Wednesday, December 16, 2015

झुग्गी बस्तियों के पुनर्वास का रास्ता क्या हो


दिल्ली की शकूरबस्ती झोपड़पट्टी हटाने में एक बच्चे की दर्दनाक मौत ने हमारे महानगरों की इस विकराल समस्या की ओर एक बार फिर देश का ध्यान खींचा है. दिल्ली उच्च न्यायालय ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि जब तक इनके लिए कोई संतोषजनक पुनर्वास कार्यक्रम न बन जाए तब तक झुग्गियों को हटाया नहीं जाए. यही मानवीय और तार्किक बात लगती है और  जिस भी शहर में भी बड़े पैमाने पर झुग्गियां हटाई जाती हैं, समाधान के रूप में यही दोहराया जाता है. विचारणीय यहां यह है कि दिल्ली ही नहीं देश के हर महानगर/शहर की विशाल झुग्गी-आबादी के लिए कैसा पुनर्वास कार्यक्रम व्यावहारिक और संतोषजनक होगा.
समस्या के दो पहलू: अवैध झोपड़पट्टियों से हमारे सभी शहर पटे पड़े हैं. इनकी सबसे बड़ी बसासत रेल पटरियों के दोनों तरफ और कहीं-कहीं बीच में भी खाली पड़ी रेलवे की जमीन पर है. इसके बाद उनकी दूसरी बड़ी बसासत शहरों से बहने वाली नदियों और गंदे नालों के किनारे हैं. बरसात में जब कभी ये नदी-नाले उफनाते हैं तब झुग्गियों में मची भगदड़ से इसके अपार विस्तार का अंदाजा मिलता है. अभी चैन्ने की भयानक बाढ़ के कारणों की पड़ताल में एक तथ्य यह भी सामने आया कि नदियों और तालाबों के किनारे बसे बेशुमार झुग्गीवासियों ने खुद बाढ़ से बचने के लिए तटबंध काट दिए जिससे उनका पानी भरभरा कर शहर की नियोजित कॉलोनियों में पैठ गया था.
हर शहर में गगनचुम्बी इमारतों के महंगे फ्लैटोके पीछे भी बेहिसाब शहरीकरण का क्रूर सच झुग्गियों की कतारों के रूप में मौजूद है. शहरों की हर वह खाली जगह जो मनुष्य के रहने के लिए सर्वथा अनुपयुक्त है, एक विशाल आबादी की शरणगाह है. दिहाड़ी मजदूर हैं जो दो जून की रोटी कमाने शहर आए हैं. ठेला-रिक्शा खींचने, कबाड़ बीनने, भीख मांगने और फेरी लगाने वाले हैं. इनमें शहरों में अपना भाग्य आजमाने आए गरीब ग्रामीण हैं. टूटे सपनों के पंख लिए छटपटाते लोग हैं. कोठियों के फर्श और बर्तन चमकाती लड़कियों से लेकर शारीरिक धंधा करने को अभिशप्त स्त्रियां यहां हैं तो हर तरह के फर्जी, काले और अनैतिक धंधे में आकंठ डूबे युवा भी. ये सब भी “हम भारत के लोग” में शामिल हैं जिन्होंनेसामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय... तथा प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए 65 वर्ष पूर्व अपना संविधान आत्मार्पित किया था लेकिन यह सब न्याय और अवसर उन तक आने से पहले कहीं भटक गए. वे विकास की इसी भटकन की उपज हैं.
समस्या का दूसरा पहलू भी शकूरबस्ती हादसे से सामने आ जाता है. हादसे के बाद सामने आई एक रिपोर्ट के मुताबिक अकेले दिल्ली में रेलवे की जमीन पर 47 हजार झुग्गियों का कब्जा है और अपनी जमीन खाली नहीं करा पाने के कारण रेलवे की दो अरब साठ करोड़ रुपए की परियोजनाएं लटकी हैं. सन 2003 और 2005 में रेलवे ने दिल्ली सरकार को सवा ग्यारह करोड़ रुपए सिर्फ इसलिए दिए कि वह राजधानी में रेलवे की जमीनों पर अवैध रूप से बसी 4410 झुग्गियों को हटा दे. आज तक सिर्फ 297 झुग्गियां हटाई जा सकी हैं. इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह कितनी विकराल और जटिल समस्या है.
बेहिसाब और अराजक शहरीकरण: बहुत बड़ी संख्या में ये लोग देश के विभिन्न ग्रामीण अंचलों से बड़े शहरों की ओर इसलिए चले आए और आते जा रहे हैं कि इनके लिए अपने घर-गांव के पास दो रोटी का जुगाड़ नहीं बन पा रहा. आजाद भारत की सरकारों ने गांवों की विशाल आबादी को वहीं सम्मान से जीवन यापन कर पाने लायक स्थितियां मुहैय्या नहीं कराईं. कृषि प्रधान कहलाने वाले भारत की सरकारें खेती-किसानी और गांव को सम्मान और प्रतिष्ठा नहीं ही दिला सकीं. विकास के नाम पर जो भी होता आया वह बड़े शहरों तक केंद्रित रहा. बहुराष्ट्रीय कम्पनी में बड़ी नौकरी करने वाले युवा हों या सुबह-सुबह नालियों से पॉलिथीन बीनने वाली किशोरियां, सबके लिए शहर ही अनिवार्य बनते गए. गांव खाली-उजाड़ होते रहे और बेशुमार भीड़ शहरों में समाती गई.
नतीजा यह कि आज हमारे शहर अपनी क्षमता से ज्यादा लोगों से ठुंसे हुए हैं. केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय की एक रिपोर्ट कहती है कि शहरीकरण की रफ्तार इतनी तेज है कि सन 2031 में हमारी कुल आबादी का 40 फीसदी महानगरों में रह रहा होगा. 2051 में यह आंकड़ा 51 फीसदी हो जाएगा और हम गांवों का देश नहीं रह जाएंगे.
समाधान: “सम्मान से” का जुमला हटा दें तो भी हर एक को जिंदा रहने का हक है. हमारे विकास को मुंह चिढ़ाती झुग्गी-बस्तियों में बहुत बड़ी आबादी इसी जद्दोजहद में लगी हुई है. इनकी बसासत पूरी तरह अवैध है लेकिन बहुत मानवीय प्रश्न है कि ये लोग जाएं कहां? दो-चार या दस-बीस अवैध बस्तियां हों तो उन्हें नियोजित ढंग से अन्यत्र बसाया जा सकता है. कुछ राज्य सरकारों ने ऐसा किया भी लेकिन एक बस्ती हटी तो दूसरी बस गई क्योंकि इनके बसते जाने के मूल कारणों का कुछ किया ही नहीं गया.  
चूंकि समस्या की जड़ में हमारा शहर केंद्रित विकास मॉडल है इसलिए उसे बदले बिना इस समस्या के समाधान का रास्ता नजर नहीं आता. दो जून की रोटी के लिए भी गांवों से शहरों की तरफ कूच करना पड़े तो झुग्गियों को हटाना तो दूर, उन्हें और भी बढ़ते-फैलते जाने से कैसे रोका जा सकता है? रोजगार के छोट-बड़े उपक्रमों को शहरों से दूर कस्बों-गांवों की तरफ विकसित करने के बारे में क्यों नहीं सोचा जाना चाहिए. सरकारी दफ्तरों, बड़े संस्थानों, नए उद्योगों-उद्यमों, बड़ी आवासीय योजनाओं, आदि को दूर-दराज के इलाकों में ले जाया जाए. पास-पड़ोस के गांवों को शहरों में मिलाते जाने की बजाय दूरस्थ गांवों को छोटे-छोटे शहरों के रूप में विकसित किया जाए. सौ नए स्मार्ट शहर बसाने की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शुरुआती योजना काबिले तारीफ थी लेकिन पता नहीं क्यों वह भी एक सौ बड़े शहरों ही को स्मार्ट बनाने की योजना में तब्दील कर दी गई.
मनरेगा का उदाहरण मौंजू होगा जब गांवों में रोजगार की गारण्टी वाले इस कार्यक्रम से शहरों में मजदूरों की कमी पड़ने लगी थी. भ्रष्टाचार की शिकायतों के बावजूद गांवों में न्यूनतम निर्धारित मजदूरी पर रोजगार मिल रहा था. यह कार्यक्रम यूपीए को 2009 के चुनाव में दोबारा केंद्र की सत्ता तक पहुंचाने में सबसे बड़ा सहायक भी माना गया था. बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पिछले दो कार्यकालों में गांवों में इतने आर्थिक कार्यक्रम चलाए कि ग्रामीणों का दूसरे राज्यों को मौसमी पलायन ही नहीं थमा बल्कि राज्य के बड़े जमीदारों को भी श्रमिक संकट झेलना पड़ा. ये तात्कालिक और लोकप्रिय कार्यक्रम भर थे, स्थाई उपाय नहीं. इनसे यह संकेत ज़रूर मिलता है कि ग्राम केंद्रित विकास योजनाएं और दीर्घकालीन रोजगार कार्यक्रम शहरों की ओर बेवजह और अंधाधुंध पलायन को बहुत हद तक रोक सकते हैं.
विकास की गाड़ी को सही अर्थों में छोटे शहरों, कस्बों-गांवों की तरफ मोड़ना आसान काम नहीं. सड़क-बिजली-पानी से लेकर शिक्षा-स्वास्थ्य और सरकारी तंत्र का जो भी बुनियादी ढांचा हम इतने वर्षों में बना पाए वह शहरों तक सीमित है. उसके अभाव में नई पहल दुष्कर लगेगी लेकिन शुरुआत तो करनी ही होगी. पहले ही कफी देर हो चुकी है.
(नभाटा, सम्पादकीय पेज, 17 दिसम्बर, 2015)

