‘मुरदा घर’ (जगदम्बा प्रसाद दीक्षित, 1974) ने रात भर सोने न दिया।
अपने मोर्चे पर
Sunday, May 17, 2026
बहुत बेचैन करता है 'मुरदा घर'
Saturday, May 16, 2026
'टनल' - हिमालय के सरोकारों का स्पर्श मात्र
‘महामाया’, ‘कालीचाट’, ‘गाफिल’ समेत कुछ अन्य उपन्यास लिख चुके सुनील चतुर्वेदी ने इस बार ‘हिमालय की घुटती सांसें’ को ‘टनल’ उपन्यास का विषय बनाया है। नवम्बर 2023 में उत्तरकाशी जिले के सिल्क्यारा नामक स्थान में चार धाम राजमार्ग के लिए निर्माणाधीन सुरंग के भीतर भारी भू-स्खलन हो जाने से 41 मजदूर फंस गए थे। उन्हें बाहर निकालने के लिए कई दिन तक कई प्रकार के उपाय किए गए, भारी-भारी मशीनें मंगवाई गईं, देश-विदेश से विशेषज्ञ बुलाए गए लेकिन सब विफल रहे। अंत में ‘रैट होल माइनर्स’ की सहायता से सुरंग में फंसे श्रमिक 17 दिन बाद बचाए जा सके थे।
‘रैट होल माइनर्स’ पहाड़ या धरती के भीतर बहुत छोटे से छेद से घुसकर खनन का खतरनाक काम किया करते हैं, जो अवैध घोषित है। जब तमाम विशेषज्ञ और बड़ी-बड़ी मशीनें फेल हो गईं तब यही अवैध काम करने वाले दीन-हीन श्रमिक काम आए थे।
खैर, सुनील चतुर्वेदी ने सिल्क्यारा हादसे के बहाने हिमालय के विनाश और असंगत विकास नीतियों पर सवाल उठाने की कोशिश की है। सिल्क्यारा टनल के बाहर चाय की टपरी चलाने वाले एक बूढ़े की मुंहजबानी सुरंग में फंसे मजदूरों की कहानी शुरू होती है। बीच-बीच में बूढ़ा कभी चिपको आंदोलन के किस्से बयान करने लगता है, कभी टिहरी बांध के विरोध में हुए आंदोलन के बारे में बताता है। यह बूढ़ा कौन है, कोई नहीं जानता। सिल्क्यारा और आसपास के गांव वाले भी नहीं, जो उससे कहानी सुनते हैं और उसके खान-पान एवं सेहत का ध्यान भी रखते हैं।
धीरे-धीरे पाठक अवश्य जान जाता है कि वह बूढ़ा अपनी जवानी में संसार के दुखों से परेशान होकर बुद्ध के मार्ग पर चलने की ठान लेने के बाद हिमालय की ओर आया था। यहां उसे चिपको आंदोलन चलाने वाले सुंदरलाल बहुगुणा, चण्डी प्रसाद भट्ट, घनश्याम सैलानी, धूम सिंह नेगी जैसे लोग मिलते हैं। बूढ़ा विशेष रूप से सुंदरलाल बहुगुणा जैसे ‘संत’ से अत्यंत प्रभावित होकर उनके अभियान में शामिल हो जाता है और बाद में उनका विश्वस्त सहायक भी बन जाता है। लेखक भी बहुगुणा जी से बहुत प्रभावित है और यह उपन्यास उनको और उनके जैसे अन्य योद्धाओं को ही समर्पित भी है।
तो, बूढ़े के मुंह से चंद ग्रामीण (और पाठक भी) सुरंग में फंसे श्रमिकों की कहानी के साथ-साथ चिपको आंदोलन और बाद में टिहरी बांध विरोधी आंदोलन के किस्से सुनते हैं। आप चकित हो सकते हैं कि सिल्क्यारा के निकटवर्ती गांवों में रहने वाले इन लोगों को तीन वर्ष पूर्व हुए उस हादसे के बारे में पता क्यों नहीं है और वे इसे सुनने के लिए अत्यंत लालायित क्यों हैं। खैर, सुरंग में फंसे मजदूरों की मुक्ति के साथ कहानी खत्म हो जाती है और कथा सुनने वालों को हैरत में डालते हुए बूढ़ा किसी रहस्य की तरह अचानक लापता हो जाता है।
यह उपन्यास बहुत उम्मीद के साथ पढ़ना शुरू किया था क्योंकि हमारे योजनाकारों और सरकारों ने विकास के नाम पर शुरू से ही हिमालय के साथ अत्यंत बर्बर व्यवहार किया है। सिल्क्यारा हादसा भी ऐसी ही प्रकृति-विरोधी नीतियों का दुष्परिणाम था। हिमालय ने कई तरह से योजनाकारों को चेताया है, बगावत भी उसने खूब की है लेकिन सरकारों और उनके नीति-निर्धारकों ने लगातार उसकी उपेक्षा की है, अनसुनी की है।
उम्मीद थी कि सुनील चतुर्वेदी इन तमाम मुद्दों पर गहराई से विचार करेंगे, कथानक में उन विसंगतियों को उभारेंगे और एक विमर्श छेड़ेंगे। लेकिन ‘टनल’ उपन्यास निराश करता है। सिल्क्यारा हादसा हो या चिपको आंदोलन या टिहरी बांध विरोधी आंदोलन, इसमें मात्र हलके-फुलके विवरणों के रूप में दर्ज़ हुए हैं। चिपको आंदोलन की चंद घटनाओं को छोड़कर उसके विविध आयाम या टिहरी बांध से हुए विस्थापन का विराट दर्द छुआ ही नहीं गया, इनकी गहराई में जाना दूर की बात रही। उन लोगों के जीवन में तनिक भी नहीं झांका गया है, जो विकास की क्रूर विसंगतियों की मार झेलते आए हैं और समय-समय पर कई आंदोलनों के माध्यम से अपना दर्द एवं आक्रोश व्यक्त करते रहे हैं। कहीं-कहीं हलके से यह उल्लेख भर कर दिया गया है कि मैदानों जैसी विकास योजनाएं हिमालयी क्षेत्र के लिए कतई उपयोगी नहीं हैं।
