने उन्हें भगाना अपनी ज़िम्मेदारी बना ली. वे सुबह-शाम अपने नन्हे पोते को गोद में लिए कुर्सी पर बाहर बैठे रहते या टहलते और दिन में भी खिड़की से देखते रहते. ज़रूरत होने पर हांका मारते. पार्क के दूसरे कोनों में लगे पौधे पता नहीं कब नष्ट हो गये, उन्हें जानवर चर गए या कुचल गए या वे सूख गए. हमारे घर के सामने वाला पौधा बचा रहा. जानवरों के खुरों से कुचला तो वह भी गया, कभी किसी ने उस पर मुंह भी मारा ही होगा लेकिन बाबू की चौकसी से उसके प्राण बचे रहे. वे उसमें पानी डालते, कभी गुड़ाई करते. वह धीरे-धीरे बड़ा होने लगा. जामुन के पौधे के रूप में उसकी पहचान होने लगी.

कोई दो-तीन फुट का हुआ होगा कि एक सुबह वह पूरी तरह जमीन पर बिछा दिखा. शायद बच्चों की फुटबॉल से वह औंधा हो गया था. बाबू ने देखा तो चिंतित हो उठे. गनीमत थी कि नाज़ुक तना पूरी तरह अलग नहीं हुआ था. बाबू ने उसकी मरहम-पट्टी की, मतलब उसे हौले से खड़ा किया, उसकी जड़ के पास एक लकड़ी गाड़ी और डोरी के सहारे पौधे को उस लकड़ी से बांध कर खड़ा कर दिया. पौधा जी गया. एक बार और उस पौधे को ज़रूरी सहारा देना पड़ा. तब उसकी ऊंचाई ठीक-ठाक हो गई थी लेकिन आंधी से वह दोहरा हो गया था. तब बाबू ने उसे उठा कर एक रस्सी से कांटेदार तार के साथ बांध दिया.

पौधा बचा रहा और क्रमश: पेड़ बनता गया. आज हमारे सामने वह खूब बड़ा, घना छायादार और फलदार पेड़ है. बाबू को दुनिया छोड़े बीस बरस हो गए. उन्होंने इस पेड़ के जामुन नहीं चखे लेकिन उनकी वज़ह से कितने सारे लोग साल-दर-साल इसके फल खा रहे हैं. सच ही तो कहा है कि पेड़ लगाता कोई है और फल आने वाली पीढ़ियां खाती हैं. मुझे अच्छी तरह याद है, इसी कॉलोनी में रहने वाले हमारे मित्र राकेश शुक्ला बाबू से कहा करते थे कि आप इस पौधे को बचा तो रहे हैं लेकिन जब यह फल देने लगेगा तो आपके घर पर ही सबसे ज़्यादा पत्थर बरसेंगे. राकेश का इशारा पत्थर मार कर फल तोड़ने वालों से था. बाबू बस मुस्करा देते. वे बोलते बहुत कम थे मगर अपनी मुस्कराहट से बहुत कुछ कह देते थे. इन दिनों कभी-कभी हम पत्थर मार कर जामुन तोड़ने वाले लड़कों से परेशान होते हैं लेकिन बाबू की वह मुस्कराहट याद आ जाती है और गुस्सा काफूर हो जाता है. वह हंसी जैसे कहती है- पके फलों पर तो सबका हक़ है न!और भला, बच्चों को पत्थर उछालने से कौन रोक सका है!

बाबू की याद दिलाता एक नीम का पेड़ भी है. इसी पार्क में और जामुन के बगल में ही. उसका किस्सा भी मुझे भावुक बना देता है.

बाबू जब नौकरी में थे तो उन्हें कैनाल कॉलोनी (कैण्ट रोड पर सिंचाई भवन के पीछे) में एक क्वार्टर मिला हुआ था. कई क्वार्टरों वाला वह बड़ा अहाता था और अहाते के बीच में नीम का बड़ा पेड था. इसी क्वार्टर और अहाते में मैं छह से 27 साल की उम्र तक रहा. बाबू ने तो करीब 40 वर्ष वहां बिताए. बाद में किराए के मकानों से होते हुए हम गोमती नगर के पत्रकारपुरम में आ गए. बाबू अक्सर पुराने साथियों से मिलने कैनाल कॉलोनी जाया करते थे. मेरा बड़ा बेटा जब तीन-चार साल का था तो एक बार बाबू उसे भी ‘बब्बा का बचपन का घर’दिखाने कैनाल कॉलोनी ले गए. गर्मियों के दिन थे और अहाते का नीम खूब फला हुआ था. निमकौरियों से अहाता पट जाया करता था. जब वे लौटे तो मेरे बच्चे की मुट्ठी निमकौरियों से भरी हुई थी. उसने बाल सुलभ उत्साह के साथ हमें बताया कि इनको बोने से नीम का पेड़ निकलेगा. पुष्टि के लिए उसने बाबू की ओर देखा- ‘है ना बाबू?’बाबू के चेहरे पर हमारी बहुत परिचित हंसी खेल रही थी और उनकी गरदन ‘हां’में हौले-हौले हिल रही थी.

