Sunday, July 26, 2026

ए भाई, हिंदी बरतो तो ऐसे बरतो!

जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारी युवाओं की भाषा के बारे में पूरा समाज उद्वेलित दिखाई दे रहा है। एक बड़े वर्ग के भाषाई संस्कार की जड़ें हिल गई हैं। अच्छा है, इसी बहाने भाषा पर, शब्दों पर चर्चा हो रही है। 

मैं यहां युवाओं के नारों-पोस्टरों की भाषा पर बात करने नहीं जा रहा हूं। इस समय मेरे हाथ में है भाषा विज्ञानी और भाषा/शब्दों के लिए सतत चिंतित रहने वाले डॉ सुरेश पंत जी की नई पुस्तक 'साधो, शब्द विचारो'।  किताब की भूमिका (कहे बिना रहा न जाए) में वे लिखते हैं- 'भाषा एक व्यक्ति की नहीं, पूरे समाज की सम्पत्ति होती है।' तो, जंतर-मंतर में जो गालियां थीं, वे भी पूरे समाज की सम्पत्ति हैं! शर्मिंदा होना है तो पूरा समाज हो। खैर। 

यह देखना सुखद और संतोषप्रद है कि पिछले कुछ वर्षों में सुरेश पंत जी ने सोशल मीडिया (विशेष रूप से फेसबुक और पहले ट्विटर, अब X) के सामान्यत: आत्ममुग्ध मंच पर भाषा को बहस-मुबाहसे का बड़ा मुद्दा बना दिया है। सोशल मीडिया और मुख्य धारा के मीडिया की भाषा और वर्तनी पर उनकी सतर्क टिप्पणियों ने बहुत बड़ा वर्ग तैयार कर दिया है जो अब शब्दों व व्याकरण के प्रयोग पर सावधान रहता है अथवा उनसे अपनी शंकाओं का समाधान चाहता है। 

इसी विमर्श और शंका समाधानों  के अब भी जारी सिलसिले का एक और सुखद परिणाम है, शब्दों के प्रयोग और व्याकरण सबंधी आम त्रुटियों/सावधानियों पर उनकी चार पुस्तकों का प्रकाशन। 'शब्दों के साथ-साथ' के भाग एक एवं दो, 'भाषा के बहाने' तथा अब 'साधो, शब्द विचारो'। वास्तव में ये चारों पुस्तकें एक ही सिलसिले की कड़ियां हैं। 

भाषा के प्रति घोर लापरवाही के इस दौर में यह जानना और भी सुखद है कि डॉ पंत की पिछली तीन पुस्तकें 'बेस्ट सेलर' का दर्ज़ा पा चुकी हैं और अब भी लोकप्रियता के पायदान पर बहुत ऊपर बनी हुई हैं। इसमें संदेह नहीं कि हाल में प्रकाशित चौथी पुस्तक भी शीघ्र उसी श्रेणी में शामिल हो जाएगी। इसे देखते हुए मेरा यह कहना संदेह के दायरे में रखा जाना चाहिए कि यह दौर भाषा के प्रति घोर लापरवाही का है। 

'साधो, शब्द विचारो' में मुख्यत: 'किसी शब्द विशेष की उत्पत्ति, अर्थ और व्यावहारिक प्रयोग पर ही चर्चा केंद्रित है कि यह शब्द आया कहां से, उसके प्रयोग में क्या भ्रम है और क्यों आदि। फिर भी इसमें पिछली पुस्तकों की अपेक्षा एक स्पष्ट अंतर भी है। पिछली पुस्तकों में व्याकरण विषयों को प्राय: नहीं उठाया गया, क्योंकि भाषा में शब्दों का प्रयोग मुख्य है, व्याकरण तो आते-आते आता है।'

डॉ पंत रूढ़ अर्थों में भाषा विद‍ नहीं हैं, जो भाषा एवं शब्दों को परम्परा और व्याकरण की लाठी से हाँकने में भरोसा करते हैं। शब्दों के निर्मल बहाव की तरह वे भी उदार और लचीले हैं।  उनका मानना है कि 'जीवित भाषाएं निरंतर नए शब्दों को ग्रहण करती रहती हैं और पुराने को भी नए-नए अंदाज़ में उलटती-पुलटती रहती हैं। व्याकरण भाषा के समकालीन प्रयोग को देख-परखकर उसके लिए कुछ नियम बनाता है, किंतु समय के साथ-साथ धीरे-धीरे भाषा का प्रवाह अपने कूल-कगारों को लांघता हुआ आगे बढ़ जाता है।'

पंत जी इतने उदार हैं कि प्रचलन में स्वीकार कर लिए कुछ गलत शब्दों को भी खारिज नहीं करते। जैसे, सही शब्द है 'धूमपान'। 'धूम्रपान' गलत है क्योंकि 'धूमपान' करने वाले 'धूम' (धुएं) का पान करते हैं, 'धूम्र' (धुएं के रंग) का नहीं। लेकिन लम्बे समय से प्रयोग में आते-आते 'धूम्रपान' का वही अर्थ ग्रहण कर लिया गया है जो वास्तव में 'धूमपान' का है। इसलिए वे इसे स्वीकार्य मानते हैं। 

वास्तव में यही व्यावहारिक है और पंत जी की पुस्तकें शब्दों और व्याकरण का व्याहारिक-तार्किक प्रयोग सिखाती हैं। वे समय में पीछे जाकर जमाने भर की अशुद्धियों को डंडा लेकर सुधारने में विश्वास नहीं करते। लेकिन अगर आप 'अज्ञान' के लिए 'अज्ञानता' लिखते हैं, तो पंत जी  उसे स्वीकार्य नहीं मानते क्योंकि 'अज्ञान' अपने आप में भाववाचक विशेषण है, उसमें 'ता' जोड़कर फिर से भाववाचक विशेषण बनाने की न जरूरत है, न ग्राह्य। 

पंत जी कहते हैं कि हिंदी संस्कृत से उपजी जरूर है लेकिन हिंदी का अपना व्याकरण है, जो संस्कृत व्याकरण से कई मायनों में फर्क है । उस पर जबरन संस्कृत का व्याकरण क्यों ठूंसना? संस्कृत' में 'दम्पती' सही हो सकता है, लेकिन हिंदी का व्याकरण 'दम्पती' को नहीं पचा पाता। उसमें 'दम्पति' ही सही ठहरता है। 

'साधो, शब्द' विचारो' सहित उनकी सभी पुस्तकें रोचक शैली और व्यंग्य व हास्य-पुट के साथ लिखी गई हैं। इसीलिए इन्हें पढ़ना भाषा और व्याकरण की बोझिल पुस्तकों की तुलना में बहुत आनंददायी भी है। अपनी फेसबुक एवं X पोस्टों में भी वे बड़ी चुटीली शैली का प्रयोग करते हैं। 'अरे, बाप रे', 'इन तिलों में तेल कहां!', 'कट्टी-बट्टी के दिन', 'ए भाई, जरा देख के चलो' जैसे शीर्षक पढ़ने की उत्सुकता जगाते हैं और बिल्कुल सहज-सरल ढंग से सही वर्तनी की चूक और व्याकरण की भूल समझा जाते हैं। 

क्या ही अच्छा हो कि प्रिंट और टीवी मीडिया के समाचार कक्षों में पंत जी की चारों पुस्तकें रखवा दी जाएं और सम्पादकों-पत्रकारों में इतनी विनम्रता आ जाए कि वे समय-समय पर उन्हें पढ़ते रहें। आज हिंदी की सर्वाधिक दुर्दशा मीडिया ही कर रहा है।

हमारे समय के न्यूज-रूम शब्दकोशों और संदर्भ ग्रंथों से समृद्ध रहते थे। सम्पादकों की ओर से भी लगभग प्रतिदिन भाषा और वर्तनी प्रयोग के निर्देश मिलते रहते थे।  

बहरहाल, पंत जी को बहुत-बहुत बधाई। शुभकामनाएं भी वे कि वे अस्थिर स्वास्थ्य और उम्र की बाधाओं पर विजय पाते हुए भाषा-विमर्श के मोर्चे पर सक्रिय बने रहें।   

- नवीन जोशी, 27 जुलाई 2026, लखनऊ।

'साधो, शब्द विचारो', पेंग्विन स्वदेश,2026, पृष्ठ-299, मूल्य- 399/- इस क्रम में उनकी अन्य पुस्तकें हैं- 'शब्दों के साथ-साथ, भाग 1 एवं भाग 2' -दोनों पेंग्विन स्वदेश और 'भाषा के बहाने' (नवारुण प्रकाशन)   

 

 

 

 

 

Saturday, July 25, 2026

'उर्फ कीड़ा' : जब पूरा तंत्र ख़ौफ़ खाने लगता है!

