Wednesday, September 09, 2026

थोड़ा लिखा, बहुत समझना- शेखर दाज्यू

 

थोड़ा लिखा-बहुत समझनावाली भाषा-शैली में कहानियां लिखने वाले उस्ताद का आज जन्म दिन है। उनकी कहानियां एक सामान्य, छोटे-से वाक्य या संवाद से शुरू होती हैं और धीर-गम्भीर-मंथर गति से चलते हुए लगभग चुपचाप पूरी हो जाती हैं। कहीं से भी आरोपित या बहुत श्रम करके लिखी गई नहीं लगतीं। कई बार लगता है- अच्छा, कहानी पूरी भी हो गई! 

और, तब उसके अर्थ खुलने लगते हैं। सहज-सरल शब्दों में कथाकार जो कह गया, वह पाठक के मन में अपना आकार और अर्थ बढ़ाने लगता है। परतें धीरे-धीरे खुलती हैं, गहरा अर्थ-बोध कराती जाती हैं और याद रह जाती हैं। 

उनके व्यक्तित्व के अनुरूप ही उनकी कहानियां भी लगती हैं- बहुत कम लेकिन सधा हुआ बोलने वाले, बिना उत्तेजित हुए अपनी अर्थपूर्ण बात कह जाने वाले, विनम्र, दोस्ताना और कहीं-कहीं व्यंग्य की हलकी-सी छौंक। कहानियां पढ़ते हुए जैसे हम शेखर जोशी को ही सुन रहे हों!

शेखर दाज्यू ने लेखक बनने या प्रसिद्धि पाने के लिए नहीं लिखा। लिखना उनके लिए समाज को बदलने की एक विनम्र कोशिश थी। इसलिए उनकी कहानियां सोद्देश्य हैं। वे समाज की नब्ज पर हाथ रखते हैं, व्याधि का निदान करने की कोशिश करते हैं, विसंगतियों और अंतर्विरोधों पर लिखते हैं, लेकिन ऐसा करते हुए वे कोई नारेबाज या फॉर्मूलाबद्ध लेखन नहीं करते। 

श्रमिकों और कारखानों की उनकी कहानियों में भी किसी गेट मीटिंग, आंदोलन या हड़ताल या नारेबाजी का उल्लेख नहीं मिलता, यद्यपि शोषण की विकसित होती हुई चेतना, असंतोष और प्रतिरोध के स्वर वहां पर्याप्त हैं। उनकी विशेषता ही यह है कि वे बड़ी से बड़ी बात कहते हुए बड़बोले कहीं से भी नहीं लगते, बल्कि बहुत सहज, सरल और चुपके से कहानी के रूप में वह विचार पाठक तक पहुंचा देते हैं। इसमें कहानी पूरी तरह बची रहती है, बल्कि खिल उठती है और उसका आस्वाद बना रहता है।    

उनकी कई कहानियाँ ऐसी हैं जिनमें वे वास्तव में जो कहना चाहते हैं, वह या तो शब्दों में साफ-साफ नहीं कहते, मात्र संकेत देकर पाठक के निष्कर्ष निकालने के लिए छोड़ देते हैं कमाल यह है कि जिस निष्कर्ष की ओर वे पाठक को ले जाना चाहते हैं, बिना किसी जोर-दबाव के, पाठक उसके अतिरिक्त दूसरा कोई निष्कर्ष निकाल ही नहीं पाता। 

क्सर तो उनकी कहानी का मर्म उसकी घटनाओं में अंतर्गुम्फित होता है जिसे अलग से कहने की आवश्यकता रह ही नहीं जाती।  

जैसे, छोटे शहर के बड़े लोग में वे यह नहीं लिखते कि कस्बे के खां साहब ने बिल्कुल अचानक भीड़ के सामने यह बात क्यों कही कि मछली वाले का ठेला कल रात एक ट्रक ने बैक करते समय तोड़ दिया। तोड़ा था उसे साम्प्रदायिक घृणा से उन्मत्त एक व्यक्ति ने। यह बात सब जानते थे और मछली वाला भी लेकिन खां साहब बड़ी समझदारी से साम्प्रदायिक घटना को वाहनजनित दुर्घटना का रूप देकर साम्प्रदायिक तनाव से खौल रहे उस कस्बे को सद्भाव से भर देते हैं। 

यह बात कहीं लिखी नहीं गई है लेकिन पाठक ठीक-ठीक यही समझते हैं। संकेत है तो मात्र शीर्षक में कि इस छोटे से शहर के लोग वास्तव में कितने बड़े हैं।

