Saturday, July 16, 2016

लेकिन यादों की नैनीताल एक्सप्रेस दौड़ती रहेगी


पिछले महीने नैनीताल एक्सप्रेसकी छोटी लाइन की ट्रेन पूरी तरह बंद होने की खबर पढ़कर यादों का पिटारा खुला तो खुलता ही चला गया. बचपन के दिन. हर साल 20 मई को हमें स्कूल से रिजल्ट मिलता था. उसी शाम बाबू मुझे चारबाग स्टेशन की छोटी लाइन ले जाते, जहां नैनीताल एक्सप्रेस खड़ी रहती. ट्रेन में दो-चार परिचित मिल ही जाते. किसी एक को मेरा हाथ थमा कर बाबू उससे कहते- बच्चे को हल्द्वानी से बागेश्वर की बस में बैठा देना तो! मैं मजे से उनके साथ यात्रा करता. दूसरी सुबह वे हल्द्वानी से मुझे के एम ओ यू लिकी एक बस में बैठा देते जो खरामा-खरामा चलते हुए देर शाम बागेश्वर पहुंचा पाती. रास्ते में कण्डक्टर कई जगह उसके गर्म हो गए इंजिन में ठंडा पानी डालता. खैर, बागेश्वर में पिस्सू-खटमल भरी किसी कोठरी में एक रात काटकर अगले दिन गांव पहुंच जाता. जुलाई के पहले हफ्ते में लखनऊ लौटने के लिए आस-पास के गांवों से काठगोदाम तक जाने वाले की खोज की जाती. कोई न कोई मिल ही जाता. तब हर शाम काठगोदाम से दो खास ट्रेनें चलती थीं- आगरा फोर्ट और नैनीताल एक्सप्रेस, जो पहाड़ की बड़ी आबादी को शहरों में पहुंचाती थीं. दोनों ही ट्रेनें अब इतिहास हो गईं. वक्त के साथ छोटी लाइनें बड़ी होने लगीं, आवागमन का स्वरूप बदल गया, प्रवास की प्रवृत्ति परिवर्तित हो गई और ये ट्रेनें सिर्फ यादों में रह गईं जो हमारे लिए अपने पहाड़ से जुड़े रहने का आत्मीय माध्यम थी.
लखनऊ वापसी में हम देखते कि उत्तराखण्ड के विभिन्न अंचलों से बसें भर-भर कर आतीं और नौकरी पर लौटते फौजियों, सरकारी कर्मचारियों और रोजी-रोटी की तलाश में भाग कर आते किशोरों को काठगोदाम स्टेशन में जमा करती जातीं. आगरा फोर्ट जल्दी छूटती थी, सात बजे के करीब.  इसलिए उसे पकड़ने की बड़ी हड़बड़ी होती. बस का ड्राइवर रास्ते भर पूछता रहता कि कोई सवारी आगरा फोर्ट पकड़ने वाली है क्या? ‘हां, हो, हांआगरा जाने वाले यात्री पीछे से आवाज देते. कण्डर को बीड़ी पर बीड़ी पिलाई जाती कि जगह-जगह गाड़ी न रोके. देर होने लगती तो यात्री बेचैन होते लेकिन ड्राइवर-कण्डक्टर उन्हें आगरा फोर्ट पकड़वाने की जिम्मेदारी लेते थे. कई बार ऐसा भी होता था कि सुस्त बस का ड्राइवर थोड़ा तेज रफ्तार गाड़ी को पास देते हुए आगरा वाले यात्रियों को उसमें भिजवा देता.
तो, काठगोदाम स्टेशन से आगरा फोर्ट रवाना होने के बाद नैनीताल एक्सप्रेस प्लेटफॉर्म पर लगती. इंतजार करते यात्रियों में जगह घेरने की होड़ मच जाती. तब रिजर्वेशन होता था या नहीं, मुझे नहीं मालूम. तब मैं जानता भी नहीं था कि ट्रेन में रिजर्वेशन जैसी कोई चीज भी होती होगी. आज सोचता हूँ कि फर्स्ट क्लास में रिजर्वेशन होता होगा. उसका एक ही डिब्बा लगता था, जिसे हम बड़ी हसरत से देखते. तब ए सी डिब्बे न थे. बहुत बाद में नैनीताल एक्सप्रेस के फर्स्ट क्लास डिब्बों में ए सी पलाण्ट लगाकर उसे सेकंड ए सी का दर्जा दिया गया. खैर, जब यह ट्रेन प्लेटफॉर्म पर लगती तो रेलवे का कोई कर्मचारी एक डिब्बे पर चॉक से खूब बड़े हर्फ में लिख देता- ‘56 ए पी ओ.यह पहाड़ का बहुत जाना–पहचाना पता था. हम बचपन से ही इससे खूब परिचित थे. गांव के कई लोग फौज में थे. उनके घर वाले स्कूली बच्चों को पकड़ कर उनसे चिट्ठी लिखवाते. पते की जगह फौजी का नम्बर, नाम और मार्फत 56 ए पी ओ लिखना काफी होता. हर फौजी का कई संख्याओं वाला एक नम्बर होता था जिसे घर वाले बहुत सम्भाल कर रखते थे और चिट्ठी लिखने वाले को कई बार हिदायत देते कि भाऊ, नम्बर ठीक से लिख देना, हां!कुछ फौजी 99 ए पी ओ वाले भी होते. ए पी ओ का अर्थ आर्मी पोस्ट ऑफिसहोता है, यह भी हमने बड़े होकर जाना.
हां, तो जिस डिब्बे पर ’56 ए पी ओलिख दिया जाता था, वह फौजियों के लिए रिजर्व होता. वही सबसे सुरक्षित डिब्बा माना जाता. छोटे बच्चों वाली महिलाएं और अकेले बच्चे अक्सर उसी में जा बैठते. फौजी उन्हें प्यार और सम्म्मान से जगह देते. कंधे पर भांति-भांति का सामान लादे कोई और आदमी उस डिब्बे में चढ़ने लगता तो फौजी टोक देते. छुटपन में मैंने इस डिब्बे में बहुत बार सफर किया. बिल्कुल युवा से प्रौढ़ सैनिक तक अपने घर-परिवार की स्थितियां एक-दूसरे से कहते रहते. वे किस्से ज्यादातर दुख और कष्टों के ही होते. कुछ फौजियों की नम आंखें और उदास चेहरे मुझे भी रुलाते. गांव से लौटते वक्त मैं नराई से भरा होता जो लखनऊ आने के कई दिन बाद धीरे-धीरे फिटती. लखनऊ से रवाना होते समय नैनीताल एक्सप्रेस खुशी और उल्लास से चहकती रहती. वापसी में उस पर उदासी पसर जाती. इस ट्रेन ने पहाड़ की कितनी व्यथा-कथाएं चुपचाप सुनकर अपनी सीटी और छुक-छुक में उड़ा दी होंगी. 
नैनीताल एक्सप्रेस हमें बहुत अपनी लगती. लकड़ी की फंटियों से बनी उसकी बेंचें हमें कभी नहीं चुभीं. बंगाली और दूसरे पर्यटक शिकायत करते लेकिन हमें उन पर बैठने में बड़ा आनंद आता, जैसे तब घर की टूटी लोहे की कुर्सी भी सोफा जैसी लगा करती थी. इसी ट्रेन में आते-जाते हम बड़े होते गए और पहाड़ के सुख-दुख से हमारा साक्षात्कार होता रहा. दुख और विरह भरी चिट्ठियों से लेकर, पहाड़ी सौगातों की कितनी ही पुंतुरियां इसने लखनऊ के गली-मुहल्लों तक पहुंचाई. कितने किशोरों को ढाबों- होटलों, घरों और दफ्तरों में नौकरियां दिलवाईं. चारबाग स्टेशन पर अक्सर इस ट्रेन से भाग कर आए पहाड़ी लड़के उतरते और शहर की भीड़ में खो जाते. पता नहीं उनमें से कितने पहाड़ लौट पाए होंगे!
