Friday, August 14, 2026

'आज रच्यो है बसंत निजाम घर'- हमारी हिंदुस्तानियत की खुशबू

सन 1980 की बात है या उसके एक-दो वर्ष पहले की, 'लखनऊ महोत्सव' की एक शाम सांस्कृतिक पण्डाल के मंच पर मलिका पुखराज उपस्थित थीं। उन दिनों वे अपनी बेटी ताहिरा और दामाद (नाम याद नहीं) के साथ पाकिस्तान से भारत के दौरे पर आई थीं। ऐसा भी याद पड़ता है कि शायद भारत सरकार ने उन्हें किसी सम्मान-पुरस्कार के लिए आमंत्रित किया था। 

उन वर्षों में सरकारी आयोजन होने के बावजूद 'लखनऊ महोत्सव' बड़ी गरिमामय हुआ करता था। विशेष रूप से उसकी सांस्कृतिक संध्याओं में देश-विदेश के नामचीन कलाकार/संस्थाएं अपनी सर्वोत्तम प्रस्तुतियों से हमें चमत्कृत कर दिया करते थे। 

तो, पाकिस्तान के राजनीतिक घटनाक्रमों पर प्रच्छन्न चुटीली टिप्पणियों के साथ अपने दामाद के संचालन में उस शाम मलिका पुखराज  व ताहिरा ने कुछ बेहतरीन नगमे (अभी तो मैं जवान हूं, वगैरह) सुनाने के बाद अंत में वह गीत सुनाया जो उनकी पुरकशिश आवाज़ में आज भी कहीं सुनने को मिल जाता है तो जेठ की धूप वासंती हो जाती है- 'लो फिर बसंत आई, फूलों पे रंग लाई/ चलो बे-दरंग, लब-ए-आब-ए-गंग, बजे जल तरंग/ मन पर उमंग छाई...।' 

हफीज़ जालंधरी का यह तराना गाया तो बहुत से गायकों ने है, और अच्छा गाया है लेकिन इसको जितनी प्रसिद्धि मलिका पुखराज की आवाज़ में मिली और पाकिस्तान में भी, वह बेमिसाल है। 

उस जमाने तक पाकिस्तान, मुसलमान और इस्लाम का नाम लेना राष्ट्रद्रोह नहीं बनाया गया था। पाकिस्तानी कलाकार, खिलाड़ी, नेता और आम जनता भी भारत आया-जाया करते थे। तब यह भी संदेह और नफरत से नहीं देखा जाता था कि मुसलमान 'हमारा त्योहार बसंत' क्यों मनाते हैं। 

वली दकनी की मजार को ध्वस्त करने वाली नफरत की फसल उगाए जाने में अभी 24-25 साल और लगने थे। उसके बाद तो इस देश में बहुत कुछ ध्वस्त किया जा चुका है। मुसलमान होना शक व नफरत से देखा जा रहा है। 

शुक्र है कि दिल्ली में निजामुद्दीन औलिया की दरगाह कायम है और वहां अब भी बसंतोत्सव मनाया जाता है। बहुत सारे कव्वाल, शायर और आम जन भी वासंती पटके गले या माथे में बांधकर बसंत के गीत गाते हैं और मजारों पर सरसों के फूल बिखेरे जाते हैं। कव्वाल जो समां बांधते हैं, उसके तो कहने ही क्या! 

यह तनिक भावुक भूमिका वास्तव में यूसुफ सईद की किताब 'आज रच्यो है बसंत निजाम घर' के पन्ने पलटते और पढ़ते हुए मन में उमड़ती-घुमड़ती रही। यह किताब अभी-अभी नवारुण प्रकाशन से जारी हुई है, जो अपनी विषयवस्तु में ही नहीं, प्रस्तुति और साज-सज्जा में भी शानदार है। उसके रंगीन चित्र और रेखांकन अलग से ध्यान खींचते हैं। डिजायन और साज-सज्जा भी यूसुफ सईद ने ही की है। 

किताब का मकसद काबिले गौर है- इस सवाल का जवाब तलाशना कि आखिर मुसलमान भारत का ऐसा त्योहार क्यों मनाते हैं जो हिंदू संस्कृति से जुड़ा है। यह सवाल बहुत से मुसलमान भी पूछते हैं, जो मानते हैं कि बसंत मनाने का चूंकि इस्लाम में कोई आधार नहीं है, इसलिए हराम है। 

