Monday, October 12, 2026

ना द तिवारी जीते जी अप्रासंगिक बना दिए गए थे

(नारायण दत्त तिवारी का यह जन्म शताब्दी वर्ष है। उन्हें याद करना शुचिता, शालीनता, नैतिकता और मर्यादा की राजनीति को याद करना है, जिसकी जगह आज की राजनीति में समाप्त हो चुकी है। आज 13 अक्टूबर 2026 को पूर्णांनद तिवारी सेवा संस्थान ने लखनऊ में उनका शताब्दी समारोह आयोजित किया था। उसी अवसर पर इस लेख की याद आई, जो नारायण दत्त तिवारी के 66वें जन्म दिन पर, 18 अक्टूबर 1991 को 'स्वतंत्र भारत’ अखबार में तनिक इस क्षोभ के साथ लिखा गया था कि क्या बदलती हुई राजनैतिक परिस्थितियों में नारायण दत्त तिवारी जैसे योग्य, अनुभवी, शालीन और मर्यादित राजनीति करने वाले की यही नियति होगी कि वह हाशिए पर ही रहने को विवश होगा! इस क्षोभ का कारण यह था कि राजीव गांधी की हत्या के बाद जो राजनैतिक स्थितियां बन रही थीं, उनमें तिवारी जी का नाम प्रधानमंत्री पद के सम्भावित नामों में शीर्ष पर था किंतु चुनावी पराजय ने उनके साथ क्रूर छल कर दिया। स्वयं उनके संकोचों और अपने लिए निर्धारित सीमाओं का अतिक्रमण न करने की उनकी मर्यादा  की भूमिका इसमें कम नहीं थी - नवीन जोशी।)


सन 1991 में नारायण दत्त तिवारी का जन्मदिन विजयादशमी को पड़ ज़रूर रहा है लेकिन राजनीति में उनकी लंका-विजय अभी दूर है। मई 1991 में जब राजीव गांधी के दृश्य से अचानक उठ जाने और सोनिया गांधी के मंच पर न आने से कांग्रेस और उसके नेताओं को अपने कायाकल्प का अवसर मिला है, तब नारायण दत्त तिवारी हाशिये पर खड़े हैं। यह उनका राजनीतिक वनवास तो शायद नहीं है, लेकिन वे राजमहल या राजधानी की चारदीवारी के भीतर भी नहीं है। जिस नारायण दत्त तिवारी का कद कांग्रेस के किसी भी वर्तमान नेता से छोटा नहीं है, लस्त-पस्त पड़ी और पुनः खड़ी हो पाने की कोशिश करती हुई कांग्रेस पार्टी को उनकी कितनी जरूरत महसूस हो रही है?

थोड़ा सा पीछे जाएं, इसी मई-जून में, जब राजीव गांधी की निर्मम हत्या के सदमे से उबरते हुए कांग्रेस पार्टी शेष चुनावों का सामना करने के लिए खड़ी हो रही थी और केन्द्र में उसके सत्तारूढ़ होने की संभावनाएं लग रही थीं, तब भावी प्रधानमंत्री के लिए जो दो-चार नाम उछल रहे थे रहे थे, उनमें नारायण दत्त तिवारी का नाम सबसे ज्यादा चमकदार लग रहा था। 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह के चिढ़ाने पर (कि तिवारी जी राजीव गांधी का सबसे अच्छा विकल्प हैं) जो नारायण दत्त तिवारी यह कहते थे कि प्रधानमंत्री बनने का सपना मेरे सोच से भी परे है, 1991 की जून में वही समर्पित सिपाही केन्द्र की शिखर-सत्ता का गणित लगाने लगा था। स्थितियों ने इतनी तेजी से पलटा खाया था और यह बिल्कुल स्वाभाविक था कि तिवारी जी जैसे शालीन, विद्वान, अनुभवी, निर्विवाद और समर्पित कांग्रेसी का नाम भावी प्रधानमंत्री के रूप में लिया जाए। लेकिन इससे पहले कि कांग्रेस की दूसरी ताकतें तिवारी जी को नेपथ्य में धकेलने की कोशिश करतीं, खुद तिवारी जी के उत्तर प्रदेश में और उनके खास चुनाव क्षेत्र नैनीताल में ही किस्मत ने उनसे छल किया। चुनाव परिणाम की उस रात तिवारी जी सचमुच बहुत उदास थे। अपनों से ही पराजित वे चुपचाप हाशिये पर आ गए। आज अपना जन्मदिन वे इसी उदासी को पोछते हुए मना रहे हैं।

लेकिन यह उपयुक्त बहाना है यह विचार करने का कि आज की राजनीति में नारायण दत्त तिवारी जैसे शालीन और विद्वान नेताओं की क्या यही नियति है कि जब-जब उनकी सबसे ज्यादा जरूरत होगी, तब-तब वे हाशिये पर पड़े उपेक्षित महसूस करते रहेंगे? आज जो कांग्रेसी यह दहाड़ रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की दुर्गति इसलिए हुई कि उसने मुलायम सिंह की अलोकप्रिय सरकार का साथ दिया और इसके लिए सारा दोष प्रकारान्तर से तिवारी जी पर थोप रहे हैं, वे यह क्यों भूल जा रहे हैं कि उस दौरान कांग्रेस तिवारी जी से कैसा सलूक कर रही थी। विधानसभा में विपक्ष के नेता की हैसियत वाले नारायण दत्त तिवारी को केन्द्रीय नेतृत्व ने कैसे असमंजस में डाल रखा था, समर्थन वापस लेना है या नहीं लेना है? सच तो यह है कि केन्द्र के स्तर पर राजीव गांधी और उनकी मित्र मण्डली दूसरा ही खेल खेल रही थी और उ. प्र. में कांग्रेस असमंजसों में झूल रही थी। इसी खेल का नतीजा था कि मुलायम सिंह ने चुपके से विधानसभा भंग करने की सिफारिश कर दी और तिवारी जी को पत्ता तक नहीं चला। तब उनके साथ कैसा सलूक हो रहा था?

