फेसबुक में झांकता हूं तो सबसे पहले वीरेंद्र यादव की अनुपस्थिति कचोटती है।
प्रत्येक ऐसे मुद्दे पर, जहां सचेत-विवेकी बौद्धिक का तत्काल एवं तार्किक हस्तक्षेप आवश्यक लगता था, वीरेंद्र जी अपनी बेबाक टिप्पणी के साथ वहां दिख जाते थे। रायपुर के एक विश्वविद्यालय में आयोजित गोष्ठी में आमंत्रित वरिष्ठ कथाकार मनोज रूपड़ा के साथ कुलपति के दुर्व्यवहार के बारे में 11 जनवरी 2026 को उन्होंने अपनी टिप्पणी इस प्रकार शुरू की थी- “शर्मनाक था वह दृश्य! कुलपति सर्वशक्तिमान था, उसने वही किया जो अविवेकी सत्ता अक्सर करती है।” इसके बाद उनकी तीखी धार “हिंदी संसार के कुछ दैदीप्यमान सितारों” की ओर मुड़ गई थी जो मनोज रूपड़ा को गोष्ठी से बाहर निकल जाने का आदेश सुनाए जाने के बाद भी “अविचलित और अविराम सभागार में बने रहे। सभा फिर जुटी, कुलपति फिर पूरे अंदाज़ में बोले। अन्य आमंत्रित प्रतिभागी लेखकों ने अपनी गुरुत्तर भूमिका का निर्वहन किया, इस आश्वस्ति के साथ कि वे अनुशासित लेखकों की तरह अन्य आयोजनों में ससम्मान बुलाए जाते रहेंगे। यह समय किसी को कुछ याद दिलाने, सामाजिक भूमिका निभाने और सत्ता के समक्ष रीढ़ सीधी रखने का विनम्र सुझाव देने का भी नहीं है। यह समय इस दृश्य के द्रष्टा होने से उपजी शर्म में डूब जाने का है। यह मनोज रूपड़ा का अपमान नहीं, यह लेखकीय अस्मिता पर हमला है। अफसोस कि इस दौर में कुछ लेखक भी इसके सहभागी हैं और हम जैसे कुछ इसके विवश दर्शक।”
16 जनवरी की सुबह अचानक उनका चला जाना इसलिए और भी तकलीफदेह है कि इस रचना विरोधी एवं बढ़ती लेखकीय रीढ़विहीनता के दौर में उनके विरल लेकिन सार्थक, विवेकशील और प्रतिरोधी तेवरों की बहुत जरूरत महसूस होती है। उनके ऐसे हस्तक्षेपों का कई लोग इंतज़ार करते थे और उनमें अपनी आवाज मिलाते हुए साझा भी किया करते थे। उनकी उपर्युक्त टिप्पणी सैकड़ों लोगों ने ‘लाइक’ की, उस पर 74 टिप्पणियां दर्ज़ हुईं और 23 लोगों ने उसे अपनी-अपनी वाल पर साझा भी किया था।
मैंने और कई अन्य मित्रों ने उनसे एकाधिक बार शिकायत की थी कि फेसबुक जैसे माध्यमों में अपनी रचनात्मक ऊर्जा खर्च करके वे उन जरूरी तथा गम्भीर आलोचनात्मक कामों के लिए समय नहीं निकाल पा रहे हैं, जो उन्हें करनी हैं और जिन्हें वे ही सबसे अच्छी तरह कर सकते हैं। कई बार वे विरोधियों और कुतर्कियों के साथ फेसबुक पर भिड़ जाया करते थे और अपने तर्क एवं उद्धरण पेश करके मुंहतोड़ जवाब देने में बहुत समय लगा दिया करते थे। इस शिकायत के बावजूद हमें उनकी टिप्पणियों का इंतज़ार रहता था। फेसबुक पर ही नहीं, साहित्यिक गोष्ठियों-सेमीनारों अथवा पत्र-पत्रिकाओं में भी, जहां वे कोई भी कुतर्क, कुपाठ या तथ्यों के साथ तोड़-मरोड़ सहन नहीं कर पाते थे, तुरंत प्रतिरोध दर्ज़ कर देते थे। फेसबुक, ‘जनसत्ता’ और ‘कथादेश’ में ओम थानवी, उदय प्रकाश, कमलेश, अर्चना वर्मा और कमलकिशोर गोयनका के साथ उनकी कुछ मुद्दों पर लम्बी भिड़ंत हुईं। गहन अध्ययन और विलक्षण स्मृति इस सब में उनके बेहतरीन हथियार होते थे। बढ़ती साम्प्रदायिक्ता और हिंदू राष्ट्रवाद के विरुद्ध उनकी सार्वजनिक सक्रियता भी काबिले गौर थी।