जवाब की तलाश में लेखक में हमें उस विरासत से परिचित कराता है जो हिंदुस्तान की धरती पर सैकड़ों-हजारों वर्षों में बहुत सारे धर्मों-संस्कृतियों से मिलकर धीरे-धीरे विकसित हुई और जीवन का अभिन्न हिस्सा बनी है। वह ऐसी इंद्रधनुषी चादर है जिसके धागों और रंगों को अलग-अलग कर पाना सम्भव नहीं है। वह तार-तार हो सकती है, अलग नहीं। 

आज के दौर में इस विरासत की चर्चा बहुत जरूरी है। पुरानी पीढ़ियां, जो इससे परिचित रही हैं, अब क्यों भूल रही हैं? नई पीढ़ियों को तो, जिन्हें नफरत घुट्टी की तरह पिलाई जा रही है, इसे जानना और भी जरूरी है। 

कोई तीन दशक पहले 'बसंत' नाम से लघु फिल्म बना चुके यूसुफ सईद ने इस किताब में बसंत की परम्पराओं, गीतों और उसकी लोकप्रियता में मुस्लिम सूफियों, शायरों और कव्वालों, खासकर अमीर खुसरो (किताब में 'खुसरौ' है) के योगदान की गहरी पड़ताल की है-

 'जब कुछ मुसलमान बारहवीं-तेरहवीं शताब्दी में हिंदुस्तान आए तो मध्य एशिया और खुरासान के नौरोज और फसले बहार की रंगीनियां शायद उन्हें यहां बसंत के रूप में नज़र आईं। इसलिए उन्होंने हिंदुस्तान के दूसरे त्योहारों के मुकाबले में बसंत को अपनेपन की भावना से मनाया। भारत के मुसलमानों में बसंत सबसे पहले चिश्ती सूफियों ने मनाया।'

और, यह किस्सा तो मशहूर ही है कि जब अपने भांजे तकीउद्दीन की मौत से गम में डूबे, हंसना-खाना भूल गए अपने पीर निजामुद्दीन औलिया को अमीर खुसरो ने महिलाओं की तरह सज-धजकर और हाथों में सरसों के फूल लेकर नाचते हुए हंसाया था। यह विचार उन्हें बसंत पंचमी पर पीले वस्त्रों में सजी, नाचती-गाती महिलाओं को देखकर सूझा था। 

तबसे बसंत का यह पर्व निजामुद्दीन औलिया और अमीर खुसरो के साथ अभिन्न रूप से जुड़ता हुआ दूसरे कई सूफी पीरों के उत्सवों में शामिल हो गया। अमीर खुसरो के बसंत गीत लोकप्रिय होते गए और बसंत पर कव्वालियां और शायरी लिखने-गाने का सिलसिला चल पड़ा, जो आज तक जारी है और लोकप्रिय भी। 

निजामुद्दीन औलिया की करीब सात सौ साल पुरानी दरगाह पर तो बसंत पंचमी के दिन देश भर के कव्वाल इकट्ठा होकर गीत-संगीत की धूम मचाते हैं। हौज़ में वासंती रंग घोला जाता है, कपड़े रंगे, बांटे और पहने जाते हैं। सरसों के फूल मजारों पर चढ़ाए जाते हैं। वैसे, यूसुफ अफसोस जताते हैं कि अब यह एक उत्सव की बजाय रस्म भर रह गया है। 

यूसुफ पूछते हैं कि 'उनकी मृत्यु के सात सौ साल बाद एक फारसी कवि और दरबारी इतिहासकार का हमारे लिए क्या महत्त्व हो सकता है?' वे जवाब देते हैं कि 'अमीर खुसरो और उनके समय की व्याख्या करने की कोशिश सिर्फ उनकी कविता या संगीत की सराहना ही नहीं है, यह भारत के इतिहास को बेहतर ढंग से समझने में मदद करती है और हमारे अतीत के बारे में गलतफहमियों को दूर कर सकती है... क्योंकि आज हम भारत में ऐसे दौर से गुज़र रहे हैं जहां इतिहास को बहुत बड़े पैमाने पर राजनीतिक अलगाव के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।'

यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण बात है और यही समझाने का बेहतरीन प्रयास यह किताब करती है। 

यूसुफ बताते हैं कि इस्लाम के आने के बहुत पहले से लोग भारत आते रहे। स्वाभाविक ही उनके प्रभाव भी यहां पड़े लेकिन हिंदुस्तानी समाज में सबसे बड़ा सांस्कृतिक प्रभाव फारस (वर्तमान ईरान) से आए लोगों का पड़ा। बाद में दूसरी जगहों से आए मुसलमानों ने भी यहां की बहुत सी परम्पराओं को सहज ही अपना लिया।

कब्रों पर चादर चढ़ाना, चिराग जलाना, फूल व नज़राना पेश करना, कब्र पर सजदा करना, तावीज-गण्डे बांधना, वगैरह बहुत सी ऐसी रस्में उन्होंने हिंदुओं से सीखीं और अपना लीं। ये रस्में ईरान या अरब से नहीं आईं। सूफियों ने भी बसंत को इस्लाम के दायरे में अपनाया। इसी तरह हिंदुओं ने भी उनकी बहुत सी रस्में, खान-पान, पहनावे और बोली-भाषा के प्रभाव सहज ही ग्रहण किए।   

यही मिली-जुली रवायत है, गंगा-जमुनी संस्कृति है, जो हजारों साल में बनी। आज कौन सी रस्में किसकी हैं, कैसी हैं और उनमें किस-किस के प्रभाव हैं, इसे अलग कर पाना तो दूर, समझ पाना भी कठिन है। इसी का नाम हिंदुस्तानियत या भारतीयता है। यह तथ्य समझना-समझाना आज की सबसे बड़ी जरूरत है। यह किताब यही काम बखूबी करती है। 

किताब में खुसरो और अन्य सूफियों के रचे बसंत संबंधी गीतों का संकलन और उनकी व्याख्या भी शामिल है। रंगों के धार्मिक प्रतीकों पर रोचक अध्याय है, जिसमें अच्छी तरह समझाया गया है कि हरा रंग क्यों इस्लाम से जोड़ा जाता है और यह गलत धारणा क्यों बनी। फिल्मों में बसंत के चित्रण पर भी यहां चर्चा की गई है। दरबारी शायर के रूप में अमीर खुसरो की विरोधीभासी भूमिका की चर्चा करने से भी यूसुफ ने परहेज नहीं किया है।   

यूसुफ यह भी बताते हैं कि बसंत की शायरी में जिस 'रंग' की बात होती है (आज रंग है, ऐ मां रंग है री, मेरे महबूब के घर रंग है री) , वह मात्र वासंती रंग नहीं है। वह असल में  अपने पीर के साथ लगा इश्किया रंग है, जिसके बिना सूफियों की इबादत पूरी नहीं होती, वह इबादत जिसका उद्देश्य अंतत: अपने भगवान या खुदा तक पहुंचना है, उसमें फना हो जाना है। 

सूफियों का उर्स (पुण्य तिथि पर उत्सव) मनाया ही इसलिए जाता है कि वे मरे नहीं, बल्कि ईश्वर में मिल गए। जैसे,  ईश्वर से उनका विवाह हो गया। सूफी अपनी तुलना दुल्हन से करते हैं और परमात्मा दूल्हा हैं- 'मोहे अपने ही रंग में रंग ले रंगीले, तू तो साहेब मेरा महबूबे इलाही।' कबीर के यहां भी 'राम' दूल्हा हैं और वे खुद दुल्हन।  

'आज जबकि हिंदू और मुसलमान दोनों ही कौमें अपने-अपने धार्मिक खोल में सीमित होती जा रही हैं, या सिमटने पर मजबूर की जा रही हैं, मुसलमानों का बसंत मनाना या हिंदुओं का ईद में शामिल होना एक ख्वाब सा बन गया है।'  यूसुफ सईद की यह चिंता हम सबकी चिंता होनी चाहिए। 

इसीलिए यह यह किताब हर घर में होनी और पढ़ी जानी चाहिए।  

- नवीन जोशी, 14 अगस्त 2026, लखनऊ

(किताब-'आज रच्यो है बसंत निजाम घर', लेखक- यूसुफ सईद, प्रकाशक- नवारुण, सम्पर्क- 9811577426) 

 

 

