Sunday, July 19, 2026

सबाल्टर्न दृष्टि-सम्पन्न योद्धा आलोचक

फेसबुक में झांकता हूं तो सबसे पहले वीरेंद्र यादव की अनुपस्थिति कचोटती है।

प्रत्येक ऐसे मुद्दे पर, जहां सचेत-विवेकी बौद्धिक का तत्काल एवं तार्किक हस्तक्षेप आवश्यक लगता था, वीरेंद्र जी अपनी बेबाक टिप्पणी के साथ वहां दिख जाते थे। रायपुर के एक विश्वविद्यालय में आयोजित गोष्ठी में आमंत्रित वरिष्ठ कथाकार मनोज रूपड़ा के साथ कुलपति के दुर्व्यवहार के बारे में 11 जनवरी 2026 को उन्होंने अपनी टिप्पणी इस प्रकार शुरू की थी- “शर्मनाक था वह दृश्य! कुलपति सर्वशक्तिमान था, उसने वही किया जो अविवेकी सत्ता अक्सर करती है।” इसके बाद उनकी तीखी धार “हिंदी संसार के कुछ दैदीप्यमान सितारोंकी ओर मुड़ गई थी जो मनोज रूपड़ा को गोष्ठी से बाहर निकल जाने का आदेश सुनाए जाने के बाद भी “अविचलित और अविराम सभागार में बने रहे। सभा फिर जुटी, कुलपति फिर पूरे अंदाज़ में बोले। अन्य आमंत्रित प्रतिभागी लेखकों ने अपनी गुरुत्तर भूमिका का निर्वहन किया, इस आश्वस्ति के साथ कि वे अनुशासित लेखकों की तरह अन्य आयोजनों में ससम्मान बुलाए जाते रहेंगे। यह समय किसी को कुछ याद दिलाने, सामाजिक भूमिका निभाने और सत्ता के समक्ष रीढ़ सीधी रखने का विनम्र सुझाव देने का भी नहीं है। यह समय इस दृश्य के द्रष्टा होने से उपजी शर्म में डूब जाने का है। यह मनोज रूपड़ा का अपमान नहीं, यह लेखकीय अस्मिता पर हमला है। अफसोस कि इस दौर में कुछ लेखक भी इसके सहभागी हैं और हम जैसे कुछ इसके विवश दर्शक।”

16 जनवरी की सुबह अचानक उनका चला जाना इसलिए और भी तकलीफदेह है कि इस रचना विरोधी एवं बढ़ती लेखकीय रीढ़विहीनता के दौर में उनके विरल लेकिन सार्थक, विवेकशील और प्रतिरोधी तेवरों की बहुत जरूरत महसूस होती है। उनके ऐसे हस्तक्षेपों का कई लोग इंतज़ार करते थे और उनमें अपनी आवाज मिलाते हुए साझा भी किया करते थे। उनकी उपर्युक्त टिप्पणी सैकड़ों लोगों ने लाइककी, उस पर 74 टिप्पणियां दर्ज़ हुईं और 23 लोगों ने उसे अपनी-अपनी वाल पर साझा भी किया था।

मैंने और कई अन्य मित्रों ने उनसे एकाधिक बार शिकायत की थी कि फेसबुक जैसे माध्यमों में अपनी रचनात्मक ऊर्जा खर्च करके वे उन जरूरी तथा गम्भीर आलोचनात्मक कामों के लिए समय नहीं निकाल पा रहे हैं, जो उन्हें करनी हैं और जिन्हें वे ही सबसे अच्छी तरह कर सकते हैं। कई बार वे विरोधियों और कुतर्कियों के साथ फेसबुक पर भिड़ जाया करते थे और अपने तर्क एवं उद्धरण पेश करके मुंहतोड़ जवाब देने में बहुत समय लगा दिया करते थे। इस शिकायत के बावजूद हमें उनकी टिप्पणियों का इंतज़ार रहता था। फेसबुक पर ही नहीं, साहित्यिक गोष्ठियों-सेमीनारों अथवा पत्र-पत्रिकाओं में भी, जहां वे कोई भी कुतर्क, कुपाठ या तथ्यों के साथ तोड़-मरोड़ सहन नहीं कर पाते थे, तुरंत प्रतिरोध दर्ज़ कर देते थे। फेसबुक, ‘जनसत्ताऔर कथादेशमें ओम थानवी, उदय प्रकाश, कमलेश, अर्चना वर्मा और कमलकिशोर गोयनका के साथ उनकी कुछ मुद्दों पर लम्बी भिड़ंत हुईं। गहन अध्ययन और विलक्षण स्मृति इस सब में उनके बेहतरीन हथियार होते थे। बढ़ती साम्प्रदायिक्ता और हिंदू राष्ट्रवाद के विरुद्ध उनकी सार्वजनिक सक्रियता भी काबिले गौर थी।

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1973 में जब मैं लखनऊ विश्वविद्यालय में दाखिल हुआ तो वीरेंद्र यादव एक वर्ष पूर्व राजनीतिशास्त्र में एमए की डिग्री लेकर बाहर आ चुके थे। वह हमारी बहुविध सक्रियता और सीखने का दौर था। ठाकुर प्रसाद सिंह, राजेश शर्मा, कृष्ण नारायण कक्कड़, प्रबोध मजूमदार, गोपाल उपाध्याय, मुद्राराक्षस, बीर राजा, नरेश सक्सेना, राकेश आदि के साथ होने वाली मुलाकातों-चर्चाओं में वीरेंद्र यादव खूब मुखर रहा करते थे। अमृत लाल नागर, यशपाल और भगवती चरण वर्मा यदा-कदा कॉफी हाउस आते थे। कुंवर नारायण अपने घर पर बैठकी जमाते थे। लीलाधर जगूड़ी उसी दौरान लखनऊ आए और कुछ समय बाद कामतानाथ भी। विनोद दास और अखिलेश कुछ और वर्षों बाद लखनऊ पहुंचे। लखनऊ की वह साहित्यिक बिरादरी खूब सक्रिय रही। बाद के वर्षों में वीरेंद्र यादव, राकेश वेदा और अखिलेश का खूब याराना रहा। वीरेंद्र जी के कई महत्त्वपूर्ण लेख हमने अखिलेश के सम्पादन में तद्भवमें ही पढ़े।

हज़रतगंज के काफी हाउस से लेकर अमीनाबाद के कंचना तक, जहां वे लम्बी बैठकें जमाते थे, वीरेंद्र जी की उपस्थिति रचनात्मक गर्मी पैदा करती थी। पारिवारिक माहौल के कारण किशोरावस्था से ही वे पढ़ाकू हो गए थे। विश्वविद्यालय तक पहुंचते-पहुंचते वे नएहरू की डिस्कवरी ऑफ़ इंडियाऔर ऑटोबायग्राफी’ (नेहरू), महात्मा गांधी की जीवनी, आदि कई पुस्तकों से लेकर टॉमस हार्डी, चार्ल्स डिकंस, बर्नाड शॉ समेत बहुत सारा अंग्रेजी साहित्य पढ़ चुके थे। समाजशास्त्रीय लेखन-विश्लेषण पढ़ना और बहसें करना उन्हें विशेष प्रिय था और हिंदी से अधिक अंग्रेजी की पुस्तकें पढ़ना भी। तत्कालीन सभी पत्र-पत्रिकाएं उनकी दिनचर्या का हिस्सा थीं। टाइम्स लिटरेरी सप्लीमेंट’, ‘इंकाउण्टर’, ‘न्यू स्टेट्समैनजैसी पत्रिकाएं पढ़ने के लिए वे ब्रिटिश कौंसिल लायब्रेरी में बैठे दिखते थे। छात्र जीवन में ही उनका सम्पर्क समाजवादी युवजन सभा और स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इण्डिया से होते हुए वामपंथी नेताओं तक हो चुका था। जीवन बीमा निगम की नौकरी में आने के साथ ही वामपंथी श्रमिक संगठनों में सक्रिय हो गए। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य भी बने और अगला महत्त्वपूर्ण पड़ाव प्रगतिशील लेखक संगठन से जुड़ना और उसमें सक्रिय भागीदारी करना था। यह पृष्ठभूमि उन्हें रचनात्मक रूप से ऊर्जावान और बहसों में आगे रखती थी। याददाश्त उनकी बहुत तेज़ थी ही। उनकी स्पष्टवादिता और बहसों में तथ्यों-तर्कों के साथ डटे रहना हमें उनकी ओर विशेष रूप से आकर्षित करते थे।