सन 1969 में जब मैं आठवीं का छात्र था, एक सुबह कोई रिक्शा वाला एक भगोड़े प्रेमी युगल को कैनाल कॉलोनी वाले हमारे अहाते में पहुंचा गया था- आपके मुलुक से भाग कर आए हैं ये.हमारा अहाता पहाड़ियों के मुहल्ले के रूप में ख्यात था. घरेलू नौकर ढूंढने के लिए भी की लोग वहां आते रहते थे. तो, गोरी-फनार, भरी देह वाली उस युवती की छवि मुझे आज भी याद है. लड़का बहुत दुबला-पतला था. हमारे एक पड़ोसी पहाड़ी ने उन्हें अपनी कोठरी में जगह दे दी थी. लड़का सिंचाई विभाग की निर्माणाधीन इमारत में मजदूरी करने लगा. उसे टीबी का रोग रहा होगा. खून की उलटी करते-करते जल्दी ही वह मर गया. लड़की काफी समय उम्रदराज पड़ोसी के साथ रही. मैं उससे पहाड़ी गीत पूछ-पूछ कर डायरी में लिखा करता था. एक दिन स्कूल से लौटने पर सुना कि वह किसी के साथ भाग गई. बाद में वह मुझे उदय गंज-हुसैन गंज की गलियों में सब्जी का टोकरा सिर पर धरे फेरी लगाती दिखी. कई पहाड़ी परिवार उसके नियमित ग्राहक और दुख-दर्द के भागीदार थे. फिर उसकी गोद में एक नन्हीं बच्ची आई. बेटी को गोद में लेकर वह हुसैन गंज तिराहे पर सड़क पर बैठ सब्जी बेचने लगी. कुमाऊं परिषद का दफ्तर वहीं पर था. मैं उधर जाता तो वह दिखाई देती. उसकी बेटी बड़ी होती रही और वह मोटी-थुलथुल और बीमार. एक दिन कुमाऊं परिषद में ही सुना कि वह सब्जे बेचने वाली मर गई. उसकी बेटी का पता नहीं क्या हुआ होगा. नैनीताल एक्सप्रेस की यादों के साथ ऐसी व्यथा-कथाएं भी जुड़ी हैं.      
1971 में उसी मुहल्ले में शेखर दा से भेंट हुई. उसी के माध्यम से साल-दो साल बाद शमशेर से मुलाकात हुई जब वह अल्मोड़ा महाविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष चुने  गए थे. फिर उत्तराखण्ड छात्र संघर्ष वाहिनी के कई साथियों से परिचय बढ़ा. ये लोग प्रतिनिधिमण्डल लेकर विधायकों-मंत्रियों से मिलने लखनऊ आते रहते. शेखर दा को उनके अलावा भी बहुत सारे लोगों से मिलना होता था. उसकी डायरी फोन नम्बरों और पतों से भरी होती. मैं उसके साथ ही लगा रहता. वापसी में वह देर ही कर देता. स्टेशन जाने से पहले उदयगंज तिराहे पर हलवाई की दुकान से कुल्हड़ में दूध लेकर ब्रेड या बन भी खाने जरूरी होते थे. हम रिक्शे पर गर्म दूध छलकाते हुए स्टेशन भागते. एकाधिक बार ऐसा भी हुआ कि नैनीताल एक्सप्रेस के छूटने का टाइम हो गया और शेखर पाठक का पता नहीं. गार्ड की सीटी और हरी झण्डी रोकने का दुस्साहस शमशेर ही कर सकता था. प्लेटफॉर्म पर गार्ड से शमशेर की बहस हो रही होती कि लम्बे-लम्बे डग ट्रेन की तरफ बढ़ते दिखते. इस दौड़ में मैं पीछे छूट जाता. चलती ट्रेन से शेखर दा का लम्बा हाथ फिर मिलेंगेकहता हुआ हिलता दिखता तो मैं घर लौट आता. शमशेर को जरूर याद होगा और हमारे प्रिय प्रोफेसर शेखर पाठक नैनीताल एक्सप्रेस की उन यात्राओं को कैसे भूल सकते हैं भला.
और गिर्दा! वह पीता-गाता रहता और हमारी महफिल पीती-सुनती सम्मोहित रहती. ट्रेन कबके जा चुकी होती और टिकट लौटाने की सुध भी किसे होती थी. कभी समय पर याद दिलाए जाने पर वह हाथ हिला देता- छोड़ो हो, आज नहीं जाते!फिर कौन उसे मना सकता था. ट्रेन में बैठ गया तो भी फैज़ या नाजिम या साहिर या गौर्दा या खुद का कलाम जारी रहता. सुनने वालों में नैनीताल एक्सप्रेस के यात्री और टी टी सभी शामिल होते, जब तक कि ट्रेन का झटकेदार पालना उसे सुला न देता होगा.  सोमरस की तरंगों पर सवार हमारे प्यारे हरुआ दाढ़ी ने भी इस ट्रेन के टी टी को अंग्रेजी में कम भाषण नहीं सुनाए ठहरे! चंद्रेश शास्त्री के साथ देखी अंग्रेजी फिल्मों का असर ऐसे ही मौकों पर बाहर निकलता था.
बहुत बाद तक नैनीताल एक्सप्रेस हमारे लिए पहाड़ का हरकारा बनी रही. दोस्तों के लिए किताबें, अखबारों-पत्रिकाओं के लिए लेख और चिट्ठियां हमने इसी ट्रेन से भेजे. नैनीताल एक्सप्रेस के डिब्बों का चक्कर लगाते हुए सिर्फ इतना कहना होता- दाज्यू, अल्मोड़ा के चेतना प्रेस या नैनीताल के राजहंस प्रेस तक यह बण्डल पहुंचा देंगे?’ परिचित न होते तो भी कई हाथ उठ जाते और सामान ठिकाने तक जल्दी और सुरक्षित पहुंच जाता. नैनीताल समाचारके लिए कितनी ही बार हाफ टोन ब्लॉक इसी तरह भेजे गए. राजीव या हरीश डाक से फोटो भेज देते और मैं ब्लॉक बनवा कर स्टेशन पर नैनीताल जाने वाले किसी भी दाज्यू के हाथ में पैकेट थमा देता.
कोई 18-20 वर्ष पहले जब यह ट्रेन काठगोदाम से आखिरी बार चली, संयोग से मैं उसमें सवार था. पूरी यात्रा में लोग उदास होकर इस ट्रेन के संस्मरण सुनाते रहे थे. उसके बाद भी नैनीताल एक्सप्रेस लाल कुंआ से लखनऊ के बीच चलती रही. तब भी हमारे लिए इस ट्रेन का महत्व बना रहा था. जब लालकुंआ से भी वह गायब हो गई तभी हमारा रिश्ता उससे टूट गया था, हालांकि वह लखनऊ को पहाड़ के एक कोने टनकपुर से अपने सफर की आखिरी रात तक जोड़े रही थी.
भावुकता अपनी जगह है लेकिन सच यही है कि यादें हमें परिवर्तन की प्रवृत्ति और उसकी दशा-दिशा का संकेत देती हैं. नैनीताल एक्सप्रेस के बंद हो जाने का कारण सिर्फ आमान परिवर्तन नहीं है. उत्तराखण्ड राज्य का बनना, समाज के मिजाज और आर्थिकी का बदलना बड़े कारण हैं. प्रवास का रूप-स्वरूप भी तो कितना बदल गया. कुछ समय बाद बड़ी लाइन पर लखनऊ से काठगोदाम तक एक नैनीताल एक्सप्रेस फिर चलेगी. उसके कोच बेहतर और आरामदायक होंगे लेकिन हमारी पीढ़ी के लिए वह वही नैनीताल एक्सप्रेस नहीं होगी जो बंद हो गई. उस ट्रेन की छुक-छुक, इंजिन से उड़ते कोयले के चूरे और देह भर में समाई धुएं की गंध हम भुला न पाएंगे.
(इसे यहां भी पढ़ सकते हैं- 
 http://www.nainitalsamachar.com/lekin-yaadon-ki-nainital-express/



