Tuesday, August 14, 2012

देवियों और देवताओं में ठन गयी है -- 1

उत्तरकाशी की हाल की भीषण बाढ़ और विपदा का खौफनाक दृश्य टी वी दे पर्दे पर देख कर मित्र नासिरुद्दीन को 'दावानल' के उस अध्याय की याद आ गई जिसमें उत्तरकाशी की 1978 की और कुछ उस से भी पुरानी भीषण प्राकृतिक आपदाओं का वर्णन है. नासिर ने ही इस अध्याय को यूनिकोड में कनवर्ट करने मदद की. इसे दोहराने के दौरान मैं खुद आतंकित हो गया. जाहिर है कि हिमालय की बगावत जारी है तथा और भी भीषण होती जा रही है. पेश है वही चैप्टर-


       

उत्तरकाशी। 1978
मानसून आने के साथ ही जोरदार बारिश शुरू हो गई थी। भागीरथी का पानी बहुत चढ़ा हुआ था। बड़े-बड़े पेड़ और विशाल पत्‍थर भागीरथी की उग्र धारा में तिनकों की तरह बहे आ रहे थे। बीच-बीच में कोई पेड़ या स्लीपर पानी की ऊंची उछलती लहरों से फेंका जाकर किनारे आ लगता तो बच्‍चे खुश होते। हर बारिश में भागीरथी अपने किनारे बसने वालों को इसी तरह लकड़ी भेंट करती आई है। इस साल खूब ही लकड़ी आ रही थी।
          - ‘इस बार तो पूरे गांव के चैन हो गए! दो-तीन बरस तक लकड़ी की इफरात- किसी ने कहा तो बुजुर्ग मातबर सिंह ने डांट लगा दी- ‘ये लकड़ी नहीं है छोकरो! ये पहाड़ के हाड़-कणिक (हड्डी-कनकी) बग रहे हैं, हाड़-कणिक। ये सोचो कि ऐसे में कब तक जिंदा रहेगा पहाड़।' वृद्ध मातबर सिंह के माथे की लकीरें चिंता के मारे और गहरी हो गईं।
          भागीरथी का क्रुद्ध पानी कटती-बहती मिट्टी से लाल-भूरा हो रहा था। ताजे उखड़े-टूटे पेड़ों के विशाल तने भी लाल-लाल चमड़ी उधेड़े बह रहे थे।
          तो भागीरथी पहाड़ की हड्डियां ही नहीं, रक्त-मज्जा भी चाटकर अट्टहास कर रही थी!


          मगर यह क्‍या !
छह अगस्त की सुबह लोगों ने देखा भागीरथी का पानी गायब! चढ़ी हुई नदी की उग्र लहरों की जगह थोड़ा सा पानी बह रह था, एकदम शांत। वेगवती लहरों से दोनों किनारों में भारी कटाव के कारण चौड़ी हो गई खाई के बीच बिल्कुल पतली-सी धारा। टूटे-उखड़े पेड़, झाड़-झंखाड़ और विशाल पत्‍थर नदी मार्ग में ऐसे पड़े थे जैसे कोई और ही उन्‍हें वहां पहुंचा कर चुपचाप गायब हो गया हो।
          - ‘ये अनर्थ की निशानी है..। जाने क्‍या  होने वाला है इस बरस।’ बुजुर्गों ने आशंका से कहा।
          - ‘कहीं ऊपर नदी का पानी रुक गया है शायद...। कुछ अटक गया है भागीरथी के रास्ते में..., कोई पहाड़ गिर पड़ा होगा भरभराकर।’
          - ‘ओ ब्‍वै(मां)! कितना पानी था गंगा में...। सब जमा हो रहा होगा..। जब टूटेगा तो क्‍या  होगा!’ स्थिति की कल्पना कर लोगों के होश उडऩे लगे।
          खबर आने में देर नहीं लगी। भारी-भारी चट्टानें खिसक कर नदी के रास्ते में आ पड़ी हैं। भागीरथी का प्रवाह अवरुद्ध हो गया है। नदी झील में तब्‍दील हो गई है। पानी जमा होता जा रहा है। खतरा! भारी खतरा!!
          भागो-भागो! नदी से जितना दूर हो सको। हो जाओ। ऊपर पहाड़ पर चढ़ जाओ। जानवरों को नदी किनारे से दूर हांको। पूरी उत्‍तरकाशी में हल्ला मच गया। दहशत फैल गई। लोग अपना माल-असबाब समेट कर ऊपर पहाड़ पर चढऩे लगे।
          नगर की सड़कों पर सरकार के सूचना विभाग की जीप दौडऩे लगी। जीप से घोषणा हो रही थी- ‘पहाड़ का मलबा गिरने से गंगा जी अवरुद्ध हो गई हैं। पानी का बहाव रुक गया है। लेकिन घबराने की बात नहीं है। लोग अफवाहें न फैलाएं और डर कर भागने की भी जरूरत नहीं। बस, बच्‍चों और जानवरों को नदी के किनारे न जाने दें।'
          लेकिन इस घोषणा का खास असर नहीं हुआ। एक तो सरकार के सूचना विभाग की सूचनाओं पर जनता को भरोसा नहीं था। दूसरे, खुद सरकारी अफसरों के घरों का सामान उनके अधीनस्थ कर्मचारी लगातार पहाड़ पर ऊपर पहुंचा रहे थे। सबसे ज्‍यादा डरे हुए सरकारी अफसर ही लग रहे थे। उनकी बीवियां और बच्‍चे भी हाथों में सामान लिए जल्दी-जल्दी पहाड़ चढ़ रहे थे। उनके घरों के गमले तक नौकरों के हाथों ऊपर भिजवाए जा रहे थे। यह देखकर जनता में और सनसनी फैल गई। लोग भाग-भाग कर घर का सामान निकालने और जल्दी से जल्दी पहाड़ चढ़कर सुरक्षित ठिकाने पहुंचने की हड़बड़ी मचाने और चीखने-चिल्लाने लगे।
          थोड़ी देर में उत्‍तरकाशी खाली हो गई। सारी आबादी ऊपर पहाड़ पर जमा हो गई। सबकी नजरें नीचे भागीरथी पर लगी थीं। लगता था ऊपर बनी झील अब टूटी-तब टूटी और भरभरा कर ढलान पर छूटा पानी का रेला पूरी उत्‍तरकाशी को ही बहा ले जाएगा। झील की स्थिति जानने का कोई तरीका नहीं था। लोगों ने ट्रांजिस्टर खोल रखे थे लेकिन आकाशवाणी भागीरथी के बारे में मौन थी। ऊपर से आई एक जीप खबर लाई कि झील को विस्‍फोट से तोडऩे की योजना बन रही है। लोग और भी चौकन्‍ने हो गए।


          और तभी उन्‍होंने वह देखा।
          डर, दहशत और अचंभे से लोगों की आंखें फट पड़ीं। मुंह से आवाज नहीं निकली। पैर कांपने लगे। जिन्‍होंने पहले देखा, वे बमुश्किल इशारे से दूसरे को बता सके और जिसने भी उधर नजर घुमाई वह हतप्रभ रह गया।
          एक विकराल दानव अपना आकार बढ़ाते हुए, हर कदम पर रूप बदलते हुए, सैकड़ों हाथ-पैर इधर-उधर उछालते हुए, हजारों जीभें लपलपाते और भयानक गर्जना करते हुए भीषण वेग से भागीरथी के मार्ग पर बढ़ा चला आ रहा है। उसके रास्ते में जो कुछ पड़ता है- पेड़, पत्‍थर, पहाड़- सबको ढहाते-उखाड़ते तिनकों की तरह वह अपने विशाल उदर में समाता जा रहा है। जहां-तहां खाल उधेड़ी लाल-लाल लकड़ियां उस विकराल दानव के आगे-आगे ऐसे बेतरतीब लुढ़क रही थीं जैसे उसकी अनगिन जिह्वाएं पहाड़ों का रक्त चाटते हुए आ रही हों। किसी पहाड़ी मोड़ या चट्टान के सामने आने पर वह दानव तनिक ठहरता, जैसे चुनौती दे रहे शत्रु की ताकत तोल रहा हो। फिर चंद पल बाद पहले से भी भयानक गर्जना करते और घाटी से आकाश तक हिलाते हुए वह अपने मार्ग की बाधा को समूल उदरस्थ कर जाता। विशालकाय पेड़ और चट्टानें उसके भंवरनुमा पेट में तिनकों व फूलों की मानिंद नाच रही थीं। गाय-भैसों के शव चीटियों जैसे कभी-कभार नजर आ जाते। आदमी की क्‍या  बिसात थी वहां! आदमी के बनाए पुलों के गर्डर और मकानों की छतों पर छाई टीनें जरूर वहां चमक रही थीं।
          ऊपर पहाड़ी पर जमा भीड़ ने थरथराते हुए यह भयानक दृश्य देखा और धीरे-धीरे जाना कि वह कोई दानव नहीं, खुद उनकी प्यारी भागीरथी है, जो कल रात किसी समय प्रवाह रुक जाने से बनी झील का सारा पानी एक साथ लेकर विनाश लीला मचाती हुई आज किसी विकराल दैत्य से कम नहीं लग रही है।
          - ‘हे गंगा मैया, शांत हो।’ बुजुर्गों ने हाथ जोड़कर विनती की। बहुत देर तक उनके कांपते हाथ जुड़े रहे।
          महिलाओं ने बच्‍चों को कसकर अपने से चिपका लिया और उन्‍हें भींचे रहीं। पतियों ने अनायास पत्नियों को करीब खींच लिया और इस तरह परिवार के सभी लोग एक साथ चिपके खड़े रहे। एक विकराल दैत्य उन्‍हें निगलने आ रहा था और वे असहाय-से सिर्फ यही कर सकते थे कि जब मौत के मुंह में समाएं तो एक साथ हों!


          - ‘ओ, बाबा रे!’
          गिर्दा, शम्भू और पुष्‍कर के मुंह से एक साथ निकला। वे डांगला की एक चोटी पर खड़े थे और नीचे भागीरथी पर बनी विशाल झील उनकी आंखों में आतंक भर रही थी।
          पूरा का पूरा ढोकरयानी  पहाड़ टूटकर अपनी चट्टानों और मिट्टी के ढूहों को लेकर भागीरथी के रास्ते में अड़ गया था। ज्‍यादातर पेड़ पहले ही सफाचट हो चुके थे और जो बच रहे थे वे आज भागीरथी के मार्ग में आड़े-तिरछे लेटे थे। लगातार मूसलाधार वर्षा के कारण प्रचंड हुई भागीरथी का प्रवाह मिट्टी-पत्‍थर और पेड़ों की दीवार ने रोक लिया था। रही-बची कसर गैराड़ी पहाड़ ने पूरी कर दी थी। उसमें जो भारी भूस्खलन हुआ उसका पूरा मलबा सरक कर भागीरथी के मार्ग में लगे डांट पर जा गिरा था। भागीरथी के दोनों तरफ के पहाड़ रह-रह कर अब भी टूट-बह रहे थे। ज्‍योति और डांगला के बीच लगा यह अवरोध बढ़ता जा रहा था। भागीरथी विशाल झील में तब्‍दील हो गई थी। ऊपर से लगातार पानी आ रहा था और झील का आकार निरंतर बढ़ता जा रहा था। डबरानी का पुल इस झील में लगभग डूब गया था। देवदार के पेड़ों की सिर्फ चोटियां पानी से ऊपर निकली हुई थीं। दूर-दूर तक पानी ही पानी दिखाई दे रहा था। अनुमान लगाना भी मुश्किल था कि झील कितनी विशाल हो गई है। ऊपर से आती पानी की तेज लहरें झील के ठहरे पानी में पहुंचती हैं तो रुका हुआ पानी भी उसके साथ जोर मारता हुआ मार्ग में अड़े अवरोध से टकराता है और फिर उसे तोड़ने में विफल होकर गुस्से में वापस मुड़ता है। इस जबर्दस्त संग्राम से झील में भयानक लहरें और भंवर पैदा हो रहे हैं जिनमें विशाल पेड़ तिनकों की तरह नाच रहे हैं।
          और इस झील को वे तब देख रहे थे जबकि वह तीन दिन पहले आधी टूटकर बह चुकी थी। पांच तारीख की शाम झील में बढ़ते पानी ने जोर मारा तो अवरोध का एक कोना अपनी जगह से खिसक गया था। तब काफी पानी उस जगह से हरहराता-उछलता-कूदता बह चला था जिसने भुक्खी, भटवाड़ी, लाटा-मल्ला, औंगी, नेताला, डबराणी, हीना, उत्‍तरकाशी के ऊपरी हिस्से, जोशियाड़ा, मातली, रतूड़ी सेरा और स्यांसू तक भारी तबाही मचाई थी। बड़ी संख्‍या में खेत, मकान, पुल, सड़क, मंदिर और साधुओं की कुटिया तक वह रेला अपने साथ बहा ले गया था लेकिन भागीरथी के मार्ग के अवरोध का ज्‍यादातर हिस्सा अपनी जगह मजबूती से जमा रहा और दोनों तरफ के पहाड़ों से निरन्‍तर गिरता मलबा उसे और मजबूत बनाता गया। नतीजा यह हुआ कि झील फिर भरती चली गई और इस समय वह खतरनाक तरीके से उफन रही थी। अवरोध से टकराकर लौटती लहरें खूंखार लग रही थीं। अब तक उन्‍होंने शांत और सुन्‍दर झीलें देखी थीं। यहां जो वे देख रहे थे वह बाढ़ से चढ़ी और प्रबल वेगवती पहाड़ी नदी का प्रवाह रुक जाने से बनी झील थी जिसमें ऊपरी छोर से पानी आना जारी था लेकिन नीचे का छोर अवरोध से बन्‍द था। सो, यह झील पिंजड़े में अभी-अभी बन्‍द किए बाघ की तरह भयानक गुस्से से गुर्राते हुए मार्ग के अवरोध और अगल-बगल के पहाड़ों पर अपना सिर पटक रही थी।
          पुष्‍कर और साथियों को भागीरथी में झील बनने और उसके टूटने से भारी तबाही की खबर कोटद्वार में मिली, जहां वे आंदोलन की भावी रणनीति पर विचार करने के लिए जमा हुए थे। तत्‍काल बैठक छोड़कर वे उत्‍तरकाशी के लिए रवाना हो गए। टिहरी से ही उन्‍हें बाढ़ से विनाश और भागीरथी के आतंक का नजारा दिखने लगा था। टिहरी में ज्‍यादा नुकसान नहीं हुआ था लेकिन भागीरथी का मिजाज देखकर लोग डरे हुए थे और मकान खाली कर ऊपर पहाड़ की तरफ भाग गए थे। तीन दिन बाद भी लागों की डरी निगाहें भागीरथी पर लगी हुई थीं। जैसे-जैसे वे आगे बढ़ते गए प्रकृति के प्रकोप के भयानक निशान उन्‍हें मिलते गए। स्यांसू में, जहां सड़क बनाने के लिए गांव वालों के भारी विरोध के बावजूद कमजोर पहाड़ पर डायनामाइट दागे गए थे, भारी भूस्खलन हुआ था। बीस से ज्‍यादा परिवारों की जमीन-जायदाद बरबाद हो गई थी। स्यांसू से आगे रतूड़ीसेरा में करीब आधा किमी. सड़क और पुल गायब थे। मातली से उत्‍तरकाशी तक का करीब दस किमी. रास्ता पैदल पार करना भी जान खतरे में डालना था। किसी तरह वे देर शाम उत्‍तरकाशी पहुंच पाए। वहां का नजारा डरावना था। जहां शहर और बाजार था वहां घुप अंधेरा व सन्नाटा था मगर ऊपर पहाड़ी पर रोशनियां टिमटिमा रही थीं। भागीरथी का जो ताण्‍डव उत्‍तरकाशी के लोगों ने तीन दिन पहले देखा था, उससे उनके मन में इतना डर पैठ गया था कि वे ऊपर पहाड़ी पर ही थोड़ा सुरक्षित महसूस कर रहे थे। दिन में वे अपने घरों को लौटते मगर शाम को रोटियां सेक कर रात भर के लिए ऊपर पहाड़ पर चढ़ जाते। उन्‍हें पता था कि भागीरथी में कहीं बनी झील अभी पूरी टूटी नहीं है, हालांकि आकाशवाणी के समाचार लगातार यह बता रहे थे कि झील से कोई खतरा नहीं है और जन-जीवन सामान्‍य है। ट्रांजिस्टर के अलावा समाचार जानने का कोई जरिया नहीं बचा था। सड़कें टूट जाने से यातायात बंद था और अखबार नहीं आ पा रहे थे। उत्‍तरकाशी से आगे मनेरी, भटवाड़ी, भुक्खी और भंगले होकर वे ज्योति और डांगला के बीच बनी झील तक पहुंचे थे। घटनास्थल तक पहुंचने का जोश ही था जो उन्‍हें यहां ले आया अन्‍यथा यहां पहुंचना भारी जोखिम का काम था। सड़क ही नहीं, पगडंडी तक नहीं बची थी। कई जगह तो उन्‍हें चौपाया बनकर घुटनों और हथेलियों के बल चलकर पहाड़ और भूस्खलन से बने दलदल पार करने पड़े थे।
          - ‘बेटा अभी तो तुम्‍हारी बहुत उमर बाकी है.., क्यों जा रहे हो वहां।’ भुक्खी में एक महिला ने अपने घर व खेतों के उजड़ जाने के अपार दुख के बावजूद उन्‍हें टोका था। ( जारी)


          