Thursday, December 10, 2015

सिटी तमाशा/ मैं तुम्हारी गोमती, तुम से कुछ कहती हूँ आज

, लखनऊ के आधुनिक बाशिंदो, मैं गोमती हूँ. तुम्हारी नदी. लाड़ से तुम मुझे गोमा भी कह देते हो. आज थोड़ी देर ठहर कर अपनी गोमा की बात सुन लोगे? बहुत दिनों से कहना चाहती रही हूं पर यहां किसी के पास मेरी बात सुनने की फुर्सत ही नहीं.

शहर के एक हिस्से में आजकल मुझे सुंदर बनाने का काम जोर-शोर से चल रहा है. तभी से मेरी आत्मा में हाला-डोला मचा है. आज का मनुष्य जब किसी नदी या जंगल को सुंदर बनाने चलता है तो उसकी जान ही निकाल लेता है. सरकार उसमें शामिल हो जाए तो फांसी का फंदा बहुत खूबसूरत बनाया जाता है. मेरी रूह कांप रही है.

देखो, मेरे पाटों को बड़ी-बड़ी मशीनें रौंद रही हैं. गहरी खुदाई करके मोटी-मोटी सरिया और सीमेंट-कंक्रीट भर कर मेरा श्रृंगार किया जा रहा है. उफ, नदी का इन बेजान चीजों से भला क्या वास्ता! मजबूत दीवारें खड़ी करके मुझे बांधा जाएगा ताकि मैं सीधी राह चलूं! यह दीवार मुझे मेरी हर धमनी से काट रही है. सरकारी भाषा में इसे रिवर फ्रण्ट डेवपमेण्ट कहते हैं. मेरी तलहटी से जो गाद निकाली जा रही है उसे किनारे बिछा कर समतल किया जा रहा है. यहरिक्लेम्ड लैण्ड (गजब, तुम नई जमीन भी पैदा कर लेते हो!) व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए बेची जाएगी ताकि मेरे सुंदरीकरण का खर्चा निकल सके. इस पर निजी बिल्डर और भी कंक्रीट से भव्य निर्माण कराएंगे. झुग्गी-झोपड़ियों को हटा कर यहां रिवर व्यू होटल-ढाबे-आरामगाह खुलेंगे. दोनों किनारों पर बढ़िया सड़कें होंगी, बेंच होंगी. सुनते हैं कुछ हरियाली भी होगी लेकिन मेरा उससे क्या रिश्ता बचेगा! तुम्हारी शामें यहां पुरलुफ्त होंगी. कभी सोचा है, तब मैं, तुम्हारी गोमा, कहां हूँगी?