वे निमकौरियां बोई गईं. ज़ल्दी ही उनसे नन्हे-नन्हे पौधे निकल आए. बेटा बाबू के साथ उनको सींचता और बड़ा होते देखता रहता. बाद में उनमें से एक पौधा पार्क में जामुन की बगल में. पड़ोसी प्रमोद जी की बिटिया के नाम पर बाबू ने उसे रिंकी नीम कहा. एक पौधा घर की पश्चिमी चहारदीवारी के बाहर लगाया गया. उसे बेटे का नाम मिला, कंचन नीम. इन पौधों को बचाने में भी बाबू की बड़ी भूमिका रही क्योंकि दातून करने के शौकीन नन्हे नीम का सिर ही कलम करने पर उतारू रहते. चहारदीवारी के बाहर लगा नीम काफी बड़ा होने पर आंधी में ढह गया और उसे दुखी हो कर कटवाना पड़ा.पार्क का रिंकी नीम खूब आबाद है. हां, नीम का एक पौधा बाबू ने साथी महेश पाण्डे को भी दिया था. वह भी आज उनके इंदिरा नगर वाले घर के सामने लहलहा रहा है. हम जब भी उस नीम के नीचे खड़े होते हैं तो महेश याद करना नहीं भूलते कि यह नीम बाबू का दिया हुआ है.

कैनाल कॉलोनी का वह अहाता अब काफी बदल गया है लेकिन वह बूढ़ा नीम अब भी वहां खड़ा है. वह नीम मेरी बचपन की स्मृतियों का अभिन्न हिस्सा है. उसी का एक वंशज़ हमारे पत्रकारपुरम वाले जीवन का साक्षी बना खड़ा है. क्या बाबू ने सोच-समझ कर ही अपने पोते को कैनाल कॉलोनी से निमकौरियां लाने की प्रेरणा दी होगी?

इन दिनों हमारे घर के सामने टपकते जामुन अपना चटक रंग बिखेर रहे हैं. ज़ल्दी ही पकी हुई पीली-पीलीनिमकौरियों से यह सड़क पट जाएगी.

प्रकृति हमें अपने पुरखों से कितने अद्भुत माध्यम से जोड़े रखती है!

-नवीन जोशी




Wednesday, June 18, 2014

शहरों में यूं ही नहीं बने ‘युद्ध’ के हालात


-नवीन जोशी

शुरुआती किस्सा लखनऊ का है लेकिन अपने देश के किसी भी शहर के लिए बराबर मौज़ूं है.

लखनऊ विकास प्राधिकरण ने पड़ोसी ज़िले बाराबंकी के 210 गांवों को लखनऊ की सीमा में शामिल करने का फैसला किया है. हर कुछ साल के अंतराल पर पड़ोसी ज़िलों के गांवों को राजधानी के दायरे में मिला लिया जाता है. कभी का छोटा सा लखनऊ आज विशाल महानगर बन गया है और लगातार बढ़ता ही जा रहा है. इसे अब और विस्तार के लिए ज़मीन मिल जाएगी और बाराबंकी के उन गांवों के निवासी खुशफहमी पाल सकते हैं कि वे भी राजधानी का हिस्सा बनकर कुछ ऐसी सुविधाओं के हकदार बन जाएंगे जो अब तक उनके हिस्से में नहीं थीं.

जितना बड़ा लखनऊ आज है, उसी में सामान्य मगर ज़रूरी नागरिक सुविधाओं का क्या हाल है? इस भीषण गर्मी में जबकि तापमान 47 डिग्री तक पहुंच जा रहा है, राजधानी के ज़्यादातर इलाकों में बिजली-पानी के लिए हा-हाकार मचा हुआ है. कई-कई मुहल्लों को 14 से 18 घंटे तक बिजली नहीं मिल रही. इनमें पॉश कही जाने वाली और वीआईपी कॉलोनियां भी शामिल हैं. त्रस्त जनता बिजली-पानी के लिए सड़कों पर उतरी हुई है. धरना-प्रदर्शन से लेकर बिजली उपकेन्द्रों में तोड़-फोड़ और अधिकारियों के घेराव किए जा रहे हैं. और यह सिर्फ इस बरस का किस्सा नहीं है.

मानसून आने वाला है. बारिश होगी तो बहुत से इलाके तालाब बन जाएंगे, सीवर उफन उठेंगे और घरों में गंदा पानी भर जाएगा. सड़कों से लेकर गलियों तक कचरा बजबजाएगा. तब दूसरी तरह की जटिल समस्याएं सिर उठाएंगी. हैज़ा, मलेरिया, वायरल बुखार और डेंगू जैसी जानलेवा बीमारियां फैलेंगी. सरकारी अस्पतालों में आम मरीज़ों के लिए जगह कम पड़ जाएगी. जो महंगे नर्सिग होम में इलाज नहीं करा सकेंगे वे भगवान भरोसे रहेंगे.
आखिर हमारे शहरों की ऐसी दुर्गति क्यों हो गई है? यह सवाल हम दिल्ली और मुम्बई जैसे महानगरों के लिए भी पूछ सकते हैं.