 

  


Tuesday, August 04, 2026

पहाड़ों की वादियों के पत्थरों पर उकेरा गया एक उदास गीत।

नवीन जोशी  जी का अद्यतन उपन्यास 'भूतगांव ' पहाड़  के पूरे एकांत, वहां के लोगों के अथक परिश्रम, पलायन की त्रासदी, प्रकृति  का आनंद मिश्रित भय, पहाड़ी  सहज सरलता, भाषा की अद्भुत  मिठास, जाति-धर्म  के पक्के बाड़े और संबंधों  के छीजते जाने  की कहानी है, जिसे नवीन  जी ने पूरी संवेदनशीलता  से लिखा है। 

पहाडो़ं के परिदृश्य  में  एक अचीन्ही  खामोशी , सौंदर्य और सूफ़ी रहस्य  का बोध होता है । ऐसा ही कुछ 'भूतगांव 'को पढ़ते हुए महसूस होता  है। और, सबसे  चमकृत करने वाली बात तो  यह है  कि आप की आंखें  तो पृष्ठों पर फिसलती हैं लेकिन  मन जैसे  किसी बहुत संवेदनशील  फिल्म  देखने  लगता  है । 
 
यह उपन्यास अर्नेस्ट  हेमिंग्वे  के 'द ओल्ड मैन  ऐंड  सी' के सैंटियागो  की याद दिलाता है। 
 
रिटायर्ड  फौजी आनन्द सिंह  अपने एक मात्र  साथी 'शेरू', जो चौपाया श्वान है,  व  चारों तरफ फैली निशब्दता है, से बातें करता है । फौजी के साथी यही दोनों  हैं और दूर से  या क़रीब  से डराकर चली  आती बाघैन (बाघ की गंध)।
 
पूरे उपन्यास  में  आपको कहीं भी इल्म  और व्यर्थ  जानकारी  को प्रदर्शित  करने की उत्कंठा,  बेजान शब्दों  की भरमार, चौंकाने वाले परिदृश्य  अथवा सब कुछ  समेटने की भ्रामक हड़बड़ी  नहीं  मिलेगी,  जैसा कि नवीन जी का व्यक्तित्व है....शांत, बेहद सरल, सहज और विचारशील ।

कथा उत्तराखंड के एक दूरस्थ गांव सतौर से शुरू होकर उसी गांव में समाप्त होती  है । भरे-पूरे  गांव  की लगभग सभी जाति की उपस्थिति,  बस्ती के मेलजोल ,भाईचारा, स्नेह, जलन-कुढन, ऊंच-नीच और रईस -गरीब के दायरे, और कहानियों  के अनंत सिलसिलों  से  शनै:शनै:  वह गांव  एक भुतहा गांव बन जाता है, जिसमें  एक अकेला  बूढ़ा  हो  चला रिटायर्ड  फौजी  आनंद  सिंह अपने घर में  पले और बचे रहे  शेरू कुत्ते से अपने घर,गांव , प्रकृति, जंगल, बाघ और बाघ के डर तथा  सुख-दुख, नियति,और छीजते  चले गये  संबंधों की कथा-भीतर-कथा कहता  रहता है  और अपनी  बेजान बची रही गृहस्थी  को जलते -बुझते  अंगारों  की गर्माहट से बचाये  रखता  है ।

आनंद सिंह को  पता है कि जब बोलती-बतियाती बस्ती  थी तब जंगल  और जंगली जानवर भी दूर भागते  थे और अब जंगल घर के दरवाजे पर  खड़ा है और  बाघ घात लगाने की फिराक में  है ।

इस उपन्यास  की आत्मा  है  कथाओं का संसार। यह कहीं  सिंहासन बत्तीसी, अरेबियन नाइट्स, या विक्रम  वेताल के लय की याद दिलाता है  कि जिनमें असमाप्त कहानी  से  दूसरी कहानी  खाद-पानी  लेकर पनपती है। किंतु यह कहानियां अवसादित  करती हैं।

नवीन  जी  स्वयं  पहाड़ से हैं इसलिए  वे  जानते हैं  पहाडो़ं पर होते विकास  का लेखा-जोखा, वहां  के लोगों  की कमर तोड़ मेहनत, परेशानियां, अभाव, ऊंची जातियों  का डर और जीवन  बचाये रखने की जद्दोजहद ।