Tuesday, July 10, 2012

शेरदा ‘अनपढ़ ’: सहज लोक अभिव्यक्तियों के बडे़ कवि


सन् 1971 में जब मैंने हाईस्कूल पास किया तब अंग्रेजी पाठ्य पुस्तक में सरोजनी नायडू की एक कविता थी- ‘वीवर्स’ यानि बुनकर। कवियित्री बुनकरों से पूछती है- यह प्यारा-सा कपड़ा किसके लिए बुन रहे हो? जवाब आता है- एक नन्हा-मुन्ना शिशु इस संसार में आया है, उसके लिए। तीन छन्दों की इस कविता में इसी तरह सवाल-जवाब होते हैं। दूसरे में जवाब आता है- दो दिल एक हुए हैं, उनके ब्याह के लिए और तीसरे में वे बताते हैं- एक शरीर दुनिया में अपना काम निबटा कर जा रहा है, उसके कफन के वास्ते। तीन छन्दों में पूरा जीवन दर्शन पेश करने वाली यह कविता मास्टर जी ने कुछ इस खूबी से पढ़ाई थी कि मन में पैठी रह गई।

उसी साल या शायद अगले बरस आकाशवाणी, लखनऊ के ‘उत्तरायण’ कार्यक्रम की कवि गोष्ठी में शेरदा को पहली बार सुना और उनकी ‘जग-जातुरि’ कविता ने सरोजिनी नायडू की उस कविता की याद ताजा कर दी- ‘खरीदनैई लुकुड़ लोग, एक्कै दुकान बटि, क्वै कै हूँ लगनाक्, क्वै कै हूँ कफनाक्।’ तब पता नहीं था कि शेरदा ‘अनपढ़’ औपचारिक स्कूली शिक्षा में ‘जीरो’ हैं। यूँ, जीवन की कविता को स्कूली शिक्षा चाहिए भी नहीं होती। बाद में यह जानकर उनके प्रति आदर और श्रद्धा और बढ़ गए थे। उन्होंने उस कवि गोष्ठी में आमंत्रित सभी श्रोताओं का दिल जीत लिया था और औपचारिक रिकार्डिंग हो जाने के बाद भी देर तक उनसे कविताओं की फरमाइश होती रही। शेरदा ने उस दिन ‘मुर्दक बयान’ और ‘मौत और मनखी’ जैसी कविताएँ भी सुनाईं थीं। बाद में तो ये और ऐसी कई अन्य कविताएँ भी उनसे सुनीं। शेरदा उन कवि गोष्ठियों के हीरो हुआ करते थे। शेरदा के नाम से श्रोताओं की भीड़ बढ़ जाती थी। आकाशवाणी के गैर कुमाउँनी कर्मचारी-अधिकारी भी मुग्ध श्रोता बन जाते थे। कई लोग शेरदा को अपने घर आमंत्रित करते और वहाँ भी उनकी कविताएँ बार-बार सुनी जातीं। बाद में जब हमने ‘आँखर’ संस्था बनाई तो शेरदा के लखनऊ आने पर किसी बड़े सभागार में कवि गोष्ठी रखी जाती और हॉल खचाखच भर जाता।

शेरदा ‘अनपढ़’ थे ही ऐसे और कविता सुनाने का उनका अंदाज भी निराला। गंभीर-दार्शनिक कविताएँ सुनाते तो जीवन की बेरहम सच्चाई माहौल पर तारी हो जाती और हास्य-व्यंग्य पढ़ते तो श्रोताओं के पेट में बल पड़ जाते, पसलियाँ दुःखने लगतीं, लेकिन लोट-पोट श्रोताओं को वे स्टेच्यू बनकर देखते रहते। उनका मुँह अंतिम शब्द के उच्चारण में खुला रहता और दोनों हाथ हवा में। वे कविता सुनाने के विशिष्ट अदाकार थे और श्रोताओं को पूरा मौका देते थे- हँसें कि रो लें!

शेरदा के कविता सुनाने के अंदाज का एक किस्सा वंशीधर पाठक ‘जिज्ञासु’ ने मुझे बहुत पहले सुनाया था। शेरदा दो अक्टूबर, गांधी जयंती पर काव्यपाठ के लिए आकाशवाणी के लखनऊ स्टूडियो बुलाए गए थे। घर में बता आए थे कि अमुक दिन, अमुक समय रेडियो पर मेरी कविता सुनना। निर्धारित समय पर शेरदा की करुण आवाज रेडियो पर गूँजने लगी-‘‘बापू, आज मैं कै तुमरि भौत याद ऊँनै।’’ पहाड़ में कविता सुन रही शेरदा की इजा रोने लगी- ‘आज म्यार शेरू पर लखनऊ में जाणि के मुसीबत ऐगै। आपण बापू कैं धत्यूण रौ….।’ किस्सा सच है या झूठ, पता नहीं लेकिन इतना सत्य है कि शेरदा की आवाज किसी को भी भीतर तक छू जाती थी।

शेरदा महफिल के साथ बह भी जाते थे। गम्भीर से गम्भीर कविता की किसी पंक्ति पर अगर कहीं श्रोता हँस दिए तो वे उसे हास्य कविता की तरह पढ़ने लगते और अर्थ के अनर्थ निकलने लगते। तीन वर्ष पहले कौसानी में पंत-मटियनी स्मृति समारोह के दौरान काव्यपाठ में यही हुआ। वे अपनी कविता ‘तू को छै’ सुना रहे थे। यह अद्भुत दार्शनिक कविता है। शेरदा ने पढ़ा-‘नै दाबणी, तु को छै?’ श्रोता हँसे तो शेरदा हँसाने पर ही तुल गए। तब बटरोही ने उन्हें टोका और सही टोका- ‘शेरदा, यह तुम्हारी हास्य कविता है क्या ?. …’ फिर शेरदा गंभीर हो गए और कविता के गूढ़ार्थ उभरने लगे।

‘चितक छारण तक बगाओ-बगाओ है गे….’ हो या ‘फटफटै नी हुनी चप्पल कि ल्या छा यस….’ शेरदा कविता का सिरा वहाँ से पकड़ लाते थे जहाँ पहाड़ी जीवन की आम दिनचर्या कुलबुलाती थी। चिता के पूरी तरह राख होने से पहले ‘बगाओ-बगाओ’ तो हमारा सनातन दुख है लेकिन कल्पना कीजिए जब पचास-साठ के दशक में सुदरू पहाडी़ गाँवों में हवाई चप्पल पहुँचने लगी होगी। कंकड़-काँटे, पाला-बरफ में नंगे पैर चलने वाली स्त्रियों के पैरों में पहले तो हवाई चप्पल टिकती ही मुश्किल से होगी और जब टिकाने के लिए अंगूठे व अंगुलियों से कस कर जकड़ ली तो ससुरी ‘फट-फट’ ही नदारद हो गई! ‘उत्तरायण’ से निकलकर कौतिकों-कैसेटों तक यह गीत सर्वाधिक लोकप्रिय यूँ ही नहीं बना।

शेरदा को जीवन की गजब दार्शनिक एवं व्यावहारिक समझ थी। यही उनकी कविताओं का प्राण है और यही कारण है कि उनकी कविताएँ कई कालजयी कविताओं के करीब लगती हैं या उनकी याद दिलाती हैं। उनकी ‘तू को छै’ कविता पंत की ‘मौन निमंत्रण’ के बहुत करीब लगती है तो कुछ दूसरी कविताएँ कबीर की रचनाओं की याद दिला देती हैं, जैसे-‘जा चेली जा सौरास’, ‘एक स्वैंण देखनऊँ’, ‘हँसू कि डाड़ मारूँ’ आदि। शेरदा मूलतः हास्य कवि नहीं हैं, हालाँकि हास्य और तीखा व्यंग भी उनकी रचनाओं में बहुत सहज और स्वाभाविक रूप में आता है। वे मूलतः दार्शनिक कवि हैं, जीवन के गूढ़ार्थों की व्याख्या वे अत्यंत सहजता से करते हैं। वे एक लाइन कहते हैं और पाठक व श्रोता अर्थों में गहरे डूबने लगते हैं।

शेरदा ने बड़ा विकट जीवन जिया। घरेलू नौकर से लेकर फौज की नौकरी, फिर बीमारी का दौर और आर्थिक कष्ट, फिर गीत-नाटक प्रभाग की नौकरी। इस जीवन यात्रा के अनुभवों ने उन्हें संसार के प्रति कबीर जैसी दृष्टि दी तो कष्टों को काटने-सहने के लिए उन्होंने निपट हास्य का सहारा लिया। इसलिए उनका हास्य भी बनावटी नहीं है और बहुधा उसमें त्रासदियाँ छुपी हुई हैं।

यह बात नोट की जानी चाहिए कि वे आम पहाड़ी अभावग्रस्त जीवन की त्रासदियों को ही हास्य के रूप में पेश करते रहे हैं। हास्य कवि की छवि ने शेरदा ‘अनपढ़’ की कविता का नुकसान ही किया। फायदा सिर्फ यह हुआ कि हास्य कविता के बहाने गंभीर कुमाउँनी कविता के श्रोता भी खूब जुड़े, जिसे राजीव ने शेरदा की ‘मास अपील’ कहा है।

बाद के दिनों के शेरदा को देखकर मुझे अक्सर यह भी लगता रहा कि खुद शेरदा ने यह गलतफहमी पाल ली थी कि वे हास्य कवि ही हैं. शायद इसी कारण वे अपनी गंभीर और अच्छी कविताओं को भी चलताऊ हास्य की तर्ज पर सुनाने लगे थे। श्रोता तो खैर उन्हें अपनी खिलखिलाहटों और तालियों में बहा ही ले जाते थे। बहरहाल, शेरदा के जाने के बाद अब उनका मूल्यांकन हास्य कवि की छवि को ध्वस्त करके ही किया जाना चाहिए।
( नैनीताल समाचार, 15 से 30 जून 2012,में प्रकाशित)

Monday, February 20, 2012

पुस्‍तकें

(कल एक बहुत अच्‍छी कविता पढ़ी,उसे अपने ब्‍लाग पर लगाने का मन हुआ; विश्‍वनाथ प्रसाद तिवारी वैसे भी मेरे प्रिय कवियों में हैं)

पुस्‍तकें

नहीं, इस कमरे में नहीं
उधर
उस सीढ़ी के नीचे
उस गैरेज के कोने में ले जाओ
पुस्‍तकें

वहां,जहां नहीं अट सकती फ्रिज
जहां नहीं लग सकता आदमकद शीशा
बोरी में बांध कर
चट्टी से ढक कर
कुछ तख्‍ते के नीचे
कुछ फूटे गमले के उपर
रख दो पुस्‍तकें

ले जाओ इन्‍हें तक्षशिला-विक्रमशिला
या चाहे जहां
हमें उत्‍तराधिकार में नहीं चाहिए पुस्‍तकें

कोई झपटेगा पासबुक पर
कोई ढूंढेगा लाकर की चाभी
किसी की आंखों में चमकेंगे खेत
किसी में गड़े हुए सिक्‍के

हाय-हाय,समय
बूढ़ी दादी सी उदास हो जाएंगी पुस्‍तकें

पुस्‍तको
जहां भी रख दें वे
पड़ी रहना इंतजार में

आएगा कोई न कोई
दिग्‍भ्रमित बालक जरूर
किसी शताब्‍दी में
अंधेरे में टटोलता अपनी राह

स्‍पर्श से पहचान लेना उसे
आहिस्‍ता-आहिस्‍ता खोलना अपना ह्रदय
जिसमें सोया है अनंत समय
और थका हुआ सत्‍य
दबा हुआ गुस्‍सा
और गूंगा प्‍यार
दुश्‍मनों के जासूस
पकड़ नहीं सके जिसे.
                                 -विश्‍वनाथ प्रसाद तिवारी

Sunday, December 18, 2011

अदम की कविता से अदम को श्रद्धांजलि

आइए महसूस करिए ज़िन्दगी के ताप को
मैं चमारों की गली तक ले चलूंगा आपको
जिस गली में भुखमरी की यातना से ऊब कर
मर गई फुलिया बिचारी थी कुएँ में डूब कर
है सधी सिर पर बिनौली कंडियों की टोकरी
आ रही है सामने से हरखुआ की छोकरी
चल रही है छंद के आयाम को देती दिशा
मैं इसे कहता हूँ सरजूपार की मोनालिसा
कैसी यह भयभीत है हिरनी-सी घबराई हुई
लग रही जैसे कली बेला की कुम्हलाई हुई
कल को यह वाचाल थी पर आज कैसी मौन है
जानते हो इसकी ख़ामोशी का कारण कौन है?

थे यही सावन के दिन हरखू गया था हाट को
सो रही बूढ़ी ओसारे में बिछाए खाट को
डूबती सूरज की किरनें खेलती थीं रेत से
घास का गट्ठर लिए वह आ रही थी खेत से
आ रही थी वह चली खोई हुई जज्बात में
क्या पता उसको कि कोई भेड़ि़या है घात में
होनी से बेख़बर कृष्ना बेख़बर राहों में थी
मोड़ पर घूमी तो देखा अजनबी बाहों में थी
चीख़ निकली भी तो होठों में ही घुट कर रह गई
छटपटाई पहले, फिर ढीली पड़ी, फिर ढह गई
दिन तो सरजू के कछारों में था कब का ढल गया
वासना की आग में कौमार्य उसका जल गया

और उस दिन ये हवेली हँस रही थी मौज में
होश में आई तो कृष्ना थी पिता की गोद में
जुड़ गई थी भीड़ जिसमें ज़ोर था सैलाब था
जो भी था अपनी सुनाने के लिए बेताब था
बढ़ के मंगल ने कहा काका तू कैसे मौन है
पूछ तो बेटी से आख़िर वो दरिंदा कौन है
कोई हो संघर्ष से हम पाँव मोड़ेंगे नहीं
कच्चा खा जाएंगे ज़िन्दा उनको छोडेंगे नहीं
कैसे हो सकता है होनी कह के हम टाला करें
और ये दुश्मन बहू-बेटी से मुँह काला करें
बोला कृष्ना से- बहन, सो जा मेरे अनुरोध से
बच नहीं सकता है वो पापी मेरे प्रतिशोध से

पड़ गई इसकी भनक थी ठाकुरों के कान में
वे इकट्ठे हो गए थे सरचंप के दालान में
दृष्टि जिसकी है जमी भाले की लम्बी नोक पर
देखिए सुखराज सिंग बोले हैं खैनी ठोंक कर
क्या कहें सरपंच भाई! क्या ज़माना आ गया
कल तलक जो पाँव के नीचे था रुतबा पा गया
कहती है सरकार कि आपस में मिलजुल कर रहो
सुअर के बच्चों को अब कोरी नहीं हरिजन कहो

देखिए ना यह जो कृष्ना है चमारों के यहां
पड़ गया है सीप का मोती गँवारों के यहां
जैसे बरसाती नदी अल्हड़ नशे में चूर है
हाथ न पुट्ठे पे रखने देती है, मगरूर है
भेजता भी है नहीं ससुराल इसको हरखुआ
फिर कोई बाहों में इसको भींच ले तो क्या हुआ
आज सरजू पार अपने श्याम से टकरा गई
जाने-अनजाने वो लज्जत ज़िंदगी की पा गई
वो तो मंगल देखता था बात आगे बढ़ गई
वरना वह मरदूद इन बातों को कहने से रही

जानते हैं आप मंगल एक ही मक्कार है
हरखू उसकी शह पे थाने जाने को तैयार है
कल सुबह गरदन अगर नपती है बेटे-बाप की
गाँव की गलियों में क्या इज्जत रहेगी आपकी´
बात का लहजा था ऐसा ताव सबको आ गया
हाथ मूँछों पर गए माहौल भी सन्ना गया
क्षणिक आवेश जिसमें हर युवा तैमूर था
हाँ, मगर होनी को तो कुछ और ही मंज़ूर था
रात जो आया न अब तूफ़ान वह पुर ज़ोर था

भोर होते ही वहाँ का दृश्य बिलकुल और था
सिर पे टोपी बेंत की लाठी संभाले हाथ में
एक दर्जन थे सिपाही ठाकुरों के साथ में
घेरकर बस्ती कहा हलके के थानेदार ने -
`जिसका मंगल नाम हो वह व्यक्ति आए सामने´
निकला मंगल झोपड़ी का पल्ला थोड़ा खोलकर
एक सिपाही ने तभी लाठी चलाई दौड़ कर
गिर पड़ा मंगल तो माथा बूट से टकरा गया
सुन पड़ा फिर `माल वो चोरी का तूने क्या किया´
`कैसी चोरी माल कैसा´ उसने जैसे ही कहा
एक लाठी फिर पड़ी बस, होश फिर जाता रहा
होश खोकर वह पड़ा था झोपड़ी के द्वार पर

ठाकुरों से फिर दरोगा ने कहा ललकार कर -
`मेरा मुँह क्या देखते हो! इसके मुँह में थूक दो
आग लाओ और इसकी झोपड़ी भी फूँक दो´
और फिर प्रतिशोध की आंधी वहाँ चलने लगी
बेसहारा निर्बलों की झोपड़ी जलने लगी
दुधमुँहा बच्चा व बुड्ढा जो वहाँ खेड़े में था
वह अभागा दीन हिंसक भीड़ के घेरे में था
घर को जलते देखकर वे होश को खोने लगे
कुछ तो मन ही मन मगर कुछ ज़ोर से रोने लगे

´´ कह दो इन कुत्तों के पिल्लों से कि इतराएँ नहीं
हुक्म जब तक मैं न दूँ कोई कहीं जाए नहीं ´´
यह दरोगा जी थे मुँह से शब्द झरते फूल से
आ रहे थे ठेलते लोगों को अपने रूल से
फिर दहाड़े "इनको डंडों से सुधारा जाएगा
ठाकुरों से जो भी टकराया वो मारा जाएगा"
इक सिपाही ने कहा "साइकिल किधर को मोड़ दें
होश में आया नहीं मंगल कहो तो छोड़ दें"
बोला थानेदार "मुर्गे की तरह मत बांग दो
होश में आया नहीं तो लाठियों पर टांग लो
ये समझते हैं कि ठाकुर से उलझना खेल है
ऐसे पाजी का ठिकाना घर नहीं है, जेल है"

पूछते रहते हैं मुझसे लोग अकसर यह सवाल
`कैसा है कहिए न सरजू पार की कृष्ना का हाल´
उनकी उत्सुकता को, शहरी नग्नता के ज्वार को
सड़ रहे जनतंत्र के मक्कार पैरोकार को
धर्म संस्कृति और नैतिकता के ठेकेदार को
प्रांत के मंत्रीगणों को, केंद्र की सरकार को
मैं निमंत्रण दे रहा हूँ आएँ मेरे गाँव में
तट पे नदियों के घनी अमराइयों की छाँव में
गाँव जिसमें आज पांचाली उघाड़ी जा रही
या अहिंसा की जहाँ पर नथ उतारी जा रही
हैं तरसते कितने ही मंगल लंगोटी के लिए
बेचती है जिस्म कितनी कृष्ना रोटी के लिए !