सामान्य सा एक उदाहरण लेते हैं. राजधानी के एक मुहल्ले में साढ़े तीन-चार हज़ार वर्ग फुट में एक शांत कोठी थी. उसकी जगह अब 40 फ्लैटों वाली दस मंज़िला इमारत खड़ी है. पहले उस कोठी में एक संयुक्त परिवार रहता था. अब वहां 40 एकल परिवार बस गए हैं. पहले सीमित लोड वाला बिजली का एक कनेक्शन था, आज 40 कनेक्शन हैं और हर फ्लैट में एक या दो ए सी के कारण लोड कई गुना बढ‌‌ गया, जबकि सम्बद्ध उपकेंद्र की क्षमता लगभग वही है. उत्पादन बढ़ा नहीं लेकिन खपत कई गुना बढ़ गई. उपलब्ध बिजली का भी बड़ा हिस्सा जर्जर हो चुकी लाइनों से वितरण में छीझ जाता है. पुरानी कोठी में जिस पाइप लाइन से पानी आता था वह दस मंजिला इमारत में पानी नहीं पहुंचा सकती थी, सो बिल्डर महाशय ने ट्यूबवेल खुदवा दिया, जिसने तेज़ी से भूजल का स्तर गिराना शुरू कर दिया (कुछ वर्ष बाद और भी गहरा ट्यूबवेल खोदना पड़ेगा.) उस कोठी के सामने की सड़क पहले शांत रहती थी, अब कारों-मोटर साइकिलों की चिल्लप्पों मची रहती है. सड़क चौड़ी करने के लिए फुटपाथ खत्म कर दिए गए जिसके लिए वहां लगे छायादार पेड़ों की बलि ले ली गई. अब चूंकि सड़क और ज़्यादा चौड़ी नहीं हो सकती, इसलिए जाम लगाना लाजिमी है. वाहनों का शोर, प्रदूषण और दुर्घटनाएं बढ़ते जा रहे हैं.

यह एक मुहल्ले की एक कोठी का किस्सा था. इसे पूरे शहर पर लागू कर दीजिए. आवास विकास परिषद, विकास प्राधिकरण और कॉलोनाइजरों द्वारा शहर के मध्य और इर्द-गिर्द बनाई गई कॉलोनियों व अपार्टमेंट को भी इसमें जोड़ दीजिए. तालाबों, मैदानों और निजी जमीनों पर अवैध रूप से बनती जा रही इमारतों को भी इसमें शामिल कर लीजिए. रिहाइशी मकानों के बढ़ते व्यापारिक इस्तेमाल को इसी का हिस्सा मानना पड़ेगा और झुग्गी बस्तियों को इससे अलग कैसे रखा जा सकता है. विकास का ढांचा ही ऐसा बना दिया गया है कि प्रगति के लिए हर व्यक्ति गांवों से शहरों की तरफ भागने को मज़बूर है और शहरों का हर कोना बहुमंजिला इमारतों और झोपड़ पट्टियों से पटा जा रहा है.

अब अंदाज़ा लगाइए कि हमारे शहरों की, जो 25-30 वर्ष पहले तक सुकून भरे नगर थे, नागरिक सुविधाओं का क्या हाल नहीं हुआ होगा! इन नगरों की बिजली-पानी, जल निकासी, सफाई, सड़क, आदि की सीमित क्षमताएं थीं. अंधाधुंध निर्माण और विस्तार ने उन पर इतना भारी-भरकम बोझ डाल दिया कि वे चरमरा गईं. अब बिजली-पानी के लिए युद्ध जैसी स्थितियां क्यों नहीं होंगी? जरा सी बरसात में बाढ़ जैसे हालात क्यों नहीं बनेंगे? टनों कचरा सड़कों के किनारे कैसे नहीं सड़ता रहेगा? और बेशुमार वाहनों से सड़कें-गलियां कैसे नहीं पटी रहेंगी?

स्वाभाविक ही आप पूछेंगे कि शहरों के मास्टर प्लान का क्या हुआ? जी, मास्टर प्लान बने और बन रहे हैं. कागजों में वे हमारे शहरों को खूबसूरत बनाते दिखते हैं लेकिन शायद ही महानगर बनते किसी शहर में मास्टर प्लान का आंशिक पालन भी हुआ हो. किसी भी शहर के अगले 20-25 वर्षों के सुनियोजित विकास के लिए मास्टर प्लान अत्यंत ज़रूरी दस्तावेज़ होता है. इसीलिए यह नगर नियोजन का अनिवार्य हिस्सा है. मास्टर प्लान में शहर के चौतरफा विकास की योजनाएं यह ध्यान में रख कर बनाई जाती हैं कि अगले दो-ढाई दशक में उसकी आबादी कितनी हो जाएगी, उसके लिए मूलभूत सुविधाओं की कितनी-कैसी ज़रूरतें होगी और वे कैसे पूरी की जाएंगी. इसमें मकानों की ज़रूरत से लेकर बिजली, पानी, सड़क, सीवर, यहां तक कि पर्यावरण तक को ध्यान में रखा जाता है. खेद है कि नगर नियोजन विभागों, विकास प्राधिकरणों और नगर निगमों ने अपने ही बनाए खूबसूरत मास्टर प्लान की धज्जियां उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. नतीजा यह है कि जहां तालाब और पार्क होने चाहिए थे वहां बहुमंजिला इमारतें हैं, जहां सिर्फ आवासीय भवन होने थे वहां बेहिसाब निर्माण हो गए. सड़कों, मैदानों, पार्कों, बाज़ारों में अवैध कब्ज़े हो गए, नदियां नाला बन गईं और वे भी अतिक्रमण से पट गए तथा हमारे शहर अराजक एवं बेतरतीब विकास का नमूना बन कर रह गए.