 'तद्भव' पत्रिका में राजू शर्मा के नए उपन्यास 'उर्फ कीड़ा' का पाठ और जंतर-मंतर में जेन-जी के आंदोलन की (आंशिक) जीत मेरे लिए एक साथ ही हुए। क्या शानदार और आनंददायी संयोग रहा!

यह व्यवस्था, यह क्रूर तंत्र अपने समस्त अंगों के दमनात्मक व्यवहार से निर्दोष, सचेत और खरे नागरिकों को  कीड़ा बना देना चाहती है- अस्तित्वहीन, नगण्य। शासन-प्रशासन एवं न्यायतंत्र के वैभव को स्थापित करने के लिए उन्हें कठोरतम धाराओं में जेल में ठूंस देती है- वर्षों तक बिना सुनवाई, आरोप पत्रों के अम्बार में ही उसकी हस्ती खत्म कर देती है, उसका मजाक बनाती है। 

लेकिन वही व्यक्ति जब खत्म हो जाने से इनकार कर देता है, अपने विलीन होते अस्तित्व में, किंचित ठसक के साथ, और अधिक सिकुड़ने या पूरी तरह मिट जाने से इनकार कर देता है, तो वही अदना नागरिक इस तंत्र के लिए , इस सत्ता संरचना के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन जाता है।

यह 'उर्फ कीड़ा' उपन्यास की कथा का सार है और यही कल जंतर-मंतर में जेन-जी ने कर दिखाया। खुद को सबसे ताकतवर मानने वाले को, कभी न झुकने वाले को, बर्बर दमन से आतंक मचाने वाले इस तंत्र को 'कॉक्रोचों' ने हरा दिया!  कॉक्रोचों ने जब खत्म हो जाने से इनकार कर दिया, जब डर को झटक दिया तो तंत्र डर गया। 

'उर्फ कीड़ा' में भी यही होता है।  राजू शर्मा ने अपने समय की क्या खूब कथा कही है। 

एक निर्दोष, सामान्य व्यापारी को राष्ट्रद्रोह और कई अन्य खतरनाक अपराधों का मुल्जिम बनाकर जेल में ठूंस दिया गया है। पांच साल से ऊपर हो गए हैं, उसकी कोई सुनवाई नहीं होती। हजारों पृष्ठों का आरोप पत्र दाखिल किया गया है, उसमें और पन्ने जुड़ते जा रहे हैं, अदालत में पेशी के समय जज उसकी ओर देखते तक नहीं। जज, दोनों पक्षों के वकील, पूरा तंत्र अच्छी तरह जानता है कि वह निर्दोष है लेकिन उन्हें अपने न्यायतंत्र की उपयोगिता और शक्ति दिखानी है। तंत्र अपना काम पूरी शक्ति से करता है। 

एक दिन अपने निर्दोष साबित होकर रिहा होने की उम्मीद टूट जाने पर मुल्जिम सिकुड़ने लगता है। छह फुट का उसका कद रोज एक सेंटीमीटर की निश्चित दर से कम होने लगता है। यह नोटिस करने के बाद पूरे तंत्र में हड़कम्प मच गया है। हजारों करोड़ रु के बजट से और शासन-प्रशासन से लेकर सेना और समस्त विज्ञान शाखाओं के वरिष्ठ अधिकारी इस अलौकिक रहस्य का पता करने में जुट जाते हैं। 

राजू शर्मा मानव-विज्ञान की वास्तविकताओं, शोधों और कल्पनाओं की उड़ान से इस सब का विस्तार से जबर्दस्त आख्यान रचते हैं। इस पढ़ने के लिए तनिक धैर्य भी चाहिए ही। वे बार-बार काफ्का और उसकी रचनाओं का, विशेष रूप से 'द ट्रायल' का उल्लेख करते हैं, जिसका पात्र 'के' ऐसी ही मनस्थितियों से गुजरता है। काफ्का की विख्यात कथा 'मेटामॉर्फोसिस' का नायक एक सुबह नींद खुलने पर पाता है कि वह इनसान से एक बड़े कीड़े में बदल गया है। खैर। 

 'उर्फ कीड़ा' का नायक मुल्जिम धीरे-धीरे दो इंच तक सिकुड़ चुका है। छह फुट का आदमी दो इंच का रह गया है लेकिन उसकी समस्त संवेदनाएं एवं मानवीय चेतना जाग्रत हैं। वह पूरा का पूरा मनुष्य ही है, हालांकि तंत्र उसे घिनौना कीड़ा, छछूंदर, गिलहरी, और भी जाने क्या-क्या कहता है। उससे नफरत करता है लेकिन डरता भी है कि कहीं यह किसी शत्रु देश का जासूसी यंत्र-मानव तो नहीं, कहीं कुछ अनिष्ट न कर बैठे। तंत्र अपनी शंकाओं में सब कुछ मानने लगता है, लेकिन उसे मानव मानने को तैयार नहीं है।  

इस सिकुड़न को समझ पाने में असमर्थ और उससे निपटने से आज़िज़ आ चुके अधिकारी यह मनाने लगते हैं कि सिकुड़ते-सिकुड़ते एक दिन वह गायब ही हो जाए, तो जान छूटे। यद्यपि वे डरते भी हैं कि गायब होकर जाने वह कहां, किस रूप में प्रकट हो जाए और जाने क्या कर बैठे।  

कहानी तब और रोचक हो उठती है, जब मुल्जिम दो इंच के बाद सिकुड़ना बंद कर देता है। उसका कद यहां स्थिर हो गया है। उसकी मानवीय  चेतना, मेधा और संवेदनाएं और भी प्रखर हो गई हैं। वह अब परेशान नहीं है, बल्कि तंत्र के डर का, उसकी बेचैनियों, नींद-हर चिंताओं और दिन-प्रति दिन बढ़ते भय का आनंद ले रहा है। उसे सुदूर किसी द्वीप के गहन सुरक्षा-व्यवस्था से घिरे किले में हर वक्त की निगरानी में कैद कर दिया गया है। पूरा तंत्र उससे भय खाता है। चौकस रहता है।

उपन्यास के अंत का दृश्य है कि उस दो इंची 'कीड़े' के सामने विशाल सिंहासन पर उच्चस्थ पदधारक, तंत्र का शक्तिशाली मुखिया बैठा हुआ है। दो इंच का वह मुल्जिम (हालांकि अब वह मुल्जिम नहीं रहा, उसके विरुद्ध सारे अभियोग बंद या स्थगित कर दिए गए हैं।) एकटक उसे देख रहा है। उच्चस्थ व्यक्ति उसकी ओर देखने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा। बीच-बीच में चोरी से उसे देखता है और तुरंत अपना मुंह घुमा लेता है। उसके चहेरे पर हवाइयां उड़ रही हैं।

कीड़ा मुस्करा रहा है। शायद हंसने भी वाला है‍! 