बूढ़े के मुंह से सुने जाते किस्से मात्र सामान्य किस्से बनकर रह गए हैं। जो ग्रामीण इन किस्सों के श्रोता हैं, वे मात्र श्रोता हैं। न ही उनका दैनंदिन जीवन, न उनके कष्ट व संघर्ष और न ही थोड़े सुख और जीवन-रस, कहीं से भी कथा का हिस्सा बन पाए हैं। एक-दो प्रसंगों में ‘फुलदेई’ पर्व-गीत या एक लोक-कथा का उल्लेख तनिक आशा जगाता है, लेकिन वह भी पर्याप्त जानकारी या शोध के अभाव में प्रामाणिक नहीं बन पाया। ‘रैट होल माइनर्स’ भी घटनास्थल की तरह ही कथा में भी आते हैं और काम पूरा करके चले जाते हैं। न उनकी बहादुरी और न उनका दयनीय-उपेक्षित जीवन लेखक की निगाह में आ पाया है। एक सचेत लेखक से इसकी उम्मीद नहीं की जाती।
लेखक ने उपन्यास की भूमिका में बताया है कि सिल्क्यारा सुरंग हादसे की खबर मिलते ही वे एक पत्रकार मित्र के साथ सिल्क्यारा पहुंचे और वहां तीन दिन तक रहे थे। इससे उम्मीद बंधी थी कि लेखक की आंख उस समाज और उसके हालात पर गहरी गई होगी। किंतु उपन्यास पूरा पढ़ लेने के बाद लगता है कि यह भी ऊपरी पत्रकारीय रिपोर्ट से आगे नहीं पहुंच सका।
वे एक लाइन में यह सवाल तो उठाते हैं कि आखिर इस सुरंग वाली सड़क की आवश्यकता किसे है, लेकिन कहीं भी यह उल्लेख नहीं करते कि यह सुरंग प्रधानमंत्री के ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’ कहे जाने वाले ‘ऑल वेदर चार धाम रोड प्रॉजेक्ट’ का हिस्सा है, जिसे तमाम मानकों, भू-विज्ञानियों और पर्यावरण विशेषज्ञों की गम्भीर आपत्तियों की अनसुनी करके एक सनक की तरह पूरा किया जा रहा है। और, यह अकेला प्रॉजेक्ट नहीं है, जो हिमालय की क्रमश: बर्बादी का कारण बन रहा है। बहुत पहले से, पहले की सरकारों ने भी हिमालय के साथ ऐसी ही बर्बरता की है।
पहले कम से कम चिपको या बांध विरोधी या नशा विरोधी जैसे कई आंदोलन जनता ने आक्रामकता के साथ किए थे, अब तो ऐसी सम्भावना ही खत्म कर दी गई है। पहाड़ों के लोग चुपचाप विकास के नाम पर विनाश देखने-सहने को विवश हैं।
ऐसे वृहत्तर प्रश्नों से यह उपन्यास नहीं टकराता और कुछ किस्सों का बयान भर बनकर रह जाता है।
· (‘टनल’ (उपन्यास), लेखक- सुनील चतुर्वेदी, पृष्ठ 116, मूल्य 225 रु., सम्भावना प्रकाशन, हापुड़।)
- न जो, रामगढ़, 17 मई 2026
Friday, May 15, 2026
170 वर्ष पुराने हिमालय के चित्रों की नायाब प्रदर्शनी
अगर आप आज-कल-परसों (18 मई की शाम तक) नैनीताल या उसके आसपास हों तो समय निकालकर मल्लीताल सी आर एस टी कॉलेज में लगी वह चित्र प्रदर्शनी देखने अवश्य जाएं, जो आपको 170 साल पहले के हिमालय में ले जाएगी। ये केवल उस काल के चित्र नहीं हैं, बल्कि इतिहास-संस्कृति-भूगोल-पर्यावरण-मानव जीवन स्थितियों-वनस्पतियों-आदि-आदि से भी रू-ब-रू कराएंगे। इस प्रदर्शनी को देखना अपने भूगोल और समाज को गहराई से देखने-जानने की मानवीय ललक और उसके लिए किए गए अथक श्रम व समर्पण को भी महसूस करना है।
मोटे तौर पर यह कहानी तत्कालीन प्रूशिया (आज का जर्मनी) के एक ख्यात फील्ड सर्वेक्षक अलेक्जेण्डर हम्बोल्ट के उस सपने से शुरू होती है जो लेटिन अमेरिका और यूरोप के पर्वतों का स्वयं फीड सर्वे कर चुकने के बाद भारतीय हिमालय का अध्ययन कराना चाहते थे ताकि विविध जानकारियों से समृद्ध एटलस तैयार किया जा सके। उन्होंने प्रूशिया के तत्कालीन राजा के माध्यम से ब्रिटिश महारानी और उनके जरिए ईस्ट इण्डिया कम्पनी से सम्पर्क साधा और भूगोल और भूगर्भशास्त्र के अध्येता दो भाइयों, हरमन श्लागिंटवाइट और एडॉल्फ श्लागिंटवाइट को इस काम के लिए तैयार किया कि वे भारतीय हिमालय का अध्ययन-सर्वेक्षण करने के लिए जाएं। दोनों भाई न केवल इस कार्य के लिए तैयार हुए, बल्कि उन्होंने छोटे भाई रॉबर्ट को भी सहायक के रूप में साथ लिया। रॉबर्ट फोटोग्राफी का भी शौकीन था। कैमरे का आविष्कार हुए तब बहुत दिन नहीं हुए थे।
करीब दो साल की तैयारियों के बाद तीनों श्लागिंटवाइट भाई 1854 में भारत पहुंचे। उन्होंने विविध सहायकों की करीब एक सौ लोगों की टीम तैयार की और भारतीय हिमालयी क्षेत्र को तीन भागों में बांटकर तीनों अपने-अपने लिए निर्धारित रास्तों पर निकल गए। उन्होंने अलग-अलग मार्गों पर कोई 18,000 मील की यात्रा की, जो अधिकतर पैदल और कभी घोड़ों पर भी की गई। उन्होंने अपने यात्रा क्षेत्रों के चित्र बनाए, नक्शे बनाए, नदियों-पहाड़ों-झीलों-बस्तियों-पुलों-आदि-आदि के विविध विवरण एवं मानक दर्ज़ करते हुए अपनी डायरियां भरीं। अपने भूगोल अध्ययन और हमबोल्ट के निर्देशों के आधार पर उन्होंने खाके तैयार किए। सभी चित्र व नक्शे तत्काल फाइनल नहीं किए जा सकते थे, इसलिए अपने रफ स्केचों में छोटी-छोटी चीजें भी दर्ज़ कीं, यहां तक कि कौन सी चीज उस समय किस रंग में दिख रही थी।