इस सबके बावज़ूद शहरों को बड़ा, और बड़ा बनाया जा रहा है. नई दिल्ली, एन सी आर बन कर फैल रही है, मुम्बई में अब किसी नए व्यक्ति के लिए जगह नहीं बची और लखनऊ, बाराबंकी व उन्नाव में घुसा जा रहा है. कहां से आएंगी इनके लिए सुविधाएं? बेहतर मास्टर प्लान नए नगरों या शहर से दूर उप नगरों के विकास की वकालत करते हैं. बाराबंकी को लखनऊ में मिलाते जाने की बजाय बाराबंकी को ही लखनऊ से बेहतर क्यों नहीं बनाया जाता? केंद्र में सत्तारूढ़ हुई नई मोदी सरकार ने अपने एजेण्डे में एक सौ नए नगर बनाना भी शामिल किया है. चरमराते महानगरों से आबादी का बोझ कम करने के लिए यह बेहद ज़रूरी है और उतना ही ज़रूरी है कि मास्टर प्लान का कड़ाई से पालन सुनिश्चित कराया जाए.

दुनिया भर में जिन खूबसूरत आधुनिक शहरों की चर्चा होती है वे अपने सुंदर मास्टर प्लान और उसके सुनिश्चित पालन के लिए जाने जाते हैं. इसके लिए पक्षपात रहित एवं दृढ़ इच्छा शक्ति वाले नेतृत्व, भावी पीढ़ी की ज़रूरतों के प्रति जागरूकता और प्राकृतिक संसाधनों का सम्मान करने की दृष्टि चाहिए.
दुर्भाग्य से यही हमारे यहां लुप्तप्राय श्रेणी में आते हैं.  
  
 



Tuesday, June 17, 2014

दिलीप मण्डल और आर अनुराधा

दिलीप मण्डल से थोड़ा परिचय है. एक-दो बार मुलाकात भी है.. उनकी किताब 'मीडिया का अण्डरवर्ल्ड' का विमोचन लखनऊ पुस्तक मेले में हुआ था और मैं भी उनके साथ मंच पर था. अनुराधा को बिल्कुल नहीं जानता था. उनकी मौत की खबर फेसबुक से पता चली और मनीषा पाण्डे की पोस्ट से उनको जाना. अफसोस किया कि में अनुराधा से मिला क्यों नहीं..... आज फेसबुक पर दिलीप की यह पोस्ट पढ़ी. इसे अपने ब्लॉग पर लगाते हुए अनुराधा को और उससे ज़्यादा दिलीप को सलाम भेजता हूं.