भारी मशीनों से जो लोहा-सीमेण्ट मुझे जबरन पिलाया जा रहा है, उससे मेरे रहे-बचे सोते सूख रहे हैं, जिनसे मैं सांस लेती हूँ. मेरी जल वाहिनियां, मुझमें प्राण भरने वाले भीतरी कुएं, मेरी मिट्टी, मेरे पेड़-पौधे, मेरे जीव-जंतु सब मर रहे हैं. एक रात जब मशीनों का शोर बंद हो गया तो मेरे किनारों की मिट्टी रोने लगी कि गोमा, सीमेण्ट की यह मजबूत दीवार हमारा रिश्ता खत्म कर रही है. भारी-भारी पत्थर बिछाए जाने वाले हैं अब मैं बारिश का पानी कैसे सोखुंगी और कैसे तुझे दूंगी? घास और जड़ें भी फूट पड़े- गोमा, अलविदा. हमारे लिए तो कोई जगह ही नहीं बची. तभी केंचुए निकल आए. उनके साथ छिपकली, बिच्छू, सांप, अजगर, गोह, जाने कितने पुराने दोस्त आ गए. उन सबका दम घुट रहा था और सबने रो-रो कर मुझसे विदा ले ली. वे अब रहें भी कहां? मेरी सुंदरता की राह में वे दुश्मन हो गए. ऐ नए जमाने के बाशिंदो, जब ये सब मेरे अजीज, जो मुझे नदी बनाते आए हैं, नहीं रह जाएंगे तो मैं ही कैसे बचूंगी?

जैसी भी थी, मैं आज तक इन सब ही की वजह से नदी थी. तुमने मुझ पर कम अत्याचार नहीं किए. मुझमें अपने गंदे नाले डाले, मिलों का खतरनाक कचरा डाला, मेरी जीवनी शक्ति पर कितने तो हमले किए. अत्याचार सह कर भी मैं खुश थी कि आदमजात को मैं अपने किनारे बसेरा देती हूँ तो कभी वह मेरी पीड़ा भी समझेगा ही. लेकिन अब तुम बहुत विकसित हो गए हो. तुम्हें अब नदी की नहीं रिवर फ्रंट की जरूरत है. अब तुम्हें नदी के किनारे भी कंक्रीट के चाहिए लेकिन उसके बीच जो बहेगी वह तुम्हारी गोमा नहीं होगी. नालों का पानी रिसाइकिल करोगे और कभी नहर का पानी उसमें छोड़ोगे. नदी कह पाओगे उसे?
किसी नदी का श्रंगार अब तुम क्या जानो! सो, अलविदा! – तुम्हारी गोमा.
(नभाटा, लखनऊ में 11 दिसम्बर को प्रकाशित)


Sunday, December 06, 2015

उत्तराखण्ड: परिवर्तन के लिए जरूरी सम्वाद


प्रसिद्ध इतिहासकार और राजनीतिक विश्लेषक राम चंद्र गुहा का लेख पढ़ रहा था- उत्तराखण्ड क्यों नहीं बना हिमाचल. अमर उजाला के 22 नवम्बर के अंक में प्रकाशित इस लेख में श्री गुहा बड़ी साफगोई से लिखते हैं- “हिमाचल प्रदेश ने समझदारी के साथ राज्य के मध्य में स्थित एक पहाड़ी शहर को अपनी राजधानी चुना. उसे सौभाग्य से वाई एस परमार जैसे दूरदृष्टा मुख्यमंत्री भी मिले, जिन्होंने अपने लम्बे कार्यकाल (1963-77) के दौरान नौकरशाही को अच्छे स्कूल और अस्पताल बनाने के लिए प्रेरित किया (मानव विकास के मामले में हिमाचल का रिकॉर्ड केरल की तरह शानदार है) दूसरी ओर उत्तराखण्ड के सात मुख्यमंत्रियों मे से कुछ नाकाबिल तो कुछ औसत दर्जे के थे. इस बीच देहरादून को राजधानी बनाए जाने के बाद से राजनीति में भ्रष्टाचार और अपराध-प्रवृत्ति भी बढ़ी है. यहां भू-माफिया सक्रिय हैं जिनकी विधायकों और मंत्रियों से सहभागिता रही है. प्रदेश के कीमती जंगल और जल संसाधन निजी कम्पनियों को बेचने के लिए सौदे किए गए हैं. उत्तराखण्ड में कई बड़े बांध बनाए गए हैं जिनकी वजह से हजारों लोगों को बेघर होना पड़ा है और यहां के पर्यावरण को भी भारी नुकसान पहुंचा है... कुछ अपवाद तो सभी जगह होते हैं लेकिन कुल मिलाकर हिमाचल की नौकरशाही अपने काम पर अधिक केन्द्रित और मेहनती है जबकि उत्तराखण्ड में उदासीन और सुस्त....उत्तराखण्ड में राजनीतिक नेतृत्व ने नौकरशाही के नकारात्मक रूप को बढ़ावा दिया है. ऐसी उम्मीद की गई थी कि उत्तराखण्ड एक और हिमाचल प्रदेश बनेगा लेकिन इसके बजाय वह झारखण्ड बनता दिख रहा है जहां की राजनीतिक व्यवस्था प्राकृतिक संसाधन की लूट पर टिकी है.”

उत्तराखण्ड का व्यापक दौरा और यहां शोध भी कर चुके श्री गुहा ने आज के उत्तराखण्ड की नब्ज पर हाथ रखी है. वैसे उन्होंने कोई नई बात नहीं कही है. उत्तराखण्ड के विभिन्न सामाजिक और राज्य आंदोलनों से जुड़े तमाम कार्यकर्ता और विश्लेषक भी ऐसी ही बात कहते रहे हैं. मगर वर्तमान समय में प्रभावशाली बौद्धिक स्वर माने जाने वाले श्री गुहा की यह बात और दूर तक सुनी जानी चाहिए. राजनीतिक नेतृत्व ने तो लगता है कि कान पूरी तरह बंद कर लिए हैं लेकिन गुहा की यह टिप्पणी उत्तराखण्ड के सक्रिय-समर्पित सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं, नए-पुराने आंदोलनकारियों और सचेत युवा वर्ग के लिए नए सिरे से मंथन और सक्रियता का प्रस्थान बिंदु तो बन ही सकती है.