उपन्यास   का मुख्य  पात्र  वीरेन्द्र के साथ  भागी हीरा  के विषय में  पहाड़ का  ही खीम सिंह  कहता है, "कोई नहीं  आएगा  मीमसाब, वहां  रपट लिखाने वाला कौन है! थोड़ी  देर  रो-धोकर  खुश हो  जाएंगे  कि सिर से बोझ उतर गया।" क्योंकि  वह एक दलित  लड़की  है। लेकिन वीरेन्द्र सिंह  जो राजपूत है  और जिसने अपने हलवाहे की बेटी को भगाया है,  उसका  परिवार  बिरादरी  से बाहर  कर दिया जाता है और जिनकी नियति गांव के छीजने की कथा  में  मिलमिला  जाती है ।

इस उपन्यास  की उपलब्धि  है  पहाडों के गूढ़ सौंदर्य  जैसी वहां  की बोली-बानी । वाक्य के अंत में  आता जादू 'बल', दाज्यू, उड्यार, ज्वे(पत्नी) , क्वे(कोई) ,आमा(दादी), फाल(कूद), लैम्फु(लैंप) या बाघैन जैसे कई -कई शब्दों  का विन्यास जो  उपन्यास  की कथा वस्तु  के साथ बांधे रखता है । इस उपन्यास  की एक और खूबी है,  वे हैं पहाड़ी मुहावरे । 
नवीन जी  ने  उनका सटीक उपयोग  किया  है और इसलिए  भाषा  में  लुनाई आ गई है । 

'भूतगांव ' पहाड़  की उदास कथा कहते हुए आजकल के  रिश्तों, स्वार्थ, बेरुखी,असंवेदनशीलता  और अलगाव  पर भी पात्रों  द्वारा  बहुत  कुछ  कहता  हुआ  नज़र  आता  है ।  इन पहाड़ी  गावों पर विकास  के नाम  पर जो कहर बरसा है  उसका दर्द  तो  टूटकर खंडहर होते घरों, भाग कर चले गये  युवाओं, पलायन करते  जाते मित्रों  व  पारिवारिक  रिश्ते दारों और घास-चारे के अभाव में  मरते  पशु धन का लेखा जोखा तो बचे रह गये  कुछ जोड़ी  आंखों में  ही बसा रह गया है,  जिसे धीरे धीरे  और धूतणसर होते जाना है।

'भूतगांव ' बनने  की कथा जितनी मार्मिक  है उतनी  ही  विचारशील  है। क्यों  ऐसा है कि मैदानों  ने उनके दुख दर्द, नैराश्य, जद्दोजहद, कुंठित  मनों , बेरोजगारी  और शिक्षा  के लिए  वादों का   मल्लमा  तथा  बहेतरी के लिए  इतना  कम सोचा और प्रयास  किये ? क्या  हम सब  इसके लिए  जि़म्मेदार  नहीं हैं?

नवीन जोशी  जी  का यह उपन्यास  आपके मन में एक खलिश दे जाता  है  जिसे आप भुला नहीं  सकते ।

'भूतगांव 'के लिए  नवीन जी  को बहुत  बधाई  और  शुभकामनाएं ।

- शीला  रोहेकर , 5 नवंबर  2025
(नवम्बर 2025 में शीला जी ने यह टिप्पणी लिखी थी जो मुझे आज ही मिल पाई है।)  

जौनपुर की आत्मा का संगीत- राग जौनपुरी

शहरों पर किताबें लिखी जाती रही हैं। दिल्ली पर ढेरों किताबें लिखी गई हैं और कोलकाता पर भी। अब भी लिखी जा रही हैं। लखनऊ पर भी कम किताबें नहीं हैं। अभी तो अजय कुमार की किताब 'राग जौनपुरी' पढ़कर पूरी की है। 

प्रत्येक शहर का एक चेहरा होता है, जिसमें उसके भूगोल, इतिहास और संस्कृति की गवाहियां चिपकी रहती हैं। वर्तमान उस पर कितना हावी हुआ है और इतिहास की आत्मा कितनी सांस ले रही है, यह देखने वाले की निगाह पर निर्भर करता है।  