1977 में पत्रकारिता में आने के बाद मेरा उनसे सम्पर्क और गहरा हुआ। सलाह-मशविरे, जानकारियों और विभिन्न मुद्दों पर टिप्पणियों के लिए वे सहज उपलब्ध रहते थे। अखबार में कुछ अच्छा लगा तो तारीफ करते और गड़बड़ पाने पर टोकने और समझाने में भी कोई संकोच नहीं करते थे। मेरी कहानियों और उपन्यासों पर उन्होंने बेबाक राय दी। उनसे अच्छी पुस्तकें पढ़ने को मिलती थीं और यह सलाह भी कि कौन-कौन संदर्भ ग्रंथ अवश्य अपने पास रखने चाहिए। यह रिश्ता खूब चला और उनके जाने के साथ ही खत्म हुआ। व्यवहार में विनम्र किंतु अपनी बात पूरे जोर से रखने और उस पर लड़ने की हद तक कायम रहने के लिए वे ख्यात थे। इसी कारण एक विवाद के बाद उन्होंने भाकपा की सदस्यता छोड़ दी थी। उनका सबसे अधिक वैचारिक विवाद मुद्राराक्षस के साथ होता था, झगड़े की सीमा तक, लेकिन दोनों का याराना भी उतना ही सबल था। हाल के वर्षों में अपने कई साथी एवं वरिष्ठ रचनाकारों तक को वे इस बात के लिए लगभग लताड़ देते थे कि आरएसएस-भाजपा के मंचों पर जाकर क्यों वे उन संगठनों को राजनैतिक वैधता प्रदान कर आते हैं, भले ही वहां उन्होंने उनके विरोध में ही बातें क्यों न कही हों।

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वीरेंद्र यादव अपने जिस योगदान के लिए सदा याद किए जाएंगे, वह है हिंदी आलोचना को एक सबाल्टर्न दृष्टिकोण देना, ‘आलोचना के कुलीनतंत्रसे बाहर कर दिए गए कई महत्त्वपूर्ण उपन्यासों का इसी दृष्टि से पुनर्पाठ करना, प्रेमचंद के उपन्यासों-कहानियों के साजिशन कुपाठ का तार्किक प्रतिरोध करना और कई लोकप्रिय तथा श्रेष्ठ घोषित उपन्यासों में कलावाद एवं भाषायी आस्वाद की चाशनी के पीछे छुपे धर्म आधारित शोषण एवं वर्णाश्रमी दृष्टि का पर्दाफाश करना।

राम विलास शर्मा, निर्मल वर्मा, रुपर्ट स्नेल और बाद के कुछ दलित लेखक-आलोचक जब प्रेमचंद की सामाजिक-राजनैतिक-दलित दृष्टि को नज़रअंदाज़ या प्रश्नांकित करते हैं, तब वीरेन्द्र यादव अपने गहन अध्ययन और पैनी नज़र से प्रेमचंद के साहित्य का पुनर्पाठ करके साबित कर देते हैं कि प्रेमचंद को कठघरे में खड़ा करने के लिए वास्तव में उनका कुपाठ किया जा रहा है। वे बकायदा मुठभेड़ की मुद्रा में सवाल उठाते हैं कि “अंग्रेजी औपनिवेशिक शासनकाल में राष्ट्रीय आंदोलन के प्रथम चरण के दौरान अवध के दुखी किसानों का प्रतिनिधित्व करते होरी की यंत्रणा के स्रोत कहां हैं? अंग्रेजी उपनिवेशवाद में, हिंदू धर्म की वर्णश्रमी सत्ता संरचना में, महज कर्ज की समस्या में या इनके समुच्चय में?” फिर वे गोदान और अन्य रचनाओं से उद्धरण-दर-उद्धरण देकर यह प्रमाणित कर देते हैं कि “प्रेमचंद भारतीय किसान की यातना की जड़ें उस मनुवादी वर्णाश्रमी व्यवस्था में तलाशते हैं, जो श्रमशील दलित समुदाय की मेहनत पर परजीवी सवर्ण आभिजात्य की विलासिता का आधार तैयार करती थी।” इसलिए, यह कहना कि “होरी की गाय पालने की लालसा वास्तव में गोदान करने की लालसा थी” (निर्मल वर्मा और रुपर्ट स्नेल) या “गोदान की मुख्य समस्या ऋण की समस्या है, क्योंकि प्रेमचंद स्वयं भी कर्ज के बोझ से दबे हुए थे” (राम विलास शर्मा) गोदानका मुकम्मल पाठ नहीं है, बल्कि जहां “राम विलास शर्मा “गोदानका सरलीकरण करते हैं” वहीं “निर्मल वर्मा का भाष्य प्रेमचंद की कथा दृष्टि से नि:सृत न होकर उनकी अपनी हिंदू धर्म की वर्णाश्रमी सोच का परिणाम है।” यहां यह उल्लेख भी समीचीन होगा कि वीरेंद्र जी प्रारम्भ में राम विलास शर्मा से प्रभावित थे लेकिन भारतीय सामाजिक संरचना में प्रभुत्ववादी वर्गों की अच्छी पड़ताल कर लेने के बाद वे उनके कटु आलोचक बन गए थे। 

प्रेमचंद पर दलित आलोचकों की आपत्तियों को तर्कों व उद्धरणों से खारिज करते हुए वीरेंद्र जी दिखा देते हैं कि वास्तव में “प्रेमचंद दलितों के आक्रोश एवं सशक्तीकरण को मौखिक अभिव्यक्ति तक सीमित न करके इसे आक्रामक प्रतिरोध की जिस तार्किक परिणति तक ले जाते हैं, वह दलित एकजुटता व अग्रगामी चेतना में उनकी लेखकीय आस्था का परिचायक है। किसी गैर दलित लेखक द्वारा दलित आक्रोश की यह (सिलिया-मातादीन प्रसंग में दलितों द्वारा ब्राह्मण दातादीन के मुंह में हड्डी का टुकड़ा डाल देना) साहसपूर्ण अभिव्यक्ति है।” प्रेमचंद के साहित्य का जैसा मुकम्मल पाठ वीरेंद्र जी ने किया है, वैसा और किसी आलोचक के यहां नहीं दिखता। प्रेमचंद पर उन्होंने काफी लिखा भी है। वे प्रेमचंद साहित्य के वास्तविक अधिकारी विद्वान व आलोचक ठहरते हैं।

वीरेंद्र जी मैला आंचलऔर आधा गांवजैसे बहुचर्चित उपन्यासों का भी पुनर्पाठ पेश करते हैं। वे कहते हैं कि “इन सरीखे श्रेष्ठ उपन्यासों को भी अपने देशकाल में बृहत्तर सरोकारों से काटकर महज उनके रूपवादी ढांचे एवं भाषायी कौशल की आस्वादपरक बहस तक केंद्रित कर दिया गया है,” जबकि वे अपनी सम्पूर्णता में निम्नवर्गीय भारतीय ग्रामीण समाज की चेतना के बदलाव की प्रक्रिया को उद्घाटित करते हैं।” वीरेंद्र जी मैला आंचलऔर आधा गांवके साथ अलग-अलग वैतरणी’ (शिव प्रसाद सिंह), ‘डूब’ (वीरेंद्र जैन), ‘इदन्नमम्’ (मैत्रेयी पुष्पा’) मुखड़ा क्या देखे’ (अब्दुल बिस्मिल्लाह) का भी विशेष उल्लेख करते हैं। उनके अध्ययन की व्यापकता और आलोचनात्मक दृष्टि का विस्तार इतनी दूर तक जाता है कि वे गोदानमें दलित प्रसंग की विवेचना करते हुए मुल्कराज आनंद के अछूतऔर आधा गांवकी विशेषताएं बताते हुए आग का दरिया (कुर्र्तुल ऐन हैदर) की तत्सबंधी कमजोरियों के साथ उदास नस्लें’ (अब्दुला हुसैन) एवं छाको की वापसी’ (बदीउज्जमा) की खूबियां भी गिना जाते हैं।

वीरेंद्र जी ने आलोचकों द्वारा उपेक्षित कर दिए गए कई महत्त्वपूर्ण उपन्यासों पर विस्तार से लिखा और सबाल्टर्नदृष्टि से उनकी व्याख्या की। जैसे, गोपाल उपाध्याय का एक टुकड़ा इतिहास’, शिव पूजन सहाय का देहाती दुनिया’, केदारनाथ अग्रवाल का पतिया’, नागार्जुन का बलचनमा’, अब्दुल बिस्मिल्लाह का मुखड़ा क्या देखे’, भीमसेन त्यागी का जमीन’, मंजूर एहतेशाम का बशारत मंजिल’, कमलाकंत त्रिपाठी के बेदखलपाहीघर’, जगदीश चंद्र के धरती धन न अपनाएवं नरककुण्ड में वास’, हृदयेश जोशी का लाल लकीरआदि। ऐसे कई उपन्यासों की विषय वस्तु और सामाजिकता की पड़ताल पर गहरी नजर डालकर जिम्मेदार आलोचक का दायित्व उन्होंने निभाया। एक दलित स्त्री और ब्राह्मण युवक के प्रेम, विवाह और तत्पश्चात दलित स्त्री के संघर्ष के आख्यान वाला गोपाल उपाध्याय का एक टुकड़ा इतिहास1975 में तब प्रकाशित हुआ था, जब दलित साहित्य या दलित विमर्श की चर्चा भी कहीं नहीं थी। वीरेंद्र जी लिखते हैं कि “प्रेमचंद ने गोदान में सिलिया-मातादीन के दलित प्रसंग को जहां छोड़ा था, यह उसके आगे की कथायात्रा है।” बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद हिंदी में लिखे गए उपन्यासों में आखिरी कलाम’ (दूधनाथ सिंह) को वे सर्वोच्च शिखर पर रखते हैं और उसे “हिंदी के वैचारिक संसार में नई पहलकदमी” बताते हैं।