श्री गुहा हिमाचल की आज की बेहतरी का मुख्य कारण वाई एस परमार जैसे मुख्यमंत्री की दूरदृष्टि और अफसरों का अपने काम पर ध्यान और मेहनत मानते हैं, जिनकी वजह से “उसने पर्यटन और बागवानी के जरिए मजबूत आर्थिक आधार बनाया और शिक्षा, स्वास्थ्य और महिलाओं के सबलीकरण के मामले भी शानदार रिकॉर्ड बनाया.” जाहिर है यह काम सत्ता में बैठे नेताओं की सोच और अफसरों को वहां से मिली दिशा के कारण सम्भव हो पाया. हिमाचल की जनता को कोई बड़ा आंदोलन नहीं करना पड़ा. दूसरी तरफ, उत्तराखण्ड की जनता ने न केवल पृथक राज्य के लिए बड़ा आंदोलन किया, बलिदान दिए और बेइंतिहा दमन झेला, बल्कि राज्य बन जाने के बीते पंद्रह वर्षों में वह और भी ज्यादा शोषित-उत्पीड़ित-ठगी महसूस करते हुए विभिन्न स्तरों पर आंदोलित है. जनता से उसके जल-जंगल-जमीन छिन गए, पानी लुट गया, गांवों का उजड़ना तेज हो गया, तमाम संसाधनों पर मंत्रियों-विधायकों-माफिया-नौकरशाही के कुटिल गठजोड़ का कब्जा हो गया और जहां कहीं उसके खिलाफ जनता आंदोलन करती है तो उसे दमन का शिकार होना पड़ा रहा है. इसके कई उदाहरण हैं जिनमें नानीसार बिल्कुल ताजा है. जनता की भावनाएं समझने की बजाय सरकार अपनी मनमानी पर उतारू है और बेशर्मी के साथ कहती है कि अभी तो ऐसी और भी योजनाएं लागू की जाएंगी. संसाधनों की लूट के मामले में हरीश रावत की सरकार अब तक सबसे निकृष्ट सरकार साबित हो रही है, जबकि हम जैसे लोग नारायण दत्त तिवारी की तुलना में उनसे ज्यादा उम्मीदें लगाए बैठे थे.

मतलब यह कि उत्तराखण्ड की सरकार जनता की सुनने वाली नहीं है और आंदोलन हुआ तो उसे कुचलने के लिए वह तैयार है. उधर, जन आंदोलन से किसी बड़े सार्थक बदलाव की उम्मीद जल्दी नहीं की जा सकती. अब तक का अनुभव कहता है कि जन आंदोलन का भी अंतत: लाभ राजनीतिक दलों ने उठया. इसलिए अब शीघ्र प्रभावकारी हस्तक्षेप जरूरी हो गया है क्योंकि उत्तराखण्ड के जन और प्राकृतिक संसाधनों की लूट बहुत तेज हो गई है.

तो, रास्ता क्या है? उत्तराखण्ड की जनता को हिमाचल जैसा सौभाग्य वाला मुख्यमंत्री पाने के लिए अनंत काल तक इंतज़ार करते रहना चाहिए या कोई राह तलाशनी चाहिए? जैसे कि क्या जनता के बीच की परिवर्तनकामी ताकतों को अब राज्य की सत्ता अपने हाथ में लेने की तैयारी नहीं करनी चाहिए? क्या उन्हें ऐसा विचार कर इस दिशा में पहल नहीं करनी चाहिए? राम चंद्र गुहा की टिप्पणी से क्या यह साफ नहीं है कि राज्य के विकास की दिशा दुरुस्त करने के लिए राजनीतिक सत्ता पर बेहतर और दूरगामी सोच के लोगों को आना चाहिए? इससे जनता के सपनों का आदर्श राज्य भले न बन पाए, जन संसाधनों की लूट और माफिया राज से बचाकर कम से कम हिमाचल जैसा राज्य तो बनाया ही जा सकता है. राजनीतिक भ्रष्टाचार के कीर्तिमानों के बावजूद हिमाचल में कुछ बेहतर कायम है. उत्तराखण्ड को और ज्यादा विनाश से यथाशीघ्र बचाने के लिए क्या आज यह अनिवार्य प्रतीत नहीं होता?

वह समय गया जब परिवर्तनकामी ताकतें या पार्टियां सता की राजनीति से परहेज करती थीं. धुर वामपंथी दल भी, जो मानते थे कि सत्ता बंदूक की नली से बहती है’, काफी पहले संसदीय राजनीति में कूद पड़े थे और परिवर्तन के लिए राजनीतिक सता पाने को अनिवार्य मानते आए हैं. एक दौर था जब उत्तराखण्ड संघर्ष वाहिनी में भी चुनाव लड़ने-न लड़ने पर घमासान वैचारिक संग्राम मचा था. लेकिन अब तो उस वाहिनी से निकले सभी संगठन और राजनीतिक दल चुनाव लड़ चुके हैं अथवा इसके समर्थक हैं. दिक्कत भारी यह है कि वे सारी ताकतें आज बिखरी हुई हैं, छोटी-छोटी वैचारिक असहमतियों और उससे भी छोटे निजी मतभेदों-मनमुटावों ने उन्हें दूर और अकेला कर दिया है. अपने-अपने मोर्चे पर वे सभी सक्रिय है और यत्र-तत्र लड़ाइयां लड़ रहे हैं लेकिन साथ आना तो दूर, जरूरी मुद्दों पर भी एक दूसरे का समर्थन करने की जरूरत वे नहीं समझते. इससे राजनीतिक सत्ता के लिए उनका दमन करना और भी आसान हुआ जा रहा है.

हिमाचल की तरह उत्तराखण्ड की जनता भी अदल-बदल कर कांग्रेस और भाजपा को सत्ता सौंपती आई है. किसी तीसरी राजनीतिक ताकत पर उसे भरोसा हो नहीं पाया है. राज्य निर्माण के व्यापक आंदोलन में गांधीवादियों से लेकर वामपंथी तक सभी शामिल थे और चूंकि राज्य की मांग ही सर्वोपरि थी इसलिए सभी साथ लड़ रहे थे. राज्य बन जाने के बाद वे सभी मिल कर एक राजनीतिक इकाई कतई नहीं बन सकते थे. मगर उत्तराखण्ड क्रांति दल भी जनता का विश्वास जीतने लायक कार्यक्रम और नेतृत्व विकसित नहीं कर सका जबकि उसका जन्म ही पृथक राज्य के वास्ते लड़ने के लिए हुआ था और उसने उम्मीदें भी जगाई थीं. उलटे, इस पार्टी ने उत्तराखण्ड की जनता को सबसे बड़ा धोखा दिया. उसके चंद नेताओं की सत्ता की भूख और अवसरवादिता ने राज्य में बेहतर वैकल्पिक राजनीति की भ्रूण हत्या ही कर दी.

