उन वर्षों में सरकारी आयोजन होने के बावजूद 'लखनऊ महोत्सव' बड़ी गरिमामय हुआ करता था। विशेष रूप से उसकी सांस्कृतिक संध्याओं में देश-विदेश के नामचीन कलाकार/संस्थाएं अपनी सर्वोत्तम प्रस्तुतियों से हमें चमत्कृत कर दिया करते थे।
तो, पाकिस्तान के राजनीतिक घटनाक्रमों पर प्रच्छन्न चुटीली टिप्पणियों के साथ अपने दामाद के संचालन में उस शाम मलिका पुखराज व ताहिरा ने कुछ बेहतरीन नगमे (अभी तो मैं जवान हूं, वगैरह) सुनाने के बाद अंत में वह गीत सुनाया जो उनकी पुरकशिश आवाज़ में आज भी कहीं सुनने को मिल जाता है तो जेठ की धूप वासंती हो जाती है- 'लो फिर बसंत आई, फूलों पे रंग लाई/ चलो बे-दरंग, लब-ए-आब-ए-गंग, बजे जल तरंग/ मन पर उमंग छाई...।'
हफीज़ जालंधरी का यह तराना गाया तो बहुत से गायकों ने है, और अच्छा गाया है लेकिन इसको जितनी प्रसिद्धि मलिका पुखराज की आवाज़ में मिली और पाकिस्तान में भी, वह बेमिसाल है।
उस जमाने तक पाकिस्तान, मुसलमान और इस्लाम का नाम लेना राष्ट्रद्रोह नहीं बनाया गया था। पाकिस्तानी कलाकार, खिलाड़ी, नेता और आम जनता भी भारत आया-जाया करते थे। तब यह भी संदेह और नफरत से नहीं देखा जाता था कि मुसलमान 'हमारा त्योहार बसंत' क्यों मनाते हैं।
वली दकनी की मजार को ध्वस्त करने वाली नफरत की फसल उगाए जाने में अभी 24-25 साल और लगने थे। उसके बाद तो इस देश में बहुत कुछ ध्वस्त किया जा चुका है। मुसलमान होना शक व नफरत से देखा जा रहा है।
शुक्र है कि दिल्ली में निजामुद्दीन औलिया की दरगाह कायम है और वहां अब भी बसंतोत्सव मनाया जाता है। बहुत सारे कव्वाल, शायर और आम जन भी वासंती पटके गले या माथे में बांधकर बसंत के गीत गाते हैं और मजारों पर सरसों के फूल बिखेरे जाते हैं। कव्वाल जो समां बांधते हैं, उसके तो कहने ही क्या!
यह तनिक भावुक भूमिका वास्तव में यूसुफ सईद की किताब 'आज रच्यो है बसंत निजाम घर' के पन्ने पलटते और पढ़ते हुए मन में उमड़ती-घुमड़ती रही। यह किताब अभी-अभी नवारुण प्रकाशन से जारी हुई है, जो अपनी विषयवस्तु में ही नहीं, प्रस्तुति और साज-सज्जा में भी शानदार है। उसके रंगीन चित्र और रेखांकन अलग से ध्यान खींचते हैं। डिजायन और साज-सज्जा भी यूसुफ सईद ने ही की है।
किताब का मकसद काबिले गौर है- इस सवाल का जवाब तलाशना कि आखिर मुसलमान भारत का ऐसा त्योहार क्यों मनाते हैं जो हिंदू संस्कृति से जुड़ा है। यह सवाल बहुत से मुसलमान भी पूछते हैं, जो मानते हैं कि बसंत मनाने का चूंकि इस्लाम में कोई आधार नहीं है, इसलिए हराम है।
जवाब की तलाश में लेखक में हमें उस विरासत से परिचित कराता है जो हिंदुस्तान की धरती पर सैकड़ों-हजारों वर्षों में बहुत सारे धर्मों-संस्कृतियों से मिलकर धीरे-धीरे विकसित हुई और जीवन का अभिन्न हिस्सा बनी है। वह ऐसी इंद्रधनुषी चादर है जिसके धागों और रंगों को अलग-अलग कर पाना सम्भव नहीं है। वह तार-तार हो सकती है, अलग नहीं।