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1973 में जब मैं लखनऊ विश्वविद्यालय में दाखिल हुआ तो वीरेंद्र यादव एक वर्ष पूर्व राजनीतिशास्त्र में एमए की डिग्री लेकर बाहर आ चुके थे। वह हमारी बहुविध सक्रियता और सीखने का दौर था। ठाकुर प्रसाद सिंह, राजेश शर्मा, कृष्ण नारायण कक्कड़, प्रबोध मजूमदार, गोपाल उपाध्याय, मुद्राराक्षस, बीर राजा, नरेश सक्सेना, राकेश आदि के साथ होने वाली मुलाकातों-चर्चाओं में वीरेंद्र यादव खूब मुखर रहा करते थे। अमृत लाल नागर, यशपाल और भगवती चरण वर्मा यदा-कदा कॉफी हाउस आते थे। कुंवर नारायण अपने घर पर बैठकी जमाते थे। लीलाधर जगूड़ी उसी दौरान लखनऊ आए और कुछ समय बाद कामतानाथ भी। विनोद दास और अखिलेश कुछ और वर्षों बाद लखनऊ पहुंचे। लखनऊ की वह साहित्यिक बिरादरी खूब सक्रिय रही। बाद के वर्षों में वीरेंद्र यादव, राकेश वेदा और अखिलेश का खूब याराना रहा। वीरेंद्र जी के कई महत्त्वपूर्ण लेख हमने अखिलेश के सम्पादन में ‘तद्भव’ में ही पढ़े।
हज़रतगंज के काफी हाउस से लेकर अमीनाबाद के कंचना तक, जहां वे लम्बी बैठकें जमाते थे, वीरेंद्र जी की उपस्थिति रचनात्मक गर्मी पैदा करती थी। पारिवारिक माहौल के कारण किशोरावस्था से ही वे पढ़ाकू हो गए थे। विश्वविद्यालय तक पहुंचते-पहुंचते वे नएहरू की ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’ और ‘ऑटोबायग्राफी’ (नेहरू), महात्मा गांधी की जीवनी, आदि कई पुस्तकों से लेकर टॉमस हार्डी, चार्ल्स डिकंस, बर्नाड शॉ समेत बहुत सारा अंग्रेजी साहित्य पढ़ चुके थे। समाजशास्त्रीय लेखन-विश्लेषण पढ़ना और बहसें करना उन्हें विशेष प्रिय था और हिंदी से अधिक अंग्रेजी की पुस्तकें पढ़ना भी। तत्कालीन सभी पत्र-पत्रिकाएं उनकी दिनचर्या का हिस्सा थीं। ‘टाइम्स लिटरेरी सप्लीमेंट’, ‘इंकाउण्टर’, ‘न्यू स्टेट्समैन’ जैसी पत्रिकाएं पढ़ने के लिए वे ब्रिटिश कौंसिल लायब्रेरी में बैठे दिखते थे। छात्र जीवन में ही उनका सम्पर्क समाजवादी युवजन सभा और स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इण्डिया से होते हुए वामपंथी नेताओं तक हो चुका था। जीवन बीमा निगम की नौकरी में आने के साथ ही वामपंथी श्रमिक संगठनों में सक्रिय हो गए। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य भी बने और अगला महत्त्वपूर्ण पड़ाव प्रगतिशील लेखक संगठन से जुड़ना और उसमें सक्रिय भागीदारी करना था। यह पृष्ठभूमि उन्हें रचनात्मक रूप से ऊर्जावान और बहसों में आगे रखती थी। याददाश्त उनकी बहुत तेज़ थी ही। उनकी स्पष्टवादिता और बहसों में तथ्यों-तर्कों के साथ डटे रहना हमें उनकी ओर विशेष रूप से आकर्षित करते थे।