मैं अब खाली हो गया हूं. बिल्कुल खाली – Dilip Mandal

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मैं अब खाली हो गया हूं. बिल्कुल खाली.
मैं अपनी सबसे प्रिय दोस्त के लिए अब पानी नहीं उबालता. उसके साथ में बिथोवन की सिंफनी नहीं सुनता. मोजार्ट को भी नहीं सुनाता. उसे ऑक्सीजन मास्क नहीं लगाता. उसे नेबुलाइज नहीं करता. उसे नहलाता नहीं. उसके बालों में कंघी नहीं करता. उसे पॉल रॉबसन के ओल्ड मैन रिवर और कर्ली हेडेड बेबी जैसे गाने नहीं सुनाता. गीता दत्त के गाने भी नहीं सुनाता. उसे नित्य कर्म नहीं कराता. उसे कपड़े नहीं पहनाता. उसे ह्वील चेयर पर नहीं घुमाता. उसे अपनी गोद में नहीं सुलाता. उसे हॉस्पीटल नहीं ले जाता. उसे हर घंटे कुछ खिलाने या पिलाने की अक्सर असफल और कभी-कभी सफल होने वाली कोशिशें भी अब मैं नहीं करता. उसकी खांसने की हर आवाज पर उठ बैठने की जरूरत अब नहीं रही. मैं अब उसका बल्ड प्रेशर चेक नहीं करता. उसे पल्स ऑक्सीमीटर और थर्मामीटर लगाने की भी जरूरत नहीं रही. मेरे पास अब कोई काम नहीं है. हर दिन नारियल पानी लाना नहीं है. फ्रेश जूस बनाना नहीं है. उसके लिए हर दिन लिम्फाप्रेस मशीन लगाने की जरूरत भी खत्म हुई.
यह सब करने में और उसके के साथ खड़े होने के लिए हमेशा जितने लोगों की जरूरत थी, उससे ज्यादा लोग मौजूद रहे. उसकी बहन गीता राव, मेरी बहन कल्याणी माझी और उसकी भाभी पद्मा राव से सीखना चाहिए कि ऐसे समय में अपने जीवन को कैसे किसी की जरूरत के मुताबिक ढाल लेना चाहिए. इस लिस्ट में मेरे बेट अरिंदम को छोड़कर आम तौर पर सिर्फ औरतें क्यों हैं? देश भर में फैली उसकी दोस्त मंडली ने इस मौके पर निजी प्राथमिकताओं को कई बार पीछे रख दिया.
यह अनुराधा के बारे में है, जो हमेशा और हर जगह, हर हाल में सिर्फ आर. अनुराधा थी. अनुराधा मंडल वह कभी नहीं थी. ठीक उसी तरह जैसे मैं कभी आर. दिलीप नहीं था. फेसबुक पर पता नहीं किस गलती या बेख्याली से यह अनुराधा मंडल नाम आ गया. अपनी स्वतंत्र सत्ता के लिए बला की हद तक जिद्दी आर. अनुराधा को अनुराधा मंडल कहना अन्याय है. ऐसा मत कीजिए.
कहीं पढ़ा था कि कुछ मौत चिड़िया के पंख की तरह हल्की होती है और कुछ मौत पहाड़ से भारी. अनुराधा की मृत्य पर सामूहिक शोक का जो दृश्य लोदी रोड शवदाह गृह और अन्यत्र दिखा, उससे यह तो स्पष्ट है कि अनुराधा ने हजारों लोगों के जीवन को सकारात्मक तरीके से छुआ था. वे कई तरह के लोग थे. वे कैंसर के मरीज थे जिनकी काउंसलिंग अनुराधा ने की थी, कैंसर मरीजों के रिश्तेदार थे, अनुराधा के सहकर्मी थे, सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता थे, प्रोफेसर थे, पत्रकार, डॉक्टर, अन्य प्रोफेशनल, पड़ोसी और रिश्तेदार थे. कुछ तो वहां ऐसे भी थे, जो क्यों थे, इसकी जानकारी मुझे नहीं है. लेकिन वे अनुराधा के लिए दुखी थे. किसी महानगर में किसी की मौत को आप इस बात से भी आंक सकते हैं कि उससे कितने लोग दुखी हुए. यहां किसी के पास दुखी होने के लिए फालतू का समय नहीं है.
अनुराधा बनना कोई बड़ी बात नहीं है.
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आप भी आर. अनुराधा हैं अगर आप अपनी जानलेवा बीमारी को अपनी ताकत बना लें और अपने जीवन से लोगों को जीने का सलीका बताएं. आप आर. अनुराधा हैं अगर आपको पता हो कि आपकी मौत के अब कुछ ही हफ्ते या महीने बचे हैं और ऐसे समय में आप पीएचडी के लिए प्रपोजल लिखें और उसके रेफरेंस जुटाने के लिए किताबें खरीदें और जेएनयू जाकर इंटरव्यू भी दे आएं. यह सब तब जबकि आपको पता हो कि आपकी पीएचडी पूरी नहीं होगी. ऐसे समय में अगर आप अपना दूसरा एमए कर लें, यूजीसी नेट परीक्षा निकाल लें और किताबें लिख लें, तो आप आर. अनुराधा हैं.
दरवाजे खड़ी निश्चित मौत से अगर आप ऐसी भिड़ंत कर सकते हैं तो आप हैं आर. अनुराधा.
जब फेफड़ा जवाब दे रहा हो और तब अगर आप कविताएं लिख रहें हैं तो आप बेशक आर. अनुराधा हैं. आप आर अनुराधा हैं अगर कैंसर के एडवांस स्टेज में होते हुए भी आप प्रतिभाशाली आदिवासी लड़कियों को लैपटॉप देने के लिए स्कॉलरशिप शुरू करते हैं और रांची जाकर बकायदा लैपटॉप बांट भी आते हैं. अगर आप सुरेंद्र प्रताप सिंह रचना संचयन जैसी मुश्किल किताब लिखने के लिए महीनों लाइब्रेरीज की धूल फांक सकते हैं तो आप आर अनुराधा हैं.
और हां, अगर आप कार चलाकर मुंबई से दिल्ली दो दिन से कम समय में आ सकते हैं तो आप आर अनुराधा हैं. थकती हुई हड्डियों के साथ अगर आप टेनिस खेलते हैं और स्वीमिंग करते हैं तो आप हैं आर अनुराधा. अगर महिला पत्रकारों का करियर के बीच में नौकरी छोड़ देना आपकी चिंताओं में हैं और यह आपके शोध का विषय है तो आप आर. अनुराधा हैं. अपना कष्ट भूल कर अगर कैंसर मरीजों की मदद करने के लिए आप अस्पतालों में उनके साथ समय बिता सकते हैं, उनको इलाज की उलझनों के बारे में समझा सकते हैं, उन मरीजों के लिए ब्लॉग और फेसबुक पेज बना और चला सकते हैं तो आप आर. अनुराधा हैं.
आप में से जो भी अनुराधा को जानता है, उसके लिए अनुराधा का अलग परिचय होगा. उसकी यादें आपके साथ होंगी. उन यादों की सकारात्मकता से ऊर्जा लीजिए.
अलविदा मेरी सबसे प्रिय दोस्त, मेरी मार्गदर्शक.
तुम्हारी मौत पहाड़ से भारी है.