वही तो साधती रहीं आपका जीवन-छंद, जिज्ञासु जी!

तसव्वुरात की परछाइयां हैं कि खत्म नहीं होतीं...
लेकिन गुरु जी, स्मृतियों के इस झंझावात को रोकना होगा. हाँ, उससे पहले वह पक्ष अवश्य कहना होगा जिसके बिना आपके बारे में कुछ भी कहा-लिखा अपूर्ण रहेगा- आपकी श्रीमती जी’, जैसा कि आप उन्हें कहते रहे.
कोई आठ-दस वर्ष पहले एक बार किसी इण्टरव्यू के सिलसिले में मैंने आपसे पूछ लिया था- अपनी रचनात्मक यात्रा में आपको परिवार का कितना सहयोग मिला?’ आपके जवाब ने मुझे स्तब्ध कर दिया था, जो शब्दश: इस तरह था- खेद है कि परिवार की ओर से मुझे सहयोग नहीं मिला.
मैंने सोचा था आप अपने परिवार को, खासकर पत्नी को पूरा श्रेय देंगे लेकिन यह क्या कह गए थे गुरू जी, आप? उस दिन नहीं टोक पाया था. आज आप चले गए हैं तो कुछ सवाल करने की गुस्ताखी करूं? आप नाराज मत होना. मुझसे आप कभी नाराज नहीं हुए. भरोसा करते रहे मुझ पर. तो बताइये, यह क्रूर जवाब आपने क्यों दिया था?
हां, आज भी आपका जवाब मुझे अन्यायपूर्ण लगता है.
पांच जून 1955 को अल्मोड़ा से जिस देवकी देवी को आप ब्याह लाए थे और जिसने इतने वर्ष आपकी हर प्रकार अद्भुत सेवा की, अगर वह पूर्ण सहयोगी नहीं थी तो गुरू जी, कोई परिवार सहयोगी नहीं हो सकता.
मैंने आपको इतने लम्बे सम्पर्क में कभी एक नीबू खरीदते नहीं देखा. आप सिर्फ एक चीज खरीद सकते थे, सिगरेट की डिब्बी. घर में किताबों के अलावा आपको सिर्फ ऐशट्रे और बाथरूम के मग्गे का पता होता था. आप पूरा वेतन ईमानदारी से श्रीमती जी के हाथ में रख देते थे और रोज घर छोड़ने से पहले उनके सामने अपना हाथ फैला देते थे, जिस पर वे हिसाब लगाकर आपकी दिन भर की सिगरेट और चाय का खर्च रख देती थीं. यदा-कदा इस शिकायत के साथ कि कल तुमने एक डिब्बी सिगरेट ज्यादा खर्च की है, हां!
परिवार चलाना, बच्चे पालना क्या होता है, आप कतई नहीं जानते थे. बच्चों को पढ़ने के लिए बिना शोर डांटा जा रहा होता था या आटा-दाल के कनस्तर धीरे से खाली किए जा रहे होते थे तो सिर्फ इसलिए कि तब आप रची जा रही कविता में छंद की मात्राएं दुरुस्त कर रहे होते थे. आपके रचनाकार का उस घर में कितना सम्मान था, यह शायद आपको पता न रहा हो लेकिन आखिरी सांस तक भी आपने जिन पुस्तकों को अलमारी में सजा-धजा देखा, उनमें साफ, नया जिल्द चढ़ाने की फुर्सत भी श्रीमती जी ने ही निकाली थी.
आप भूले हों तो हों, हम कैसे भूल सकते हैं कि खुर्रमनगर (पंतनगर) में जब आपका मकान बन रहा था तो देवकी जी फटी धोती पहन कर दिन भर मजदूरों के साथ ईटा-गारा ढोती थीं ताकि रोज एक मजदूरी बचे. आपकी रोटी पकाने के बाद भी वे अंधेरे में सिर पर ईटें रख कर छत के ढोले तक पहुंचाया करती थीं ताकि सुबह आते ही राजमिस्त्री काम पर लग सके. जिस मकान पर आपने बड़े फख्र से बंसीधर पाठक जिज्ञासु की तख्ती टांगी, उसका गारा-सीमेण्ट आपकी देवकी पर्वतीया के खून-पसीने में सना है. यह नाम कभी आपने ही उन्हें दिया था लेकिन नेम प्लेट पर इसे भी शोभायमान करना आप भूले ही रहे!
और, याद है, घर से चाय-सिगरेट के खर्च के साथ रोज मिलने वाली हिदायत- किसी की एक पैसे की चाय मत पीना, हां! अपने पैसे से पीना. (घर आने पर चाय पिलाइए तो जिज्ञासु शौक से पीएंगे लेकिन दफ्तर में पी गई हर कप चाय का पैसा वे अपनी जेब से देते थे. कलाकार-रचनाकार से चाय पी लेना अपराध था उनके लिए.)
रिटायरमेण्ट के बाद जिन-जिन बीमारियों का हमला आप पर हुआ, उनसे वे ही लड़ती रहीं. रोग ग्रस्त शरीर आपका था लेकिन युद्ध उनका. घंटों आपका मलपश खुजलाना है, दवा चुपड़नी है, अपने हाथों खाना खिलाना है. पिछले आठ-दस सालों से वे आपकी नींद सोती थीं, आपकी हर करवट पर जगती थीं. अपनी उनकी सिर्फ सांस थी और वह भी आप ही के लिए जरूरी थी. जाड़ों में धूप में बैठा कर दो-तीन बार हाथ-पैरों और कमर की मालिश से लेकर हर जरूरत का पूरा ध्यान. सुबह के दलिया से रात के दूध तक, समय-समय पर दवा, फल, जूस, बिस्कुट, जाने क्या-क्या, जिनका एक टुकड़ा कभी उनके अपने मुंह में नहीं गया. वह पतली-दुबली काठी दो रोटी और दाल-भात से चलती रही. उनकी चौकसी सीमा पर तैनात जवान की सतर्कता को मात करती थी. और जब कभी, आप कुछ खाने-पीने से मना कर देते थे तो क्या प्यारी डांट लगाती थीं, कि बुड्ढे, खाओ-खाओ, खाओगे नहीं तो टिकोगे कैसे, और तुमको मैं मरने दूंगी क्या! पिछले कई साल से तो आप उनके लिए नन्हे बालक ही थे जिसे लाड़ में गरियाना-खिलाना-हंसाना जैसे उनके अपने लिए भी जीने का जरिया था. गालियों भरी उनकी प्यारी डांट सुनकर आपके होठों पर हंसी थिरक उठती थी और आप चुपचाप खा लेते थे. सब कहते थे कि जिज्ञासु जी को तो उनकी पत्नी ने टेक रखा है. बिल्कुल सच कहते थे. वह तो सृष्टि का अटूट नियम टूटने का खतरा था, नहीं तो देखते कि आठ जुलाई को भी आप कैसे जाते!
आपकी सारी कविता-कहानियों के नेपथ्य में, आपकी सारी भटकनों में, आपके रिश्तों के निर्वाह में, आपकी एकनिष्ठ कुमाऊंनी सेवा तथा साफगोई और ईमानदारी के पीछे वे अनिवार्य रूप से रही हैं, गुरू जी! उनका सहयोग अप्रतिम है. देखिए, आपके जाने के बाद वे एकदम से खाली हो गई हैं.
आपकी कुमाऊंनी सेवा का समादर समाज ने किया, आपको प्यार और सम्मान मिला. इस लोक में आपको याद रखा जाएगा. और, उस लोक में अब आपको खूब पता चल रहा होगा कि कौन थीं देवकी और उनका आपके जीवन एवं कर्म में कितना बड़ा योगदान रहा. अब तो आप अपना बयान बदल देना, गुरू जी!

और, आज अपने नब्बू का नमस्कार भी लेना, जिसे कहना मैं आपके सामने पड़ते ही हमेशा भूल जाता रहा. (फिलहाल इतना ही)

Friday, July 15, 2016

जिज्ञासु जी : 'उत्तरायण' से आगे 'आंखर' तक

जिज्ञासु जी ने 'उत्तरायण' के लिए चलाना शब्द इस्तेमाल किया था लेकिन जो उन्होंने किया वह चलाना नहीं उसे सींचना, पालना, पोषना और निरंतर समृद्ध करना था. वे बताते थे कि जब मैं उत्तरायण में तैनात हुआ तब मुझे खुद कुमाऊंनी नहीं आती थी. बचपन से देहरादून, दिल्ली, शिमला और अम्बाला रहा. पंजाबी को मैं अपनी मातृभाषा कहा करता था. फिर कुमाऊंनी सीखनी शुरू की. श्रीमती जी से शुरुआत की. फिर लखनऊ की सयानी महिलाओं के साथ बैठा.