1977 में पत्रकारिता में आने के बाद मेरा उनसे सम्पर्क और गहरा हुआ। सलाह-मशविरे, जानकारियों और विभिन्न मुद्दों पर टिप्पणियों के लिए वे सहज उपलब्ध रहते थे। अखबार में कुछ अच्छा लगा तो तारीफ करते और गड़बड़ पाने पर टोकने और समझाने में भी कोई संकोच नहीं करते थे। मेरी कहानियों और उपन्यासों पर उन्होंने बेबाक राय दी। उनसे अच्छी पुस्तकें पढ़ने को मिलती थीं और यह सलाह भी कि कौन-कौन संदर्भ ग्रंथ अवश्य अपने पास रखने चाहिए। यह रिश्ता खूब चला और उनके जाने के साथ ही खत्म हुआ। व्यवहार में विनम्र किंतु अपनी बात पूरे जोर से रखने और उस पर लड़ने की हद तक कायम रहने के लिए वे ख्यात थे। इसी कारण एक विवाद के बाद उन्होंने भाकपा की सदस्यता छोड़ दी थी। उनका सबसे अधिक वैचारिक विवाद मुद्राराक्षस के साथ होता था, झगड़े की सीमा तक, लेकिन दोनों का याराना भी उतना ही सबल था। हाल के वर्षों में अपने कई साथी एवं वरिष्ठ रचनाकारों तक को वे इस बात के लिए लगभग लताड़ देते थे कि आरएसएस-भाजपा के मंचों पर जाकर क्यों वे उन संगठनों को राजनैतिक वैधता प्रदान कर आते हैं, भले ही वहां उन्होंने उनके विरोध में ही बातें क्यों न कही हों।
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वीरेंद्र यादव अपने जिस योगदान के लिए सदा याद किए जाएंगे, वह है हिंदी आलोचना को एक सबाल्टर्न दृष्टिकोण देना, ‘आलोचना के कुलीनतंत्र’ से बाहर कर दिए गए कई महत्त्वपूर्ण उपन्यासों का इसी दृष्टि से पुनर्पाठ करना, प्रेमचंद के उपन्यासों-कहानियों के साजिशन कुपाठ का तार्किक प्रतिरोध करना और कई लोकप्रिय तथा श्रेष्ठ घोषित उपन्यासों में कलावाद एवं भाषायी आस्वाद की चाशनी के पीछे छुपे धर्म आधारित शोषण एवं वर्णाश्रमी दृष्टि का पर्दाफाश करना।
राम विलास शर्मा, निर्मल वर्मा, रुपर्ट स्नेल और बाद के कुछ दलित लेखक-आलोचक जब प्रेमचंद की सामाजिक-राजनैतिक-दलित दृष्टि को नज़रअंदाज़ या प्रश्नांकित करते हैं, तब वीरेन्द्र यादव अपने गहन अध्ययन और पैनी नज़र से प्रेमचंद के साहित्य का पुनर्पाठ करके साबित कर देते हैं कि प्रेमचंद को कठघरे में खड़ा करने के लिए वास्तव में उनका कुपाठ किया जा रहा है। वे बकायदा मुठभेड़ की मुद्रा में सवाल उठाते हैं कि “अंग्रेजी औपनिवेशिक शासनकाल में राष्ट्रीय आंदोलन के प्रथम चरण के दौरान अवध के दुखी किसानों का प्रतिनिधित्व करते होरी की यंत्रणा के स्रोत कहां हैं? अंग्रेजी उपनिवेशवाद में, हिंदू धर्म की वर्णश्रमी सत्ता संरचना में, महज कर्ज की समस्या में या इनके समुच्चय में?” फिर वे ‘गोदान’ और अन्य रचनाओं से उद्धरण-दर-उद्धरण देकर यह प्रमाणित कर देते हैं कि “प्रेमचंद भारतीय किसान की यातना की जड़ें उस मनुवादी वर्णाश्रमी व्यवस्था में तलाशते हैं, जो श्रमशील दलित समुदाय की मेहनत पर परजीवी सवर्ण आभिजात्य की विलासिता का आधार तैयार करती थी।” इसलिए, यह कहना कि “होरी की गाय पालने की लालसा वास्तव में गोदान करने की लालसा थी” (निर्मल वर्मा और रुपर्ट स्नेल) या “गोदान की मुख्य समस्या ऋण की समस्या है, क्योंकि प्रेमचंद स्वयं भी कर्ज के बोझ से दबे हुए थे” (राम विलास शर्मा) ‘गोदान’ का मुकम्मल पाठ नहीं है, बल्कि जहां “राम विलास शर्मा “गोदान’ का सरलीकरण करते हैं” वहीं “निर्मल वर्मा का भाष्य प्रेमचंद की कथा दृष्टि से नि:सृत न होकर उनकी अपनी हिंदू धर्म की वर्णाश्रमी सोच का परिणाम है।” यहां यह उल्लेख भी समीचीन होगा कि वीरेंद्र जी प्रारम्भ में राम विलास शर्मा से प्रभावित थे लेकिन भारतीय सामाजिक संरचना में प्रभुत्ववादी वर्गों की अच्छी पड़ताल कर लेने के बाद वे उनके कटु आलोचक बन गए थे।