जब ये पंक्तियां पढ़कर मेरे होंठों पर तिर्यक मुस्कान तैर रही थी, उसी समय जंतर-मंतर में 'कॉक्रोच' जश्न मनाने लगे थे। 

इतना अच्छा, झिंझोड़ने वाला उपन्यास लिखने के लिए राजू शर्मा जी और 'तद्भव' में प्रकाशित करने के लिए अखिलेश जी को बधाई।  

- न जो, 26 जुलाई, 2026, लखनऊ  

Thursday, July 23, 2026

बुद्ध के जीवन, धर्मोपदेश और विचारों पर रोचक पुस्तक

 

भगवान बुद्धप्रसिद्ध इतिहासकार और पुरातत्वविद्‍ डॉ किरण कुमार थपल्याल की हाल में प्रकाशित पुस्तक है। बुद्ध के जीवन, धर्म-दर्शन तथा संघ पर उनके गहन अध्ययन और शोध का परिणाम है यह पुस्तक। लखनऊ विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्व विभाग के अध्यक्ष एवं छात्रों में लोकप्रिय शिक्षक रह चुके प्रो थपल्याल की सिंधु सभ्यता पुस्तक (डॉ संकटा प्रसाद शुक्ल के साथ सह-लेखन) चर्चित हुई थी। 1976 में पहली बार प्रकाशित इस पुस्तक के अब तक नौ संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं।

बुद्ध के जीवन और बौद्ध धर्म-दर्शन पर अनेकानेक पुस्तकें उपलब्ध हैं। अब भी उसके विविध पक्षों पर पुस्तक-प्रकाशन तथा विद्वानों के बीच विमर्श जारी रहता है। बुद्ध और उनके धर्म-दर्शन ने दक्षिण एशिया ही नहीं, सुदूर यूरोप और अमेरिका तक बहुत बड़ी आबादी को सदियों तक प्रभावित किया। आज भी उसकी विविध शाखाओं-मार्गों के अनुयायियों की काफी बड़ी संख्या इन देशों में है। कालांतर में विविध कारणों से, जिनमें भारतीय महाद्वीप में हिंदू धर्म का आक्रामक विस्तार भी शामिल है, बौद्ध धर्म का पराभव होता गया लेकिन उसकी जड़ें इतनी मजबूत और गहरी पड़ चुकी थीं कि उसकी सशक्त उपस्थिति सभी जगह जमी रह गईं। आज भी उसके प्रति आकर्षण अनुभव किया जाता है। हिंदू धर्म की अनेक जड़ताओं से परेशान लोग बुद्धम् शरणम् गच्छामिउच्चारते हुए उधर का रुख करते हैं। बाबा साहब भीमराव आम्बेडकर ने इसी कारण बौद्ध धर्म अपना लिया था। बहुजन समाज में बौद्ध धर्म के प्रति अतिरिक्त आकर्षण स्वाभाविक ही पाया जाता है।

प्रो थपल्याल की यह पुस्तक बुद्ध के प्रारम्भिक जीवन, मानव जीवन के दुख से दुखी होकर उनके गृह-त्याग और लम्बी भटकन, अंतत: ज्ञान प्राप्ति, प्रारम्भिक शिष्यों को प्रवचन, संघ की स्थापना, धर्म प्रचार, अंतिम दिन और परिनिर्वाण, धर्म के मूल आधार, उसके सैद्धांतिक पक्ष, बुद्ध के उपदेशों, बुद्धकालीन बौद्ध संघों, विभिन्न मुद्दों पर बुद्ध के विचार, आदि-आदि पर विस्तार से चर्चा करती है। नौ अध्यायों और पांच परिशिष्टों वाली यह पुस्तक बुद्ध के जीवन और उनके धर्म व संघ को सम्पूर्ण रूप में देखती है। कहीं-कहीं आलोचनात्मक निगाह से भी। बुद्ध को चूंकि बाद में भगवान का दर्ज़ा दे दिया गया था, इसलिए उनके बारे में अनेक किंवदंतियां प्रचलित हो गईं और बहुत सारे मिथक गढ़ लिए गए। पुस्तक में उन सबका जिक्र है, साथ ही उस संदर्भ में विभिन्न विद्वानों के अलग-अलग मत और कहीं-कहीं उसके संभावित कारणों का भी उल्लेख किया गया है।

बुद्ध के मांसाहार सबंधी विचार और विशेष रूप से स्त्रियों के बारे में उनकी बातें विवादास्पद भी रहीं। वे मांसाहार का निषेध करते थे लेकिन अगर भोजन मात्र के लिए जीव हत्या न की गई हो तो अनुमति भी देते थे, ऐसे प्रसंग मिलते हैं। स्त्रियों के बारे में उनके विचार अत्यंत विवादास्पद और स्त्री-विरोधी रहे हैं। हालांकि उन्होंने सुजाता और आम्रपाली को उपदेश दिया, उन्हें उपदेश देकर संघ में शामिल होने की अनुमति दी और भिक्षुणी संघ की भी स्थापना की, लेकिन वे भिक्षुणियां हमेशा और हर हाल में भिक्षुओं से निचले पायदान पर रखी गईं। बुद्ध का यह कथन बहूद्धृत है- एक बार उनके प्रिय शिष्य आनंद ने उनसे पूछा- स्त्रियों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए, बुद्ध ने कहा- स्त्रियों की ओर देखो ही मत, अगर दिख जाए तो उनसे बात मत करो, यदि वे बात करें तो सतर्क एवं सावधान रहो। वे स्त्रियों को आसक्ति का भण्डार मानते थे और कहते थे कि पत्नी का दायित्व हर प्रकार पति की सेवा करना है, वगैरह। यह विचार्णीय है कि क्या बुद्ध-पश्चात हिंदू धर्म में स्त्रियों की पुरुष की दासी जैसी स्थितियां बुद्ध के उपदेशों के प्रभाव के कारण बनीं!

खैर, बुद्ध के उपदेशों की विस्तार से चर्चा करते हुए प्रो थपल्याल विभिन्न विद्वानों द्वारा की गई व्याख्याएं तथा स्पष्टीकरण भी प्रस्तुत करते हैं। पुस्तक के मुख्य अध्यायों के अंत में संलग्न पाद टिप्पणियां इस संदर्भ में उल्लेखनीय हैं। यहां वे बौद्ध साहित्य के विपुल भण्डार से विविध मत-सम्मत उद्धृत करते हैं और पाठक के सामने विकल्प छोड़ देते हैं कि वह इन मत-मतांतरों से गुजरने के बाद अपनी स्वतंत्र धारणा बना सके।

बुद्ध के उपदेशों और धर्म के मूलाधारों का वर्णन करते हुए प्रो थपल्याल स्पष्ट कह्ते हैं कि –“यह पूर्णतया निश्चित करना कठिन है कि बौद्ध ग्रंथों में बुद्ध के नाम से जो उपदेश उपलब्ध हैं, उनमें से कौन वास्तव में उन्हीं के द्वारा दिए गए थे और कौन बाद में जोड़े गए। इस कृति में यथासम्भव उन्हीं को स्थान दिया गया है, जिन्हें अधिकांश विद्वान उनके द्वारा दिए गए मानते हैं।”