परिवर्तन की बड़ी आकांक्षा से उपजे जन आंदोलनों से जन्मी उत्तराखण्ड संघर्ष वाहिनी बिखरती चली गई. उस समय के कुछ जुझारू-समर्पित युवा कार्यकर्ता कांग्रेस या भाजपा या दूसरे दलों में चले गए और क्या त्रासदी है कि उनमें से कुछ आज हरीश रावत जैसे मुख्यमंत्री का समर्थन कर रहे हैं. वहीं से निकली उत्तराखण्ड लोक वाहिनी और उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी ने मंजिल एक होने के बावजूद अपने अलग रास्ते बना लिए. संघर्षशील महिलाओं का मोर्चा अलग सक्रिय हो गया. तराई से लेकर मध्य हिमालय के विभिन्न इलाकों में कई राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन जनता के हक-हकूक के लिए लड़ रहे हैं. साहित्य और पत्रकारिता की जनमुखी धाराएं भी पर्याप्त सचेत-सक्रिय हैं. शुभ संकेत यह कि अलग-अलग होने के बावजूद सभी मोर्चों पर कम या ज्यादा सक्रियता मौजूद है.
कहना यह चाहता हूँ कि वर्तमान स्थितियों के प्रति बड़े प्रतिरोध की जमीन तैयार लगती है. वैचारिक स्तर पर तथा उद्देश्यों के प्रति काफी हद तक समानता भी है. इसे एक राजनीतिक शक्ति बनाने की जरूरत है, एक अखिल उत्तराखण्डी राजनीतिक संगठन. यह समय की मांग है. इस पर कभी- कभार यहां-वहां चर्चा भी होती है लेकिन कहीं से कोई पहल भी होती नहीं दिखाई देती. अफसोस की बात है कि पिछले मास नानीसार जा रहे उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी के अध्यक्ष पी सी तिवारी समेत कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और ग्रामीणों की गिरफ्तारी का विरोध भी चंद फेसबुकी प्रतिक्रियाओं तक सीमित रह गया, जबकि वे लोग गुपचुप और अवैध तरीके से गांव की जमीन एक बड़े कारोबारी ग्रुप को देने की सरकारी साजिश का विरोध करने वहां जा रहे थे. वर्तमान सरकार की ऐसी जनविरोधी नीतियों से सभी त्रस्त हैं और उसके खिलाफ मुखर भी. फिर भी ऐसी चुप्पी बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है. सबसे पहले इस संकोच या परहेज से निजात पानी होगी.

एक सर्वमान्य राजनीतिक संगठन बनाना निश्चय ही बड़ी चुनौती है. जनता का विश्वास जीतना उससे भी कठिन. वन आंदोलन से लेकर राज्य की लड़ाई के प्रतिफलन तक जनता ठगी सी महसूस करती आई है. इसी कारण कांग्रेस और भाजपा उसकी मजबूरी बन गई हैं. मगर अब तक जनता यह स्पष्ट समझ चुकी है कि दोनों ही दलों की सरकारों ने उसे ठगने और उत्तराखण्ड को लूटने के सिवा कुछ नहीं किया. नया और विश्वसनीय विकल्प मिलने पर वह साथ आ सकती है. बस, विकल्प, नेतृत्व, संगठन और कार्यक्रम इस तरह बनाने होंगे कि जनता उस पर भरोसा कर सके. हाल का दिल्ली का राजनीतिक प्रयोग अपनी विसंगतियों के बावजूद एक राह दिखाता है. आम आदमी पार्टी ने दिल्ली की जनता को विश्वास दिलाने में सफलता पाई कि वह कांग्रेस और भाजपा से कहीं बेहतर विकल्प बन सकती है. अरविंद केजरीवाल की तानाशाही प्रवृत्तियों को छोड़ दें और आम आदमी पार्टी की टूटन से निकले स्वराज अभियान से कुछ सीख लें तो उससे बेहतर राजनीतिक विकल्प की सम्भावना बनती है. उत्तराखण्ड के कुछ सामाजिक कार्यकर्ता आप और अब स्वराज अभियान के साथ हैं भी.

उत्तराखण्ड इस देश के अत्यंत सचेत-सक्रिय-आंदोलित समाजों में गिना जाता है. इसकी वैचारिक प्रखरता और आंदोलनों की त्वरा राष्ट्रीय मुख्यधारा में बराबर प्रवाहित रही है. आज जब खुद उत्तराखण्ड को इसकी बहुत जरूरत है, क्या इस दिशा में कुछ चिंतन होगा? चंद लोग ही सही, आगे आकर ऐसा सम्वाद शुरू करेंगे?
आमीन.


Thursday, December 03, 2015

लाचार रचनाकार और सरकारी मदद की गुहार


अपने तीखे तेवरों और अक्सर धारा के विरुद्ध लिखने-बोलने के लिए चर्चित साहित्यकार-नाटककार मुद्राराक्षस पिछले काफी समय से बीमार हैं. उनकी आर्थिक हालत कतई अच्छी नहीं है. लेखक बिरादरी ने पिछले दिनों प्रदेश सरकार से उनकी सहायता और इलाज की बेहतर व्यवस्था करने के लिए गुहार लगाई. बिरजू महाराज के प्रख्यात शिष्य और कथक की लखनऊ शैली को देश-विदेश में लोकप्रिय बनाने वाले गुरु अर्जुन का गम्भीर बीमारी से लड़ते हुए पिछले ही मास निधन हुआ है. उनकी मदद करने के लिए भी कलाकारों ने आवाज उठाई थी.

मुद्राराक्षस की मदद करने की अपील पर शासन की तरफ से उस समय कहा गया कि राज्य में पंचायत चुनावों की अधिसूचना लागू है. इसलिए उनकी सहायता करने में अड़चन है. लेकिन इसी दौरान प्रदेश मंत्रिमण्डल ने यह फैसला कर दिया कि यू पी के पद्म पुरस्कार और यश भारती पाने वालों को सपा सरकार 50 हजार रु मासिक पेंशन देगी. पद्म पुरस्कार पाने वालों में शायद ही कोई विपन्न और लाचार व्यक्ति होता हो. यश भारती पुरस्कार मुलायम सिंह के नेतृत्व वाली सरकार ने सन 1994 में शुरू किए थे. बीच में बसपा की मायावती सरकार ने इन पुरस्कारों को रोक दिया था. 2012 में फिर सत्ता में आने अखिलेश सरकार ने फिर से यश भारती पुरस्कार देना शुरू किया. 2013-14 और 2014-15 के लिए इसी साल फरवरी में 56 लोगों को यह पुरस्कार दिया गया. साहित्य, फिल्म, कला, खेल, आदि विविध क्षेत्रों के नामी लोगों को यह पुरस्कार दिया जाता है. पहले इसमें सम्मान पत्र के अलावा पांच लाख रु दिए जाते थे जो अब बढ़ा कर 11 लाख रु कर दिए गए हैं. अब इन्हें 50 हजार रु प्रतिमास पेंशन देने का ऐलान भी कर दिया गया है. चर्चा रही कि प्रदेश सरकार ने यह फैसला इस कारण किया कि यश भारती प्राप्त कोई व्यक्ति इस सम्मान को लौटाने की घोषणा न कर दे. प्रदेश सरकार के काम-काज से नाराज लोगों की भी कमी नहीं है, खैर.
यू पी से ताल्लुक रखने वाले मुम्बई फिल्म जगत के नामचीन अभिनेता-अभिनेत्री, क्रिकेट खिलाड़ी, पहलवान, आदि भी यश भारती से सम्मानित हैं. इनमें अमिताभ बच्चन का पूरा परिवार, खुद अमिताभ, पत्नी जया और बेटा अभिषेक बच्चन, शामिल है. बच्चन परिवार को पेंशन की क्या जरूरत (उन्होंने अपनी पेंशन राशि लेने से इनकार करते हुए इसे सरकार से गरीबों के हित में उपयोग करने की अपील की है) यश भारती की लम्बी सूची में ज़्यादातर ऐसे नाम हैं जो आर्थिक रूप से बेहतर स्थिति में हैं. उन्हें सरकारी पेंशन की जरूरत नहीं लेकिन मुद्राराक्षस जैसे जरूरतमंद रचनाकारों को कोई पेंशन या मदद मयस्सर नहीं. उन्हें यश भारती पुरस्कार भी नहीं मिला है कि अब पेंशन का सहारा हो. कभी भोजपुरी के लोकगायक बालेश्वर जैसों को यश भारती से सम्मानित किया गया तो इसलिए कि समाजवादी पार्टी ने चुनाव-सभाओं में उनका इस्तेमाल किया था. 