उनकी इस यात्रा के दौरान ही भारत में 1857 का सैनिक विद्रोह हुआ। जब वे वापस लौटे तो उनके पास साढ़े सात सौ से अधिक नक्शे और चित्र तो मौजूद थे ही, यात्रा मार्ग से बटोरी गई तमाम चीजें भी थीं, जैसे- पत्थर, लकड़ी, वनस्पतियों, आदि के ढेरों नमूने। इनमें असम से लेकर बाल्टिस्तान और लद्दाख, हिमालय की तलहटियों, मिजोरम के खासी हिल्स से लेकर हिमालय-पार के तिब्बत और भूटान तक के चित्र, नक्शे और विविध वस्तुएं शामिल थीं।
भारत तीन भाई आए थे लेकिन लौटे दो ही। बीच वाले भाई एडॉल्फ को 1857 में काशगर में जासूस होने के शक में मार डाला गया था। अनेक खूबियों वाली इस ऐतिहासिक सर्वे यात्रा का यह अत्यंत त्रासद पक्ष रहा।
खैर, जर्मनी लौटकर वे चित्र रंगों और अन्य विवरणों से पूरे किए गए। रॉबर्ट ने अपने कैमरे से जो फोटो खींची थीं, डेवलप करने के बाद उन्हें भी डायरी में चिह्नित विवरणों के आधार पर रंगीन बनाया गया। एक मूल्यवान ऐतिहासिक काम हो गया था लेकिन 1859 में हम्बोल्ट की मृत्यु हो जाने और फिर प्रूशिया के तत्कालीन राजा का भी पराभव होते जाने से उनके काम को वह मुकाम नहीं मिल सका, जिसकी योजना शुरू में बनाई गई थी।
श्लागिंटवाइट भाइयों के बनाए चित्र काफी समय तक उनके घर में पड़े रहे और फिर जर्मनी के अल्पाइन संग्रहालय में उन्हें सुरक्षित कर दिया गया।
दुनिया के सामने ये ऐतिहासिक चित्र पहली बार 2011 में आए जब बर्लिन में इनमें से कुछ चित्रों की पहली प्रदर्शनी लगाई गई। उस समय बर्लिन की फ्री यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और हिमालय अध्येता हरमन क्राइट्ज़मैन ने अपने परिचित हिमालयविद और ‘पहाड़’ फाउण्डेशन के प्रोफेसर शेखर पाठक को बर्लिन आमंत्रित किया। प्रो पाठक इन चित्रों को देखकर स्वाभाविक ही उत्फुल्लित हुए और उन्होंने अल्पाइन म्यूजियम में रखी श्लागिंटवाइट भाइयों की तैयार की गई बाकी सामग्री भी देखी। उसी समय उनके मन में इन चित्रों की प्रदर्शनी भारत में लगाने का विचार आया था। आज कोई 15 वर्ष बाद उनका यह सपना साकार हुआ है। यह कैसे सम्भव हो पाया, क्या दिक्कतें आईं, कैसे उनका समाधान किया गया और कितने लोगों ने इसे सम्भव बनाया, यह अलग से लम्बी कहानी है।
दिल्ली और देहरादून में प्रदर्शन के बाद श्लागिंटवाइट भाइयों के सैकड़ों चित्रों में से करीब एक सौ चुनिंदा चित्र फिलहाल नैनीताल में देखने के लिए उपलब्ध हैं। यह बताना भी जरूरी है कि ये मूल चित्र नहीं हैं। सुरक्षा और संरक्षण की अत्यावश्यक सावधानी के कारण मूल चित्रों की प्रतिकृतियां तैयार करके प्रदर्शित की गई हैं। इन प्रतिकृतियों को 'पहाड़' फाउंडेशन को दान कर दिया गया है। यानी अब ये भारत में ही रहेंगीए और समय-समय पर प्रदर्शित की जा सकेंगी।
आप इन चित्रों में 1855 के नैनीताल की झलक देख सकते हैं, बहुत बड़े भूस्खलन से मल्लीताल का ‘फ्लैट्स’ तब तक नहीं बना था और नैनीताल भी एक गांव हुआ करता था। उस समय के बदरीनाथ का चित्र देखकर आप चौंक जाएंगे और पहचान नहीं पाएंगे कि यही आज का बदरीनाथ है। नदियों पर किस मौलिक-प्राकृतिक तकनीक से तब पुल बनाए जाते थे, यह देखना कम रोमांचक नहीं है। बहुत से बौद्ध विहारों, मंदिरों, पठारों, चट्टान-शृंखलाओं, वनस्पतियों, नदियों और समाजों के चित्र हमें 170 साल पहले के समय में ले जाते हैं।
- नवीन जोशी, रामगढ़, 16 मई, 2026
Friday, April 10, 2026
भुतहा होते गांव
कथाकार नवीन जोशी का उपन्यास ‘भूतगांव’ उत्तराखंड के पहाड़ों के अकेलेपन और गांवों के भुतहा हो जाने की कथा है। केवल उत्तराखंड ही नहीं व्यवसाय और रोज़गार के अभाव में हिमाचल प्रदेश से लेकर उत्तर पश्चिम तक के गांव खाली हो रहे हैं तो सेठों की धरती शेखावाटी की बड़ी-बड़ी हवेलियों के बाहर चौकीदार हैं और अंदर कबूतर। शेखावाटी वह इलाका है जहां बिरला, पोदार, साहू जैन, सिंहानिया, पीरामल एवं खेतान इत्यादि का जन्म हुआ था लेकिन व्यवसाय के लिये वे बाहर निकले तो उनकी हवेलियां आज भी इंतजार कर रही हैं। नवीन जोशी उत्तराखंड के सतौर गांव के एक परिवार को उपन्यास के केंद्र में रखते हैं, जिनका एक भाई लखनऊ चला गया था तो दूसरा फौज से अवकाश ग्रहण कर गांव में अकेला रह रहा था। पूरे गांव में छुरमल ज्यू का मंदिर और आनंद सिंह तथा उसका कुत्ता शेरू हैं। अपने अकेलेपन में गांव शांत है लेकिन बाघ की आवाज़ का डर हमेशा गांव की शांति को भंग किये रहता है। नवीन जोशी पत्रकार हैं इसलिये अकेलेपन की समस्या को वैश्विक स्तर पर उठाते हैं। वैश्विक पूंजी ने गुड़गांव, बेंगलोर, पुणे एवं हैदराबाद जैसे महानगर व्यापार और टेक्नोलोजी के विस्तार के लिये चुने हैं, जहां सारे देश के युवक नौकरियों के लिये जा रहे हैं। लेकिन दूर-दराज के गांवों में अभाव हैं, न शिक्षा की व्यवस्था है और न रोजगार की, इसलिये पढ़ा-लिखा युवक रोज़गार की तलाश में बाहर जाता है और फिर वहीं का होकर रह जाता है। सरकार की उदासीनता के कारण गांव मूलभूत सुविधाओं के अभाव में अकेले और भुतहे हो गये हैं। अपने गांव के प्रति प्रेम कोरी भावुकता है, जंग खाये ताले लगे उन मकानों में रहकर या पहाड़ के सौंदर्य को देखकर पेट नहीं भरता इसलिये शहर की ओर जाना ऐसा यथार्थ है, जो सबके सामने है।