Saturday, September 14, 2013

मरती भाषाओं के दौर में

(यहां मैं इसे ' जानकीपुल' से साभार ले रहा हूँ-नवीन जोशी.) आज हिंदी दिवस है. सरकारी संस्थाओं में जय हिंदी-जय हिंदी कहने का दिन. लेकिन कल जब मैंने प्रसिद्ध इतिहासकार शेखर पाठक का यह लेख पढ़ा तब से मेरा ध्यान इसी में अटका हुआ है. आप भी पढ़िए, सोचने को विवश करनेवाला यह लेख- मॉडरेटर.)
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कभी रघुवीर सहाय ने कहा था, ‘न सही कविता मेरे हाथ की छटपटाहट सही’। यही बात भाषा के बारे में कही जा सकती है। सिर्फ मनुष्य अपनी छटपटाहट को भाषा यानी शब्द दे सका है। यह कहानी सत्तर हजार साल पहले शुरू होती है, हालांकि लिपियों का संसार करीब पांच हजार साल पहले बनना शुरू हुआ। आज भाषा मानव अस्तित्व की अनिवार्यता और पहचान हो गई है और वही उसे अन्य जीव प्रजातियों से अलग करती है। 
वडोदरा की ‘भाषा शोध तथा प्रकाशन केंद्र’ नामक संस्था अभी बीस साल की भी नहीं हुई थी कि उसकी नजर में सौ साल पहले किया गया जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन का भारतीय भाषा सर्वेक्षण आ गया। उसने ग्रियर्सन के सौ साल बाद भारत के वर्तमान भाषा परिदृश्य पर नजर डालने का निर्णय किया। उसने किसी प्रकार के भाषा वैज्ञानिक या भाषा ऐतिहासिक काम करने का दावा नहीं किया था। उसका लक्ष्य भारतीय भाषाओं के लोक-सर्वेक्षण का था। यानी सदियों में बनी और विकसित हुई भाषाओं, जो सामूहिक, सांस्कृतिक समुच्चय की तरह हैं, पर आज की आर्थिकी, संसाधनों की लूट और अपने क्षेत्रों से पलायन के कारण जो दबाव बना है उसे समझना। ‘विकास’ ने किस तरह समुदायों और फिर भाषाओं को सिमटने और मिटने को विवश किया है, इसकी पड़ताल करना। 
‘भाषा’ कहीं भी भाषाओं को कम या अधिक महत्त्व की श्रेणियों में नहीं बांटती और न बोलने वालों की संख्या के अनुसार उनका स्थान निर्धारित करती है। इस अभियान ने भाषा और बोली या लिपि के होने या न होने का विभाजन भी किनारे रख दिया था। खासकर उन भाषाओं की पड़ताल करना इसका लक्ष्य था, जिनके सिर पर खो जाने का खतरा मंडरा रहा है। यह कार्य कहीं भी ग्रियर्सन के भारतीय भाषा सर्वेक्षण का विकल्प, उसका दोहराव या उसके समांतर नहीं है। यह भारतीय भाषाओं का व्यापक सर्वेक्षण या उनके साहित्य की गहन पड़ताल भी नहीं है। 
यह 2011 में भारतीय समुदायों में अब भी जीवित तमाम भाषाओं का एक विस्तृत परिदृश्य प्रस्तुत करने की कोशिश है। ‘भाषा’ विभिन्न समुदायों का एक ऐसा नेटवर्क बनाना चाहती थी, जो टिकाऊ विकास की ऐसी योजना तैयार कर सके, जिसमें समुदाय अपने पारंपरिक ज्ञान की पड़ताल कर सकें और उसकी हिफाजत भी। यह संस्था उस जैविक, सांस्कृतिक और भाषाई विविधता को कायम रखना चाहती है, जिसे सदियों से तमाम लिपिविहीन या सामान्य भाषाओं ने संरक्षण दिया है। वह चाहती है कि भारत के विविध भाषा समुदायों में अधिक गहरा रिश्ता बने, जिससे भारतीय समाज में बहु-भाषिकता और सांस्कृतिक बहुलता को मजबूती मिले और भारत एक मिले-जुले भाषा और संस्कृति क्षेत्र के रूप में विकसित हो सके। 
यह सरकार और समाज के बीच भी ऐसा रिश्ता विकसित करना चाहती है, जिसमें सरकार को विकास की ऐसी रणनीति बनाने को बाध्य किया जा सके, जो समुदायों के पारिस्थितिकीय और सांस्कृतिक संदर्भों से तालमेल रखे। मातृभाषाओं में शिक्षा के लिए क्षमता बढ़ाने और पाठ्य सामग्री विकसित करने का काम करना चाहती है। भारत के किसी भावी भाषाई और सांस्कृतिक विविधता के सर्वेक्षण के लिए एक मूल आधार तैयार करना; विश्व की भाषा विविधता के संरक्षण में योगदान देना और भाषा को राजनीतिक या प्रशासनिक सीमाओं से आगे पारिस्थितिकीय क्षेत्रों के आधार पर देखना इसके अन्य लक्ष्य हैं। 
