Monday, August 31, 2026

‘पूरा पहाड़ मेरे लेखन का हिसाब मांगता है’- विद्यासागर नौटियाल

दिसम्बर 1957 में इलाहाबाद में हुए वृहद लेखक सम्मेलन के दैरान हुए कुछ रोचक प्रसंग सुनाते हुए शेखर जोशी जी एक यह किस्सा भी सुनाते थे- उस सम्मेलन के कहानी सत्र की अध्यक्षता यशपाल जी को करनी थी। उसकी पूर्व संध्या पर बाहर से आए कुछ लेखक बातचीत कर रहे थे। तभी विद्यासागर नौटियाल ने,  जो तब बनारस विश्वविद्यालय के छात्र थे, कुछ आक्रोश से कहा कि मैं तो यशपाल जी से पूछूंगा कि उन्होंने पर्वतीय नारी को लेकर इस तरह की (उत्तराधिकारकहानी की ओर इशारा था) कहानियां क्यों लिखीं। बनारस से ही आए वाचस्पति गैरोला भी वहां बैठे थे। अगले दिन सम्मेलन के दौरान नौटियाल जी तो कुछ नहीं बोले, लेकिन वाचस्पति ने खड़े होकर पूछ लिया कि अध्यक्ष महोदय, आपने पर्वतीय नारी की मान-मर्यादा के विरोध में कहानियां क्यों लिखीं? यशपाल जी ने कहा कि मैं अपने वक्तव्य में इसका जवाब दूंगा और बाद में उन्होंने दिया भी, कि मैंने जो देखा और महसूस किया, उसे लिखा है, आदि-आदि। लेकिन जवाब सुनने के लिए नौटियाल वहां रुके थे न वाचस्पति। इस पर खूब चुहल हमने की थी। बहुत बाद में वर्तमान साहित्यके यशपाल विशेषांकमें नौटियाल जी ने याद भी किया है कि उस दिन गैरोला जी मेरी ही बातों से उत्तेजित हो गए थे।

1958 में विद्यासागर नौटियाल 25 वर्ष के युवक थे, छात्र थे, भैंस का कट्याजैसी प्रसिद्ध कहानी लिख चुके थे और उनके भीतर एक आग जलती रहती थी। (टिहरी के स्कूली दिनों से ही वे अपने नाम के साथ दुर्वासाभी जोड़े रहते थे और कल्पनाके लिए भैंस का कट्या इसी उपनाम के साथ भेजी गई थी, लेकिन प्रकाशन पूर्व पत्र लिखकर दुर्वासाहटवा दिया था।) उस उम्र में यशपाल जी की वह कहानी उन्हें आपत्तिजनक लगी हो, यह अस्वाभाविक नहीं था। (वैसे, वे यशपाल जी की रचनाओं के प्रशंसक थे हालांकि उनकी कुछ रचनाओं में पहाड़ी नारी के चित्रण से वे सहमत नहीं होते थे। मनुष्य के रूपपर उन्होंने इस आशय की टिप्पणी भी लिखी थी)

पहाड़ की नारियों की स्थितियों और संघर्षों को लेकर वे ताउम्र अत्यंत संवेदनशील और आक्रामक मुद्रा में रहे। उनकी कई कहानियों के केंद्र में पहाड़ की स्त्रियां हैं, उनका अपार कष्टों भरा जीवन है, शोषण-दमन है और सांकेतिक विद्रोह भी। (जीवन भर समर्पित वामपंथी बने रहने और कई आंदोलनों में शिरकत और जेल की सजा काटने के बावजूद वे कहानियों में आरोपित विद्रोह या क्रांति के पक्षधर नहीं थे।) मुख्यत: पहाड़ की नारी के जीवन पर केंद्रित उनकी कई कहानियां फट जा पंचधारनाम से संकलित हैं। उनके उपन्यासों में भी पर्वतीय स्त्री की दारुण जीवन स्थितियां अत्यंत संवेदनशीलता और आकोश के साथ चित्रित हुई हैं। उन्होंने लिखा भी है- “पहाड़ के मर्दों के मुकाबले मुझे पहाड़ की नारी अधिक आकर्षित करती रही है। उसकी आंतरिक वेदना। प्रम्थ्यू अनबंध की तरह पेन पेन फॉरएवर’, जन्म से मृत्यु तक की वेदना।”      

74 वर्ष पूरा कर लेने पर अपनी कहानियों के एक बड़े संग्रह (मेरी कथा यात्रा, वाणी प्रकाशन, 2008) की लम्बी भूमिका लिखते हुए वे बताते हैं- “मैंने पर्वतीय नारी को अनेक रूपों में देखा है। खेतों-खलिहानों में, घासिया रकबों में, पहाड़ों की चोटियों और उनकी वादियों में, बस्तियों-वीरानों में, नदी-नालों के आसपास, घरों के अंदर और ज़िंदगी की ज़द्दोज़हद में जुटी हुई औरत। चरागाहों में ग्वालिन बनीं बेटियां, बनैले खूंखार जानवरों से भी ज़्यादा खतरनाक आदमियों की करतूतों, हरकतों का मुकाबला करती हुईं। औरत, जिसे खुद अपने ही जन्मदाता मां-बाप गाय-भैंस की तरह, गोरू की तरह बेचने को बेचैन रहते हैं। अपनी बीमार भैंस को ज़िंदा रखने के लिए सरकारी जंगल में पतरौल के सामने घास की तरह बिछ जाने पर मजबूर घसियारिन। बंधुआ शूद्रा, जिसका अपनी देह पर भी अपना हक नहीं होता। औरत जिसे राजनेताओं की शह पर नारी देह के थोक व्यापारी अपने दलालों के मार्फत बहुत बेरहमी के साथ हिंदुस्तान भर में फैले हुए वेश्यालयों की तरफ घसीटते-धकेलते रहते हैं। मजबूर नारी की उन छवियों को अपनी रचनाओं में उतारने की कोशिश करता रहा।”

वे यह भी मानते हैं कि “यह सिर्फ पहाड़ की नहीं, पूरे देश की तस्वीर है। लेकिन मैं अपनी रचनाओं को पहाड़ से बाहर नहीं निकाल सका, चूंकि मुझे बाहर के क्षेत्रों और उनके इतिहास की, उनके भूगोल की, संक्षेप में उनके परिवेश की पूरी जानकारी नहीं रहती। आधी-अधूरी जानकारियों को मैं अपनी रचनाओं का आधार नहीं बनाना चाहता। मैंने जिस पहाड़ पर कहानियां लिखी हैं उसकी घाटी से चोटी तक की सदियां मेरे भीतर बसी हुई हैं।”

फट जा पंचधारउनकी बहुचर्चित कहानी रही है। अब शायद ही उसकी कोई याद भी करता हो। हिंदी समाज अपने रचनाकारों को बहुत जल्दी भुला बैठता है। यह आत्म-श्लाघा और आत्म-प्रचार का शर्मनाक दौर है। खैर, ‘फट जा पंचधारकी शूद्र नायिका रक्खी नौटियाल जी की बहुत सारी नारी पात्रों की प्रतिनिधि प्रवक्ता लगती है। उनकी अधिकतर कहानियों में स्त्रियां चुपचाप अत्याचार सहन करती हैं। घासकहानी की नायिका जंगल में पतरौल के सामने घास की तरह बिछने को मजबूर है क्योंकि उसे अपनी बीमार भैंस को बचाने के लिए जंगल से घास काटकर ले जाना बहुत ही जरूरी है। मूक बलिदान’, ‘अपनी पारी मौन’, ‘सोना’, ‘समय की चोरी’, माटीवालीऔर उस चिड़िया के बोलकहानियों में भी जो नारी पात्र अत्याचारों को चुपचाप सहती आती हैं, उनकी ओर से भी रक्खी ही चीखती है।

पहाड़ के कुछ हिस्सों में बहुपति प्रथा रही है। सबसे बड़ा भाई जिसे ब्याह कर लाता है, बाकी भाइयों की भी वह पत्नी हो जाती है। फट जा पंचधारकी एक लड़की जब ब्याह करके ससुराल आई, तब उसका सबसे छोटा पति (वैसे, देवर) वीर सिंह उसकी गोद में खेलने लायक है। जब तक वह जवान होता है, वह बूढ़ी हो जाती है। ठाकुर वीर सिंह शूद्र परिवार की जवान रक्खी को अपने घर ले आता है। वीर सिंह के परिवार और बिरादरी में तूफान उठना स्वाभाविक है। वीर सिंह कुछ समय तक सबका विरोध झेलते हुए भी रक्खी को साथ रखे रहता है लेकिन कुछ समय पंचायत के दबाव में और सम्पत्ति वंचित होने के भय से उसे त्याग देता है। तब वह विद्रोह कर देती है और अपनी सारे दुख-अपमान बताते हुए चीखती है। कहानी के अंत में रक्खी की यह फुफकार पाठक के मन में लम्बे समय तक गूंजती रहती है- “मैं चाहती हूं कि पंचधार फट जाए। भूकम्प का एक झटका आए, तगड़ा भूचाल और इस पहाड़ का जोड़-जोड़ हिल उठे। पंचायत के तप्पड़ से यमुना माई के फाट तक के ढंगारों, ढलानों में बेशुमार गहरी, चौड़ी-चौड़ी दरारें पड़ जाएं और पंचधार खण्ड-खण्ड हो जाए। भूख, नंगेपन और तिरस्कार के नुकीले कांटों की सेज पर टिके मेरे अपंग शरीर में अब ज़्यादा दम नहीं, पर इस गुफा में बैठकर में उसी भूचाल का इंतज़ार कर रही हूं। मैं उसी दिन को देखने के लिए ज़िंदा हूं।” यहां लेखक स्त्री जाति के साथ ही नहीं, दलितों के पक्ष में भी पुरजोर खड़ा है। यह स्त्री और दलित दोनों के पक्ष में लेखक की प्रतिबद्धता बताता है और उनकी कई रचनाओं में दिखाई देता है। (इस कहानी को पढ़ते हुए 1975 में प्रकाशित गोपाल उपाध्याय का उपन्यास एक टुकड़ा इतिहासबरबस याद आता है। उसमें भी अछूत युवती और ब्राह्मण युवक की ऐसी ही कहानी है। उसमें दलित चंदी देवी का विद्रोह और लम्बा संघर्ष दर्ज़ हुआ है। वह उपन्यास तब लिखा गया था जब हिंदी में दलित विमर्श या दलित साहित्य का नाम भी नहीं सुना गया था। यह उपन्यास भी लगभग अलक्षित रह गया)।