बुद्ध ने अपने प्रथम प्रवचन में चार आर्य सत्यबताए थे- दुख है, दुख का कारण है, कारण है इसलिए दुख का निवारण भी सम्भव है, और ऐसा अष्टांगिक मार्गों पर चलने से सम्भव है। ये अष्टांगिक मार्ग हैं- सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाक् (वाणी), सम्यक कर्मांत, सम्यक आजीव, सम्यक व्यायाम, सम्यक स्मृति और सम्यक समाधि। प्रो थपल्याल इन सब की विस्तार से व्याख्या करते हैं और तत्पश्चात बौद्ध धर्म के सैद्धान्तिक पक्ष की विवेचना करते हैं। इसमें दस शीलों का वर्णन है- प्राणियों की हिंसा से विरति, जो न दिया गया हो उसे न लेना, काम में मिथ्याचार से विरति, झूठ बोलने से विरति, सुरा-मैरेय-मद्य आदि नशीले पदार्थों से विरति, असमय भोजन से विरति, नृत्य-गीत-वादित और तमाशे से विरति, माला-सुगंधित पदार्थ का लेपन-धारण और अलंकरण से विरति, आरामदेह बिछावन से विरति तथा सोने-चांदी के परिग्रहण से विरति। अहिंसा पहला शील है लेकिन बुद्ध के अनुसार अनजाने में हुई हिंसा, यहां तक कि हत्या भी, अपराध नहीं है।

बौद्ध भिक्षु के लिए निर्वाण की प्राप्ति सर्वोच्च आदर्श है। यही उसकी आध्यात्मिक यात्रा का अंत है। निर्वाण का अर्थ है- तृष्णा का अंत। जैसे दीपक की लौ बुझने पर समाप्त हो जाती है, इधर-उधर या ऊपर-नीचे नहीं जाती, उसी तरह निर्वाण होने पर जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति मिल जाती है। तात्विक दृष्टि से यह अहम् का अंत है और नैतिक दृष्टि से लोभ, घृणा और अज्ञान का नाश करने वाला है।बुद्ध यह भी कहते थे कि केवल मेरे उपदेश सुनने से ही दुख का निरोध और निर्वाण की प्राप्ति नहीं हो सकती। उसके लिए मेरे बताए हुए मार्ग पर चलने का निरंतर प्रयास करना होगा। मेरा काम मार्ग बताना है, उस मार्ग पर चलना लोगों का काम है।

अनात्मवाद, अनित्यवाद और अनीश्वरवाद बौद्ध धर्म के प्रमुख सिद्धांत हैं। वे मानते हैं कि आत्मा की स्वतंत्र सत्ता नहीं होती। अनित्यवाद यह है कि सभी वस्तुएं अनित्य हैं यानी शाश्वत नहीं हैं। उनमें हर पल परिवर्तन होता रहता है और बुद्ध की शिक्षाओं में ईश्वर के लिए कोई स्थान नहीं है। मनुष्य अपने कर्मों के लिए स्वयं उत्तरदायी है और अपना आप भाग्यविधाता है।

यह त्रासदी ही कही जाएगी कि अनीश्वरवादीबुद्ध के भक्तों/भिक्षुओं ने बुद्ध को ही भगवान का दर्ज़ा दे दिया! बुद्ध को भगवान बनाने में हिंदू धर्मों के मठाधीशों का भी बड़ा हाथ है। जब बौद्ध धर्म तेज़ी से चारों ओर फैलने लगा तो उसकी लोकप्रियता से चिंतित हिंदू मठाधीशों ने बुद्ध को भगवान विष्णु का अवतार घोषित कर दिया और बौद्ध धर्म को हिंदू धर्म का ही एक अंग बता दिया।  

पुस्तक में बुद्ध के आचरण, उनसे जुड़ी दंतकथाओं, उनके उपदेशों की व्याख्या, उनकी यात्राओं, मुलाकातों, उनके निर्वाण से लेकर निर्वाण पश्चात अस्थियों के वितरण और स्तूपों के निर्माण, आदि के विवरण भी रोचक शैली में दिए गए हैं। पुस्तक में बुद्धकालीन संघों और भिक्षुओं से आचरण की अपेक्षाओं के अलावा परिशिष्ट में विभिन्न सामाजिक-आर्थिक मुद्दों पर बुद्ध के विचार व्याख्या सहित शामिल हैं।

भगवान बुद्धपुस्तक बहुत परिश्रम और अध्ययन के साथ लिखी गई है। इसीलिए वह पठनीय और रोचक भी बन पड़ी है। किताब के अंत में बुद्ध के जीवन के विविध अवसरों को दर्शाते 20 प्राचीन मूर्तिशिल्पों के चित्र भी परिचय सहित दिए गए हैं। ये चित्र अजंता, सारनाथ, भरहुत, सांची, आदि में प्राप्त हुए थे।

-    नवीन जोशी

(पुस्तक- भगवान बुद्ध, लेखक- प्रो किरण कुमार थपल्याल, प्रकाशक- उ प्र हिंदी संस्थान, पृष्ठ- 350। मूल्य- 445/-)       

 

Sunday, July 19, 2026

सबाल्टर्न दृष्टि-सम्पन्न योद्धा आलोचक

फेसबुक में झांकता हूं तो सबसे पहले वीरेंद्र यादव की अनुपस्थिति कचोटती है।

प्रत्येक ऐसे मुद्दे पर, जहां सचेत-विवेकी बौद्धिक का तत्काल एवं तार्किक हस्तक्षेप आवश्यक लगता था, वीरेंद्र जी अपनी बेबाक टिप्पणी के साथ वहां दिख जाते थे। रायपुर के एक विश्वविद्यालय में आयोजित गोष्ठी में आमंत्रित वरिष्ठ कथाकार मनोज रूपड़ा के साथ कुलपति के दुर्व्यवहार के बारे में 11 जनवरी 2026 को उन्होंने अपनी टिप्पणी इस प्रकार शुरू की थी- “शर्मनाक था वह दृश्य! कुलपति सर्वशक्तिमान था, उसने वही किया जो अविवेकी सत्ता अक्सर करती है।” इसके बाद उनकी तीखी धार “हिंदी संसार के कुछ दैदीप्यमान सितारोंकी ओर मुड़ गई थी जो मनोज रूपड़ा को गोष्ठी से बाहर निकल जाने का आदेश सुनाए जाने के बाद भी “अविचलित और अविराम सभागार में बने रहे। सभा फिर जुटी, कुलपति फिर पूरे अंदाज़ में बोले। अन्य आमंत्रित प्रतिभागी लेखकों ने अपनी गुरुत्तर भूमिका का निर्वहन किया, इस आश्वस्ति के साथ कि वे अनुशासित लेखकों की तरह अन्य आयोजनों में ससम्मान बुलाए जाते रहेंगे। यह समय किसी को कुछ याद दिलाने, सामाजिक भूमिका निभाने और सत्ता के समक्ष रीढ़ सीधी रखने का विनम्र सुझाव देने का भी नहीं है। यह समय इस दृश्य के द्रष्टा होने से उपजी शर्म में डूब जाने का है। यह मनोज रूपड़ा का अपमान नहीं, यह लेखकीय अस्मिता पर हमला है। अफसोस कि इस दौर में कुछ लेखक भी इसके सहभागी हैं और हम जैसे कुछ इसके विवश दर्शक।”

16 जनवरी की सुबह अचानक उनका चला जाना इसलिए और भी तकलीफदेह है कि इस रचना विरोधी एवं बढ़ती लेखकीय रीढ़विहीनता के दौर में उनके विरल लेकिन सार्थक, विवेकशील और प्रतिरोधी तेवरों की बहुत जरूरत महसूस होती है। उनके ऐसे हस्तक्षेपों का कई लोग इंतज़ार करते थे और उनमें अपनी आवाज मिलाते हुए साझा भी किया करते थे। उनकी उपर्युक्त टिप्पणी सैकड़ों लोगों ने लाइककी, उस पर 74 टिप्पणियां दर्ज़ हुईं और 23 लोगों ने उसे अपनी-अपनी वाल पर साझा भी किया था।