क्या नारायण दत्त तिवारी की त्रासदी यह है कि राजनीति करने की उनकी शैली गुलाम नबी आजाद या कल्पनाथ राय और के. के. तिवारी वाली नहीं है? क्या वीर बहादुर सिंह की कांग्रेसी शैली के प्रादुर्भाव के बाद तिवारी-शैली अप्रासंगिक हो जाती है? अपने राजनीतिक प्रतिद्वन्दी को अनर्गल प्रलाप और दहाड़ से पटकनी न देने के कारण क्या तिवारी जी राजनीति के अखाड़े में पहलवान नहीं रह जाते? क्या संसदीय कौशल, वाकपटुता, राजनैतिक चातुर्य, अध्ययनशीलता की परम्परा पर चलने के कारण ही वे आज की राजनीति में 'मिस फिट' हो जाते हैं? 'मिस फिट' नारायण दत्त तिवारी कभी नहीं रहे और आज भी, यदि वे लोकसभा का चुनाव न हारे होते, तो उनकी उपेक्षा करना संभव नहीं था। सच तो यह है कि उन्होंने अपने व्यक्तित्व को संकरे कपड़ों में छुपाकर रखा और यह कांग्रेस की आज तक की संस्कृति की तकाजा था। आज तक कांग्रेस में एक ही नेता हो सकता था और बाकी सारी प्रतिभाओं को कार्यकर्ता बनकर रहने की मजबूरी थी। इसलिए नारायण दत्त तिवारी ने अपने को ‘अदना सिपाही’ बनाकर ही रखा। कभी-कभी लगता है कि वे कांग्रेस में जरूरत से ज्यादा दबकर रह रहे हैं और अपने को उन्होंने कभी 'एसर्ट' नहीं किया। लेकिन जिस-जिस ने कांग्रेस में खुद को 'एसर्ट' करना चाहा, वह क्या कांग्रेस में रह पाया? हेमवती नंदन बहुगुणा जनता पार्टी में आने पर कहा करते थे कि इंदिरा गांधी अपने कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों और दूसरे नेताओं को बीच-बीच में उखाड़-उखाड़ कर देखती रहती हैं कि कहीं कोई जड़ तो नहीं पकड़ रहा है। राजीव गांधी के समय तक यह कांग्रेस की संस्कृति रही है कि वहां सबका कद काट-काट कर छोटा किया जाता रहा, ताकि कोई नेता (प्रधानमंत्री/कांग्रेसाध्यक्ष) के कद तक न पहुंच जाए। आप नारायण दत्त तिवारी पर यह आरोप लगा सकते हैं कि वे अपनी ऊंची बढ़ती शाखाओं को खुद ही कतरते रहे और आज तक कांग्रेस के दीवानखाने में जानबूझकर एक 'बोनसाई' की तरह जमे रहे। उन्होंने न हेमवती नंदन बहुगुणा की राह पकड़ी, न विश्वनाथ प्रताप सिंह की और कमलापति त्रिपाठी की राह जाते भी वे नहीं दिखाई देते।

नारायण दत्त तिवारी के पिता कोई गोविन्द बल्लभ पंत नहीं थे, इसलिए यह निर्विवाद है कि उन्होंने जो भी राजनीतिक शिखर छुए, वह उनकी मेहनत, संघर्ष और लगन की निजी कमाई है। आज जब कि कांग्रेस को नेहरू वंशवाद के अभिशाप से मुक्ति मिली है (कांग्रेसियों को सोनिया गांधी का बड़ा आभार मानना चाहिए कि वे राजनीति में नहीं जा रही हैं) और कांग्रेस को अपनी नर्सरी में प्रतिभाओं की पौधशाला उगाने का पूरा मौका है, तब भी क्या नारायण दत्त तिवारी खुद ही 'बोनसाई' बने रहने की मजबूरी से मुक्त नहीं होंगे? उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के पुनर्जीवन और खुद नारायण दत्त तिवारी के लिए यह लखटकिया सवाल है। सवाल यह भी है कि यदि आज कांग्रेस में पी. वी. नरसिंह राव का वर्तमान सच हो सकता है, तो नारायण दत्त तिवारी का भविष्य सच क्यों नहीं हो सकता?

