Tuesday, August 25, 2026

'पुष्कर-कविता में विछोह नहीं, प्रेम की सार्थकता है'

प्रिय भाई नवीन,

बड़ी मुश्किल से जुटा पाया हूं अपने को यह पत्र लिखने के लिए। चाहता तो तुमसे मिलकर 'बहुत अच्छा, बहुत अच्छा'


करके तुम्हारे 'दावानल' की औपचारिक प्रशंसा कर सकता था। मगर उससे मन कहां मानता। उपन्यास मुझसे कम पढ़े जाते हैं। कुछ कहानी-कविता पढ़ता भी हूं तो ज़्यादा याद नहीं रख पाता। मौके पर तो बिल्कुल नहीं। तुम्हारी कुछ कहानियां भी पढ़ीं। मंचन करने का तत्काल मन भी किया मगर फिर वही पहाड़ियों की मारगांठ वाली स्थिति। खैर...। 

'दावानल' पढ़कर दरअसल में बहुत भावुक हो गया। सोचा इस गीली स्थिति में कुछ बोल-लिख न पाऊंगा। फिर रख दिया। कुछ दिन लग गए। कुछ उबरा तो लगा, ये इतना आसान नहीं है। उपन्यास के खास तौर पर नहर दफ्तर, हुसेनगंज के दृश्य, लोग, उनके रेखाचित्र जाने-पहचाने लगे। अच्छा लगा। पहली बार पढ़ते समय जो-जो मन जुड़ा गया, वो नोट कर लेता तो अच्छा था। अब वही याद है जो नहीं भूल पाता। 

यद्यपि उपन्यास में वन आंदोलनों पर तुम्हारी व्याख्या, विवरण, इतिहास और समीक्षा अद्भुत, जानकारीपूर्ण और मन में गुस्सा उपजाने वाले हैं, मगर छपछपी पड़ी ईजा व बाबू वाले प्रसंगों पर। तुम्हारी निस्संग स्वभाव की भावुकता इसीलिए रुलाती है कि यहीं अब तक पहाड़ी लड़के (भले ही वे अधेड़ या वृद्ध हो गए हों) स्वयं को आडेंटीफाई करते हैं। 


हमारी और हमारे कुछ बाद की पीढ़ी के ईजा-बाबू लगता है एक ही घराने के होते थे। उनके कष्ट, भले ही उन्होंने शहर में सहे हों, होते पहाड़ के ही थे। बहुत रुलाई आई यार खास तौर पर उनके तर्पण प्रसंगों में। जाने क्यों, अगर ये बुराई हो तो हो मगर, वन आंदोलन के प्रकरणों उतना नहीं झकझोरा, जितना ईजा-बाबू या इनसे मिलते-जुलते प्रसंगों ने, जैसे कि बाघ वाला प्रसंग।

हां, एक बात और जुड़ा गई। पुष्कर और कविता के सम्बंध। यहां तुम गज़ब के हो गए। न केवल शरतचंद्रीय गलदश्रु भावुकता से भी और अज्ञेय की क्रांतिकारिता से  भी (बचा ले गए)। ऐसी आदर्श स्थिति रची कि मैं भी फेल हो गया। पुष्कर-कविता में तुमने विछोह नहीं, प्रेम की सार्थकता रची है। ये मेरा पहले पढ़ा हुआ नहीं है। एक मेच्योर विचारक की छवि बनाई तुमने। यद्यपि चेहरे से तुम किशोर पुष्कर ही लगते हो। वर्षों पहले मेरे देखे, हुसेनगंज वाले। 

सबसे बड़ी बात तो ये कि उपन्यास पढ़कर मुझे अपना अब तक का किया पूरा फरमाइशी लेखन और ओढ़ा हुआ रंगमंच अचानक बहुत सतही लगने लगता है। तुमने वाकई हम सब जैसे मीडियाकरों पर लोहार की चोट की है। ये हुआ संगठित सोच, खूब छना हुआ विचार, खूब खंगाली हुई दृष्टि और मेच्योर लेखन। 

'दावानल' में उसका अपना स्वभाव व प्रकृति है। चूंकि तुम्हारा लेखन प्राकृतिक है, इसलिए मौलिक है। ऐसा नहीं कि वन आंदोलन वाले प्रसंगों ने मुझे खदबदाया नहीं, गुस्सा भी आया मगर एक रूपवादी-कलावादी होने के कारण मुझे भावुकता ही अधिक सुरक्षा देती है। शायद पहाड़ियों की दुखती रग यही है।

उपन्यास का कैनवस काफी बड़ा था मगर तुम कुशल चित्रकार निकले। कहीं अनावश्यक स्ट्रोक नहीं। सभी रंग संतुलित। मुझे नहीं पता, उत्तराखण्ड में उपन्यास को क्या प्रतिक्रिया मिली। क्या इसे बहुगुणा जी-भट्ट जी ने पढ़ा होगा? न हो तो पढ़ाओ। गिर्दा से तुम्हारा दीर्घजीवी जुड़ान पहले पता नहीं था।

'दावानल' से उठे प्रश्न क्या उत्तराखण्ड बनने के बाद उतने पैने रह गए हैं या नहीं? क्या अलग राज्य बनने के बाद 'दावानल' के आरोपों का कोई मतलब नहीं रहा? 'नैनीताल समाचार' अभी भी पुष्कर निकाल रहा है क्या? 