परी देश की कहानियांकी बिंदो भी बहुत सशक्त चरित्र है। वह प्यार और शादी का झांसा देकर उसका देह-भोग करने वाले पर्यटक को, जो इस कथाकार का नैरेटर है और हिंदी कहानियों में धंधा करके आजीविका कमाने वाली पहाड़ी लड़कियों का वर्णन पढ़कर नैनीताल आया है, हाथ में हंसिया लेकर ललकारती है- “पैसे तूने मेरी गाय के दूध के दिए हैं। मेरे उस दूध के पैसे, जिसे कुछ महीनों बाद वह पिएगा जो इस वक्त मेरे पेट में है, उसकी कीमत कौन चुकाएगा? पानी तक नहीं मांग पाओगे, यहीं टुकड़े-टुकड़े करके रख दूंगी। देखूं तू कैसे जाता है।” यह कहानी उन हिंदी कहानीकारों पर भी टिप्पणी है जो पहाड़ की लड़कियों की ऐसी-वैसी छवि पेश करते थे। इस लेख के प्रारम्भ में बताया गया किस्सा याद कीजिए।

बिकती बांदों के सपनेशीर्षक संस्मरण में नौटियाल जी गढ़वाल की उन महिलाओं के दर्द का विस्तार से उल्लेख है जो खरीदी-बेची जाती थीं- “सामंती समाज में औरत और पशु के साथ एक जैसा व्यवहार था। दोनों का दर्जा समान होता था। औरत को पशु की तरह बेचा या खरीदा जा सकता था। ... बेटी अविवाहित हो चाहे विवाहित, उसकी कीमत मायकेवाले ही तय करेंगे। तय करेंगे और रकम प्राप्त भी करेंगे। वह धनराशि बेटी नहीं ले सकती...।” यह दर्द बड़ी संवेदनशीलता से उनकी रचनाओं में आता रहा।

...       

नौटियाल जी ने देश और विदेश भी कम नहीं घूमे। अपनी युवावस्था के आठ साल उन्होंने बनारस में बिताए। उत्तर प्रदेश विधान के निर्वाचित सदस्य के रूप में वे लखनऊ भी काफी रहे, यात्री एवं समाज-अध्येता वे हमेशा ही रहे और ऐसा नहीं है कि पहाड़ से इतर क्षेत्रों के जन-जीवन पर उन्होंने कहानियां नहीं लिखी हों; लेकिन जिसे उनके अर्थों में जाननाकहा जाएगा, वैसा उन्होंने पहाड़ को ही जाना। “उसकी घाटी से लेकर चोटी तक की सदियां मेरे भीतर बसी हुई हैं”, यह केवल दावा नहीं हैं, अतिरेकी या आलंकारिक वक्तव्य भी नहीं है। पहाड़ की, विशेष रूप से गढ़वाल की ऊंची-ऊंची चोटियों, घाटियों, नदियों, गांवों-बस्तियों, वीरानों-बुग्यालों को जिसने दसियों बार अपने लम्बे-लम्बे डगों से नापा हो, जिसने किशोरावस्था से ही सामंतशाही का विरोध करते हुए वहां की जेलें देखीं हों, जिसने बुग्यालों के घुमंतू गूजरों, बंधुआ वन श्रमिकों से लेकर टिहरी बांध के विस्थापितों तक के लिए जमीनी संघर्ष किया हो और जिसने आज़ाद भारत में भी (कम्युनिस्ट होने के कारण) लम्बी जेल काटी हो, ऐसा साहित्यकार हिंदी में कहां मिलेगा! (राहुल सांकृत्यायन, देवेंद्र सत्यार्थी एवं अज्ञेय के जीवन-संदर्भ दूसरे हैं।)

...

विद्यासागर नौटियाल का जन्म 29 सितम्बर 1933 को गुलाम देश के भीतर अंग्रेजों की सरपरस्ती में पनपती टिहरी रियासत की सामंती जकड़न में हुआ था। उनके जन्म से तीन वर्ष पूर्व रंवाई के यमुना तट पर तिलाड़ी में निहत्थे किसानों पर रियासती पुलिस ने गोलियां चलाकर एक और जलियांवाला बाग नरसंहार कर डाला था। टिहरी राजशाही के विरुद्ध प्रजामंडल के आंदोलनकारी सक्रिय थे, जिनका क्रूर दमन किया जाता था। स्कूली दिनों में ही किशोर विद्या सागर प्रजामंडलियों के सम्पर्क में आ गए और बाकायदा उसके प्रदर्शनों में शामिल होने लगे थे। शिकायत मिलने पर उन्हें कॉलेज और हॉस्टल से निकाल दिया गया था। 15 अगस्त 1947 को देश के आज़ाद होने पर भी टिहरी रियासत में राजशाही जारी रही। तब टिहरी की आज़ादी के लिए आंदोलन और तेज हुआ। 18 अगस्त 1947 को प्रजामण्डल के कई आंदोलनकारियों के साथ विद्यासागर नौटियाल भी गिरफ्तार कर लिए गए। तब उनकी उम्र 13 वर्ष की थी। लम्बे आंदोलन और त्याग के बाद प्रजामण्डलियों ने टिहरी को राजशाही से 1948 में आज़ाद कराया, कुछ समय वहां प्रजामण्डल का राज रहा और फिर 1949 में टिहरी भी भारत का अभिन्न अंग बनकर उत्तर प्रदेश राज्य का हिस्सा हुआ।

प्रजामण्डल में ही विद्यासागर नौटियाल कम्युनिस्टों के सम्पर्क में आए और फिर आजीवन कम्युनिस्ट बने रहे। कॉलेज की पढ़ाई पूरी करके वे 1952 में काशी विश्वविद्यालय पहुंचे और करीब आठ साल वहां रहे। वहीं उनका सम्पर्क त्रिलोचन शास्त्री, विष्णु चंद्र शर्मा, केदारनाथ सिंह, रामदरश मिश्र, विश्वनाथ त्रिपाठी, ठाकुर प्रसाद सिंह, नामवर सिंह, शिव प्रसाद सिंह, आदि से हुआ। कॉलेज के दिनों से ही साहित्य की ओर प्रवृत्त नौटियाल जी ने वहीं भैंस का कट्यासमेत कुछ और कहानियां लिखीं। कुछ भी लिखने की सोचते ही उनके भीतर रचा-बसा पहाड़ बोलने लगता था। उस पहाड़ में भी टिहरी राजशाही और उसके क्रूर दमन की यादें हावी हो जातीं। किसी साहित्यिक पत्रिका में छपने वाली उनकी पहली कहानी (1954) भैंस का कट्याप्रकटत: पहाड़ के जनजीवन में मनुष्यों और पशुओं के बीच के मानवीय रिश्तों की कहानी है लेकिन वास्तव में वह टिहरी के सामंती शासन को जनता की चुनौती के रूप में लिखी गई है। इस कहानी ने उन्हें चर्चित कथाकार बना दिया था।

काशी विश्वविद्यालय के छात्रावास में रहते हुए एक बार तीन-चार छात्रों के साथ उन्हें भी कुलपति आवास में रात को चौकसी के लिए बुलाया गया था, क्योंकि वहां चोर-डकैत सक्रिय हो गए थे। उस बारे में वे लिखते हैं- “एक रात ऐसा हुआ कि कमरे में सब के सो जाने के बाद मैं नहीं सो पाया। उस रात मेरे दिमाग में वे डाकू घूमने लगे, जिनमें से एक को महेंद्रवीं के छात्रों ने भेलूपुर पुलिस के हवाले कर दिया था। मैंने अचानक अपनी कॉपी खोल ली। उसके खुलते ही मैं बनारस के भेलूपुर थाने के बजाय अपने टिहरी शहर के थाने में जा पहुंचा। मैं अपने शहर में वहां बह रही भिलंगना नदी के तट पर और अपने कॉलेज के आहाते में घूमने लगा। कॉलेज एक टीले पर था और उसके नीचे पहाड़ी के तल पर मेहतरों की बस्ती थी। मैंने देखा कि मेरे कॉलेज के लड़के ऊपर से नीचे की बस्ती पर बेवजह पत्थर फेंक कर खुद पीछे की ओर भाग आते हैं। उन बरसते पत्थरों के कारण बस्ती के निवासियों के दिलों में हरदम एक आतंक छाया रहता है। बाकी लड़कों का उस ओर ध्यान ही नहीं जाता था लेकिन मैं अपने मन में ऐसा आतंक महसूस करने लगा जैसे वे पत्थर खुद मेरे घर पर बरसाए जाने लगे हों। अब एक अरसे बाद रात के मौके पर मैं उन शरारती छात्रों की हृदयहीन कार्रवाई की इंदराजी करने लगा था।” (मेरी कथा यात्रा)

यह प्रसंग बताता है कि नौटियाल जी पहाड़ से बाहर रहने पर भी अपने पहाड़में ही रहते थे और यह भी कि बचपन से ही उनकी पक्षधरता स्पष्ट थी। वे दीन-हीन-सताए गए लोगों के साथ खड़े थे। कम्युनिस्ट वे कुछ नेताओं के प्रभाव में ही नहीं बने थे, सामाजिक स्थितियों के कारण वह विचारधारा और पक्षधरता उन्होंने आत्मसात कर ली थी।