दूसरी ओर, ‘कुरु कुरु स्वाहा’, ‘कसप’ (मनोहर श्याम जोशी), मुझे चांद चाहिए’ (सुरेंद्र वर्मा) जैसे कुछ बहुचर्चित, पठनीय उपन्यासों को चुस्त जुमलेबाजी, शातिर रचनात्मक खिलंदड़ेपन व विदूषकीय गाम्भीर्यऔर विपन्नता से विलास तक की कथा-यात्रा” कहकर उन्होंने खारिज किया। इस संदर्भ में उनकी गम्भीर चिंता थी कि हिंदी के कई लेखक भी अमेरिकन लेखकों या फिर शोभा डे, बलवंत गार्गी और नमिता गोखले जैसे पल्प-लेखकों से प्रभावित होकर उन्हीं का अनुसरण करने लगे हैं। उन्होंने भारतीय अंग्रेजी लेखकों के उपन्यासों पर भी व्यापक दृष्टि डाली और अरुंधती रॉय एवं सलमा रुश्दी की सार्थक सामाजिक-रचनात्मक हस्तक्षेप की प्रशंसा की है।

वीरेंद्र जी तो विनोद कुमार शुक्ल जैसे बहुपुरस्कृत-प्रशंसित विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यासों को भी अपनी धारदार आलोचना से तार-तार कर देते हैं। नौकर की कमीज’, ‘खिलेगा तो देखेंगेऔर दीवार में एक खिड़की रहती थीके लिए वे कहते हैं कि “प्रकटत: निम्न-मध्यवर्गीय जीवन की विडम्बनाओं और विसंगतियों को अपनी कथावस्तु बनाने के बावजूद ये उपन्यास अपनी अंतिम परिणतियों में महज एक कलाकारी बनकर रह जाते हैं।” इन उपन्यासों के बारे में प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह और विष्णु खरे की बेलाग प्रशस्तियों पर वे सवालिया निशान लगाते हैं और कहते हैं कि “राजनीति का निर्वासन और मूर्त स्थितियों का अमूर्तन ही इन उपन्यासों की वह कलात्मक उपलब्धि है, जिस पर हिंदी आलोचना के कुलीनतंत्र की सर्वसहमति है।” वीरेंद्र जी ने रागदरबारीजैसे अत्यधिक प्रशंसित उपन्यास की कुछ बातों के लिए सराहना करने के बावजूद उसे अंतत: एक प्रहसन और “व्यंग्य-विनोद का ऐसा प्रति-संसार रचने वाला बताया, जहां दुख, करुणा, सहानुभूति और सामाजिक सरोकार दृश्य ओझल हो जाते हैं।” जैनेंद्र, अज्ञेय, और भी कई लेखकों के उपन्यास उनकी तीखी नज़र से गुजरे हैं।

वीरेंद्र जी का आलोचक मानता है कि उपन्यास मात्र शिल्प की गढ़न और कथा रचना नहीं हैं। जिस समाज में वे लिखे जा रहे हैं, उसकी सामाजिक सत्ता संरचना से वे मुक्त नहीं हो सकते। भारतीय समाज की जड़ में बैठी वर्णाश्रम व्यवस्था, प्रभुत्वशाली वर्गों के वर्चस्व और उनके दमन तंत्र, साम्प्रदायिक शक्तियों के उभार और इन सबको मिलने वाली चुनौतियों के साथ ही लेखक की पक्षधरता देखे बिना साहित्य का मूल्यांकन करना अनुचित है। उनकी आलोचना-दृष्टि इसका निरंतर निर्वाह करती है और अपने पूर्ववर्ती आलोचकों को भी इसीलिए कटघरे में खड़ा करती है।

इसीलिए वीरेंद्र यादव का लिखा हुआ बहुत महत्त्वपूर्ण है। इस चुनौतीपूर्ण समय में वे अत्यंत आवश्यक स्वर थे। उनकी अभी बहुत जरूरत थी।  

-नवीन जोशी 

'सब लोग' पत्रिका (सम्पादक-किशन कालजयी) के मई 2026 अंक में प्रकाशित


   

        

Monday, May 25, 2026

‘आधे सूरज की धूप’- टीसती स्मृतियों में गुमशुदा स्त्री का चेहरा

परिवार के भीतर आपसी सबंधों के पेच एक अत्यंत संवेदनशील बच्चे को वयस्क बनाते हुए किन-किन और कैसी-कैसी जटिल व अंधेरी आंतरिक उलझनों-बिखरावों की दुनिया में ले जाते हैं जो उसके पूरे जीवन पर मंडराते रहते हैं, इसका टीसता हुआ मार्मिक वृतांत है नरेश गोस्वामी का पहला उपन्यास आधे सूरज की धूप लघु कलेवर (मात्र 83 पृष्ठ) का यह उपन्यास अपनी व्याप्ति में विराट है और पाठक को मथता चलता है। इसे पढ़ना अपने भीतर के अनेक गह्वरों में झांकते चलना भी है। अतीत की वे कौन सी चोट हैं, कौन सी अनुभूतियां हैं, जिनसे हम आजीवन छुटकारा नहीं पा पाते, जिनके प्रेत हमारे वर्तमान पर मंडराते रहते हैं?   

परिवार के सबसे छोटे बेटे अरविंद को पिता के फोन से चाचा की मृत्यु का समाचार मिलता है। पिता से भौतिक और मानसिक रूप से भी बहुत दूर जा चुके अरविंद की स्मृति-यात्रा के साथ उपन्यास शुरू होता है। कभी बालक अरु और कभी युवा आरवि होता हुआ वयस्क अरविंद मुख्य रूप से अपने पारिवारिक, विशेष रूप से माता-पिता के संबंधों की गांठों में झांकता है।

इस प्रक्रिया में उसके भीतर निरंतर आलोड़न-विलोड़न चलता है। वस्तुत: यह हालडोला उसके भीतर बचपन से ही शुरू हो गया था जिसने उसे न युवावस्था में प्रगतिशील राजनैतिक धारा में टिकने दिया और न बाद में किसी रिश्ते या नौकरी में। बचपन से आज तक वह भटकता ही रहा है। यह भटकन बाहरी से अधिक भीतरी है और उसके साथ इसका त्रास भी जुड़ा हुआ है। उसके वर्तमान पर अतीत के प्रेत मंडराते रहते हैं। हमें पता नहीं चलता कि बाहर से बिल्कुल सामान्य, चुस्त-दुरुस्त दिखता आदमी अपने भीतर किस यंत्रणा से गुजरता रहता है।

पिता (पितृसत्ता कह लीजिए) यहां अपराधी हैं, मां की घोर उपेक्षा करने का अपराधी, बच्चों की परवाह न करने का अपराधी, बड़े भाई का शोषण बर्दाश्त करने का अपराधी और अपने किए का बचाव करने के साथ मां को ही दोष देते रहने का अपराधी- ‘किसान परिवार से आई थी ... अनपढ़ और अनगढ़ थी, इसलिए जीवन भर भैंसों में उलझी रही ...पहले रिश्ते को नहीं भुला पाई ... समय के साथ नहीं चल पाई...।

रामरती (मां) पहले परिवार के बड़े लड़के शिवपाल से ब्याही गई थी। उस रिश्ते से एक पुत्र भी जन्मा था लेकिन न वह पुत्र बचा, न पति। तब वह दुत्कार और अपमान के बाद मायके भगा दी गई। जाते हुए वह अपने सबसे छोटे देवर से पूछती गई थी- बता, जिब तू बड़ा हो जावैगा तो मझे लैण आवैगा?’ वह बिना जाने-समझे जवाब देता है- हां, बड़ा होते ही लेने आऊंगा

और, मायके में ग्यारह वर्ष वैधव्य के काटने के बाद रामरती अपने से बारह वर्ष छोटे देवर की पत्नी बनकर फिर उसी घर में लौट आई। नए पति बने देवर ने उससे बच्चे पैदा किए लेकिन न कभी प्यार दिया, न पत्नी का मान-सम्मान। जेठ-जिठानियों ने भी उसे प्रताड़ना ही दी- या डंकिणी फेर आ गई! लेकिन वह हारी नहीं, मायके से एक गाय लेकर आई और उसके सहारे धीरे-धीरे कई भैंसों को पालकर परिवार चलाने वाली बनी, कमाऊ खेतों में खटी और खटते-खटते एक दिन मर गई।

तब अरविंद बहुत छोटा था लेकिन हर ओर से उपेक्षित वह मां, जो उसे भी बहुत स्नेह नहीं दे पाई, उसकी आत्मा में एक टीस बनकर बैठी रह गई- क्या उसकी ज़िंदगी उसी धुंए में धुंधवाती रही थी, जिससे बाहर आकर और आंखें पोछकर वह हमसे मिल लेती थी? क्या उसके भीतर कोई धागा नहीं बचा था जो बाहर फैले जीवन से जुड़ सके?’