पिछले एक साल से ‘चिंतन’ की छोटी-बड़ी गोष्ठियों में कभी-कभी अधकचरी बहसों को भी अत्यंत गम्भीरता से सुनते हुए नारायण दत्त तिवारी को देखकर लगता है कि वे कम से कम हताश नहीं है। सक्रिय तो वे हैं ही। यह उनकी अध्ययनशील प्रवृत्ति का विस्तार होने के साथ-साथ राजनीति में ऐसी ही प्रवृत्तिवाली पीढ़ी तैयार करने का दीर्घकालीन प्रयास भी हो सकता है। लेकिन कांग्रेस में और यहीं उत्तर प्रदेश में एक पीढ़ी है जो अब नारायण दत्त तिवारी से निराश और ऊबती दिखाई देती है। यह पीढ़ी उनसे किसी हंगामा मचाऊ राजनीति की उम्मीद नहीं करती और इसके बिना राजनीति को व्यावहारिक नहीं मानकर अपना अलग रास्ता चुन रही है। इस बार की विदेश यात्रा से लखनऊ लौटने पर तिवारी जी ने जो कहा वह भी सक्रिय राजनीति की दृष्टि से उत्साहवर्धक नहीं है। उपचुनाव लड़ने की बाबत पूछने पर उनका जवाब था कि मैं अब दलगत राजनीति से ऊपर उठकर देश की आर्थिक बेहतरी के लिए काम करना चाहता हूँ। उधर पहाड़ में भी उनकी लोकप्रियता गिरी है। चुनाव हारना अलग बात है और पुराने विश्वस्त लोगों का भरोसा खोना अलग बात। नैनीताल क्षेत्र में तिवारी जी के संघर्ष के दिनों के कई साथी अब उनकी तरफ से उपेक्षा महसूस करते हैं और जो नए लोग उनके इर्द-गिर्द जमा हुए हैं, वे चेहरा दिखाऊ ही ज्यादा है। स्वयं तिवारी जी जानते हैं कि इस चुनाव में ही बहेड़ी के कुछ मतदान केन्द्रों पर उनका कोई कार्यकर्ता एजेन्ट के रूप में मौजूद नहीं था।

उनकी कार्यप्रणाली के आलोचक भी कम नहीं हैं। उन्हें 'न्यू डेहली तिवारी' और 'नथिंग डूइंग तिवारी' कहने वाले लोग भी हैं। खुद तिवारी जी ने एक बार मुख्यमंत्री पद छोड़कर दिल्ली जाते हुए लगभग खीझकर कहा था कि उत्तर प्रदेश का कुछ नहीं किया जा सकता, यहां काम का माहौल ही नहीं है। लेकिन उनकी कार्यक्षमता और कार्यकुशलता के कई किस्से आप सचिवालय के अधिकारियों से सुन सको हैं। उन्होंने आज तक किसी अफसर से अप्रिय नहीं बोला और अपने राजनैतिक प्रतिद्वंद्वी को मित्र ही माना। उनके राजनैतिक जीवन की अब तक की चादर बेदाग कही जा सकती है। वे कभी किसी विवाद में नहीं फंसे और उन पर कोई आरोप नहीं लगा। कुल मिलाकर उनका राजनैतिक भागफल खूब बड़ा है, जिसे कोई नकार नहीं सकता। उनकी योग्यता निर्विवाद है- किसी भी पद के लिए।

लेकिन यह स्वयं नारायण दत्त तिवारी पर निर्भर है कि कांग्रेस के वर्तमान हालात में वे अपने लिए कौन सा रास्ता चुनते हैं। दलीय राजनीति से ऊपर उठकर देश के लिए काम करने का संत भाव अपनाते हैं या बीस वर्ष पुराने जोश से अखाड़े में कूदते हैं या फिर लगभग निर्लिप्त भाव से 'जेहि विधि राखे राम' का बस इंतजार ही करते हैं। आज 1991 के जन्म दिन पर इस सवाल का जवाब शायद वे अपने भीतर टटोल रहे हों।

- न जो, 13-10-2026 

 

Tuesday, October 06, 2026

नागरिकों को मताधिकार वंचित करने पर सजा क्यों न हो?

बंगाल, बिहार समेत उन सभी राज्यों में , जहां विधान सभा चुनाव हो चुके हैं या एसआईआर पूरा हो चुका है, अब 'छूटे हुए' मतदाताओं के नाम जोड़ने की कवायद चुनाव आयोग ने शुरू कराई है। ये 'छूटे हुए' नहीं, 'छोड़े गए' मतदाता हैं। अकेले बंगाल में 27 लाख मतदाता बाहर कर दिए गए। वे न विधान सभा चुनाव में वॉत डाल पाए, न चंद दिन पहले हुए उपचुनाव में। जब पोल खुलनी शुरू हुई तब राज्यों के बीएलओ से कहा जा रहा है कि छूटे हुए मतदाताओं का घर-घर जाकर पता लगाइए। फॉर्म 6 में किया गया बदलाव भी वापस ले लिया गया है, सिर्फ उन्हीं राज्यों में जहां एसआईआर पूरा हो गया है। यह सब पहले क्यों नहीं हो सकता था। 

करीब 13 करोड़ मतदाता एसआईआर के नाम पर सूची से हटा दिए गए। इनमें बहुत से मृत्यु अथवा अन्य कारणों से मतदाता नहीं रह गए थे लेकिन करोड़ों ऐसे हैं जो मतदाता हैं लेकिन आयोग की कड़ी शर्तों या नाम-पते में मामूली विसगतियों के कारण बाहर कर दिए गए। इतने बड़े पैमाने पर मताधिकार छीने जाने के 'अपराध' की सजा क्यों नहीं होनी चाहिए? 

चुनाव और नागरिकों का मताधिकार लोकतंत्र की बुनियाद है। इस बुनियाद को खोखला करने की कुछ सुनियोजित साजिशों का पर्दाफाश होना शुरू हुआ है। चुनाव आयोग की भूमिका गम्भीर रूप से संदिग्ध पाई जा रही है। 

इन तथ्यों पर गौर करिए-

1. मतदाता बनाना और एक भी वयस्क नागरिक मतदान से वंचित न होने पाए, अब तक यह चुनाव आयोग की जिम्मेदारी रही है।  एसआईआर के बहाने इस चुनाव आयोग ने पहली बार यह दायित्व जनता पर डाल दिया कि वे साबित करें कि वे वैध मतदाता, और इस प्रकार भारतीय नागरिक, हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस बारे में बहुत सी आपत्तियों को खारिज कर दिया। 