प्रेमचंद पर दलित आलोचकों की आपत्तियों को तर्कों व उद्धरणों से खारिज करते हुए वीरेंद्र जी दिखा देते हैं कि वास्तव में “प्रेमचंद दलितों के आक्रोश एवं सशक्तीकरण को मौखिक अभिव्यक्ति तक सीमित न करके इसे आक्रामक प्रतिरोध की जिस तार्किक परिणति तक ले जाते हैं, वह दलित एकजुटता व अग्रगामी चेतना में उनकी लेखकीय आस्था का परिचायक है। किसी गैर दलित लेखक द्वारा दलित आक्रोश की यह (सिलिया-मातादीन प्रसंग में दलितों द्वारा ब्राह्मण दातादीन के मुंह में हड्डी का टुकड़ा डाल देना) साहसपूर्ण अभिव्यक्ति है।” प्रेमचंद के साहित्य का जैसा मुकम्मल पाठ वीरेंद्र जी ने किया है, वैसा और किसी आलोचक के यहां नहीं दिखता। प्रेमचंद पर उन्होंने काफी लिखा भी है। वे प्रेमचंद साहित्य के वास्तविक अधिकारी विद्वान व आलोचक ठहरते हैं।
वीरेंद्र जी ‘मैला आंचल’ और ‘आधा गांव’ जैसे बहुचर्चित उपन्यासों का भी पुनर्पाठ पेश करते हैं। वे कहते हैं कि “इन सरीखे श्रेष्ठ उपन्यासों को भी अपने देशकाल में बृहत्तर सरोकारों से काटकर महज उनके रूपवादी ढांचे एवं भाषायी कौशल की आस्वादपरक बहस तक केंद्रित कर दिया गया है,” जबकि वे अपनी सम्पूर्णता में निम्नवर्गीय भारतीय ग्रामीण समाज की “चेतना के बदलाव की प्रक्रिया को उद्घाटित करते हैं।” वीरेंद्र जी ‘मैला आंचल’ और ‘आधा गांव’ के साथ ‘अलग-अलग वैतरणी’ (शिव प्रसाद सिंह), ‘डूब’ (वीरेंद्र जैन), ‘इदन्नमम्’ (मैत्रेयी पुष्पा’) व ‘मुखड़ा क्या देखे’ (अब्दुल बिस्मिल्लाह) का भी विशेष उल्लेख करते हैं। उनके अध्ययन की व्यापकता और आलोचनात्मक दृष्टि का विस्तार इतनी दूर तक जाता है कि वे ‘गोदान’ में दलित प्रसंग की विवेचना करते हुए मुल्कराज आनंद के ‘अछूत’ और ‘आधा गांव’ की विशेषताएं बताते हुए ‘आग का दरिया’ (कुर्र्तुल ऐन हैदर) की तत्सबंधी कमजोरियों के साथ ‘उदास नस्लें’ (अब्दुला हुसैन) एवं ‘छाको की वापसी’ (बदीउज्जमा) की खूबियां भी गिना जाते हैं।
वीरेंद्र जी ने आलोचकों द्वारा उपेक्षित कर दिए गए कई महत्त्वपूर्ण उपन्यासों पर विस्तार से लिखा और ‘सबाल्टर्न’ दृष्टि से उनकी व्याख्या की। जैसे, गोपाल उपाध्याय का ‘एक टुकड़ा इतिहास’, शिव पूजन सहाय का ‘देहाती दुनिया’, केदारनाथ अग्रवाल का ‘पतिया’, नागार्जुन का ‘बलचनमा’, अब्दुल बिस्मिल्लाह का ‘मुखड़ा क्या देखे’, भीमसेन त्यागी का ‘जमीन’, मंजूर एहतेशाम का ‘बशारत मंजिल’, कमलाकंत त्रिपाठी के ‘बेदखल’ व ‘पाहीघर’, जगदीश चंद्र के ‘धरती धन न अपना’ एवं ‘नरककुण्ड में वास’, हृदयेश जोशी का ‘लाल लकीर’ आदि। ऐसे कई उपन्यासों की विषय वस्तु और सामाजिकता की पड़ताल पर गहरी नजर डालकर जिम्मेदार आलोचक का दायित्व उन्होंने निभाया। एक दलित स्त्री और ब्राह्मण युवक के प्रेम, विवाह और तत्पश्चात दलित स्त्री के संघर्ष के आख्यान वाला गोपाल उपाध्याय का ‘एक टुकड़ा इतिहास’ 1975 में तब प्रकाशित हुआ था, जब दलित साहित्य या दलित विमर्श की चर्चा भी कहीं नहीं थी। वीरेंद्र जी लिखते हैं कि “प्रेमचंद ने ‘गोदान’ में सिलिया-मातादीन के दलित प्रसंग को जहां छोड़ा था, यह उसके आगे की कथायात्रा है।” बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद हिंदी में लिखे गए उपन्यासों में ‘आखिरी कलाम’ (दूधनाथ सिंह) को वे सर्वोच्च शिखर पर रखते हैं और उसे “हिंदी के वैचारिक संसार में नई पहलकदमी” बताते हैं।
