चुनाव और नागरिकों का मताधिकार लोकतंत्र की बुनियाद है। इस बुनियाद को खोखला करने की कुछ सुनियोजित साजिशों का पर्दाफाश होना शुरू हुआ है। चुनाव आयोग की भूमिका गम्भीर रूप से संदिग्ध पाई जा रही है।
इन तथ्यों पर गौर करिए-
1. मतदाता बनाना और एक भी वयस्क नागरिक मतदान से वंचित न होने पाए, अब तक यह चुनाव आयोग की जिम्मेदारी रही है। एसआईआर के बहाने इस चुनाव आयोग ने पहली बार यह दायित्व जनता पर डाल दिया कि वे साबित करें कि वे वैध मतदाता, और इस प्रकार भारतीय नागरिक, हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस बारे में बहुत सी आपत्तियों को खारिज कर दिया।
2. नए मतदाता बनने के लिए फॉर्म- 6 भरना होता है। इस चुनाव आयोग ने एसआईआर के बहाने फॉर्म-6 में एक नया परिवर्तन कर दिया- मतदाता बनने के लिए यह बताना जरूरी है कि आपके माता-पिता पहले मतदाता सूची में थे या नहीं।
3. यह नियम विरुद्ध है और सरकार ने नियम बदला नहीं है। दो चुनाव आयुक्तों ने इस पर आपत्ति की लेकिन उनकी आपत्ति दरकिनार कर दी गई। यानी यह फैसला सर्वसम्मति या बहुमत से नहीं हुआ, जो कि नियमानुसार होना ही चाहिए था।
4. चुनाव आयोग ने पिछले दिनों कहा कि फॉर्म-6 में बदलाव को सुप्रीम कोर्ट ने उचित बताया। अब सुप्रीम कोर्ट कह रहा है कि उसने ऐसा कभी नहीं कहा। अब वह आयोग के कागजात देखेगा कि क्या नियम का उल्लंघन हुआ है।
5. जिन राज्यों में एसआईआर हो चुका है या जहां इन दिनों चल रहा है, वहां बहुत बड़ी संख्या में भाजपा के बूथ एजेण्ट फॉर्म- 7 भरकर जमा कर रहे हैं। फॉर्म-7 सूची से नाम काटने के लिए होता है। यह तब भरा जाता है जब किसी की मृत्यु हो जाए या किसी का नाम दो बार सूची में हो। भाजपा के लोग ढेरों-ढेर फॉर्म-7 भरकर उन मतदाताओं के नाम कटवा रहे हैं, जो प्रकटत: भाजपा विरोधी हैं, जैसे मुसलमान।
6. दो दिन पहले कर्नाटक के बलारी विधान सभा क्षेत्र में भाजपा का एक बूथ एजेण्ट 7500 मतदाताओं के नाम काटने के लिए ढेर सारे फॉर्म-7 भरकर बीएलओ के पास जमा करने आया। उसने कहा कि ये मतदाता मौजूद नहीं हैं। कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है। बीएलओ ने नियम विरुद्ध बताकर फॉर्म नहीं लिए। भाजपा के इस कार्यकर्ता के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट लिखी गई है और जांच हो रही है। THE HINDU अखबार ने 05 अक्टूबर 2026 को विस्तार से यह रिपोर्ट छापी है।
7. कर्नाटक के ही बीजापुर में 1046 मुस्लिम मतदाताओं के नाम काटने के लिए फॉर्म -7 भरकर जमा किए गए। कई फॉर्म-7 में प्रमाण के तौर पर इन मतदाताओं के मृत्यु प्रमाण पत्र नत्थी किए गए थे, जबकि वे मतदाता मौजूद हैं। जांच में पाया गया कि मृत्यु प्रमाण पत्र फर्जी थे। ( देखें THE HINDU अखबार की रिपोर्ट, दि. 05 अक्टूबर 2026)
8. पिछले दिनों झारखण्ड में भी ऐसे कई मामले पकड़े गए थे। भाजपा के बूथ एजेंट सैकड़ों की संख्या में फॉर्म-7 भरकर बीएलओ के पास जमा करने आए। एक मामले में तो खुद बीएलओ और उसके परिवार के नाम काटने का फॉर्म उनके सामने आया। राज्य में चूंकि भाजपा की सरकार नहीं है, इसलिए बीएलओ ने फॉर्म नहीं लिए और शिकायत की। पाया गया कि जिनके नाम काटने के लिए फॉर्म भरा जा रहा है, वे वैध मतदाता हैं और उसी ठिकाने में रह रहे हैं। इनमें ज़्यादातर मुस्लिम मतदाता हैं।
9. ऐसा ही खेल बंगाल और बिहार में भी किया गया, हालांकि तब तक यह साजिश पूरी तरह सामने नहीं आई थी। बिहार में विपक्षी दलों ने बहुत आपत्तियां कीं लेकिन वहां भाजपा की सरकार होने से मामला दबा ही रहा। जहां भाजपा की सरकारें हैं, वहां किसी ने चूं नहीं की या उसकी सुनी नहीं गई।