2.  नए मतदाता बनने के लिए फॉर्म- 6 भरना होता है। इस चुनाव आयोग ने एसआईआर के बहाने फॉर्म-6 में एक नया  परिवर्तन कर दिया- मतदाता बनने के लिए यह बताना जरूरी है कि आपके माता-पिता पहले मतदाता सूची में थे या नहीं। 

3. यह नियम विरुद्ध है और सरकार ने नियम बदला नहीं है। दो चुनाव आयुक्तों ने इस पर आपत्ति की लेकिन उनकी आपत्ति दरकिनार कर दी गई। यानी यह फैसला सर्वसम्मति या बहुमत से नहीं हुआ, जो कि नियमानुसार होना ही चाहिए था। 

4. चुनाव आयोग ने पिछले दिनों कहा कि फॉर्म-6 में बदलाव को सुप्रीम कोर्ट ने उचित बताया। अब सुप्रीम कोर्ट कह रहा है कि उसने ऐसा कभी नहीं कहा। अब वह आयोग के कागजात देखेगा कि क्या नियम का उल्लंघन हुआ है। 

5. जिन राज्यों में एसआईआर हो चुका है या जहां इन दिनों चल रहा है, वहां बहुत बड़ी संख्या में भाजपा के बूथ एजेण्ट फॉर्म- 7 भरकर जमा कर रहे हैं। फॉर्म-7 सूची से नाम काटने के लिए होता है। यह तब भरा जाता है जब किसी की मृत्यु हो जाए या किसी का नाम दो बार सूची में हो। भाजपा के लोग ढेरों-ढेर फॉर्म-7 भरकर उन मतदाताओं के नाम कटवा रहे हैं, जो प्रकटत: भाजपा विरोधी हैं, जैसे मुसलमान।

6. दो दिन पहले कर्नाटक के बलारी विधान सभा क्षेत्र  में भाजपा का एक बूथ एजेण्ट 7500 मतदाताओं के नाम काटने के लिए ढेर सारे फॉर्म-7 भरकर बीएलओ के पास जमा करने आया। उसने कहा कि ये मतदाता मौजूद नहीं हैं। कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है। बीएलओ ने नियम विरुद्ध बताकर फॉर्म नहीं लिए। भाजपा के इस कार्यकर्ता के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट लिखी गई है और जांच हो रही है। THE HINDU अखबार ने 05 अक्टूबर 2026 को विस्तार से यह रिपोर्ट छापी है। 

7. कर्नाटक के ही बीजापुर में 1046 मुस्लिम मतदाताओं के नाम काटने के लिए फॉर्म -7 भरकर जमा किए गए। कई फॉर्म-7 में प्रमाण के तौर पर इन मतदाताओं के मृत्यु प्रमाण पत्र नत्थी किए गए थे, जबकि वे मतदाता मौजूद हैं। जांच में पाया गया कि मृत्यु प्रमाण पत्र फर्जी थे। ( देखें THE HINDU अखबार की रिपोर्ट, दि. 05 अक्टूबर 2026)  

8. पिछले दिनों झारखण्ड में भी ऐसे कई मामले पकड़े गए थे। भाजपा के बूथ एजेंट सैकड़ों की संख्या में फॉर्म-7 भरकर बीएलओ के पास जमा करने आए। एक मामले में तो खुद बीएलओ और उसके परिवार के नाम काटने का फॉर्म उनके सामने आया। राज्य में चूंकि भाजपा की सरकार नहीं है, इसलिए बीएलओ ने फॉर्म नहीं लिए और शिकायत की। पाया गया कि जिनके नाम काटने के लिए फॉर्म भरा जा रहा है, वे वैध मतदाता हैं और उसी ठिकाने में रह रहे हैं। इनमें ज़्यादातर मुस्लिम मतदाता हैं। 

9. ऐसा ही खेल बंगाल और बिहार में भी किया गया, हालांकि तब तक यह साजिश पूरी तरह सामने नहीं आई थी। बिहार में विपक्षी दलों ने बहुत आपत्तियां कीं लेकिन वहां भाजपा की सरकार होने से मामला दबा ही रहा। जहां भाजपा की सरकारें हैं, वहां किसी ने चूं नहीं की या उसकी सुनी नहीं गई। 

10. बंगाल में मतदाताओं के नाम काटे जाने की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने जो ट्रिब्युनल बनाए हैं, उनके पास 22 लाख 21 हजार अपीलें उन मतदाताओं ने की हैं, जिनके नाम इसी तरह काट दिए गए। इतने मतदाताओं के नाम काटने के लिए भी ऐसा ही खेल हुआ। तब ममता बनर्जी मुख्यमंत्री थीं और खुद काला कोट पहनकर सुप्रीम कोर्ट में खड़ी हुई थीं। कुछ नहीं हुआ। योगेंद्र यादव उन कई मतदाताओं  को साक्षात लेकर सुप्रीम कोर्ट में हाजिर हुए, जिनके नाम काट दिए गए थे। सुप्रीम कोर्ट ने आयोग को एसआईआर चलाने रहने की झण्डी दे दी थी। 

11. गोवा के बीएलओ ने जांच के बाद पाया कि कई मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से गलत काटे गए। राज्य के मतदाता पंजीकरण अधिकारी (ईआरओ) ने ये नाम सूची में वापस जोड़ने चाहे लेकिन आयोग के सॉफ्टवेयर को वे एक्सेस नहीं कर पाए। तब एक और चाल खुली। मतदाताओं के नाम जोड़ने या काटने का भी काम सीधे दिल्ली में आयोग के दफ्तर से हो रहा था, जबकि इसका अधिकार राज्यों के ईआरओ को ही है। 