बदबू उनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध और चर्चित कहानियों में है। जो नायक है, वह उस कारखाने में काम करते हुए अपने हाथों की बदबू को बनाए रखना चाहता है और बदबू गायब हो जाने की आशंका मात्र से परेशान हो जाता है। शेखर जी कहीं नहीं लिखते कि वह बदबू क्या है और क्यों वह उसे बचाए रखना चाहता है लेकिन कहानी में घटनाओं की बुनावट इतनी खूबसूरत और सहज है कि पाठक न केवल आसानी से समझ जाता है कि बदबू है क्या, बल्कि उस बदबू को खुद भी आत्मसात कर लेना चाहता है। यह बदबू की खुशबू है जो दूर तक और देर तक सुवासित होती रहती है।

मृत्यु कहानी देखिए, कहानीकार अपने पात्रों से मृत्यु की कई हृदयविदारक घटनाएं कहलवाता है। उसी समय वहां एक छोटी-सी घटना होती है। एक आदमी घर की घंटी बजाता है। घर की मालकिन दरवाजा खोलकर आगंतुक से कुछ कहती है और वह लौट जाता है। घऱ में बैठे लोग फिर बातें करने लगते हैं। जो इस बीच बहुत कम समय के लिए हुआ, उस पर कोई बात नहीं करता, जबकि उस नामालूम-सी लगने वाली घटना में ही एक भयावह मृत्यु हो गई है, जिसमें किसी के प्राण तो नहीं जाते लेकिन वहां उपस्थित लोगों की चेतना, गरिमा और प्रतिरोध का उनका स्वर दम तोड़ देते हैं। 

कहानीकार यह सब कुछ नहीं कहता, जिसे कहने के लिए उसने कहानी बुनी। वह मात्र एक वाक्य लिखकर कथा समाप्त कर देता है कि “हममें से किसी ने भी मृत्यु के उन क्षणों की चर्चा नहीं की, जिनके हम तीनों संयुक्त रूप में साक्षी रहे थे।” क्या आज भी हम अपने चारों ओर रोज ऐसी कितनी ही मौतें नहीं देख रहे?

इस कहानी में एक और मृत्यु की ओर इशारा है। घर की जो मालकिन है, शकुन, जो बाथरूम में छुप गए अपने पति के लिए झूठ बोल देती है कि वे तो ट्रेन रोकने के लिए स्टेशन ही गए हैं, वह कॉलेज के दिनों की एक सचेत, स्वतंत्र व्यक्तित्व एवं प्रगतिशील विचारों वाली लड़की थी, आज मात्र पति की चेरी, एक गृहस्थन है। पति ने उसे नौकरी भी नहीं करने दी। उसके स्वतंत्र व्यक्तित्व और प्रतिभा की भी मृत्यु यहाँ हुई है। 

ध्यान दीजिए कि इस कहानी में दो प्रकार की मौतें हैं—एक वे मौतें, जिनकी चर्चा कहानी के पात्र खुलकर कर रहे हैं और दूसरे वे, जिनकी चर्चा कोई नहीं कर रहा। यही अचर्चित मौतें हैं जो समाज के लिए अत्यंत चिंताजनक हैं। कहानीकार का फोकस वहीं है। जिन प्रसंगों के माध्यम से और जिस खामोश शैली में शेखर जी इन मौतों की सूचना बिना पाठक तक पहुंचाते हैं, वह विशिष्ट है।   

किस्सागो जिसकी चर्चा कम ही हुई है। वह एक लेखक की कहानी है और सोद्देश्य एवं यथार्थ लेखन के बारे में महत्त्वपूर्ण बात कहती है। बचपन से ही बड़े काल्पनिक और रहस्य-रोमांच से भरपूर किस्से सुनाने वाला किस्सागो बाद में शहर जाकर लेखक बन जाता है। कहानी में कुछ रोमांचक किस्से सुनाए भी गए हैं। 

एक बार यह लेखक किसी गमी में अपने गांव पहुंचता है और उस गरीब परिवार के गुमसुम हो गए बच्चे को खुश करने के उद्देश्य से बाहर ले जाकर एक रोमांचक कहानी गढ़ता है। बच्चा कभी सुन रहे होने का संकेत देने के लिए हां-हूं करता है और कभी कहीं खो जाता है। चलते-चलते बच्चे को रास्ते के किनारे एक सूखी टहनी दिखती है जिसे वह लपककर उठा लेता है और घसीटते हुए ले चलता है। 

लेखक के कथा सुनाने में खड़-खड़ की ध्वनि व्यवधान डालती है। वह बच्चे को टोकता है- इस लकड़ी को क्यों लिए चल रहे हो नन्नू, बेकार खड़-खड़ हो रही है।बच्चा जवाब देता है –घर में ईंधन नहीं है दद्दा, बारिश भी होने वाली है।’ इसके बाद दो लाइनें और हैं, जिनमें बताया गया है कि कहानीकार की कल्पना गड़बड़ा गई है, फिर भी वह उसे समेटने की कोशिश कर रहा है। इसी के साथ कहानी समाप्त हो जाती है। 