Wednesday, August 03, 2011

रचनावली के बहाने नंद कुमार उप्रेती की याद

यह टिप्पणी नैनीताल समाचार के लिये लिखी गई थी और वहीं से साभार प्रस्तुत है- नवीन जोशी



उन्नीस जून 2011 की उमस भरी शाम लखनऊ के भारतेन्दु नाट्य अकादमी के प्रेक्षागृह में ज्यादा लोग नहीं थे, लेकिन वहाँ जो भी आए वे या तो स्व. नंद कुमार उप्रेती को बहुत करीब से जानते थे या उनके बारे में सुन-सुन कर प्रभावित थे। उस शाम उप्रेती जी की कुमाउनी रचनाओं के संग्रह का विमोचन हो रहा था और उस बहाने उस विलक्षण व्यक्ति के रचना संसार के साथ-साथ उनके जीवन संघर्ष और जीवट पर भी अंतरंग-सी चर्चा की गई।

वृद्धावस्था के साथ-साथ बीमारी से भी त्रस्त और कृशकाय वंशीधर पाठक ‘जिज्ञासु’ पूरे ढाई घण्टे वहाँ बैठे रहे तो सिर्फ इसलिए कि नंद कुमार उप्रेती से 40 वर्ष उनका याराना रहा था और पहली मुलाकात में नंद कुमार को बंगाली समझने वाले जिज्ञासु ने ही उन्हें कुमाउँनी में लिखने को ‘धकियाया’ था- वर्ना तो किशोरावस्था में पहाड़ से भागकर लखनऊ में ठौर-ठिकाना खोज रहे नंद कुमार पहाड़ियों से कोई मदद न पाकर (‘ल्याखै नै लगाय’-वे कहते थे) किसी कृपालु बंगाली के यहाँ शरण और शिक्षा पाते हुए युवा होने तक स्थापित बंगाली लेखक बन ही चुके थे। जरा-सा बोलने में थक जा रहे और सुन सकने में लगभग असमर्थ हो गए जिज्ञासु जी ने उस दिन अपने उस सखा को बेतरह याद किया और उनके बारे में तब तक बोलते ही चले गए जब तक कि मैंने चिंतित होकर उन्हें रोक नहीं दिया। फिर कार्यक्रम के अंत में घर जाते हुए जिज्ञासु जी ने मुझसे कहा- ‘नब्बू, अब मुझसे किसी कार्यक्रम में आने को मत कहना।’ मैं समझ सकता हूं कि यह बीमारी और कमजोरी की लाचारी से ज्यादा उनका भावुक हो जाना ही था।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करने खुशी-खुशी चले आए वयोवृद्ध यज्ञदेव पण्डित अपने से दो-तीन वर्ष छोटे रहे नंद कुमार उप्रेती के लेखन और व्यक्तित्व से भी ज्यादा इस बात से प्रभावित थे कि उन्हें तंत्र, ज्योतिष और कुण्डलिनी जागरण जैसे गूढ़ विषयों के परेशान करने वाले सवालों का संतोषजनक उत्तर उप्रेती जी से मिल जाया करता था। 1953 में आकाशवाणी लखनऊ से प्रादेशिक समाचार बुलेटिन शुरू करने वाले पण्डित जी ने उप्रेती जी के इसी ज्ञान पर प्रकाश डाला। पहाड़ से भटकते हुए लखनऊ आने के बीच किशोर नंद कुमार जोगियों-तांत्रिकों के सान्निध्य में भी कुछ समय रहे थे और बाद में लखनऊ से भी वे द्रोणागिरि पर्वत के इर्द-गिर्द रहने वाले कुछ साधुओं के पास अक्सर जाया ही करते थे। हृदयरोगी हो चुके यज्ञदेव पण्डित को भी एक बार उन्होंने ऐसे ही अपने ‘गुरु’ से मिलाने के लिए पहाड़ की कठिन चढ़ाई चढ़वा दी थी।

‘बाबा’ की किताब छप जाने की खबर से उत्साहित उप्रेती जी की बड़ी बेटी, पार्श्व गायिका सपना अवस्थी इस कार्यक्रम के लिए मुंबई से भागी-भागी तो आई लेकिन मंच से बोलने में बहुत भावुक हो गई और इतना ही कह पाई कि जो काम मुझे करना चाहिए था वह डॉ. प्रयाग जोशी ने करके बहुत बड़ा उपकार किया है। बाबू के जिन्दा रहते किताब छपती तो वे कितना खुश होते।

रचनावली के सम्पादक डॉ. प्रयाग जोशी ने विस्तार से बताया कि किस तरह उनकी रचनाएँ एकत्र हो पाईं। पर्चियों में कविता, वगैरह लिखने वाले उप्रेती जी की रचनाओं को जैसे-तैसे उनकी पत्नी श्रीमती बसंती उप्रेती ने ही बण्डल बनाकर यहाँ-वहाँ ठूँस रखा था, यानी ठेठ पहाड़ी अंदाज में संभाल रखा था, हालाँकि उन्हें पतिदेव के रचनाकर्म से खास वास्ता न था। प्रयाग जोशी ने उप्रेती जी की कुमाउनी कविताओं, कहानियों, लेखों-संस्मरणों और नाटकों का विश्लेषण भी पेश किया कि किस खूबी से उप्रेती जी समाज पर सोद्देश्य कटाक्ष करते हैं और कुमाउनी बोली के प्रति कितने सजग हैं। उप्रेती जी के शब्द प्रयोग साबित करते हैं कि कुमाउनी बोली की विविध शैलियों में सम्प्रेषण की अद्भुत क्षमता है। उप्रेती जी की इस कुमाउनी रचनावली में 53 कविताएँ, 9 लेख-कहानी-संस्मरण और 13 नाटक संग्रहीत हैं।

बोलने की अपनी बारी आने पर मैं जब अपने किशोरावस्था के दिनों में उप्रेती जी और जिज्ञासु जी में होने वाली अंतरंग बातचीत का लगभग मूक श्रोता होने की चर्चा करने लगा तो अनायास ही वह प्रसंग याद आ गया। दुःख-तकलीफों की चर्चा ज्यादा देर चल जाने पर एक रोज उप्रेजी जी ने बड़े तेवर के साथ कहा था- ‘यार, मैंने तो तमाम दुखों की पोटली बनाकर उन्हें भेल के नीचे च्याप दिया है और कहता हूँ अब दबाओ सालो मुझे!’ मैं जब यह किस्सा सुना रहा था तो सभागार की पहली पंक्ति में बैठीं श्रीमती उप्रेती आँचल से आँखें पोछने लगी थीं। जाहिर है, वे उन कष्टों की गवाह ही नहीं भागीदार भी रही थीं। छोटी बेटी पुष्पा को उप्रेती जी बहुत प्यार करते थे। वह भी वहाँ भीगी आँखें और पसीजा मन लिए मौन बैठी थी। यूँ, ‘बाबा’ की किताब का छपना और ससमारोह विमोचित होना उनके लिए गर्व और खुशी का भी मौका था और वह पूरे परिवार के चेहरे पर तब साफ दिखाई दिया जब विमोचित पहली प्रति सबके हस्ताक्षर के बाद श्रीमती उप्रेती को ससम्मान सौंपी गई।

उप्रेती जी की युवावस्था के दौर के अंतरंग मित्र और वरिष्ठ पत्रकार रामकृष्ण को, जो पैरों से लाचार होने के कारण घर में ही कैद रहने को मजबूर हैं, हम चाह कर भी कार्यक्रम में नहीं ला सके। लेकिन उप्रेती जी की कई यादें उन्होंने लिख कर ईमेल से हमसे साझा कीं। रामकृष्ण ने अपनी एक किताब में भी विस्तार से उप्रेती जी और संगीत उस्तादों से उनके याराने पर लिखा है। उप्रेती जी के फटे पाजामे से लेकर ‘कुमाऊँ डेयरी’ के पीछे की छोटी-सी कोठरी में कुछ मशहूर सितार वादकों, तबला वादकों और कथक नर्तकों के साथ उनकी दोस्ती के साक्षी रहे हैं रामकृष्ण।

आकाशवाणी, लखनऊ और नजीबाबाद में कई वरिष्ठ पदों पर रह चुके नित्यानंद मैठाणी, महेश पाण्डे, पियूष पाण्डे, गोविन्द राजू और धन सिंह मेहता ने भी उप्रेती जी को अपने-अपने ढंग से याद किया और कौन कह सकता है कि सभागार में श्रोता रूप में चुपचाप बैठे प्रद्युम्न सिंह (जिन्होंने 1968 में पहली बार लखनऊ में कुमाउनी लोक धुनों पर आधारित नृत्य नाटिका ‘मालूशाही’ प्रस्तुत की थी), हरीश सनवाल, हरीश पंत, ज्ञान पंत, आदि, जिन्होंने उप्रेती जी को कई भूमिकाओं में देख-सुना था, के मन में भी उनकी विविध यादें उमड़-घुमड़ नहीं रही होंगी।

सन् 2005 में उप्रेती जी के निधन के समय से ही यह संकल्प जैसा था कि जब कभी उनका संग्रह छपेगा तो उसका विमोचन हम अवश्य लखनऊ में उनके मित्रों-संबंधियों के बीच कराएँगे। डा. प्रयाग जोशी ने संग्रह का सम्पादन करके, प्रकाश बुक डिपो, बरेली वालों ने उसे छापकर और रंगकर्मी ललित सिंह पोखरिया की अध्यक्षता वाली साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था ‘निसर्ग’ ने संग्रह के लोकार्पण के आयोजन का हमारा आग्रह सहर्ष मान कर इस संकल्प को पूरा करा दिया।

Tuesday, July 05, 2011

‘दावानल’ से उठी ‘आमा’ की वेदना

(दो जून, 2011 को नैनीताल समाचार में छपी यह रपट बस यूं ही पोस्‍ट कर दे रहा हूं- न. जो. )
उत्तरांचल संस्कृति युवा मंच द्वारा 1 मई को भारतेन्दु नाट्य अकादमी, लखनउ के बी.एम. शाह प्रेक्षागृह में नवीन जोशी के बहुचर्चित उपन्यास ‘दावानल’ पर परिचर्चा का आयोजन किया गया। इस अवसर पर ‘दावानल’ की पृष्ठभूमि से प्रेरित राहुल सिंह बोरा द्वारा लिखित एवं जीवन सिंह रावत द्वारा निर्देशित लघु फिल्म ‘आमा’ का प्रदर्शन भी किया गया। प्रकाशन के पाँच वर्ष बाद ‘दावानल’ पर परिचर्चा उन युवा सृजनकर्मियों द्वारा आयोजित की गई थी, जिनका पहाड़ से नाता बचपन में ही टूट चुका है। जो लखनऊ में पले-बढ़े और आज व्यक्तिगत और सामाजिक सवालों के जवाब तलाश रहे हैं। उत्तराखण्ड जन आन्दोलनों पर आधारित ‘दावानल’ एक ओर वन सम्पदा पर ग्रामवासियों के नैसर्गिक अधिकारों और आपसी संवेदनात्मक सम्बन्धों का साक्षात्कार कराता है तो दूसरी ओर अदूरदर्शी वन नीतियों के कारण बर्बाद होते पहाड़ी जनजीवन की तस्वीर खींचता है। इस प्रकार यह क्षेत्र विशेष का उदाहरण लेकर वन और सम्पूर्ण मानव समाज के साहचर्य का दर्शन स्थापित करता हुआ एक सार्वभौमिक रूप से समसामयिक बन जाता है।

साहित्यकार धनसिंह मेहता ‘अंजान’ ने कहा कि सत्ता और शक्ति के उपभोगार्थ हमारे राजनैतिक कर्णधार प्रकृतिजनित समस्याओं और समाज की विषम परिस्थितियों को अपने हित में और अधिक बिगाड़ देते हैं। ‘दावानल’ इस कुचक्र का खुलासा करता है। ‘दावानल’ पूरे चिपको आन्दोलन की चीरफाड़ करता हुआ उसके असली दिव्य स्वरूप को सामने रखता है। ज्ञान पंत ने ‘दावानल’ को पहाड़ का सम्पूर्ण यथार्थ बताया। अन्त में नवीन जोशी ने ‘दावानल’ के माध्यम से चिपको आन्दोलन को ब्यौरेवार प्रस्तुत किया और बताया कि किस तरह भोली-भाली ग्रामीण स्त्री गौरा देवी की वनों पर नैसर्गिक अधिकारों की लड़ाई को प्रचारधर्मियों एवं प्रचारलोलुपों के द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरण की लड़ाई बना दिया गया। ब्रिटिश शासन की दमनकारी वन नीतियाँ आज़ाद भारत में और क्रूर हो गईं। ग्रामीणों के वनों पर नैसर्गिक अधिकारों को छीन लिया गया। कार्यक्रम का संचालन ललित पोखरिया द्वारा किया गया।

इस मौके पर प्रदर्शित ‘आमा’ फिल्म के लेखन, निर्देशन, सिनेमेटोग्राफी, अभिनय और सम्पादन से जुड़े लगभग सभी कलाकार ‘निसर्ग’ संस्था का नाट्य प्रशिक्षण कार्यक्रम उत्तीर्ण करने के पश्चात् अनेक रंग संस्थाओं की नाट्य प्रस्तुतियों में अपने को स्थापित कर चुके हैं। मुख्य अभिनेता अनुराग मिश्र, निर्देशक जीवन सिंह रावत, तथा लेखक राहुल सिंह बोरा ने भी ‘दावानल’ और ‘आमा’ के सन्दर्भ में अपने-अपने विचार व्यक्त किये। ‘आमा’ एक दादी और उसके पोते के बीच रिश्ते की कहानी है। शहर में रहने वाला पुष्कर अपनी आमा से नहीं मिल पाता। एक रोज उसे दादी की चिट्ठियाँ मिलती हैं, लेकिन तब तक दादी की मौत हो चुकी होती है। इन पत्रों से पुष्कर में अपनी दादी और अपनी जड़ों के बारे में जानने की ललक भी पैदा होती है और वह अपनी जड़ों की तलाश में निकल जाता है। फिल्म की शूटिंग रानीखेत के पास स्थित गटोली गाँव, रानीखेत बाजार और लखनऊ में हुई है।
-ललित पोखरिया

Friday, June 10, 2011

मुड़ कर कल के मकबूल को देखना

सन 2003 में प्रकाशित अपनी आत्मकथा ‘एम एफ हुसेन की कहानी, अपनी जुबानी’ को रिलीज करने एम एफ हुसेन पटना भी आए थे। मैं उन दिनों पटना ही था और हुसेन के साथ एक कप कॉफी पीने का मौका 'हिन्दुस्तान' के स्थानीय संपादक की हैसियत से मुझे भी मिला। हुसेन प्रशंसकों से घिरे थे, अलग से कुछ बातें करने का अवसर नहीं था। फिर भी हुसेन से मिलना रोमांचक अनुभव था। उन्होंने मुझे भी अपनी आत्म कथा की एक प्रति दी और हमारे एक साथी के आग्रह पर हिन्दुस्तान के पाठकों के लिए प्यार लिख कर अपने हस्ताक्षर कर दिए थे जिसे हमने अखबार के अगले अंक में छापा भी था।

उस रात घर पहुंच कर जब ‘एम एफ हुसेन की कहानी, अपनी जुबानी’ के पन्ने पलटना शुरू किया तो फिर उसे पूरी पढ़े बिना रख देना हो ही नहीं पाया। किताब की प्रस्तुति और कहन का अंदाज तो जुदा होना ही था, क्योंकि वह मकबूल फिदा हुसेन नाम के आला दर्जे के कलाकार की आत्म कथा है, लेकिन मेरे लिए वह किताब उस आला इनसान को थोड़ा समझ सकने का बायस बनी। उनका बचपन, गरीबी और संघर्ष, वगैरह तो उसमें हैं ही, हुसेन ने उसमें अपने कलाकार के अंकुर फूटने और कला संवेदना के स्रोतों को भी बड़े तटस्थ भाव से लेकिन खूब बारीकी से शब्द-चित्रित किया है। हुसेन की पेटिंग्स में क्यों बार-बार एक साइकिल या उसका एक पहिया या हैण्डिल आते रहते हैं, या क्यों एक चेहरा विहीन स्त्री बार-बार आती दिखाई देती है जो कभी मदर टेरेसा का आभास देती है और कभी किसी सामान्य स्त्री का। क्यों एक खाली घड़ा, एक पुराना पर्दा, जैसी बहुत आम चीजें उनके चित्रों में अपनी उपस्थिति बार-बार दर्ज कराती हैं?

