हमारी दुनिया में ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्होंने आत्मप्रचार से कोसों दूर रहकर किसी एक विशेष उद्देश्य के लिए अपना जीवन समर्पित किया। स्वर्गीय बंशीधर पाठक 'जिज्ञासु' को इसी श्रेणी में रखा जा सकता है। कुमाऊंनी बोली-भाषा और उसके साहित्य के लिए अथक प्रयास करने वाले 'जिज्ञासु' जी की जीवन-यात्रा को पुस्तक का रूप दिया वरिष्ठ पत्रकार- साहित्यकार नवीन जोशी ने। इसी पुस्तक का लोकार्पण समारोह 'जिज्ञासु' जी के जन्मदिवस 21 फरवरी 2026 को लखनऊ के पेपर मिल कॉलोनी स्थित 'ऑल इंडिया कैफी आज़मी अकादमी' सभागार में 'आँखर' एवं 'निसर्ग' संस्था के तत्वावधान में संपन्न हुआ। 256 पृष्ठ, 26 अध्यायों वाली पुस्तक 'बंशीधर पाठक 'जिज्ञासु' : कुमाऊँनी का अप्रतिम सेनानी' (प्रकाशक नवारुण प्रकाशन, मूल्य ₹400) का लोकार्पण समारोह दरअसल महज़ एक लोकार्पण समारोह नहीं था, वरन वह उस युग को पुनर्सृजित करने जैसा था जब संचार माध्यम के तौर पर आकाशवाणी की एक महत्वपूर्ण भूमिका थी।
कार्यक्रम के प्रारंभ में ‘निसर्ग’ के ललित सिंह पोखरिया ने अतिथियों का स्वागत किया। पुस्तक के सम्पादक नवीन जोशी जी ने 'जिज्ञासु' जी का परिचय देते हुए बताया कि 21 फरवरी, 1934 को अल्मोड़ा जिले के ग्राम नहरा में जन्मे बंशीधर पाठक जी कैसे रोजी-रोटी की तलाश में दिल्ली से शिमला होते हुए अंबाला पहुंचे, जहां उन्हें खादी ग्रामोद्योग विभाग में स्टेनो-टाइपिस्ट की नौकरी मिली जो उन्हें क़तई पसंद न थी। फिर जयदेव शर्मा 'कमल' जी से मित्रता ने उन्हें आकाशवाणी लखनऊ के उत्तरायण कार्यक्रम में कंपीयर की नौकरी दिलवा दी। यहां यह उल्लेख करना उचित होगा कि अंबाला से पूर्व 'जिज्ञासु' जी शिमला में ‘कमल’ जी के साथ ही एक संस्था में बच्चों को पढ़ाया करते थे। फिर कमल जी आकाशवाणी में आ गए और उनका तबादला लखनऊ हो गया।
वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध के पश्चात केंद्रीय सरकार के स्तर से यह रणनीति बनी कि चीन से सटे हिमालयी क्षेत्रों को राष्ट्र की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए आकाशवाणी लखनऊ के शॉर्टवेव से कुमाऊंनी-गढ़वाली बोलियों में एक कार्यक्रम प्रारंभ किया जाए। 22 नवंबर, 1962 को 15 मिनट की अवधि वाले ‘उत्तरायण’ कार्यक्रम का श्री गणेश हुआ। शुरुआती दौर में कार्यक्रम को गढ़वाली बोली में जीत सिंह जरधारी जी ने और हिंदी में जयदेव शर्मा 'कमल' जी ने संचालित किया। 7 जनवरी, 1963 को 'जिज्ञासु' जी कुमाऊँनी कंपीयर के बतौर जुड़ गए। फरवरी 1964 में इस कार्यक्रम की अवधि 60 मिनट की कर दी गई। नवीन जोशी जी ने उपस्थित श्रोता समुदाय को सूचित किया कि उस दौर में 'उत्तरायण' आकाशवाणी का एकमात्र कार्यक्रम था जो एक घंटे की अवधि का था। 'उत्तरायण' कार्यक्रम की लोकप्रियता का यह हाल था कि पहाड़ी गाँव कस्बों से ही नहीं, सीमांतों पर तैनात उत्तराखंडी फ़ौजियों की फ़रमाइशी चिट्ठियों से ‘उत्तरायण’ एकांश की मेजे़ं और आलमारियां भरने लगीं। वह संपूर्ण उत्तराखंड की सांस्कृतिक धड़कन बन गया। उत्तराखंड की बोलियों का उस दौर का कोई नया पुराना कवि, लेखक, गायक, वादक, लोक कलाकार वगैरह नहीं बचा होगा जो उत्तरायण का मेहमान न बना हो। 'जिज्ञासु' जी के योगदान को रेखांकित करते हुए नवीन जी ने कहा कि 60 के दशक का दौर ऐसा था, जब वर्तमान उत्तराखंड से आने वाले लोग अपनी मातृभाषा कुमाऊंनी और गढ़वाली बोलते झिझकते थे, ऐसे वक्त में जिज्ञासु जी इन बोलियों को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे थे। 