देखिए कि कहां से कहानी शुरू हुई थी और कहां जाकर पूरी हुई और जो कहना-बताना था वह कैसे बिना लिखे कह डाला! कहानी अगर जीवन का यथार्थ नहीं है तो निरी कल्पना है, गप्प है, निरर्थक है। बच्चे के सूखी लकड़ी उठाकर कर खड़-खड़ करते हुए चलने और छोटी से उम्र में घर की चिंता करने के बीहड़ यथार्थ की तुलना में उस लेखक की बड़ी मेहनत से कल्पित कथा का कोई अर्थ नहीं है। 

इसका संकेत शेखर जी कहानी में एक जगह देते हैं। गांव के दिनों में जब किस्सागो अपनी “कल्पना में सम्भव-असम्भव कुछ भी जोड़ लेता, तो बूढ़े बुबु के अनुभवी कान सही वक्त पर खोटे और खरे की पहचान कर लेते। उनका घुटनों पर झुका, पंखी में लिपटा सिर ऐसे मौकों पर जोर-जोर से हिलने लगता। और, जब किस्सागो कुछ ज़्यादा ही दूर की कौड़ी लाने की कोशिश करता तो बुबु थोड़ा सा सिर उठाकर हाथ की लकड़ी से आग को कुरेदने लगते या ठीठों को इनारे-किनारे से खिसकाकर केंद्र में पहुंचा देते।”

नौरंगी बीमार है अकेली ऐसी कहानी है जिसके पाठकों ने ही नहीं, कुछ समीक्षकों ने दो सर्वथा विपरीत पाठ किए हैं। खजांची की असावधानी से नौरंगी को वेतन के साथ दो सौ रु अतिरिक्त मिल गए हैं। मिल ही गए हैं, ऐसा निश्चित तौर पर नहीं बताया गया है। सभी को संदेह है कि नौरंगी के हाथ ही लगे हैं। नौरंगी का व्यवहार स्वयं भी सन्देह उत्पन्न करता है लेकिन कुछ रोज बीमारी का बहाना करने के बाद वह एक सुबह सिर ऊंचा  किए नौकरी पर हाजिर हो जाता है जैसे कुछ हुआ ही न हो। 

कहानी का एक पाठ यह किया गया है की नौरंगी को दो सौ रु अधिक नहीं मिले थे, वह शक किए जाने के कारण शर्म से गड़ा हुआ छुट्टी पर चला गया था और बाद में यह तय करके कि ईमानदार को तानों और शक से क्या परेशान होना, वह सिर ऊंचा किए नौकरी पर आ जाता है। 

दूसरा पाठ या निष्कर्ष यह है कि नौरंगी को ही अतिरिक्त रु मिले थे और उसने दबा लिए। शुरू में वह अपराध बोध से शर्मशार रहा लेकिन अफसरों के भ्रष्टाचार के किस्से याद कर-कर उसे इतनी ताकत मिल गई कि वह शर्म को पचाकर ठाठ से नौकरी पर आ गया। अर्थात वह भी भ्रष्ट हो गया। 

शेखर दाज्यू बताते थे कि इस कहानी मेत्त्र वे यह दिखाना चाहते हैं कि भ्रष्टाचार ऊपर से नीचे आता है। यही यथार्थ है। पहलसम्मान ग्रहण करते समय दिए गए वक्तव्य में उन्होंने कहा भी था कि मेरे लेखन का आधार मेरे चारों ओर बिखरा हुआ यथार्थ रहा है।

तो, यह हैं हमारे शेखर दाज्यू। मेंटल, दौड़, हेड मासिंजर मंटू, जी हजूरिया, नौरंगी बीमार है, भद्रलोक का नीड़, सहयात्री, प्रतीक्षित, डांगरीवाले जैसी कई कथाएं हैं जिनमें जीवन के यथार्थ के साथ उनका यह कथा-कौशल अत्यंत सुंदर और प्रभावी रूप में व्यक्त हुआ है। ये कहानियां जितनी खामोशी से शुरू हुई थीं, उतनी ही चुपचाप पूरी हो गईं इन खामोशियों में एक गूंज है जो कहानी समाप्त होने के बाद देर तक अनुगूंजों में बनी रहती है।

उनकी कुछ कहानियों के समापन वाक्य देखिए-

दाज्यू- “बॉय कहते हैं शाब मुझे।संक्षिप्त सा उत्तर देकर वह मुड़ गया। आवेश में उसका चेहरा लाल होकर और भी अधिक सुंदर हो गया था।

बोझ- बहुत दिन बाद उसने अपने को हलका महसूस किया था।

रास्ते- अच्छा होता यदि इस बात को जिसे मैं इतनी देर से बरबस अपने में ही दबाए हुए था, दबी ही रहने   देता। मुझे लगा मैंने व्यर्थ ही यह बात कही थी क्योंकि दादा ने इसका कोई उत्तर नहीं दिया।

रंगरूट- मेरा यह देशप्रेम अपने गांव-अंचल की धरती, नदी का किनारा और पेड़ पौधे-जंगल-पहाड़ देखकर उभरा था या किसी और कारण, मैं कह नहीं सकता।

छोटे शहर के बड़े लोग- हवा में बहुत ठंडक थी। लोग कब तक वहां खड़े रहते।

मेंटल- ऐसे मरीज को डॉक्टर ड्यूटी के लिए फिट कर दे, क्या यह आश्चर्य की बात नहीं!