‘भूतगांव’ एक समय में हिल-मिलकर रहने वाला गांव था, जहां ब्राह्मण और राजपूतों के अलावा अन्य जातियां भी थीं, जो धीरे-धीरे उजड़ गईं। गांव सूने हो गये और अकेले मकान धीरे-धीरे खंडहर में तब्दील होते गये। गांव में अपने पालतू कुत्ते शेरू के साथ रह रहे आनंद सिंह बताते हैं कि ‘महाभारत के हस्तिनापुर जैसा ही ठहरा हमारा गांव। शापग्रस्त। गांधारी ने कृष्ण को शाप दिया था पूरे कुल के उजड़ जाने का। वैसे ही यह गांव शापग्रस्त लगता है मुझे। चल, आज भी किसी बंद दरवाजे और सूने गोठ की कहानी कहूंगा या किसी खंडहर की। खंडहरों की भी कहानी होती है डियर। बल्कि सच बात ये हुई कि खंडहरों के पास ज्यादा कहानियां होती हैं। टूटी दीवारों, ढही छतों, लुढ़के पाथरों, सड़ी बल्लियों और भीतों की कहानियां! गोठ की गाय और गोद का भाऊ जीते रहें, ऐसा आशीर्वाद देने वाले हुये ताकि जिंदगी चलती रहे। कहानी न बन जाये। द्वार पर ताला लटक गया और गोठ सूना हो गया तो फिर कहानी ही रह जाने वाली हुई।’
यह ऐसी कहानियां हैं, जिन्हें सुनने वाला कोई आदमी गांव में नहीं है इसलिये गांव के उजड़ने की कहानियों को वे भारी मन से शेरू को सुनाते हैं। यह भी एक विडंबना ही है कि अकेले आदमी के पास अतीत की हरी-भरी स्मृतियां हैं लेकिन उन्हें सुनने वाला कोई आदमी नहीं बचा। वे दुखी मन से कहते हैं ‘इस गांव की ऐसी कौन-सी कथा है जो बार-बार कहने लायक हो। कोई ऐसे गया, कोई वैसे उजड़ा, कोई हमारी तरह टूटा । बचा यह सन्नाटा, चारों तरफ खंडहर, बंजर और इस सबके अकेले साथी छुरमल ज्यू।’ छुरमल ज्यू गांव के देवता हैं, पूरे गांव में अकेला मंदिर उन्हीं का है लेकिन ब्राह्मणों के पलायन करने के बाद अब कोई दीया जलाने वाला पुरोहित नहीं बचा है इसलिये आनंद सिंह ठाकुर होते हुये भी दीया जलाते हैं। गांव में हर जाति के काम बंटे हुये हैं इसलिये जो काम ब्राह्मणों का है, उसे ठाकुर नहीं कर सकता, अगर वह करता है तो यह परंपरागत काम की श्रेणी में नहीं आता है।
उपन्यास की मूल कथा सतौर गांव के वीरेंद्र सिंह नेगी और उसके छोटे भाई आनंद सिंह पर केंद्रित है, एक कथा लखनऊ जैसे महानगर पहुंचती है तो दूसरी सतौर में रहकर सुनाई जाती है- दोनों कथाएं मार्मिक हैं, दोनों के अपने-अपने दुख हैं, दोनों के अतीत और वर्तमान हैं, दोनों के भविष्य दारुण हैं। विडंबना यह है कि जो कथा लखनऊ में घटित हो रही है, उसका मुख्य पात्र जातिवाद से ग्रस्त है और जो कथा गांव में कही जा रही है, वह जातिवाद से मुक्त है। जो लोग पहाड़ों या अन्य दूसरी जगहों से महानगर में गये हैं, वे अपने साथ अपनी जातियों को भी ले गये हैं, वे आधुनिक बनने की कोशिश तो करते हैं लेकिन अपनी जड़ों से जुड़ने के नाम पर जाति की विभीषिका से मुक्त नहीं हो पाते हैं जिसका लाभ लोग कम राजनीतिज्ञ अधिक उठा रहे हैं। नवीन जोशी ने कथा को इस तरह बुना है कि यह एक व्यक्ति की कहानी न होकर बदलते हुये समाज की बृहत् कथा में रूपांतरित हो जाती है। इसलिये यह नहीं कहा जा सकता कि यह कहानी सतौर गांव के युवक वीरेंद्र सिंह नेगी और हलवाहे की बेटी हीरा की प्रेम कहानी मात्र है। उपन्यास में गांव की कथा आनंद सिंह अपने शेरू को सुनाते हैं तो लखनऊ में स्थापित वीरेंद्र सिंह नेगी की कहानी नेरेटर सुनाते हैं लेकिन ‘भूतगांव’ की कहानी साथ-साथ चलती है, जो दोनों कहानियों के अर्थ और गहरे करती जाती है। अपने हलवाहे चनरराम की बेटी हीरा के देह आकर्षण से विमोहित होकर वीरेंद्र उसे लखनऊ भगाकर ले गया था, पहाड़ से लेकर मैदान तक में इस तरह की घटनाएं होती रहती हैं, यह प्रेम का मामला है जिस पर दुनियाभर में खूब लिखा गया है और अब भी लिखा जा रहा है लेकिन नवीन जोशी जो बताना चाहते हैं, वह यह है कि वीरेंद्र सिंह नेगी से वी.एस.नेगी में जो मध्यवर्गीय युवा रूपांतरित हुआ था, वह महानगर में पक्की नौकरी और बड़े अधिकारी का संरक्षण पाकर अपनी जाति पर गर्व करने लगा। हीरा उसके हलवाहे की बेटी थी, वह उसकी जाति और सामाजिक जीवन में जातियों की विडंबनाओं से भलीभांति परिचित था लेकिन उसके युवा आकर्षण ने जाति और उसकी विभीषिका को भुला दिया था पर जीवन में स्थायित्व आने तथा सवर्ण मधुमिता गांगुली के संपर्क में आने के बाद हीरा में उसे दलितत्व नज़र आने लगा। यह अकेले वीरेंद्र की कहानी नहीं है बल्कि खाते-पीते सवर्ण मध्यवर्ग की कहानी है, जो अपनी हैसियत से अपना भद्र रूप चुनता है। यह इस रूप में अपनी जड़ों से जुड़ने की नहीं बल्कि सुविधानुसार बदलती व्याख्याओं की कहानी है।