दरअसल, यह साइकिल हुसेन की बचपन की साइकिल है और इसके साथ किशोर मकबूल की बड़ी प्यारी यादें जुड़ी हैं। देखिए हुसेन क्या लिखते हैं- 'साइकिल की सीट इनसानी मुखड़ा, हैण्डिल दो बाहें, पैडल दो पैर, लड़का (हुसेन खुद) पीछे कैरियर पर सवार साइक्लिंग किया करता, जैसे पूरी साइकिल उसकी गोद में हो या लड़का साइकिल की गोद में। यह नहीं कह सकते कौन किसे गोद में लिए प्यार कर रहा है।'... वह बेचेहरा स्त्री हुसेन की मॉं है, बेचेहरा इसलिए क्योंकि हुसेन को अपनी मॉं का चेहरा याद नहीं। कोई डेढ़ साल के थे कि मॉं चल बसी और कलाकार हुसेन अपनी मॉं का चेहरा ढूंढता फिरता है, मदर टेरेसा में भी और माधुरी दीक्षित में भी। जी हां, माधुरी दीक्षित में भी। हुसेन के माधुरी-प्यार को लेकर खूब चर्चाएं-अफवाहें उड़ीं, लेकिन हुसेन माधुरी को 'मां-अधूरी' मानते थे।

एक लड़की थी जो एक निश्चित समय पर घड़ा लेकर पानी भरने आती थी और कैसे एक जालिम ने उसे अपनी रखैल बनाकर हुसेन के मासूम सपनों का कत्ल किया..किसी एक कोठरी में एक पर्दा था जिसके हिलने के ढंग में अलग-अलग इशारे छुपे होते थे..। हुसेन के मन में बचपन और कैशौर्य की अनेक यादें इस कदर जमी रहीं कि लगभग हर अभिव्यक्ति में, पेण्टिंग हो या कविता, उनका स्पर्श सायास-अनायास आ ही जाता रहा और खुद हुसेन ने भी उन छवियों को कभी अलग नहीं होने दिया। वास्तव में वे स्मृतियां उनकी कूची की ताकत बनीं।

आज हुसेन को श्रद्धांजलि स्वरूप उनकी आत्म कथा के आखिरी अध्याय का यह अंश पेश करते हुए मैं बहुत भावुक भी हूं क्योंकि अपने वतन से बहुत प्यार करने वाले इस अति संवेदनशील इनसान को कुछ कट्टरपंथी हिन्दुओं के सिरफिरेपन के कारण आत्म-निर्वासन झेलना पड़ा और जलावतनी में ही उनकी मृत्यु हुई-- नवीन जोशी.

"यह पंढरपुर का लड़का इन्दौर जाकर मकबूल पेन्टर बना। बम्बई ने उसे एमएफ हुसेन आर्टिस्ट का खिताब दिया। दिल्ली ने पद्मभूषण से विभूषण की शाल पहनाई, मैसूर और बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी ने डी. लिट की डिग्री चिपका दी। जब बर्लिन अपनी फिल्म लेकर गया तो उसके पीछे गोल्डन (बियर) भालू लगा दिया।

मकबूल बचपन ही से अपने खयाली घोड़े दौड़ाने का शौकीन। उसे बम्बई का रेसकोर्स तो नहीं मिला मगर आलीशान दीवानखानों की दीवारें बहुत मिली। बस, एम एफ हुसेन ने अपने घोड़े उन दीवारों पर बेतहाशा दौड़ा दिये। यह रेस कोई चूहों कि रेस नहीं कि बिल्ली के डर से दुम दबाकर भाग जाये। यह दौड़ शह सवारों की दौड़ है। डर किस का? गिरने का? नहीं!

‘‘गिरते हैं शह सवार ही मैदाने जंग में।
वह तिफ्ल क्या गिरेगा जो घुटनों के बल चले।’’ बेशक बम्बई की पहली दौड़ में एम एफ ऐसे मुंह के बल गिरे कि अठ्ठारा साल तक अपने घोड़े पर चढ़ नहीं पाये। हार नहीं मानी। 1947 में मौका मिलते ही मकबूल छलांग मारकर घोड़े पर चढ़ बैठा और ऐसी एक एड़ लगाई कि घोड़ा कहीं रुका ही नहीं।

‘‘ने हाथ में लगाम ने पा रकाब में ’’। ठीक है हाथ में लगाम नहीं लेकिन पैरों की एड़ से घोड़े का रुख बदला जा सकता है, भले रोका न जा सके। पिछले पचास सालों में दुनिया छान मारी। लोगों की छानबीन में लगे रहे। हजारों से मिले लेकिन कुछ अच्छे इनसानों का साथ नहीं छोड़ा चाहे वह दुनिया के किसी कोने में हों।

एम एफ से किसी ने पूछा वह कौन और कहाँ-कहाँ?
जवाब दिया-अगर मैं उन शख्सीयतों के नाम गिनाना शुरू करूं तो ऐसा लगेगा कि मैं नेम ड्रापिंग या अपनी बड़ाई जता रहा हूं। आपबीती लिखने में यही एक बड़ी कमी है। अपने मुंह अपनी बातें नहीं कर सकते जो थोड़ी बहोत अच्छी हों जैसे मोहब्बत की बात—-‘‘इक लफ्जे मोहब्बत का इतना सा फसाना है। सिमटे तो दिले आशिक फैले तो जमाना है’’

एम एफ का अभी जमाना खत्म नहीं हुआ और हो यह रहा है कि वह एक साथ तीन-तीन जमानों में घिरा हुआ है। पहला हुस्न और इश्क, दूसरा आर्ट और फिल्म, तीसरा गमे रोजगार। तीनों जमानों के अलग अलग कोड हैं। यह एम एफ हुसेन की कहानी नहीं एक वक्त की जुबानी है। यहां समय बोल रहा है और इस छोटे से वक्फे के दौरान कुछ लोग मिले कुछ बातें हुईं। कोई तो हो जो लोगों से मिले। कोई तो हो जो उनकी बातें सुने। मिलने का शौक और सुनने की आदत, वह मकबूल में कूट कूट कर भरी है।

मिलने का मुआमला इतना आसान नहीं। कैसे कैसे लोग हैं। खुद अपने घरवाले, दिल वाले। पास पड़ोसी, महल्ले वाले, जानने वाले। शहर और मुल्क वाले, दूर से दखने वाले। फिर दुनिया जहान वाले। मकबूल की आवारगी ने दुनिया जहान घुमाया। शौक और बढ़ता ही गया। आज अठ्ठास्सी बरस के करीब मिलने की हवस वही बाकी।

क्या मां की गोद बचपन से छिन जाने पर पालना भी न रहा जिसे कोई यशोदा माई झुलाये।
मां की गुनगुनाती नींद को बुलाती लोरी कहां।
मकबूल के कानों में तो सिर्फ एक ही आवाज गूंजती रही ‘‘जागते रहो—जागते रहो’’।
यह जागरण जारी है। यह मैराथन मीलों का सफर जारी। केनवास पर रंगों की भरमार। आर्ट गैलरी का गरम बाजार। इंटरनेशनल आक्शन हाउस का सुपर स्टार, बॉलीवुड की अप्सराओं का परस्तार लेकिन एलोरा-अजंता की देवियों के चरन छूने के बाद।

सारी उम्र काटी हुस्न के बाजार में। वह हुस्न का सौदा करने नहीं गया, हुस्न बांटने गया। इस हुस्न के बाजार में हुसेन की आवभगत से कई नासमझ लोग हसद की आग में जलने लगे। ताने तिशने, यहां तक तीर कमान खिंच गये।

यह जलन क्यूं? आज के एम एफ हुसेन को देखकर?
मुड़ के कल के मकबूल को देखा है? जो प्ले हाउस के हुसेनी खिचड़ी वाले ढाबे में पांच पैसे की खिचड़ी पर दाल या कढ़ी मुफ्त डलवाने खड़ा रहता था। दो आने की सिनेमा टिकट के लिये दो घंटे लाइन में। कई महीनों बीस-बीस फीट लंबे फिल्मी हीरोइनों के होर्डिंग सीढ़ियों पर चढ़ के पेन्ट करना। ग्रान्ट रोड की उसी गली की एक चाल में रहती बूढ़ी बेवा की बेटी फजीला से बियाह पर पांच दस रास्ता चलते बाराती। उसी रात कल्लु मियां विक्टोरिया चलाने का गराज खाली किया और एक पोस्टमैन दोस्त ने सुहाग रात मनाने मकबूल को अपने दो कमरों में से एक कमरा भेंट में दे दिया—–यह फिल्मी स्क्रिप्ट नहीं, यह असली सीन हैं। मकबूल की जिंदगी का एक हिस्सा, जिसे लोग नहीं जानते। वह तो आज के एमएफ हुसेन को जानते हैं जिस पर भड़की लाईम लाईट है।"

Tuesday, May 24, 2011

और जो 90% से नीचे रह गए वे नाकाम हुए?

-‘बच्चे का रिजल्ट कैसा रहा?’ हमने एक साथी से फोन पर पूछा।
-‘अरे, यार..। ’ उनकी आवाज में अफसोस था- ‘89%..। थोड़ा और मेहनत करता तो..। 89 परसेण्ट पर भी एक पिता का यह निराशा भरा स्वर हमें भीतर तक हिला गया। हमने उन्हें घर जाकर बधाई दी। बच्चे को एक किताब उपहार में दी। लेकिन उस परिवार के चेहरों से मलाल नहीं गया।

तब से हम लगातार सोच रहे हैं, जो बच्चे 90 परसेण्ट से नीचे रह जाते हैं, क्या वे कमतर हैं? वे योग्य और प्रतिभाशाली नहीं हैं? 100 में 88 या 85 या 80 नंबर भी क्या कम होते हैं? नहीं, 80 नंबर भी बहुत होते हैं लेकिन हमारे चारों तरफ हो क्या रहा है?

सीआईसीएसई की 10वीं व 12वीं और सीबीएसई की 12वीं का रिजल्ट आ चुका है। यूपी बोर्ड का जल्दी ही आने वाला है। रिजल्ट आते ही स्कूल, कोचिंग और पूरा मीडिया टॉपर बच्चों को ढूंढने लगते हैं। 98%..97%..96% वालों के उल्लासित चेहरे अखबारों और टीवी स्क्रीन पर छाए रहते हैं। स्कूलों से लेकर घरों तक कैमरे और पत्रकार दौड़ते हैं। माता-पिता, भाई-बहन और टीचर तक के इण्टरव्यू छप रहे हैं- ‘वह 10-12 घण्टे पढ़ता था..हमने टीवी ही हटा दिया था..’ वगैरह। अखबारों में टॉपर बच्चों के फोटो छापने की होड़ मचती है। रिजल्ट के पहले दिन तो 94% वालों को भी अखबार में जगह नहीं मिल पाती। 90% वालों को फोटो छपवाने के लिए कई दिन इंतजार करना पड़ता है..।

ऐसे में 89 परसेण्ट नंबर लाने वाले बच्चे के माता-पिता का चेहरा लटकेगा ही। स्कूलों में और माता-पिताओं में यह कैसी अंधी दौड़ मची है? बच्चों पर इसका क्या असर पड़ रहा है? स्कूल बच्चों को पढ़ा रहे हैं या उनका दिमाग नंबरों के सांचे में ढाल रहे हैं?

सीआईसीएसई बोर्ड अपने टॉपर घोषित नहीं करता लेकिन हम मीडिया वाले उसे भी खोज लाए। सीबीएसई ने परसेण्टेज का सिस्टम ही खत्म करके ग्रेडिंग व्यवस्था शुरू कर दी। फिर भी टॉपर बच्चों की ढुँढाई मचती है। यूपी बोर्ड ने मेरिट लिस्ट जारी करना बन्द कर दिया। मगर स्कूल हैं, कोचिंग संस्थान हैं और मीडिया है कि टॉपर बच्चों की अपनी-अपनी लिस्ट जारी करते रहते हैं। 90% ऐसी सीमा रेखा बना दी गई है कि उसके पार वाले ही प्रतिभाशाली है। उनकी सफलता का सौदा करने के लिए स्कूल और कोचिंग संस्थान दुकानें खोले खड़े हैं। इसलिए 90% से नीचे मायूसी विचरती है। यह बेहद खतरनाक प्रवृत्ति है।

सच यह है कि 10वीं और 12वीं कक्षाओं के नंबर जीवन की सफलता-विफलता तय नहीं करते। 95-98 परसेण्ट नंबर लाने वाले ही आगे चलकर कॅरिअर के शिखर पर नहीं चढ़ते। सच तो इसके उलट है। जीवन में बड़ी सफलताएं आम तौर पर वे ही अर्जित करते हैं जो स्कूल में 90% से नीचे नंबर पाए होते हैं। अपने चारों तरफ शीर्ष पर विराजमान लोगों को देख लीजिए, उनकी आत्मकथाएं पढ़ लीजिए। नारायणमूर्ति से अजीम प्रेमजी तक, अमिताभ बच्चन से लेकर रतन टाटा तक, वारेन बूफे से लेकर मार्क जुकरबर्ग तक, डॉ. एपीजे कलाम से लेकर खुशवंत सिंह तक..। बहुत लंबी सूची मिलेगी जो औसत विद्यार्थी रहे या कम से कम अपने समय के स्कूल टॉपर नहीं रहे, लेकिन लगन और मेहनत से सफलता ने उनके कदम चूमे।

अपवाद जरूर होंगे, लेकिन आम तौर पर पाया गया है कि 95-98% नंबर पाने वालों में ‘रट्टू’ ज्यादा होते हैं। पढ़ाई के तनाव, कोर्स ही की किताबों और ट्यूशनों में उनका बचपन और कैशोर्य बंधुआ बनकर रह जाता है। वे हमेशा परसेण्टेज मेण्टेन करने के दवाब में रहते हैं। उनके व्यक्तित्व का सहज विकास नहीं हो पाता और अक्सर वे 10वीं-12वीं के बाद जबरन बनाए गए शिखर से लुढ़कते चले जाते हैं। आईआईटी-आईआईएम से लेकर विविध शिक्षा संस्थानों के छात्रों में आत्महत्या और अवसाद के बढ़ते जा रहे किस्से खुद गवाह हैं। इसके विपरीत 75 या 80-85 प्रतिशत नंबर लाने वाले बच्चों स्कूली पढ़ाई के साथ-साथ जीवन के विविध अध्याय भी पढ़ रहे होते हैं। वे अपेक्षाकृ त व्वाहारिक होते हैं ।

अपने स्कूली दौर में हम 34 फीसदी नंबर में पास हो जाते थे। 60 फीसदी में फर्स्ट डिवीजन और 75 परसेण्ट में डिस्टिंक्शन मिलते थे जो बहुत कम बच्चों के हिस्से आते थे। 50-55 फीसदी के आस-पास नंबर पाने पर खूब खुशी होती थी। तब पढ़ाई इतना बड़ा धन्धा नहीं बनी थी। उसमें सुख, संतोष और व्यावहारिक ज्ञान थे।

हमारा आशय टॉपर बच्चों की उपलब्धियों को नकारना नहीं है। उन्हें बहुत-बहुत बधाई। लेकिन 80-85 परसेण्ट अंक लाकर भी प्रतिभाशाली नहीं माने जा रहे बच्चों और उनके अभिभावकों को हताशा और दवाब में आने की कतई जरूरत नहीं। उनके लिए सभी सुन्दर राहें खुली पड़ी हैं।

-नवीन जोशी

Tuesday, May 17, 2011

गरमी की छुट्टियां

आज रात अपनी यह कविता उसने मुझे फोन पर सुनाई जिसके लिए मैं कभी कभार, उसके बचपन में, कवितानुमा कुछ लिख दिया करता था. यूं कविताएं उसने पहले भी लिखी हैं, लेकिन मेरे ब्‍लॉग में उसकी यह पहली ही है. मजा यह कि मेरे लिए य‍ह ब्‍लाग भी उसी ने बनाया था,सन 2006 में ...नवीन जो‍शी

हर्ष जोशी

लो, एक और मई आ गई

उबलती दोपहर और उमस भरी रातें
वैसी ही हैं लेकिन
गरमी का मौसम अब बदल चुका है

अब खिडकी ही से देख सकता हूँ छुटि्टयों की कुनमुन
गली में क्रिकेट खेलते
आउट और नो बॉल का हुड्दंग मचाते बच्‍चों को
साइकिल पर रेस लगाती खिलखिलाती लड़कियों को
स्‍कूल कैम्पिंग से लौट कर आती हुई बस की खिडकी से मुँह चिढाता
बेसुरे गाने गाता हुआ बचपन
मुझे टैफिक सिगनल पर छेडता है
वापस आओगे ?

कैसे जा सकता है कोई पलट कर
अब जबकि हम ऑफिस के ए सी में कैद हैं
और उस पुराने खुर्राट कूलर का गुर्राना
और खस की खुसबू वाले पानी की छींक
बहुत पीछे छूट गए हैं
अब जब दोपहर का काटना कोई खास मायने नहीं रखता
क्‍योंकि न किसी फुटबॉल, कैरम बोर्ड
या पुरानी कॉमिक्‍स उधार पर देने वाले उस अधेड आदमी को हमारा इंतजार है
अच्‍छे आम तो दूर इस शहर में कच्‍चे आम भी मुश्किल से मिलते हैं

पसीना अब निकलता है तो खुशी नहीं होती
हर बूंद सवाल करती है मैं क्‍यों निकली
और हवा में मौजूद दहक से मैं पूछता हूँ
क्‍या तुम मुझे फिर वैसे नहीं छू सकती
हॉं, किसी दुर्लभ छुट्टी में
जो पहले सा नहीं रह गया
उस आलस के बगल में लेट कर सुनने की कोशिश करता हूँ तो
एक आवाज तरस खा लेती है मुझ पर
कबाडी वाला

वैसे, गर्मियां मुझे अब अच्‍छी नहीं लगतीं.

Monday, May 09, 2011

अण्णा हजारे को सलाम…लेकिन माजरा क्या है ?

भ्रष्टाचार के खिलाफ अण्णा ह्ज़ारे और सिविल सोसायटी के अनशन के पक्ष-विपक्ष में बहुत कुछ लिखा-पढा जा चुका है.नैनीताल समाचार के संपादक और अपने मित्र राजीव लोचन साह का यह लेख पूरे मामले को समर्थन या विरोध की नज़र से देखने की बज़ाय व्यापक संदर्भों में विश्लेषित करता है और कुछ बहुत ज़रूरी सवाल भी उठाता है. यहां कटघरे में मीडिया भी है. इन सवालों पर ज़्यादा से ज़्यादा विचार-बहस हो, इसीलिये यहां साभार प्रस्तुत करता हूं- नवीन जोशी


भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग का पहला चरण जीत लिया गया है…. जन लोकपाल विधेयक लाने के बारे में केन्द्र सरकार अण्णा हजारे की सारी माँगें मान चुकी है….. अब अगली लड़ाई जाने कब और कैसी होगी!