इस संस्था को जनजातियों के बीच काम करने के अनुभव के कारण विभिन्न जनजातियों या समुदायों की भाषा विविधता का ज्ञान था। यह विविधता भूगोल, प्राकृतिक संसाधन, आर्थिकी, स्थायी निवासी या घुमंतू होने से भी जुड़ी थी। ग्रियर्सन ने जो काम 1903 से 1923 के बीच दुनिया के सामने रखा, उसका सामान उन्नीसवीं सदी के अंतिम डेढ़-दो दशकों में जमा किया गया था। 
ग्रियर्सन ने एक सौ उन्यासी भाषाओं और पांच सौ चौवालीस बोलियों की चर्चा की है। तब भी एक सौ उन्यासी भाषाओं में से एक सौ पैंसठ पर संकट छाया हुआ था। ग्रियर्सन की टीम पूरे देश की भाषाओं का सर्वेक्षण नहीं कर सकी और जिन प्रांतों में यह काम हुआ, वहां की भी अनेक भाषाएं सामने आने से रह गई थीं। पर इस सर्वेक्षण का अपना महत्त्व था। 
इसी बीच 1921 की जनगणना संपन्न हुई और उसमें एक सौ अट्ठासी भाषाएं और मात्र उनचास बोलियां गिनाई गर्इं। तब औपनिवेशिक तंत्र में स्वाभाविक ही अंग्रेजी का वर्चस्व था और भारतीय राष्ट्रवाद या नवजागरण हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं की मार्फत बोल रहा था। अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त नई पीढ़ी अपनी भाषाओं की तरफ लौट रही थी। यह भी सच है कि औपनिवेशिक काल में भारत की मात्र दो प्रतिशत भाषाएं मुद्रण की दुनिया में प्रवेश कर सकी थीं। यानी तब मौखिकता (ओरलिटी) भाषाओं का एक प्रमुख तत्त्व था। 
हिंदी को गांधी से राजगोपालाचारी तक का समर्थन प्राप्त था और अभी भाषा की मामूली राजनीति शुरू नहीं हुई थी। भारत के अधिकतर आंदोलनकारी बहुभाषी थे और भारतीय समाज का भाषाई मिजाज भी यही था। आजादी के बाद अंग्रेजियत का ही नहीं, अंग्रेजी का भी वर्चस्व बना रहा। हिंदी सिर्फ ‘राजभाषा’ बन पाई। सच यही है कि सिर्फ भारतीय समाज उसे ‘राष्ट्रभाषा’ बना सकता है, पर अन्य भाषाओं का भी उतना ही गहरा सम्मान करते हुए। किसी भी भाषा को दोयम दर्जे का नहीं कहा जा सकता।
आज हिंदी के फूल हिंदी हृदय प्रदेश से बाहर ‘तरह-तरह की हिंदी’ में खिले हैं, तो हिंदी की जड़ें अपनी ‘बोलियों’ से खाद-पानी पाती हैं। तब हिंदी की इस दुनिया में खड़ी बोली थी तो ब्रजभाषा भी और कौरवी, कुमाऊंनी, गढ़वाली से भोजपुरी, मैथिली, मालवी, राजस्थानी आदि तक का सिलसिला था। उर्दू और दक्खिनी हिंदी भी उससे दूर नहीं थी। 
अनेक बहुभाषी रचनाकारों का होना भी भारत के लिए सौभाग्य की तरह था। तभी राज्य पुनर्गठन आयोग ने भाषाई आधार पर प्रांतों के पुनर्गठन का विचार दे डाला। इससे मुश्किलें बढ़ीं और समाधान नहीं निकल सके। फिर जब लोहिया ने ‘अंग्रेजी हटाओ’ का नारा दिया तो दक्षिण- विशेष रूप से तमिलनाडु- में हिंदी विरोध चरम पर पहुंच गया। हालांकि मद्रास में हिंदी फिल्में बनती रहीं और ‘चंदामामा’ भी वहां से छपती रही। 
1961 की जनगणना में भारत में 1652 ‘मातृभाषाएं’ बताई गई थीं। दुर्भाग्य से जब 1971 की जनगणना हुई तो किसी नासमझी से उन भाषाओं के आंकड़े नहीं दिए गए या उन सबको ‘अन्य भाषाओं’ में गिना गया, जिनको बोलने वालों की संख्या दस हजार से कम थी। 1971 में दस हजार से ऊपर की आबादी में बोली जाने वाली एक सौ आठ भाषाओं की चर्चा है। एक प्रकार से सरकारी तौर पर लगभग पंद्रह सौ ‘मातृभाषाओं’ को दफ्न कर दिया गया। यह सरकारी तौर पर पहला ‘भाषा संहार’ (गणेश देवी इसे ‘फोनोसाइड’ कहते हैं) था। सामाजिक-सांस्कृतिक वास्तविकता यह थी कि हमारे ऐतिहासिक प्रवाह में बोलियां सदा धारा का गतिशील हिस्सा बनी रहीं और भाषाएं किनारे शान से खड़ी होती रहीं। ‘बोलियों’ के प्रवाह की गति से ‘भाषाओं’ को भी नमी और ताप मिलता रहता था। 