नवीन जोशी पहाड़ और पहाड़ियों की उपेक्षा से आहत ऐसी कहानी लिख रहे थे, जो पहाड़, बर्फ, नदी, झरने और प्राकृतिक सौंदर्य से आकर्षित होकर जाने वाले सैलानियों के अनुभवों से अलग है। सैलानियों की मस्ती में पहाड़ का कठिन जीवन नहीं है, गरीबी और भूख भी नहीं है इसलिये उन्हें वहां सब कुछ अच्छा लगता है। जबकि पहाड़ सामाजिक बुराइयों और कुरीतियों से मुक्त नहीं है, वहां छुआछूत और जातिवाद जिस तरह व्याप्त है, वह भयावह है।
मुझे यह उपन्यास पढ़ते समय बार-बार यह अहसास हुआ कि उजड़ते गांवों की अनेक समस्याओं के साथ जातिवाद का दंश भी बड़ी समस्या रही है। उपन्यास जातिवाद पर नहीं है लेकिन उससे मुक्त भी नहीं है। सतौर गांव में अकेले रह रहे आनंद सिंह की अपनी पीड़ा है, जिसे वह कभी शेरू को सुनाता है तो कभी मन ही मन याद करके दुखी होता है। वह जब छोटा था, तब उसका बड़ा भाई वीरेंद्र हीरा को भगाकर ले गया था, इस घटना ने पूरे परिवार को तबाह कर दिया। उसका मानना है कि जो काम वीरेंद्र ने किया, उसका परिणाम भी उसे ही भुगतना चाहिये था लेकिन काम एक ने किया और परिणाम पूरे परिवार ने भुगता। उसकी बहन पत्थर बांधकर नदी में कूद गई और उसकी लाश पर सिर पटककर मां ने प्राण त्याग दिये, अपनी इज्जत के साथ जीने वाले पिता जीते जी ही मुरझा गये और पूरे घर को जाति बाहर कर दिया गया। आज भी इस तरह की घटनाएं खांप पंचायतों इत्यादि के माध्यम से सामने आ रही हैं, जिनका दंश पूरे परिवार को झेलना पड़ता है।
आनंद सिंह छोटा था, उसने अपने परिवार को बिखरते और घुटते हुये देखा था इसलिये वह कहता है ‘हमारे परिवार के साथ जो हुआ था, उसके बाद शादी की बात से ही मुझे चिढ़ हो गई थी। यह ख्याल कभी मन में आया ही नहीं। आज भी सोचता हूं क्या दोष था दीदी का? उसकी किसी अच्छे घर में शादी क्यों नहीं होनी चाहिये थी? न होता साला खानदानी खशिया! उसे क्यों अपमान सहना पड़ा? जान देनी पड़ी? इजा का गुमान क्यों इतना चूर-चूर हुआ कि उसने अपना सिर फोड़ डाला? और बाज्यू? गलती की थी तो ददा ने की थी। वैसे सोचो डियर शेरू, ददा की भी क्या गलती थी? इन खशियों की नाक इतनी ऊंची और नाज़ुक क्या हुई कि ज़रा-सा में जड़ से ही कट गई? धत्त साला, ये जात-बिरादरी और गोत्र-सोत्र ! ये लोग मुझे भी सुनाते वही सब। बार-बार ददा-भौजी, दीदी, इजा और बाज्यू के अपमान के किस्से दोहराये जाते। क्यों करता मैं शादी! इस समाज के खिलवाड़ के लिये? इनके तानों के लिये? आमा जब तक जिंदा रही, यही रट लगाती थी, हाथ जोड़ती थी- मेरे अन्नू रे शादी कर ले। छोटी जात में ही कर ले। एक घर चलाने वाली आ जायेगी। दो रोटी खिला देगी। कोई पानी देने वाला होगा। कब तक ऐसे रहेगा?’’
सतौर गांव का यह परिवार प्रतिष्ठित था या धनाढ्य था, यह प्रश्न बेमानी है। इसलिये कि गांव में इसके अलावा जातिगत सम्मान होता है, जिसको बचाये रखने के लिये परिवार का मुखिया हर समय चिंतित रहता है लेकिन वीरेंद्र की एक गलती के कारण पूरा परिवार जैसे खत्म ही हो गया। आनंद सिंह बचा तो किसके लिये, खंडहर और अकेले होते गांव के लिये, मंदिर से लेकर लोगों के घरों में दीया और धूप दिखाने भर के लिये। यह एक कहानी है, जो अपनी विभीषिका में दुखांत है इसलिये उपन्यास में उसका दुख बार-बार रिस-रिसकर बाहर आता है। पर नवीन जोशी की और भी चिंताएं हैं, जिन्हें बड़ी या छोटी कहकर नहीं आंका जा सकता। वे यह प्रश्न पूछते हैं कि अब गांवों में पानी के नल किसके लिये लग रहे हैं, जब पानी पीने वाले ही नहीं रहे, तब इन नलों की उपयोगिता किसके लिये है? वे पूछते हैं कि रोज़ी-रोटी के अभाव में गांवों में कोई क्यों रहना चाहेगा? उन जैसे तमाम लोगों की इच्छा थी कि ‘गांवों तक अच्छी सड़कें होतीं। अच्छी बसें चलतीं। छोटे-छोटे दफ्तर और लीसा-लकड़ी-जड़ी-बूटी-फल-फूल की फैक्टरी होती। मतलब गुजारे लायक नौकरियां होतीं।’ लेकिन पहाड़ के गांवों की ओर न किसी ने देखा और न गांवों के खाली होने से पहले किसी ने उनकी चिंता की। तब गांव खाली होने ही थे इसलिये हुये भी।
यह व्यापक चिंताएं हैं, जिन्हें नवीन जोशी एक-एक कर उपन्यास में उठाते हैं। उनकी चिंता यह भी है कि पहाड़ के आदमी की विश्वसनीयता को घर के नौकर तक सीमित करने की अवधारणा किसने प्रसारित की? ईमानदार और कर्मठ होने का मतलब उसके पंखों को कतर देना तो नहीं हो सकता?