नन्हे कलेवर के इस उपन्यास में वह मां सघन रूप से बसी हुई है। वह वाक्यों में है, पंक्तियों के बीच में है, घटनाओं में है, मौन में है। वह अरविंद की भटकन में टीसती है, खण्डहर हो रहे मकान की मिट्टी में महकती है, बुआ के किस्सों से झांकती है। मां के पीछे छिपी एक गुमशुदा औरतअरविंद के चेतन-अवचेतन में हमेशा बनी रहती है, इस कदर कि अरविंद जीवन भर किसी भी फिल्म में मां का जिक्र आने भर से भावुक हो जाता था और शर्मिंदा होना पड़ता था। इसीलिए उसने फिल्म देखना ही छोड़ दिया था।

उस मां को पति और परिवार का प्यार नहीं मिला लेकिन उसने सारा जग जीत लिया था, यह उसकी मौत के बाद पता चलता है जब शोक व्यक्त करने इतनी स्त्रियां आ जाती हैं कि घर के भीतर और दालान तक में उन्हें बैठाने की जगह नहीं बचती- कस्बे के अलग-अलग कोनों, कुम्हारों, लुहारों, छिप्पियों और मुसलमानों की गलियों से आई अनाम और अनजान औरतों का यह रेला देखकर मोहल्ले की परिचित ताई-चाचियां और घर के लोग हैरान थे... औरतों का यह तांता कई दिनों तक लगा रहा। कई तो महीनों बाद सिर्फ यह कहने आई कि घर में किसी काम की जरूरत पड़े तो खबर करवा दियो।

धरती-सी धैर्यवान और मजबूत यह मां अपने घर की नींव में ही नहीं थी, मामा की रखैलकही जाने वाली उस रसूलन के मान-सम्मान के लिए भी कमर बांध कर खड़ी रही, जिसने मामा के परिवार को बिखरने से बचा रखा था। और तो और, वह आततायी जेठ के हाथ का लट्ठ छीनकर उसके सामने चुनौती बनकर खड़ी हो गई थी। वह स्त्री उपन्यास से बाहर आकर पाठक के भीतर बैठ जाती है और वहीं बनी रहती है।

यह कथा एकरेखीय नहीं है और न इस तरह सिलसिलेवार कही गई है। अरविंद के अंतर में लगातार चलने वाले स्मृतियों के मोंताज में कथा के बिखरे-बिखरे तार उभरते और क्रमश: जुड़ते जाते हैं। उपन्यास पूरा होते-होते एक कसक गहरे उतर जाती है। शिल्प इतना प्रभावशाली और अलग किस्म का है कि कथा का कहीं विस्तार न होने, तारतम्य नहीं बनने, विवरणों में न जाने और कोई विशेष ढांचा खड़ा न किए जाने के बावजूद वह समग्रता में प्रवाहित होती है। भाषा में देशज छोंक इसे और आत्मीय बना देता है।  

जो पिता तीन चौथाई उपन्यास में अपराधी ठहरते हैं, वह वृद्धावस्था में जैसे बरी कर दिए जाते हैं, हालांकि इसका जवाब अरविंद के पास भी नहीं है कि क्या उसनें उन्हें सचमुच बरी कर दिया? ऐसा केवल अरविंद के साथ ही नहीं होता, वह फिलहाल जिस सबीना के साथ रिश्ते में बना हुआ है, वह भी अपने आरोपित पापा को बख्श देती है- यह महसूस करते हुए कि कि जो चोट मैंने अपने पापा को पहुंचाई थी, उसका घाव खुद मेरे अंदर हुआ था।

सबीना का किस्सा यह है कि जब वह चौदह-पंद्रह की थी तो उसकी मम्मी की मौत हो गई थी और चार महीने भी नहीं बीते थे कि पापा ने दूसरी शादी कर ली थी। सबीना उनसे भाग आई और फिर नहीं लौटी थी। दोनों को लगता रहा था कि उनके पास लौटने के लिए कोई जगह नहीं है।

यहां पंकज बिष्ट का उपन्यास उस चिड़िया का नामयाद आता है, जहां नायक पिता की मृत्यु के बाद उनके जीवन को किसी अभियोजन की दृष्टि से देखता रहता है। वास्तव में यह सब अपने ही भीतर झांकने की कोशिश है, अपने को समझने का प्रयास है। अंतिम पृष्ठों में अरविंद और सबीना की बातचीत इसे स्पष्ट कर देती है। सबीना के बहुत छोटे से प्रसंग में मदर मेरी कम्स टु मी’ (अरुंधती राय) की स्मृति भी कोंध जाती है।

उपन्यास के शुरू में पिता का जो फोन आया था कि महेंद्र चाचा की मौत पर अवश्य घर आना क्योंकि तुम दुनिया से कट गए हो’, उसका जवाब अंत में मिलता है, चालीस वर्षों में फैले तमाम स्मृति-मोंताज़ों की उड़ती-भागती यात्रा के बाद, अपने भाई गोविंद से यह कहने में कि गोविंद भाई, पिता जी से मेरे न आने का कोई बहाना बना देना।

आधे सूरज की धूपके बैक कवर पर दर्ज़ है कि सामाजिक-सांस्कृतिक विमर्शों और साहित्य में एक साथ आवाजाही करने वाले नरेश गोस्वामी का यह पहला उपन्यास है जो पिछले दस बरसों में अलग-अलग दिशाओं में भटकने के बाद अंतत: इस ठौर पर पहुंचा है।

और क्या खूब पहुंचा है!मैं इतना और जोड़ना चाहता हूं। शानदार उपन्यास के लिए गोस्वामी जी को बधाई और प्रकाशित करने के लिए सम्भावना प्रकाशन को साधुवाद।

- नवीन जोशी, 25 मई 2026, रामगढ़  

(‘आधे सूरज की धूप’ (उपन्यास), लेखक- नरेश गोस्वामी। सम्भावना प्रकाशन, हापुड़, पृष्ठ 83, मूल्य- 200 रु।)    

      

             

Sunday, May 17, 2026

बहुत बेचैन करता है 'मुरदा घर'

 ‘मुरदा घर’ (जगदम्बा प्रसाद दीक्षित, 1974) ने रात भर सोने न दिया।

  
 
 
कितना कम जानते हैं हम! कितना कम पढ़ा है!
 
शैलेश मटियानी का ‘बावन नदियों का संगम’ पढ़ा था। ‘इब्बू मलंग’, ‘चील’, ‘मिट्टी’, जैसी उनकी कई कहानियां भी पढ़ी थीं। मटियानी जी कभी बम्बई के अपने शुरूआती दिनों के किस्से सुनाते तो कंपकंपी छूटने लगती थी। वे घर से भागकर दिल्ली-इलाहाबाद होते हुए बम्बई पहुंचे थे। 
 
बेटिकट पकड़े गए तो जेल हुई। जेल में जो भी था, कम से कम रोटी मिल जाती थी। रिहा हुए तो भिखारियों के बीच बैठकर भीख मांगी, कूड़े से बीनकर भी खाया। फिर एक ढाबे में जूठे बर्तन मांजते हुए लिखना शुरू किया। उनके उपन्यास-कहानियां इस सबकी गवाह हैं। सोचता था, कि हिंदी में वैसा विकट जीवन जीने और उसका भोगा हुआ लिखने वाला और कौन रचनाकार होगा! 
 
जगदम्बा प्रसाद दीक्षित बम्बई (अब मुम्बई) के सेंट जेवियर कॉलेज में अध्यापक थे। ठीक-ठाक जीवन जिया उन्होंने लेकिन ‘मुरदा घर’ कैसे लिख पाए वे! 
 
स्पष्ट है कि श्रेष्ठ लेखक कितनी ही आंखों से देखता और कितनी ही इंद्रियों से भोगता है! 
 
'मुरदा घर' में एक-दो रुपए और कभी-कभी तो अठन्नी के लिए भी सम्भावित ग्राहकों का हाथ पकड़कर खींचती औरतें, ताकि देह के बदले ही कुछ खाने को मिल जाए। होटलों के पिछवाड़े सड़ा-गला जूठा फेंके जाने का बेसब्री से इंतज़ार करते, उसके लिए आपस में लड़ते, कुत्तों-कौओं को भगाते बच्चे। छोटी-छोटी चोरियां करते, जरायम की दुनिया के सहारे ‘परिवार’ जोड़ने की कोशिश करते मर्द। भीख मांगने के लिए गिड़गिड़ाते एवं आपस में लड़ते भिखारी, अंधे-लूले-कोढ़ी और उनकी कभी क्रूर-कभी अति-मानवीय दुनिया … । इस ‘नर्क’ में सीझता-रिसता-घिसटता जीवन है, सपने हैं उनकी टूटन है और उनकी चुभती किरचें।
 
इन बस्तियों से लगी हुई अट्टालिकाएं और दौड़ती-भागती मोटरें और सभ्य दुनिया है। उनके लिए कलंक बने इस संसार को बार-बार उजाड़ने वाला शासन-प्रशासन है, जेलें हैं और उसके भीतर का दूसरा ही घोर नरक है। 
 
इस सब को प्रामाणिक बनाते दृश्य, बिम्ब, भाषा, संवाद और टूटे-फूटे किंतु मारक वाक्य हैं। शैली ऐसी की आप पढ़ते हुए सिहर-सिहर उठते हैं। 
 
यह 1960-70 के दशक की बम्बई का एक अनिवार्य चेहरा है, जिसका रोंगटे खड़े कर देने वाला वृत्तांत हम मटियानी जी के मुख से सुनते और उनकी रचनाओं में पढ़ा करते थे। जगदम्बा प्रसाद दीक्षित कैसे उसे इतना विश्वसनीय और धड़कता हुआ लिख पाए! 
 