12. साबित हो गया कि चुनाव आयोग  सॉफ्टवेयर को जानबूझकर छेड़ा गया। इसकी एक्सेस सिर्फ दिल्ली दफ्तर तक सीमित कर दी गई। दोनों चुनाव आयुक्तों ने इस पर भी आपत्ति की थी। यानी यह फैसला भी मुख्य चुनाव आयुक्त ने अल्पमत के आधार पर किया। इसलिए यह अवैध निर्णय है। 

13. बंगाल बने ट्रिब्युनल में तैनात एक दर्ज़न पूर्व न्यायाधीशों ने भी अब शिकायत की है कि चुनाव आयोग ने सुनवाई के लिए जो डिजिटल पोर्टल बनाया है,  उसकी पहुंच सीमित कर दी गई है। वे इस पोर्टल के जरिए पक्षकारों को नोटिस नहीं भेज पा रहे हैं। मतदाताओं के दस्तावेज भी अपलोड नहीं कर पा रहे, न ही ऑनलाइन सुनवाई कर पा रहे। यह खबर Indian Express अखबार ने आज (06 अक्टूबर 2026) पहले पेज पर विस्तार से प्रकाशित की है। 

14. अब तेलंगाना से भी खबरें आ रही हैं कि भजपा के बूथ एजेंट बड़ी संख्या में फॉर्म 7 भरकर चुने हुए मतदाताओं के नाम काटवाने की कोशिश में लगे हैं। वहां भी उनके खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट दर्ज़ की गई है। इस राज्य में भी भाजपा की सरकार नहीं है।   

15. गोवा में एक मतदाता, जिसका नाम गलत ढंग से काट दिया गया है, हाई कोर्ट पहुंचा गया है कि चुनाव आयोग उससे झूठ बोलने और गलत काम करने को कह रहा है। हुआ यह कि पोल खुलने के बाद चुनाव आयोग ने उससे कहा कि फिर से मतदाता बनने के लिए फॉर्म 6 भरकर दे दो। फॉर्म 6 सिर्फ नए मतदाताओं के लिए होता है। उसमें लिखना होगा कि वह पहले कभी मतदाता नहीं था या किसी सूची में उसका नाम नहीं है। उसने कोर्ट से कहा है कि मैं यह झूठ नहीं लिखना चाहता जबकि मैं काफी पहले से मतदाता रहा हूं। हाई कोर्ट ने चुनाव आयोग को नोटिस जारी की है। ऐसे कई मतदाता होंगे। सब तो अदालत नहीं जा सकते।  

16. देश भर में करीब 13 करोड़ मतदाताओं के नाम एसआईआर के जरिए काट दिए गए। नाम के हिज्जे में फर्क होने, माता-पिता के नाम में कोई त्रुटि पाए जाने, उनकी उम्र में 15 साल से कम का अंतर होने, मकान नम्बर गलत छपा होने जैसी मामूली बातों पर भी नाम काट दिए गए। यह कोई नई बात नहीं है कि देश की मतदाता सूची में ऐसी त्रुटियां पहले से आम रही हैं। इन आधारों पर पहले कभी किसी को वोट देने से नहीं रोका गया। 

स्पष्ट है ये चुनाव जीतने की भाजपा की कई तिकड़मों का एक हिस्सा है। मतदाता सूची में मनमाना हेरफेर कराने की उसकी साजिशों का पर्दाफाश हो रहा है। वर्तमान चुनाव आयोग, मुख्यत: मुख्य चुनाव आयुक्त, इसमें उसकी मदद कर रहा है और सुप्रीम कोर्ट उसकी स्वायत्तता का तर्क देकर अब तक उसे खुला हाथ देता आया है। 

अब चीजें खुल रही हैं। मामला सुप्रीम कोर्ट में नए सिरे से पहुंचा है। कुछ मामले विभिन्न हाई कोर्टों तक आए हैं। कई पूर्व चुनाव आयुक्त इन तिकड़मों को अवैध बता चुके हैं। अब सुप्रीम कोर्ट के एक वर्तमान न्यायाधीश ने भी मतदाताओं को मताधिकार से वंचित करने के प्रयासों की निंदा की है। दिली समेत कई राज्यों में आंदोलन शुरू हो गए हैं। 

तय है कि देश ने ऐसा लोकतंत्र-विरोधी काम नहीं देखा, इमरजेंसी में भी नहीं। देखना है कि मामला कहां तक पहुंचता है।    \

- न जो, 06 अक्टूबर 2026

 

Thursday, October 01, 2026

8.5 लाख किताबों वाली लाइब्रेरी भी क्या बंद हो जाएगी?

नई दिल्ली के कर्तव्य भवन क्षेत्र (Central Vista) के विस्तार लिए कटिबद्ध मोदी सरकार के पास देश के सबसे पुराने पुस्तकालय के लिए जगह नहीं है। कर्तव्य भवन विस्तार के दूसरे चरण में शास्त्री भवन को गिराया जाना है। इस भवन की चार मंजिलों में स्थित केंद्रीय सचिवालय पुस्तकालय (सेंट्रल सेक्रेटरिएट लाइब्रेरी) को अब तक पर्याप्त नई जगह नहीं दी गई है। यह देश की सबसे पुरानी और दूसरी सबसे बड़ी लाइब्रेरी है, जिसमें 8.5 लाख से अधिक किताबें और बहुत पुराने दुर्लभ दस्तावेज हैं। 