कहना बहुत था। 'दावानल' फिर से पढ़कर कह पाऊंगा।

नवीन, हुसेनगंज से गोमती नगर तक तुमने बहुत सार्थक रचनात्मक सृजनशील यात्रा तय की है। ऐसी तप:पूत साधना कभी समाप्त नहीं होती। बहुत-बहुत बधाई और आशीर्वाद। * 

तुम्हारा- उर्मिल कुमार थपलियाल  

* बहुत आश्चर्य होता है तुम्हारी रिसर्च और वन आंदोलनों की संदर्भ सामग्री जुटाने पर्। इस रूप में मुझे तुम शेखर पाठक से दिखे। तथ्यगत उपन्यास तो डॉक्यूमेण्ट्री लगने लगते हैं। पहाड़ की स्थिति तुमने दलित आत्म कथाओं की तरह महिमावर्णन करते हुए नहीं लिखी। तुम्हारी भाषा में चेग्वेरा और वामपंथियों की ललित ललकार नहीं है। भाषा की पहुंच सरलता-तरलता और सहज सम्प्रेषण से आती है। यह सिद्ध हुआ।

वाकई नैनीताल में रहने से कुमाऊं औरमेरी तरह देहरादून में रहने से गढ़वाल नहीं जाना जा सकता। पता नहीं तुम्हें पढ-अने के बाद मैं जिस हीनभावना से गुजरा हूं, वहां से कब उबर पाऊंगा। शायद वो सभी पहाड़ी जो तुम्हारी तरह का गम्भीर और सार्थक काम नहीं कर पा रहे हैं।   

इस पत्र को पुराना पोस्टकार्ड ही समझना, क्योंकि लिखना ख्तम करते ही और कुछ लिखना याद आने लगता है। जहां तक कागज हो, वहां तक। बिखराव इसी को कहते हैं।  

(प्रसिद्ध रंगकर्मी उर्मिल कुमार थपलियाल ने मेरा उपन्यास 'दावानल' पढ़कर यह पत्र मुझे 20 मई 2008 को लिखा था और फिर खुद ही चलकर मुजेह देने आए थे। आज पुराने कागजों में मिला तो यहां लगा दे रहा हूं ताकि सनद रहे- न जो

  

Sunday, August 23, 2026

स्कूलों की दशा छुपाने से नहीं सुधरेगी

सरकारी स्कूलों की दशा छुपाने से नहीं सुधरेगी। सरकार को चाहिए कि वह सबको बुलाए, कहे कि देखिए, हम ऐसे चला रहे हैं स्कूलों को। कोई कमी दिखे, कुछ सुझाव हों तो सहर्ष दीजिए। हम उन्हें लागू करेंगे।

लेकिन सरकार क्या कर रही है? उसने स्कूलों में बाहरी लोगों के आने पर रोक लगा दी है। खबरदार, कोई पत्रकार, कोई विपक्षी स्कूलों में कुछ देखने न पाए।

इसका सीधा अर्थ ही यह है कि स्कूलों में भारी गड़बड़ है और सरकार उसे ठीक करने की बजाय छुपाना चाहती है। 

बड़ी खामियां न होतीं तो प्रदेश भर में (और कई अन्य राज्यों में भी) बच्चे आंदोलन करने पर क्यों आमादा होते? पिछले चंद दिनों में लखनऊ, कन्नौज, फतेहपुर, महोबा, उन्नाव, आजमगढ़, हमीरपुर समेत कई स्कूलों के बच्चों ने सड़क पर उतरकर प्रदर्शन किए, अधिकारियों का घेराव किया, गुस्से में नारे लगाए। 

क्या मांग रहे हैं बच्चे? पढ़ाने के लिए पर्याप्त शिक्षक हों, पीने का पानी मिल जाए, शौचालय हो और लड़कियों के लिए तो अवश्य हो, मध्याह्न भोजन मानक के अनुसार मिले, स्कूल भवन इतना जर्जर न हो कि छत ही सिर पर गिर पड़े, स्कूल जाने का रास्ता ठीक-ठाक हो और पढ़ाई की बेहतर व्यवस्था हो। 

क्या सरकार सच में कह सकती है कि हमारे स्कूलों में यह सब है?  

स्कूलों की यह दुर्दशा नई नहीं है। अक्सर खबरें आती रही हैं कि स्कूल की इमारत ढह गई, स्कूल के कमरों में भैंसों का तबेला है, मास्टर नहीं हैं, रास्ते में कीचड़-कीचड़ है, मध्याह्न भोजन में कीड़े हैं और दाल में ढेर पानी है, लड़कियां शौचालय न होने से स्कूल छोड़ रही हैं, वगैरह। 

इन खबरों का संज्ञान लेकर स्कूल सुधारे गए होते तो बच्चे क्यों विरोध प्रदर्शन करते? बच्चे पहले भी चुपचाप शिकायत करते थे। कुछ शिक्षक भी बदहाली गिना देते थे। पहले वे अपना अधिकार मांगने से डरते थे। जंतर-मंतर पर विद्यार्थियों के प्रदर्शन ने डर खत्म कर दिया है। अब प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों के बच्चे भी सड़क पर आ रहे हैं। 

क्राक्रोच जनता पार्टी और कुछ यूट्यूब वाले भी स्कूलों की बदहाली देखने निकल पड़े हैं। वे स्कूलों में जाकर उनकी खस्ताहाली सामने लाना चाहते हैं। सरकार पोल खुलने से डर गई है। वह मामला छुपाए रखना चाहती है। ठीक करना चाहती तो उन्हें क्यों रोकती?

वैसे भी, सरकारों ने (इसमें पिछली सरकारें भी शामिल हैं) सरकारी स्कूलों को दीन-हीन बच्चों के लिए बेसहारा छोड़ रखा है। जिनके पास थोड़ा भी पैसा है, उनके लिए शिक्षा की दुकानों के रूप में निजी स्कूल खूब खोल दिए हैं। लोग जमीन बेचकर, कर्ज़ा लेकर भी बच्चों को शिक्षा खरीदने के लिए भेजने को मजबूर हैं। वही आगे बढ़ने का रास्ता दिखाई देता है। 

किंतु, जो बहुत गरीब हैं, महंगी शिक्षा नहीं खरीद सकते, वे सरकारी स्कूलों में अपने बच्चों को भेजते हैं। ऐसे लोगों की अभी बहुत बड़ी संख्या है। 

ये गरीब सरकारों की चिंता में शामिल नहीं हैं। इसीलिए सरकारी स्कूल सबसे उपेक्षित हैं। वैसे भी उन्हें धीरे-धीरे बंद किया जा रहा है। बहाना यह है कि सरकारी स्कूलों में बच्चे कम होते जा रहे हैं। अरे, स्कूल और पढ़ाई बदहाल बना दी है आपने। इसलिए बच्चे कम होते जा रहे हैं। 

स्कूलों में शिक्षकों की भर्ती नहीं की जा रही । जो शिक्षक हैं भी, उन्हें पढ़ाने के अलावा बहुत सारे दूसरे कामों में लगा दिया जाता है। मतदाता सूची, मतदान, जनगणना, तरह-तरह के सत्यापन, जाने क्या-क्या काम उनसे लिए जाते हैं।