ऐसी ही होनी चाहिए लेखक की संवेदना और जमीनी सत्य को इस बारीकी से पकड़ सकने की उसकी क्षमता।
 
‘मुरदा घर’ का ज़िक्र कुछ समय पहले गंगा शरण सिंह की एक पोस्ट में पढ़ा था लेकिन यह उपन्यास उपलब्ध नहीं हो पा रहा था। परसों नैनीताल में था तो मित्र Rajiv Lochan Sah/नैनीताल समाचार के पुस्तक संग्रह में अचानक इस पर निगाह गई तो तत्काल मांग लाया था। रामगढ़ के डेरे में जो इसे पढ़ना शुरू किया तो फिर रुका न गया। 
 
इससे उपजी बेचैनी लम्बे समय तक साथ रहने वाली है।
 
- न जो, 15 मई 2026, रामगढ़  

Saturday, May 16, 2026

'टनल' - हिमालय के सरोकारों का स्पर्श मात्र

महामाया’, ‘कालीचाट’, गाफिलसमेत कुछ अन्य उपन्यास लिख चुके सुनील चतुर्वेदी ने इस बार हिमालय की घुटती सांसेंको टनलउपन्यास का विषय बनाया है। नवम्बर 2023 में उत्तरकाशी जिले के सिल्क्यारा नामक स्थान में चार धाम राजमार्ग के लिए निर्माणाधीन सुरंग के भीतर भारी भू-स्खलन हो जाने से 41 मजदूर फंस गए थे। उन्हें बाहर निकालने के लिए कई दिन तक कई प्रकार के उपाय किए गए, भारी-भारी मशीनें मंगवाई गईं, देश-विदेश से विशेषज्ञ बुलाए गए लेकिन सब विफल रहे। अंत में रैट होल माइनर्सकी सहायता से सुरंग में फंसे श्रमिक 17 दिन बाद बचाए जा सके थे।  

रैट होल माइनर्सपहाड़ या धरती के भीतर बहुत छोटे से छेद से घुसकर खनन का खतरनाक काम किया करते हैं, जो अवैध घोषित है। जब तमाम विशेषज्ञ और बड़ी-बड़ी मशीनें फेल हो गईं तब यही अवैध काम करने वाले दीन-हीन श्रमिक काम आए थे।

खैर, सुनील चतुर्वेदी ने सिल्क्यारा हादसे के बहाने हिमालय के विनाश और असंगत विकास नीतियों पर सवाल उठाने की कोशिश की है। सिल्क्यारा टनल के बाहर चाय की टपरी चलाने वाले एक बूढ़े की मुंहजबानी सुरंग में फंसे मजदूरों की कहानी शुरू होती है। बीच-बीच में बूढ़ा कभी चिपको आंदोलन के किस्से बयान करने लगता है, कभी टिहरी बांध के विरोध में हुए आंदोलन के बारे में बताता है। यह बूढ़ा कौन है, कोई नहीं जानता। सिल्क्यारा और आसपास के गांव वाले भी नहीं, जो उससे कहानी सुनते हैं और उसके खान-पान एवं सेहत का ध्यान भी रखते हैं।

धीरे-धीरे पाठक अवश्य जान जाता है कि वह बूढ़ा अपनी जवानी में संसार के दुखों से परेशान होकर बुद्ध के मार्ग पर चलने की ठान लेने के बाद हिमालय की ओर आया था। यहां उसे चिपको आंदोलन चलाने वाले सुंदरलाल बहुगुणा, चण्डी प्रसाद भट्ट, घनश्याम सैलानी, धूम सिंह नेगी जैसे लोग मिलते हैं। बूढ़ा विशेष रूप से सुंदरलाल बहुगुणा जैसे संतसे अत्यंत प्रभावित होकर उनके अभियान में शामिल हो जाता है और बाद में उनका विश्वस्त सहायक भी बन जाता है। लेखक भी बहुगुणा जी से बहुत प्रभावित है और यह उपन्यास उनको और उनके जैसे अन्य योद्धाओं को ही समर्पित भी है। 

तो, बूढ़े के मुंह से चंद ग्रामीण (और पाठक भी) सुरंग में फंसे श्रमिकों की कहानी के साथ-साथ चिपको आंदोलन और बाद में टिहरी बांध विरोधी आंदोलन के किस्से सुनते हैं। आप चकित हो सकते हैं कि सिल्क्यारा के निकटवर्ती गांवों में रहने वाले इन लोगों को तीन वर्ष पूर्व हुए उस हादसे के बारे में पता क्यों नहीं है और वे इसे सुनने के लिए अत्यंत लालायित क्यों हैं। खैर, सुरंग में फंसे मजदूरों की मुक्ति के साथ कहानी खत्म हो जाती है और कथा सुनने वालों को हैरत में डालते हुए बूढ़ा किसी रहस्य की तरह अचानक लापता हो जाता है।

यह उपन्यास बहुत उम्मीद के साथ पढ़ना शुरू किया था क्योंकि हमारे योजनाकारों और सरकारों ने विकास के नाम पर शुरू से ही हिमालय के साथ अत्यंत बर्बर व्यवहार किया है। सिल्क्यारा हादसा भी ऐसी ही प्रकृति-विरोधी नीतियों का दुष्परिणाम था। हिमालय ने कई तरह से योजनाकारों को चेताया है, बगावत भी उसने खूब की है लेकिन सरकारों और उनके नीति-निर्धारकों ने लगातार उसकी उपेक्षा की है, अनसुनी की है।

 उम्मीद थी कि सुनील चतुर्वेदी इन तमाम मुद्दों पर गहराई से विचार करेंगे, कथानक में उन विसंगतियों को उभारेंगे और एक विमर्श छेड़ेंगे। लेकिन टनलउपन्यास निराश करता है। सिल्क्यारा हादसा हो या चिपको आंदोलन या टिहरी बांध विरोधी आंदोलन, इसमें मात्र हलके-फुलके विवरणों के रूप में दर्ज़ हुए हैं। चिपको आंदोलन की चंद घटनाओं को छोड़कर उसके विविध आयाम या टिहरी बांध से हुए विस्थापन का विराट दर्द छुआ ही नहीं गया, इनकी गहराई में जाना दूर की बात रही। उन लोगों के जीवन में तनिक भी नहीं झांका गया है, जो विकास की क्रूर विसंगतियों की मार झेलते आए हैं और समय-समय पर कई आंदोलनों के माध्यम से अपना दर्द एवं आक्रोश व्यक्त करते रहे हैं। कहीं-कहीं हलके से यह उल्लेख भर कर दिया गया है कि मैदानों जैसी विकास योजनाएं हिमालयी क्षेत्र के लिए कतई उपयोगी नहीं हैं।

बूढ़े के मुंह से सुने जाते किस्से मात्र सामान्य किस्से बनकर रह गए हैं। जो ग्रामीण इन किस्सों के श्रोता हैं, वे मात्र श्रोता हैं। न ही उनका दैनंदिन जीवन, न उनके कष्ट व संघर्ष और न ही थोड़े सुख और जीवन-रस, कहीं से भी कथा का हिस्सा बन पाए हैं। एक-दो प्रसंगों में फुलदेईपर्व-गीत या एक लोक-कथा का उल्लेख तनिक आशा जगाता है, लेकिन वह भी पर्याप्त जानकारी या शोध के अभाव में प्रामाणिक नहीं बन पाया। रैट होल माइनर्सभी घटनास्थल की तरह ही कथा में भी आते हैं और काम पूरा करके चले जाते हैं। न उनकी बहादुरी और न उनका दयनीय-उपेक्षित जीवन लेखक की निगाह में आ पाया है। एक सचेत लेखक से इसकी उम्मीद नहीं की जाती।

लेखक ने उपन्यास की भूमिका में बताया है कि सिल्क्यारा सुरंग हादसे की खबर मिलते ही वे एक पत्रकार मित्र के साथ सिल्क्यारा पहुंचे और वहां तीन दिन तक रहे थे। इससे उम्मीद बंधी थी कि लेखक की आंख उस समाज और उसके हालात पर गहरी गई होगी। किंतु उपन्यास पूरा पढ़ लेने के बाद लगता है कि यह भी ऊपरी पत्रकारीय रिपोर्ट से आगे नहीं पहुंच सका। 