मैंने और कई अन्य मित्रों ने उनसे एकाधिक बार शिकायत की थी कि फेसबुक जैसे माध्यमों में अपनी रचनात्मक ऊर्जा खर्च करके वे उन जरूरी तथा गम्भीर आलोचनात्मक कामों के लिए समय नहीं निकाल पा रहे हैं, जो उन्हें करनी हैं और जिन्हें वे ही सबसे अच्छी तरह कर सकते हैं। कई बार वे विरोधियों और कुतर्कियों के साथ फेसबुक पर भिड़ जाया करते थे और अपने तर्क एवं उद्धरण पेश करके मुंहतोड़ जवाब देने में बहुत समय लगा दिया करते थे। इस शिकायत के बावजूद हमें उनकी टिप्पणियों का इंतज़ार रहता था। फेसबुक पर ही नहीं, साहित्यिक गोष्ठियों-सेमीनारों अथवा पत्र-पत्रिकाओं में भी, जहां वे कोई भी कुतर्क, कुपाठ या तथ्यों के साथ तोड़-मरोड़ सहन नहीं कर पाते थे, तुरंत प्रतिरोध दर्ज़ कर देते थे। फेसबुक, ‘जनसत्ताऔर कथादेशमें ओम थानवी, उदय प्रकाश, कमलेश, अर्चना वर्मा और कमलकिशोर गोयनका के साथ उनकी कुछ मुद्दों पर लम्बी भिड़ंत हुईं। गहन अध्ययन और विलक्षण स्मृति इस सब में उनके बेहतरीन हथियार होते थे। बढ़ती साम्प्रदायिक्ता और हिंदू राष्ट्रवाद के विरुद्ध उनकी सार्वजनिक सक्रियता भी काबिले गौर थी।

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1973 में जब मैं लखनऊ विश्वविद्यालय में दाखिल हुआ तो वीरेंद्र यादव एक वर्ष पूर्व राजनीतिशास्त्र में एमए की डिग्री लेकर बाहर आ चुके थे। वह हमारी बहुविध सक्रियता और सीखने का दौर था। ठाकुर प्रसाद सिंह, राजेश शर्मा, कृष्ण नारायण कक्कड़, प्रबोध मजूमदार, गोपाल उपाध्याय, मुद्राराक्षस, बीर राजा, नरेश सक्सेना, राकेश आदि के साथ होने वाली मुलाकातों-चर्चाओं में वीरेंद्र यादव खूब मुखर रहा करते थे। अमृत लाल नागर, यशपाल और भगवती चरण वर्मा यदा-कदा कॉफी हाउस आते थे। कुंवर नारायण अपने घर पर बैठकी जमाते थे। लीलाधर जगूड़ी उसी दौरान लखनऊ आए और कुछ समय बाद कामतानाथ भी। विनोद दास और अखिलेश कुछ और वर्षों बाद लखनऊ पहुंचे। लखनऊ की वह साहित्यिक बिरादरी खूब सक्रिय रही। बाद के वर्षों में वीरेंद्र यादव, राकेश वेदा और अखिलेश का खूब याराना रहा। वीरेंद्र जी के कई महत्त्वपूर्ण लेख हमने अखिलेश के सम्पादन में तद्भवमें ही पढ़े।

हज़रतगंज के काफी हाउस से लेकर अमीनाबाद के कंचना तक, जहां वे लम्बी बैठकें जमाते थे, वीरेंद्र जी की उपस्थिति रचनात्मक गर्मी पैदा करती थी। पारिवारिक माहौल के कारण किशोरावस्था से ही वे पढ़ाकू हो गए थे। विश्वविद्यालय तक पहुंचते-पहुंचते वे नएहरू की डिस्कवरी ऑफ़ इंडियाऔर ऑटोबायग्राफी’ (नेहरू), महात्मा गांधी की जीवनी, आदि कई पुस्तकों से लेकर टॉमस हार्डी, चार्ल्स डिकंस, बर्नाड शॉ समेत बहुत सारा अंग्रेजी साहित्य पढ़ चुके थे। समाजशास्त्रीय लेखन-विश्लेषण पढ़ना और बहसें करना उन्हें विशेष प्रिय था और हिंदी से अधिक अंग्रेजी की पुस्तकें पढ़ना भी। तत्कालीन सभी पत्र-पत्रिकाएं उनकी दिनचर्या का हिस्सा थीं। टाइम्स लिटरेरी सप्लीमेंट’, ‘इंकाउण्टर’, ‘न्यू स्टेट्समैनजैसी पत्रिकाएं पढ़ने के लिए वे ब्रिटिश कौंसिल लायब्रेरी में बैठे दिखते थे। छात्र जीवन में ही उनका सम्पर्क समाजवादी युवजन सभा और स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इण्डिया से होते हुए वामपंथी नेताओं तक हो चुका था। जीवन बीमा निगम की नौकरी में आने के साथ ही वामपंथी श्रमिक संगठनों में सक्रिय हो गए। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य भी बने और अगला महत्त्वपूर्ण पड़ाव प्रगतिशील लेखक संगठन से जुड़ना और उसमें सक्रिय भागीदारी करना था। यह पृष्ठभूमि उन्हें रचनात्मक रूप से ऊर्जावान और बहसों में आगे रखती थी। याददाश्त उनकी बहुत तेज़ थी ही। उनकी स्पष्टवादिता और बहसों में तथ्यों-तर्कों के साथ डटे रहना हमें उनकी ओर विशेष रूप से आकर्षित करते थे।

1977 में पत्रकारिता में आने के बाद मेरा उनसे सम्पर्क और गहरा हुआ। सलाह-मशविरे, जानकारियों और विभिन्न मुद्दों पर टिप्पणियों के लिए वे सहज उपलब्ध रहते थे। अखबार में कुछ अच्छा लगा तो तारीफ करते और गड़बड़ पाने पर टोकने और समझाने में भी कोई संकोच नहीं करते थे। मेरी कहानियों और उपन्यासों पर उन्होंने बेबाक राय दी। उनसे अच्छी पुस्तकें पढ़ने को मिलती थीं और यह सलाह भी कि कौन-कौन संदर्भ ग्रंथ अवश्य अपने पास रखने चाहिए। यह रिश्ता खूब चला और उनके जाने के साथ ही खत्म हुआ। व्यवहार में विनम्र किंतु अपनी बात पूरे जोर से रखने और उस पर लड़ने की हद तक कायम रहने के लिए वे ख्यात थे। इसी कारण एक विवाद के बाद उन्होंने भाकपा की सदस्यता छोड़ दी थी। उनका सबसे अधिक वैचारिक विवाद मुद्राराक्षस के साथ होता था, झगड़े की सीमा तक, लेकिन दोनों का याराना भी उतना ही सबल था। हाल के वर्षों में अपने कई साथी एवं वरिष्ठ रचनाकारों तक को वे इस बात के लिए लगभग लताड़ देते थे कि आरएसएस-भाजपा के मंचों पर जाकर क्यों वे उन संगठनों को राजनैतिक वैधता प्रदान कर आते हैं, भले ही वहां उन्होंने उनके विरोध में ही बातें क्यों न कही हों।