 दरअसल, यह कहना कि उन्हें कुमाऊंनी नहीं आती थी, उनकी विनम्रता थी. अपनी दुधबोली उन्हें ठीक-ठाक आती थी लेकिन वे उस बोली में 'उत्तरायण' कार्यक्रम का नियोजन और संचालन करने के लिए उसमें पारंगत होना चाहते थे. कुमाऊंनी के विविध उच्चारण, इलाकाई विभेद, उच्चारण के जरा से अनतर से गहरा अर्थ-भेद, सब भली-भांति जान लेना चाहते थे. बहुत जल्दी जिज्ञासु जी ने बहुत अच्छी कुमाऊंनी सीख ली और कामचलाऊ गढ़वाली भी. जबलपुर वाले कुमाऊंनी भाषा और संस्कृति विशेषज्ञ त्रिलोचन पाण्डे जी से पत्र व्यवहार होने लगा. 1964 तक अपनी दुधबोली पर उनकी बढ़िया पकड़ हो गई थी. अब वे लोगों को भांति-भांति के कुमाऊंनी उच्चारण और उसके बारीक भेद सिखाने लगे थे. इसके बाद शुरू हुआ कुमाऊंनी कवियों से सम्पर्क. खुद भी कुमाऊंनी में कविता, गीत, कहानी, रूपक और नाटक लिखने लगे. लिखने को तो उन्होंने कुमाऊंनी में कव्वाली भी लिखी और गवाई. उसके बाद वे ओबीआर पार्टियों के साथ रिकॉर्डिंग मशीन लेकर पहाड़ के कौतिकों में घूमने लगे. बागेश्वर, द्वाराहट, जौलजीवी, गोचर, देवीधुरा, जाने कहां-कहां. ब्रजेंद्र लाल साह, चारु चंद्र पांडे, अनुरागी जी की मार्फत लोक संगीत की समझ बढ़ी. 1939-40 में अल्मोड़ा से कुमाऊंनी में अचल पत्रिका निकालने वाले जीवन चंद्र जोशी अपना बुढ़ापा लखनऊ में काट रहे थे. जिज्ञासु जी उनकी शरण भी जाते.

फिर एक नया दौर आया जब आकाशवाणी के स्टूडियो में आमंत्रित श्रोताओं के समक्ष लोक भाषा की कवि गोष्ठियां और लोक संगीत संध्याएं आयोजित होने लगीं. उत्तरायण कार्यक्रम की ऐसी धूम मची कि पहाड़ी गांव-कस्बों से ही नहीं, सीमांतों पर तैनात उत्तराखण्डी फौजियों की चिट्ठियों से उत्तरायण एकांश की मेजें और अल्मारियां भरने लगीं. पंद्रह मिनट से शुरू हुआ कार्यक्रम बहुत जल्दी पहले आधे घण्टे और फिर एक घण्टे का कर दिया गया. सांसदों-विधायकों की भेंट वार्ताओं, विकास के खोखले दावों, वगैरह की बजाय, वह सम्पूर्ण उत्तराखण्ड की सांस्कृतिक धड़कन बन गया. प्रवासी उत्तराखण्डियों के साथ-साथ समूचे उत्तराखण्ड के संस्कृति कर्मियों का लोकप्रिय मंच वह बहुत अरसे तक बना रहा. 'उत्तरायण' का कार्यक्रम अधिकारी कोई भी रहा हो, कुमाऊं-गढ़वाल का मूल निवासी या हिंदी भाषी, वे जिज्ञासु जी पर इतना भरोसा करते थे कि पूरे कार्यक्रम की तिमाही प्लानिंग उनसे ही कराते. उनके काम में शायद ही किसी अधिकारी ने दखल दिया हो. 
'उत्तरायण' को यह श्रेय जाता है कि उत्तराखण्ड की बोलियों का उस दौर का कोई नया-पुराना कवि, लेखक, गायक, वादक, लोक-कलाकार, वगैरह नहीं बचा होगा जो 'उत्तरायण' का मेहमान न बना हो और जिसकी रिकॉर्डिंग उसके संग्रह में मौजूद न हो.
नाजुक मैग्नेटिक स्पून टेपों में रिकॉर्डेड वह कीमती संग्रह अब वहां नहीं है. चंद ही टेप डिजिटल फॉर्मेट में बदल कर सुरक्षित रखे जा सके. यह भी जिज्ञासु जी का बड़ा दर्द था जिसे लिए-लिए वे चले गए.
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तसव्वुरात की परछाइयां उभरती हैं-
हुसैनगंज चौराहे के बर्लिंगटन होटल के परिसर में मीटिंग हो रही है. जिज्ञासु जी ने कई लोगों को बटोर रखा है. एक सांस्कृतिक संस्था बनाने की बात हो रही है. कुमाऊंनी-गढ़वाली में नाटक मंचित करने की योजना बनती है. 1974 में बनी सस्था का नाम रखा गया शिखर संगम’ और नवम्बर 1975 में लखनऊ के इतिहास में पहली बार एक कुमाऊंनी (मी यो गेयूं, मी यो सटक्यूं- लेखक/निर्देशक- नंद कुमार उप्रेती) और एक गढ़वाली नाटक (खाडू लापता, लेखक-ललित मोहन थपलियाल, निर्देशक-जीत जरधारी) खेले गए. बंगाली क्लब के खचाखच भरे हॉल में बैठे दर्शक रोमांचित थे और मुख्य अतिथि के रूप में आईं शिवानी ने स्वतंत्र भारत के अपने वातायन कॉलम में जी भर कर इन प्रस्तुतियों की सराहना की. उन्होंने दोनों बोलियों में हस्तलिखित/साइक्लोस्टाइल्ड पत्रिका त्वीले धारो बोला का भी लोकार्पण किया था जिसके सम्पादक थे जिज्ञासु. उस पत्रिका में श्यामाचरण दत्त पंत एवं जयंती पंत से लेकर नागेंद्र दत्त ढौंढियाल तक के की महत्वपूर्ण लेख तथा कई कविताएं थीं, जो जाहिर है कि जिज्ञासु जी के उत्तरायण-संग्रह का प्रसाद थे.

'शिखर संगम' जल्दी भंग हो गई. कोई बात नहीं. जिज्ञासु जी ने नई टीम जुटा कर आंखर का गठन कर लिया. दौड़-भाग चल रही है. चंदा जुटाया जा रहा है. जिज्ञासु जी रसीद बुक लेकर पहाड़ियों के घर-घर जा रहे हैं. कहीं तीखी-कटु बातें भी सुनने को मिलती हैं लेकिन चंदा तो लेना ही है. नाटक के लिए महिला पात्र नहीं मिल रही हैं. समझाया जा रहा है लोगों को कि लड़कियों को संस्था में भेजो. गाली भी पड़ रही है कि अपनी लड़कियों को क्यों नहीं नचाते. कोई बाधा उनके संकल्प को तोड़ नहीं पाती. देखते-देखते बड़ी टीम खड़ी हो गई जिसमें लड़कियों-महिलाओं की अच्छी संख्या थी. अगले दस वर्ष तक अपनी बोली के नाटकों का मंचन और बोलियों में आंखर पत्रिका का प्रकाशन चलता रहा. पत्रिका कुछ समय नियमित रूप से मासिक भी निकलती रही. बोलियों के नाटकों की टीम लेकर जिज्ञासु जी ने भोपाल, मुरादाबाद, पीलीभीत, कानपुर और अल्मोड़ा-नैनीताल तक की यात्राएं कीं. बाद में आंखर भी बिखर गया लेकिन जिज्ञासु जी अपनी जेब से पैसा लगा कर आंखर पत्रिका का प्रकाशन किए जा रहे हैं. दुखी भी होते हैं कि कोई सहयोग नहीं करता लेकिन गांठ में दाम और तन-मन में त्राण रहते दो साल खुद से खींच ले गए पत्रिका को. फिर शरीर ने साथ देना छोड़ दिया. शिकायतों-तकलीफों की गठरी लेकर वे घर भीतर सीमित हो गए. अकेले. तब तक यह शिष्य भी गुरू बन कर अपनी दुनिया में ज्यादा माती गया था.