बच्चे का सपना- मेरा उत्तर सुनकर उसके चेहरे पर सुखद आश्चर्य की चमक आ गई। वह प्रसन्न थी और संतुष्ट, परंतु सभी बच्चों की तरह अपने सपनों की वास्तविकता से अपरिचित और अनजान।

पुराना घर- “न रे! रस्सी ऊपर पेड़ पर समेट कर रखे हैं। हम देखे थे।” अधिक समझदार बनने के गौरव के साथ लड़की ने भाई को यह सूचना दी।

मृत्यु- बारी-बारी से मृत्यु के उन क्षणों की हम लोग चर्चा कराते रहे, जिसके हम पृथक-पृथक रूप में साक्षी रहे थे। लेकिन हम में से किसी ने भी मृत्यु के उन क्षणों की चर्चा नहीं की, जिनके हम तीनों संयुक्त रूप में साक्षी रहे थे।

प्रतीक्षित- काश, उनके इस प्रश्न का कोई निश्चित उत्तर मैं दे पाता!

सिनारियो- रवि को सहसा अहसास हुआ, काश इस रंगत को अपने कैमरे में पकड़ पाता!

- न जो, जन्म दिन (10 सितम्बर) की पूर्व संध्या पर शेखर दाज्यू को याद करते हुए। 

(फोटो सौजन्य- कृष्णा पंत)  

       

 

Tuesday, September 08, 2026

हिमालय और उसके जन-जीवन की गहन पड़ताल

 

‘अब ताला क्या लगाना!..........
तो क्या कोठरी खुली ही छोड़ दे?
असमंजस में वह बंद दरवाजे के सामने खड़ा रह गया।’ (पृष्ठ-9)
‘दावानल’ उपन्यास की उक्त शुरूआती लाइनों में व्यक्त लेखक नवीन जोशी का असमंजस व्यवहारिक जीवन में भी अभी तक ज्यों का त्यों है। उनका ही क्यों हम-सब भी तो जीवन में व्याप्त असमंजस से कहाॅं उभर पा रहे हैं?
उत्तराखण्डी होने के नाते सामाजिक तौर पर विगत शाताब्दी में यहाॅं उपजे और सफल कहे और माने जाने वाले वन, शराब तथा पृथक राज्य आन्दोलनों के औचित्य और अस्तित्व का असमंजस हम सब में नहीं है, क्या? आज, हम-सबकी जीवन में स्थिति जीवनीय अवसरों और संभावनाओं के लिए बंद दरवाजे के बाहर खड़े निरीह प्राणी की नहीं है, क्या? राजनैतिक हालातों ने हमें सामाजिक तौर पर बीते पर पछताना, वर्तमान में लाचार और भविष्य के लिए आशंकित नहीं बना दिया है, क्या?
प्रतिष्ठित लेखक और पत्रकार नवीन जोशी के ‘दावानल’ और ‘देवभूमि डेवलपर्स’ संस्मरणात्मक उपन्यास क्रमबद्ध तरीके से उत्तराखण्ड में विगत आधी शताब्दी के विविध पड़ावों यथा- सत्तर के दशक के ‘चिपको’, अस्सी के दशक के ‘नशा नहीं रोजगार दो’, नब्बे के दशक के ‘पृथक राज्य आन्दोलन’ से जूझते हुए आज ‘हेलंग’ और ‘हाकम’ के मुकाम पर पहुॅंचे उत्तराखण्डी जन और जीवन की गहन पड़ताल के रूप में प्रकाशित हुए हैं।
मैं आपको इन किताबों की शब्द-यात्रा की ओर ले चलता हूं।
पहले, ‘दावानल’ की बात कर लेते हैं-
नवीन जोशी का ‘दावानल’ उपन्यास, सामयिक प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली से वर्ष- 2006 और 2008 (दूसरा संस्करण) में प्रकाशित हुआ। लेखक संशय की गुंजाइश को विराम देते हुए आरम्भ में ही घोषित करते हैं कि ‘दावानल’ किताब ‘बीसवीं शताब्दी के सातवें और आठवें दशक में उत्तराखण्ड में छिड़ा व्यापक वन (चिपको) आंदोलन, इस कथा की आधारभूमि है। यह उपन्यास है, इतिहास नहीं।’
उपन्यास का नायक पुष्कर है। गाॅंव से लखनऊ पिता के पास पढ़ने आया नन्हा पुष्कर युवा होते ही कब कैरियर बनाती किताबों से बाहर छिटक-कर पहाड़ के सामाजिक सरोकारों की लड़ाई का हिस्सा बन गया, ये उसे भी पता नहीं चला। लखनऊ विश्वविद्यालय के मेघावी छात्र पुष्कर ने मई, 1977 के किसी दिन जब हल्द्वानी में ‘पर्वतीय युवा मोर्चा’ के एक पर्चे को पढ़ा तो जिज्ञासावश वह अपने गांव न जाकर नैनीताल चला गया। नैनीताल में ‘पढ़ाई के साथ लड़ाई’ में सक्रिय साथियों से हुई मुलाकात ने उसकी जीवन की दशा और दिशा ही बदल दी। पुष्कर को जब पूरा पहाड़ अपने गांव का ही विस्तार लगने लगा तो वो उसके दुखःदर्दो से दूर कैसे रह सकता था।
असल में, पुष्कर के रूप में नवीन जोशी ने अपने किशोरावस्था से युवा अवस्था तक के संस्मरणों को इसमें पिरोया है। उत्तराखण्ड में बीसवीं शताब्दी के 70 के दशक के सामाजिक आन्दोलनों को एक अध्येयता के रूप में नवीन जोशी ने बेहद करीब से देखा और समझा था। उस काल में, पिता के सुनहरे सपनों से इतर अपने खुरदरे जीवनीय उद्देश्यों के ऊहापोह में वे रहे। कहना चाहिए कि, यह किताब, लखनऊ के नहर दफ्तर की कालोनी में अपने बाबू (पिता) के साथ रहने वाले नवीन जोशी के जीवनीय बदलावों और अनुभवों का ताप है।
‘दावानल’ उपन्यास का केन्द्रीय भाव चिपको आन्दोलन है। इसके माध्यम से यह उस काल के पहाड़ और पहाड़ी की अनेकों पीड़ाओं को प्रकट तौर पर पाठकों तक पहुंचाता है। नवीन जोशी ने ‘दावानल’ उपन्यास में पुष्कर और उसके साथियों के माध्यम से उस दौर के उत्तराखण्डी युवाओं की स्थिति, मनोदशा, पीड़ा, उन पर पारिवारिक - सामाजिक - शैक्षिक - राजनैतिक दबाव तथा चेतना के विविध आयामों को इस किताब में सार्वजनिक किया है। उपन्यास के पात्र यथा- रामप्रसाद, जीवन लाल, चंदर, मुन्नी भाभी, शंभू, ज्योति, गिर्दा, इरा, शैली, राधाबल्लभ, गौरा, सलीम, दीवान, कविता, सीपी, ममता, तिलदा, कमला, चन्द्र सिंह, लोकेन्द्र, लक्ष्मी, सुदर्शन, चन्द्रशेखर, त्रिवेन्द्र, गिरीश आदि सभी हमारे आस-पास के ही लोग हैं। इनको पहचानना मुश्किल नहीं है। चिपको आन्दोलन से प्रशिक्षित ये चेहरे उत्तराखण्ड के सवालों और मुद्दो पर चर्चित रहे हैं।