पहाड़ से बाहर जा पड़े पर्वत-पुत्रों को आम तौर पर पहाड़ की याद नराईया खुद’ (नॉस्टेल्जिया) के रूप में आती है - शीतल हवा-पानी, जंगल-पक्षी-पर्यावरण और अपने परिवार एवं संगी साथियों की पीड़ादायक स्मृति। पहाड़ के बहुत सारे रचनाकारों के लेखन में यह नराईया खुदकम-ज़्यादा आती रहती है। शैलेश मटियानी और शेखर जोशी जैसे पहाड़ी जनजीवन के कटु यथार्थ के चितेरे लेखक भी किन्ही भावुक क्षणों में उसका तनिक उल्लेख अपनी रचनाओं में कर पड़ते हैं। लेकिन नौटियाल जी को अपने लेखन में कतई खुदनहीं लगती थी, यद्यपि वे बार-बार कहते हैं कि अपने लेखन को मैं पहाड़ से बाहर नहीं ले जा पाता।

तो, उन्हें कैसे पहाड़ की खुदलगती थी? उन्हीं के शब्दों में- “मैंने पहाड़ को हमेशा आदमी से जोड़कर देखा है। जिस रचना में आदमी मौजूद नहीं, उस पहाड़ से मेरा कोई सबंध नहीं। विकट पहाड़ पर जीने की कोशिश में घोर संघर्षों में जुटे हुए लोग। उन संघर्षों में सोच-विचार कर उस तरह शामिल होने की किसी को फुर्सत नहीं होती, जैसी योजना बनाकर कोई राजनेता या उच्च अधिकारी फोटोग्राफरों के सामने दिखावटी वृक्षारोपण करने के लिए पहले से खोदे गए गड्ढों के अंदर अपने कर-कमल ले जाने का ढोंग करते फिरते हैं। अब लगता है कि मैं तो कुछ लिख ही नहीं पाया। पूरा पहाड़ मुझसे मेरे लेखन का हिसाब मांगता नज़र आने लगता है। क्या मुझे उन सब पर लिखने के लिए और पिचहत्तर साल मिल सकते हैं?” (मेरी कथा यात्रा)

1960 में वे अपने पहाड़लौट आए, लिखने के लिए नहीं, बल्कि पूरावक्ती (फुलटाइमर) कम्युनिस्ट कार्यकर्ता बनकर। काशी में जो पहाड़ याद आता था, अब उसे जीना था। लिखना पीछे छूटता गया और वे गांव-गांव की खाक छानने लगे। सड़कें बहुत कम थीं। (बचपन से उन्हें बहुत पैदल चलने की आदत थी। अपने संस्मरण दलित जीवन-एक विचारणीय समस्याकी शुरुआत उन्होंने इस तरह की है- “सन 1942 में नौ वर्ष की उम्र में सौ मील दूर कसेड़ी-बंगाण के घनघोर जंगलों से पांच दिन तक पैदल चलकर, रिंगाली और राढ़ी के डांडों की मशहूर चढ़ाइयां पार करता हुआ मैं टिहरी पहुंचा था”)।  वैसे भी, गांवों तक जाने और लोगों से मिलने-बात करने के लिए पैदल ही चलना होता था। एक पहाड़ की तलहटी से शिखर तक, फिर उधर से नीचे उतर कर दूसरे पहाड़ के शिखर तक। इन्हीं पहाड़ी शिखरों-घाटियों में गांव बसे होते हैं। बीच-बीच में छोटे-छोटे पहाड़ी कस्बे। जंगलों में वन श्रमिक हैं, उनकी समस्या सुननी है, उन्हें संगठित होने के लाभ और तरीके समझाने हैं। गांवों में पटवारी-पेशकार के सताए सीधे-सादे-गरीब ग्रामीण हैं। कुछ समय ऋषिकेश में अड्डा जमाकर मोटर मजदूर संघ के कार्यकर्ता बन गए तो ड्राइवर-कंडक्टरों के साथ कच्ची-संकरी सड़कों की धूल फांकी। घोड़े-खच्चर वाले मजदूरों के काम से दौड़ना। सड़क मजदूरों की गैंग का दर्द सुनना, जिनका शोषण करने में ठेकेदार कोई कसर न छोड़ता। पटवारी-पुलिस से भिड़ना। अपने मालीदेवल गांव तो कभी-कभी जा पाना होता था। पत्नी से बात तक न हो पाती थी। रात पहुंचे तो सुबह निकल लिए क्योंकि पीपलकोटी में वन-श्रमिकों के साथ कुछ समस्या हो जाने का संदेश मिल गया है। मजदूर क्या थे, बंधुआ जैसे थे। उनका साथ देना है।

फिर 1962 में गिरफ्तार कर लिए गए क्योंकि चीनी हमला हो गया था और कम्युनिस्ट दुश्मन मान लिए गए थे। 1964 तक जेल में रहे। रिहाई के बाद फिर वही सिलसिला। फिर पार्टी ने चुनाव लड़वाया। कभी हारे भी लेकिन 1980 में देवप्रयाग से कम्युनिस्ट पार्टी के विधायक निर्वाचित हुए। अब अपने क्षेत्र से लखनऊ तक की दौड़ होने लगी। इस सब में लिखना पीछे छूटता गया। बनारस में जो कहानियां अधूरी रह गई थीं, वे दिमाग से ही नहीं, कागजों में भी गायब हो गईं। विद्यासागर नौटियाल नाम का कहानीकार गुम हो गया।

कोई पच्चीस बरस बाद भैंस का कट्याका कहानीकार कुनमुनाया। कागज-पत्तर छाने गए, पत्रिकाएं तलाश की गईं, जिनमें कहानियां छपीं थीं। कुछ मिलीं, कुछ कागज मिले, कुछ स्मृति से दोबारा लिखी गईं और एक कथा संग्रह तैयार हुआ- टिहरी की कहानियां’ (1984)। फिर लिखने और छपने ने गति पकड़ी। भीम अकेला’ (1989), सूरज सबका है (1997), ‘उत्तर बायां है (2003), ‘यमुना के बागी बेटे(2006), ‘झुण्ड से बिछड़ा’ (2008), ‘स्वर्ग दिदा पाणि-पाणि’ (2010) ‘मेरा जामक वापस दो’ (2012)’ जैसे उपन्यास, ‘मेरी कथा यात्रा’ (2008) जैसे कुछ कहानी संग्रह और बागी टिहरी गाए जा’ (2007) जैसे संस्मरणों की किताबें आईं। (यह पूरी सूची नहीं है, बल्कि ये मेरे पढ़े हुए हैं।)

इन शीषकों से और उनकी अधिकसंख्य कहानियों के नामों (भैंस का कट्या, फट जा ओ  पंचधार, खच्चर फगणू नहीं होते, सुच्ची डोर, यह बामणपन टूटे, महाराज काफूशाह का आत्मघात, ताऊजी की याद, कुंवारीधार बोलेगी, कुदरत की गोद में, धाध, अभाजा, आदि) से सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि इनका परिवेश कहां का है। पहाड़ ही उनकी रचनाओं के केंद्र में है। उसका सौंदर्य नहीं, उसके लोग, विशेष रूप से नारियां। जिन कहानियों की कथा या परिवेश पहाड़ का नहीं है, उनमें भी नौटियाल जी का पहाड़ किसी न किसी बहाने कूद आता है और वह बिना प्रसंग नहीं होता। टिहरी राजशाही के खिलाफ जंग, उसके दमन और टिहरी बांध से विस्थापन व संघर्ष के प्रसंग तो कई रचनाओं में बार-बार आ जाते है। इसका स्पष्टीकरण देते हुए वे बताते हैं- “अनेक लोगों की समझ में नहीं आता कि अपनी अधिकांश रचनाओं में मैं इतिहास की इस घिसी-पिटी घटना का बार-बार उल्लेख क्यों करने लगता हूं। सवाल यह है कि उस दौरान जनता द्वारा सहन की गई ज़्यादतियों की अनदेखी कैसी की जा सकती है। उनको आज नहीं लिखा जाएगा तो कब लिखा जाएगा? कौन लिखेगा? पहाड़ के ही नहीं, खुद टिहरी रियासत के अंदर जन्मे मेरे समकालीन रचनाकारों को इन तथ्यों की कोई जानकारी ही नहीं है।” (मेरी कथा यात्रा)। यह बड़बोलापन नहीं है, बरसों बरस वे उस सब के बीच रहे-जूझे हैं।  

हिमाच्छादित पर्वत शिखरों की स्वर्णिम आभा उनकी रचनाओं में एक छलावे या विपदा के रूप में प्रस्तुत होती है। उत्तर बायां हैउपन्यास के अंतिम पृष्ठों में चांदी गांव का एक प्रसंग आता है। जब कभी साफ-धुले आसमान की रात में जोन’ (चांदनी) खिलती है तो गांव वालों को सामने का चांदीकांठा पहाड़ सोने की तरह दमकता दिखता है। वे सोचते हैं कि वहां जाकर सोना बटोर लाएं। पूरा का पूरा पहाड़ सोने का है। वहां तक जाना है और जो हाथ आए बटोर लाना है। सोना ही सोना। फिर न गरीबी रहेगी न कोई कष्ट। वे नहा-धोकर, पूजा-पाठ करके चांदीकांठा की ओर जाने की तैयारी करते हैं। उन्होंने सोना लाद लाने के लिए घिल्डे’ (खाद, घास वगैरह पीठ पर ढोने के लिए शंक्वाकार बड़ी टोकरी) तैयार कर रखे हैं। सारा गांव तैयार हो रहा है लेकिन तभी “घने, काले बादलों के खोल से बाहर निकल आने वाला वह जोनलुप्त हो जाता है और चांदीकांठा फिर अंधकार में डूब जाता है। जोन के इस तरह के ठग्गू व्यवहार के लोग अब आदी हो गए हैं। उन्हें जोन से अब कोई उम्मीद नहीं रह गई है ... आकाश में घूमने वाले कुछ दुष्ट ग्रह जोन को चांदी के आकाश में पूरी तरह से, ठीक से चमकने नहीं देते।”