यह सरकार वैसे भी जनता को शिक्षित नहीं बनाना चाहती। इसका जोर धर्मांधता पर अधिक है। शिक्षित जनता सवाल करती है, अपने अधिकारों की बात करती है और सरकार यही नहीं होने देना चाहती। 

बहरहाल, सरकारी स्कूलों को वास्तव में दुरस्त करने की नीयत हो तो उन्हें पर्याप्त बजट, शिक्षक, संसाधन और सुविधाएं देनी चाहिए। फिर, नेताओं और आला अफसरों के बच्चों के सबसे पहले इन स्कूलों में भर्ती किया जाना चाहिए। जिस दिन प्रभुत्व वर्ग के बच्चे इन स्कूलों में पढ़ने जाने लगेंगे, उसी दिन पूरी शिक्षा व्यवस्था का कायाकल्प हो जाएगा। 

सरकार ऐसा नहीं करेगी क्योंकि इससे शिक्षा की बड़ी-बड़ी दुकानें बंद हो जाएंगी। वह ऐसा कभी नहीं चाहती। 

सरकार 'बाहरी' लोगों को सरकारी स्कूलों में जाने से रोक लेगी। उसके पास ताकत है लेकिन बच्चों को आंदोलन करने से वह कैसे रोक पाएगी?  

ध्यान रहे, एक दिन ये बच्चे यह सवाल भी जरूर पूछेंगे कि किसी मंत्री-एमपी-एमएलए और सचिव-डीएम के बच्चे हमारे साथ पढ़ने क्यों नहीं आते। 

-न जो, 24 अगस्त 2026, लखनऊ  

  

Friday, August 21, 2026

गिर्दा के खिलाफ गिर्दा?

आप गिर्दा को याद करते हो, खूब याद करते हो। 22 अगस्त को तो अवश्य ही याद करते हो। बहुत अच्छी बात है। लेकिन गिर्दा को इतना याद क्यों करते हो? 

गिर्दा को याद करने का आपके लिए क्या मतलब है? 

क्या उस गिर्दा को याद करते हो, जो हाड़-मांस का पुतला था? या, उस गिर्दा को याद करते हो जो अपने विचारों-गीतों-आंदोलनों में था और आज भी मौजूद है?

गिर्दा लिखता-गाता था- 'कैसा हो स्कूल हमारा/ जहां प्रश्न हल तक पहुंचाएं, ऐसा हो स्कूल हमारा/ जहां किताबें निर्भय बोलें, ऐसा हो स्कूल हमारा...।' 

क्या आप हमारी सड़ी-गली शिक्षा व्यवस्था को आमूल बदलने की मांग का समर्थन करते हो या खाली गिर्दा को याद करने की रस्म निभाते हो? क्या आप इस देश के परेशान हाल बच्चों के साथ हो या उनका बर्बर दमन करने वाली सरकार के साथ खड़े रहते हो? आपके लिए गिर्दा को याद करने के मायने क्या हैं? 

गिर्दा ने सवाल पूछा था- 'सारा पानी चूस रहे हो, नदी समंदर लूट रहे हो/ गंगा-यमुना की छाती पर कंकड़-पत्थर कूट रहे हो/ लेकिन जिस दिन डोलेगी यह धरती, बोल ब्योपारी तब क्या होगा?'

आप नदी-पहाड़-जंगल-जमीन लूटने वालों 'ब्योपारियों' के विरोध में खड़े हो या उनके बगलगीर हो और तालियां बजा रहे हो? आप खाली गिर्दा की तस्वीर पर फूल चढ़ा रहे हो या उसके विचार का मान रख रहे हो?

'सावनी सांझ आकाश खुला है, ओ हो रे, द दिगौ लाली' या ' हुलरी ऐगे ब्याल' आदि गिर्दा के गीतों के सौंदर्य बोध में ही डूबे रहते हो या उस सौंदर्य बोध की जड़ में जाते हो? 'हम लड़ते रयां भुला, हम लड़ते रूंलो' की उसकी पुकार भी सुनते हो?  गाने में तो बहुत मजा ले रहे हो लेकिन किस मोर्चे पर लड़ रहे हो, पूछो तो अपने आप से!

'पानी बिच मीन पियासी, खेतों में भूख उदासी/ ये उलटबांसियां नहीं कबीरा/ खालिस चाल सियासी' कहा था गिर्दा ने। सियासी चालों को समझते हो या उन्हीं के बहकावे में आते हो? कहीं ऐसा तो नहीं कि उन्हीं सियासी चालों को चलने में खुद भी शामिल हो? 

ऐसा क्यों है कि आप गिर्दा को भी गाते हो और उत्तराखण्ड या देश को बर्बाद करने वालों के साथ प्रस्न्न मुद्रा में फोटो खिंचवाते हो और उन्हीं के  रंग में रंगे रहते हो?

गिर्दा का सपना था- 'कस होलो उत्तराखण्ड, कास हमारा नेता/ जड़ कंजड़ि उखेलि भली कै, पुरि बहस करूंलो?' यह सपना याद है या भूल गए हो?  

उत्तराखण्ड में क्या हो रहा है, कौन मचाए हुए है खुली लूट, क्या सपना था उत्तराखण्ड का, इस पर कभी बात-बहस करते हो? थोड़ी-बहुत चिंता भी होती है या जो गिर्दा की चिंता में शामिल हैं, उनको देशद्रोही बताने में ही अपनी ऊर्जा लगा देते हो? 

गिर्दा ने 'अंधायुग', ;अंधेर नगरी', 'थैंक्यू मिस्टर ग्लाड' जैसे नाटक  खेलकर और 'नगाड़े खामोश हैं' एवं 'धनुष यज्ञ' जैसे नाटक लिख व मंचित कर सचेत नहीं किया था क्या? उसकी चेतावनी सुनते-समझते हो या खाली यूट्यूब पर गिर्दा-गिर्दा सुनाते हो? 

गज़ब ही कर देते हो आप जब जोर-जोर से गाते हो- 'जैंता एक दिन तो आलो उ दिन यो दुनी में/ जै दिन चोर नी फलाला, कै कै जोर नी चललो...।' लेकिन आप तालियां बजा-बजा कर गिर्दा के केवल शब्द गा रहे हो या 'उस दिन' को लाने के लिए वास्तव में कुछ जतन भी कर रहे हो? 