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वीरेंद्र यादव अपने जिस योगदान के लिए सदा याद किए जाएंगे, वह है हिंदी आलोचना को एक सबाल्टर्न दृष्टिकोण देना, ‘आलोचना के कुलीनतंत्रसे बाहर कर दिए गए कई महत्त्वपूर्ण उपन्यासों का इसी दृष्टि से पुनर्पाठ करना, प्रेमचंद के उपन्यासों-कहानियों के साजिशन कुपाठ का तार्किक प्रतिरोध करना और कई लोकप्रिय तथा श्रेष्ठ घोषित उपन्यासों में कलावाद एवं भाषायी आस्वाद की चाशनी के पीछे छुपे धर्म आधारित शोषण एवं वर्णाश्रमी दृष्टि का पर्दाफाश करना।

राम विलास शर्मा, निर्मल वर्मा, रुपर्ट स्नेल और बाद के कुछ दलित लेखक-आलोचक जब प्रेमचंद की सामाजिक-राजनैतिक-दलित दृष्टि को नज़रअंदाज़ या प्रश्नांकित करते हैं, तब वीरेन्द्र यादव अपने गहन अध्ययन और पैनी नज़र से प्रेमचंद के साहित्य का पुनर्पाठ करके साबित कर देते हैं कि प्रेमचंद को कठघरे में खड़ा करने के लिए वास्तव में उनका कुपाठ किया जा रहा है। वे बकायदा मुठभेड़ की मुद्रा में सवाल उठाते हैं कि “अंग्रेजी औपनिवेशिक शासनकाल में राष्ट्रीय आंदोलन के प्रथम चरण के दौरान अवध के दुखी किसानों का प्रतिनिधित्व करते होरी की यंत्रणा के स्रोत कहां हैं? अंग्रेजी उपनिवेशवाद में, हिंदू धर्म की वर्णश्रमी सत्ता संरचना में, महज कर्ज की समस्या में या इनके समुच्चय में?” फिर वे गोदान और अन्य रचनाओं से उद्धरण-दर-उद्धरण देकर यह प्रमाणित कर देते हैं कि “प्रेमचंद भारतीय किसान की यातना की जड़ें उस मनुवादी वर्णाश्रमी व्यवस्था में तलाशते हैं, जो श्रमशील दलित समुदाय की मेहनत पर परजीवी सवर्ण आभिजात्य की विलासिता का आधार तैयार करती थी।” इसलिए, यह कहना कि “होरी की गाय पालने की लालसा वास्तव में गोदान करने की लालसा थी” (निर्मल वर्मा और रुपर्ट स्नेल) या “गोदान की मुख्य समस्या ऋण की समस्या है, क्योंकि प्रेमचंद स्वयं भी कर्ज के बोझ से दबे हुए थे” (राम विलास शर्मा) गोदानका मुकम्मल पाठ नहीं है, बल्कि जहां “राम विलास शर्मा “गोदानका सरलीकरण करते हैं” वहीं “निर्मल वर्मा का भाष्य प्रेमचंद की कथा दृष्टि से नि:सृत न होकर उनकी अपनी हिंदू धर्म की वर्णाश्रमी सोच का परिणाम है।” यहां यह उल्लेख भी समीचीन होगा कि वीरेंद्र जी प्रारम्भ में राम विलास शर्मा से प्रभावित थे लेकिन भारतीय सामाजिक संरचना में प्रभुत्ववादी वर्गों की अच्छी पड़ताल कर लेने के बाद वे उनके कटु आलोचक बन गए थे। 

प्रेमचंद पर दलित आलोचकों की आपत्तियों को तर्कों व उद्धरणों से खारिज करते हुए वीरेंद्र जी दिखा देते हैं कि वास्तव में “प्रेमचंद दलितों के आक्रोश एवं सशक्तीकरण को मौखिक अभिव्यक्ति तक सीमित न करके इसे आक्रामक प्रतिरोध की जिस तार्किक परिणति तक ले जाते हैं, वह दलित एकजुटता व अग्रगामी चेतना में उनकी लेखकीय आस्था का परिचायक है। किसी गैर दलित लेखक द्वारा दलित आक्रोश की यह (सिलिया-मातादीन प्रसंग में दलितों द्वारा ब्राह्मण दातादीन के मुंह में हड्डी का टुकड़ा डाल देना) साहसपूर्ण अभिव्यक्ति है।” प्रेमचंद के साहित्य का जैसा मुकम्मल पाठ वीरेंद्र जी ने किया है, वैसा और किसी आलोचक के यहां नहीं दिखता। प्रेमचंद पर उन्होंने काफी लिखा भी है। वे प्रेमचंद साहित्य के वास्तविक अधिकारी विद्वान व आलोचक ठहरते हैं।

वीरेंद्र जी मैला आंचलऔर आधा गांवजैसे बहुचर्चित उपन्यासों का भी पुनर्पाठ पेश करते हैं। वे कहते हैं कि “इन सरीखे श्रेष्ठ उपन्यासों को भी अपने देशकाल में बृहत्तर सरोकारों से काटकर महज उनके रूपवादी ढांचे एवं भाषायी कौशल की आस्वादपरक बहस तक केंद्रित कर दिया गया है,” जबकि वे अपनी सम्पूर्णता में निम्नवर्गीय भारतीय ग्रामीण समाज की चेतना के बदलाव की प्रक्रिया को उद्घाटित करते हैं।” वीरेंद्र जी मैला आंचलऔर आधा गांवके साथ अलग-अलग वैतरणी’ (शिव प्रसाद सिंह), ‘डूब’ (वीरेंद्र जैन), ‘इदन्नमम्’ (मैत्रेयी पुष्पा’) मुखड़ा क्या देखे’ (अब्दुल बिस्मिल्लाह) का भी विशेष उल्लेख करते हैं। उनके अध्ययन की व्यापकता और आलोचनात्मक दृष्टि का विस्तार इतनी दूर तक जाता है कि वे गोदानमें दलित प्रसंग की विवेचना करते हुए मुल्कराज आनंद के अछूतऔर आधा गांवकी विशेषताएं बताते हुए आग का दरिया (कुर्र्तुल ऐन हैदर) की तत्सबंधी कमजोरियों के साथ उदास नस्लें’ (अब्दुला हुसैन) एवं छाको की वापसी’ (बदीउज्जमा) की खूबियां भी गिना जाते हैं।

वीरेंद्र जी ने आलोचकों द्वारा उपेक्षित कर दिए गए कई महत्त्वपूर्ण उपन्यासों पर विस्तार से लिखा और सबाल्टर्नदृष्टि से उनकी व्याख्या की। जैसे, गोपाल उपाध्याय का एक टुकड़ा इतिहास’, शिव पूजन सहाय का देहाती दुनिया’, केदारनाथ अग्रवाल का पतिया’, नागार्जुन का बलचनमा’, अब्दुल बिस्मिल्लाह का मुखड़ा क्या देखे’, भीमसेन त्यागी का जमीन’, मंजूर एहतेशाम का बशारत मंजिल’, कमलाकंत त्रिपाठी के बेदखलपाहीघर’, जगदीश चंद्र के धरती धन न अपनाएवं नरककुण्ड में वास’, हृदयेश जोशी का लाल लकीरआदि। ऐसे कई उपन्यासों की विषय वस्तु और सामाजिकता की पड़ताल पर गहरी नजर डालकर जिम्मेदार आलोचक का दायित्व उन्होंने निभाया। एक दलित स्त्री और ब्राह्मण युवक के प्रेम, विवाह और तत्पश्चात दलित स्त्री के संघर्ष के आख्यान वाला गोपाल उपाध्याय का एक टुकड़ा इतिहास1975 में तब प्रकाशित हुआ था, जब दलित साहित्य या दलित विमर्श की चर्चा भी कहीं नहीं थी। वीरेंद्र जी लिखते हैं कि “प्रेमचंद ने गोदान में सिलिया-मातादीन के दलित प्रसंग को जहां छोड़ा था, यह उसके आगे की कथायात्रा है।” बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद हिंदी में लिखे गए उपन्यासों में आखिरी कलाम’ (दूधनाथ सिंह) को वे सर्वोच्च शिखर पर रखते हैं और उसे “हिंदी के वैचारिक संसार में नई पहलकदमी” बताते हैं।

