भारत के स्नातकों में बेरोजगारी सामान्य से चार गुना अधिक है। स्नातक डिग्री प्राप्त प्रत्येक 12 युवाओं में सिर्फ एक को अपनी डिग्री के मुताबिक नौकरी मिली है। 13 फीसदी पुरुष स्नातक और 20.4 महिला स्नातक बेरोजगार हैं, जबकि देश में औसत बेरोजगारी दर 3.2 है।
ये चिंताजनक आंकड़े चंद रोज पहले जारी नीती आयोग की एक रिपोर्ट में दिए गए हैं। आयोग का मानना है कि अपने देश में पढ़ाई और नौकरी में 36 का आंकड़ा है। आशय यह कि जैसा काम करने वालों की मांग या जरूरत है, वैसी पढ़ाई नहीं होती।
लेकिन जिस प्रकार आयोग कक्षा छह से ही रोजगार परक शिक्षा देने की वकालत कर रहा है, उसके खतरे और बड़े हैं। उसके बारे में थोड़ी देर में बात करते हैं। फिलहाल आंकड़ों की बात।
नीति आयोग बताता है कि जो लोग रोजगार में हैं भी, उनमें 90 प्रतिशत ऐसे काम में लगे हैं जिसका उनकी डिग्री से कोई सम्बंध नहीं है। अधिकतर संस्थानों में पाठ्यक्रम बासी हो चुका है, नव विकसित उद्योगों की जरूरतों से उसका कोई तालमेल नहीं है। बीए, बीएससी, बीकॉम की डिग्रियां या विभिन्न डिप्लोमा या कोर्स नौकरी नहीं दिला पाते।
नीति आयोग ने 2024-25 के आर्थिक सर्वेक्षण का हवाला देते हुए अपनी रिपोर्ट में बताया है कि मात्र 8.25 प्रतिशत स्नातकों को अपनी शैक्षिक योग्यता के अनुरूप रोजगार मिला है।
पिछले दिनों वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने Indian Express अखबार से बातचीत में कहा था कि भारतीय शिक्षा प्रणाली डिग्री-डिप्लोमा धारी युवाओं को पैदा करती है, नौकरियों के लिए सक्षम या योग्य उम्मीदवार नहीं।
नीति आयोग की रिपोर्ट बताती है कि देश में इस समय स्नातक कक्षाओं में पढ़ रहे 3.4 करोड़ युवाओं में 1.13 करोड़ सिर्फ बी ए कक्षाओं में भर्ती हैं। बीए, बीएससी और बीकॉम कक्षाओं में मिलाकर दो करोड़ से अधिक बच्चे पढ़ रहे हैं। ये डिग्रियां नौकरी नहीं दिला पातीं।
इन डिग्री कक्षाओं में बच्चे सरकारी नौकरी की प्रत्याशा में भर्ती होते हैं। नवम्बर 2024 स जुलाई 2025 के बीच 55,000 सरकारी पदों के लिए एक करोड़ 86 लाख अर्जियां आई थीं।
ब आते हैं नीति आयोग की सिफारिश पर्। उसका कहना है कि कक्षा छह कक्षा 12 तक सामान्य रोजगारपरकता और उद्यमशीलता बकायदा एक विषय के रूप में सिखाई जानी चाहिए। इसमें संवाद कौशल, व्यवसाय लायक अंग्रेजी, प्रारम्भिक डिजिटल ज्ञान, वित्तीय समझ, टीम भावना, समस्या हल करने की क्षमता और उद्यमशीलता शामिल हो।
नीतेऐ आयोग यह भी सिफारिश करता है कि प्रत्येक जिले या प्रखण्ड में एक समर्पित रोजगार स्कूल खोला जाना चाहिए, जो कक्षा नौ के बाद सिर्फ रोजगार शिक्षा दे।
इन सुझावों को अमल में लाया जाएगा तो एक बड़ा खतरा यह होगा कि हमारी आने वाली पीढ़ियां अर्धशिक्षित होंगी। कक्षा छह से ही जो रोजगार शिक्षा पढ़ेंगे, वे अच्छी उच्च शिक्षा से वंचित हो सकते हैं और कई प्रतिभाएं विकसित होने से रह जाएंगी।
वास्तव में जिस चीज की स्खत जरूरत है, वह यह कि शिक्षा की दुकानदारी खत्म हो और युवी पीढ़ियां वास्तविक शिक्षा पाएं, जिससे दुनिया को देखने-समझने और उसकी तमाम कठिनाइयों के बीच ठीक से खड़ा होने की क्षमता उनमें आए।
पिछले कई वर्षों से रोजगार कम होते जा रहे हैं। सरकारी नौकरियां लगभग नहीं हैं। खाली पदों पर भर्तियां नहीं हो रहीं। निजी क्षेत्र में पहले कमप्यूटर और अब ए आई के कारण नौकरियां कम होती जा रही हैं। भाजपा सरकार ने शिक्षा को अपने राजनैतिक एजेंडे में बदल दिया है। पाठ्यक्रम में ऐसे-ऐसे बदलाव किए जा रहे हैं कि सल्तनत या मुगल काल का इतिहास पढ़ाना बंद किया जा रहा है।