आकारवर्धक शीशा लेकर पढ़ना और छिट-पुट लिखना तब भी उनका जारी था. यदा-कदा कुछ पत्रिकाओं में वे छपे दिखाई देते थे या घर जाने पर कतरनें दिखाते थे. उनका एक कविता संग्रह हिंदी में (मुझको प्यारे पर्वत सारे) और एक कुमाऊंनी में (सिसौंण) छप पाया था. और संग्रहों के लिए पाण्डुलिपियां तैयार करते रहते थे लेकिन छापने वाला था कौन! तीन महीने पहले मेरी आखिरी मुलाकात में भी कह रहे थे कि यार, नब्बू, कुछ कहानियां पूरी करनी हैं, संग्रह निकलवाना है.

वैसे, सच यही है कि उनकी कविताओं-कहानियों का उस सबके सामने कोई मोल नहीं है जो उन्होंने कुमाऊंनी बोली के लिए किया, नई पीढ़ी को तैयार करने के लिए किया. (क्रमश:)

Thursday, July 14, 2016

जिज्ञासु जी : काठ के दो बक्से और 'उत्तरायण'

तसव्वुरात की परछाइयां उभरती हैं-
गुरुवार को उनका साप्ताहिक अवकाश होता था. अवकाश में भी उत्तरायण की सेवा में जाना पुनीत कर्तव्य जैसा था लेकिन किसी-किसी अवकाश को वे अपने काठ के दोनों बक्से खोल कर पूरा दिन उनकी उखेला-पुखेली और साज-समाव में लगा देते. इस बीच यह शिष्य पहुंच गया तो सम्भाली चीजें फिर बाहर निकल आतीं- तुमने नागार्जुन की कविताएं तो पढ़ी हैं लेकिन बाबा का गद्य देखा है क्या... ये ले जाओ, रतिनाथ की चाची पढ़ना... पंत और निराला का कविता-विवाद जरूर पढ़ना चाहिए... और ये देखो, राम विलास शर्मा ने निराला पर कैसा अद्भुत लिखा है... अरे, तुमने मुख सरोवर के हंस नहीं पढ़ा अभी तक? फिर क्या पढ़ा यार! और देवेंद्र सत्यार्थी? लोक का अध्ययेता...बेला फूले सारी रात’. यह लो तुम उस दिन मांग रहे थे गढ़वाली पर राहुल की पुस्तक....और ये निशा निमंत्रण’, जिसमें बच्चन ने नया छंद ईजाद किया है. 

वे किताबें निकालते जाते, उनके बारे में बताते जाते... फिर कोई पुरानी पत्रिका का अंक खोल कर बैठ जाते- ये सुनो, गोपाल सिंह नेपाली का गीत- मां, मत हो नाराज कि मैंने खुद ही मैली की न चुनरिया... और इसमें रामानंद दोषी के बहुत सुंदर गीत छपे हैं...ये देखो... शाम ढलने लगती और कई बार गरम किया खाना एक बार फिर गरम करतीं देवकी जी रसोई से डांट लगा रही होतीं- नहीं खाते हो आज ये खाना?

काठ के ये दो बड़े बक्से मिला कर उनकी बैठक में रखे रहते और बैठने की सैटी का काम करते. उस पर खाना भी हो जाता और वक्त-जरूरत झपकी भी ले ली जाती. ये बक्से जिज्ञासु जी की कीमती सम्पत्ति हैं और आज उनके नहीं रहने पर भी घर में उनकी उपस्थिति बनाए हुए हैं.
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करीब 31 वर्ष उत्तरायण को पूरी तरह समर्पित करने के बाद जब 1994 में वे रिटायर हुए, तब तक कई रोगों ने उनके शरीर पर हमला बोल दिया था. एक्जीमा की सूखी पपड़ियां जब पूरे शरीर को ढक लेती थीं तो उनसे खुजाते भी न बनता था. उनकी सदा सेवारत पत्नी किसी तीली पर दवा लगा कर उन पपड़ियों को सहलातीं और अपने हाथों खिलाती. खूनी बवासीर जब जोर मारती तो रक्त चढ़ाने तक की नौबत आ जाती. रक्त चाप बढ़ा, हड्डियां कमजोर पड़ीं, कमर जल्दी झुक गई, दांतों ने धीरे-धीरे साथ देना छोड़ दिया और चस्मे का शीशा हर साल और मोटा होता गया. उतनी उम्र नहीं हुई थी जितने के वे लगने लगे थे. तो भी सुबह बरामदे में और दिन में बैठक में कुर्सी मेज पर बैठ कर वे कविताएं रचते, लेख लिखते, अखबारों-पत्रिकाओं से कतरनें काटते-चिपकाते, अपनी किताबों की जिल्द सही करते, पुरानी चीजें निकाल कर पढ़ते और सारा दिन अपने को रचनात्मक रूप से व्यस्त रखते. उनके रिटायर होने के बाद आकाशवाणी ने उनकी क्षमता और अनुभव का कोई मोल नहीं लगाया. सरकारी तंत्र में इस बात का कोई मूल्य ही नहीं था कि उत्तरायण की लोकप्रियता और स्तर के पीछे डेढ़ पसलियों के इस व्यक्ति का बड़ा हाथ था. उत्तरायण क्रमश: सरकारी गति को प्राप्त होता रहा और जिज्ञासु नामधारी व्यक्ति के भीतर उसके पतन की पीड़ा ग्रंथियां बन कर जमा होती रहीं. उनके इर्द-गिर्द चक्कर काटने वाली भीड़ नदारद हो चुकी थी. सुख-दुख बांटने के लिए नंद कुमार उप्रेती जैसे कुछेक दोस्त बचे थे लेकिन वे भी जल्दी साथ छोड़ गए. जब कभी मैं उनके पास जाता तो शिकायतों का पुलिंदा तैयार रहता- कोई नहीं आता यार, अब. और मैं कहीं जा नहीं पाता. अब मैं पढ़ भी नहीं पाता. जबकि उनके हाथ का आकारवर्धक शीशा गवाही देता रहता कि पढ़ना कैसे छोड़ सकते हैं वे!

मुझसे भी शिकवा कम नहीं होता- कहां रहते हो यार, तुम भी आज छह महीने बाद आए हो.’ एक-दो  महीना उन्हें छह महीने से ज्यादा ही लगता होगा. जब ज्यादा ही नराई लग जाती थी तब किसी सुबह-सुबह पत्नी के साथ टेम्पो में बैठ कर हमारे घर आ जाते. अपने साथ कभी मेरे लेखों की कतरनें ले आते, कभी कोई पुरानी किताब या पत्रिकाओं के अंक और कभी पढ़ने के लिए कुछ नया मांग ले जाते. एक-कर सबके हाल पूछते- शेखर की कोई चिट्ठी आई? अब चारु चंद्र जी भी पत्र नहीं लिखते. गिरीश क्या कर रहा है? नैनीताल समाचार तो मुझे भेजते ही नहीं. पता नहीं दुधबोली का अंक निकला या नहीं? जो-जो याद आ जाता, सबका हाल-चाल पूछते जब तक कि उनकी पत्नी लगभग डांटते हुए उन्हें उठा नहीं देती- चलो-चलो अब, लता को बैंक की देर हो गई. 

वह आदमी जो सारा लखनऊ पैदल नापा करता था, जो लखनऊ के तमाम मुहल्लों में रचनाधर्मी और संस्कृति प्रेमी पहाड़ियों के घर आंख बंद करके भी पहुंच जाता था, जो उत्तराखण्ड के मेलों-कौतिकों से लोकगीतों की रिकॉर्डिंग कर लाने के लिए कष्टदायी यात्राएं किया करता था, उसे लाचार होकर घर बैठे देखना बहुत पीड़ा दायक होता था. पिछले छह-सात साल से तो वे बिल्कुल घरी गए थे और कोई साल भर से बिस्तर पर, जबकि क्षीण कान-आंख के साथ स्मृति-लोप ने भी आ घेरा था.