‘दवानल’ उपन्यास घर और बाहर की मध्य रेखा पर ठिठके युवा पुष्कर की उस कशमकश से आरम्भ होता है, जिसमें इजा (माॅं) के कहे वचन ‘अपने बाबू को कभी दुःख नहीं देना बेटा!’ को निभाने में वह अपने को असमर्थ पाता है। जबकि, ‘पुष्कर जानता था कि बाबू हर सांस पहाड़ में छोड़ आए गांव, खेत और मां के लिए लेते हैं या फिर उस बेटे के लिए जिसे पढ़ाने के लिए वे अपने साथ लखनऊ ले आए हैं। उनकी कोई सांस शायद अपने लिए नहीं होती थी। वे ऐसी मशीन थे जो गांव के लिए हर महीने एक मनिआर्डर और बेटे के लिए पढ़ाई का बंदोबस्त करने के लिए चलती थी। दो रोटी और दाल-भात खाते थे तो इसलिए कि मशीन को चलने के लिए कुछ तेल तो चाहिए ही।’ (पृष्ठ-31)
यह किताब, पिता और पुत्र के उस एकाकीपन को भी कुदेरती है जिसमें वे साथ रहते हुए भी वैचारिक रूप में साम्य नहीं रख पाते हैं। पिता-पुत्र के एक दूसरे के बारे में सोचे-समझे सुनहरे सपने जब टूट कर बिखरते हैं तो उसकी आवाज दोनों को सुनाई देती है, पर बोल कोई भी नहीं पाता है। पिता के पुत्र के प्रति बड़ते परायेपन के भाव का जिम्मेदार वह स्वयं है, ऐसा पुष्कर का मानना है।
'और, अब तो शायद उन्होंने उसे अपने से दूर, पराया-सा भी मान लिया। नहीं तो ऐसे क्यों बोलते वे-‘आप खाना खाएंगे या अभी जाना है?’ पहले कभी उन्होंने पुष्कर से ‘आप’ नहीं कहा था।’ (पृष्ठ- 179)
ऐसी बैचैनी में पुत्र पुष्कर के अन्तःमन की धुगधुगी हर क्षण पिता को महसूस कराने के लिए मचलती थी कि ‘मैं तुम्हारे प्रति बेईमान नहीं था, बाबू’...नहीं बाबू, मैं सिर्फ तुम्हारे सपने को दूसरे कोण से देख रहा था, उसमें और भी पिताओं के सपने शामिल कर रहा था।’ (पृष्ठ- 32)
पिता-पुत्र के संबंधों की यही शाश्वत नियति इस किताब में बखूबी आयी है।
‘दावानल’ सत्तर के दशक में लखनऊ में जड़-जमाते प्रवासी उत्तराखण्डियों की कथा-व्यथा की दांस्तान भी है। ‘ये लोग अपना परिवार साथ में नहीं रखते थे क्योंकि वे शहर में बसने नहीं आए थे। वे पहाड़ की किसी चोटी या घाटी में बसे गांव में छोड़ आये अपने परिवार की सप्लाई लाइन थे। वहां गांव में कुछ सीढ़ीनुमा खेत हैं, बाप-दादों का बनवाया एक मकान है, कुछ ढोर-डंगर हैं, जिन्हें छोड़ा नहीं जा सकता। इसलिए नहर दफ्तर के उन क्वार्टरों में ये लोग अकेले रहते थे। नहीं, अकेले रहते थे कहना गलत होगा, उनके साथ होते थे पढ़ाने के लिए लाए गए बेटे या नौकरी लगने के इंतजार करने वाले छोटे भाई या रिश्तेदार।...पहाड़ से भागे हुए छोकरे शहर की भीड़-भाड़ और चकाचौंध से घबराकर जब कभी स्टेशन के बाहर रोते-भटकते पाए जाते, तो दयालु रिक्शेवाले उन्हें यहीं छोड़ जाते थे।’ (पृष्ठ-37)
कमोवेश यही तस्वीर थी उन दिनों लखनऊ में पनप रहे एक नये उत्तराखण्ड की थी। पुष्कर के बाबू की तरह हर साल असूज के महीने काम-धंधे, खेती-बाड़ी के लिए लखनऊ से घर-गाॅंव आना पहाड़ियों का नियमित दस्तूर था। क्योंकि, तब उनके मन-मस्तिष्क में लखनऊ मात्र जीवकोपार्जन का ठिकाना था। पारिवारिक जीवन की जीवंतता तो वे अपने पहाड़ी गांवों में ही महसूस करते थे।
चिपको के बहाने 20वीं सदी के उत्तरोत्तर काल में पलते-बढ़ते उत्तराखण्ड के मन-मस्तिष्क का मिज़ाज़ इस किताब में है। उस दौर के तमाम सामाजिक - राजनैतिक - आर्थिक - सांस्कृतिक घटनाओं और जन-आन्दोलनों, व्यक्तित्वों, संस्थाओं तथा शासन-प्रशासन की नीति-नियत से हम परिचित होते हैं। तवाघाट की तबाही, नैनीताल गोली काण्ड, चांचरी धार और अदवानी का जंगल आन्दोलन, नैनीताल समाचार और उत्तराखण्ड संघर्ष वाहिनी का अस्तित्व आना आदि घटनायें इस किताब के महत्वपूर्ण हिस्से हैं।
