स्कूल में पढ़ा था कि इनसान
को दिखाई कैसे देता है। जब किसी वस्तु से परावर्तित रोशनी हमारी आँखों में पड़ती है
तो उसका सही-सही चित्र आँख के पीछे बन जाता है और दिमाग उसे देख लेता है। इसी भ्रम
में जीते-जीते हम बूढ़े हो आए! अब समझ में आया कि यह किताबी बातें बच्चों को
विज्ञान का सिद्धान्त समझाने के लिए होती हैं। जीवन में देखने-न देखने का विधान
कुछ और ही होता है।
हमारा ही दोष होगा कि अपने
ज़्यादातर मित्र व परिचित नियम-कानून का पालन करने वाले हैं। एक परिचित उस रोज़ बहुत
दुखी होकर आए। उन्होने एलडीए से एक छोटा प्लॉट खरीदा था। नियमानुसार नक्शा बनवा कर
पास करवाया और उसी के मुताबिक निर्माण शुरू किया। नींव ही भरी
जा रही थी कि एक दोपहर मिस्त्री का फोन आ गया- “साहेब,
एक साहेब आए रहे और काम रुकवाय गए हैं।” भागे-भागे प्लॉट पर पहुंचे। पता चला,
इलाके के जे ई आए थे। मिलने को कह गए हैं।
जे ई से अर्ज़ किया गया कि
हुज़ूर, एक-एक इंच नाप कर पूरा नक्शे के हिसाब से बन रहा है। आप खुद
नाप-जोख कर लीजिए लेकिन जे ई के देखने में कोई फर्क नहीं पड़ा। लोगों ने समझाया कि चढ़ावा
चढ़ाओ। सही दिखने लगेगा। लेकिन वे कहते रहे
कि जब ज़रा भी गलत निर्माण नहीं हो रहा तो चढ़ावा कैसा। नियम-कानून के पक्के थे। सो,
अपने मकान का काम रुकवा कर देखने चले कि कहाँ-कहाँ कैसा निर्माण हो रहा है।
इलाके में निकले तो हज़ार
नज़ारे। मकान की जगह खड़ी दुकानें। नक्शा आवासीय, निर्माण शॉपिंग
काम्प्लेक्स का। नक्शा तीन मंज़िला, निर्माण पाँच मंज़िला। डायरी और फोन में सबूत लेकर
पहुंचे। जे ई ने डपट दिया कि ज़्यादा तीन-पाँच करोगे तो तुम्हारा मकान सील कर दिया
जाएगा। इतना किस्सा लेकर हमारे पास आए थे और बहुत गुस्से में थे। नियम-कानून मानने
वाला गुस्सा ही कर सकता है और अपना खून जलाता रहता है।
अखबार दिखाते हुए बोले- “ये
देखिए, कोई नटवर लाल हैं, उन्होंने पाँच मंज़िल का नक्शा पास करवाया और सात
मंज़िल का अपार्टमेण्ट बना लिया। यह एलडीए के इंजीनियरों को नहीं दिखता?”
हमने कहा- “कई मामलों में
पाँच मंज़िल के ऊपर नहीं दिखता। गर्दन इतनी ऊपर नहीं उठ पाती।“
-“और ये होटल देखिए,
एलडीए दफ्तर के ठीक पीछे। इसमें कितने नियमों का पालन हो रहा है?”
-“यह भी ऊंची इमारत है।
ऊँचाई पर चमक ज़्यादा होती है, दिखता नहीं।”
-“यह प्लॉट एकल आवासीय है
और शॉपिंग कॉम्प्लेक्स खड़ा हो गया।” उन्होंने अपना स्मार्ट फोन निकाल कर हमें फोटो
दिखानी शुरू की।
-“आप गुस्से में हैं,
इसलिए आपको शॉपिंग कॉम्प्लेक्स दिख रहा है। इंजीनियरों को आवासीय भवन ही दिखता
होगा। आपने इंजीनियरिंग नहीं पढ़ी है।”
उन्होंने दूसरा फोटो हमारे
सामने किया- “इस अवैध इमारत को कोर्ट ने गिराने को कहा था। क्यों नहीं गिराई?”
उनका गुस्सा बढ़ता जा रहा था।
-“गिरा तो दी थी। इंजीनियर
पूरी टीम लेकर गए थे। सबसे ऊपरी मंज़िल की पैरापीट वॉल में मशीन से छेद भी किए थे।
कोर्ट में दिखाने के लिए फोटो भी खींचे थे।”
-“गिराई थी तो फिर कैसे उग
आई इतनी बड़ी बिल्डिंग?” चिढ़ कर वे चीखे- “और यह गजब देखिए...” उन्होंने
फोन पर वीडियो चला दिया- “बाहर से बिल्डिंग सील है, यह देखिए सील... और अंदर
निर्माण जारी है, देखिए-देखिए, काम पूरे ज़ोरों से चल रहा है।”
-“लेकिन बाहर से तो पक्की सील है न! अंदर ही देखते रहेंगे
तो दूसरी बिल्डिंगें कैसे सही होंगी?” हमने तर्क किया।
-“और यहाँ नींव ही भरी जा
रही थी कि नक्शे का उल्लंघन दिख गया?” वे अपनी ही रौ में बड़बड़ाए जा रहे थे।
-“जी,
आपका प्लॉट छोटा है तो नींव के अंदर भी दिख जाता है। आप तालाब पर बड़ा अपार्टमेण्ट
बनाइए, उसकी नींव दिखेगी न मंज़िलें।”
वे लाल-लाल आखों से हमें
देखते रहे। जैसे, हम ही इंजीनियर हों। फिर फोन,
डायरी और अखबार समेट कर चले गए। अभी किसी ने बताया कि एलडीए ने उन्हें नोटिस भेज
दिया है। जल संस्थान से भी कई हज़ार रु का बिल आया है कि मकान के निर्माण में बहुत
पानी खर्च हो रहा है। वे स्मार्ट फोन लेकर जल संस्थान के लिए भी सबूत जुटा रहे हैं,
सुना।
तो साहबान,
कई बार देख कर भी नहीं दिखता। कभी आँख नहीं खुलती। कभी गर्दन नहीं उठती। अक्सर चमक
से आँखेँ चौंधिया जाती हैं। आँख का पानी मर जाए तो कैसे दिखे! और देखने पर उतारू
हों, तो हुज़ूर बिना देखे भी सब देख लेते हैं। इस निगाह के सदके!
(नाभाटा, लखनऊ, 3 अगस्त, 2014)
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