दूसरी ओर, ‘कुरु कुरु स्वाहा’, ‘कसप’ (मनोहर श्याम जोशी), मुझे चांद चाहिए’ (सुरेंद्र वर्मा) जैसे कुछ बहुचर्चित, पठनीय उपन्यासों को चुस्त जुमलेबाजी, शातिर रचनात्मक खिलंदड़ेपन व विदूषकीय गाम्भीर्यऔर विपन्नता से विलास तक की कथा-यात्रा” कहकर उन्होंने खारिज किया। इस संदर्भ में उनकी गम्भीर चिंता थी कि हिंदी के कई लेखक भी अमेरिकन लेखकों या फिर शोभा डे, बलवंत गार्गी और नमिता गोखले जैसे पल्प-लेखकों से प्रभावित होकर उन्हीं का अनुसरण करने लगे हैं। उन्होंने भारतीय अंग्रेजी लेखकों के उपन्यासों पर भी व्यापक दृष्टि डाली और अरुंधती रॉय एवं सलमा रुश्दी की सार्थक सामाजिक-रचनात्मक हस्तक्षेप की प्रशंसा की है।

वीरेंद्र जी तो विनोद कुमार शुक्ल जैसे बहुपुरस्कृत-प्रशंसित विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यासों को भी अपनी धारदार आलोचना से तार-तार कर देते हैं। नौकर की कमीज’, ‘खिलेगा तो देखेंगेऔर दीवार में एक खिड़की रहती थीके लिए वे कहते हैं कि “प्रकटत: निम्न-मध्यवर्गीय जीवन की विडम्बनाओं और विसंगतियों को अपनी कथावस्तु बनाने के बावजूद ये उपन्यास अपनी अंतिम परिणतियों में महज एक कलाकारी बनकर रह जाते हैं।” इन उपन्यासों के बारे में प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह और विष्णु खरे की बेलाग प्रशस्तियों पर वे सवालिया निशान लगाते हैं और कहते हैं कि “राजनीति का निर्वासन और मूर्त स्थितियों का अमूर्तन ही इन उपन्यासों की वह कलात्मक उपलब्धि है, जिस पर हिंदी आलोचना के कुलीनतंत्र की सर्वसहमति है।” वीरेंद्र जी ने रागदरबारीजैसे अत्यधिक प्रशंसित उपन्यास की कुछ बातों के लिए सराहना करने के बावजूद उसे अंतत: एक प्रहसन और “व्यंग्य-विनोद का ऐसा प्रति-संसार रचने वाला बताया, जहां दुख, करुणा, सहानुभूति और सामाजिक सरोकार दृश्य ओझल हो जाते हैं।” जैनेंद्र, अज्ञेय, और भी कई लेखकों के उपन्यास उनकी तीखी नज़र से गुजरे हैं।

वीरेंद्र जी का आलोचक मानता है कि उपन्यास मात्र शिल्प की गढ़न और कथा रचना नहीं हैं। जिस समाज में वे लिखे जा रहे हैं, उसकी सामाजिक सत्ता संरचना से वे मुक्त नहीं हो सकते। भारतीय समाज की जड़ में बैठी वर्णाश्रम व्यवस्था, प्रभुत्वशाली वर्गों के वर्चस्व और उनके दमन तंत्र, साम्प्रदायिक शक्तियों के उभार और इन सबको मिलने वाली चुनौतियों के साथ ही लेखक की पक्षधरता देखे बिना साहित्य का मूल्यांकन करना अनुचित है। उनकी आलोचना-दृष्टि इसका निरंतर निर्वाह करती है और अपने पूर्ववर्ती आलोचकों को भी इसीलिए कटघरे में खड़ा करती है।

इसीलिए वीरेंद्र यादव का लिखा हुआ बहुत महत्त्वपूर्ण है। इस चुनौतीपूर्ण समय में वे अत्यंत आवश्यक स्वर थे। उनकी अभी बहुत जरूरत थी।  

-नवीन जोशी 

'सब लोग' पत्रिका (सम्पादक-किशन कालजयी) के मई 2026 अंक में प्रकाशित


   

        

Monday, May 25, 2026

‘आधे सूरज की धूप’- टीसती स्मृतियों में गुमशुदा स्त्री का चेहरा

परिवार के भीतर आपसी सबंधों के पेच एक अत्यंत संवेदनशील बच्चे को वयस्क बनाते हुए किन-किन और कैसी-कैसी जटिल व अंधेरी आंतरिक उलझनों-बिखरावों की दुनिया में ले जाते हैं जो उसके पूरे जीवन पर मंडराते रहते हैं, इसका टीसता हुआ मार्मिक वृतांत है नरेश गोस्वामी का पहला उपन्यास आधे सूरज की धूप लघु कलेवर (मात्र 83 पृष्ठ) का यह उपन्यास अपनी व्याप्ति में विराट है और पाठक को मथता चलता है। इसे पढ़ना अपने भीतर के अनेक गह्वरों में झांकते चलना भी है। अतीत की वे कौन सी चोट हैं, कौन सी अनुभूतियां हैं, जिनसे हम आजीवन छुटकारा नहीं पा पाते, जिनके प्रेत हमारे वर्तमान पर मंडराते रहते हैं?   

परिवार के सबसे छोटे बेटे अरविंद को पिता के फोन से चाचा की मृत्यु का समाचार मिलता है। पिता से भौतिक और मानसिक रूप से भी बहुत दूर जा चुके अरविंद की स्मृति-यात्रा के साथ उपन्यास शुरू होता है। कभी बालक अरु और कभी युवा आरवि होता हुआ वयस्क अरविंद मुख्य रूप से अपने पारिवारिक, विशेष रूप से माता-पिता के संबंधों की गांठों में झांकता है।

इस प्रक्रिया में उसके भीतर निरंतर आलोड़न-विलोड़न चलता है। वस्तुत: यह हालडोला उसके भीतर बचपन से ही शुरू हो गया था जिसने उसे न युवावस्था में प्रगतिशील राजनैतिक धारा में टिकने दिया और न बाद में किसी रिश्ते या नौकरी में। बचपन से आज तक वह भटकता ही रहा है। यह भटकन बाहरी से अधिक भीतरी है और उसके साथ इसका त्रास भी जुड़ा हुआ है। उसके वर्तमान पर अतीत के प्रेत मंडराते रहते हैं। हमें पता नहीं चलता कि बाहर से बिल्कुल सामान्य, चुस्त-दुरुस्त दिखता आदमी अपने भीतर किस यंत्रणा से गुजरता रहता है।

पिता (पितृसत्ता कह लीजिए) यहां अपराधी हैं, मां की घोर उपेक्षा करने का अपराधी, बच्चों की परवाह न करने का अपराधी, बड़े भाई का शोषण बर्दाश्त करने का अपराधी और अपने किए का बचाव करने के साथ मां को ही दोष देते रहने का अपराधी- ‘किसान परिवार से आई थी ... अनपढ़ और अनगढ़ थी, इसलिए जीवन भर भैंसों में उलझी रही ...पहले रिश्ते को नहीं भुला पाई ... समय के साथ नहीं चल पाई...।