वे एक लाइन में यह सवाल तो उठाते हैं कि आखिर इस सुरंग वाली सड़क की आवश्यकता किसे है, लेकिन कहीं भी यह उल्लेख नहीं करते कि यह सुरंग प्रधानमंत्री के ड्रीम प्रोजेक्टकहे जाने वाले ऑल वेदर चार धाम रोड प्रॉजेक्टका हिस्सा है, जिसे तमाम मानकों, भू-विज्ञानियों और पर्यावरण विशेषज्ञों की गम्भीर आपत्तियों की अनसुनी करके एक सनक की तरह पूरा किया जा रहा है। और, यह अकेला प्रॉजेक्ट नहीं है, जो हिमालय की क्रमश: बर्बादी का कारण बन रहा है। बहुत पहले से, पहले की सरकारों ने भी हिमालय के साथ ऐसी ही बर्बरता की है। 

पहले कम से कम चिपको या बांध विरोधी या नशा विरोधी जैसे कई आंदोलन जनता ने आक्रामकता के साथ किए थे, अब तो ऐसी सम्भावना ही खत्म कर दी गई है। पहाड़ों के लोग चुपचाप विकास के नाम पर विनाश देखने-सहने को विवश हैं।

ऐसे वृहत्तर प्रश्नों से यह उपन्यास नहीं टकराता और कुछ किस्सों का बयान भर बनकर रह जाता है।

·        (‘टनल’ (उपन्यास), लेखक- सुनील चतुर्वेदी, पृष्ठ 116, मूल्य 225 रु., सम्भावना प्रकाशन, हापुड़।)

- न जो, रामगढ़, 17 मई 2026 

           

Friday, May 15, 2026

170 वर्ष पुराने हिमालय के चित्रों की नायाब प्रदर्शनी

अगर आप आज-कल-परसों (18 मई की शाम तक) नैनीताल या उसके आसपास हों तो समय निकालकर मल्लीताल सी आर एस टी कॉलेज में लगी वह चित्र प्रदर्शनी देखने अवश्य जाएं, जो आपको 170 साल पहले के हिमालय में ले जाएगी। ये केवल उस काल के चित्र नहीं हैं, बल्कि इतिहास-संस्कृति-भूगोल-पर्यावरण-मानव जीवन स्थितियों-वनस्पतियों-आदि-आदि से भी रू-ब-रू कराएंगे। इस प्रदर्शनी को देखना अपने भूगोल और समाज को गहराई से देखने-जानने की मानवीय ललक और उसके लिए किए गए अथक श्रम व समर्पण को भी महसूस करना है।

मोटे तौर पर यह कहानी तत्कालीन प्रूशिया (आज का जर्मनी) के एक ख्यात फील्ड सर्वेक्षक अलेक्जेण्डर हम्बोल्ट के उस सपने से शुरू होती है जो लेटिन अमेरिका और यूरोप के पर्वतों का स्वयं फीड सर्वे कर चुकने के बाद भारतीय हिमालय का अध्ययन कराना चाहते थे ताकि विविध जानकारियों से समृद्ध एटलस तैयार किया जा सके। उन्होंने प्रूशिया के तत्कालीन राजा के माध्यम से ब्रिटिश महारानी और उनके जरिए ईस्ट इण्डिया कम्पनी से सम्पर्क साधा और भूगोल और भूगर्भशास्त्र के अध्येता दो भाइयों, हरमन श्लागिंटवाइट और एडॉल्फ श्लागिंटवाइट को इस काम के लिए तैयार किया कि वे भारतीय हिमालय का अध्ययन-सर्वेक्षण करने के लिए जाएं। दोनों भाई न केवल इस कार्य के लिए तैयार हुए, बल्कि उन्होंने छोटे भाई रॉबर्ट को भी सहायक के रूप में साथ लिया। रॉबर्ट फोटोग्राफी का भी शौकीन था। कैमरे का आविष्कार हुए तब बहुत दिन नहीं हुए थे।

करीब दो साल की तैयारियों के बाद तीनों श्लागिंटवाइट भाई 1854 में भारत पहुंचे। उन्होंने विविध सहायकों की करीब एक सौ लोगों की टीम तैयार की और भारतीय हिमालयी क्षेत्र को तीन भागों में बांटकर तीनों अपने-अपने लिए निर्धारित रास्तों पर निकल गए। उन्होंने अलग-अलग मार्गों पर कोई 18,000 मील की यात्रा की, जो अधिकतर पैदल और कभी घोड़ों पर भी की गई। उन्होंने अपने यात्रा क्षेत्रों के चित्र बनाए, नक्शे बनाए, नदियों-पहाड़ों-झीलों-बस्तियों-पुलों-आदि-आदि के विविध विवरण एवं मानक दर्ज़ करते हुए अपनी डायरियां भरीं। अपने भूगोल अध्ययन और हमबोल्ट के निर्देशों के आधार पर उन्होंने खाके तैयार किए। सभी चित्र व नक्शे तत्काल फाइनल नहीं किए जा सकते थे, इसलिए अपने रफ स्केचों में छोटी-छोटी चीजें भी दर्ज़ कीं, यहां तक कि कौन सी चीज उस समय किस रंग में दिख रही थी।

उनकी इस यात्रा के दौरान ही भारत में 1857 का सैनिक विद्रोह हुआ। जब वे वापस लौटे तो उनके पास साढ़े सात सौ से अधिक नक्शे और चित्र तो मौजूद थे ही, यात्रा मार्ग से बटोरी गई तमाम चीजें भी थीं, जैसे- पत्थर, लकड़ी, वनस्पतियों, आदि के ढेरों नमूने। इनमें असम से लेकर बाल्टिस्तान और लद्दाख, हिमालय की तलहटियों, मिजोरम के खासी हिल्स से लेकर हिमालय-पार के तिब्बत और भूटान तक के चित्र, नक्शे और विविध वस्तुएं शामिल थीं।  

भारत तीन भाई आए थे लेकिन लौटे दो ही। बीच वाले भाई एडॉल्फ को 1857 में काशगर में जासूस होने के शक में मार डाला गया था। अनेक खूबियों वाली इस ऐतिहासिक सर्वे यात्रा का यह अत्यंत त्रासद पक्ष रहा।

खैर, जर्मनी लौटकर वे चित्र रंगों और अन्य विवरणों से पूरे किए गए। रॉबर्ट ने अपने कैमरे से जो फोटो खींची थीं, डेवलप करने के बाद उन्हें भी डायरी में चिह्नित विवरणों के आधार पर रंगीन बनाया गया। एक मूल्यवान ऐतिहासिक काम हो गया था लेकिन 1859 में हम्बोल्ट की मृत्यु हो जाने और फिर प्रूशिया के तत्कालीन राजा का भी पराभव होते जाने से उनके काम को वह मुकाम नहीं मिल सका, जिसकी योजना शुरू में बनाई गई थी।

श्लागिंटवाइट भाइयों के बनाए चित्र काफी समय तक उनके घर में पड़े रहे और फिर जर्मनी के अल्पाइन संग्रहालय में उन्हें सुरक्षित कर दिया गया।

दुनिया के सामने ये ऐतिहासिक चित्र पहली बार 2011 में आए जब बर्लिन में इनमें से कुछ चित्रों की पहली प्रदर्शनी लगाई गई। उस समय बर्लिन की फ्री यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और हिमालय अध्येता हरमन क्राइट्ज़मैन ने अपने परिचित हिमालयविद और पहाड़फाउण्डेशन के प्रोफेसर शेखर पाठक को बर्लिन आमंत्रित किया। प्रो पाठक इन चित्रों को देखकर स्वाभाविक ही उत्फुल्लित हुए और उन्होंने अल्पाइन म्यूजियम में रखी श्लागिंटवाइट भाइयों की तैयार की गई बाकी सामग्री भी देखी। उसी समय उनके मन में इन चित्रों की प्रदर्शनी भारत में लगाने का विचार आया था। आज कोई 15 वर्ष बाद उनका यह सपना साकार हुआ है। यह कैसे सम्भव हो पाया, क्या दिक्कतें आईं, कैसे उनका समाधान किया गया और कितने लोगों ने इसे सम्भव बनाया,  यह अलग से लम्बी कहानी है।

दिल्ली और देहरादून में प्रदर्शन के बाद श्लागिंटवाइट भाइयों के सैकड़ों चित्रों में से करीब एक सौ चुनिंदा चित्र फिलहाल नैनीताल में देखने के लिए उपलब्ध हैं। यह बताना भी जरूरी है कि ये मूल चित्र नहीं हैं। सुरक्षा और संरक्षण की अत्यावश्यक सावधानी के कारण मूल चित्रों की प्रतिकृतियां तैयार करके प्रदर्शित की गई हैं। इन प्रतिकृतियों को 'पहाड़' फाउंडेशन को दान कर दिया गया है। यानी अब ये भारत में ही रहेंगीए और समय-समय पर प्रदर्शित की जा सकेंगी। 

आप इन चित्रों में 1855 के नैनीताल की झलक देख सकते हैं, बहुत बड़े भूस्खलन से मल्लीताल का फ्लैट्स तब तक नहीं बना था और नैनीताल भी एक गांव हुआ करता था। उस समय के बदरीनाथ का चित्र देखकर आप चौंक जाएंगे और पहचान नहीं पाएंगे कि यही आज का बदरीनाथ है। नदियों पर किस मौलिक-प्राकृतिक तकनीक से तब पुल बनाए जाते थे, यह देखना कम रोमांचक नहीं है। बहुत से बौद्ध विहारों, मंदिरों, पठारों, चट्टान-शृंखलाओं, वनस्पतियों, नदियों और समाजों के चित्र हमें 170 साल पहले के समय में ले जाते हैं।