गिर्दा की ही तर्ज़ पर मैं पूछना चाहता हूं,  'जब मेरे देश में पेड़ पेड़ों के खिलाफ, पानी पानी के खिलाफ और पहाड़ पहाड़ों के खिलाफ पेश किए जा रहे हैं', तो कहीं ऐसा तो नहीं कि सिर्फ गा-गाकर आप गिर्दा को गिर्दा के ही खिलाफ खड़ा कर दे रहे हो?   

कहीं इसीलिए तो उत्तराखण्ड सरकार भी गिर्दा के नाम पर पुरस्कार नहीं देने लगी है? क्या यह सरकार गिर्दा के विचारों का सम्मान करती है या आपकी तरह उसे उसी के विरुद्ध खड़ा कर रही है?

गिर्दा के गीत गाने और फोटो पर माला चढ़ाने से फुर्सत मिले तो इन सवालों पर भी तनिक विचार कर लेना और याद रखना, गिर्दा सब समझता था-

'बेच खाया है मुझे कितना, किसे बेचा है

बात ये दिल में लाओ तो कोई बात करें।' 

- नवीन जोशी, 22 अगस्त 2026, लखनऊ        

  

  

Wednesday, August 19, 2026

माननीयों के खिलाफ मुकदमे लटके ही रहते हैं!

हमारे वर्तमान और पूर्व सांसदों-विधायकों के खिलाफ, जिनमें कुछ मुख्यमंत्री भी शामिल हैं, 4192 मुकदमे अदालतों में लम्बे समय से लम्बित हैं। उनमें सुनवाई ही नहीं हो रही।  

519 मुकदमे दस साल से अधिक समय से लम्बित हैं, जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने जनप्रतिनिधियों के खिलाफ दर्ज़ मुकदमों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतें बना रखी हैं। समय-समय पर शीघ्र सुनवाई करने के लिए वह निर्देश भी जारी करता है। 

सर्वोच्च न्यायालय ने इससे सम्बद्ध एक जनहित याचिका में वरिष्ठ अधिवकता विजय हंसारिया कि 'एमिकस क्यूरी' अर्थात 'न्यायालय का मित्र' बना रखा है। सुप्रीम कोर्ट में पेश उन्हीं की एक रिपोर्ट में ये तथ्य सामने आए हैं। कुछ मुकदमों में मामले की तह तक जाने के लिए अदालतें 'एमिकस क्यूरी' की तैनाती करती हैं।  

श्री हंसारिया की रिपोर्ट के कुछ अंश अखबारों में प्रकाशित हुए हैं। इनके अनुसार जनप्रतिनिधियों के विरुद्ध 700 अन्य मामलों में जांच ही अटकी हुई है। 360 मामलों में तीन साल से ऊपर हो गए, आरोप पत्र तक अदालत में पेश नहीं किए गए हैं।  

रिपोर्ट बताती है कि माननीयों के खिलाफ लम्बित मुकदमों की यह संख्या (4192) उच्च न्यायालयों से मिली सूचना या उनकी वेबसाइटों से निकाली गई है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एमिकस क्यूरी को नेताओं के खिलाफ लम्बित मुकदमों की संख्या नहीं बताई। उसकी वेबसाइट में 2024 में यह संख्या 1171 बताई गई थी, जो देश भर में सबसे अधिक है। 

इस रिपोर्ट के अनुसार 28 राज्यों में से 14 के मुख्यमंत्रियों के विरुद्ध आपराधिक मुकदमे दर्ज़ हैं। तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी  के विरुद्ध सबसे अधिक 89 मुकदमे लम्बित हैं। उसके बाद बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेन्दु अधिकारी के खिलाफ 29, कर्नाटक के सी एम डी के शिवकुमार एवं आंध्र के सी एम चंद्रबाबू नायडू के विरुद्ध 19-19 और केरलम के सी एम सतीशन के खिलाफ 18 मुकदमे लम्बित हैं। 

मुकदमे तो यू पी के सी एम आदित्यनाथ योगी के खिलाफ भी थे लेकिन उन्होंने सत्ता में आने के बाद वे मुकदमे आदलत से वापस करवा लिए।  

माननीयों के विरुद्ध 4192 मुकदमों में से 754 मामले पांच से लेकर दस साल से लम्बित हैं। 562 मुकदमे तीन साल से अधिक और 1095 मुकदमे तीन साल से कम समय से अदालतों में अटके हैं।  

सबसे अधिक 1171 मुकदमे उत्तर प्रदेश में लटके हैं। उसके बाद केरलम (543), बिहार (373), महाराष्ट्र (364) और उड़ीसा (330) का नम्बर आता है। 

सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में 10 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में जनप्रतिनिधियों के खिलाफ लम्बित आपराधिक मुकदमों की शीघ्र सुनवाई के लिए 12 विशेष अदालतें बनाने का आदेश दिया था। 2018 में उसने निर्देश दिया था कि हर जिले में एक सेशन अदालत और एक मजिस्ट्रेट कोर्ट सिर्फ इन्हीं मुकदमों की सुनवाई के लिए तय किए जाएं ताकि मामलों का निपटारा प्राथमिकता से हो। 

नवम्बर 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाई कोर्टों को आदेश दिया था कि ऐसे मामलों के शीघ्र निपटारे के लिए स्वत: संज्ञान लें और त्वरित सुनवाई के लिए विशेष पीठों को अधिकृत करें।  

एक पूर्व न्यायालय मित्र ने जब अपनी रिपोर्ट में बताया था कि अधिकतर हाई कोर्टों में ऐसे मुकदमों की निगरानी की कोई प्रभावी व्यवस्था ही नहीं है तो यह मामला फरवरी 2025 में सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ को सौंपा गया। 

एमिकस क्यूरी की ताज़ा रिपोर्ट कहती है कि सुप्रीम कोर्टों के निर्देशों के बावजूद जनप्रतिनिधियों के खिलाफ लम्बित मुकदमे कम नहीं हुए हैं। 