10. बंगाल में मतदाताओं के नाम काटे जाने की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने जो ट्रिब्युनल बनाए हैं, उनके पास 22 लाख 21 हजार अपीलें उन मतदाताओं ने की हैं, जिनके नाम इसी तरह काट दिए गए। इतने मतदाताओं के नाम काटने के लिए भी ऐसा ही खेल हुआ। तब ममता बनर्जी मुख्यमंत्री थीं और खुद काला कोट पहनकर सुप्रीम कोर्ट में खड़ी हुई थीं। कुछ नहीं हुआ। योगेंद्र यादव उन कई मतदाताओं को साक्षात लेकर सुप्रीम कोर्ट में हाजिर हुए, जिनके नाम काट दिए गए थे। सुप्रीम कोर्ट ने आयोग को एसआईआर चलाने रहने की झण्डी दे दी थी।
11. गोवा के बीएलओ ने जांच के बाद पाया कि कई मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से गलत काटे गए। राज्य के मतदाता पंजीकरण अधिकारी (ईआरओ) ने ये नाम सूची में वापस जोड़ने चाहे लेकिन आयोग के सॉफ्टवेयर को वे एक्सेस नहीं कर पाए। तब एक और चाल खुली। मतदाताओं के नाम जोड़ने या काटने का भी काम सीधे दिल्ली में आयोग के दफ्तर से हो रहा था, जबकि इसका अधिकार राज्यों के ईआरओ को ही है।
12. साबित हो गया कि चुनाव आयोग सॉफ्टवेयर को जानबूझकर छेड़ा गया। इसकी एक्सेस सिर्फ दिल्ली दफ्तर तक सीमित कर दी गई। दोनों चुनाव आयुक्तों ने इस पर भी आपत्ति की थी। यानी यह फैसला भी मुख्य चुनाव आयुक्त ने अल्पमत के आधार पर किया। इसलिए यह अवैध निर्णय है।
13. बंगाल बने ट्रिब्युनल में तैनात एक दर्ज़न पूर्व न्यायाधीशों ने भी अब शिकायत की है कि चुनाव आयोग ने सुनवाई के लिए जो डिजिटल पोर्टल बनाया है, उसकी पहुंच सीमित कर दी गई है। वे इस पोर्टल के जरिए पक्षकारों को नोटिस नहीं भेज पा रहे हैं। मतदाताओं के दस्तावेज भी अपलोड नहीं कर पा रहे, न ही ऑनलाइन सुनवाई कर पा रहे। यह खबर Indian Express अखबार ने आज (06 अक्टूबर 2026) पहले पेज पर विस्तार से प्रकाशित की है।
14. अब तेलंगाना से भी खबरें आ रही हैं कि भजपा के बूथ एजेंट बड़ी संख्या में फॉर्म 7 भरकर चुने हुए मतदाताओं के नाम काटवाने की कोशिश में लगे हैं। वहां भी उनके खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट दर्ज़ की गई है। इस राज्य में भी भाजपा की सरकार नहीं है।
15. गोवा में एक मतदाता, जिसका नाम गलत ढंग से काट दिया गया है, हाई कोर्ट पहुंचा गया है कि चुनाव आयोग उससे झूठ बोलने और गलत काम करने को कह रहा है। हुआ यह कि पोल खुलने के बाद चुनाव आयोग ने उससे कहा कि फिर से मतदाता बनने के लिए फॉर्म 6 भरकर दे दो। फॉर्म 6 सिर्फ नए मतदाताओं के लिए होता है। उसमें लिखना होगा कि वह पहले कभी मतदाता नहीं था या किसी सूची में उसका नाम नहीं है। उसने कोर्ट से कहा है कि मैं यह झूठ नहीं लिखना चाहता जबकि मैं काफी पहले से मतदाता रहा हूं। हाई कोर्ट ने चुनाव आयोग को नोटिस जारी की है। ऐसे कई मतदाता होंगे। सब तो अदालत नहीं जा सकते।
16. देश भर में करीब 13 करोड़ मतदाताओं के नाम एसआईआर के जरिए काट दिए गए। नाम के हिज्जे में फर्क होने, माता-पिता के नाम में कोई त्रुटि पाए जाने, उनकी उम्र में 15 साल से कम का अंतर होने, मकान नम्बर गलत छपा होने जैसी मामूली बातों पर भी नाम काट दिए गए। यह कोई नई बात नहीं है कि देश की मतदाता सूची में ऐसी त्रुटियां पहले से आम रही हैं। इन आधारों पर पहले कभी किसी को वोट देने से नहीं रोका गया।
स्पष्ट है ये चुनाव जीतने की भाजपा की कई तिकड़मों का एक हिस्सा है। मतदाता सूची में मनमाना हेरफेर कराने की उसकी साजिशों का पर्दाफाश हो रहा है। वर्तमान चुनाव आयोग, मुख्यत: मुख्य चुनाव आयुक्त, इसमें उसकी मदद कर रहा है और सुप्रीम कोर्ट उसकी स्वायत्तता का तर्क देकर अब तक उसे खुला हाथ देता आया है।
अब चीजें खुल रही हैं। मामला सुप्रीम कोर्ट में नए सिरे से पहुंचा है। कुछ मामले विभिन्न हाई कोर्टों तक आए हैं। कई पूर्व चुनाव आयुक्त इन तिकड़मों को अवैध बता चुके हैं। अब सुप्रीम कोर्ट के एक वर्तमान न्यायाधीश ने भी मतदाताओं को मताधिकार से वंचित करने के प्रयासों की निंदा की है। दिली समेत कई राज्यों में आंदोलन शुरू हो गए हैं।
तय है कि देश ने ऐसा लोकतंत्र-विरोधी काम नहीं देखा, इमरजेंसी में भी नहीं। देखना है कि मामला कहां तक पहुंचता है। \
- न जो, 06 अक्टूबर 2026