आठ जुलाई को जो हुआ वह वास्तव में मुक्ति थी. 
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तसव्वुरात की परछाइयां उभरती हैं-

आकाशवाणी के लॉन की हरी दूब पर जाड़ों की धूप में बैठे वे मुझे सुना रहे हैं अपनी दास्तां, क्योंकि मैंने ही लगा रखी थी रट-


साढे तीन साल का था जब पिता मुझे अपने साथ देहरादून लेते गए. पिता विशारद-संस्कृत के छात्र थे और पुरोहिताई करते थे. वहीं उन्होंने मुझे पाटी पर अ-आ-क-ख सिखाए. फिर गीता प्रेस, गोरखपुर की छपी किताबें लाने लगे. लगु सिद्धान्त कौमुदी और अमर कोश रटाया. एक श्लोक रटने पर एक पाई मिलती थी. इसी तरह संस्कृत नाटक भी पढ़ डाले. फिर पिता को दिल्ली जाना पड़ा और दिल्ली से शिमला, जहां 1945 या 1946 में डीएवी हाईस्कूल में छठी में भर्ती कराया गया. एक कवि सम्मेलन में मदन लाल मधु को सुना जो शिमला में अध्यापक थे. तब कविता का चस्का लगा. शिमला बस अड्डे पर पूर्ण सिंह की धर्मशाला में एक कवि सम्मेलन सुना, जिसमें पंत, बच्चन, महादेवी और निराला ने काव्य पाठ किया था. उसके बाद कविता लिखना शुरू किया.

बाद में मैंने उनसे यह भी पता किया था- जन्म- 21 फरवरी 1934, ग्राम-नहरा, पोस्ट-मासर, जिला-अल्मोड़ा. माता- आनदी देवी, पिता- पुरुषोत्तम पाठक. अपना नाम कभी बंसीधर लिखते, कभी वंशीधर. अंग्रेजी में बी डी पाठक.

आकाशवाणी भवन के गेट पर एक पहाड़ी भाई के चाय के खोंचे पर जारी है कहानी-
सन 1950 में हाईस्कूल किया और पिता के साथ वापस दिल्ली जाने से इनकार कर दिया. अखबारों-पत्रिकाओं में मेरी कविता और कहानियां छपने लगी थीं. संस्कृत के ट्यूशन भी पढ़ाता था. जयदेव शर्मा कमल से इसी कारण भेंट हुई. कमल जी भारतेंदु विद्यापीठ में हिंदी कविता पढ़ाते थे. 1953 की बात है शायद, उन्होंने अपनी पत्नी को संस्कृत पढ़ा देने का अनुरोध किया. यहीं पड़ी हमारी पक्की पारिवरिक दोस्ती की नींव जो आजीवन मजबूत बनी रही और मेरे आकाशवाणी, लखनऊ में आने का कारण बनी.

कभी नजरबाग-सुन्दरबाग और कभी क्ले-स्क्वायर-मुरलीनगर की गलियों में आते-जाते जारी रहता यह किस्सा. मैं कोचता और वे बताते जाते- कमल जी शिमला, आकाशवाणी केंद्र में नियुक्त हो गए थे. फिर उनका तबादला दिल्ली और उसके बाद लखनऊ हो गया. मैं उन दिनों खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग, अम्बाला छावनी के दफ्तर में टाइपिस्ट था. एक दिन लखनऊ से कमल जी का अंतर्देशीय पत्र मिला कि मैं केंद्र निदेशक, आकाशवाणी के नाम विभागीय कलाकार के रूप में नियुक्ति हेतु आवेदन पत्र भेज दूं. 1962 के चीनी हमले के बाद भारत सरकार ने उत्तर प्रदेश के सीमांत पर्वतीय अंचल के श्रोताओं के लिए उत्तरायण कार्यक्रम शुरू करने का फैसला किया था, जिसे प्रसारित करने की जिम्मेदारी लखनऊ केंद्र को मिली थी. उसी में एक जगह निकली थी. मैंने आवेदन पत्र भेजने की बजाय तार भेज दिया कि मैं लखनऊ पहुंच रहा हूं. इस तरह मैं सात जनवरी 1963 को उत्तरायण में विभागीय कलाकार की हैसियत से काम करने लगा. पंद्रह मिनट का कार्यक्रम अक्टूबर 1962 में शुरू हो चुका था, जिसे जीत जरधारी और कमल जी संचालित कर रहे थे. उसके बाद इसे मैंने और जरधारी ने चलाया.’ (क्रमश:) 

Wednesday, July 13, 2016

ये चराग जल रहे हैं- 8 (1) /जिज्ञासु : मेरे अघोषित गुरु


कोई आठ साल पहले एक दिन अपने घर बुलवा कर उन्होंने मुझे एक कागज पकड़ाया था. उनके सुन्दर हस्तलेख में किसी रजिस्टर का एक पन्ना दोनों ओर लिखा हुआ था. शीर्षक था- मेरी वसीयत. इस वसीयत में उन्होंने तीन सम्पतियों का जिक्र किया था. एक- मेरे पिताश्री ने कोई वसीयत नहीं की थी, सो उनकी सम्पति पर मेरा कोई हक नहीं बनता. दो- मेरी हार्दिक इच्छा है कि मेरे मरण के उपरांत कोई भी धार्मिक कर्म का आयोजन न किया जाए. मेरी देह का दान (मेडिकल कॉलेज) ट्रामा सेण्टर, लखनऊ को कर दिया जाए... और तीन- मेरी पुस्तकों, पत्रिकाओं, उपयोगी कतरनों को मेरी श्रीमती किसी साहित्यिक संस्था, जो कि उत्तराखण्डीय प्रवासियों द्वारा लखनऊ में स्थापित की गई हो, उन्हें दान स्वरूप प्रदान कर सकती हैं.
निर्धारित प्रपत्र पर हस्ताक्षर करा कर देह दान करने का उनका संकल्प मैंने मेडिकल कॉलेज में विधिवत दर्ज करा दिया था लेकिन उनके परिवार से इसकी चर्चा करने का साहस तब मुझे नहीं हुआ था.
आठ जुलाई 2016 की सुबह जब जिज्ञासु जी के छोटे बेटे दीपू ने उनके निधन के खबर दी तो शोक के साथ मेरी पहली चिंता उनकी इस इच्छा को पूरा कराने की हुई. मैंने संसकोच दीपू से कहा कि देह दान किया था उन्होंने, मेडिकल कॉलेज को फोन करना होगा. दीपू ने बताया कि वह सब हो रहा है. देह दान तो पिता जी ने मम्मी का भी करा रखा है.
मेडिकल कॉलेज की टीम के उनका पार्थिव शरीर उठा ले जाने तक भी मैं उनके अंतिम दर्शन को नहीं पहुंच पाया लेकिन इसका बहुत मलाल नहीं हुआ. संतोष हुआ कि उनकी सबसे बड़ी इच्छा पूरी हो गई. मुझे शंका थी कि उनकी धर्मप्राण, संस्कारी-कर्मकाण्डी पत्नी देहदान पर आपत्ति करेंगी और उन्हें मनाना मुश्किल होगा. लेकिन मैं गलत समझता रहा. वह स्त्री जो जीवन भर अपने पति की अथक सेवा करती रही और उसके हर फैसले में साथ रही, वह आज कैसे विरोध कर सकती थी. वे मुझे देखते ही आंसू बहाते हुए बताने लगीं कहते थे, नवीन को फोन कर देना, वह सब करा देगा.
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तसव्वुरात की परछाइयां उभरती हैं-
सन 1971 का साल. शाम ठीक पौने सात बजे मैं आकाशवाणी, लखनऊ के फाटक के सामने खड़ा हूं. पांच-दस मिनट के बाद सामने स्टूडियों की तरफ से वे आते दिखाई दिए. एक हाथ में स्पून-टेप, रजिस्टर, वगैरह और दूसरे हाथ में जलती सिगरेट का कश पूरे जोर से खींचते हुए. कार्यक्रम खत्म कर स्टूडियो से बाहर आते ही उनका पहला काम सिगरेट जलाना होता था. उत्तरायण कार्यक्रम तब पूरे एक घण्टे का हो चुका था और उसका संचालन करते हुए इतनी देर सिगरेट पीना मुश्किल ही होता था. तो भी वे पांच मिनट के समाचार ब्रेक में बाहर आकर दो-चार सुट्टे मार लिया करते थे. लेकिन पूरे इतमीनान से सिग़रेट कार्यक्रम खत्म होने के बाद ही पी जा सकती थी. मुझे फाटक के बाहर खड़ा देख कर वे हाथ हिलाते हैं कि अभी आया... सामान कमरे में रख कर वे आ गए हैं और कह रहे हैं- आज विद्या के यहां चलें?’
-चलिए.’ और मैं उनके साथ चल पड़ता हूं. यह लगभग हर शाम का किस्सा होता. कभी वे कहते, चलो आज इगराल साब के यहां चलते हैं, कभी डॉ भाकूनी के यहां, कभी नजरबाग हेमा के यहां, कभी सुंदर बाग, कभी मॉडल हाउस, कभी सदर, कभी निराला नगर, कभी महानगर. मुरली नगर, उदय गंज, क्ले स्क्वायर तो पड़ोस में ही हुआ. कभी मिल गई तो सिटी बस, वर्ना लमालम पैदल. 1971 से अगले आठ-दस सालों में मैंने उनके साथ घूमते हुए लखनऊ के करीब-करीब सभी मुहल्लों में पहाड़ियों के घर छान लिए थे.
मैं दो-चार दिन उनसे मिलने नहीं जा पाता तो वे कैनाल कॉलोनी वाले हमारे डेरे पर चले आते. बाबू उनके नमस्कार का जवाब तो देते लेकिन उख़ड़े-उखड़े. उनकी समझ में नहीं आता था एक लड़के की अपने पिता की उम्र के व्यक्ति से यह कैसी दोस्ती है!
तो, कैसी दोस्ती थी यह?
दोस्ती के आवरण में, दरअसल, यह गुरु-शिष्य का अनौपचारिक रिश्ता था. कोई स्कूल या आश्रम नहीं, कोई कक्षा या लेक्चर नहीं. यह पैदल चलते फुटपाथ पर और लखनऊ के पहाड़ियों के घरों में मिलने वाली अनोखी दीक्षा होती थी. उन्हें उत्तरायण के लिए कुमाऊंनी-गढ़वाली वार्ताकार चाहिए होते थे, कवि-गीतकार चाहिए थे, गायक-वादक चाहिए थे. नाम से जिज्ञासु आगे-आगे और साथ में मन से जिज्ञासु यह शिष्य.
तसव्वुरात की परछाइयां उभरती हैं-