व्यवस्था की पोल खोलने वाली चमारों की गली जैसी कविता और सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद हैं/ दिल पे रख कर हाथ कहिए देश क्या आज़ाद है जैसी धारदार गज़लें लिखने वाले अदम गोंडवी ने अत्यंत दयनीय हालात में दम तोड़ा, क्योंकि उन्हें सत्ता प्रतिष्ठान या अकादमियों ने किसी पुस्कार या पेंशन के लायक नहीं समझा था. ऐसे कई नाम हैं, और होंगे. जागरूक और जिम्मेदार विपक्ष की भूमिका निभाने वाला रचनाकार सरकार की नज़र में बागी या विरोधी दल का एजेण्ट होता है!
बड़ी संख्या में साहित्य अकादमी सम्मान लौटाने और उसी पैमाने पर लेखकों की निंदा-आलोचना के कारण साहित्यकार आजकल खबरों में हैं. चैनलों की तीखी बहसों में वे लेखक भी दिखाई-सुनाई दे रहे हैं, आम तौर पर जिनका नोटिस मीडिया नहीं ही लेता. केंद्र सरकार के भी कई वरिष्ठ मंत्रियों ने पिछले दिनों लेखकों के बयानों का नोटिस लेते हुए बड़े-बड़े बयान जारी किए. सोशल मीडिया में तो खैर लेखकों का मुद्दा छाया ही हुआ है. कुल मिलाकर लेखक इन दिनों बहसों के केंद्र में हैं, उनका लिखा साहित्य भले ही प्रकाशकों की कृपा से छपी महंगी किताबों में लाइब्रेरियों में बंद हो. कलम के सिपाहियों की माली हालत पर तो खैर उनके जीते-जी कभी चर्चा ही नहीं होती.

बीमारी और वृद्धावस्था के दौरान हमारे ज्यादातर साहित्यकार-कलाकार लाचार दिखते रहे हैं. भारतीय भाषाओं के लेखक कमा ही क्या पाते हैं! कई-कई पुस्तकों के प्रख्यात लेखकों को भी प्रकाशकों से मिलने वाली रॉयल्टी का हाल सुनकर हंसी और रोना एक साथ आते हैं. लेखकों की किताबों से प्रकाशक मालामाल हो रहे हैं लेकिन रचनाकार की माली हालत दयनीय ही रह गई. जो लेखक नौकरी या किसी रोजगार में रहे उनका काम तो चल जाता है लेकिन सिर्फ लेखन पर निर्भर लेखक की स्थिति संकट के समय अत्यंत दयनीय हो जाती है. यही वजह है कि अक्सर लेखक बिरादरी बहुत जरूरतमंद साहित्यकार-कलाकार की मदद के लिए सरकारों से लेकर संस्थाओं-व्यक्तियों से भी अपील करती दिखती है. मुक्तिबोध से लेकर धूमिल तक और शैलेश मटियानी से लेकर त्रिलोचन तक ऐसे कई प्रसंग याद आते हैं. अपनी रचनाओं में समय के क्रूर सत्य और व्यवस्था से टकराने वाले रचनाधर्मियों को असहायता में व्यवस्थामुखी हो जाना पड़ता है. तब उसकी निष्ठा और प्रतिरोधी तेवरों पर सवाल भी उठने लगते हैं. लेखन से ही रोजी-रोटी कमाने वाले शैलेश मटियानी ने कभी उत्तर प्रदेश सरकार से आर्थिक सहायता का प्रस्ताव ठुकरा दिया था हालांकि वे हमेशा गर्दिश में रहे. बाद में बीमारी और लाचारी में उनके परिवार को सरकार से आर्थिक मदद स्वीकार करनी पड़ी थी. तब उनकी आलोचना भी की गई थी. सवाल यह है कि लेखक ऐसी स्थिति में क्या करे?

किसी समय आकाशवाणी में रहते हुए व्यवस्था के विरुद्ध आक्रामक तेवर अपनाने और लेखन में भी व्यवस्था विरोधी मुद्राराक्षस, उनके परिवारीजन और साथी लेखक आज अगर सरकार से उनकी मदद की अपील करने को मजबूर हैं तो सोचना चाहिए कि हमारे समाज में लेखक की स्थिति ऐसी क्यों है? अव्वल तो ऐसी अपील की जरूरत ही नहीं पड़नी चाहिए थी. आज़ादी के 68 सालों बाद आदर्श स्थिति यह होती कि किसी भी नागरिक के बेहतर इलाज के लिए मदद की गुहार ही नहीं करनी पड़ती. लेखक हो या मजदूर या फुटपाथ पर गुजर कर रहा भिखारी, हर एक के समुचित इलाज की व्यवस्था सरकारी अस्पतालों में होती. दुर्भाग्य से ऐसा हुआ नहीं और न ही निकट भविष्य में ऐसा होने के आसार हैं. हमारी सरकारों ने, चाहे वह किसी भी दल या गठबन्धनों की रही हों, जन-स्वास्थ्य और हर नागरिक के लिए न्यूनतम आवश्यक चिकित्सा की व्यस्था पर ध्यान ही नहीं दिया. जनता के धन से चल रहे सरकारी अस्पतालों की सारी मुफ्त सुविधाएं वीआईपी के लिए हैं. जो वीआईपी नहीं है उसे मामूली इलाज या डॉक्टर से मिलने के लिए भी सिफारिश लगानी पड़ती है.