रामरती (मां) पहले परिवार के बड़े लड़के शिवपाल से ब्याही गई थी। उस रिश्ते से एक पुत्र भी जन्मा था लेकिन न वह पुत्र बचा, न पति। तब वह दुत्कार और अपमान के बाद मायके भगा दी गई। जाते हुए वह अपने सबसे छोटे देवर से पूछती गई थी- बता, जिब तू बड़ा हो जावैगा तो मझे लैण आवैगा?’ वह बिना जाने-समझे जवाब देता है- हां, बड़ा होते ही लेने आऊंगा

और, मायके में ग्यारह वर्ष वैधव्य के काटने के बाद रामरती अपने से बारह वर्ष छोटे देवर की पत्नी बनकर फिर उसी घर में लौट आई। नए पति बने देवर ने उससे बच्चे पैदा किए लेकिन न कभी प्यार दिया, न पत्नी का मान-सम्मान। जेठ-जिठानियों ने भी उसे प्रताड़ना ही दी- या डंकिणी फेर आ गई! लेकिन वह हारी नहीं, मायके से एक गाय लेकर आई और उसके सहारे धीरे-धीरे कई भैंसों को पालकर परिवार चलाने वाली बनी, कमाऊ खेतों में खटी और खटते-खटते एक दिन मर गई।

तब अरविंद बहुत छोटा था लेकिन हर ओर से उपेक्षित वह मां, जो उसे भी बहुत स्नेह नहीं दे पाई, उसकी आत्मा में एक टीस बनकर बैठी रह गई- क्या उसकी ज़िंदगी उसी धुंए में धुंधवाती रही थी, जिससे बाहर आकर और आंखें पोछकर वह हमसे मिल लेती थी? क्या उसके भीतर कोई धागा नहीं बचा था जो बाहर फैले जीवन से जुड़ सके?’

नन्हे कलेवर के इस उपन्यास में वह मां सघन रूप से बसी हुई है। वह वाक्यों में है, पंक्तियों के बीच में है, घटनाओं में है, मौन में है। वह अरविंद की भटकन में टीसती है, खण्डहर हो रहे मकान की मिट्टी में महकती है, बुआ के किस्सों से झांकती है। मां के पीछे छिपी एक गुमशुदा औरतअरविंद के चेतन-अवचेतन में हमेशा बनी रहती है, इस कदर कि अरविंद जीवन भर किसी भी फिल्म में मां का जिक्र आने भर से भावुक हो जाता था और शर्मिंदा होना पड़ता था। इसीलिए उसने फिल्म देखना ही छोड़ दिया था।

उस मां को पति और परिवार का प्यार नहीं मिला लेकिन उसने सारा जग जीत लिया था, यह उसकी मौत के बाद पता चलता है जब शोक व्यक्त करने इतनी स्त्रियां आ जाती हैं कि घर के भीतर और दालान तक में उन्हें बैठाने की जगह नहीं बचती- कस्बे के अलग-अलग कोनों, कुम्हारों, लुहारों, छिप्पियों और मुसलमानों की गलियों से आई अनाम और अनजान औरतों का यह रेला देखकर मोहल्ले की परिचित ताई-चाचियां और घर के लोग हैरान थे... औरतों का यह तांता कई दिनों तक लगा रहा। कई तो महीनों बाद सिर्फ यह कहने आई कि घर में किसी काम की जरूरत पड़े तो खबर करवा दियो।

धरती-सी धैर्यवान और मजबूत यह मां अपने घर की नींव में ही नहीं थी, मामा की रखैलकही जाने वाली उस रसूलन के मान-सम्मान के लिए भी कमर बांध कर खड़ी रही, जिसने मामा के परिवार को बिखरने से बचा रखा था। और तो और, वह आततायी जेठ के हाथ का लट्ठ छीनकर उसके सामने चुनौती बनकर खड़ी हो गई थी। वह स्त्री उपन्यास से बाहर आकर पाठक के भीतर बैठ जाती है और वहीं बनी रहती है।

यह कथा एकरेखीय नहीं है और न इस तरह सिलसिलेवार कही गई है। अरविंद के अंतर में लगातार चलने वाले स्मृतियों के मोंताज में कथा के बिखरे-बिखरे तार उभरते और क्रमश: जुड़ते जाते हैं। उपन्यास पूरा होते-होते एक कसक गहरे उतर जाती है। शिल्प इतना प्रभावशाली और अलग किस्म का है कि कथा का कहीं विस्तार न होने, तारतम्य नहीं बनने, विवरणों में न जाने और कोई विशेष ढांचा खड़ा न किए जाने के बावजूद वह समग्रता में प्रवाहित होती है। भाषा में देशज छोंक इसे और आत्मीय बना देता है।  

जो पिता तीन चौथाई उपन्यास में अपराधी ठहरते हैं, वह वृद्धावस्था में जैसे बरी कर दिए जाते हैं, हालांकि इसका जवाब अरविंद के पास भी नहीं है कि क्या उसनें उन्हें सचमुच बरी कर दिया? ऐसा केवल अरविंद के साथ ही नहीं होता, वह फिलहाल जिस सबीना के साथ रिश्ते में बना हुआ है, वह भी अपने आरोपित पापा को बख्श देती है- यह महसूस करते हुए कि कि जो चोट मैंने अपने पापा को पहुंचाई थी, उसका घाव खुद मेरे अंदर हुआ था।

सबीना का किस्सा यह है कि जब वह चौदह-पंद्रह की थी तो उसकी मम्मी की मौत हो गई थी और चार महीने भी नहीं बीते थे कि पापा ने दूसरी शादी कर ली थी। सबीना उनसे भाग आई और फिर नहीं लौटी थी। दोनों को लगता रहा था कि उनके पास लौटने के लिए कोई जगह नहीं है।

यहां पंकज बिष्ट का उपन्यास उस चिड़िया का नामयाद आता है, जहां नायक पिता की मृत्यु के बाद उनके जीवन को किसी अभियोजन की दृष्टि से देखता रहता है। वास्तव में यह सब अपने ही भीतर झांकने की कोशिश है, अपने को समझने का प्रयास है। अंतिम पृष्ठों में अरविंद और सबीना की बातचीत इसे स्पष्ट कर देती है। सबीना के बहुत छोटे से प्रसंग में मदर मेरी कम्स टु मी’ (अरुंधती राय) की स्मृति भी कोंध जाती है।

उपन्यास के शुरू में पिता का जो फोन आया था कि महेंद्र चाचा की मौत पर अवश्य घर आना क्योंकि तुम दुनिया से कट गए हो’, उसका जवाब अंत में मिलता है, चालीस वर्षों में फैले तमाम स्मृति-मोंताज़ों की उड़ती-भागती यात्रा के बाद, अपने भाई गोविंद से यह कहने में कि गोविंद भाई, पिता जी से मेरे न आने का कोई बहाना बना देना।

आधे सूरज की धूपके बैक कवर पर दर्ज़ है कि सामाजिक-सांस्कृतिक विमर्शों और साहित्य में एक साथ आवाजाही करने वाले नरेश गोस्वामी का यह पहला उपन्यास है जो पिछले दस बरसों में अलग-अलग दिशाओं में भटकने के बाद अंतत: इस ठौर पर पहुंचा है।

और क्या खूब पहुंचा है!मैं इतना और जोड़ना चाहता हूं। शानदार उपन्यास के लिए गोस्वामी जी को बधाई और प्रकाशित करने के लिए सम्भावना प्रकाशन को साधुवाद।

- नवीन जोशी, 25 मई 2026, रामगढ़  

(‘आधे सूरज की धूप’ (उपन्यास), लेखक- नरेश गोस्वामी। सम्भावना प्रकाशन, हापुड़, पृष्ठ 83, मूल्य- 200 रु।)