ब्रिटिश सरकार ने  1891 में कलकत्ता में 'इम्पीरियल सेक्रेटरिएट लाइब्रेरी' के नाम से इसकी स्थापना की थी। तब अंग्रेजों ने कलकत्ता को भारत की राजधानी बनाया हुआ था। 1911 में जब दिल्ली को राजधानी बनाया गया तो इस पुस्तकालय को भी दिल्ली लाया गया और सिविल लाइंस के पुराने सचिवालय भवन में इसे जगह दी गई। जब अंग्रेजी ने रायसीना हिल्स के इर्द-गिर्द नया सचिवालय विकसित किया तो इस लाइब्रेरी को नॉर्थ ब्लॉक में जगह दी गई थी। 

देश की स्वतंत्रता के बाद इसे सेंट्रल सेक्रेटरिएट लाइब्रेरी नाम दिया गया। 1969 में इसे शास्त्री भवन में 5500 वर्ग मीटर जगह देकर स्थानतरित किया गया। तब से यह पुस्तकालय शास्त्री भवन की चार मंजिलों में चल रहा है। अब शास्त्री भवन को गिराया जाना है ताकि वहां नए कर्तव्य भवनों का निर्माण किया जा सके। उसके बहुत से विभागों के लिए जगह तय की जा चुकी है लेकिन इस पुस्तकालय के लिए अब तक कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गई है। 

इस पुस्तकालय में सन 1702 ई तक की बहुमूल्य पुरानी किताबें और दस्तावेज हैं। दुर्लभ पुस्तकों एवं दस्तावेजों के लिए एक पूरा सेक्शन ही बना हुआ है। इससे इसकी उपयोगिता और महत्ता समझी जा सकती है। इसी पुस्तकालय में 1984 के बाद के भारत सरकार के सभी प्रकाशन भी संग्रहीत हैं।  

17 सितम्बत 2026 को केंद्रीय सार्वजनिक निर्माण विभाग ने शास्त्री भवन में स्थित सभी मंत्रालयों एवं विभागों को लिखा कि इस इमारत को सारे फर्नीचर और दूसरे सामान सहित शीघ्रातिशीघ्र खाली किया जाना है। खाली इमारत को सितम्बर के अंत तक नवनिर्माण के लिए सौंप दिया जाना है। जाहिर है, उसे ध्वस्त करके ही नवनिर्माण होगा। 

बीती जनवरी में केंद्रीय आवास विभाग ने इस लाइब्रेरी के लिए मात्र 300 वर्ग मीटर वाले दो कमरे कर्तव्य भवन-2 में आवंटित किए थे। इस प्रस्ताव को केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय ने अस्वीकार कर दिया। लाइब्रेरी इसी मंत्रालय के अधीन है। उसने लिखा कि 300 वर्ग मीटर की जगह इतनी विशाल लाइब्रेरी के लिए बहुत ही कम है, जो अभी करीब 5500 वर्ग मीटर में स्थित है।  

2023 से ही शास्त्री भवन को खाली कराने की योजना बन गई थी। तत्कालीन संस्कृति सचिव ने लाइब्रेरी के लिए कम से कम साढ़े पांच हजार वर्ग मीटर जगह मांगी थी। इस पर चुप्पी रही। फिर जनवरी 2026 में बताया गया कि 'सक्षम प्राधिकार' ने सिर्फ दो कमरे लाइब्रेरी के लिए तय किए हैं। जवाब में उन्हें फिर लिखा गया कि इतनी जगह लाइब्रेरी की किताबों और पुराने दस्तावेजों के लिए बहुत ही कम है।

संस्कृति मंत्रालय के शंकित हैं। उनकी शंका का कारण भी है, क्योंकि क्षेत्रीय भाषाओं वाला उनका तुलसी सदन पुस्तकालय, जिसमें क्षेत्रीय भाषा व संस्कृति सबंधी करीब दो लाख किताबें हैं, पिछले पंद्रह साल से 'अस्थायी रूप से' बंद है। उसकी किताबें कई गत्तों में कैद हैं, पता नहीं किस हाल में। 

रामचरित मानस के 400 साल पूरे होने के अवसर पर 'तुलसी सदन लाइब्रेरी' बनाई गई थी और उसे मंडी हाउस में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के भवन में जगह दी गई थी। 2011 में मण्डी हाउस मेट्रो रेल स्टेशन बनाने के लिए वह भवन तोड़ा गया और लाइब्रेरी को 'अस्थाई रूप से' बंद किया गया। तब से यह बंद है। उसे कोई नई जगह आज तक न मिली। 'इंडियन एक्सप्रेस' अखबार के संवाददाता ने आर के पुरम के एक दफ्तर के गोदाम में इन किताबों के बंद गत्ते देखे, जिनमें आज भी 'अग्रवाल पैकेजर्स एंड मूवर्स' लिखा हुआ दिखता है। यानी 2011 में यहां लाए जाने के बाद से इन्हें खोला नहीं गया।  

क्या यही हाल 8.5 लाख किताबों वाली सेंट्रल सेक्रेटरिएट लाइब्रेरी का भी होगा?  कर्तव्य भवन नवनिर्माण परियोजना ने सिर्फ नए आकर्षक भवन बनाने तक सीमित है या प्राचीन अमूल्य धरोहरों को सुचिंति रूप में संरक्षित करना भी इसमें शामिल है? 

क्या कोई सुन रहा है?   