हम जनान्दोलनों से जले लोग हैं। अब जनता के उत्साह को भी फूँक-फूँक कर देखते हैं। 1994 में हमने बड़ी उम्मीद के बीच जनता के एक जबर्दस्त उभार के साथ दर्जनों लोगों के प्राणों का बलिदान दिया, मुजफ्फरनगर का अपमान झेला और एक राज्य प्राप्त किया। फिर जनता सो गई और उत्तराखंड देश के तमाम अन्य प्रदेशों जैसा ही भ्रष्ट, कुशासित और लूट-खसोट वाला राज्य बन गया।

5 अप्रेल को जब अण्णा हजारे ने अनशन शुरू किया, मैं देहरादून में था। मीडिया में अण्णा साहब के प्रस्तावित उपवास की चर्चा काफी पहले से ही शुरू हो गई थी। उस शाम देहरादून के गांधी पार्क में भी अण्णा के समर्थन में एक सभा का आयोजन था। मुझे चूँकि उसी वक्त वापस लौटना था, अतः उस सभा में शिरकत करना मेरे लिये सम्भव नहीं था। उस सभा की सूचना देने वाला जो बैनर दिखाई दिया, वह किसी ‘ओबेराय मोटर्स’ द्वारा प्रायोजित था। हमने देहरादून को सलाम किया, जहाँ सामान्यतः जनान्दोलनों से नाक भौं सिकोड़ने वाले और सामाजिक कर्म के नाम पर अपने आप को कथा-प्रवचनों तक सीमित रखने वाले व्यापारी भी भ्रष्टाचार मिटाने के लिये ‘सिविल सोसाइटी’ के साथ कंधे से कंधा मिला कर डट गये थे।

अब तक टी.वी. चैनल अण्णा हजारे के बारे में लगातार खबरें देने लगे थे। जहाँ-जहाँ टी.वी. स्क्रीन पर नजर पड़ी, अण्णा साहब की ही झलक दिखाई दी। महज एक दिन पहले जो इलैक्ट्रॉनिक मीडिया ‘वल्र्ड कप क्रिकेट’ में इंडिया की जीत का जयजयकार कर रहा था, वह एकाएक अण्णा पर कैसे फोकस हो गया, यह अपनी समझ में नहीं आया। हमने अण्णा हजारे के बारे में ‘नैनीताल समाचार’ के 15 से 30 सितम्बर 1998 के अंक के मुखपन्ने पर ‘अण्णा हजारे की जगह जेल में ही है’ शीर्षक से एक टिप्पणी प्रकाशित की थी। तब महाराष्ट्र में भी अण्णा के बारे में गिने-चुने लोग ही जानते थे। अण्णा द्वारा भ्रष्टाचार का आरोप लगाये जाने पर महाराष्ट्र के समाज कल्याण मंत्री बबनराव घोलप ने उन पर मानहानि का मुकदमा कर दिया था। मजिस्ट्रेट एच. के. होलंगे पाटिल ने अण्णा साहब को पाँच हजार रु. का मुचलका भरने या तीन माह के लिये जेल जाने का विकल्प दिया था। अण्णा साहब पैसा न होने की मजबूरी जताते हुए जेल चले गये थे। तब अत्यन्त क्षोभ में हमने वह टिप्पणी लिखी थी। तब से आज तक अण्णा साहब सात-आठ बार उपवास कर चुके हैं। अब तक तो मीडिया ने अण्णा को घास नहीं डाली। अब एकाएक क्या हो गया है ? क्या हाल के महीनों में एक के बाद एक सामने आये घोटालों से जनता में बढ़ते असंतोष और ट्यूनीशिया तथा मिश्र में हुए सफल जन विद्रोह के बाद मीडिया ने इस घटना में टी.आर.पी. बढ़ने की पूरी सम्भावनायें टटोलीं और फिर ‘हाईप’ बना देने का फैसला किया ?

नैनीताल वापस पहुँचने पर एक के बाद एक अनेक फोन आये। सारे देश में, सब जगह कुछ न कुछ हो रहा है। सिर्फ नैनीताल में ही हम पिछड़ रहे हैं। क्या आप इस मामले में कुछ करने जा रहे हैं….. कोई कार्यक्रम इत्यादि ? …… मगर मैं स्पष्ट नहीं हो पा रहा था। इस ख्याल से कि सोचने के लिये कुछ वक्त मिल जायेगा और हो सकता है तब तक मामला सुलझ ही जाये, हमने रविवार की तिथि घोषित कर दी। हालाँकि इस बीच कुछ उत्साही युवक तल्लीताल डाँठ पर अण्णा के समर्थन में धरने पर बैठे भी। सचमुच शुक्रवार की शाम तक सुलह हो ही गई।

…..अब जबकि अण्णा हजारे जंतर मंतर से वापस अपने गाँव रालेगन सिद्धि पहुँच गये हैं, क्या यह चार-पाँच दिन का घटनाक्रम एक मीडिया प्रायोजित नाटक, जिसमें शहरी मध्य वर्ग की भावनाओं को अत्यन्त चतुरता से भुनाया गया, नहीं लग रहा है? क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई एक उत्सव, एक पिकनिक की तरह हो सकती है ? इस तथाकथित ‘सिविल सोसाइटी’ में कितने लोगों को देश में चल रहे जमीनी संघर्ष, सरकार के दमन और जनता की अदम्य जिजीविषा के बारे में जानकारी है ?

यह स्थापित सत्य है कि मीडिया आज बहुत बड़ी ताकत है। जब सारे चैनल और अधिकांश अखबार एक सुर में कोई बात कहने लगते हैं तो सामान्य व्यक्ति में यह विवेक ही नहीं बचा रह पाता कि वह खुले दिमाग से सोच सके। सच तो यह है कि सामान्य व्यक्ति के पास जानकारियाँ ही नहीं होतीं। सूचना क्रांति के दौर में सूचनाओं का जबर्दस्त अकाल है। टी.वी. चैनलों पर निर्भर या दो-चार अखबार पढ़ कर देश-दुनिया के बारे में अपनी राय बनाने वाला व्यक्ति कैसे जाने कि मणिपुर में ईरोम शर्मिला चानू नामक एक औरत पिछले दस साल से लगातार ‘विशेष पुलिस अधिकार कानून’ के खिलाफ गांधीवादी तरीके से तरह से उपवास कर रही है? उसे क्या मालूम कि देश में माओवाद इसलिये पनप रहा है कि आर्थिक उदारीकरण के बाद छोटी-बड़ी, देशी-विदेशी कम्पनियों के लिये सरकार किसानों की जमीनें छीन रही है और अपनी जमीनें बचाने के लिये लड़ रहे लोगों के बीच माओवादियों को जड़ें जमाने का मौका मिलता है। फिर अपने ही नागरिकों का जनसंहार करने के लिये सरकार ‘ऑपरेशन ग्रीन हंट’ शुरू कर सेना या अर्द्धसैनिक बल भेजती है। झारखंड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा आदि के आदिवासी क्षेत्रों में कॉरपोरेट सेक्टर द्वारा सरकारों के साथ मिल कर प्राकृतिक संसाधनों की यह लूट-खसोट बहुत ज्यादा है। हमारे उत्तराखंड में 500 से अधिक जल विद्युत परियोजनायें बन रही हैं, जिनमें से अधिकांश के विरोध में स्थानीय ग्रामीण लड़ रहे हैं। इनके बारे में मीडिया नहीं बताता या बताता भी है तो बेहद चलताऊ ढंग से। मंदाकिनी नदी पर बन रही परियोजना का विरोध करने वाले दो आन्दोलनकारी, सुशीला भंडारी और जगमोहन झिंक्वाण, अण्णा हजारे के उपवास शुरू करने से महज दो दिन पहले 60 दिन की कैद काट कर जेल से रिहा हुए थे। लेकिन यहाँ कुमाऊँ में अखबार पढ़ कर जानकारी हासिल करने वाले किसी पाठक को कानोंकान खबर भी नहीं हुई। खबर होती तो क्या पता कुछ उत्साही नौजवान उनके समर्थन में भी मोमबत्तियाँ जला कर हल्द्वानी की सड़कों पर निकल आते! जापान के फुकुशिमा परमाणु ऊर्जा संयंत्र में हुए विस्फोट के आलोक में देखें तो महाराष्ट्र, जहाँ के अण्णा हजारे रहने वाले हैं, के रत्नागिरि जिले के जैतापुर में बन रहे दुनिया के सबसे बड़े परमाणु ऊर्जा संयंत्र के खिलाफ चल रहे आन्दोलन को दबाने के लिये सरकार ने अघोषित आपातकाल लगा दिया है। वहाँ किसानों ने अपनी जमीन के मुआवजे के चैक लेने से इन्कार कर दिया तो उन्हें जेलों में डालना शुरू कर दिया गया। प्रेस काउंसिल के निवर्तमान अध्यक्ष न्यायमूर्ति पी.वी. सावंत वहाँ जन सुनवाई के लिये जाने लगे तो जिला प्रशासन ने उन्हें तत्काल जिले से बाहर खदेड़ दिया।

क्या आपने अपने अखबार में यह खबर पढ़ी ?

ऐसी घटनाओं की मीडिया लाईव तो क्या बासी कवरेज भी नहीं करता। फिर सामान्य व्यक्ति, टी.वी. चैनल का दर्शक या अखबार का पाठक, क्या जाने कि किस तरह बारूद के ढेर पर बैठा है यह देश, इसका लोकतंत्र ? वह तो अण्णा हजारे के उपवास को ही सामाजिक क्रांति मान लेगा!

दरअसल मीडिया कमाता है विज्ञापनों से और विज्ञापन मिलते हैं कॉरपोरेट घरानों से। बहुत से अखबार तो क़ॉरपोरेट घरानों द्वारा ही निकाले जाते हैं। फिर वह कॉरपोरेट षड़यंत्रों का भंडाफोड़ कर अपनी जड़ों में मठ्ठा क्यों डाले ? खुद इस मीडिया का अपना भ्रष्टाचार क्या कम है ? दो साल पहले लोकसभा चुनाव के दौरान ‘पेड न्यूज’ के मामले में मीडिया की इतनी थू-थू हुई कि प्रेस काउंसिल को उसकी जाँच करवानी पड़ी। साल भर से उस प्रकरण की जाँच रिपोर्ट बन कर तैयार है, लेकिन सार्वजनिक नहीं हो रही है। प्रेस काउंसिल में शामिल कॉरपोरेट अखबारों के प्रतिनिधि उसे सार्वजनिक होने ही नहीं दे रहे हैं। कॉमनवेल्थ खेलों में हुआ भ्रष्टाचार किसी अच्छी नीयत से उजागर नहीं हुआ। इसलिये उजागर हुआ कि सुरेश कलमाडी ने ‘टाईम्स ऑफ इंडिया’ की पेशकश को ठुकरा कर ‘हिन्दुस्तान टाईम्स’ को मीडिया पार्टनर बना दिया। बौखलाये टाईम्स ने कलमाडी की बखिया उखेड़ कर रख दी। उत्तराखंड में पिछली बरसात में तबाही हुई और केन्द्र से एक भारी भरकम राहत राशि प्रदेश सरकार को मिली तो यहाँ के बड़े दैनिकों में पैकेज झपटने की होड़ लग गई। कफनफरोश! नीरा राडिया प्रकरण में इस मीडिया और इसके कॉरपोरेट घरानों से अन्तर्सम्बन्ध बहुत साफ ढंग से सामने आये हैं। यही मीडिया ‘इंडिया अगेन्स्ट करप्शन’ में लोगों की अगुआई करता दिखाई दे रहा है। उसी की उछलकूद से अण्णा हजारे फरिश्ते जैसे दिखाई दे रहे हैं। अन्यथा इस देश में ऐसे लोग क्या कम हैं, जो सत्तर-अस्सी साल की उम्र में भी नौजवानों जैसे उत्साह से कॉरपोरेट गुलामी के खिलाफ लड़ रहे हैं….. रात-दिन देश के कोने-कोने में लोगों से बातचीत कर रहे हैं। उनके लिये इन अखबारों में सिंगल कॉलम की खबर छापने की जगह नहीं है। अण्णा साहब की नीयत चाहे जितनी साफ हो, संकल्प चाहे जितना बड़ा हो राजनैतिक समझ की इतनी कमी है कि नरेन्द्र मोदी के विकास के मॉडल को आदर्श बता दे रहे हैं।

भ्रष्टाचार भारतीय जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया है। जैसे बुग्यालों की स्वच्छ हवा में रहने के बाद किसी महानगर के प्रदूषित वातावरण में रहने पर महसूस होता है, वैसा ही किसी ईमानदार देश के नागरिक को भारत में आने पर लगता होगा। किसी चीज के लिये लाईन तोड़ने से लेकर छोटी-मोटी रिश्वत देना हमारे लिये सामान्य बात है। कई बार तो वह जरूरी भी हो जाता है। नौकरी पाने के लिये तो कितनी-कितनी घूस देनी पड़ती हैं। अब तो हम ईमानदारी पचा भी नहीं पाते। कभी कानून को सख्ती से लागू करवाने वाला कोई ईमानदार अधिकारी आ जाये तो उसका बोरिया-बिस्तर बँधवाने के लिये जरा भी देर नहीं करते। सब लोग एकजुट हो जाते हैं। हमारे लोकतंत्र की यह खामी दिनोंदिन बढ़ती रही है। नब्बे के दशक में आर्थिक उदारीकरण लागू होने के बाद तो इसने सारी सीमायें तोड़ दी हैं। अब तो कहीं भी देखो इतने ‘हजार करोड़’ से कम की बात ही नहीं होती। कॉरपोरेटों ने सरकारें, सांसद, विधायक सब खरीद लिये हैं। खुल कर भ्रष्टाचार फैलाने वाले ये कॉरपोरेट घराने तो लोकपाल बिल के दायरे में आ ही नहीं सकते। हम बिकने के लिये तैयार मंत्रियों और नौकरशाहों पर नकेल डालने की कोशिश कर सकते हैं, लेकिन उन्हें खरीदने वालों का क्या किया जायेगा ?

फिर भी लोकपाल बिल बनना चाहिये। उसका बनना बेहद जरूरी है। लेकिन कानून बनने मात्र से क्या होता है ? हजारों तो हमारे यहाँ कानून हैं, जो या तो लागू नहीं हो रहे हैं या उनका दुरुपयोग हो रहा है। कानून को सख्ती और ईमानदारी से लागू करने के लिये जिस इच्छाशक्ति की जरूरत होती है, उसका हमारे लोकतंत्र में पूरी तरह अभाव है। अभी डेढ़ महीने पहले पाउच में गुटखा बिकना प्रतिबंधित किया गया था, क्या वह सचमुच लागू हो गया? क्या सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान रुक गया है? घरेलू हिंसा बन्द हो गई? हरिजन एक्ट या दहेज कानून क्या अपराधियों को दंडित करता है या फिर निर्दोषों को परेशान करता है? 2007 में आये वनाधिकार कानून से लाखों वनवासियों का जीवन बदल सकता था, लेकिन सरकारों ने उसे लागू करने में रुचि ही नहीं दिखाई। उससे पहले 73वें तथा 74वें संशोधन कानूनों में विकेन्द्रित शासन व्यवस्था लागू कर क्रांतिकारी परिवर्तन की तमाम संभावनायें थीं। उत्तराखंड में राज्य बनने के दस वर्ष बीत जाने पर भी पंचायती राज कानून अस्तित्व में ही नहीं आया है। वर्ष 2005 में सूचना का अधिकार कानून लागू होने वक्त ‘सिविल सोसाइटी’ में अत्यन्त उत्साह था। अण्णा हजारे उस कानून को लागू करवाने में भी अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर चुके हैं। लेकिन छः साल बाद उस कानून को लागू करने में अब ढीलापन आने लगा है। इस कानून को लेकर काम करने वाले सक्रिय कार्यकर्ताओं की हत्यायें शुरू हो गई हैं सो अलग। मानवाधिकार आयोग, महिला आयोग आदि तमाम आयोग अपनी विश्वसनीयता खो चुके हैं। तब इस बात की क्या गारण्टी है कि लोकपाल अपना काम यहाँ मुस्तैदी से करता रहेगा? लोकपाल भी तो एक प्रक्रिया के अन्तर्गत नियुक्त किया जायेगा। वह सत्ता से अपनी नजदीकियों के आधार पर ही नियुक्त होगा। जिस देश में एक ईमानदार न्यायाधीश दुर्लभ हो गया हो, वहाँ एक सुयोग्य लोकपाल ढूँढना असम्भव नहीं होगा क्या? अपराधियों की गिरफ्तारी के लिये पुलिस को मजबूर करने के लिये जनता को जिस तरह चक्काजाम कर दबाव बनाना पड़ता है, क्या उसी तरह हर बार जनता को सड़कों पर उतरना पड़ेगा कि लोकपाल फलाँ भ्रष्ट मंत्री या नौकरशाह के खिलाफ कार्रवाही करे।

इन तमाम जटिलताओं के मद्देनजर भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई एक पिकनिक जैसी कैसे हो सकती है? 1998 में जब बबनराव घोलप की मानहानि के सिलसिले में अण्णा साहब हजारे जेल जा रहे थे, तब घोलप के समर्थक अदालत के बाहर नारे लगा रहे थे, ‘घोलप तुम आगे बढ़ो, हम तुम्हारे साथ हैं।’ ऐसे चेहरे उस रोज जंतर-मंतर में भी दहाड़ रहे थे, ‘अण्णा तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं’ जब वह छोटी सी बच्ची अण्णा साहब को जूस पिला रही थी। यहाँ नैनीताल-अल्मोड़ा में तो वे थे ही। जनता के हित में अराजक ढंग से लड़ी जा रही किसी लड़ाई में ऐसे लोगों को अलग-थलग करना असम्भव सा होता है। कैमरों के आगे चेहरा दिखाने में वे सबसे आगे होते हैं।

मीडिया तो अपने पैसे बटोरने के लिये अब आई.पी.एल. की राह पर चल पड़ा है, लेकिन जो लोग अण्णा हजारे के अभियान के बहाने ईमानदारी से इस देश के हालात के बारे में सोचने लगे हैं, उन्हें अपनी समझ बढ़ानी होगी और अपने लड़ने की ताकत भी। अपने आसपास चल रहे जमीनी संघर्षों की पहचान करनी होगी और उनसे जुड़ना पड़ेगा। कोई भी ताकत जनता की ताकत से बड़ी नहीं होती। अण्णा हजारे प्रकरण में भी हमने यही देखा।
-राजीव लोचन साह,संपादक, नैनीताल समाचार.