स्याल्दे-बिखौती आ रहा है. इस पर कुमाऊंनी में वार्ता कौन लिखेगा? हम गुरु-शिष्य की जोड़ी पहुंच गई गौरी दत्त लोहनी जी के महानगर वाले घर. चाय पी जा रही है और द्वाराहट का कौतिक, लोक-गीत और ध्वज-निशाण सब साक्षात अवतरित हो जाते उस छोटी सी बैठक में. फूलदेई पर वार्ता लिखनी है शांता पाण्डे को और उनके ड्राइंग रूम में गुनगुनाया जा रहा है- लाओ चेलियो, कुकुड़ी का फूल...  फूल टिपी तौ बोकिये ले खै छौ... और मेरी स्मृतियों में ताजा हो रहा है गांव का बिम्ब, लिपी-पुती ऐपण डली छापरी सिर पर धरे बच्चों की टोली का देली पूजना, गुड़-चावल पाना और सुस्वादु सै की गंध... किसी की कविता ठीक की जा रही है, बोली के शब्दों के अर्थ और अनर्थ समझाए जा रहे हैं. किसी की वार्ता को दुरुस्त किया जा रहा है, उसमें बोलियों के मुहावरे डाले जा रहे हैं, लोकोक्तियों की व्याख्या हो रही है और सुन-गुन रहा है यह शिष्य. कल दिन में चारू चंद्र पाण्डे जी के यहां चलना है... जाड़ों की छुट्टियों में वे अपने भाई के यहां आ गए है. जिज्ञासु जी के साथ गायक लड़के-लड़कियों की छोटी‌‌-सी टोली और मैं. पाण्डे जी लोक धुनों के स्वर समझा रहे हैं, हारमोनियम पर स्वर निकाल रहे हैं, गायक-गायिकाओं के सुर साध रहे हैं. कभी पाण्डे जी को लेकर हम पहुंच गए हैं नजर बाग वीना तिवारी के यहां. कब शाम हो गई पता ही नहीं चलता. ब्रजेंद्र लाल साह गीत नाटक-प्रभाग के उपनिदेशक बन कर लखनऊ क्या आए, जिज्ञासु जी ने लोक-संगीत प्रशिक्षण कार्यशाला ही चला दी. विज्ञानी दीवान सिंह भाकूनी जी से उनका ड्राइंग रूम दो घण्टे के लिए मांग लिया गया और रोज शाम को वहा लोक-संगीत सिखाने लगे साह जी. सीखने वाले और सिखाने वाले और सुनने वाले सब मगन. कभी केशव अनुरागी को डांटा जा रहा है कि यार अनुरागी जी, लखनऊ के बच्चों को कुछ सिखाते क्यों नहीं हो.
बिना फिल्टर वाली सिगरेट को जीभ से गीला करके सुलगाते हुए धुआं उड़ाते जिज्ञासु और उनका यह अघोषित शिष्य दौड़े जा रहे हैं. उनके कंधे पर लटके झोले में रखे हैं वार्ताकारों, कवियों, गायकों के कॉण्ट्रेक्ट. घर-घर जा कर हस्ताक्षर कराना तो बहाना है, असल मकसद है वार्ता, कविता और गीतों को देखना, दुरुस्त करना और अक्सर उनकी सामग्री भी लोगों को उपलब्ध कराना. लोक कथाओं की पुस्तिकाएं घर से ले जाकर दी जा रही हैं कि इसे पढ़कर अपनी बोली में लोक कथा लिख कर लाओ. ये लो, माधो सिह भण्डारी की कहानी, यह लो रामी बौराणी का काव्य, इन पर गढ़वाली में आठ-आठ  मिनट की वार्ताएं  लिखनी हैं. बीच-बीच में गीत के टुकड़े भी डाल देना, हां!
कभी आकाशवाणी के उत्तरायण एकांश कक्ष में जम जाती महफिल. नंद कुमार उप्रेती जी आ गए हैं, उनके सखा यज्ञदेव पण्डित जी विराजमान हैं, मालुरा हरियाली डाना का पार... वाले प्रद्युम्न सिंह भी हैं. जरधारी जी को नाटक देखने रवींद्रालय जाना है फिर भी डटे हैं. और भी कई चेहरे हैं. बातचीत पांखू (पिथौरागढ़) के ओड्यारों से शुरू हो कर हैड़ाखान बाबा के आश्रम और जिम कॉर्बेट तक पहुंच गई है. इतनी बातें कि अगले दिन मुझे हैड़ाखान बाबा और जिम कॉर्बेट पर किताबें मांगने जिज्ञासु जी के घर जाना पड़ता है. तब उनके किराए के घर की निशानी हुआ करती थी, हथेली में पर्वत धारण किए उड़ते हनुमान जी की मूर्तिवाला उदयगंज का मकान.(क्रमश:)
(नोट- 'तस्व्वुरात की परछाइयां उभरती हैं' साहिर लुधियानवी की एक मशहूर नज्म की पंक्ति है)