 - नवीन जोशी, रामगढ़, 16 मई, 2026

       

         

Friday, April 10, 2026

भुतहा होते गांव

कथाकार नवीन जोशी का उपन्यास ‘भूतगांव’ उत्तराखंड के पहाड़ों के अकेलेपन और गांवों के भुतहा हो जाने की कथा है। केवल उत्तराखंड ही नहीं व्यवसाय और रोज़गार के अभाव में हिमाचल प्रदेश से लेकर उत्तर पश्चिम तक के गांव खाली हो रहे हैं तो सेठों की धरती शेखावाटी की बड़ी-बड़ी हवेलियों के बाहर चौकीदार हैं और अंदर कबूतर। शेखावाटी वह इलाका है जहां बिरला, पोदार, साहू जैन, सिंहानिया, पीरामल एवं खेतान इत्यादि का जन्म हुआ था लेकिन व्यवसाय के लिये वे बाहर निकले तो उनकी हवेलियां आज भी इंतजार कर रही हैं। नवीन जोशी उत्तराखंड के सतौर गांव के एक परिवार को उपन्यास के केंद्र में रखते हैं, जिनका एक भाई लखनऊ चला गया था तो दूसरा फौज से अवकाश ग्रहण कर गांव में अकेला रह रहा था। पूरे गांव में छुरमल ज्यू का मंदिर और आनंद सिंह तथा उसका कुत्ता शेरू हैं। अपने अकेलेपन में गांव शांत है लेकिन बाघ की आवाज़ का डर हमेशा गांव की शांति को भंग किये रहता है। नवीन जोशी पत्रकार हैं इसलिये अकेलेपन की समस्या को वैश्विक स्तर पर उठाते हैं। वैश्विक पूंजी ने गुड़गांव, बेंगलोर, पुणे एवं हैदराबाद जैसे महानगर व्यापार और टेक्नोलोजी के विस्तार के लिये चुने हैं, जहां सारे देश के युवक नौकरियों के लिये जा रहे हैं। लेकिन दूर-दराज के गांवों में अभाव हैं, न शिक्षा की व्यवस्था है और न रोजगार की, इसलिये पढ़ा-लिखा युवक रोज़गार की तलाश में बाहर जाता है और फिर वहीं का होकर रह जाता है। सरकार की उदासीनता के कारण गांव मूलभूत सुविधाओं के अभाव में अकेले और भुतहे हो गये हैं। अपने गांव के प्रति प्रेम कोरी भावुकता है, जंग खाये ताले लगे उन मकानों में रहकर या पहाड़ के सौंदर्य को देखकर पेट नहीं भरता इसलिये शहर की ओर जाना ऐसा यथार्थ है, जो सबके सामने है।

भूतगांव’ एक समय में हिल-मिलकर रहने वाला गांव था, जहां ब्राह्मण और राजपूतों के अलावा अन्य जातियां भी थीं, जो धीरे-धीरे उजड़ गईं। गांव सूने हो गये और अकेले मकान धीरे-धीरे खंडहर में तब्दील होते गये। गांव में अपने पालतू कुत्ते शेरू के साथ रह रहे आनंद सिंह बताते हैं कि ‘महाभारत के हस्तिनापुर जैसा ही ठहरा हमारा गांव। शापग्रस्त। गांधारी ने कृष्ण को शाप दिया था पूरे कुल के उजड़ जाने का। वैसे ही यह गांव शापग्रस्त लगता है मुझे। चल, आज भी किसी बंद दरवाजे और सूने गोठ की कहानी कहूंगा या किसी खंडहर की। खंडहरों की भी कहानी होती है डियर। बल्कि सच बात ये हुई कि खंडहरों के पास ज्यादा कहानियां होती हैं। टूटी दीवारों, ढही छतों, लुढ़के पाथरों, सड़ी बल्लियों और भीतों की कहानियां! गोठ की गाय और गोद का भाऊ जीते रहें, ऐसा आशीर्वाद देने वाले हुये ताकि जिंदगी चलती रहे। कहानी न बन जाये। द्वार पर ताला लटक गया और गोठ सूना हो गया तो फिर कहानी ही रह जाने वाली हुई।

यह ऐसी कहानियां हैं, जिन्हें सुनने वाला कोई आदमी गांव में नहीं है इसलिये गांव के उजड़ने की कहानियों को वे भारी मन से शेरू को सुनाते हैं। यह भी एक विडंबना ही है कि अकेले आदमी के पास अतीत की हरी-भरी स्मृतियां हैं लेकिन उन्हें सुनने वाला कोई आदमी नहीं बचा। वे दुखी मन से कहते हैं ‘इस गांव की ऐसी कौन-सी कथा है जो बार-बार कहने लायक हो। कोई ऐसे गया, कोई वैसे उजड़ा, कोई हमारी तरह टूटा । बचा यह सन्नाटा, चारों तरफ खंडहर, बंजर और इस सबके अकेले साथी छुरमल ज्यू।’ छुरमल ज्यू गांव के देवता हैं, पूरे गांव में अकेला मंदिर उन्हीं का है लेकिन ब्राह्मणों के पलायन करने के बाद अब कोई दीया जलाने वाला पुरोहित नहीं बचा है इसलिये आनंद सिंह ठाकुर होते हुये भी दीया जलाते हैं। गांव में हर जाति के काम बंटे हुये हैं इसलिये जो काम ब्राह्मणों का है, उसे ठाकुर नहीं कर सकता, अगर वह करता है तो यह परंपरागत काम की श्रेणी में नहीं आता है।

उपन्यास की मूल कथा सतौर गांव के वीरेंद्र सिंह नेगी और उसके छोटे भाई आनंद सिंह पर केंद्रित है, एक कथा लखनऊ जैसे महानगर पहुंचती है तो दूसरी सतौर में रहकर सुनाई जाती है- दोनों कथाएं मार्मिक हैं, दोनों के अपने-अपने दुख हैं, दोनों के अतीत और वर्तमान हैं, दोनों के भविष्य दारुण हैं। विडंबना यह है कि जो कथा लखनऊ में घटित हो रही है, उसका मुख्य पात्र जातिवाद से ग्रस्त है और जो कथा गांव में कही जा रही है, वह जातिवाद से मुक्त है। जो लोग पहाड़ों या अन्य दूसरी जगहों से महानगर में गये हैं, वे अपने साथ अपनी जातियों को भी ले गये हैं, वे आधुनिक बनने की कोशिश तो करते हैं लेकिन अपनी जड़ों से जुड़ने के नाम पर जाति की विभीषिका से मुक्त नहीं हो पाते हैं जिसका लाभ लोग कम राजनीतिज्ञ अधिक उठा रहे हैं। नवीन जोशी ने कथा को इस तरह बुना है कि यह एक व्यक्ति की कहानी न होकर बदलते हुये समाज की बृहत् कथा में रूपांतरित हो जाती है। इसलिये यह नहीं कहा जा सकता कि यह कहानी सतौर गांव के युवक वीरेंद्र सिंह नेगी और हलवाहे की बेटी हीरा की प्रेम कहानी मात्र है। उपन्यास में गांव की कथा आनंद सिंह अपने शेरू को सुनाते हैं तो लखनऊ में स्थापित वीरेंद्र सिंह नेगी की कहानी नेरेटर सुनाते हैं लेकिन ‘भूतगांव’ की कहानी साथ-साथ चलती है, जो दोनों कहानियों के अर्थ और गहरे करती जाती है। अपने हलवाहे चनरराम की बेटी हीरा के देह आकर्षण से विमोहित होकर वीरेंद्र उसे लखनऊ भगाकर ले गया था, पहाड़ से लेकर मैदान तक में इस तरह की घटनाएं होती रहती हैं, यह प्रेम का मामला है जिस पर दुनियाभर में खूब लिखा गया है और अब भी लिखा जा रहा है लेकिन नवीन जोशी जो बताना चाहते हैं, वह यह है कि वीरेंद्र सिंह नेगी से वी.एस.नेगी में जो मध्यवर्गीय युवा रूपांतरित हुआ था, वह महानगर में पक्की नौकरी और बड़े अधिकारी का संरक्षण पाकर अपनी जाति पर गर्व करने लगा। हीरा उसके हलवाहे की बेटी थी, वह उसकी जाति और सामाजिक जीवन में जातियों की विडंबनाओं से भलीभांति परिचित था लेकिन उसके युवा आकर्षण ने जाति और उसकी विभीषिका को भुला दिया था पर जीवन में स्थायित्व आने तथा सवर्ण मधुमिता गांगुली के संपर्क में आने के बाद हीरा में उसे दलितत्व नज़र आने लगा। यह अकेले वीरेंद्र की कहानी नहीं है बल्कि खाते-पीते सवर्ण मध्यवर्ग की कहानी है, जो अपनी हैसियत से अपना भद्र रूप चुनता है। यह इस रूप में अपनी जड़ों से जुड़ने की नहीं बल्कि सुविधानुसार बदलती व्याख्याओं की कहानी है।