आज के दौर में इस विरासत की चर्चा बहुत जरूरी है। पुरानी पीढ़ियां, जो इससे परिचित रही हैं, अब क्यों भूल रही हैं? नई पीढ़ियों को तो, जिन्हें नफरत घुट्टी की तरह पिलाई जा रही है, इसे जानना और भी जरूरी है।
कोई तीन दशक पहले 'बसंत' नाम से लघु फिल्म बना चुके यूसुफ सईद ने इस किताब में बसंत की परम्पराओं, गीतों और उसकी लोकप्रियता में मुस्लिम सूफियों, शायरों और कव्वालों, खासकर अमीर खुसरो (किताब में 'खुसरौ' है) के योगदान की गहरी पड़ताल की है-
'जब कुछ मुसलमान बारहवीं-तेरहवीं शताब्दी में हिंदुस्तान आए तो मध्य एशिया और खुरासान के नौरोज और फसले बहार की रंगीनियां शायद उन्हें यहां बसंत के रूप में नज़र आईं। इसलिए उन्होंने हिंदुस्तान के दूसरे त्योहारों के मुकाबले में बसंत को अपनेपन की भावना से मनाया। भारत के मुसलमानों में बसंत सबसे पहले चिश्ती सूफियों ने मनाया।'
और, यह किस्सा तो मशहूर ही है कि जब अपने भांजे तकीउद्दीन की मौत से गम में डूबे, हंसना-खाना भूल गए अपने पीर निजामुद्दीन औलिया को अमीर खुसरो ने महिलाओं की तरह सज-धजकर और हाथों में सरसों के फूल लेकर नाचते हुए हंसाया था। यह विचार उन्हें बसंत पंचमी पर पीले वस्त्रों में सजी, नाचती-गाती महिलाओं को देखकर सूझा था।
तबसे बसंत का यह पर्व निजामुद्दीन औलिया और अमीर खुसरो के साथ अभिन्न रूप से जुड़ता हुआ दूसरे कई सूफी पीरों के उत्सवों में शामिल हो गया। अमीर खुसरो के बसंत गीत लोकप्रिय होते गए और बसंत पर कव्वालियां और शायरी लिखने-गाने का सिलसिला चल पड़ा, जो आज तक जारी है और लोकप्रिय भी।
निजामुद्दीन औलिया की करीब सात सौ साल पुरानी दरगाह पर तो बसंत पंचमी के दिन देश भर के कव्वाल इकट्ठा होकर गीत-संगीत की धूम मचाते हैं। हौज़ में वासंती रंग घोला जाता है, कपड़े रंगे, बांटे और पहने जाते हैं। सरसों के फूल मजारों पर चढ़ाए जाते हैं। वैसे, यूसुफ अफसोस जताते हैं कि अब यह एक उत्सव की बजाय रस्म भर रह गया है।
यूसुफ पूछते हैं कि 'उनकी मृत्यु के सात सौ साल बाद एक फारसी कवि और दरबारी इतिहासकार का हमारे लिए क्या महत्त्व हो सकता है?' वे जवाब देते हैं कि 'अमीर खुसरो और उनके समय की व्याख्या करने की कोशिश सिर्फ उनकी कविता या संगीत की सराहना ही नहीं है, यह भारत के इतिहास को बेहतर ढंग से समझने में मदद करती है और हमारे अतीत के बारे में गलतफहमियों को दूर कर सकती है... क्योंकि आज हम भारत में ऐसे दौर से गुज़र रहे हैं जहां इतिहास को बहुत बड़े पैमाने पर राजनीतिक अलगाव के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।'
यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण बात है और यही समझाने का बेहतरीन प्रयास यह किताब करती है।