Wednesday, May 04, 2011

गोल्ड कोस्ट- धूप नहाए पुरसुकून बीच






यह सचमुच आस्ट्रेलिया का सुनहरा तट है, एक और बहुत सुन्दर शहर। कोई 70 किमी. का विशाल समुद्री तट और साल में लगभग 300 दिन धूप से नहाए पुरसुकून बीच। दूर-दूर तक प्रशान्त महासागर का विस्तार। आसमान छूती अट्टालिकाएँ, जिनमें 77वीं मंजिल तक रिहायश वाले क्यू-1 टावर की 78वीं मंजिल से जो विराट और दिव्य दर्शन होते हैं तो पता चलता है कि इस शहर का नाम ‘गोल्ड कोस्ट’ क्यों पड़ा। 78वीं मंजिल की जिस खिड़की पर हम खड़े हैं उस पर लिखा है- ‘नजर की सीध में 16,083 किमी. दूर न्यूयार्क है’। वाह, क्या बात है!

एक तरफ गगनचुम्बी इमारतें और दूसरी तरफ अथाह जलराशि। धूप में नहाया समुद्र तट, सुनहरी रेत और ‘बीच-गार्डस’की सतर्क निगाहों की सुरक्षा में लहरों से खेलते सैलानी। हर साल एक करोड़ से ज्यादा पर्यटक गोल्ड कोस्ट आते हैं और उनमें भारतीयों की भी अच्छी खासी संख्या है। गोल्ड कोस्ट की सड़कों पर घूमते हुए हमें ‘शेर-ए-पंजब’, ‘इण्डियन फैमिली रेस्त्रां’, ‘ऊँ-इण्डिया हाउस’, ‘तन्दूरी हट’, ‘तन्दूरी प्लेस’ जैसे नाम-पट दिखाई देते हैं। ‘राज पैलेस’ में व्यास (पंजाब) से आई सिमी हमें खाना परोसती हैं तो उसकी लहराती लम्बी चोटी गोल्ड-कोस्ट में भारतीय ध्वज जैसी लहराती है। होटल के बाहर दीवार पर पोस्टर लगे हैं- ‘फॉर सेल’, निजी क्रूज की बिक्री की सूचना। सबसे सस्ता क्रूज चार मिलियन आस्ट्रेलियन डालर (करीब 20 करोड़ रु.) का है। हमारे स्थानीय साथी ग्रेग हमारे चौंकने पर हँसते हैं- ‘यहाँ आस्ट्रेलिया के सबसे अमीर लोग बसते हैं। शायद यह इसलिए भी गोल्ड-कोस्ट है!’

गोल्ड कोस्ट आने से पहले हम एक दिन ब्रिसबेन रुके थे, क्वींस लैण्ड प्रान्त की राजधानी, एक और खूबसूरत शहर, जहाँ इसी नाम की नदी शहर के बीच में बहती है जिस पर सिडनी हार्बर ब्रिज जैसी ऐतिहासिकता वाला स्टोन ब्रिज तो है ही, नदी के भीतर से गुजरने वाली टनल-रोड भी है। ब्रिसबन के इर्द-गिर्द बहुत से पर्यटक स्थल हैं लेकिन हमें करीब एक सौ किमी. दूर गोल्ड कोस्ट जाते हुए सिर्फ दो जगह रुकना था।

पहले आस्ट्रेलिया जू जिसके स्वस्थ्य पशु-पक्षियों, चुस्त कर्मचारियों और सनसनीखेज प्रदर्शनों को देखकर बरबस ही अपने अव्यवस्थित चिड़ियाघरों के मरियल जनवरों और बेहाल कर्मचारियों की याद हो आती है। लेकिन आस्ट्रेलिया जू का जिक्र होते ही सबसे पहले स्टीव इरविन याद आते हैं। सन् 2008 में ग्रेट बैरियर रीफ में शूटिंग के दौरान स्टिंग-रे के जहरीले दंश से स्टीव इरविंग की दर्दनाक मृत्यु नहीं हुई होती तो मार्च 2011 में आस्ट्रेलिया जू में हम उनसे मिलकर निश्चय ही गदगद होते। डिस्कवरी चैनल के जरिए अपने दुस्साहसिक कारनामों से विश्वविख्यात हुए स्टीव की मौत भारत में भी सुर्खियां बनी थी। आस्ट्रेलिया जू में हमें मगरमच्छों के साथ खेलते-हँसते स्टीव के पोस्टर ही पोस्टर दिखाई देते हैं। स्टीव की देखरेख में ही आस्ट्रेलिया जू को विश्वख्याति मिली, जहाँ आज भी उनके सहयोगी मगरमच्छों के साथ सनसनीखेज प्रदर्शन करते-कराते हैं।

गोल्ड कोस्ट के रास्ते का दूसरा पड़ाव था -ड्रीम लैण्ड, स्वप्न लोक जैसा ही। रहस्य-रोमांच और सनसनी से भरे मनोरंजन के एक से एक साधन। हम तो सिर्फ एक ‘टॉवर ऑफ टेरर’ का आनन्द लेकर ही आतंकित हो बैठे। जानते हैं क्या? खुली कारनुमा एक डिब्बा हमें ‘एल’ आकार की पटरी पर 160 किमी. प्रति घंटे की रफ्तार से 115 मीटर (38 मंजिल जितना ऊँचे) ऊपर ले गया, सिर्फ सात सेकण्ड में और उतनी ही तेजी से नीचे ले आया! हमारे मुँह से तो चीख भी न निकली थी। अब तक सोचकर सिहरन हो रही है, लेकिन वहाँ ऐसी कई सनसनियां थीं और उनका लुत्फ उठाते युवाओं की लम्बी कतारें लगीं हुई थीं।

बहरहाल, गोल्ड कोस्ट से हमारी वतन वापसी होती है।

Saturday, April 16, 2011

बीहड़ वन में पूरी नदी का गहरी खाई में गिरना






हाल की भारी वर्षा से उफनाई बैरन नदी भयानक शोर के साथ सैकड़ों फुट गहरी खाई में गिर रही है और वाष्प-कणों से भरा घना सफेद कोहरा खाई से ऊपर उठकर हरे-भरे जंगल में छा रहा है। पूरी की पूरी नदी को एक गहरी खाई में गिरते देखना रोमांचक दृश्य है।

हम कैर्न्स (आस्ट्रेलिया) के विश्व-सम्पदा घोषित ट्रॉपिकल रेन फॉरेस्ट अर्थात उष्ण कटिबंधीय वर्षा-वन के ऊपर से गुजरती ‘स्काई रेल’ के बैरन-फाल्स स्टेशन पर उतरे हैं। ‘स्काई रेल’ क्यों, रोप-वे यानी रज्जु मार्ग कहना चाहिए। 7.5 किमी लम्बी इस स्काई रेल में एक सौ से ज्यादा ‘गोण्डोला’ (केबिन) सुबह से शाम तक निरन्तर दौड़ते रहते हैं। बीच-बीच में स्टेशन बने हैँ जहाँ आप ‘गोण्डोला’ से उतर कर जंगल में इधर-उधर घूम सकते हैं और फिर किसी गोण्डोला में बैठकर आगे की यात्रा जारी रख सकते हैं।

यह स्काई रेल अत्यन्त समृद्ध वर्षा-वन के ऊपर से गुजरती है और आप गोण्डोला की शीशे की खिड़कियों से दूर-दूर तक फैली हरियाली, सुदूर कोरल-समृद्ध सागर और यहाँ-वहाँ बसी बस्तियाँ देख सकते हैं। यदि आपको हर चीज की अपने मुल्क से तुलना करने की बीमारी हो तो अफसोस कर सकते हैं कि हमने अपने ऐसे ही समृद्ध वनों को कितनी निमर्मता से नष्ट कर डाला है। बहरहाल, स्काई रेल इस वर्षा-वन के ऊपर आपको कोई डेढ़ घण्टे तक घुमाती और प्रकृति की विविध छवियाँ दिखाती है। वापसी भी स्काई रेल से करनी हो तो ढाई घण्टे लगेंगे, लेकिन हमें वापसी सड़क से करनी थी जो घने जंगल के बीच से गुजरती हुई अलग ही अनुभव से भर देती है।

कुराण्डा में रेन फॉरेस्टेशन नेचर पार्क में हमें रुकना था जहाँ कोआला को गोद में लेकर प्यार करने और आस्ट्रेलियाई आदिवासियों (एब-ओरिजिनल्स) के नृत्य-गीत देखने के बाद ‘आर्मी-डक’ से जंगल के बीहड़ कोनों की रोमांचक यात्रा करनी थी। आस्ट्रेलिया में आज यूरोपीय मूल के लोगों का कब्जा है और सारी समृद्धि व सत्ता उन्हीं के पास है जबकि मूल-आस्ट्रेलियाई वंचित समुदाय हैं। उनके संगठन बने हैं और आन्दोलन होते रहते हैं। आस्ट्रेलिया सरकार ‘एब-ओरिजिनल्स’ को बराबर के अधिकार और सत्ता में भागीदारी देने की बात भी करती है लेकिन उनके साथ भेदभाव साफ दिखाई देता है। बहरहाल, पर्यटकों के वास्ते ये मूल-आस्ट्रेलियाई प्रदर्शन की वस्तु भी हैं। इस नेचर पार्क में उनके नृत्य-गीत, भाले और बूमरैंग के प्रदर्शन पर्यटकों के मनोरंजन के लिए होते हैं।

बहरहाल, वर्षा-वन का असली आनन्द ‘आर्मी-डक’ से जंगल के बीहड़ की यात्रा में आता है। ‘आर्मी-डक’ ऐसा वाहन है जो ऊबड़-खाबड़ रास्ते, दलदल और पानी में भी मजे से चलता-तैरता है और हम देखते हैं ऐसा जंगल जिसमें मनुष्य का कोई दखल नहीं है। कोई फर्न सौ-डेढ़ सौ साल का पेड़ बन चुका है तो बड़े से पेड़ की शाखाओं के बीच से कोई बास्केट फर्न रोशनी और धूप पाने की लड़ाई जीतने की जद्दोजहद में व्यस्त है। हर तरफ वनस्पतियों में होड़ मची है। उनका भी अपना जीवन संग्राम होता है। विशाल भू-भाग और बहुत कम आबादी वाले आस्ट्रेलिया में प्राकृतिक संसाधनों पर कोई दबाव नहीं है। इसलिए ऐसे वन सुरक्षित हैं। हमारे यहाँ तो सुरक्षित वनों में भी माफिया की जबर्दस्त घुसपैठ है। फिर वही तुलना की बीमारी, मगर क्या कीजै!

समृद्ध वर्षा-वन की सुखद यात्रा का सुकून मन में भरे हम होटल लौट आए हैं। हाल के समुद्री चक्रवात की तबाही से उबरता कैर्न्स बहुत शांत है। यहाँ मानसून पूरी तरह आ चुका है। हल्की वर्षा में समुद्र में लंगर डाले क्रूज और जेट बोट का विशाल बेड़ा होटल की खिड़की से दिखाई दे रहा है। इन्ही से पर्यटक विश्वविख्यात ग्रेट बैरियर रीफ की रोमांचक यात्रा पर जाते हैं।

Thursday, April 07, 2011

रत्याली [रतजगा]

हिंदी के अत्यत संवेदनशील कवि हरीश चंद्र पाडे की "उत्तरा" में छपी यह कविता पढ कर हम पति-पत्नी कल से बहुत द्रवित और उद्वेलित हैं और बार बार इसे पढ रहे है. आप भी ज़रूर पढें--



इस घर से वधू को लेने गई है बारात

इस घर में रतजगा है आज



इस समय जब वहां बाराती थिरक-थिरक कर साक्ष्य बन रहे होंगे

जीवन के एक मोड का

यहां औरतें गा कर नाच कर स्वांग रच -रच कर

लंबी रात के अंतराल को पाट रही हैं



वहां जब पढे जा रहे हैं झंझावातों में भी साथ रहने के मंत्र

और सात जन्मों के साथ की आकांक्षा की जा रही है

यहां जीवन भर साथ चलते-चलते थकी औरतें

मर्दों का स्वांग रच रही हैं



इनके पास विषय ही विषय हैं

स्वांग ही स्वांग



प्रताडनाएं, जिन्होंने उनका जीना हराम कर रखा था

अभी प्रहसनों में ढल रही हैं

डंडे कोमल-कोमल प्रतीकों में बदल रहे हैं

वर्जनाएं अधिकारों में ढल रही हैं



ये मर्द बन कर प्रेम कर रही हैं बुरी तरह

अपनी औरत को बुरी तरह फटकार रही हैं

जूतों की नोकों को चमका रही हैं बार-बार

मूछों में ताव दे रही हैं



जो आदमियों द्वारा केवल आदमियों के लिये सुरक्षित है

उस लोक में विचर रही हैं

पिंजरे से निकल कर कितना ऊंचा उडा जा सकता है

परों को फैला कर देख रही हैं



वह टुकडा

जो द्वीप है उनके लिये

उसे महाद्वीप बना रही हैं



अपने वास्तविक संसार में लौटने के पहले

कल सुबह एक और औरत के आने के पहले

Wednesday, April 06, 2011

सिडनी ओपेरा हाउस : हार्बर पर उगा अद्वितीय फूल





आस्ट्रेलिया के चार शहरों की यात्रा में हमारा पहला पड़ाव सिडनी था और वहां पहला ही साक्षात्कार सिडनी ओपेरा हाउस की सम्मोहित कर देने वाली डिजाइन से होता है। क्या ही खूबसूरत इमारत है। जितनी बार जितने कोणों से देखिए इसका नया ही आकर्षक रूप सामने आता है और यह तो हमें दूसरी शाम पता चला कि सिडनी ओपेरा हाउस का असली, भव्य दर्शन तो समुद्र में थोड़ा दूर जाकर होता है। जब हमने क्रूज की ढा़ई घण्टे की यात्रा में समुद्र में दूर से ओपेरा हाउस को देखा तो अहसास हुआ कि ढ़लती शाम की सुनहरी धूप और रात की जगमग रोशनी में ओपेरा हाउस का सौन्दर्य कई गुणा बढ़ गया है। हार्बर पर उगे किसी अद्वितीय फूल की तरह। समुद्र की लहरें निरन्तर जिसके चरण पखारती हों और सुबह से रात तक की विविध रोशनियाँ जिसका पल-पल नया ‍‌श्रंगार करती हों, ऐसे ओपेरा हाउस की छवि बस मन में टंकी रह जाती है।

और जब ओपेरा हाउस का वाक्पटु गाइड उसके निर्माण के इतिहास के रोचक और उदास प्रसंगों का बखान करता है तो उस दिव्य छवि में एक कसक भी समा जाती है। विश्वव्यापी डिजायन प्रतियोगिता के बाद चयनित जिस डच आर्कीटेक्ट उटजन ने 1959 में इसे अथक परिश्रम और लगन से बनवाना शुरू किया, वही इसका तैयार भव्य रूप कभी नहीं देख पाया। निर्माण के दौरान इतनी मुश्किलें आईं और अप्रिय विवाद उठे कि उटजन को इसके निर्माण से अलग कर दिया गया। बाद में उटजन सही साबित हुआ और उसी के मूल डिजायन और निर्देशों के तहत ओपेरा हाउस पूरा हुआ मगर 1973 में इसके उद्घाटन के समय उटजन का नाम तक नहीं लिया गया था। हालाँकि बाद में सिडनी ओपेरा हाउस ट्रस्ट ने उटजन को पूरा श्रेय दिया और उसे ससम्मान सिडनी आमंत्रित भी किया लेकिन उटजन अपनी इस अद्वितीय कृति को देखने फिर कभी सिडनी नहीं आया। हाँ, नवंबर 2008 में अपनी मृत्यु से पहले उसने ओपेरा हाउस के रखरखाव और भविष्य के लिए कुछ नई परिकल्पनाएँ जरूर भेजीं। आज सिडनी में उटजन को बड़े सम्मान के साथ याद किया जाता है और उसकी स्मृति में ओपेरा हाउस में बाकयदा ‘उटजन रूम’ भी बनाया गया है। उसे इस डिजायन के लिए आर्कीटेक्चर का सर्वोच्च सम्मान मिला और सिडनी ओपेरा हाउस को वर्ल्ड हेरिटेज सूची में जगह। इस इमारत में पाँच अलग-अलग आकार-प्रकार के थिएटर हैं जहाँ जाज, बैले, शास्त्रीय संगीत, नाटक, नृत्य सभी तरह के कार्यक्रम निरंतर होते रहते हैं-एक वर्ष में करीब 2500 प्रदर्शन!