पहाड़ी नदियों पर बांध बनाये जा रहे हैं, उनका पानी रोककर निजी कंपनियों को दिया जा रहा है, पेड़ काटे जा रहे हैं, पहाड़ काटकर चैड़ी सड़कें बनाई जा रही हैं, उजड़े गांवों की ज़मीन निजी स्कूल खोलने के लिये दी जा रही है यानी विकास के नाम पर पहाड़ों की आत्मा पर दुर्दांत प्रहार किये जा रहे हैं। पहले एक ही बाघ की चिंता रहती थी लेकिन ‘अब और भी भयानक बाघ आ रहे हैं। ये कंपनी हम सबके लिये बाघ ही तो हुई। और ये हमारी सरकार कैसी है यार? क्यों दे रही किसी कंपनी को हमारी ज़मीन? सरकार भी नरभक्षी बाघ नहीं हुई क्या? उसे हमने गांव बचाने के लिये चुना था या गांव बेच खाने के लिये?’
इन स्थितियों में नवीन जोशी को उत्तराखंड राज्य की स्थापना के लिये दी गई कुर्बानियां याद आती हैं और वे अलग राज्य बनने के सपनों के बारे में सोचते हैं, जो धीरे-धीरे समाप्त कर दिये गये। कहना न होगा कि पहाड़ की स्थितियां अलग हैं, उनके सपने और संघर्ष अलग हैं लेकिन दुर्भाग्य से उन्हें समझने वाला कोई नहीं है। इसलिये पहाड़ के गांव उजड़ रहे हैं, चारों ओर भुतहा सन्नाटा है। इस उजाड़ और भुतहे सन्नाटे में बाघ का डर, उसकी आवाज़ जंग खाये तालों के अंदर तक सुनी जा सकती है।
‘भूतगांव’ अतीत के साथ इक्कीसवीं सदी में देखे गये सपनों की भी कहानी है, यह कहने भर को उपन्यास नहीं है बल्कि इसका वितान औपन्यासिक है इसलिये सारी कथाएं सतौर गांव की हैं या सतौर गांव से संबंधित हैं।
उपन्यास के अंत में वीरेंद्र के बेटा और बेटी जो अमेरिका और जर्मनी में रह रहे हैं गांव आते हैं और बाघ के भय और आतंक से मनोरोगी बने अपने चाचा आनंद सिंह को देखते हैं तो उन्हें अपने पिता का मनोरोग याद आता है। अकेलेपन में तमाम तरह की ग्रंथियां भयावह रूप में व्यक्तित्व को खत्म करती हैं, इन ग्रंथियों का शिकार बने लोग धीरे-धीरे समाप्त हो रहे हैं। कहना न होगा कि उपन्यास को जिस भाषा में गढ़ा गया है, उसमें पहाड़ी छोंक है, जो इसे पठनीय बनाता है।
-सूरज पालीवाल
(‘हंस’ अप्रैल 2026 में प्रकाशित)
Wednesday, February 25, 2026
कुमाउंनी के अप्रतिम सेनानी- बंशीधर पाठक 'जिज्ञासु'
हमारी दुनिया में ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्होंने आत्मप्रचार से कोसों दूर रहकर किसी एक विशेष उद्देश्य के लिए अपना जीवन समर्पित किया। स्वर्गीय बंशीधर पाठक 'जिज्ञासु' को इसी श्रेणी में रखा जा सकता है। कुमाऊंनी बोली-भाषा और उसके साहित्य के लिए अथक प्रयास करने वाले 'जिज्ञासु' जी की जीवन-यात्रा को पुस्तक का रूप दिया वरिष्ठ पत्रकार- साहित्यकार नवीन जोशी ने। इसी पुस्तक का लोकार्पण समारोह 'जिज्ञासु' जी के जन्मदिवस 21 फरवरी 2026 को लखनऊ के पेपर मिल कॉलोनी स्थित 'ऑल इंडिया कैफी आज़मी अकादमी' सभागार में 'आँखर' एवं 'निसर्ग' संस्था के तत्वावधान में संपन्न हुआ। 256 पृष्ठ, 26 अध्यायों वाली पुस्तक 'बंशीधर पाठक 'जिज्ञासु' : कुमाऊँनी का अप्रतिम सेनानी' (प्रकाशक नवारुण प्रकाशन, मूल्य ₹400) का लोकार्पण समारोह दरअसल महज़ एक लोकार्पण समारोह नहीं था, वरन वह उस युग को पुनर्सृजित करने जैसा था जब संचार माध्यम के तौर पर आकाशवाणी की एक महत्वपूर्ण भूमिका थी।
कार्यक्रम के प्रारंभ में ‘निसर्ग’ के ललित सिंह पोखरिया ने अतिथियों का स्वागत किया। पुस्तक के सम्पादक नवीन जोशी जी ने 'जिज्ञासु' जी का परिचय देते हुए बताया कि 21 फरवरी, 1934 को अल्मोड़ा जिले के ग्राम नहरा में जन्मे बंशीधर पाठक जी कैसे रोजी-रोटी की तलाश में दिल्ली से शिमला होते हुए अंबाला पहुंचे, जहां उन्हें खादी ग्रामोद्योग विभाग में स्टेनो-टाइपिस्ट की नौकरी मिली जो उन्हें क़तई पसंद न थी। फिर जयदेव शर्मा 'कमल' जी से मित्रता ने उन्हें आकाशवाणी लखनऊ के उत्तरायण कार्यक्रम में कंपीयर की नौकरी दिलवा दी। यहां यह उल्लेख करना उचित होगा कि अंबाला से पूर्व 'जिज्ञासु' जी शिमला में ‘कमल’ जी के साथ ही एक संस्था में बच्चों को पढ़ाया करते थे। फिर कमल जी आकाशवाणी में आ गए और उनका तबादला लखनऊ हो गया।
वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध के पश्चात केंद्रीय सरकार के स्तर से यह रणनीति बनी कि चीन से सटे हिमालयी क्षेत्रों को राष्ट्र की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए आकाशवाणी लखनऊ के शॉर्टवेव से कुमाऊंनी-गढ़वाली बोलियों में एक कार्यक्रम प्रारंभ किया जाए। 22 नवंबर, 1962 को 15 मिनट की अवधि वाले ‘उत्तरायण’ कार्यक्रम का श्री गणेश हुआ। शुरुआती दौर में कार्यक्रम को गढ़वाली बोली में जीत सिंह जरधारी जी ने और हिंदी में जयदेव शर्मा 'कमल' जी ने संचालित किया। 7 जनवरी, 1963 को 'जिज्ञासु' जी कुमाऊँनी कंपीयर के बतौर जुड़ गए। फरवरी 1964 में इस कार्यक्रम की अवधि 60 मिनट की कर दी गई। नवीन जोशी जी ने उपस्थित श्रोता समुदाय को सूचित किया कि उस दौर में 'उत्तरायण' आकाशवाणी का एकमात्र कार्यक्रम था जो एक घंटे की अवधि का था। 'उत्तरायण' कार्यक्रम की लोकप्रियता का यह हाल था कि पहाड़ी गाँव कस्बों से ही नहीं, सीमांतों पर तैनात उत्तराखंडी फ़ौजियों की फ़रमाइशी चिट्ठियों से ‘उत्तरायण’ एकांश की मेजे़ं और आलमारियां भरने लगीं। वह संपूर्ण उत्तराखंड की सांस्कृतिक धड़कन बन गया। उत्तराखंड की बोलियों का उस दौर का कोई नया पुराना कवि, लेखक, गायक, वादक, लोक कलाकार वगैरह नहीं बचा होगा जो उत्तरायण का मेहमान न बना हो। 'जिज्ञासु' जी के योगदान को रेखांकित करते हुए नवीन जी ने कहा कि 60 के दशक का दौर ऐसा था, जब वर्तमान उत्तराखंड से आने वाले लोग अपनी मातृभाषा कुमाऊंनी और गढ़वाली बोलते झिझकते थे, ऐसे वक्त में जिज्ञासु जी इन बोलियों को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे थे। 'जिज्ञासु' जी पैदल ही अपना झोला टाँगे कुमाऊँनी परिवारों में जाते, वहाँ सदस्यों को प्रेरित करते कि वह अपनी मातृ बोली में 'उत्तरायण' के लिए वार्ता /कहानी /कविता लिखें। उनके अथक प्रयत्नों का परिणाम था कि सैकड़ों लोग आकाशवाणी से जुड़े। आकाशवाणी के माध्यम से आपने न जाने कितनी प्रतिभाओं को संवारा,निखारा। अपनी मातृ बोली में कुछ महत्वपूर्ण करने की इच्छा के चलते 'जिज्ञासु' जी ने 'शिखर संगम' संस्था बनाई। इस संस्था के तहत पहली बार 1975 में एक गढ़वाली एवं एक कुमाऊँनी नाटक का मंचन भी किया गया। उस दौर में नाटकों में महिला किरदार निभाने के लिए महिलाएं सामने नहीं आती थीं, लेकिन रेणु पंत, रमा गुसाईं और उषा खंडूड़ी जैसी महिलाऐं सामने आईं और उन्होंने नाटकों में अभिनय किया। फिर आया वर्ष 1978 जब जिज्ञासु जी के नेतृत्व में 'आँखर' संस्था का गठन किया गया। वर्ष 1988 तक यह संस्था सक्रिय रही। इस संस्था के बैनर तले बहुत से नाटकों का मंचन लखनऊ के अतिरिक्त कानपुर, पीलीभीत, अल्मोड़ा, नैनीताल और भोपाल में भी हुए। कुमाऊंनी बोली में जनवरी 1993 में 'जिज्ञासु'जी ने 'आॉखर' नाम से एक मासिक पत्रिका भी निकाली, जो फिर त्रैमासिक होकर अक्टूबर 1995 में यह बंद हो गई। 'जिज्ञासु' जी की जीवन यात्रा के इतने विस्तृत परिचय के पश्चात मंच पर उपस्थित भातखंडे संगीत समविश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति डॉ पूर्णिमा पांडेय ने 'जिज्ञासु' जी के साथ अपने रिश्तों का उल्लेख करते हुए कहा कि 'जिज्ञासु' जी ने उन्हें कुमाऊंनी सिखाई थी। डॉक्टर पांडेय ने बताया कि 'जिज्ञासु' जी के सानिध्य में उन्होंने 'पुंतरी' नाटक में भाग भी लिया था।
इस कार्यक्रम में नैनीताल से आए 'नैनीताल समाचार' के संपादक राजीव लोचन साह जी ने 'जिज्ञासु' जी के साथ अपने संबंधों का खु़लासा करते हुए बताया कि वर्ष 1977 में इमरजेंसी के बाद जब 'नैनीताल समाचार' की शुरुआत हुई थी तो अख़बार के सिलसिले में उन्हें नैनीताल से लखनऊ आना पड़ता था। लखनऊ में नवीन जोशी जी के माध्यम से राजीव जी की भेंट 'जिज्ञासु' जी से होती थी। 'जिज्ञासु' जी के माध्यम से उनको लखनऊ के पर्वतीय समाज की विभिन्न जानकारियां हासिल होती रहती थीं। राजीव जी ने बताया कि 'नैनीताल समाचार' प्रकाशन के साथ ही 'हुड़का' प्रकाशन भी प्रारंभ किया गया था। इस प्रकाशन से पहली पुस्तक शेर सिंह बिष्ट 'अनपढ़' का कुमाऊंनी काव्य संग्रह 'मेरि लटि-पटि' प्रकाशित हुआ तो दूसरी पुस्तिका 'जिज्ञासु' जी का काव्य संग्रह 'सिसौंण'। कुमाऊंनी बोली में दिये अपने वक्तव्य में आपने यह भी जानकारी दी कि वर्ष 2027 में ' नैनीताल समाचार' को अपने प्रकाशन के 50 वर्ष पूर्ण हो जाएंगे। इस अवसर पर किसी बड़े आयोजन का विचार भी है।