लेखक, उत्तराखण्ड के तत्कालीन वर्तमान को समझने के लिए उसके अतीत को भी टटोलता है। अखबारों की पुरानी फाइलों में दर्ज 20 जुलाई, 1970 को बेलाकूची में हुई त्रासदी को पुष्कर ने कुछ इस तरह से पढ़ा-
‘...कुल बारह किलोमीटर सड़क, तीस बसें, ट्रक व कारें, इक्कीस छोटे-बड़े पुल और अलकनंदा के किनारे बसे गांव उस प्रलय की भेंट चढ़ गए।
और मनुष्य?
‘अरे छोड़ो महाराज, मनखियों के मरने-जीने का भी कोई हिसाब-किताब होता है!’ दुरमी के प्रधान रामेश्वरजी से पूछ पाता पुष्कर तो उनका यही जवाब होता।’ (पृष्ठ-174)
नवीन जोशी ने उत्तराखण्डी समाज में उदित, उभरे और अवसान को प्राप्त चिपको आन्दोलन के महत्वपूर्ण पक्षों को ‘दावानल’ उपन्यास में विस्तार दिया है। उत्तराखण्ड में वन-वनवासियों के प्राकृतिक सह-संबंधों, प्रकृति की चेतावनी और उसको भूल-बिसरने की मानवीय प्रवृत्ति के मध्य चिपको आन्दोलन की विडम्बना और चरित्रों को यह जीवंत करता है। इस नाते, चिपको के मर्म और दर्द की अभिव्यक्ति इसमें हुई है।
उपन्यास का एक पात्र शैली पुष्कर से कहता है कि ‘...चिपको आंदोलन जनता का आक्रोश भर था, गुस्सा था जनता में जो उस तरह फूटा और उसे तरह-तरह के लोगों ने अपने ढंग से व्याख्यापित कर दिया। कोई उसे पर्यावरण का आंदोलन बताने लगा, कोई अधिकारों की बहाली का।...पहली तरह के लोग उसमें अपने लिए अवसर देख रहे थे तो तुम लोग दिवास्वप्न में खोए थे। दोनों अपने-अपने ढंग से दोषी हो।’ (पृष्ठ-20)
यह किताब बताती है कि सरकार ने चालाकी से चिपको के शीर्ष नेतृत्वों को अलग-अलग तरीके से पुरस्कारों और सम्मानों के मोह-जाल में कैसे फंसाया? सम्मानों ने चिपको के कुछ चेहरों को देश-दुनिया में ख्याति दी, इससे वे तो बड़े हो गए पर स्थानीय समाज और उनकी संस्थायें उनसे बहुत पीछे छूट गयीं। और, यह आन्दोलन दो वैचारिक पक्षों के जगह दो चेहरों को लिए आगे बढ़ने लगा। इन दो चेहरों ने सरकार के हितों के अनुकूल चिपको के मूल चिन्तन जिसमें स्थानीय लोगों के परम्परागत हक-हकूकों से जंगलों की हिफाज़त की बात थी उससे हटकर मात्र इकालाजी की बात करना उचित समझा। लिहाजा, स्थानीय ‘आर्थिकी’ पर उनका स्वर धीमा होने लगा और ‘पारिस्थितिकी’ का स्वर तेज होने लगा। परन्तु एक तरफ देश-दुनिया में चिपको आन्दोलन के प्रचार की धूम थी तो दूसरी तरफ उसके शीर्ष नेतृत्व के मध्य अहम और वहम की धूल मंडराने लगी थी। सम्मानों की ललक ने इसको और पनाह दी थी।
चिपको की लोकप्रियता को अलग-अलग तरीके से लेखकीय रंग भरे जाने लगे। ‘...मगर छपते जा रहे हैं नामचीन पर्यावरणविदों के लेख और इंटरव्यू। बाबा जीवन लाल ने हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी में भी लिखना शुरू कर दिया है। वे अखबारों में छाए हुए हैं। स्वच्छ हवा और शुद्ध पर्यावरण के लिए जंगलों को बचाओ! ‘क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी-पानी और बयार।’ उनकी देखा-देखी राम प्रसादजी ने भी कलम उठा ली है। पता नहीं खुद लिखते हैं या कोई लेखक रख लिया है। बाबा तो अच्छे वक्ता और लेखक रहे हैं। मगर राम प्रसादजी हिंदी भी ठीक से नहीं बोल पाते थे। बार-बार अपनी पहाड़ी बोली में आ जाते। शायद आंदोलन और प्रसिद्धि ने उन्हें सिखा दिया है। जो भी हो, खूब छप रहे हैं दोनों। लिखने और इंटरव्यू देने की होड़।’ (पृष्ठ, 202-203)
चिपको के परिपेक्ष्य में उपन्यास के पात्र सलीम के इन विचारों से असहमत कैसे हो सकते हैं कि ‘...यह व्यवस्था हमेशा इसी तरह काम करती है। यह जन-आंदोलनों को भी ऐसी चालाकी से मोड़ देती है कि उसका मूल स्वर गायब हो जाता है और वह जन-भावनाओें को अपने पक्ष में भुना लेती है। चूंकि ये सरकारें पूंजीपतियों, दलालों, ठेकेदारों यानी जनता की शोषक ताकतों का गठजोड़ हैं, इसलिए वास्तविक जनहित का कोई फैसला ले ही नहीं सकतीं। लेकिन पुष्कर भाई, चूंकि तुम भावुक हो, मेरे शब्दों में रोमांटिक आंदोलनकारी, इसलिए तुम्हें झटका लगना स्वाभाविक है।’ (पृष्ठ- 219)