श्री हंसारिया ने सुप्रीम कोर्ट से यह सिफारिश की है कि जनप्रतिनिधियों के विरुद्ध लम्बित मामलों को जल्द निपटाने के लिए डिजिग्नेटेड कोर्ट बनें यानी ऐसे कोर्ट जो इस केवल इन्हीं मुकदमों को सुनें और फैसला करें, तीन साल से अधिक समय से लम्बित मुकदमों की सुनवाई रोज हो और जो माननीय लगातार दो तारीखों में अदालत में पेश न हों, उनके विरुद्ध गैर जमानती वारण्ट जारी किए जाएं। 

यह भी सिफारिश की गई है कि जनप्रतिनिधियों के खिलाफ आरोप अप्त्र दाखित कर दिए जाने के बाद एक साल में सुनवाई पूरी हो जाए और उसकी मासिक निगरानी हो। 

- न. जो. 20 अगस्त 2026

(अखबारों में प्रकाशित रिपोर्टों के आधार पर)  

Monday, August 17, 2026

क्यों और कैसे आपकी पोस्ट सोशल मीडिया से गायब हुई

सोशल मीडिया पर भारत सरकार किस प्रकार शिकंजा कसे हुए है, इसके विवरण चौंकाने वाले हैं। 

वर्ष 2026 में मार्च से जुलाई तक सरकार ने फेसबुक, यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर पोस्ट/रील वगैरह ब्लॉक करने के 1,95, 000 (एक लाख पचानब्बे हजार) आदेश जारी किए। इसी बीच जंतर मंतर पर जेन जी का आंदोलन चरम पर था। 

यूं समझिए कि प्रत्येक 68 सेकेंड पर एक आदेश जारी हुआ। रोजाना का औसत बैठता है- 1275 आदेश।

और, एक आदेश से एक बार में सैकड़ों व्यक्तियों यानी यूजर्स की पोस्ट/ रीलें हटवाई गईं। 

ये आदेश मुख्यत: गृह मंत्रालय से आए। कानून है कि आदेश जारी होने के तीन घण्टे के भीतर सामग्री ब्लॉक हो जानी चाहिए। ये कम्पनियां तीन घण्टे क्या, आदेश जारी होते ही स्वत: सामग्री ब्लॉक कर देती हैं। 

इस वर्ष की तुलना में पिछले वर्ष 2025 में ऐसे आदेश काफी कम थे। अक्टूबर 2024 से अक्टूबर 2025 के बीच मात्र छह आदेश प्रतिमास जारी किए गए थे। Indian Express ने आज यानी 18 अगस्त 2026 के अखबार में सूचना के अधिकार से प्राप्त जानकारियों के आधार पर इसकी विस्तार से खबर छापी है।

इस खबर में बताए गए तथ्य सरकार के भय, उसकी सेंसरशिप और उसके अहंकार को स्पष्ट करते हैं। एक उच्चाधिकारी ने बताया कि जैसे-जैसे विद्यार्थियों का आंदोलन व्यापक होता गया, वैसे-वैसे पोस्ट ब्लॉक करने के आदेश बढ़ते गए।

मार्च से जुलाई के पांच महीनों में सबसे अधिक 1,00,000 (एक लाख) आदेश इंस्टाग्राम पर रील/पोस्ट ब्लॉक करने के लिए जारी किए गए।  फेसबुक को 80,000 (अस्सी हजार) और यूट्यूब को करीब 15 हजार आदेश दिए गए। 

सोशल मीडिया पर जिस सामग्री को ब्लॉक करने को कहा गया (आई टी कानून की धारा 79-3-बी के आधार पर) , उनमें मुख्य रूप से जेन जी आंदोलन, सरकार की आलोचना, पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथनॉल मिलाने की निंदा और पश्चिम बंगाल चुनाव से सम्बद्ध सामग्री रही। राष्ट्रीय सुरक्षा और कानून व्यवस्था को कारण बताकर पोस्ट ब्लॉक करने वाले आदेश (आई टी एक्ट की धारा 69-ए) इसमें शामिल नहीं हैं। 

गृह मंत्रालय का एक पोर्टल है 'सहयोग' नाम से। इसी पोर्टल पर ये आदेश जारी होते हैं। यह पोर्टल इसी उद्देश्य से बनाया गया है, जिस पर केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालय/विभाग सोशल मीडिया पर पोस्ट की गई सामग्री को ब्लॉक करने के आदेश जारी करते हैं। सोशल मीडिया कम्पनियां इस पोर्टल से जुड़ी हुई हैं। 

कायदे से इन सोशल साइटों के स्वामित्व वाली कम्पनियों (फेसबुक और इंस्टाग्राम का स्वामित्व मेटा का है और यूट्यूब गूगल का) को सरकार के आदेशों की समीक्षा करनी चाहिए कि किस आधार पर सामग्री ब्लॉक करने को कहा गया है, वह कितना उचित या अनुचित है, उसे अपना पक्ष रखना चाहिए, लेकिन ये ऐसा नहीं करते। 

मेटा भारत में यूजर्स को बताता भी नहीं है कि उनकी सामग्री सरकार के आदेश से ब्लॉक कर दी गई है। दूसरे देशों में वह यूजर्स को बता देता है। 

मेटा ने सहयोग पोर्टल  के साथ ऐसी तकनीकी व्यवस्था कर ली है कि आदेश जारी होते ही उस पर अपने आप अमल हो जाता है। उस पर मेटा का कोई अधिकारी विचार करना तो दूर, उसे देखता भी नहीं। आदेश जारी होते ही सामग्री स्वत: ब्लॉक हो जाती हैं। 

भारत के अलावा दूसरे देशों में मेटा ऐसा नहीं करता। उसके अधिकारी वहां सरकार के आदेशों पर विचार करते हैं, सरकार को अपने तर्क पेश करते हैं और संतुष्ट होने पर ही पोस्ट ब्लॉक करते हैं। 

भारत के आई टी कानून में ऐसी कोई बंदिश नहीं है कि सरकार का आदेश आते ही सामग्री तत्काल ब्लॉक कर दी जाए। मेटा के अधिकारी भारत सरकार का आदेश आंख मूदकर मान लेते हैं। शायद उससे कोई तर्क-वितर्क करना नहीं चाहते। 

भारत में 60 करोड़ लोग सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रहे हैं। ये लोग करीब 10 करोड़ पोस्ट/रील रोजाना डालते हैं। इस तरह भारत सोशल मीडिया कम्पनियों के लिए सबसे बड़ा, अत्यंत विशाल बाजार है। यहां वह सरकार से कोई पंगा क्यों लेना चाहेगा? 