फिर भाषाई प्रांतों के विचार-फलन के बाद संविधान की आठवीं अनुसूची बनी। अभी इस अनुसूची में बाईस भाषाएं हैं। संविधान की धारा 347 के अनुसार राज्य द्वारा नई भाषाओं को मान्यता देने का प्रावधान है। यूनेस्को के द्वारा प्रकाशित संकटग्रस्त भाषाओं के एटलस में एक सौ सत्तर भारतीय भाषाओं को खतरे में बताया गया है। यूनेस्को ने दस हजार से कम बोलने वालों की भाषाओं को भी लिया है। हालांकि यूनेस्को का एटलस बहुत-सी खामियां लिए है, पर यह एटलस विश्व संस्था द्वारा की गई महत्त्वपूर्ण पहल है। भाषा मनुष्य की सांस्कृतिक थाती का सबसे महत्त्वपूर्ण हिस्सा है, क्योंकि यह हमारे मनुष्य होने का प्रमाण है और रचनात्मकता को प्रकट करने का माध्यम भी।
अभी दुनिया में मौजूद अनुमानित छह हजार भाषाओं में से बाईसवीं सदी तक मात्र तीन सौ भाषाओं के जीवित बचे रहने की संभावना प्रकट की गई है। इसका अर्थ हुआ कि हम अनेक समुदायों को तब तक या तो खो देंगे या वे किन्हीं और समाजों में विलीन हो जाएंगे। पर आज दुनिया और देश के अनेक समुदायों में अपनी स्थिति समझने और बदलने की चेतना दिखाई देती है। उन्हें सरकारों और निगमों/ कंपनियों से लड़ते हुए देखा जा सकता है। 
इसलिए अनेक लोगों को लगता है कि अब भाषाओं को बचाने की संभावना बढ़ गई है। आज पापुआ न्यूगिनी (900), भारत (870), इंडोनेशिया (600), नाइजीरिया (400), मैक्सिको (300) आदि भाषाई संपन्नता और विविधता वाले देश हैं। इनके मुकाबले औद्योगिक क्रांति वाले या विकसित देशों में यह भाषाई संपन्नता और विविधता नहीं है। अफ्रीका, अमेरिका, लातिनी अमेरिका और आस्ट्रेलिया में कैसे जन-भाषाओं का संहार किया गया, यह छिपा नहीं है। आज भाषा चेतना किसी भी और समय के मुकाबले अधिक है, उसे राजनीतिक और आर्थिक चेतना के साथ जोड़ने की जरूरत है। 
इतिहास में कई बार भाषाओं पर संकट मडराया। पहला संकट तब आया जब मनुष्य पशुचारण से खेती की ओर आया या कहें कि घुुमक्कड़ी से स्थायी बसाहटों की ओर आया। उद्योगीकरण के दौर में दूसरा संकट आया। यह उपनिवेशवाद से जुड़ा था। पर सबसे बड़ा संकट आज खगोलीकरण के दौर में आया है। क्योंकि पूंजीवाद के इस रूप की मुख्य फितरत एकल संस्कृति की है। वह पृथ्वी पर किसी भी तरह की विविधता नहीं चाहता है। कुछ विचार और संस्थाएं भी देशों या क्षेत्रों में इस तरह की विविधता के खिलाफ हैं। यह असहज और अप्राकृतिक स्वभाव कहा जा सकता है और इसका ज्यादा टिकना संभव नहीं होगा। 
‘भाषा’ संस्था ने मात्र दो साल के भीतर तीन हजार भाषाविदों, भाषा कार्यकर्ताओं और समुदायों के सहयोग से आठ सौ सत्तर भाषाओं को सामने लाने में कामयाबी हासिल की है। यह काम इक्यावन या इससे भी अधिक खंडों में प्रकाशित हो रहा है। इसमें भारत की छियासठ लिपियां सामने आएंगी और एक संकेत/ इशारा (‘साइन’) भाषा भी। इस भाषा पर एक पूरा खंड है। इन खंडों में भारतीय हिमालयी क्षेत्र की सत्तर और समुद्र तटीय क्षेत्र की पैंतालीस भाषाएं प्रस्तुत हुई हैं। जनजातीय भाषाओं की कुल संख्या साढ़े तीन सौ से अधिक है। 
यह संस्था भाषाओं के नमूने रिकार्ड करने, सामुदायिक नृजातीय अध्ययन, पारिस्थितिकीय-सांस्कृतिक नक्शा तैयार करने का काम करेगी। यह एक ऐसे अंतरविश्वविद्यालयी केंद्र की स्थापना करना चाहती है, जहां गैर-अनुसूचित भाषाओं (जो आठवीं अनुसूची में नहीं हैं) का अध्ययन किया जाएगा। संस्था का सपना एक अखिल एशियाई भाषा सर्वेक्षण करने का भी है। वह सपने देखती है और उनको हथेली का यथार्थ भी बनाती है।
'जनसत्ता' से साभार