चिपको के देश-दुनिया में फैलते तथाकथित ग्लेमर से तस्त्र पुष्कर अपने मित्रों शैली और सलीम के उस पर लगे ‘रोमांटिक आंदोलनकारी’ के तगमें आखिर तोड़ ही डालता है। वह पुरुजोर आवाज़ में अपनी खीज व्यक्त करते हुए आगे एक अध्येयता ही रहना चाहता है-
‘ओ गौरा देवी! रामी देवी!, बौंणी देवी!, रामी देवी!, लक्ष्मी देवी! और जसुली देवी! बधाई हो तुमको, पद्मभूषण और मैगसेसे की। क्या कहा? तुम इन्हें नहीं जानती! अरे पगली! किसी लाट-गवर्नर के नाम नहीं हैं। इनाम हैं, इनाम! बडे़-बड़े सम्मान! तुम्हारे नाम और काम के, जो तुम्हारे नेताओं को मिले हैं। श्रेय और सम्मान तो नेताओं को ही मिलता है न!’
............
‘याद है गौरा देवी, ये रामप्रसादजी रेणी का जंगल बचा लेने पर तुम्हें शाबासी देने आए थे! आज तुम उन्हें बधाई दो। घर में थोड़ा गुड़ हो तो एक डली रामप्रसादजी को खिलाओ। एक डली बाबा जीवनलाल के लिए भी भेजो।
और यह लकड़ी-पानी, घास-पत्ते की रट मत लगाओ। बड़ा काम करने वालों को छोटी-छोटी चीजों की चिंता शोभा नहीं देती। एक बात और, गौरा देवी! जो जंगल तुमने तब बचाया था, अब उसकी तरफ एक कदम मत बढ़ाना। वहां अब खूंखार, मनखीमार बाघ रहते हैं, हां! खबरदार!’ (पृष्ठ, 226-227)
‘दावानल’ में चंट-चालाक सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच ऐसे नायकों का भी जिक्र किया है जिनकी कथनी-करनी में कभी भेद नहीं रहा। चांचरीधार के जंगलों को कटने से बचाने के बाद उत्साही विपिन त्रिपाठी से जुड़ा यह किस्सा बेहद प्रेरक है, जिसने उनको ताउम्र जमीनी कार्यकर्ता बनाये रखा-
‘विपिन त्रिपाठी जिंदाबाद...टैक्सी की खिड़की से विपिन चच्चा ने भोटिया भाई के हाथ अपने हाथों में लेकर प्यार से दबाए तो निर्विकार-सा वह बोला था- ‘भुला, अपनी औकात मत भूलना, हां!’ डंक-सा लगा था विपिन चच्चा को। कैसी पते की बात कह दी थी उसने! जेल से छूटते ही चंदे की टैक्सी! वे फौरन टैक्सी से बाहर निकले, अपने गले की फूलमालाएं भोटिया भाई को पहनाई और समर्थकों के हुजूम को आश्चर्यचकित छोड़कर बस स्टैंड की ओर चल पड़े थे।’ (पृष्ठ-156)
पुष्कर के जीवनीय उतार-चढ़ावों ने उसे एक तरफ 70 के दशक के आम युवा की चर्चित ‘यंग ऐंग्री मैन’ की छवि के रूप में ढ़ाला तो दूसरी ओर उसे उनसे जीवन दर्शन का पाठ भी मिला। श्मशान घाट में किसी सयाने का यह कथन कि ‘अपना शोक यहीं बहा दो, पुत्र। यह शोक को बहा देने की जगह है। यहां से फिर जिंदगी में लौटना होता है। वह देखो, ऊपर सड़क किनारे...लाश लेकर आए आधे लोग नहा-धोकर दाल-भात पका रहे हैं। यहां चिता जल रही है और वहां भात पक रहा है। चिता की राख के साथ सारा शोक बहाकर वे भोजन करेंगे। दूर से आए हैं, थके हैं। खाकर आराम करेंगे और फिर लौट जाएंगे अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में। यही संसार का नियम है। उधर देखो, चिता की राख बहाकर वह बालक उस ठौर पर दिया जला रहा है। पंडित कह रहा है बालक से कि अब पीछे मुड़ो और घर जाओ। इस तरफ मुड़कर मत देखना। यानी इस शोक को भूल जाना और वापस जिंदगी में शामिल हो जाना। तुम भी लौट जाओ, युवक। मन का संताप यहीं छोड़कर लौट जाओ।’ (पृष्ठ- 135)
‘दावानल‘ का नायक पुष्कर भी अपने जीवन के कर्तव्य-पथ की ओर लौटते हुए उपन्यास के विराम में मन-ही-मन गाता है-
‘ऋतु औंनै रौली, भवंर उड़ाला बलि...’।
यही तो जीवन की नियति है।
 
- अरुण कुकसाल
ग्राम-चामी, पोस्ट- सीरौं-246163
पट्टी- असवालस्यूॅं, जनपद- पौड़ी (गढ़वाल), उत्तराखंड
(आज सुबह-सुबह अरुण कुकसाल ने फेसबुक पर दावानल की यह याद दिला दी।)