- न जो, (Indian Express, 30 सितम्बर 2026 में प्रकाशित रिपोर्ट के आधार पर)  

 

 

 

 

  

  

 

Tuesday, September 22, 2026

चुनाव आयोग की धांधलियों की पोल खुली

 

चुनाव आयोग बहुत बड़ी धांधलियां कर रहा है। SIR के बहाने अलोकतांत्रिक और अवैध काम कर रहा है। Indian Express अखबार में प्रकाशित रितिका चोपड़ा की एक खोजी रिपोर्ट ने आज यह साबित कर दिया। रिपोर्ट लम्बी है और कई भागों में छपी है। उसके मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं-
1. चुनाव आयोग में तीन सदस्य होते हैं। एक मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्त। कोई भी फैसला तीनों को सर्वसम्मति से या बहुमत से करना होता है। पिछले 10 महीनों में दो चुनाव आयुक्तों ने 14 बार आपत्तियां कीं कि गलत हो रहा है और उन्हें बताए बिना आयोग के नाम से निर्णय किए जा रहे हैं। ये आपत्तियां बकायदा लिखित रूप से दर्ज़ की गईं और कैबिनेट सचिव तक पहुंचाई गईं। सब तरफ चुप्पी रही।
2. दोनों चुनाव आयुक्तों ने अलग-अलग यह आपत्ति की कि बिना 'आयोग' की सहमति के आयोग के नाम पर आदेश-निर्देश जारी किए जा रहे हैं।
3. मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने का निर्णय प्रत्येक विधान सभा क्षेत्र के मतदाता पंजीकरण अधिकारी (ईआरओ) को करना होता है। ऐसा नियम है और यह संवैधानिक पद है। लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त और आयोग के निदेशक (आईटी) ने एक ऐसा सॉफ्टवेयर लागू कराया जिससे मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने का अधिकार ईआरओ से छिन गया। वे इस सॉफ्टवेयर को 'एक्सेस' ही नहीं कर सकते हैं।
4. मतदाताओं के बारे में सारे निर्णय सीधे दिल्ली में होने लगे। चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने लिखित आपत्ति की कि यह नियम विरुद्ध है। बिना नियम बदले ऐसा किया जा रहा है और यह केंद्रीयकरण क्यों किया गया। अखबार ने कुछ राज्यों के ऐसे मामले रिपोर्ट में दर्ज़ किए हैं जहां ईआरओ वाजिब पाए जाने पर भी नाम जोड़ नहीं पाए।
4. SIR में नए नाम जोड़ने वाले फॉर्म 6 में बदलाव करके पहली बार के मतदाताओं से यह बताने को कहा गया कि उनके माता-पिता या दादा-दादी का नाम सूची में पहले था या नहीं। दोनों चुनाव आयुक्तों ने लिखित आपत्ति की कि यह अवैध है। उनकी आपत्ति, जो बहुमत की आपत्ति थी, के बावजूद फॉर्म 6 में ये बदलाव किए गए। ऑनलाइन आवेदन पत्रों में इसे भरे बिना नए मतदाता आगे बढ़ ही नहीं पाए। 13 अगसत को श्री संधू ने लिखित दिया कि तत्काल इसे हटाया जाए। दूसरे आयुक्त ने भी यही कहा लेकिन नया फॉर्म 6 जारी कर दिया गया और आज तक चल रहा है।
उल्लेखनीय है कि मुख्य चुनाव आयुक्त की ही तरह ये दोनों आयुक्त भी एनडीए सरकार में नियुक्त किए गए थे। नियुक्त करने वाली तीन सदस्यीय समिति में प्रधानमंत्री मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और नेता विपक्ष हैं। नेता विपक्ष ने दोनों आयुक्तों के नाम पर आपत्ति की थी। तब भी दो आयुक्तों ने ये आपत्तियां की हैं।
30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में SIR के नाम पर 13 करोड़ से अधिक मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए। अकेले बंगाल में 60 लाख मतदाताओं के नाम 'तार्किक विसंगति' की नोटिस जारी की गई। इनमें से 27 लाख नाम आयोग ने हटा दिए। कई याचिकाओं पर सुनवाइयों के बाद सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल में न्यायाधिकरण बनाए, जिन्हें 37 लाख 31 हजार अपीलों को सुनना था। इनमें से 22 लाख 21 हजार अपीलें नाम काटे जाने के खिलाफ मतदाताओं ने की थीं, जबकि 16 लाख 10 हजार अपीलें नाम काटे जाने के लिए चुनाव आयोग की ओर से दाखिल की गई थीं। आयोग की ओर से ये अपीलें किसने दायर कीं, यह अभी कोर्ट को नहीं बताया गया है।
लोकतंत्र का तकाज़ा है और चुनाव आयोग का दायित्व है कि एक भी सही मतदाता वोट डालने से वंचित न होने पाए। अकेले बंगाल में SIR के कारण करीब 37 लाख मतदाता वोट डालने से वंचित रहे और न्यायाधिकरण उनके मामले आज तक सुन नहीं पाया है। 
  यह बात पहले कई बार सामने आ चुकी है कि बिहार से लेकर बंगाल तक और सभी राज्यों में मतदाता सूची से जिनके नाम काटे गए उनमें मुसलमानों की संख्या बहुत अधिक है।  
  बड़ा सवाल यह है कि मुख्य चुनाव आयुक्त किसके इशारे पर यह सब कर रहे थे? सुप्रीम कोर्ट ने भी अनेक ध्यानाकर्षणों के बाद भी  SIR पर चुनाव आयोग को पूरी छूट क्यों दी? 
Indian Express की रितिका चोपड़ा को इस खोजी रिपोर्ट के लिए साधुवाद्। पूरी रिपोर्ट नीचे दिए दिए लिंक्स पर जाकर पढ़ी जा सकती है- 
 
https://indianexpress.com/article/express-exclusive/election-commission-sir-14-objections-gyanesh-kumar-sukhbir-singh-sandhu-vivek-joshi-10889737/
 
https://indianexpress.com/article/express-exclusive/election-commission-illegal-changes-form-6-gyanesh-kumar-10889714/
 
https://indianexpress.com/article/express-exclusive/election-commission-special-intensive-revision-sir-electoral-roll-centralisation-eci-ecinet-10889738/
 
https://indianexpress.com/article/express-exclusive/election-commission-gyanesh-kumar-sukhbir-sandhu-vivek-joshi-electoral-roll-control-systems-10889773/ 
 