यूसुफ बताते हैं कि इस्लाम के आने के बहुत पहले से लोग भारत आते रहे। स्वाभाविक ही उनके प्रभाव भी यहां पड़े लेकिन हिंदुस्तानी समाज में सबसे बड़ा सांस्कृतिक प्रभाव फारस (वर्तमान ईरान) से आए लोगों का पड़ा। बाद में दूसरी जगहों से आए मुसलमानों ने भी यहां की बहुत सी परम्पराओं को सहज ही अपना लिया।
कब्रों पर चादर चढ़ाना, चिराग जलाना, फूल व नज़राना पेश करना, कब्र पर सजदा करना, तावीज-गण्डे बांधना, वगैरह बहुत सी ऐसी रस्में उन्होंने हिंदुओं से सीखीं और अपना लीं। ये रस्में ईरान या अरब से नहीं आईं। सूफियों ने भी बसंत को इस्लाम के दायरे में अपनाया। इसी तरह हिंदुओं ने भी उनकी बहुत सी रस्में, खान-पान, पहनावे और बोली-भाषा के प्रभाव सहज ही ग्रहण किए।
यही मिली-जुली रवायत है, गंगा-जमुनी संस्कृति है, जो हजारों साल में बनी। आज कौन सी रस्में किसकी हैं, कैसी हैं और उनमें किस-किस के प्रभाव हैं, इसे अलग कर पाना तो दूर, समझ पाना भी कठिन है। इसी का नाम हिंदुस्तानियत या भारतीयता है। यह तथ्य समझना-समझाना आज की सबसे बड़ी जरूरत है। यह किताब यही काम बखूबी करती है।
किताब में खुसरो और अन्य सूफियों के रचे बसंत संबंधी गीतों का संकलन और उनकी व्याख्या भी शामिल है। रंगों के धार्मिक प्रतीकों पर रोचक अध्याय है, जिसमें अच्छी तरह समझाया गया है कि हरा रंग क्यों इस्लाम से जोड़ा जाता है और यह गलत धारणा क्यों बनी। फिल्मों में बसंत के चित्रण पर भी यहां चर्चा की गई है। दरबारी शायर के रूप में अमीर खुसरो की विरोधीभासी भूमिका की चर्चा करने से भी यूसुफ ने परहेज नहीं किया है।
यूसुफ यह भी बताते हैं कि बसंत की शायरी में जिस 'रंग' की बात होती है (आज रंग है, ऐ मां रंग है री, मेरे महबूब के घर रंग है री) , वह मात्र वासंती रंग नहीं है। वह असल में अपने पीर के साथ लगा इश्किया रंग है, जिसके बिना सूफियों की इबादत पूरी नहीं होती, वह इबादत जिसका उद्देश्य अंतत: अपने भगवान या खुदा तक पहुंचना है, उसमें फना हो जाना है।
सूफियों का उर्स (पुण्य तिथि पर उत्सव) मनाया ही इसलिए जाता है कि वे मरे नहीं, बल्कि ईश्वर में मिल गए। जैसे, ईश्वर से उनका विवाह हो गया। सूफी अपनी तुलना दुल्हन से करते हैं और परमात्मा दूल्हा हैं- 'मोहे अपने ही रंग में रंग ले रंगीले, तू तो साहेब मेरा महबूबे इलाही।' कबीर के यहां भी 'राम' दूल्हा हैं और वे खुद दुल्हन।
'आज जबकि हिंदू और मुसलमान दोनों ही कौमें अपने-अपने धार्मिक खोल में सीमित होती जा रही हैं, या सिमटने पर मजबूर की जा रही हैं, मुसलमानों का बसंत मनाना या हिंदुओं का ईद में शामिल होना एक ख्वाब सा बन गया है।' यूसुफ सईद की यह चिंता हम सबकी चिंता होनी चाहिए।
इसीलिए यह यह किताब हर घर में होनी और पढ़ी जानी चाहिए।
- नवीन जोशी, 14 अगस्त 2026, लखनऊ
(किताब-'आज रच्यो है बसंत निजाम घर', लेखक- यूसुफ सईद, प्रकाशक- नवारुण, सम्पर्क- 9811577426)