आपको याद होगा कि हाल ही में मेटा के मालिक मार्क ज़ुकरबर्ग को भारत सरकार ने तलब किया था। वे दिल्ली आकर उच्चाधिकारियों के सामने पेश हुए थे। 

- नवीन जोशी, 18 अगस्त 2026  

 

 

 

  

Saturday, August 15, 2026

कबिरा सोई पीर है- हमारे समाज का आईना

सघन संवेदनाओं और सामाजिक-राजनैतिक चेतना से सम्पन्न प्रतिभा कटियार कविताओं के अलावा कहानियां भी लिखती रही हैं। रूसी कवि मारीना त्स्वेतायेवा की जीवनी 'मारीना' में कविता एवं कवि-मन की उनकी समझ के साथ उनके गद्य ने भी ध्यान खींचा था। पिछले वर्ष प्रकाशित उनका पहला उपन्यास 'कबिरा सोई पीर है' भी प्रकाशन के बाद से चर्चा में है। 

भारतीय समाज में गहरे पैठी वर्णाश्रमी संरचना और उससे उपजी मारक स्थितियां एवं अंतर्विरोध इस उपन्यास का केंद्रीय विषय हैं। घर-परिवार और समाज में स्त्रियों की स्थिति, पुरुष सत्ता द्वारा उनका दमन और क्रमश: उभरती स्त्री चेतना केंद्रीय विषय में गुंथे हुए हैं। प्रेम उनका प्रिय विषय है, इसलिए प्रेम कथा में इस सबको खूबसूरती से  पिरोया गया है।

प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी कराने वाले एक कोचिंग संस्थान से कथा शुरू होती है। शुरूआती पृष्ठों में ही 'साला चमार कहीं का। आकर बैठ गया है सर पर', 'ब्राह्मण होकर आरक्षण का पक्ष ले रहा है तू? एक दिन यही आरक्षण तेरे सामने खड़ा होगा भूत की तरह', और 'मैं हर लड़की के, हर स्त्री के सम्मान के लिए लड़ता हूं, लड़ूंगा' जैसे वाक्यों से पाठक का सामना होता है और संकेत मिल जाता है कि यह कैसी लड़ाई का मैदान है। 


समवय लड़के-लड़कियों में निश्छल दोस्ती, प्रेम, ईर्ष्या, झगड़े सब स्वाभाविक हैं। गरीब परिवारों में कोचिंग जाते बच्चे बेहतर भविष्य का सपना हैं। सपनों के अलग-अलग धरातल हैं। कोई परिवार ब्राह्मण है और कोई दलित। गरीबी बराबरी का मंच नहीं है। जाति की ऊंच-नीच उसे घोर असमान बनाती है।  

प्रेम ऐसे बंधन नहीं देखता। वह असमान मंच पर पेंगें मारता झूलता रहता है। शुरू-शुरू में जो झटके आसानी से झेल जाता है प्रेम, वही खुरदुरी जमीन पर पैर रखते ही कभी जातीय ठोकर खाता है और कभी पुरुष के दम्भ की। कोचिंग सेंटर से शुरू हुआ दलित तृप्ति और ब्राह्मण अभुनव का प्रेम इसी नियति को प्राप्त होता है। 'हर लड़की का सम्मान करता हूं' कहने वाला अनुभव अपने भीतर भरे पाखण्ड को स्वीकार तो करता है लेकिन पितृसत्ता का चोला नहीं फेंक पाता। उसका प्रेम इसी बात से सूख जाता है कि तृप्ति आईएएस परीक्षा में पास हो गई लेकिन वह रह गया। 

कथा सुखांत नहीं है लेकिन प्रेम में अपने प्रेमी से अधिक एक पुरुष से छली गई तृप्ति स्वाभिमान के मोर्चे पर मजबूत होती है। तमाम जिल्लत से मुक्त होने के लिए उसके पिता ने आत्महत्या का जो रास्ता चुना, वह तृप्ति का भी रास्ता बंद कर गया था लेकिन तृप्ति फिर खड़ी होती है। उसका फिर से संकल्पबद्ध होना, अफसर बन गए अनुभव के साथ संयोगवश हो गई भेंट के प्रतिरोध में ही जैसे सम्भव होता है। पुरुष दम्भ से वह ताकत ग्रहण करती है और आंसू पोछकर अगले समर के लिए कमर कसती है। यह उपन्यास का सबसे मजबूत पक्ष है।

कथा तृप्ति और अनुभव के प्रेम के इर्द-गिर्द एकरेखीय नहीं रहती। तृप्ति की बहन सीमा के वैवाहिक जीवन की भयावह स्थितियां स्त्रियों के व्यापक दर्द को स्वर देती हैं, जिसमें पत्नी से बलात्कार का विमर्श भी शामिल है। उसके भाई अंशुल की कहानी और अनुभव के पिता के दफ्तर के हालात जातीय नफरत और राजनीति के विरोधाभासों की पोल खोलते हैं। सुधांशु और कनिका का प्रेम और पारिवारिक द्वंद्व भी हमारे ही समाज का आईना है। इस तरह उपन्यास व्यापक संदर्भ और फलक ग्रहण करता है। 

प्रतिभा का कवि पूरे उपन्यास पर छाया हुआ है- बीच-बीच में प्रयुक्त किए गए कवितांश, अध्यायों के शीर्षक और प्रत्येक किस्से की शुरूआत और अंत में दी गई शायरी इसका प्रमाण है। भाषा जरूर 'थोड़ा सा रोमानी हो जाएं' वाली छूट लेती है, जिसमें पहाड़ और नदी को भी साथ ले लिया गया है।   

बढ़िया उपन्यास है और खूब पठनीय। प्रतिभा से भविष्य में और अच्छे उपन्यासों की उम्मीद बंधती है।  

-नवीन जोशी, 15 अगस्त 2026, लखनऊ।

(उपन्यास- कबिरा सोई पीर है',  रचना- प्रतिभा कटियार, प्रकाशक- लोकभारती, प्रयागराज।)

 