सिडनी ओपेरा हाउस से नजर घूमी नहीं कि हमें ऐतिहासिक और आलीशान सिडनी हार्बर ब्रिज के दर्शन होते हैं। छह वर्ष के परिश्रम से बना और मार्च 1932 में पूरा हुआ यह पुल दुनिया का सबसे बड़ा (लम्बा नहीं) इस्पात चाप वाला पुल है। इसमें इतना लोहा लगा है कि उसे रंगने में 60 बड़े खेल मैदानों को रंगने के बराबर पेंट खर्च होता है और बड़े-बड़े जहाज इसके नीचे से आते-जाते हैं। इसके उद्घाटन का एक रोमांचक किस्सा भी है। 19 मार्च 1932 को भव्य समारोह में न्यू साउथ वेल्स के प्रीमियर जैक लांग इसका फीता काटते कि उससे पहले ही फौजी वेश में दौड़ते आए एक घुड़सवार ने अपनी तलवार से वह फीता काटकर जनता की ओर से पुल का उद्घाटन कर दिया था। उसे गिरफ्तार करके और दोबारा रिबन बाँधकर पुल का औपचारिक उद्घाटन किया गया। खैर, ओपेरा हाउस बनने से पहले यह पुल आस्ट्रेलिया, विशेषकर सिडनी का अन्तर्राष्ट्रीय पहचान प्रतीक था। अब ओपेरा हाउस इस पर भारी पड़ रहा है, हालाँकि सिडनी हार्बर ब्रिज आज भी उतना ही दर्शनीय और लोकप्रिय है और साहसी पर्यटक चार सौ सीढ़ियाँ चढ़-उतरकर सिडनी हार्बर ब्रिज के चाप (आर्क) की रोमांचक यात्रा करने से नहीं चूकते ।

सिडनी का तीन-चौथाई आकर्षण हार्बर के इर्द-गिर्द ही फैला है-ओपेरा हाउस और हार्बर ब्रिज के अलावा कोआला और कंगारू के स्नेहिल सानिध्य वाला टरोंगा जू, हजारों समुद्री प्राणियों का रोचक संसार दिखाने वाला सिडनी एक्वेरियम और वाइल्ड लाइफ वर्ल्ड, कैप्टन कुक की आस्ट्रेलिया की खोज और बाद की कई प्राचीन समुद्री यात्राओं का इतिहास संजोए आस्ट्रेलियन नेशनल मेरीटाइम म्यूजियम, नेशनल बाटेनिक गार्डन, आदि आकर्षण हार्बर पर ही हैं। हार्बर किनारे के बेहतरीन रेस्त्रां सुबह से रात तक खान-पान के शौकीनों से गुलजार रहते हैं। ‘एब-ओरिजनल्स’ अर्थात आस्ट्रेलियाई मूल के आदिवासी अपने लोक-करतब दिखाने हार्बर पर ही जुटते हैं तो हिन्दुस्तानी कस्बों की तरह सड़क छाप सर्कस या करतब दिखाकर पैसा मांगने (कमाने) वाले फुटपाथिए-करामाती भी हमें सिडनी हार्बर पर ही मिले। हार्बर पर आप घण्टों बैठे रह सकते हैं, आस्ट्रेलिया की बीयर अथवा वाइन का निर्मल आनन्द ले सकते हैं और मन करे तो स्पीड बोट का रोमांच उठा सकते हैं, जो समुद्र में 80 किमी प्रति घण्टे की रफ्तार से दौड़ते हुए सहसा पूरा ब्रेक लगाकर आपको लहरों पर चकरघिन्नी खिलाती और दाँएं-बाएं उछालती है। हमारे मुँह से तो चीख ही निकल गई थी और तीखा खारा पानी खुले मुँह में भर गया था। यह दुस्साहिक रोमांच पसंद न हो तो, आलीशान क्रूज भी हार्बर पर ही मौजूद हैं जो ढाई-तीन घण्टे की मादक यात्रा में बेहतरीन खान-पान, डांस और विविध मनोरंजन पेश करते हैं।

एक और रोमांचक आकर्षण सिडनी टावर है जो जमीन से 268 मीटर (879 फुट) ऊपर ले जाकर सिडनी का चौतरफा विहंगम दृश्य दिखाता है। अंतरिक्ष यात्री की सी पोशाक पहनाकर और कमर से बंधी जंजीरों को ‘स्काई वाक’ की रेलिंग से सुरक्षित कर आपको टावर के चारों ओर जैसे आकाश-मार्ग पर ही घुमाया जाता है। पैरों के नीचे शीशे की फर्श होती है जो हवा में खड़े होने की प्रतीति कराती है और ऊँचाई से डरने वालों की सांसें थाम देने को काफी है। हवा के तेज थपेड़ों के बीच टावर के चारों ओर घूमते हुए आप सिडनी के हर कोण से दर्शन करते हैं। प्रशान्त महासागर का नीला विस्तार अनन्त की ओर ले जाता है और हम दार्शनिक होने लगते हैं लेकिन फिर टावर की तेज रफ्तार लिफ्ट हमें 40 सेकेण्ड में 268 मीटर से जमीन पर उतार लाती है।

बोण्डाई से बोंटी बीच की कोई 4 किमी की पैदल यात्रा से हमारे सिडनी दर्शन का समापन होता है। सिडनी शहर से 8 किमी दूर आस्ट्रेलिया के सबसे सुन्दर समुद्र तटों में शुमार बोण्डाई से बोंटी तक का यह छोर सुनहरी रेत पर छोटी-बड़ी लहरों की अठखेलियों से लेकर चट्टानों पर उनके आक्रामक प्रहार तक का विविध नजरा पेश करता है। प्रशान्त महासागर के नीले विस्तार से उठती धवल-उच्छृंखल लहरों में तैरते, भीगते, बैठे-लेटे, नंगे-अधनंगे सैलानियों से पूरा तट भरा पड़ा है। भारी भीड़ के बावजूद समुद्र तट की स्वच्छता ध्यान खींचती है। स्वर्णिम रेत वाले इस बेहद खूबसूरत समुद्र तट पर तरह-तरह से अपनी ही मस्ती में डूबे लोगों को देखकर लगता है संसार में कहीं कोई कष्ट और अभाव नहीं है, आनन्द ही आनन्द है!

यहाँ यह सोचना भी जैसे इस आनन्द लोक में खलल डालना है। एक बड़ी शैतान लहर मुझे पूरा भिगोकर जैसे सचेत कर जाती है।

Sunday, March 27, 2011

समृद्धि लोक में जीवन संग्राम


विशाल समृद्ध भू-भाग और सीमित आबादी, अच्छी कमाई, घर-घर में न्यूनतम दो महँगी कारें और ऐशो-आराम का पूरा लुत्फ उठाते लोग। यूं देखने पर आस्ट्रेलिया खाये-अघाये लोगों लोगों का मुल्क लगता है। है भी, लेकिन इस समृद्धि-लोक में जीवन की जंग लड़ रहे लोग भी हैं। यह अलग बात है कि उनका चेहरा दयनीय या रुलंटा नहीं बल्कि तमाशे या मनोरंजन की वस्तु के रूप में हँसता-खिलखिलाता ही सामने आता है।

सबसे पहले मूल आस्ट्रेलियाई आदिवासी हैं, जिन्हें यहां ‘एबोरिजनल्स’ के नाम से जानते-पुकारते हैं। आज के आस्ट्रेलिया में सत्ता और समृद्धि के समस्त संसाधनों पर यूरोपीय मूल के लोगों का कब्जा है और ‘एबोरिजनल्स’ वंचित समुदा्य हैं। सन् 1770 में कैप्टन कुक की आस्ट्रेलिया की खोज के बाद से आस्ट्रेलिया ब्रिटिश उपनिवेश बना और कम से कम 40 हजार साल से वहाँ रह रहे मूल आस्ट्रेलियावासियों को मारा-खदेड़ा जाने लगा। प्रथम विश्व युद्ध के बाद ब्रिटिश उपनिवेश से मुक्त होने तक मूल आस्ट्रेलियाई निवासियों की संख्या बहुत कम हो गई थी। आज भी मूल आस्ट्रेलियाईयों की आबादी आस्ट्रेलिया की कुल जनसंख्या की दो-ढाई प्रतिशत ही है। आज भी वे उपेक्षित-वंचित हैं, उनके संगठन बने हैं और यदा-कदा आंदोलन-प्रदर्शन-सेमिनार भी वे अपने हक के लिए करते रहते हैं।

तो, आज के समृद्ध आस्ट्रेलिया में एक सतत संघर्ष इन मूल निवासियों का है जो मुख्य धारा से दूर धकेल दिए गए थे. आज उनमें से कई अच्छी निजी व सरकारी सेवाओं में भी हैं, मगर ‘वन ऑफ देम’ (उनमें से एक) कह कर इंगित किए जाते हैं। कई मूल निवासी परिवार जो ज़्यादा पढ़-लिख नहीं पाए हैं, अपनी पुरातन कला-संस्कृति का जगह-जगह प्रदर्शन करके रोजी-रोटी कमाते हैं। हमने उन्हें सिडनी हार्बर जैसी लोकप्रिय और व्यस्त जगह पर खुले में बैठे ‘डिजेरिडू’ (लकड़ी का भ्वांकरा जैसा) बजाते, बूमरैंग और लकड़ी के भाले फेंकने का प्रदर्शन और अन्य करतब करते देखा। लोग उनके सामने रखे बक्से में डॉलर डाल रहे थे। ज़्यादातर पर्यटन स्थलों पर इस तरह के प्रदर्शन खुद सरकारी स्तर पर भी कराए जाते हैं। सिडनी के म्यूज़ियम में ‘एबोरिजनल्स’ की समृद्ध लोक कला-संस्कृति की बड़ी दीर्घा है। हमने कैर्न्स के ‘रेनफॉरस्टेशन नेचर पार्क’ में भी उनके ऐसे ही कला-प्रदर्शन देखे जहॉ पर्यटक बाकायदा टिकट लेकर जाते हैं। आस्ट्रेलियाई सरकार के तमाम दावों के बावजूद आस्ट्रेलिया के मूल निवासी अपने अस्तित्व और अधिकारों के लिए एक कमजोर सी लड़ाई लड़े जा रहे हैं। सिडनी के रॉयल बॉटेनिक गार्डन में हमें उनका एक बड़ा-सा पोस्टर दिखाई दिया, जिसमें लिखा था- ‘‘आप नए आस्ट्रेलियाई हैं, लेकिन हम पुराने आस्ट्रेलियाई हैं। हम सिर्फ न्याय, शालीन व्यवहार और निष्पक्षता की माँग कर रहे हैं। क्या यह माँग बहुत ज़्यादा है?’’

सिडनी हार्बर पर ही हम शनिवार-रविवार को, जब वहाँ खूब भीड़ जुटती है, तरह-तरह के शारीरिक करतब करती टीमों को देखते हैं। उन्हें देखकर भारतीय सड़कों के किनारे रस्सी पर चलते युवक या लोहे के नन्हे छल्ले से अपना शरीर पार करती लड़की, जैसे विविध करतब दिखाकर रोजी-रोटी कमाते लोगों की याद आती है। यानी वंचितों का रोटी का संघर्ष सब जगह एक जैसा है। एक युवक को तो हमने पूरे साढ़े पाँच फुट की लचीली, खूबसूरत गुड़िया के साथ बॉल-डांस करते देखा। वह डांस का पद-संचालन ही नहीं सिखा रहा था, बल्कि भड़काऊ संगीत पर कुशल नर्तक जोड़ी के ताली-पीटू कौशल भी दिखा रहा था। उस पर भी डॉलर और सीलिंग न्यौछावर हो रहे थे।

और सिडनी हार्बर के पीछे की एक व्यस्त सड़क के फुटपाथ पर अपनी टोपी धरे, सिर झुकाए एक व्यक्ति को दो-दिन लगातार देखने के बाद हमने जिज्ञासा की तो पता चला कि वह भीख मांगता है और अक्सर इसी तरह बैठा मिलता है। हमने सोचा था, आस्ट्रेलिया जैसे समृद्ध देश में कोई भीख नहीं मांगता होगा!

रात को थके-मांदे जब हम होटल लौटे तो लेटते-लेटते सुबह के ‘सिडनी मार्निंग हेरल्ड’ पर नजर डाली। उस दिन की लीड थी - ‘सिडनी के अस्पतालों में ऑपरशन टलने से सैकड़ों मरीज परेशान।’ दूसरी लीड थी-‘सिडनी पुलिस नशीले पदार्थों का व्यापार करने वाले बड़े लोगों पर तो हाथ डाल नहीं पाती, शरीफ नागरिकों को जरूर खूब तंग करती है।’

आस्ट्रेलिया की समृद्धि और मस्ती का आतंक हमारे दिल-दिमाग से उतरने लगा और फिर हम सुकून से सो पाए।

Tuesday, February 08, 2011

खिलने को है व्याकुल होता इन प्राणों में कोई.

चन्द्र कुंवर बर्त्वाल(१९१९-१९४७) प्रक्रिति के अद्भुत चितेरे कवि थे.बहुत कम उम्र में उनका निधन हो गया था. उनका रचना काल १० साल से भी कम रहा. वसन्त पंचमी पर आपको पढाता हूं चन्द्र कुंवर की यह अद्भुत कविता--
"अब छाया में गुंजन होगा, वन में फूल खिलेंगे/
दिशा-दिशा से अब सौरभ के धूमिल मेघ उठेंगे.
अब रसाल की मंजरियों पर पिक के गीत झरेंगे/
अब नवीन किसलय मारुत में मर्मर मधुर करेंगे.
जीवित होंगे वन निद्रा से, निद्रित शैल जगेंगे/
अब तरुओं में मधु से भीगे कोमल पंख उगेंगे.
पद-पद पर फैली दूर्वा पर हरियाली जागेगी/
बीती हिम रितु अब जीवन में प्रिय मधु रितु आयेगी.
रोयेगी रवि के चुम्बन से अब सानंद हिमानी/
फूट उठेगी अब गिरि-गिरि के उर से उन्मद वाणी.
हिम का हास उडेगा धूमिल सुरसरि की लहरों पर/
लहरें घूम-घूम नाचेंगी सागर के द्वारों पर.
तुम आओगी इस जीवन में कहता मुझसे कोई/
खिलने को है व्याकुल होता इन प्राणों में कोई."

Saturday, October 02, 2010

गिर्दा : खुद को बटोरे बिना ही चल दिये, गुरू!

नवीन जोशी
‘नैनीताल समाचार’ की फाइलें पलट रहा था। पीले और भुरभुरे हो चुके पन्नों से गिर्दा महकने लगे। ‘अच्छा ऐसा ऽऽऽ!’ कहकर गिर्दा किसी पन्ने के बीच से चहकने लगते, ‘हड़ि ’ कहकर जैसे पूरी व्यवस्था को दुत्कारने लगे। ‘शिबौ-शिब’ उच्चार कर सत्ताधारियों की खिल्ली उड़ाने लगते। किसी शीर्षक से उनका रौद्र रूप प्रकट होता तो होली के बोलों पर आधारित कोई हेडिंग हिया में कुरकुताली लगाने लगती। नंदप्रयाग में गोली चलती तो गिर्दा की गजल-गोली ‘समाचार’ के पन्नों से जवाबी फायर करने लगती- ‘गोलियाँ कोई निशाना बाँधकर दागी थीं क्या/खुद निशाने पर पड़ी आ खोपड़ी तो क्या करें।’ कहीं फैज, कहीं साहिर, कहीं कबीर, कहीं नजीर, कहीं गौर्दा, कहीं सीधे लोक से बनाए गए प्रयोग-‘जब से दशरथ ललन एम पी हो गए, हुए कृष्ण एमएलए तो मैं क्या करूं…।’ अभिव्यक्ति को सटीक और मारक बनाने के लिए कहाँ-कहाँ उड़ जाता था गिर्दा और क्या-क्या चुन लाता था….। ट्रेडिल प्रेस पर छपने वाले अखबार में पीतल के रूल को मोड़-मरोड़ कर देश का नक्शा छापने की जिद वही सफल करा सकता था।

पर यह तो बहुत बाद की बातें हैं।

मैंने पहले-पहल गिरीश तिवाड़ी को 1971 में आकाशवाणी, लखनऊ के स्टूडियो में देखा था। कुमाउंनी-गढ़वाली बोली का ‘उत्तरायण’ कार्यक्रम, स्वतंत्रता दिवस, वसंत पंचमी आदि मौकों पर आमंत्रित श्रोताओं के समक्ष लोक कवि गोष्ठी आयोजित किया करता था। वह ऐसी ही एक कवि गोष्ठी थी, जिसके बारे में मुझे चन्द्रशेखर पाठक नामक उस लम्बे-पतले युवक ने बताया था जो पीडब्ल्यूडी में दिहाड़ी पर क्लर्की करते हुए संयोग से हमारी कैनाल कालोनी में सनवाल जी के कमरे में रहने आ गए थे और जो कुछ समय बाद दफ्तर में किसी बात से आहत होकर, अस्थाई नौकरी को लात मार कर वापस अल्मोड़ा लौट गए थे और कालान्तर में इतिहासविद प्रो. शेखर पाठक के नाम से विख्यात हुए।

खैर, तो ‘उत्तरायण’ की कवि गोष्ठी में उस शाम बृजेन्द्र लाल साह, पार्वती उप्रेती, चारु चन्द्र पाण्डे, लीलाधर जगूड़ी, जीवानन्द श्रीयाल, गोपाल दत्त भट्ट आदि के बीच एक गिरीश तिवाड़ी नाम्ना सुदर्शन कवि भी थे, जिन पर तब तक ध्यान नहीं गया था जब तक कि कविता सुनाने की उनकी बारी नहीं आ गई। उन्होंने उस दिन अपनी ‘वसंत’ कविता सुनाई, बल्कि गाई- ‘रात उज्याली, घाम निमैलो, डान-कानन केसिया फुलो। हुलरी ऐगे वसंत की परी, फोकीगो जाँ-ताँ रंग पिंहलो ऽऽऽ…।’ उनके मीठे गले ने, गीत ने, शब्दों को उच्चारने, हाथों को नचाने और चेहरे पर वसंत का उल्लास उतार लाने के अंदाज ने उस दिन आकाशवाणी, लखनऊ के पुराने स्टूडियो के कक्ष नंबर एक में बीस-पच्चीसेक श्रोताओं के बीच वह समा बाँध दिया था जिसे कहते हैं-महफिल लूट लेना!