दूसरी ओर, ‘कुरु कुरु स्वाहा’, ‘कसप’ (मनोहर श्याम जोशी), ‘मुझे चांद चाहिए’ (सुरेंद्र वर्मा) जैसे कुछ बहुचर्चित, पठनीय उपन्यासों को “चुस्त जुमलेबाजी, शातिर रचनात्मक खिलंदड़ेपन व विदूषकीय गाम्भीर्य” और “विपन्नता से विलास तक की कथा-यात्रा” कहकर उन्होंने खारिज किया। इस संदर्भ में उनकी गम्भीर चिंता थी कि हिंदी के कई लेखक भी अमेरिकन लेखकों या फिर शोभा डे, बलवंत गार्गी और नमिता गोखले जैसे पल्प-लेखकों से प्रभावित होकर उन्हीं का अनुसरण करने लगे हैं। उन्होंने भारतीय अंग्रेजी लेखकों के उपन्यासों पर भी व्यापक दृष्टि डाली और अरुंधती रॉय एवं सलमा रुश्दी की सार्थक सामाजिक-रचनात्मक हस्तक्षेप की प्रशंसा की है।
वीरेंद्र जी तो विनोद कुमार शुक्ल जैसे बहुपुरस्कृत-प्रशंसित विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यासों को भी अपनी धारदार आलोचना से तार-तार कर देते हैं। ‘नौकर की कमीज’, ‘खिलेगा तो देखेंगे’ और ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ के लिए वे कहते हैं कि “प्रकटत: निम्न-मध्यवर्गीय जीवन की विडम्बनाओं और विसंगतियों को अपनी कथावस्तु बनाने के बावजूद ये उपन्यास अपनी अंतिम परिणतियों में महज एक ‘कलाकारी’ बनकर रह जाते हैं।” इन उपन्यासों के बारे में प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह और विष्णु खरे की बेलाग प्रशस्तियों पर वे सवालिया निशान लगाते हैं और कहते हैं कि “राजनीति का निर्वासन और मूर्त स्थितियों का अमूर्तन ही इन उपन्यासों की वह कलात्मक उपलब्धि है, जिस पर हिंदी आलोचना के कुलीनतंत्र की सर्वसहमति है।” वीरेंद्र जी ने ‘रागदरबारी’ जैसे अत्यधिक प्रशंसित उपन्यास की कुछ बातों के लिए सराहना करने के बावजूद उसे अंतत: एक प्रहसन और “व्यंग्य-विनोद का ऐसा प्रति-संसार रचने वाला बताया, जहां दुख, करुणा, सहानुभूति और सामाजिक सरोकार दृश्य ओझल हो जाते हैं।” जैनेंद्र, अज्ञेय, और भी कई लेखकों के उपन्यास उनकी तीखी नज़र से गुजरे हैं।
वीरेंद्र जी का आलोचक मानता है कि उपन्यास मात्र शिल्प की गढ़न और कथा रचना नहीं हैं। जिस समाज में वे लिखे जा रहे हैं, उसकी सामाजिक सत्ता संरचना से वे मुक्त नहीं हो सकते। भारतीय समाज की जड़ में बैठी वर्णाश्रम व्यवस्था, प्रभुत्वशाली वर्गों के वर्चस्व और उनके दमन तंत्र, साम्प्रदायिक शक्तियों के उभार और इन सबको मिलने वाली चुनौतियों के साथ ही लेखक की पक्षधरता देखे बिना साहित्य का मूल्यांकन करना अनुचित है। उनकी आलोचना-दृष्टि इसका निरंतर निर्वाह करती है और अपने पूर्ववर्ती आलोचकों को भी इसीलिए कटघरे में खड़ा करती है।
इसीलिए वीरेंद्र यादव का लिखा हुआ बहुत महत्त्वपूर्ण है। इस चुनौतीपूर्ण समय में वे अत्यंत आवश्यक स्वर थे। उनकी अभी बहुत जरूरत थी।
-नवीन जोशी
'सब लोग' पत्रिका (सम्पादक-किशन कालजयी) के मई 2026 अंक में प्रकाशित