पहाड़ के स्वर्णिम शिखर पहाड़ के लोगों के लिए ठग्गू हैं। पहाड़ का सौंदर्य छलावा है। सोना यानी कष्ट एवं गरीबी दूर करने के संसाधन सिर्फ सपना हैं। इस सपने को दुष्ट ग्रहों ने हर लिया है। इन दुष्टों से लड़ना होगा, ऐसा वे शब्दों में लिखते नहीं लेकिन पाठकों को संदेश मिल जाता है।

उत्तर बायां हैउपन्यास ऊंचे पहाड़ी बुग्यालों (वृक्ष विहीन घास के पठार) में विचरण करते घुमंतू जाति के गूजरों, पालसियों, खडवालों के जीवन, रीति-रिवाजों, कष्टों, शोषण, सपनों और संघर्षों का प्रामाणिक औपन्यासिक आख्यान है। यह सब नौटियाल जी का अपना बहुत देखा-जाना हाल है। इस निर्मम सच्चाई तक पहाड़ के बहुत सारे निवासियों और रचनाकारों की पहुंच ही नहीं रही है।

यमुना के बागी बेटे’, नाम से ही स्पष्ट है, तिलाड़ी के यमुना तट (रंवाईं क्षेत्र) पर 1930 के नरसंहार के बाबत है। इस घाटी के सीधे-सरल ग्रामीण मामूली खेती और पशुपालन से अपना गुजारा करते थे। जल, जंगल, जमीन यानी समस्त संसाधनों पर टिहरी रियासत का कब्जा था। दरबार की इजाजत के बिना गांव वाले जंगल में प्रवेश नहीं कर सकते थे, पशु नहीं चरा सकते थे। वे दरबार में गुहार लगाने गए तो उनसे कहा गया कि अपने जानवरों को पहाड़ से नीचे खाई में धकेल दो। अत्याचार और दमन की पराकाष्ठा के बाद रंवाल्टे (रंवाई के रहवासी) शांतिपूर्ण आंदोलन पर उतारू हुए तो टिहरी दरबार की फौज ने उन्हें तिलाड़ी के मैदान में घेरकर उस समय गोलियों से भून डाला, जब वे सभा के लिए वहां जुटे थे। उपन्यास की छोटी सी भूमिका में नौटियाल जी ने लिखा है- “मेरा जन्म एक जंगलाती परिवार में हुआ था। यमुना घाटी का अन्न, जल व वायु मेरे बचपन की हिफाजत करते रहे। अपने जन्म से तीन साल पहले घटित तिलाड़ी कांड की दारुण कथाएं मेरे दिल को एक भारी पत्थर के मानिंद दबाती लगती थीं। उस अनोखे प्रतिरोध की यह गाथा शायद उन चंद देशवासियों के किसी काम आ सके, जो विपरीत व विकट परिस्थितियों के बावजूद जल, जंगल और जमीन पर वनवासियों और रहवासियों के अधिकारों की लड़ाई आज भी जारी रखे हैं।”

नौटियाल जी ने टिहरी, उत्तरकाशी, पौड़ी क्षेत्र का चप्पा-चप्पा कई बार पैदल छाना है। ऐसी ही दो दिन तक चली एक लम्बी यात्रा को आधार बनाकर उन्होंने भीम अकेलाउपन्यास लिखा। उपन्यास के आवरण में यह यात्रा वृतांत जैसा ही है। लेखक के साथ उसका पूरा परिवेश, स्मृतियां, पहाड़ों की कई मुश्किलें भी साथ चलती हैं। लिखते हुए नाना स्मृतियों और किस्सों की उनकी पोटली खुलती जाती है। छोटे कलेवर के इस उपन्यास का विस्तार बड़ा है। शेखर जोशी जी ने इसे जातीय स्मृतियों का अद्भुत दस्तावेजकहा था।  

पहाड़ी गांवों में बाघ (वास्तव में तेंदुआ या गुलदार) का आना और पालतू पशुओं का शिकार करना नई बात नहीं है। झुंड से बिछड़ाउपन्यास में अकेली निस्सहाय बुढ़िया शांति की गाय को बाघ मार डालता है, लेकिन इसमें एक इसी बाघ का आतंक न होकर कई-कई बाघों के आतंक की कहानी है। राज दरबार बाघ है। बांध बनाने वाली कम्पनी बाघ है। पटवारी-पेशकार बाघ हैं। बाघ अपने चिह्नित शिकार को झुण्ड से अलग करके दौड़ाता और मार देता है। इस व्यवस्था में भी हम कई तरह अकेला करके, एकता को छिन्न-भिन्न करके, दौड़ा-दौड़ा करके मारे जाते हैं। एकजुट लोगों को अलग-अलग कर दो, अकेला कर दो, चुप करा दो और इस तरह उनको मार दो। छोटी सी कहानी के कई आयाम हैं और पहाड़ के जनजीवन की अनेक परतें तो खुलती ही हैं।

मात्र 140 पृष्ठों के उपन्यास सूरज सबका हैमें तो जैसे पूरे पहाड़ की आत्मा है - उसकी इतिहास-कथाएं हैं, दंत कथाएं हैं, जीवन-पद्धति है, उसके दंश हैं, जातीय स्मृतियां हैं, संस्कृति है, कुछ अचर्चित नायक हैं और नौटियाल जी की अनोखी लेखन शैली है। वैसे, उनकी रचनाओं में कोई विशेष शिल्प नहीं होता, लेकिन यहां शिल्प विशिष्ट है और हावी है। छोटे-छोटे वाक्य लिखना उनकी शैली रही है लेकिन यहां दो-दो, तीन-तीन शब्दों के वाक्य भी हैं। वाक्य क्या हैं, जैसे एक मकान की चिनाई है। सचमुच, एक पहाड़ी मकान चिना जा रहा है यहां और नन्हीं छुन्ना की आंखों से देखा जा रहा है या उसे बताया जा रहा है- “दोनों किवाड़ नीचे की तरफ देहली से जुड़े हैं। एक बाईं ओर जुड़ा है, एक दाहिनी ओर। किवाड़ों के ऊपर पटाव हैं। एक मोटा तख्ता। नीचे देहली, ऊपर पटाव। जब आदमी देहली पर खड़ा होता है तो, उस समय पटाव उसके सर के ठीक ऊपर होता है। सीढ़ी पर खड़ी हैरान छुन्ना ऊपर की ओर देखती है। उसे देहली के ऊपर किवाड़, किवाड़ों के ऊपर पटाव दिखाई देता है। उसे सिर्फ पटाव दिखाई देता है। वह नहीं देख पाती कि पटाव के ऊपर भी एक दीवार चिनी गई है। उस दीवार के ऊपर लकड़ी की कड़ियां हैं, कड़ियों के ऊपर पटेले - पेड़ों की शाखों के छोटे-छोटे टुकड़े। खूब घने बिछे हुए।” कथा फिर इतिहास में जाती है। लेखक पहाड़ के दो नामचीन इतिहासकारों से उद्धरण भी देने लगता है। फिर डूबती टिहरी की गूंज उठती है और सामंती दौर के जिक्र तो आते ही हैं। समीक्षक उन पर आरोप लगा सकते हैं कि वे उपन्यास के नाम पर सब कुछ गड्ड-मड्ड कर देते हैं लेकिन पहाड़ के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को चुनौती नहीं दी जा सकती।

पहाड़ के इनसान ही नहीं, उसके भूगोल एवं प्रकृति की नौटियाल जी की समझ देखनी हो तो स्वर्ग दद्दा, पाणि-पाणिउपन्यास पढ़ना चाहिए। यह पहाड़ की कठोर चट्टानों के भीतर छुपे मीठे पानी की खोज के बहाने पुरखों के जीवट, समाजिक हितों के प्रति उनके समर्पण, बदलते समाज की टुच्ची और विभेदकारी प्रवृत्तियों, विकास के नाम पर सरकारी तंत्र के भ्रष्टाचार और प्रकृति के अंधाधुंध दोहन की कथा है। जिस पुरखे ने जीवन दांव पर लगाकर कठोर चट्टानों के बीच मीठे पानी का धारा बनाया था, बाद में उसी के वारिसों को अछूत बताकर उस पानी से वंचित कर दिया जाता है। तब सरकार हरिजनों के कल्याणकी जो योजना बनाती है, उससे उनके घरों तक पानी पहुंचाने के बहाने सरकारी धन की लूट ही नहीं होती, बल्कि पानी के मूल स्रोत को समृद्ध बनाने वाले देवदार के घने जंगल का भी सफाया कर दिया जाता है। नतीजतन धीरे-धीरे पानी ही सूख जाता है। आजकल पहाड़ के गांवों में चल रही बहुप्रचारित नल से जलयोजना की असलियत नौटियाल जी ने बहुत पहले बता दी थी।         

बचपन और किशोरावस्था में विद्या सागर नौटियाल ने टिहरी राजशाही के जुल्म देखे और उनके खिलाफ प्रजामंडल आंदोलन में शामिल रहे। 1990 के दशक में वे टिहरी बांध से विस्थापित होने वाले हजारों लोगों में शामिल थे। उसके खिलाफ वर्षों वे आंदोलन में शामिल रहे। अंतत: विवश होकर अपना गांव-घर डूबने के लिए छोड़कर उन्हें भी देहरादून विस्थापित होना पड़ा। पहाड़ के आम जन की अनेक विपदाओं के साक्षी रहने के अलावा वे इन त्रासदियों के भी भुक्तभोगी रहे। विस्थापन और टिहरी के साथ एक सभ्यता के डूबने पर लिखे गए उनके संस्मरण मार्मिक तो हैं ही, योजनाकारों की विकास-दृष्टि पर सवाल भी खड़ा करते हैं। उन्होंने पहाड़ पर खूब लिखा और जो भी लिखा, प्रामाणिक लिखा। उसमें पहाड़ का रोमानी या पर्यटकी चित्र आ ही नहीं सकते थे।  