Friday, August 14, 2026

'आज रच्यो है बसंत निजाम घर'- हमारी हिंदुस्तानियत की खुशबू

सन 1980 की बात है या उसके एक-दो वर्ष पहले की, 'लखनऊ महोत्सव' की एक शाम सांस्कृतिक पण्डाल के मंच पर मलिका पुखराज उपस्थित थीं। उन दिनों वे अपनी बेटी ताहिरा और दामाद (नाम याद नहीं) के साथ पाकिस्तान से भारत के दौरे पर आई थीं। ऐसा भी याद पड़ता है कि शायद भारत सरकार ने उन्हें किसी सम्मान-पुरस्कार के लिए आमंत्रित किया था। 

उन वर्षों में सरकारी आयोजन होने के बावजूद 'लखनऊ महोत्सव' बड़ी गरिमामय हुआ करता था। विशेष रूप से उसकी सांस्कृतिक संध्याओं में देश-विदेश के नामचीन कलाकार/संस्थाएं अपनी सर्वोत्तम प्रस्तुतियों से हमें चमत्कृत कर दिया करते थे। 

तो, पाकिस्तान के राजनीतिक घटनाक्रमों पर प्रच्छन्न चुटीली टिप्पणियों के साथ अपने दामाद के संचालन में उस शाम मलिका पुखराज  व ताहिरा ने कुछ बेहतरीन नगमे (अभी तो मैं जवान हूं, वगैरह) सुनाने के बाद अंत में वह गीत सुनाया जो उनकी पुरकशिश आवाज़ में आज भी कहीं सुनने को मिल जाता है तो जेठ की धूप वासंती हो जाती है- 'लो फिर बसंत आई, फूलों पे रंग लाई/ चलो बे-दरंग, लब-ए-आब-ए-गंग, बजे जल तरंग/ मन पर उमंग छाई...।' 

हफीज़ जालंधरी का यह तराना गाया तो बहुत से गायकों ने है, और अच्छा गाया है लेकिन इसको जितनी प्रसिद्धि मलिका पुखराज की आवाज़ में मिली और पाकिस्तान में भी, वह बेमिसाल है। 

उस जमाने तक पाकिस्तान, मुसलमान और इस्लाम का नाम लेना राष्ट्रद्रोह नहीं बनाया गया था। पाकिस्तानी कलाकार, खिलाड़ी, नेता और आम जनता भी भारत आया-जाया करते थे। तब यह भी संदेह और नफरत से नहीं देखा जाता था कि मुसलमान 'हमारा त्योहार बसंत' क्यों मनाते हैं। 

वली दकनी की मजार को ध्वस्त करने वाली नफरत की फसल उगाए जाने में अभी 24-25 साल और लगने थे। उसके बाद तो इस देश में बहुत कुछ ध्वस्त किया जा चुका है। मुसलमान होना शक व नफरत से देखा जा रहा है। 

शुक्र है कि दिल्ली में निजामुद्दीन औलिया की दरगाह कायम है और वहां अब भी बसंतोत्सव मनाया जाता है। बहुत सारे कव्वाल, शायर और आम जन भी वासंती पटके गले या माथे में बांधकर बसंत के गीत गाते हैं और मजारों पर सरसों के फूल बिखेरे जाते हैं। कव्वाल जो समां बांधते हैं, उसके तो कहने ही क्या! 

यह तनिक भावुक भूमिका वास्तव में यूसुफ सईद की किताब 'आज रच्यो है बसंत निजाम घर' के पन्ने पलटते और पढ़ते हुए मन में उमड़ती-घुमड़ती रही। यह किताब अभी-अभी नवारुण प्रकाशन से जारी हुई है, जो अपनी विषयवस्तु में ही नहीं, प्रस्तुति और साज-सज्जा में भी शानदार है। उसके रंगीन चित्र और रेखांकन अलग से ध्यान खींचते हैं। डिजायन और साज-सज्जा भी यूसुफ सईद ने ही की है। 

किताब का मकसद काबिले गौर है- इस सवाल का जवाब तलाशना कि आखिर मुसलमान भारत का ऐसा त्योहार क्यों मनाते हैं जो हिंदू संस्कृति से जुड़ा है। यह सवाल बहुत से मुसलमान भी पूछते हैं, जो मानते हैं कि बसंत मनाने का चूंकि इस्लाम में कोई आधार नहीं है, इसलिए हराम है। 

जवाब की तलाश में लेखक में हमें उस विरासत से परिचित कराता है जो हिंदुस्तान की धरती पर सैकड़ों-हजारों वर्षों में बहुत सारे धर्मों-संस्कृतियों से मिलकर धीरे-धीरे विकसित हुई और जीवन का अभिन्न हिस्सा बनी है। वह ऐसी इंद्रधनुषी चादर है जिसके धागों और रंगों को अलग-अलग कर पाना सम्भव नहीं है। वह तार-तार हो सकती है, अलग नहीं। 

आज के दौर में इस विरासत की चर्चा बहुत जरूरी है। पुरानी पीढ़ियां, जो इससे परिचित रही हैं, अब क्यों भूल रही हैं? नई पीढ़ियों को तो, जिन्हें नफरत घुट्टी की तरह पिलाई जा रही है, इसे जानना और भी जरूरी है। 

कोई तीन दशक पहले 'बसंत' नाम से लघु फिल्म बना चुके यूसुफ सईद ने इस किताब में बसंत की परम्पराओं, गीतों और उसकी लोकप्रियता में मुस्लिम सूफियों, शायरों और कव्वालों, खासकर अमीर खुसरो (किताब में 'खुसरौ' है) के योगदान की गहरी पड़ताल की है-

 'जब कुछ मुसलमान बारहवीं-तेरहवीं शताब्दी में हिंदुस्तान आए तो मध्य एशिया और खुरासान के नौरोज और फसले बहार की रंगीनियां शायद उन्हें यहां बसंत के रूप में नज़र आईं। इसलिए उन्होंने हिंदुस्तान के दूसरे त्योहारों के मुकाबले में बसंत को अपनेपन की भावना से मनाया। भारत के मुसलमानों में बसंत सबसे पहले चिश्ती सूफियों ने मनाया।'

और, यह किस्सा तो मशहूर ही है कि जब अपने भांजे तकीउद्दीन की मौत से गम में डूबे, हंसना-खाना भूल गए अपने पीर निजामुद्दीन औलिया को अमीर खुसरो ने महिलाओं की तरह सज-धजकर और हाथों में सरसों के फूल लेकर नाचते हुए हंसाया था। यह विचार उन्हें बसंत पंचमी पर पीले वस्त्रों में सजी, नाचती-गाती महिलाओं को देखकर सूझा था। 