क्या विडम्बना है कि जेल भेजे गए वीआईपी अपराधी कैद की तकलीफ न सहन कर सरकारी अस्पतालों के गहन चिकित्सा कक्ष में आराम फरमाते रहते हैं. अमीरों के लिए पंचतारा निजी अस्पताल धड़ाधड़ खुल रहे हैं. सर्दी-जुकाम में भी राजनीतिक नेताओं के दरवाजे पर विशेषज्ञ डॉक्टरों की फौज दौड़ी चली जाती है लेकिन बकौल प्रेमचंद, साहित्य के आगे चलने वाली मशाल निर्मित करने वाला रचनाकार गम्भीर बीमारी में भी लाचार पड़ा रहता है. उसके इलाज में मदद के लिए साथी रचनाकारों की अपील का असर हो ही जाए, इसकी भी कोई गारण्टी नहीं. दिक्कत इसलिए और बढ़ जाती है क्योंकि बहुत सारे दूसरे देशों की तरह हमारे देश में स्वास्थ्य बीमा अनिवार्य नहीं है.
हमारी व्यवस्था को चलाने वाला तंत्र इतना लोकतांत्रिक आज तक न हो सका कि प्रतिरोधी स्वरों का सम्मान करे या कम से कम धैर्य से सुन ले. सत्ता, संस्थानों और राजनीति पोषित संगठनों की असहिष्णुता किस हद तक बढ़ गई है, यह आज के माहौल से स्पष्ट है. इस देश की बहुलतावादी परम्परा को ध्वस्त करने की कोशिशों के खिलाफ आवाज उठाने वाले लेखकों को सुनने की बजाय उन पर तरह-तरह से हमले हो रहे हैं. ऐसे लेखकों-कलाकारों की मदद कोई सरकार क्यों करेगी जो उसकी गलत और जनविरोधी नीतियों के विरोध में खड़ा हो? लेखक का तो काम ही प्रतिरोधी स्वरों को मुखर करते हुए समाज को सचेत करना है.

तो भी क्या यह उम्मीद की जाए कि सरकार पद्म पुरस्कार या यश भारती पाने वालों को बड़ी पेंशन देने की बजाय रचनाकारों-संस्कृतिकर्मियों, आदि का किसी न्यूनतम अर्हता के आधार पर चिकित्सा बीमा कराए ताकि उन्हें आवश्यक इलाज के लिए गुहार न लगानी पड़े. इसमें उनके विचार या वाद के आधार पर भेदभाव न किया जाए. तर्क, विचार और लेखन से आगे की दिशा दिखाने तथा पीछे ले जाने वाली प्रवृत्तियों का विरोध करने वाले रचनाकारों का तो सत्ता और समाज को शुक्रगुज़ार होना चाहिए. निंदक नियरे राखिए की तर्ज पर उनकी समुचित देखभाल करनी चाहिए. 
(15 नवम्बर,2015)  





सिटी तमाशा/ स्मार्ट सिटी की कवायद और हमारे शऊर के सदके


बीते मंगलवार को आंधी-पानी से बचने के लिए खड़े लोगों ने ओवरब्रिज के नीचे का पूरा रास्ता बंद कर लिया था. उसी में दोपहिया गाड़ियां ठुंसी थीं. कारें हॉर्न पर हॉर्न बजाए जा रही थीं और कोई टस से मस होने को तैयार नहीं था. पूरी सड़क चीखती गाड़ियों और गाली-गलौज के शोर से भरी रही. चलिए, यह तो अचानक और बेमौसम आई आंधी-पानी के कारण हुआ था लेकिन बाकी समय?

जब रेल का फाटक बंद होता है तो हम कितने तमीज से गाड़ियां खड़ी करके ट्रेन के गुजरने का इंतजार करते हैं? चौराहे कितने अनुशासित ढंग से बत्ती के हरी होने तक खड़े रहते हैं? बाएं जाने वाला बिल्कुल दाहिने और दाहिने जाने वाला बाएं छोर पर क्या सोच कर अपनी गाड़ी लगा देता होगा? दाएं-बाएं मुड़ने का संकेत देने के लिए लगी इण्डीकेटर लाइटों का सिर्फ सजावट के लिए होना क्या जरूरी है? कानफाड़ू हॉर्न जरूर बजाइए ताकि सबको लगे कि हमारे पास गाड़ी है! कार सरकारी हो और ड्राइवर साहब का मुंह लगा तो फिर देखिए करतब. दस गुना ज्यादा डेसिबल का हॉर्न और यातायात के नियम गाड़ी की छत पर लगी लाल-नीली बत्ती के नीचे दम तोड़ते नजर आते हैं.

मोटरसाइकिल वाले कहीं से भी फर्राटा मारते हुए आ सकते हैं और कहीं को भी जा सकते हैं. आप बाएं जा रहे हैं तो वे अचानक आपके सामने बाएं से दाएं मुड़ जाएंगे, पीछे से आकर ठीक सामने तिरछे हो जाएंगे, सर्कस के कुएं में बाइक चलाने जैसा करतब दिखाते हुए आपको चकरघिन्नी खिला देंगे और डिवाइडर फांद कर कोई भी स्टण्ट करने को हर वक्त आजाद.

सड़क पर आप पैदल हैं तो जान हथेली पर और वाहन चला रहे हैं तो हर वक्त जान-माल के लाले. बिना हील-हुज्जत के 5-6 किमी आगे बढ़ जाएं तो गनीमत. यहां अब भी सबसे तमीजदार साइकिल वाला है जो साइकिल पथ के बावजूद सड़क पर टेढ़ा-मेढ़ा ही चलता है लेकिन आपको घूरता कतई नहीं. तमीज के मामले में लखनऊ की परिभाषा पूरी तरह बदल गई है. जितनी बड़ी गाड़ी होगी, चलाने–बैठने वाले उतने ही बेशऊर. ट्रैफिक सिपाही हो या मर्सिडीज वाला, गुस्सा रिक्शा वालों पर ही उतारता है.
सड़क किनारे या बीच बाजार गाड़ी कैसे खड़ी जाती है, इसका ठसका तो खैर हुजूर की राजनीतिक या सार्वजनिक प्रतिष्ठा बता ही देती है, रिहायशी कॉलोनियों में भी कोई ठीक आपके घर के गेट के सामने अपनी गाड़ी खड़ी कर बाजार या रेस्त्रां चल दे तो चौंकना नहीं होता. यह नई तरह का घेराव या घर में आपकी नजरबंदी होगी, जब तक कि हुजूर पूरे नवाबी ठाठ से खरामा-खरामा नमूदार न हो जाएं. हो सकता है गाड़ी में बैठने से पहले वे आपकी दीवार पर निवृत्त भी होना चाहें!