एक और प्रसंग बताए बिना यह आलेख पूरा नहीं होगा। 1980 के दशक में नौटियाल जी पूरी तरह टिहरी बांध के खिलाफ आंदोलन में जुटे हुए थे। वे पूर्ण समर्पित कम्युनिस्ट थे और पार्टी के पुराने सदस्य थे। कम्युनिस्ट पार्टी टिहरी बांध के समर्थन में इसलिए थी क्योंकि उसके निर्माण के लिए सोवियत संघ भारत सरकार के साथ हुए एक समझौते के तहत धन दे रहा था। कम्युनिस्ट पार्टी ने आपत्ति की कि वे क्यों पार्टी की राय के विपरीत बांध बनने का विरोध कर रहे हैं। उनका कहना था कि मैं बांध से विस्थापित पहाड़ के आम जन के हित में लड़ना जरूरी समझता हूं। उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया। नौटियाल जी की प्रतिक्रिया थी कि एक सच्चा कम्युनिस्ट आजीवन कम्युनिस्ट रहता है। उसे कम्युनिस्ट होने से कैसे निकाला जा सकता है? यह उनकी पहाड़ के प्रति अटूट प्रतिबद्धता थी। पहाड़ के लिए उन्होंने पार्टी लाइन का खुला विरोध कर दिया था। यही उनका सच्चा कम्युनिस्ट होना था। बाद में पार्टी ने ही अपना रुख बदला और नौटियाल जी को फिर पार्टी में शामिल कर लिया।      

आज नौटियाल जी हमारे बीच नहीं हैं (निधन 16 फरवरी 2012) किंतु उनका पहाड़ और भी लुटा-पिटा हुआ है। अलग राज्य बन जाने के बाद भी वहां सरकारें, विकास, पर्यटन, आदि-आदि सिर्फ छलावा और ठग्गू हैं। पर्वत शिखरों के चमकदार सोने पर दुष्ट ग्रहों का आतंक और भी पसर गया है।

- नवीन जोशी

('बनास जन 88' के विद्यासागर नौटियाल विशेषांक में प्रकाशित, 2026)  

   

                      

                                     

 

 

 

Thursday, August 27, 2026

डिग्रीधारी बेरोजगारों की फौज़ है अपने देश में

 भारत के स्नातकों में बेरोजगारी सामान्य से चार गुना अधिक है। स्नातक डिग्री प्राप्त प्रत्येक 12 युवाओं में सिर्फ एक को अपनी डिग्री के मुताबिक नौकरी मिली है। 13 फीसदी पुरुष स्नातक और 20.4 महिला स्नातक बेरोजगार हैं, जबकि देश में औसत बेरोजगारी दर 3.2 है। 

ये चिंताजनक आंकड़े चंद रोज पहले जारी नीती आयोग की एक रिपोर्ट में दिए गए हैं। आयोग का मानना है कि अपने देश में पढ़ाई और नौकरी में 36 का आंकड़ा है। आशय यह कि जैसा काम करने वालों की मांग या जरूरत है, वैसी पढ़ाई नहीं होती। 

लेकिन जिस प्रकार आयोग कक्षा छह से ही रोजगार परक शिक्षा देने की वकालत कर रहा है, उसके खतरे और बड़े हैं। उसके बारे में थोड़ी देर में बात करते हैं। फिलहाल आंकड़ों की बात। 

नीति आयोग बताता है कि जो लोग रोजगार में हैं भी, उनमें 90 प्रतिशत ऐसे काम में लगे हैं जिसका उनकी डिग्री से कोई सम्बंध नहीं है। अधिकतर संस्थानों में पाठ्यक्रम बासी हो चुका है, नव विकसित उद्योगों की जरूरतों से उसका कोई तालमेल नहीं है। बीए, बीएससी, बीकॉम की डिग्रियां या विभिन्न डिप्लोमा या कोर्स नौकरी नहीं दिला पाते।

नीति आयोग ने 2024-25 के आर्थिक सर्वेक्षण का हवाला देते हुए अपनी रिपोर्ट में बताया है कि मात्र 8.25 प्रतिशत स्नातकों को अपनी शैक्षिक योग्यता के अनुरूप रोजगार मिला है। 

पिछले दिनों वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने Indian Express अखबार से बातचीत में कहा था कि भारतीय शिक्षा प्रणाली डिग्री-डिप्लोमा धारी युवाओं को पैदा करती है, नौकरियों के लिए सक्षम या योग्य उम्मीदवार नहीं। 

नीति आयोग की रिपोर्ट बताती है कि देश में इस समय स्नातक कक्षाओं में पढ़ रहे 3.4 करोड़ युवाओं में  1.13 करोड़ सिर्फ बी ए कक्षाओं में भर्ती हैं। बीए, बीएससी और बीकॉम कक्षाओं में मिलाकर दो करोड़ से अधिक बच्चे पढ़ रहे हैं। ये डिग्रियां नौकरी नहीं दिला पातीं। 

इन डिग्री कक्षाओं में बच्चे सरकारी नौकरी की प्रत्याशा में भर्ती होते हैं। नवम्बर 2024 स जुलाई 2025 के बीच 55,000 सरकारी पदों के लिए एक करोड़ 86 लाख अर्जियां आई थीं। 

ब आते हैं नीति आयोग की सिफारिश पर्। उसका कहना है कि कक्षा छह कक्षा 12 तक सामान्य रोजगारपरकता और उद्यमशीलता बकायदा एक विषय के रूप में सिखाई जानी चाहिए। इसमें संवाद कौशल, व्यवसाय लायक अंग्रेजी, प्रारम्भिक डिजिटल ज्ञान, वित्तीय समझ, टीम भावना, समस्या हल करने की क्षमता और उद्यमशीलता शामिल हो। 

नीतेऐ आयोग यह भी सिफारिश करता है कि प्रत्येक जिले या प्रखण्ड में एक समर्पित रोजगार स्कूल खोला जाना चाहिए, जो कक्षा नौ के बाद सिर्फ रोजगार शिक्षा दे। 

इन सुझावों को अमल में लाया जाएगा तो एक बड़ा खतरा यह होगा कि हमारी आने वाली पीढ़ियां अर्धशिक्षित होंगी।  कक्षा छह से ही जो रोजगार शिक्षा पढ़ेंगे, वे अच्छी उच्च शिक्षा से वंचित हो सकते हैं और कई प्रतिभाएं विकसित होने से रह जाएंगी।

वास्तव में जिस चीज की स्खत जरूरत है, वह यह कि शिक्षा की दुकानदारी खत्म हो और युवी पीढ़ियां वास्तविक शिक्षा पाएं, जिससे दुनिया को देखने-समझने और उसकी तमाम कठिनाइयों के बीच ठीक से खड़ा होने की  क्षमता उनमें आए। 

पिछले कई वर्षों से रोजगार कम होते जा रहे हैं। सरकारी नौकरियां लगभग नहीं हैं। खाली पदों पर भर्तियां नहीं हो रहीं।  निजी क्षेत्र में  पहले कमप्यूटर और अब ए आई के कारण नौकरियां कम होती जा रही हैं। भाजपा सरकार ने शिक्षा को अपने राजनैतिक एजेंडे में बदल दिया है। पाठ्यक्रम में ऐसे-ऐसे बदलाव किए जा रहे हैं कि सल्तनत या मुगल काल का इतिहास पढ़ाना बंद किया जा रहा है। 

  

 

Tuesday, August 25, 2026

'पुष्कर-कविता में विछोह नहीं, प्रेम की सार्थकता है'

प्रिय भाई नवीन,

बड़ी मुश्किल से जुटा पाया हूं अपने को यह पत्र लिखने के लिए। चाहता तो तुमसे मिलकर 'बहुत अच्छा, बहुत अच्छा'


करके तुम्हारे 'दावानल' की औपचारिक प्रशंसा कर सकता था। मगर उससे मन कहां मानता। उपन्यास मुझसे कम पढ़े जाते हैं। कुछ कहानी-कविता पढ़ता भी हूं तो ज़्यादा याद नहीं रख पाता। मौके पर तो बिल्कुल नहीं। तुम्हारी कुछ कहानियां भी पढ़ीं। मंचन करने का तत्काल मन भी किया मगर फिर वही पहाड़ियों की मारगांठ वाली स्थिति। खैर...। 

'दावानल' पढ़कर दरअसल में बहुत भावुक हो गया। सोचा इस गीली स्थिति में कुछ बोल-लिख न पाऊंगा। फिर रख दिया। कुछ दिन लग गए। कुछ उबरा तो लगा, ये इतना आसान नहीं है। उपन्यास के खास तौर पर नहर दफ्तर, हुसेनगंज के दृश्य, लोग, उनके रेखाचित्र जाने-पहचाने लगे। अच्छा लगा। पहली बार पढ़ते समय जो-जो मन जुड़ा गया, वो नोट कर लेता तो अच्छा था। अब वही याद है जो नहीं भूल पाता। 

यद्यपि उपन्यास में वन आंदोलनों पर तुम्हारी व्याख्या, विवरण, इतिहास और समीक्षा अद्भुत, जानकारीपूर्ण और मन में गुस्सा उपजाने वाले हैं, मगर छपछपी पड़ी ईजा व बाबू वाले प्रसंगों पर। तुम्हारी निस्संग स्वभाव की भावुकता इसीलिए रुलाती है कि यहीं अब तक पहाड़ी लड़के (भले ही वे अधेड़ या वृद्ध हो गए हों) स्वयं को आडेंटीफाई करते हैं। 