बंशीधर पाठक 'जिज्ञासु' जी को समर्पित इस कार्यक्रम में बहैसियत मुख्य अतिथि बोलते हुए प्रसिद्ध हिमालयविद् एवं 'पहाड़' पत्रिका के संपादक डॉ शेखर पाठक ने बताया कि 'जिज्ञासु' जी के साथ उन्होंने लखनऊ शहर में लोफरिंग के मजे़दार अनुभव लिए थे। उन्होंने कहा कि जिज्ञासु जी को कुमाऊंनी भाषा-बोली को आगे बढ़ाने की इतनी प्रबल इच्छा थी कि बिना किसी परिचय के भी वह किसी भी कुमाऊंनी परिवार का दरवाजा खटखटा देते और फिर वहां जाकर सभी को अपनी मातृभाषा बोलने के लिए प्रेरित करते। जिज्ञासु' जी के माध्यम से उन्हें अमृतलाल नागर, भगवती चरण वर्मा, यशपाल, ठाकुर प्रसाद सिंह जैसे लब्ध प्रतिष्ठ साहित्यकारों से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। डॉ शेखर पाठक ने कहा कि 'जिज्ञासु' जी ने तीन खिड़कियाँ खोलीं। प्रथम, अपनी भाषा को जानने की, द्वितीय- दूसरी भाषा के लोगों को जानने की और तीसरी खिड़की देश और दुनिया को जानने की। उन्होंने कहा कि ‘उत्तरायण’ कार्यक्रम से प्रायः प्रतिरोध की कविताएं भी प्रसारित होती रहती थीं। डॉ शेखर पाठक ने आकाशवाणी लखनऊ एवं आकाशवाणी नजीबाबाद से संबद्ध रहे प्रसिद्ध गायक एवं ढोल वादक केशव अनुरागी का भी अपने वक्तव्य में ज़िक्र किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रोफेसर किरण कुमार थपल्याल ने की। आपने कहा कि वर्तमान दौर में क्षेत्रीय भाषाओं के समक्ष गंभीर संकट है। यूनेस्को के अनुसार जल्द ही ख़त्म होने वाली भाषाओं में कुमाऊंनी भी है, ऐसे में जिज्ञासु जी का घर-घर जाकर लोगों को कुमाऊंनी भाषा के लिए प्रेरित करना वास्तव में त्याग और सेवा का एक अनुपम उदाहरण था। प्रोफेसर थपलियाल ने उस दौर के बहुत से मजे़दार क़िस्से श्रोताओं के साथ साझा किए। जैसे, कैसे किन्हीं कृषि वैज्ञानिक डॉक्टर थपल्याल द्वारा ऐन मौके पर कार्यक्रम में उपस्थित होने में असमर्थता व्यक्त करने पर 'जिज्ञासु' जी द्वारा उन्हें निवेदन किया गया कि वह आलू की महत्ता पर एक वार्ता लिख दें। फिर प्रोफे़सर थपल्याल, जो कि प्राचीन इतिहास एवं पुरातत्व विभाग में प्रोफेसर थे, उन्होंने वनस्पति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर से जानकारी लेकर आलू पर एक वार्ता लिखी जो बाद में काफ़ी सराही गई।
चाय के बाद प्रारंभ हुए कार्यक्रम के दूसरे चरण में जिज्ञासु जी द्वारा रचित गीतों का आनंद सभी ने लिया। जहां लखनऊ की गायिका विमल पंत और भाषा पंत ने गीतों और एक हास्य कव्वाली गाकर हॉल को कुमाऊंनी साहित्य के सौंदर्य से भर दिया, वहीं हल्द्वानी में रह रहीं और कार्यक्रम में अनुपस्थित प्रसिद्ध गायिका वीना तिवारी की रिकॉर्डिंग का आनंद सभी ने लिया। इस कार्यक्रम के पहले हिस्से का संचालन कार्यक्रम संयोजक नवीन जोशी जी ने किया। वहीं दूसरे हिस्से का संचालन नवीन जी की जीवन संगिनी लता जोशी जी ने किया। कार्यक्रम में श्रीमती विमल पंत एवं श्रीमती भाषा पंत को सम्मानित भी किया गया। इस अवसर पर सभागार में मौजूद लोगों में शामिल थे श्रीमती रुक्मिणी शर्मा (पत्नी स्वर्गीय जयदेव शर्मा 'कमल') विकल्प शर्मा (पुत्र स्वर्गीय जयदेव शर्मा 'कमल') प्रोफेसर रमेश दीक्षित, पत्रकार जगत से वंदना मिश्र, महेश पांडेय, जगदीश जोशी, आलोक जोशी, कुमार सौवीर, पुरातत्वशास्त्री राकेश तिवारी, राजीव ध्यानी, प्रतुल जोशी, लक्ष्मी जोशी, उमा मैठाणी, नारायण सिंह रौतेला, पंकज सिन्हा, रंगकर्मी मेराज आलम, मीता पंत, मोहन पंत, विमल जोशी, ऊषा पांडेय, हेमा जोशी, भाषाविद मुमताज़ अहमद, कहानीकार दीपक श्रीवास्तव, आलोचक प्रभात त्रिपाठी, धनंजय शुक्ल, भूगर्भ शास्त्री आलोक पांडेय, डायरेक्टर जयपुरिया मैनेजमेंट कॉलेज डॉ कविता पाठक, डॉक्टर आरती बरनवाल ,सतीश जोशी, सुधा मिश्र, नवारुण प्रकाशन के सर्वेसर्वा संजय जोशी, पर्वतीय महापरिषद के अध्यक्ष गणेश चंद्र जोशी, उत्तराखण्ड महापरिषद के अध्यक्ष हरीश पंत, कवि ज्ञान पंत, घनानंद पांडे, 'जिज्ञासु' जी के छोटे भाई गणेश चन्द्र पाठक, जिज्ञासु जी के ज्येष्ठ पुत्र चारु चंद्र पाठक एवं उनकी पत्नी दीपा पाठक कनिष्ठ पुत्र दिव्यरंजन पाठक, आकाशवाणी के पूर्व अतिरिक्त महानिदेशक सतीश ग्रोवर आदि।
-प्रतुल जोशी