- न. जो, 23 सितम्बर 2026  

Wednesday, September 16, 2026

विज्ञानियों ने बताया, नेपाल में तबाही क्यों हुई

हिमालय की लांगटांग लिरुंग चोटी का 2.2 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाला और 50 मीटर गहरा  हिस्सा 26 अगस्त को नीचे लुढ़क पड़ा था। नेपाल में भयावह और तिब्बत में अपेक्षाकृत कम तबाही इसी कारण मची थी। यह मलवा 5150 मीटर की ऊंचाई से सीधे 1400 मीटर नीचे घाटी में गिरा और फिर नीचे लुढ़कता चला गया। 

विज्ञानियों ने अध्ययन के बाद हिसाब लगाया है कि उस दिन लांगटांग चोटी के उत्तरी मुहाने से चट्टानों और बर्फ का  एक करोड़ 10 लाख क्यूबिक मीटर मलवा नीचे लुढ़का था,  जिसके धक्के से 5.2 रिचर पैमाने का भूकम्प भी आया। इसके बाद वह अपने साथ और भी मलवा लेकर नीचे लुढ़ता गया और वह सब कुछ बहा कर लेता या दबाता गया, जो भी उसके रास्ते में पड़ा।

यह मलवा कितना विकराल था, इसका अनुमान देने के लिए विज्ञानियों ने बताया कि उस पत्थर, बर्फ, पानी और कीचड़ से फुटबॉल के 300 मैदान 50 मीटर ऊंचाई तक भर जाते!

ऐसा क्यों हुआ?

'द वर्ल्ड वेदर एट्रीब्यूशन' ने, जो कई देशों के विज्ञानियों का साझी संस्था है और बिगड़ते पर्यावरण के अति गम्भीर परिणामों का अध्ययन करती है, इसे कई कारणों का सम्मिलित परिणाम बताया है- वैश्विक तापमान बढ़ने से ग्लेशियर पिघलने, चट्टानों के अनावृत होने, चट्टानों को जकड़ी हुई सदियों पुरानी ठोस बर्फ के ढीले पड़ने, 2015 में आए भूकम्प से चट्टानों के हिलने, पिघलती बर्फ के पानी के दरारों में पैठने और वहां तक गर्मी पहुंचने के मिले-जुले कारणों से हुआ। 

इस इलाके में 2015 में 7.8 रिचर पैमाने का भूकम्प आया था। उसने चट्टानों को कितना कमजोर किया और उसका कितना असर इस हादसे का कारण बना, यह स्पष्ट नहीं है लेकिन विज्ञानी कहते हैं कि उस भूकम्प ने लांगटांग पर्वत की ढाल को अस्थिर तो किया ही हो सकता है। 

इम्पीरियल कॉलेज, लंडन में क्लाइमेट चेंज के प्रोफेसर फ्रेडरिक ओट्टो ने अध्ययन रिपोर्ट के बारे में बताया कि मानव जनित पर्यावरण संकट ने यह जरूर किया कि आधारभूत यानी सदियों से जमी बर्फीली चट्टानें ढीली पड़ने लगीं, ग्लेशियर पिघल कर पतले हुए या पीछे सरके और इन चोटियों पर खूब हिमपात होने की बजाय बारिश अधिक होने लगी।

उन्होंने कहा कि इतनी विशाल बर्फीली चट्टान का गिरना विरले ही होता है। अनुमान है कि ऐसा 1000 से 10000 साल में कभी एक बार होता है। उन्होंने बताया कि जो मलवा 1400 मीटर की ऊंचाई से गिरा, उसने और भी चोटियों-घाटियों को तोड़ा, और भी मलवा पैदा किया और नीचे लुढ़कते हुए आयतन और आवेग में विकराल होता चला गया।

इसकी गति इतनी भयानक थी कि चोटी से घाटी में गिरने के बाद वह मात्र 7-8 मिनट में तिब्बत के जीरोंग पोर्ट तक पहुंच गया। अंदाजन उसकी गति 170 किमी प्रति घण्टा थी।   

वैश्विक तापमान बढ़ने के कारण कई दशकों से ग्लेशियर पिघल रहे हैं, पतले हो रहे हैं। ग्लेशियरों के पीछे खिसकने यानी पिघलने की दर आधा मीटर प्रति वर्ष  थी। अब यह दर तेज हो गई है। ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार पिछले 16 वर्षों में लांगटांग लिरुंग ग्लेशियर का पिघलना 0.5% प्रति वर्ष से बढ़कर 1% से 2.3% तक प्रतिवर्ष हो गया है।   

यह चेतावनी है कि उच्च हिमालय में हो रहे परिवर्तनों पर नज़र रखी जाए, खतरनाक झीलों/ग्लेशियरों की लगातार निगहबानी हो और सीमावर्ती देश एक-दूसरे के साथ आंकड़े व अन्य जानकारियां साझा करें। 

अध्ययन-रिपोर्ट यह सुझाव भी देती है कि जीवाश्म ईंधन (पेट्रोल, कोयला, आदि) का इस्तेमाल जल्दी से जल्दी  बंद किया जाए।  

- न जो, 17 सितम्बर 2026