हमारी और हमारे कुछ बाद की पीढ़ी के ईजा-बाबू लगता है एक ही घराने के होते थे। उनके कष्ट, भले ही उन्होंने शहर में सहे हों, होते पहाड़ के ही थे। बहुत रुलाई आई यार खास तौर पर उनके तर्पण प्रसंगों में। जाने क्यों, अगर ये बुराई हो तो हो मगर, वन आंदोलन के प्रकरणों उतना नहीं झकझोरा, जितना ईजा-बाबू या इनसे मिलते-जुलते प्रसंगों ने, जैसे कि बाघ वाला प्रसंग।

हां, एक बात और जुड़ा गई। पुष्कर और कविता के सम्बंध। यहां तुम गज़ब के हो गए। न केवल शरतचंद्रीय गलदश्रु भावुकता से भी और अज्ञेय की क्रांतिकारिता से  भी (बचा ले गए)। ऐसी आदर्श स्थिति रची कि मैं भी फेल हो गया। पुष्कर-कविता में तुमने विछोह नहीं, प्रेम की सार्थकता रची है। ये मेरा पहले पढ़ा हुआ नहीं है। एक मेच्योर विचारक की छवि बनाई तुमने। यद्यपि चेहरे से तुम किशोर पुष्कर ही लगते हो। वर्षों पहले मेरे देखे, हुसेनगंज वाले। 

सबसे बड़ी बात तो ये कि उपन्यास पढ़कर मुझे अपना अब तक का किया पूरा फरमाइशी लेखन और ओढ़ा हुआ रंगमंच अचानक बहुत सतही लगने लगता है। तुमने वाकई हम सब जैसे मीडियाकरों पर लोहार की चोट की है। ये हुआ संगठित सोच, खूब छना हुआ विचार, खूब खंगाली हुई दृष्टि और मेच्योर लेखन। 

'दावानल' में उसका अपना स्वभाव व प्रकृति है। चूंकि तुम्हारा लेखन प्राकृतिक है, इसलिए मौलिक है। ऐसा नहीं कि वन आंदोलन वाले प्रसंगों ने मुझे खदबदाया नहीं, गुस्सा भी आया मगर एक रूपवादी-कलावादी होने के कारण मुझे भावुकता ही अधिक सुरक्षा देती है। शायद पहाड़ियों की दुखती रग यही है।

उपन्यास का कैनवस काफी बड़ा था मगर तुम कुशल चित्रकार निकले। कहीं अनावश्यक स्ट्रोक नहीं। सभी रंग संतुलित। मुझे नहीं पता, उत्तराखण्ड में उपन्यास को क्या प्रतिक्रिया मिली। क्या इसे बहुगुणा जी-भट्ट जी ने पढ़ा होगा? न हो तो पढ़ाओ। गिर्दा से तुम्हारा दीर्घजीवी जुड़ान पहले पता नहीं था।

'दावानल' से उठे प्रश्न क्या उत्तराखण्ड बनने के बाद उतने पैने रह गए हैं या नहीं? क्या अलग राज्य बनने के बाद 'दावानल' के आरोपों का कोई मतलब नहीं रहा? 'नैनीताल समाचार' अभी भी पुष्कर निकाल रहा है क्या? 

कहना बहुत था। 'दावानल' फिर से पढ़कर कह पाऊंगा।

नवीन, हुसेनगंज से गोमती नगर तक तुमने बहुत सार्थक रचनात्मक सृजनशील यात्रा तय की है। ऐसी तप:पूत साधना कभी समाप्त नहीं होती। बहुत-बहुत बधाई और आशीर्वाद। * 

तुम्हारा- उर्मिल कुमार थपलियाल  

* बहुत आश्चर्य होता है तुम्हारी रिसर्च और वन आंदोलनों की संदर्भ सामग्री जुटाने पर्। इस रूप में मुझे तुम शेखर पाठक से दिखे। तथ्यगत उपन्यास तो डॉक्यूमेण्ट्री लगने लगते हैं। पहाड़ की स्थिति तुमने दलित आत्म कथाओं की तरह महिमावर्णन करते हुए नहीं लिखी। तुम्हारी भाषा में चेग्वेरा और वामपंथियों की ललित ललकार नहीं है। भाषा की पहुंच सरलता-तरलता और सहज सम्प्रेषण से आती है। यह सिद्ध हुआ।

वाकई नैनीताल में रहने से कुमाऊं औरमेरी तरह देहरादून में रहने से गढ़वाल नहीं जाना जा सकता। पता नहीं तुम्हें पढ-अने के बाद मैं जिस हीनभावना से गुजरा हूं, वहां से कब उबर पाऊंगा। शायद वो सभी पहाड़ी जो तुम्हारी तरह का गम्भीर और सार्थक काम नहीं कर पा रहे हैं।   

इस पत्र को पुराना पोस्टकार्ड ही समझना, क्योंकि लिखना ख्तम करते ही और कुछ लिखना याद आने लगता है। जहां तक कागज हो, वहां तक। बिखराव इसी को कहते हैं।  

(प्रसिद्ध रंगकर्मी उर्मिल कुमार थपलियाल ने मेरा उपन्यास 'दावानल' पढ़कर यह पत्र मुझे 20 मई 2008 को लिखा था और फिर खुद ही चलकर मुजेह देने आए थे। आज पुराने कागजों में मिला तो यहां लगा दे रहा हूं ताकि सनद रहे- न जो

  

Sunday, August 23, 2026

स्कूलों की दशा छुपाने से नहीं सुधरेगी

सरकारी स्कूलों की दशा छुपाने से नहीं सुधरेगी। सरकार को चाहिए कि वह सबको बुलाए, कहे कि देखिए, हम ऐसे चला रहे हैं स्कूलों को। कोई कमी दिखे, कुछ सुझाव हों तो सहर्ष दीजिए। हम उन्हें लागू करेंगे।

लेकिन सरकार क्या कर रही है? उसने स्कूलों में बाहरी लोगों के आने पर रोक लगा दी है। खबरदार, कोई पत्रकार, कोई विपक्षी स्कूलों में कुछ देखने न पाए।

इसका सीधा अर्थ ही यह है कि स्कूलों में भारी गड़बड़ है और सरकार उसे ठीक करने की बजाय छुपाना चाहती है। 

बड़ी खामियां न होतीं तो प्रदेश भर में (और कई अन्य राज्यों में भी) बच्चे आंदोलन करने पर क्यों आमादा होते? पिछले चंद दिनों में लखनऊ, कन्नौज, फतेहपुर, महोबा, उन्नाव, आजमगढ़, हमीरपुर समेत कई स्कूलों के बच्चों ने सड़क पर उतरकर प्रदर्शन किए, अधिकारियों का घेराव किया, गुस्से में नारे लगाए। 

क्या मांग रहे हैं बच्चे? पढ़ाने के लिए पर्याप्त शिक्षक हों, पीने का पानी मिल जाए, शौचालय हो और लड़कियों के लिए तो अवश्य हो, मध्याह्न भोजन मानक के अनुसार मिले, स्कूल भवन इतना जर्जर न हो कि छत ही सिर पर गिर पड़े, स्कूल जाने का रास्ता ठीक-ठाक हो और पढ़ाई की बेहतर व्यवस्था हो। 

क्या सरकार सच में कह सकती है कि हमारे स्कूलों में यह सब है?  

स्कूलों की यह दुर्दशा नई नहीं है। अक्सर खबरें आती रही हैं कि स्कूल की इमारत ढह गई, स्कूल के कमरों में भैंसों का तबेला है, मास्टर नहीं हैं, रास्ते में कीचड़-कीचड़ है, मध्याह्न भोजन में कीड़े हैं और दाल में ढेर पानी है, लड़कियां शौचालय न होने से स्कूल छोड़ रही हैं, वगैरह। 

इन खबरों का संज्ञान लेकर स्कूल सुधारे गए होते तो बच्चे क्यों विरोध प्रदर्शन करते? बच्चे पहले भी चुपचाप शिकायत करते थे। कुछ शिक्षक भी बदहाली गिना देते थे। पहले वे अपना अधिकार मांगने से डरते थे। जंतर-मंतर पर विद्यार्थियों के प्रदर्शन ने डर खत्म कर दिया है। अब प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों के बच्चे भी सड़क पर आ रहे हैं। 

क्राक्रोच जनता पार्टी और कुछ यूट्यूब वाले भी स्कूलों की बदहाली देखने निकल पड़े हैं। वे स्कूलों में जाकर उनकी खस्ताहाली सामने लाना चाहते हैं। सरकार पोल खुलने से डर गई है। वह मामला छुपाए रखना चाहती है। ठीक करना चाहती तो उन्हें क्यों रोकती?