Thursday, June 23, 2016

विद्रोह और जूते चाटने का मध्यमान


पिछले दिनों मथुरा काण्ड के बाद भी इस सवाल ने सिर उठाया कि आईएएस-आईपीएस अधिकारी नेताओं की जन विरोधी कुटिल चालों और स्वार्थी अभियानों में सहयोगी बनने की बजाय उन्हें क्यों नहीं कहते. अगर ये अनैतिक, गलत आदेशों को मानने से इनकार कर दें तो बहुत सारी गड़बड़ियां रोकी जा सकती हैं. हमारे प्रशासनिक तंत्र की असली कुंजी इन अधिकारियों के हाथ में है. वे चाहें तो नियम विरोधी आदेश को भी रोका और दुरुस्त किया जा सकता है. अतीत में ऐसे कई उदाहरण हैं जब वरिष्ठ अधिकारियों ने मुख्यमंत्री तक के नियम विरोधी आदेश को मानने से इनकार किया. आजादी के तत्काल बाद ऐसे मंत्री हुए जो अधिकारियों की का सम्मान करते थे. बाद में ऐसे नेताओं की पीढ़ी आ गई जो एक अधिकारी की सुनकर दूसरे अधिकारी की मार्फत गलत काम करा ले जाती रही. इस तरह इनकार करने वाले अधिकारी का सम्मान बना रहता था. फिर ऐसे नेता आ गए जो सुनने ही को तैयार नहीं. वे ऐसे अफसरों का तबादला करके आज्ञाकारीअफसरों की तैनाती करने-कराने लगे. इस दौरान कहने वाले अफसरों की संख्या लगातार कम होती रही जबकि आज्ञाकारीअधिकारियों की संख्या तेजी से बढ़ती गई. उन्होंने नियम-कानूनों की परवाह न कर धारा में शामिल हो जाना सीख लिया.
नेताओं-मंत्रियों के नियम-कानून विरोधी आदेशों के पालन से इनकार करने वाले अफसरों का सरकार क्या बिगाड़ सकती है?  इसका उत्तर हम आईपीएस अधिकारी, फिलहाल आईजी अमिताभ ठाकुर के उदाहरण से अच्छी तरह समझ सकते हैं. यहां स्पष्ट कर दूं कि अमिताभ ठाकुर के बहुत सारे कदमों से हमारी असहमति है लेकिन वे इस बात के सबसे अच्छे उदाहरण हैं कि नेताओं की कुटिल चालों का सार्वजनिक रूप से और अदालतों तक जाकर विरोध करने वाले अधिकारियों का भी सरकार कुछ नहीं बिगाड़ सकती, कम से कम उनकी नौकरी को कोई खतरा नहीं होता. उन्हें बहुत दिन तक निलम्बित भी नहीं रखा जा सकता. ज्यादा से ज्यादा उन्हें सबसे शुष्क और बेकार मानी जाने वाली तैनातैयां दी जा सकती हैं लेकिन बेहतर काम करने की गुंजाइश उनके लिए वहां भी बनी ही रहती है. बस, उनकी अतिरिक्त कमाइयां, रुतबा और सत्ता से करीबी नहीं रह जाते. सत्ता की यह करीबी और तरलतैनातियां ही वह बड़ा कारण हैं जो अफसरों को नेताओं का पिछलग्गू बना देती हैं.  यह तथ्य अब चौंकाता नहीं कि भ्रष्टाचार के मामलों में  कई अफसरों ने नेताओं को पीछे छोड़ दिया है.
पूर्व मुख्य सचिव टी एस आर सुब्रमणियन ने अपनी पुस्तक में 1990 का आंखें खोल देने वाला प्रसंग दर्ज किया है. तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव आईएस सेवा सप्ताह के मुख्य अतिथि थे. अपने भाषण में आईएएस अधिकारियों से वे यह भी कह गए कि ’... आपके पास श्रेष्ठ दिमाग और शिक्षा है. आप जिस तरफ ध्यान लगा देंगे वहीं सफल हो जाएंगे. समाज आपका आदर करता है. फिर आप मेरे पास आकर मेरे पैर क्यों छूते हैं? आप मेरे जूते क्यों चाटते हैं? अपने व्यक्तिगत हित के लिए मेरे पास क्यों आते हैं? यदि आप ऐसा करोगे तो मैं आपकी इच्छानुसार कार्य कर दूंगा और फिर आपसे अपनी कीमत वसूल करूंगा.
तंत्र से बगावत करने वाले अफसर अपने गुस्से में ही जल-भुन कर रह जाते हैं. दूसरे छोर पर जूते चाटने वाले हैं जो पूरे प्रशासन को घिनौना बना देते हैं. इन दोनों का एक मध्यमान होता होगा जिसमें  विचलनों के बावजूद लोकतंत्र और जनता के शासन की महक भी शामिल रहती होगी. वह रास्ता चुनने से भी हमारे ज्यादातर बेहतरीन दिमाग कतराते क्यों हैं? (नभाटा, जून 24, 2016)


Thursday, June 02, 2016

आखिर हुज़ूर को जानकरी क्यों नहीं है?


चंद रोज पहले इस अखबार के एक पन्ने पर बड़ी खबर छपी थी कि मिट्टी की अवैध खुदाई से किसानों के खेत तक ढहने लगे हैं. डम्परों से फसल रौंदी जा रही है. इसकी तस्दीक करती तस्वीरें भी छपी थीं  किसानों की इस दुर्दशा पर सम्वाददाता ने शासन के एक प्रमुख अधिकारी से पूछा था. उनका जवाब भी साथ ही छपा था- इसकी जानकारी नहीं है. पता कराएंगे.जगह-जगह आवासीय भूखण्डों पर हो रहे अवैध निर्माणों पर लखनऊ विकास प्राधिकरण के अफसरों से पूछा जाता है तो उनका जवाब होता है- कोई शिकायत प्राप्त नहीं हुई है, दिखवा लेंगे.मंत्रियों और बड़े अफसरों से अक्सर भ्रष्टाचार या किसी गड़बड़ी के बारे में पूछिए तो जवाब आता है- संज्ञान में नहीं है, जांच करवा लेंगे.विधान सभा में भी कई बार सवाल के जवाब में लिखित उत्तर मिलता है कि –सूचना एकत्र की जा रही है.
बड़े अधिकारी जो शासन चलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, उन्हें पता क्या रहता है? किसी भी पार्टी की सरकार हो, अधिकारी हमेशा शासन में होते हैं. यह सूचना विस्फोट का युग है. हर पल तरह-तरह की जानकारियां विविध माध्यमों से बरस रहीं हैं. वे नियमित अखबारों के पन्ने पलटते हैं. घर-दफ्तर में उनके टीवी पर समाचार चैनल निरंतर चलते रहते हैं. भ्रष्टाचार, अवैध कब्जे-निर्माण, गरीबों-किसानों की दुर्दशा, बिजली-पानी का घोर संकट, जेलों में अपराधियों की मौज, जैसी तमाम खबरें चारों तरफ से बरस रही हैं. अवैध खुदाई से बर्बाद होते खेतों की तस्वीरें और किसानों का दर्द अखबार के पन्ने पर साफ-साफ दिख रहे हैं फिर भी जानकारी नहीं है. अगर ऐसा है तो बड़ी गम्भीर बात है, अभी जांच टीम भेजते हैंजैसे जवाब भी टालू माने जाएंगे, लेकिन वह भी बहुत कम सुनने को मिलते हैं.
इन्ही अधिकारियों यह खूब पता रहता है कि गरीबी की रेखा से कितने लोग ऊपर आ गए. कन्या विद्या धन, वृद्धावस्था पेंशन, जननी-शिशु स्वास्थ्य और ऐसी बहुत सारी सरकारी योजनाओं में कितने लोग लाभांवित हुए और कितनी रकम बांट दी गई. विकास के ऐसे सपनीले दावे करने में उन्हें महारत हासिल रहती है जिसका जमीन और जनता पर कोई असर दिखाई नहीं देता. सवाल उठता है कि हमारी यह सरकारी मशीनरी है किसके लिए और किसके हित में काम करती है? सरकार में बैठे नेताओं के लिए या जनता के लिए? जो कुछ वास्तव में जनता के साथ हो रहा है और जो सरकारी फाइलों में किया जा रहा है, उसकी सच्चाई इन अधिकारियों से ज्यादा कौन जानता-समझता होगा लेकिन तरक्की और तरल तैनातियों की सीढ़ियां चढ़ते-चढ़ते उनकी आंखों पर खूबसूरत पर्दा पढ़ चुका होता है. वे सरकारी तंत्र की मशीन बन कर रह जाते हैं.
कुछ अधिकारी अपनी प्रतिभा जनता की शिकायतों-तकलीफों को दबाने-छुपाने में लगाते हैं जबकि उनका काम है कि वे उन्हें समझें और उनका समाधान करने का यथासम्भव प्रयत्न करें. जरूरत हो तो सम्बंधित मंत्री अथवा सरकार के मुखिया तक बात पहुंचाएं. सच है कि सूचना विस्फोट के इस दौर में माध्यमों की विश्वसनीयता का संकट आ खड़ा हुआ है, लेकिन सरकारी तंत्र हमेशा अपने माध्यम से सूचना या सबूत जुटाने एवं जांच करनाने की बात करता है. उसमें विलम्ब तो होता ही है, निष्कर्ष अपनी सुविधा से तोड़े-मरोड़े भी जाते हैं. सरकार जनता के माध्यमों पर भरोसा नहीं करती और सरकारी तंत्र जनता का विश्वास खो चुका है. दिक्कत यह है कि कुछ भी करने के लिए यहां सरकारी तंत्र ही  समर्थ और सक्षम है. उसके बिना पत्ता भी नहीं हिलता. तब? (नभाटा, 03 जून)