तबसे बसंत का यह पर्व निजामुद्दीन औलिया और अमीर खुसरो के साथ अभिन्न रूप से जुड़ता हुआ दूसरे कई सूफी पीरों के उत्सवों में शामिल हो गया। अमीर खुसरो के बसंत गीत लोकप्रिय होते गए और बसंत पर कव्वालियां और शायरी लिखने-गाने का सिलसिला चल पड़ा, जो आज तक जारी है और लोकप्रिय भी। 

निजामुद्दीन औलिया की करीब सात सौ साल पुरानी दरगाह पर तो बसंत पंचमी के दिन देश भर के कव्वाल इकट्ठा होकर गीत-संगीत की धूम मचाते हैं। हौज़ में वासंती रंग घोला जाता है, कपड़े रंगे, बांटे और पहने जाते हैं। सरसों के फूल मजारों पर चढ़ाए जाते हैं। वैसे, यूसुफ अफसोस जताते हैं कि अब यह एक उत्सव की बजाय रस्म भर रह गया है। 

यूसुफ पूछते हैं कि 'उनकी मृत्यु के सात सौ साल बाद एक फारसी कवि और दरबारी इतिहासकार का हमारे लिए क्या महत्त्व हो सकता है?' वे जवाब देते हैं कि 'अमीर खुसरो और उनके समय की व्याख्या करने की कोशिश सिर्फ उनकी कविता या संगीत की सराहना ही नहीं है, यह भारत के इतिहास को बेहतर ढंग से समझने में मदद करती है और हमारे अतीत के बारे में गलतफहमियों को दूर कर सकती है... क्योंकि आज हम भारत में ऐसे दौर से गुज़र रहे हैं जहां इतिहास को बहुत बड़े पैमाने पर राजनीतिक अलगाव के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।'

यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण बात है और यही समझाने का बेहतरीन प्रयास यह किताब करती है। 

यूसुफ बताते हैं कि इस्लाम के आने के बहुत पहले से लोग भारत आते रहे। स्वाभाविक ही उनके प्रभाव भी यहां पड़े लेकिन हिंदुस्तानी समाज में सबसे बड़ा सांस्कृतिक प्रभाव फारस (वर्तमान ईरान) से आए लोगों का पड़ा। बाद में दूसरी जगहों से आए मुसलमानों ने भी यहां की बहुत सी परम्पराओं को सहज ही अपना लिया।

कब्रों पर चादर चढ़ाना, चिराग जलाना, फूल व नज़राना पेश करना, कब्र पर सजदा करना, तावीज-गण्डे बांधना, वगैरह बहुत सी ऐसी रस्में उन्होंने हिंदुओं से सीखीं और अपना लीं। ये रस्में ईरान या अरब से नहीं आईं। सूफियों ने भी बसंत को इस्लाम के दायरे में अपनाया। इसी तरह हिंदुओं ने भी उनकी बहुत सी रस्में, खान-पान, पहनावे और बोली-भाषा के प्रभाव सहज ही ग्रहण किए।   

यही मिली-जुली रवायत है, गंगा-जमुनी संस्कृति है, जो हजारों साल में बनी। आज कौन सी रस्में किसकी हैं, कैसी हैं और उनमें किस-किस के प्रभाव हैं, इसे अलग कर पाना तो दूर, समझ पाना भी कठिन है। इसी का नाम हिंदुस्तानियत या भारतीयता है। यह तथ्य समझना-समझाना आज की सबसे बड़ी जरूरत है। यह किताब यही काम बखूबी करती है। 

किताब में खुसरो और अन्य सूफियों के रचे बसंत संबंधी गीतों का संकलन और उनकी व्याख्या भी शामिल है। रंगों के धार्मिक प्रतीकों पर रोचक अध्याय है, जिसमें अच्छी तरह समझाया गया है कि हरा रंग क्यों इस्लाम से जोड़ा जाता है और यह गलत धारणा क्यों बनी। फिल्मों में बसंत के चित्रण पर भी यहां चर्चा की गई है। दरबारी शायर के रूप में अमीर खुसरो की विरोधीभासी भूमिका की चर्चा करने से भी यूसुफ ने परहेज नहीं किया है।   

यूसुफ यह भी बताते हैं कि बसंत की शायरी में जिस 'रंग' की बात होती है (आज रंग है, ऐ मां रंग है री, मेरे महबूब के घर रंग है री) , वह मात्र वासंती रंग नहीं है। वह असल में  अपने पीर के साथ लगा इश्किया रंग है, जिसके बिना सूफियों की इबादत पूरी नहीं होती, वह इबादत जिसका उद्देश्य अंतत: अपने भगवान या खुदा तक पहुंचना है, उसमें फना हो जाना है। 

सूफियों का उर्स (पुण्य तिथि पर उत्सव) मनाया ही इसलिए जाता है कि वे मरे नहीं, बल्कि ईश्वर में मिल गए। जैसे,  ईश्वर से उनका विवाह हो गया। सूफी अपनी तुलना दुल्हन से करते हैं और परमात्मा दूल्हा हैं- 'मोहे अपने ही रंग में रंग ले रंगीले, तू तो साहेब मेरा महबूबे इलाही।' कबीर के यहां भी 'राम' दूल्हा हैं और वे खुद दुल्हन।  

'आज जबकि हिंदू और मुसलमान दोनों ही कौमें अपने-अपने धार्मिक खोल में सीमित होती जा रही हैं, या सिमटने पर मजबूर की जा रही हैं, मुसलमानों का बसंत मनाना या हिंदुओं का ईद में शामिल होना एक ख्वाब सा बन गया है।'  यूसुफ सईद की यह चिंता हम सबकी चिंता होनी चाहिए। 

इसीलिए यह यह किताब हर घर में होनी और पढ़ी जानी चाहिए।  

- नवीन जोशी, 14 अगस्त 2026, लखनऊ

(किताब-'आज रच्यो है बसंत निजाम घर', लेखक- यूसुफ सईद, प्रकाशक- नवारुण, सम्पर्क- 9811577426)