वैसे भी, सरकारों ने (इसमें पिछली सरकारें भी शामिल हैं) सरकारी स्कूलों को दीन-हीन बच्चों के लिए बेसहारा छोड़ रखा है। जिनके पास थोड़ा भी पैसा है, उनके लिए शिक्षा की दुकानों के रूप में निजी स्कूल खूब खोल दिए हैं। लोग जमीन बेचकर, कर्ज़ा लेकर भी बच्चों को शिक्षा खरीदने के लिए भेजने को मजबूर हैं। वही आगे बढ़ने का रास्ता दिखाई देता है। 

किंतु, जो बहुत गरीब हैं, महंगी शिक्षा नहीं खरीद सकते, वे सरकारी स्कूलों में अपने बच्चों को भेजते हैं। ऐसे लोगों की अभी बहुत बड़ी संख्या है। 

ये गरीब सरकारों की चिंता में शामिल नहीं हैं। इसीलिए सरकारी स्कूल सबसे उपेक्षित हैं। वैसे भी उन्हें धीरे-धीरे बंद किया जा रहा है। बहाना यह है कि सरकारी स्कूलों में बच्चे कम होते जा रहे हैं। अरे, स्कूल और पढ़ाई बदहाल बना दी है आपने। इसलिए बच्चे कम होते जा रहे हैं। 

स्कूलों में शिक्षकों की भर्ती नहीं की जा रही । जो शिक्षक हैं भी, उन्हें पढ़ाने के अलावा बहुत सारे दूसरे कामों में लगा दिया जाता है। मतदाता सूची, मतदान, जनगणना, तरह-तरह के सत्यापन, जाने क्या-क्या काम उनसे लिए जाते हैं।

यह सरकार वैसे भी जनता को शिक्षित नहीं बनाना चाहती। इसका जोर धर्मांधता पर अधिक है। शिक्षित जनता सवाल करती है, अपने अधिकारों की बात करती है और सरकार यही नहीं होने देना चाहती। 

बहरहाल, सरकारी स्कूलों को वास्तव में दुरस्त करने की नीयत हो तो उन्हें पर्याप्त बजट, शिक्षक, संसाधन और सुविधाएं देनी चाहिए। फिर, नेताओं और आला अफसरों के बच्चों के सबसे पहले इन स्कूलों में भर्ती किया जाना चाहिए। जिस दिन प्रभुत्व वर्ग के बच्चे इन स्कूलों में पढ़ने जाने लगेंगे, उसी दिन पूरी शिक्षा व्यवस्था का कायाकल्प हो जाएगा। 

सरकार ऐसा नहीं करेगी क्योंकि इससे शिक्षा की बड़ी-बड़ी दुकानें बंद हो जाएंगी। वह ऐसा कभी नहीं चाहती। 

सरकार 'बाहरी' लोगों को सरकारी स्कूलों में जाने से रोक लेगी। उसके पास ताकत है लेकिन बच्चों को आंदोलन करने से वह कैसे रोक पाएगी?  

ध्यान रहे, एक दिन ये बच्चे यह सवाल भी जरूर पूछेंगे कि किसी मंत्री-एमपी-एमएलए और सचिव-डीएम के बच्चे हमारे साथ पढ़ने क्यों नहीं आते। 

-न जो, 24 अगस्त 2026, लखनऊ  

  

Friday, August 21, 2026

गिर्दा के खिलाफ गिर्दा?

आप गिर्दा को याद करते हो, खूब याद करते हो। 22 अगस्त को तो अवश्य ही याद करते हो। बहुत अच्छी बात है। लेकिन गिर्दा को इतना याद क्यों करते हो? 

गिर्दा को याद करने का आपके लिए क्या मतलब है? 

क्या उस गिर्दा को याद करते हो, जो हाड़-मांस का पुतला था? या, उस गिर्दा को याद करते हो जो अपने विचारों-गीतों-आंदोलनों में था और आज भी मौजूद है?

गिर्दा लिखता-गाता था- 'कैसा हो स्कूल हमारा/ जहां प्रश्न हल तक पहुंचाएं, ऐसा हो स्कूल हमारा/ जहां किताबें निर्भय बोलें, ऐसा हो स्कूल हमारा...।' 

क्या आप हमारी सड़ी-गली शिक्षा व्यवस्था को आमूल बदलने की मांग का समर्थन करते हो या खाली गिर्दा को याद करने की रस्म निभाते हो? क्या आप इस देश के परेशान हाल बच्चों के साथ हो या उनका बर्बर दमन करने वाली सरकार के साथ खड़े रहते हो? आपके लिए गिर्दा को याद करने के मायने क्या हैं? 

गिर्दा ने सवाल पूछा था- 'सारा पानी चूस रहे हो, नदी समंदर लूट रहे हो/ गंगा-यमुना की छाती पर कंकड़-पत्थर कूट रहे हो/ लेकिन जिस दिन डोलेगी यह धरती, बोल ब्योपारी तब क्या होगा?'

आप नदी-पहाड़-जंगल-जमीन लूटने वालों 'ब्योपारियों' के विरोध में खड़े हो या उनके बगलगीर हो और तालियां बजा रहे हो? आप खाली गिर्दा की तस्वीर पर फूल चढ़ा रहे हो या उसके विचार का मान रख रहे हो?

'सावनी सांझ आकाश खुला है, ओ हो रे, द दिगौ लाली' या ' हुलरी ऐगे ब्याल' आदि गिर्दा के गीतों के सौंदर्य बोध में ही डूबे रहते हो या उस सौंदर्य बोध की जड़ में जाते हो? 'हम लड़ते रयां भुला, हम लड़ते रूंलो' की उसकी पुकार भी सुनते हो?  गाने में तो बहुत मजा ले रहे हो लेकिन किस मोर्चे पर लड़ रहे हो, पूछो तो अपने आप से!

'पानी बिच मीन पियासी, खेतों में भूख उदासी/ ये उलटबांसियां नहीं कबीरा/ खालिस चाल सियासी' कहा था गिर्दा ने। सियासी चालों को समझते हो या उन्हीं के बहकावे में आते हो? कहीं ऐसा तो नहीं कि उन्हीं सियासी चालों को चलने में खुद भी शामिल हो? 

ऐसा क्यों है कि आप गिर्दा को भी गाते हो और उत्तराखण्ड या देश को बर्बाद करने वालों के साथ प्रस्न्न मुद्रा में फोटो खिंचवाते हो और उन्हीं के  रंग में रंगे रहते हो?

गिर्दा का सपना था- 'कस होलो उत्तराखण्ड, कास हमारा नेता/ जड़ कंजड़ि उखेलि भली कै, पुरि बहस करूंलो?' यह सपना याद है या भूल गए हो?  

उत्तराखण्ड में क्या हो रहा है, कौन मचाए हुए है खुली लूट, क्या सपना था उत्तराखण्ड का, इस पर कभी बात-बहस करते हो? थोड़ी-बहुत चिंता भी होती है या जो गिर्दा की चिंता में शामिल हैं, उनको देशद्रोही बताने में ही अपनी ऊर्जा लगा देते हो? 

गिर्दा ने 'अंधायुग', ;अंधेर नगरी', 'थैंक्यू मिस्टर ग्लाड' जैसे नाटक  खेलकर और 'नगाड़े खामोश हैं' एवं 'धनुष यज्ञ' जैसे नाटक लिख व मंचित कर सचेत नहीं किया था क्या? उसकी चेतावनी सुनते-समझते हो या खाली यूट्यूब पर गिर्दा-गिर्दा सुनाते हो? 

गज़ब ही कर देते हो आप जब जोर-जोर से गाते हो- 'जैंता एक दिन तो आलो उ दिन यो दुनी में/ जै दिन चोर नी फलाला, कै कै जोर नी चललो...।' लेकिन आप तालियां बजा-बजा कर गिर्दा के केवल शब्द गा रहे हो या 'उस दिन' को लाने के लिए वास्तव में कुछ जतन भी कर रहे हो? 

गिर्दा की ही तर्ज़ पर मैं पूछना चाहता हूं,  'जब मेरे देश में पेड़ पेड़ों के खिलाफ, पानी पानी के खिलाफ और पहाड़ पहाड़ों के खिलाफ पेश किए जा रहे हैं', तो कहीं ऐसा तो नहीं कि सिर्फ गा-गाकर आप गिर्दा को गिर्दा के ही खिलाफ खड़ा कर दे रहे हो?   

कहीं इसीलिए तो उत्तराखण्ड सरकार भी गिर्दा के नाम पर पुरस्कार नहीं देने लगी है? क्या यह सरकार गिर्दा के विचारों का सम्मान करती है या आपकी तरह उसे उसी के विरुद्ध खड़ा कर रही है?

गिर्दा के गीत गाने और फोटो पर माला चढ़ाने से फुर्सत मिले तो इन सवालों पर भी तनिक विचार कर लेना और याद रखना, गिर्दा सब समझता था-

'बेच खाया है मुझे कितना, किसे बेचा है

बात ये दिल में लाओ तो कोई बात करें।' 

- नवीन जोशी, 22 अगस्त 2026, लखनऊ        

  

  

Wednesday, August 19, 2026

माननीयों के खिलाफ मुकदमे लटके ही रहते हैं!

हमारे वर्तमान और पूर्व सांसदों-विधायकों के खिलाफ, जिनमें कुछ मुख्यमंत्री भी शामिल हैं, 4192 मुकदमे अदालतों में लम्बे समय से लम्बित हैं। उनमें सुनवाई ही नहीं हो रही।  

519 मुकदमे दस साल से अधिक समय से लम्बित हैं, जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने जनप्रतिनिधियों के खिलाफ दर्ज़ मुकदमों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतें बना रखी हैं। समय-समय पर शीघ्र सुनवाई करने के लिए वह निर्देश भी जारी करता है। 

सर्वोच्च न्यायालय ने इससे सम्बद्ध एक जनहित याचिका में वरिष्ठ अधिवकता विजय हंसारिया कि 'एमिकस क्यूरी' अर्थात 'न्यायालय का मित्र' बना रखा है। सुप्रीम कोर्ट में पेश उन्हीं की एक रिपोर्ट में ये तथ्य सामने आए हैं। कुछ मुकदमों में मामले की तह तक जाने के लिए अदालतें 'एमिकस क्यूरी' की तैनाती करती हैं।  

श्री हंसारिया की रिपोर्ट के कुछ अंश अखबारों में प्रकाशित हुए हैं। इनके अनुसार जनप्रतिनिधियों के विरुद्ध 700 अन्य मामलों में जांच ही अटकी हुई है। 360 मामलों में तीन साल से ऊपर हो गए, आरोप पत्र तक अदालत में पेश नहीं किए गए हैं।  