नवीन जोशी पहाड़ और पहाड़ियों की उपेक्षा से आहत ऐसी कहानी लिख रहे थे, जो पहाड़, बर्फ, नदी, झरने और प्राकृतिक सौंदर्य से आकर्षित होकर जाने वाले सैलानियों के अनुभवों से अलग है। सैलानियों की मस्ती में पहाड़ का कठिन जीवन नहीं है, गरीबी और भूख भी नहीं है इसलिये उन्हें वहां सब कुछ अच्छा लगता है। जबकि पहाड़ सामाजिक बुराइयों और कुरीतियों से मुक्त नहीं है, वहां छुआछूत और जातिवाद जिस तरह व्याप्त है, वह भयावह है।

मुझे यह उपन्यास पढ़ते समय बार-बार यह अहसास हुआ कि उजड़ते गांवों की अनेक समस्याओं के साथ जातिवाद का दंश भी बड़ी समस्या रही है। उपन्यास जातिवाद पर नहीं है लेकिन उससे मुक्त भी नहीं है। सतौर गांव में अकेले रह रहे आनंद सिंह की अपनी पीड़ा है, जिसे वह कभी शेरू को सुनाता है तो कभी मन ही मन याद करके दुखी होता है। वह जब छोटा था, तब उसका बड़ा भाई वीरेंद्र हीरा को भगाकर ले गया था, इस घटना ने पूरे परिवार को तबाह कर दिया। उसका मानना है कि जो काम वीरेंद्र ने किया, उसका परिणाम भी उसे ही भुगतना चाहिये था लेकिन काम एक ने किया और परिणाम पूरे परिवार ने भुगता। उसकी बहन पत्थर बांधकर नदी में कूद गई और उसकी लाश पर सिर पटककर मां ने प्राण त्याग दिये, अपनी इज्जत के साथ जीने वाले पिता जीते जी ही मुरझा गये और पूरे घर को जाति बाहर कर दिया गया। आज भी इस तरह की घटनाएं खांप पंचायतों इत्यादि के माध्यम से सामने आ रही हैं, जिनका दंश पूरे परिवार को झेलना पड़ता है।

आनंद सिंह छोटा था, उसने अपने परिवार को बिखरते और घुटते हुये देखा था इसलिये वह कहता है ‘हमारे परिवार के साथ जो हुआ था, उसके बाद शादी की बात से ही मुझे चिढ़ हो गई थी। यह ख्याल कभी मन में आया ही नहीं। आज भी सोचता हूं क्या दोष था दीदी का? उसकी किसी अच्छे घर में शादी क्यों नहीं होनी चाहिये थी? न होता साला खानदानी खशिया! उसे क्यों अपमान सहना पड़ा? जान देनी पड़ी? इजा का गुमान क्यों इतना चूर-चूर हुआ कि उसने अपना सिर फोड़ डाला? और बाज्यू? गलती की थी तो ददा ने की थी। वैसे सोचो डियर शेरू, ददा की भी क्या गलती थी? इन खशियों की नाक इतनी ऊंची और नाज़ुक क्या हुई कि ज़रा-सा में जड़ से ही कट गई? धत्त साला, ये जात-बिरादरी और गोत्र-सोत्र ! ये लोग मुझे भी सुनाते वही सब। बार-बार ददा-भौजी, दीदी, इजा और बाज्यू के अपमान के किस्से दोहराये जाते। क्यों करता मैं शादी! इस समाज के खिलवाड़ के लिये? इनके तानों के लिये? आमा जब तक जिंदा रही, यही रट लगाती थी, हाथ जोड़ती थी- मेरे अन्नू रे शादी कर ले। छोटी जात में ही कर ले। एक घर चलाने वाली आ जायेगी। दो रोटी खिला देगी। कोई पानी देने वाला होगा। कब तक ऐसे रहेगा?’

सतौर गांव का यह परिवार प्रतिष्ठित था या धनाढ्य था, यह प्रश्न बेमानी है। इसलिये कि गांव में इसके अलावा जातिगत सम्मान होता है, जिसको बचाये रखने के लिये परिवार का मुखिया हर समय चिंतित रहता है लेकिन वीरेंद्र की एक गलती के कारण पूरा परिवार जैसे खत्म ही हो गया। आनंद सिंह बचा तो किसके लिये, खंडहर और अकेले होते गांव के लिये, मंदिर से लेकर लोगों के घरों में दीया और धूप दिखाने भर के लिये। यह एक कहानी है, जो अपनी विभीषिका में दुखांत है इसलिये उपन्यास में उसका दुख बार-बार रिस-रिसकर बाहर आता है। पर नवीन जोशी की और भी चिंताएं हैं, जिन्हें बड़ी या छोटी कहकर नहीं आंका जा सकता। वे यह प्रश्न पूछते हैं कि अब गांवों में पानी के नल किसके लिये लग रहे हैं, जब पानी पीने वाले ही नहीं रहे, तब इन नलों की उपयोगिता किसके लिये है? वे पूछते हैं कि रोज़ी-रोटी के अभाव में गांवों में कोई क्यों रहना चाहेगा? उन जैसे तमाम लोगों की इच्छा थी कि ‘गांवों तक अच्छी सड़कें होतीं। अच्छी बसें चलतीं। छोटे-छोटे दफ्तर और लीसा-लकड़ी-जड़ी-बूटी-फल-फूल की फैक्टरी होती। मतलब गुजारे लायक नौकरियां होतीं।’ लेकिन पहाड़ के गांवों की ओर न किसी ने देखा और न गांवों के खाली होने से पहले किसी ने उनकी चिंता की। तब गांव खाली होने ही थे इसलिये हुये भी।

यह व्यापक चिंताएं हैं, जिन्हें नवीन जोशी एक-एक कर उपन्यास में उठाते हैं। उनकी चिंता यह भी है कि पहाड़ के आदमी की विश्वसनीयता को घर के नौकर तक सीमित करने की अवधारणा किसने प्रसारित की? ईमानदार और कर्मठ होने का मतलब उसके पंखों को कतर देना तो नहीं हो सकता?

पहाड़ी नदियों पर बांध बनाये जा रहे हैं, उनका पानी रोककर निजी कंपनियों को दिया जा रहा है, पेड़ काटे जा रहे हैं, पहाड़ काटकर चैड़ी सड़कें बनाई जा रही हैं, उजड़े गांवों की ज़मीन निजी स्कूल खोलने के लिये दी जा रही है यानी विकास के नाम पर पहाड़ों की आत्मा पर दुर्दांत प्रहार किये जा रहे हैं। पहले एक ही बाघ की चिंता रहती थी लेकिन ‘अब और भी भयानक बाघ आ रहे हैं। ये कंपनी हम सबके लिये बाघ ही तो हुई। और ये हमारी सरकार कैसी है यार? क्यों दे रही किसी कंपनी को हमारी ज़मीन? सरकार भी नरभक्षी बाघ नहीं हुई क्या? उसे हमने गांव बचाने के लिये चुना था या गांव बेच खाने के लिये?

इन स्थितियों में नवीन जोशी को उत्तराखंड राज्य की स्थापना के लिये दी गई कुर्बानियां याद आती हैं और वे अलग राज्य बनने के सपनों के बारे में सोचते हैं, जो धीरे-धीरे समाप्त कर दिये गये। कहना न होगा कि पहाड़ की स्थितियां अलग हैं, उनके सपने और संघर्ष अलग हैं लेकिन दुर्भाग्य से उन्हें समझने वाला कोई नहीं है। इसलिये पहाड़ के गांव उजड़ रहे हैं, चारों ओर भुतहा सन्नाटा है। इस उजाड़ और भुतहे सन्नाटे में बाघ का डर, उसकी आवाज़ जंग खाये तालों के अंदर तक सुनी जा सकती है। 

भूतगांव’ अतीत के साथ इक्कीसवीं सदी में देखे गये सपनों की भी कहानी है, यह कहने भर को उपन्यास नहीं है बल्कि इसका वितान औपन्यासिक है इसलिये सारी कथाएं सतौर गांव की हैं या सतौर गांव से संबंधित हैं।

उपन्यास के अंत में वीरेंद्र के बेटा और बेटी जो अमेरिका और जर्मनी में रह रहे हैं गांव आते हैं और बाघ के भय और आतंक से मनोरोगी बने अपने चाचा आनंद सिंह को देखते हैं तो उन्हें अपने पिता का मनोरोग याद आता है। अकेलेपन में तमाम तरह की ग्रंथियां भयावह रूप में व्यक्तित्व को खत्म करती हैं, इन ग्रंथियों का शिकार बने लोग धीरे-धीरे समाप्त हो रहे हैं। कहना न होगा कि उपन्यास को जिस भाषा में गढ़ा गया है, उसमें पहाड़ी छोंक है, जो इसे पठनीय बनाता है।

-सूरज पालीवाल 

(हंस’ अप्रैल 2026 में प्रकाशित)