'जिज्ञासु' जी पैदल ही अपना झोला टाँगे कुमाऊँनी परिवारों में जाते, वहाँ सदस्यों को प्रेरित करते कि वह अपनी मातृ बोली में 'उत्तरायण' के लिए वार्ता /कहानी /कविता लिखें। उनके अथक प्रयत्नों का परिणाम था कि सैकड़ों लोग आकाशवाणी से जुड़े। आकाशवाणी के माध्यम से आपने न जाने कितनी प्रतिभाओं को संवारा,निखारा। अपनी मातृ बोली में कुछ महत्वपूर्ण करने की इच्छा के चलते 'जिज्ञासु' जी ने 'शिखर संगम' संस्था बनाई। इस संस्था के तहत पहली बार 1975 में एक गढ़वाली एवं एक कुमाऊँनी नाटक का मंचन भी किया गया। उस दौर में नाटकों में महिला किरदार निभाने के लिए महिलाएं सामने नहीं आती थीं, लेकिन रेणु पंत, रमा गुसाईं और उषा खंडूड़ी जैसी महिलाऐं सामने आईं और उन्होंने नाटकों में अभिनय किया। फिर आया वर्ष 1978 जब जिज्ञासु जी के नेतृत्व में 'आँखर' संस्था का गठन किया गया। वर्ष 1988 तक यह संस्था सक्रिय रही। इस संस्था के बैनर तले बहुत से नाटकों का मंचन लखनऊ के अतिरिक्त कानपुर, पीलीभीत, अल्मोड़ा, नैनीताल और भोपाल में भी हुए। कुमाऊंनी बोली में जनवरी 1993 में 'जिज्ञासु'जी ने 'आॉखर' नाम से एक मासिक पत्रिका भी निकाली, जो फिर त्रैमासिक होकर अक्टूबर 1995 में यह बंद हो गई। 'जिज्ञासु' जी की जीवन यात्रा के इतने विस्तृत परिचय के पश्चात मंच पर उपस्थित भातखंडे संगीत समविश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति डॉ पूर्णिमा पांडेय ने 'जिज्ञासु' जी के साथ अपने रिश्तों का उल्लेख करते हुए कहा कि 'जिज्ञासु' जी ने उन्हें कुमाऊंनी सिखाई थी। डॉक्टर पांडेय ने बताया कि 'जिज्ञासु' जी के सानिध्य में उन्होंने 'पुंतरी' नाटक में भाग भी लिया था।
इस कार्यक्रम में नैनीताल से आए 'नैनीताल समाचार' के संपादक राजीव लोचन साह जी ने 'जिज्ञासु' जी के साथ अपने संबंधों का खु़लासा करते हुए बताया कि वर्ष 1977 में इमरजेंसी के बाद जब 'नैनीताल समाचार' की शुरुआत हुई थी तो अख़बार के सिलसिले में उन्हें नैनीताल से लखनऊ आना पड़ता था। लखनऊ में नवीन जोशी जी के माध्यम से राजीव जी की भेंट 'जिज्ञासु' जी से होती थी। 'जिज्ञासु' जी के माध्यम से उनको लखनऊ के पर्वतीय समाज की विभिन्न जानकारियां हासिल होती रहती थीं। राजीव जी ने बताया कि 'नैनीताल समाचार' प्रकाशन के साथ ही 'हुड़का' प्रकाशन भी प्रारंभ किया गया था। इस प्रकाशन से पहली पुस्तक शेर सिंह बिष्ट 'अनपढ़' का कुमाऊंनी काव्य संग्रह 'मेरि लटि-पटि' प्रकाशित हुआ तो दूसरी पुस्तिका 'जिज्ञासु' जी का काव्य संग्रह 'सिसौंण'। कुमाऊंनी बोली में दिये अपने वक्तव्य में आपने यह भी जानकारी दी कि वर्ष 2027 में ' नैनीताल समाचार' को अपने प्रकाशन के 50 वर्ष पूर्ण हो जाएंगे। इस अवसर पर किसी बड़े आयोजन का विचार भी है।
बंशीधर पाठक 'जिज्ञासु' जी को समर्पित इस कार्यक्रम में बहैसियत मुख्य अतिथि बोलते हुए प्रसिद्ध हिमालयविद् एवं 'पहाड़' पत्रिका के संपादक डॉ शेखर पाठक ने बताया कि 'जिज्ञासु' जी के साथ उन्होंने लखनऊ शहर में लोफरिंग के मजे़दार अनुभव लिए थे। उन्होंने कहा कि जिज्ञासु जी को कुमाऊंनी भाषा-बोली को आगे बढ़ाने की इतनी प्रबल इच्छा थी कि बिना किसी परिचय के भी वह किसी भी कुमाऊंनी परिवार का दरवाजा खटखटा देते और फिर वहां जाकर सभी को अपनी मातृभाषा बोलने के लिए प्रेरित करते। जिज्ञासु' जी के माध्यम से उन्हें अमृतलाल नागर, भगवती चरण वर्मा, यशपाल, ठाकुर प्रसाद सिंह जैसे लब्ध प्रतिष्ठ साहित्यकारों से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। डॉ शेखर पाठक ने कहा कि 'जिज्ञासु' जी ने तीन खिड़कियाँ खोलीं। प्रथम, अपनी भाषा को जानने की, द्वितीय- दूसरी भाषा के लोगों को जानने की और तीसरी खिड़की देश और दुनिया को जानने की। उन्होंने कहा कि ‘उत्तरायण’ कार्यक्रम से प्रायः प्रतिरोध की कविताएं भी प्रसारित होती रहती थीं। डॉ शेखर पाठक ने आकाशवाणी लखनऊ एवं आकाशवाणी नजीबाबाद से संबद्ध रहे प्रसिद्ध गायक एवं ढोल वादक केशव अनुरागी का भी अपने वक्तव्य में ज़िक्र किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रोफेसर किरण कुमार थपल्याल ने की। आपने कहा कि वर्तमान दौर में क्षेत्रीय भाषाओं के समक्ष गंभीर संकट है। यूनेस्को के अनुसार जल्द ही ख़त्म होने वाली भाषाओं में कुमाऊंनी भी है, ऐसे में जिज्ञासु जी का घर-घर जाकर लोगों को कुमाऊंनी भाषा के लिए प्रेरित करना वास्तव में त्याग और सेवा का एक अनुपम उदाहरण था। प्रोफेसर थपलियाल ने उस दौर के बहुत से मजे़दार क़िस्से श्रोताओं के साथ साझा किए। जैसे, कैसे किन्हीं कृषि वैज्ञानिक डॉक्टर थपल्याल द्वारा ऐन मौके पर कार्यक्रम में उपस्थित होने में असमर्थता व्यक्त करने पर 'जिज्ञासु' जी द्वारा उन्हें निवेदन किया गया कि वह आलू की महत्ता पर एक वार्ता लिख दें। फिर प्रोफे़सर थपल्याल, जो कि प्राचीन इतिहास एवं पुरातत्व विभाग में प्रोफेसर थे, उन्होंने वनस्पति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर से जानकारी लेकर आलू पर एक वार्ता लिखी जो बाद में काफ़ी सराही गई।
चाय के बाद प्रारंभ हुए कार्यक्रम के दूसरे चरण में जिज्ञासु जी द्वारा रचित गीतों का आनंद सभी ने लिया। जहां लखनऊ की गायिका विमल पंत और भाषा पंत ने गीतों और एक हास्य कव्वाली गाकर हॉल को कुमाऊंनी साहित्य के सौंदर्य से भर दिया, वहीं हल्द्वानी में रह रहीं और कार्यक्रम में अनुपस्थित प्रसिद्ध गायिका वीना तिवारी की रिकॉर्डिंग का आनंद सभी ने लिया। इस कार्यक्रम के पहले हिस्से का संचालन कार्यक्रम संयोजक नवीन जोशी जी ने किया। वहीं दूसरे हिस्से का संचालन नवीन जी की जीवन संगिनी लता जोशी जी ने किया। कार्यक्रम में श्रीमती विमल पंत एवं श्रीमती भाषा पंत को सम्मानित भी किया गया। इस अवसर पर सभागार में मौजूद लोगों में शामिल थे श्रीमती रुक्मिणी शर्मा (पत्नी स्वर्गीय जयदेव शर्मा 'कमल') विकल्प शर्मा (पुत्र स्वर्गीय जयदेव शर्मा 'कमल') प्रोफेसर रमेश दीक्षित, पत्रकार जगत से वंदना मिश्र, महेश पांडेय, जगदीश जोशी, आलोक जोशी, कुमार सौवीर, पुरातत्वशास्त्री राकेश तिवारी, राजीव ध्यानी, प्रतुल जोशी, लक्ष्मी जोशी, उमा मैठाणी, नारायण सिंह रौतेला, पंकज सिन्हा, रंगकर्मी मेराज आलम, मीता पंत, मोहन पंत, विमल जोशी, ऊषा पांडेय, हेमा जोशी, भाषाविद मुमताज़ अहमद, कहानीकार दीपक श्रीवास्तव, आलोचक प्रभात त्रिपाठी, धनंजय शुक्ल, भूगर्भ शास्त्री आलोक पांडेय, डायरेक्टर जयपुरिया मैनेजमेंट कॉलेज डॉ कविता पाठक, डॉक्टर आरती बरनवाल ,सतीश जोशी, सुधा मिश्र, नवारुण प्रकाशन के सर्वेसर्वा संजय जोशी, पर्वतीय महापरिषद के अध्यक्ष गणेश चंद्र जोशी, उत्तराखण्ड महापरिषद के अध्यक्ष हरीश पंत, कवि ज्ञान पंत, घनानंद पांडे, 'जिज्ञासु' जी के छोटे भाई गणेश चन्द्र पाठक, जिज्ञासु जी के ज्येष्ठ पुत्र चारु चंद्र पाठक एवं उनकी पत्नी दीपा पाठक कनिष्ठ पुत्र दिव्यरंजन पाठक, आकाशवाणी के पूर्व अतिरिक्त महानिदेशक सतीश ग्रोवर आदि।
-प्रतुल जोशी