बात सड़क पर ही हमारे व्यवहार की नहीं है. बार विचार और बर्ताव की है. हमारी नजर मुहल्ले के पार्क से गुप-चुप फूल तोड़ने या पौधा ही उखाड़ लाने पर लगी रहती है या हम उसे संवारने में भी कुछ योगदान करते हैं? पान की पीक दफ्तर की दीवार या कूड़ेदान में थूकते हुए हमें कुछ गड़बड़ लगता है या नहीं? पॉलीथिन और प्लास्टिक कचरा कहीं भी डाल देने में हाथ झिझकता है? मेट्रो आ रही है, उसकी दीवारों पर हम मुहब्बत की निशानियां बनाएंगे न! बस की गद्दी फाड़ने का आनंद कैसा होता है? पानी का भू-भण्डार अगली पीढ़ी के लिए बचाकर क्यों रखा जाए?


सिर्फ इसलिए याद दिलाने का मन हुआ कि अपना यह नखलऊ, सुना है, स्मार्ट होने वाला है. इसकी यह मजाल!
(नभाटा, लखनऊ में 04 दिसम्बर को प्रकाशित)

Friday, November 27, 2015

सिटी तमाशा/ हमारे स्वाद और भाषा-बोली पर डाका!


- मैगी है, अंकल?’ हाथ में थामा नोट आगे बढ़ाए हुए एक बच्चा दुकानदार से पूछ रहा था. उसके चेहरे की उत्सुकता और व्याकुलता साफ पढ़ी जा सकती थी जो तुरन्त ही भारी निराशा में बदल गई जब दुकानदार ने तनिक मुस्कराते हुए में गरदन हिला दी.
- ऑनलाइन मिल रही है बेटा’. काउण्टर पर खड़े दूसरे ग्राहक ने बच्चे को बताया. लेकिन उसके पास सुनने का धैर्य नहीं था. वह तेज कदमों से किसी दूसरी दुकान की तरफ भागा चला गया. दिन भर छोटे-बड़े बच्चे और मम्मियां मैगी ढूंढने आने लगे हैं’- दुकानदार कह रहा था.
चंद हफ्तों के लिए मैगी क्या बंद हुई, बच्चों का मुंह लटक गया. मां का दूध सूख जाने पर भी उतनी व्याकुलता नहीं होती जितनी मैगी पर रोक लग जाने से हुई. अब धीरे-धीरे मैगी बाजार में वापस आ रही है तो छोटे बच्चों से लेकर युवा तक आनंदित हैं और मैगी पार्टी की तस्वीरें सोशल साइट्स पर सगर्व पोस्ट कर रहे हैं.
हमारी पीढ़ी की पीढ़ी का स्वाद बाजार के जादूगरों ने कैसे हर लिया है! भारतीय खाने की विविधता और पौष्टिकता की सर्वत्र चर्चा होती है लेकिन हमारी थालियों पर कैसा हमला हुआ है कि सारे स्वाद ही छिन गए. उस दुकान पर छिड़ी मैगी-चर्चा में एक महिला बता रही थी कि टेबल पर पराठा-पूरी या दाल-भात-रोटी रखो तो बच्चे कहने लगते हैं कि कुछ अच्छा खिलाओ. कुछ अच्छा माने मैगी, पास्ता, केएफसी... मैं तो मैगी में ही सब्जियां मिला देती हूं. क्या करूं, कुछ तो अच्छा बच्चों के पेट में जाए. आज यह हर घर की समस्या है.
क्या त्रासदी है कि स्वदेशी का राग अलापने और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के खिलाफ झण्डा उठाने वाले बाबा रामदेव अपनी कम्पनी के नूडल्स लेकर बाजार में आ गए हैं. जल्दबाजी इतनी कि इसके लिए उन्होंने भारतीय खाद्य सुरक्षा और नियामक प्राधिकरण से आवश्यक लाइसेंस भी नहीं लिया. मैगी पर रोक लगने के बाद उन्हें मुनाफे का अच्छा मौका दिखा होगा. मैकरोनी, स्पाघेटी और वर्मिसेली वे पहले से बेच ही रहे हैं. इसमें कैसा स्वदेशी आंदोलन है? देसी स्वाद तो धीरे-धीरे मारे जा रहे हैं, उस पर हमला बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का हो या तथाकथित भारतीय आश्रमों का.
मैगी हो पिज्जा या केएफसी या ढेरों दूसरे विदेशी व्यंजन उन्हें खाने में कोई हर्ज नहीं. बल्कि, दुनिया भर के स्वाद जरूर लेने चाहिए. आज पूरी दुनिया मुट्ठी में है तो जितनी हो सके भाषाएं सीखिए, पहनावे धारण कीजिए और खान-पान बरतिए. कोई डण्डा नहीं चला रहा कि बाटी-चोखा, आलू-पूरी, डोसा-पोहा, वगैरह ही गले से नीचे धकेलते रहिए या धोती-कुर्ता-लुंगी-साड़ी ही धारण कीजिए. लेकिन यह जरूर देखिए कि अपने स्वाद, पहनावे और भाषा-बोलियों के साथ कैसा सलूक हम कर रहे हैं. जी हां, खान-पान और भाषा-बोलियों का परस्पर अंतरंग सम्बंध है. हम अपने स्वाद ही नहीं भूल रहे, भाषाओं को भी साथ ही मार रहे हैं. स्वाद छिनता है तो अपनी बोली-भाषा-लोकगीत-संगीत सब जाता रहता है.
यह सांस्कृतिक हमला बड़े शहरों से सीधे गांवों तक पहुंच गया है. गांवों के मेलों-हाटों-उत्सवों-ब्याह-काजों में सबसे ज्यादा मांग चाऊमीन वगैरह की हो रही है. सांस्कृतिक संध्याओं में लोक गीतों की बजाय फिल्मी धुनों पर लोक-नृत्य होते हैं. लोक संगीत और भाषा-बोली का हाल वैसा ही हो गया है जैसा किसी ढाबे में प्याज-लहसुन का छौंका लगाकर पकाई गई मैगी का होता है.
नवरात्र में कन्या पूजन के दिन अगर बच्चियों के सामने नूडल्स परोसे जाएं क्योंकि पूरी-हलवा-चना अब कोई खाता नहीं तो हमें कुछ सोचना चाहिए या नहीं?
(नभाटा, लखनऊ, में 27 नवम्बर को प्रकाशित)