रिपोर्ट बताती है कि माननीयों के खिलाफ लम्बित मुकदमों की यह संख्या (4192) उच्च न्यायालयों से मिली सूचना या उनकी वेबसाइटों से निकाली गई है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एमिकस क्यूरी को नेताओं के खिलाफ लम्बित मुकदमों की संख्या नहीं बताई। उसकी वेबसाइट में 2024 में यह संख्या 1171 बताई गई थी, जो देश भर में सबसे अधिक है। 

इस रिपोर्ट के अनुसार 28 राज्यों में से 14 के मुख्यमंत्रियों के विरुद्ध आपराधिक मुकदमे दर्ज़ हैं। तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी  के विरुद्ध सबसे अधिक 89 मुकदमे लम्बित हैं। उसके बाद बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेन्दु अधिकारी के खिलाफ 29, कर्नाटक के सी एम डी के शिवकुमार एवं आंध्र के सी एम चंद्रबाबू नायडू के विरुद्ध 19-19 और केरलम के सी एम सतीशन के खिलाफ 18 मुकदमे लम्बित हैं। 

मुकदमे तो यू पी के सी एम आदित्यनाथ योगी के खिलाफ भी थे लेकिन उन्होंने सत्ता में आने के बाद वे मुकदमे आदलत से वापस करवा लिए।  

माननीयों के विरुद्ध 4192 मुकदमों में से 754 मामले पांच से लेकर दस साल से लम्बित हैं। 562 मुकदमे तीन साल से अधिक और 1095 मुकदमे तीन साल से कम समय से अदालतों में अटके हैं।  

सबसे अधिक 1171 मुकदमे उत्तर प्रदेश में लटके हैं। उसके बाद केरलम (543), बिहार (373), महाराष्ट्र (364) और उड़ीसा (330) का नम्बर आता है। 

सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में 10 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में जनप्रतिनिधियों के खिलाफ लम्बित आपराधिक मुकदमों की शीघ्र सुनवाई के लिए 12 विशेष अदालतें बनाने का आदेश दिया था। 2018 में उसने निर्देश दिया था कि हर जिले में एक सेशन अदालत और एक मजिस्ट्रेट कोर्ट सिर्फ इन्हीं मुकदमों की सुनवाई के लिए तय किए जाएं ताकि मामलों का निपटारा प्राथमिकता से हो। 

नवम्बर 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाई कोर्टों को आदेश दिया था कि ऐसे मामलों के शीघ्र निपटारे के लिए स्वत: संज्ञान लें और त्वरित सुनवाई के लिए विशेष पीठों को अधिकृत करें।  

एक पूर्व न्यायालय मित्र ने जब अपनी रिपोर्ट में बताया था कि अधिकतर हाई कोर्टों में ऐसे मुकदमों की निगरानी की कोई प्रभावी व्यवस्था ही नहीं है तो यह मामला फरवरी 2025 में सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ को सौंपा गया। 

एमिकस क्यूरी की ताज़ा रिपोर्ट कहती है कि सुप्रीम कोर्टों के निर्देशों के बावजूद जनप्रतिनिधियों के खिलाफ लम्बित मुकदमे कम नहीं हुए हैं। 

श्री हंसारिया ने सुप्रीम कोर्ट से यह सिफारिश की है कि जनप्रतिनिधियों के विरुद्ध लम्बित मामलों को जल्द निपटाने के लिए डिजिग्नेटेड कोर्ट बनें यानी ऐसे कोर्ट जो इस केवल इन्हीं मुकदमों को सुनें और फैसला करें, तीन साल से अधिक समय से लम्बित मुकदमों की सुनवाई रोज हो और जो माननीय लगातार दो तारीखों में अदालत में पेश न हों, उनके विरुद्ध गैर जमानती वारण्ट जारी किए जाएं। 

यह भी सिफारिश की गई है कि जनप्रतिनिधियों के खिलाफ आरोप अप्त्र दाखित कर दिए जाने के बाद एक साल में सुनवाई पूरी हो जाए और उसकी मासिक निगरानी हो। 

- न. जो. 20 अगस्त 2026

(अखबारों में प्रकाशित रिपोर्टों के आधार पर)  

Monday, August 17, 2026

क्यों और कैसे आपकी पोस्ट सोशल मीडिया से गायब हुई

सोशल मीडिया पर भारत सरकार किस प्रकार शिकंजा कसे हुए है, इसके विवरण चौंकाने वाले हैं। 

वर्ष 2026 में मार्च से जुलाई तक सरकार ने फेसबुक, यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर पोस्ट/रील वगैरह ब्लॉक करने के 1,95, 000 (एक लाख पचानब्बे हजार) आदेश जारी किए। इसी बीच जंतर मंतर पर जेन जी का आंदोलन चरम पर था। 

यूं समझिए कि प्रत्येक 68 सेकेंड पर एक आदेश जारी हुआ। रोजाना का औसत बैठता है- 1275 आदेश।

और, एक आदेश से एक बार में सैकड़ों व्यक्तियों यानी यूजर्स की पोस्ट/ रीलें हटवाई गईं। 

ये आदेश मुख्यत: गृह मंत्रालय से आए। कानून है कि आदेश जारी होने के तीन घण्टे के भीतर सामग्री ब्लॉक हो जानी चाहिए। ये कम्पनियां तीन घण्टे क्या, आदेश जारी होते ही स्वत: सामग्री ब्लॉक कर देती हैं। 

इस वर्ष की तुलना में पिछले वर्ष 2025 में ऐसे आदेश काफी कम थे। अक्टूबर 2024 से अक्टूबर 2025 के बीच मात्र छह आदेश प्रतिमास जारी किए गए थे। Indian Express ने आज यानी 18 अगस्त 2026 के अखबार में सूचना के अधिकार से प्राप्त जानकारियों के आधार पर इसकी विस्तार से खबर छापी है।

इस खबर में बताए गए तथ्य सरकार के भय, उसकी सेंसरशिप और उसके अहंकार को स्पष्ट करते हैं। एक उच्चाधिकारी ने बताया कि जैसे-जैसे विद्यार्थियों का आंदोलन व्यापक होता गया, वैसे-वैसे पोस्ट ब्लॉक करने के आदेश बढ़ते गए।

मार्च से जुलाई के पांच महीनों में सबसे अधिक 1,00,000 (एक लाख) आदेश इंस्टाग्राम पर रील/पोस्ट ब्लॉक करने के लिए जारी किए गए।  फेसबुक को 80,000 (अस्सी हजार) और यूट्यूब को करीब 15 हजार आदेश दिए गए। 

सोशल मीडिया पर जिस सामग्री को ब्लॉक करने को कहा गया (आई टी कानून की धारा 79-3-बी के आधार पर) , उनमें मुख्य रूप से जेन जी आंदोलन, सरकार की आलोचना, पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथनॉल मिलाने की निंदा और पश्चिम बंगाल चुनाव से सम्बद्ध सामग्री रही। राष्ट्रीय सुरक्षा और कानून व्यवस्था को कारण बताकर पोस्ट ब्लॉक करने वाले आदेश (आई टी एक्ट की धारा 69-ए) इसमें शामिल नहीं हैं। 

गृह मंत्रालय का एक पोर्टल है 'सहयोग' नाम से। इसी पोर्टल पर ये आदेश जारी होते हैं। यह पोर्टल इसी उद्देश्य से बनाया गया है, जिस पर केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालय/विभाग सोशल मीडिया पर पोस्ट की गई सामग्री को ब्लॉक करने के आदेश जारी करते हैं। सोशल मीडिया कम्पनियां इस पोर्टल से जुड़ी हुई हैं। 

कायदे से इन सोशल साइटों के स्वामित्व वाली कम्पनियों (फेसबुक और इंस्टाग्राम का स्वामित्व मेटा का है और यूट्यूब गूगल का) को सरकार के आदेशों की समीक्षा करनी चाहिए कि किस आधार पर सामग्री ब्लॉक करने को कहा गया है, वह कितना उचित या अनुचित है, उसे अपना पक्ष रखना चाहिए, लेकिन ये ऐसा नहीं करते। 

मेटा भारत में यूजर्स को बताता भी नहीं है कि उनकी सामग्री सरकार के आदेश से ब्लॉक कर दी गई है। दूसरे देशों में वह यूजर्स को बता देता है। 

मेटा ने सहयोग पोर्टल  के साथ ऐसी तकनीकी व्यवस्था कर ली है कि आदेश जारी होते ही उस पर अपने आप अमल हो जाता है। उस पर मेटा का कोई अधिकारी विचार करना तो दूर, उसे देखता भी नहीं। आदेश जारी होते ही सामग्री स्वत: ब्लॉक हो जाती हैं। 

भारत के अलावा दूसरे देशों में मेटा ऐसा नहीं करता। उसके अधिकारी वहां सरकार के आदेशों पर विचार करते हैं, सरकार को अपने तर्क पेश करते हैं और संतुष्ट होने पर ही पोस्ट ब्लॉक करते हैं। 

भारत के आई टी कानून में ऐसी कोई बंदिश नहीं है कि सरकार का आदेश आते ही सामग्री तत्काल ब्लॉक कर दी जाए। मेटा के अधिकारी भारत सरकार का आदेश आंख मूदकर मान लेते हैं। शायद उससे कोई तर्क-वितर्क करना नहीं चाहते। 

भारत में 60 करोड़ लोग सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रहे हैं। ये लोग करीब 10 करोड़ पोस्ट/रील रोजाना डालते हैं। इस तरह भारत सोशल मीडिया कम्पनियों के लिए सबसे बड़ा, अत्यंत विशाल बाजार है। यहां वह सरकार से कोई पंगा क्यों लेना चाहेगा? 

आपको याद होगा कि हाल ही में मेटा के मालिक मार्क ज़ुकरबर्ग को भारत सरकार ने तलब किया था। वे दिल्ली आकर उच्चाधिकारियों के सामने पेश हुए थे। 

- नवीन जोशी, 18 अगस्त 2026