मुझे याद है, उस दिन आमंत्रित कवियों को दो दौर में अपनी कविताएँ पढ़नी थीं। रिकॉर्डिंग का समय निर्धारित था। वंशीधर पाठक जिज्ञासु और जीत जरधारी की जोड़ी बारी-बारी से संचालन कर रही थी। 40-45 मिनट की निर्धारित अवधि में रिकार्डिंग पूरी कर गोष्ठी का औपचारिक समापन कर दिया गया था, लेकिन अपनी बोलियों के काव्य-रस से सराबोर प्रवासी श्रोता और भी सुनना चाहते थे। सो, रिकार्डिंग बन्द करने के बाद देर तक गोष्ठी चलती रही। चारु चन्द्र पाण्डे, जगूड़ी, जीवानन्द श्रीयाल और गोपाल दत्त भट्ट की उस दिन सुनी कुमाउंनी-गढ़वाली कविताओं की मुझे आज थोड़ी-थोड़ी याद है। लेकिन गिरीश तिवाड़ी की कविताएँ ही नहीं, उनका उस दिन का पूरा गेट-अप भी स्मृति में जस का जस टँगा हुआ है। इसका एक कारण यह भी जरूर होगा कि कालान्तर में उनसे संबंध प्रगाढ़ होने पर वे कविताएँ कई बार सुनीं लेकिन उस दिन काली टोपी, गोरे मुखड़े पर करीने से बनी घनी काली दाढ़ी और काली शेरवानी में सबसे अलग और खूब फब रहे गिरीश तिवाड़ी की वह छवि मन से कभी उतरी ही नहीं। तब भी नहीं जबकि बाद में वे बिल्कुल अराजक, बल्कि अघोरी जैसा जीवन जीने लगे थे और हम सबके आत्मीय हो चुके फक्कड़ गिर्दा का उस सुदर्शन कवि गिरीश तिवाड़ी से रिश्ता जोड़ना अकल्पनीय जैसा लगने लगा था। हाँ, अपने फक्कड़पन के शुरूआती दिनों में भी गिर्दा को अपनी दाढ़ी से कुछ-कुछ लगाव रह गया था और तल्लीताल डाँठ के नुक्कड़ वाली नाई की दुकान में कभी-कभार वे लखनउवा खत बनवा लिया करते थे। नाई की दुकान के ठीक बगल में कबाब की दुकान भी हुआ करती थी, जहाँ से गाहे-ब-गाहे कबाब खाना-खिलाना भी उन्हें पसंद था।

तो, 1971 की उसी कवि गोष्ठी में गिर्दा ने अपनी ‘चिट्ठी’ कविता भी सुनाई थी, जिसने पहाड़ की नराई में व्याकुल रहने वाले मुझ किशोर को भीतर तक छू लिया था। अपने घर-गाँव और इजा-दीदी की नराई फेरने के लिए मैं तब अपने कमरे के एकान्त में कागज काला किया करता था। कविता, कहानी, उपन्यास से मेरा कोई वास्ता पड़ा न था। उस दिन जब गिर्दा ने सुनाया-‘पै के करूँ, पापी पेटैल् छोड़ै दे म्योर मुलुक मैथैं/नन्तर क्वे काटि लै दिनो मैं कैं ताँ नि छोड़न्यू मैं’ तो मेरी नराई को जैसे किसी ने वाणी दे दी हो। वहाँ उतने लोग न होते तो मैं शायद रो ही पड़ता।

कवि गोष्ठी के बाद सब लोग कवियों को बधाई दे रहे थे, बात कर रहे थे। परम संकोची मैं एक कोने में खड़ा गिरीश तिवाड़ी को देखे जा रहा था और उनसे बात करना चाहता था। चन्द्रशेखर पाठक शायद उस शाम वहाँ पहुँच नहीं पाए थे। किसी तरह हिम्मत करके गिरीश तिवाड़ी के पास गया और ‘चिट्ठी’ कविता की बाबत पूछने लगा। वे बहुत स्नेह से मिले थे, जैसा कि उनका स्वभाव अन्त तक सबके लिए बना रहा। प्यार से बोले थे-‘‘भुला, एक किताब छपी छु-शिखरों के स्वर। वी में छु ये चिट्ठी। तु जिज्ञासु ज्यु थैं माँगि ल्हिये। उनार पास छन किताब।’’

जिज्ञासु जी से भी इतना परिचय कहाँ था। उस कवि गोष्ठी की मीठी स्मृतियाँ और ‘चिट्ठी’ कविता की कसक मन में भरे लौट गया था। उस दिन से मैं भी उसी तरह की कविताएँ-गीत लिखने की कोशिश करने लगा था, हालाँकि एक भी पंक्ति कायदे की नहीं बनती थी। लेकिन तब तो यही लगता था कि बस, अब बन ही गया कवि…..।

कुछ समय बाद जिज्ञासु जी से परिचय भी चन्द्रशेखर पाठक ने ही करवाया, जो तब तक मेरा शेखर दा या ददा बन चुका था। शेखर दा तब दफ्तर से बचे समय में कहानी-कविता लिखता, दिनमान पढ़ता और नाक की डण्डी में उग आए एक दाने को अंगुली से लगातार घिसता हुआ अरविन्दो या चे ग्वेवारा की, मेरे लिए अबूझ-सी किताबों, में डूबा रहता था। बीच-बीच में मैं उसे अपने रचे ‘महान साहित्य’ से तंग किया करता था। शेखर दा का साल भर या शायद आठ-दस महीने ही लखनऊ के हमारे मुहल्ले में रहना मेरे लिए दिशा-निर्देशक बन गया।

जब शेखरदा पहाड़ लौट गया और अल्मोड़ा महाविद्यालय से इतिहास में एम.ए. करने लगा तब भी ‘लक्ष्मेश्वर, अल्मोड़ा’ से उसके पोस्टकार्ड बराबर आते रहते। जब भी वह लखनऊ आता मुझसे मिलने कैनाल-कालोनी जरूर आता। एक बार उसके साथ युवकों की पूरी टोली ही थी। अपने ही अंदाज में शेखरदा ने परिचय कराया-‘ये शमशेर सिंह बिष्ट, अध्यक्ष हैं अल्मोड़ा डिग्री कालेज छात्र संघ के। ये विनोद जोशी-महामंत्री, ये हरीश जोशी…।’ पहाड़ के उन ऊर्जावान युवकों से मिलना रोमांचक अनुभव था। वे पहाड़ के किसी विधायक के यहाँ रॉयल होटल में रुकते थे, जो आकाशवाणी भवन के पड़ोस में ही था। मैं अधिक से अधिक समय उन युवकों के साथ बिताता.
एक बार ऐसा संयोग हुआ कि गिरीश तिवाड़ी आकाशवाणी के कवि सम्मेलन में आए और अल्मोड़ा से शमशेर, आदि भी विधायक निवास में ठहरे थे। उस पहली कवि गोष्ठी को दो-तीन बरस हो गए थे। ‘चिट्ठी’ कविता मन में गूँजती रहती थी और जिज्ञासु जी से ‘शिखरों के स्वर’ माँगने की हिम्मत पड़ी न थी। उस बार मैंने अपने प्रिय कवि से ही कहा-‘गिर्दा, शिखरों के स्वर मुझे मिली नहीं।’ उन्होंने क्या कहा मुझे याद नहीं। कवि सम्मेलन के तुरन्त बाद मैं शमशेर के साथ कहीं चला गया। गिर्दा बाद में शमशेर से मिलने गए होंगे मगर कमरे में कोई नहीं मिला। गिर्दा को उसी रात वापस लौटना था। दो चार दिन बाद जब मेरी जिज्ञासु जी से भैंट हुई तो वे मुझे अपने घर ले गए और एक किताब मुझे दी। किताब का नाम था-‘शिखरों के स्वर।’ मैं बहुत खुश हो गया। किताब खोली तो उसके भीतर एक छोटा सा पत्र रखा था-

‘प्रिय नवीन! शम्भू कैं चाँण हूँ वीक कमार में गैयाँ, उ नि मिल। उ थैं कै दियै गिरदा न्है गो कै। त्वील ‘शिखरों के स्वर’ जिज्ञासु दाज्यू थैं मांङी न्हैं। मांङि ल्हियै। बाँकि फिर भैंट हुण पर। पहाड़ आलै तो भैंट करियै।’

पत्र के नीचे हस्ताक्षर थे जो मैंने पहले कभी नहीं देखे थे लेकिन समझना भी मुश्किल नहीं था कि किसके हैं। ‘ग’ में खूब लहरदार होकर काफी ऊपर तक चली गई छोटी ‘इ’ की मात्रा से शुरू हुए वे हस्ताक्षर बाद में हमारे बहुत अजीज दस्तखत बने। वह चिट्ठी ‘शिखरों के स्वर’ की उस प्रति में आज तक मेरे पास सुरक्षित है। उसमें तारीख नहीं पड़ी है लेकिन यह शायद 1975 की बात है।

आज वह चिट्ठी देखता हूँ तो पाता हूँ कि अंत तक गिर्दा का हस्तलेख और हस्ताक्षर वैसे के वैसे बने रहे। सिर्फ ‘गिरीश’ हस्ताक्षर में भी बदल कर ‘गिर्दा’ हो गया, बस। लम्बी चिट्ठियाँ तो उसने शायद ही कभी लिखी हों, लेकिन छोटी-छोटी चिट वह खूब लिखता था। बिल्कुल जुदा अंदाज में ‘अ’ लिखना और मात्राएँ खींचना। लिखता बहुत तबीयत से था वह और हाँ, कलम भी बहुत प्रिय थे उसे। कलम की भेंट वह बहुत लाड़ से स्वीकार करता था और नए कलम से कागज में इधर-उधर अपने हस्ताक्षर करके खुश हो जाता था। उसकी जेब में कलम न लगा हो, ऐसा शायद ही कभी हुआ हो।

इतने वर्षों में उसके लिखे चिटों में सिर्फ एक फर्क आया था-‘प्रिय नवीन’ का संबोधन ‘नबुवा’ या ‘नब्बू’ में बदल गया था। ज्यादा लाड़ में हो तो ‘स्साले नबुवा!’ काफी दिनों बाद मिलने पर कस कर गले लगाते हुए ‘तुमर नष्ट है जौ, तुमर’ तो उसने कहना ही ठैरा! यह उसके लाड़ जताने का तरीका था। यह अद्भुत बात है कि रचनाकार गिर्दा का मूल स्वर प्रखर प्रतिरोधी और बेमुरव्वत था लेकिन इन्सान गिर्दा के भीतर बेपनाह मुहब्बत का दरिया बहता था और कोई एक या कुछेक ही उसके दावेदार न थे। वह सबको हासिल था। और इश्क ? हाँ, उसे इश्क भी हुआ था और उसकी चोट उसमें बहुत गहरे टीसती रहती थी लेकिन इसका जिक्र करना तो दूर, वह अपने बारे में ही कहाँ कुछ बताता था। यह बात फिर कभी।

बाद के वर्षों की तो बेशुमार यादें हैं, एक-दूसरे में गुँथी और झंझावात की तरह दिमाग में बवण्डर मचाती हुईं। इस बवण्डर के शांत होने में काफी समय लगेगा।

अभी तो एक रील सी है। एक कोलाज, एक मोन्ताज सा। नैनीताल में पहले प्रमोद साह के साथ का कमरा, फिर नैनीताल क्लब के नीचे वाली वह ऐतिहासिक कोठरी और उसमें भी राजा की रसोई और रात गए तक गिर्दा का हारमोनियम, हारमोनियम तक पहुँचने से पहले की बेहिसाब बहसें और मयनोशी। ‘नैनीताल समाचार’ की उत्तेजक और झगड़ा-मचाऊ बैठकें, तर्क-वितर्क, ‘नशा नहीं रोजगार दो’ आन्दोलन के दौर की यात्राएँ, अल्मोड़ा में शमशेर की कोठरी का रात्रिवास, नाटक की वे रिहर्सलें और अभिनव प्रयोग। नाटक या कविता या लोकगीतों की किताबें छापने की ऐसी योजनाएँ जो उनके गीत-संगीत का कैसेट बनाकर आखिरी जिल्द की जेब में रखने की कल्पना तक जाती थी, हालाँकि तब तक ऐसे प्रयोग हमारे देखने में नहीं आए थे। हर प्रस्तुति को उसके सभी पक्षों में सम्पूर्णता तक ले जाने की उसकी जद्दोजहद। कभी अचानक, गीत-नाटक प्रभाग के दौरों के बीच से उसका आधी-आधी रात को लखनऊ आना, बदहवासी में थोड़े-बहुत पैसे का जुगाड़ और उसी तरह लौट जाना।

कभी फुर्सत से लखनऊ आना तो सारी-सारी रात बैठे-लेटे-पसरे भीतर के रचनात्मक बाँध का फूटते जाना। ‘उठो, अब चलो,’ कहने पर वह शायराना अंदाज ‘…..जरा खुद को बटोर लूँ तो चलूँ…। जाने कहाँ-कहाँ बिखरा पड़ा हूँ …..लेकिन समेटू कैसे, नबू’। पहाड़ी होलियों की एक विशद मंचीय प्रस्तुति लखनऊ में करने की वह तमन्ना, जिसमें मंच तीन स्तरीय होना था। एक स्तर बैठी होली का, दूसरा खड़ी होली का और तीसरा महिला-होली का और तीनों की प्रस्तुतियों का सिंक्रोनाइजेशन…..। रचनात्मकता की ऐसी उड़ानें जो कभी बहुत अव्यावहारिक लगतीं तो कभी दुस्साध्य और कभी खिझाने वाली भी। मगर साथ में यह टेर भी-‘गो कि हमारी बात मानना कतई जरूरी नहीं, हाँ!……रिजेक्ट करो स्साले को अगर बात में दम नहीं है तो…।’ अपने समय से बहुत आगे का उसका चिंतन!

इन बिन्दास बैठकों-बातों में वह जितना डूबता जाता, उतना ही उसका कलाकार, उसका विचारक, उसके भीतर बैठा आलोचक प्रखर होता जाता वह बोलता-बजाता-गाता जाता और हम जैसे लहरों पर तैरते रहते। नशा गिर्दा को डबल गिर्दा बना देता था। दरअसल वह सिर्फ नशा करना नहीं होता था। शराब उसकी रचनात्मकता को भड़का देती थी हालाँकि अति तक भी जाती थी। तब उसको रोकना-टोकना बेकार ही जाता। हम अक्सर सोचते, इस समय टेप रिकार्डर होना चाहिए था। लेकिन हर बार हम चूक जाते। गिर्दा इतना करीब था कि कभी उसका ठीक-ठाक इण्टरव्यू भी करने की हमने नहीं सोची। उसके पास इतना खजाना था कि उसे सँजोने की अच्छी से अच्छी योजनाएँ ही बनती रह गईं। हमेशा लगता था, गिर्दा तो यहीं है। जा कहाँ रहा है!

वह लखनऊ में ही था, दस साल पहले जब उसे दिल का दौरा पड़ा था। सुबह 10 बजे उसे दिखाने पीजीआई ले जाना तय था। नौ बजे प्रेस क्लब से फोन आया कि गिर्दा जी के सीने में बहुत दर्द है, आप फौरन आइए। वह प्रेस क्लब में ही ठहरना पसन्द करता था। घरबारी हो जाने के बावजूद घरों के लिहाज और बंदिशें उसे पसन्द न थे। प्रेस क्लब में भी पत्रकारों से कहीं ज्यादा वहाँ के कर्मचारियों से उसका याराना रहता था। सो, उस सुबह रंगलाल ही उसे रिक्शे पर लाद कर अस्पताल ले गया था, हमारे पहुँचने से पहले।

दिल अच्छा-खासा घायल हो चुका था और शरीर कुछ शिथिल पर गिर्दा का दिमाग और भी तेज चलने लगा था। ‘रयूमेटाइड आर्थ्राइटिस’ ने उसे बहुत तंग किया, पंगु बना देने की हद तक। दवाओं के दुष्प्रभावों ने उसे जितना हो सकता था, सताया परन्तु वह शरीर की गुलामी मानने वाला जीव था ही नहीं। वह विचारों की स्वच्छन्द और रचनात्मक उड़ान वाला परिन्दा था, हमेशा चैतन्य और रचनारत। इसीलिए हम सबको लगता था कि वह कमजोर तो है पर ठीक है। हीरा भाभी की सेवा-टहल ने उसे जिस तरह सँभाला था, उससे भी हमारी आश्वस्ति बढ़ती ही थी।

पेट में अल्सर फटने से वह बेहद तकलीफ में रहा होगा लेकिन एम्बुलेंस में नैनीताल से हल्द्वानी ले जाए जाते समय भी फोन पर मुझसे कह रहा था-‘ठीक हूँ….चिंता मत करना…दास बाबू ( लखनऊ मेडिकल कालेज के डा. सिद्धार्थ दास जो उसकी गठिया का इलाज कर रहे थे) को बता देना…..।’

हम सबकी तरह खुद उसे भी अस्पताल से ठीक-ठाक लौट आने का पक्का भरोसा रहा होगा। वह यूँ चला जाने वाला जीव था ही नहीं। लेकिन देखो, एकदम सटक गया। पिछले कुछ समय से फोन पर बात खत्म करते हुए वह कहा करता था-‘घर में सबको मलास देना, पलास देना। मेरे हाथों से अपने गाल मलास लेना। नबुआ, मैं ठीक हूँ। मेरी चिंता मत करना। फिर बात होगी। ओक्के। ’
ओक्के, गिर्दा। ओक्के।

अब क्या कहें, सृष्टि के नियम से परे तो तुम भी नहीं थे न!