अपने शहर को देखने वाले की निगाह का कमाल अनुभव करना हो तो अजय कुमार की 'राग जौनपुरी' के पन्नों पर ध्यान से नज़रें दौड़ानी चाहिए। जौनपुर के बारे में हाल में एक और किताब देखने में आई थी- अमित श्रीवास्तव की 'सिराज-ए-दिल जौनपुर'।  उसे पढ़ने का मौका तो नहीं मिला लेकिन 'गहन है यह अंधकारा' जैसी किताब लिखने वाले अमित श्रीवास्तव की कलम से भी जौनपुर कम न धड़का होगा। 

जौनपुर को अपनी रगों में जीने वाले अजय कुमार कवि, गद्यकार, चित्रकार, संस्कृतिकर्मी और जन संस्कृति मंच के संस्थापकों में रहे। 'राग जौनपुरी' पुस्तक उनकी वर्षों की मेहनत का नतीजा जरूर है मगर यह शहर उनकी सांसों में धड़कता-महकता रहता था। 

'नवारुण' से प्रकाशित अपने पुस्तक का स्पर्श करने के लिए वे जीवित नहीं रहे, जिसका विमोचन कुछ मास पूर्व जौनपुर के उसी हिंदी भवन में हुआ था,  जिसकी शुरूआत उनके पिता, स्वतंत्रता सेनानी रामेश्वर प्रसाद जी ने की थी और जिसे अजय जी ने शहर के प्रमुख साहित्य-संस्कृति केंद्र के रूप में विकसित किया। 

यदा-कदा जिस जौनपुर को कुछ लोग उसकी इमरती के लिए याद करते हैं, उस पर अजय कुमार विद्यापति (1360-1440) की 'कीर्तिलता' से बात शुरू करते हैं। कहते हैं कि 'कीर्तिलता' का जौनपुर बाजार वर्णन जरूर पढ़ना चाहिए, जिसके अनुसार जौनपुर भारत का प्रमुख राजनैतिक और आर्थिक केंद्र मालूम पड़ता है। सारी दुनिया की चीजें वहां बिकने को आती थीं।

विद्यापति तो फिर विद्यापति ही हैं- "बाजार में मारे भीड़ के लोग पिस-पिस जाते हैं, जहां निगाह डालिए सिर ही सिर दिखाई देते हैं, एक का तिलक पुछ दूसरे में लग जाता है, पराई स्त्रियों के कंगन टकराकर टूट जाते हैं, ब्राह्मण का यज्ञोपवीत चांडाल के अंग में झूल जाता है, वेश्याओं के पयोधर से टकराकर यतियों का हृदय चूर-चूर हो जाता है"।

'जौनपुर' नाम की उत्पत्ति की अनेक चर्चाओं  पर बहुत ध्यान न देकर वे नाम बदलने की मुहिम पर लानत भेजते हुए यह सजोर कहते हैं कि जौनपुर पर कोई साजिशी रंग चढ़ना आसान नहीं। जहां सिकंदर लोधी के भयानक हमले के बाद भी शर्की शासनकाल में शानदार वास्तुकला के साथ बनी इमारतें , शाही किला, अटाला मस्जिद, वगैरह बची रह गईं, उस जौनपुर पर कोई रंग चढ़ाए कैसे चढ़े!

अजय कुमार जौनपुर  की विविध विशेषताओं, उसके सूफियों, हिंदी सेवियों, 'चितरकारों', वास्तुकारों, संग्रामियों, योद्धा किसानों, ऐसे-वैसे जौनपुरियों इत्यादि की चर्चा करते हुए भी 'हिंदू तुरुक के मिलल बास' का गौरवपूर्ण उद्घोष को दोहराने वालों से तीखा सवाल करते हैं कि 'क्या बद्दोपुर जौनपुर का हिस्सा नहीं है, वहां जो हुआ वह दंगा नहीं था?'  शहरों के शानदार गंगा-जमुनी इतिहास को हमारा ही वर्तमान तो कलंकित कर रहा है।  

जौनपुर पर किताब हो और वामिक जौनपुरी की चर्चा न आए, ऐसा कैसे हो सकता है। वामिक साहब की तरक्कीपसंद शायरी को हिंदी-उर्दू में परिचित करवाने में अजय जी का बड़ा योगदान रहा है। किताब में एक पूरा अध्याय वामिक साहब पर है। इनके साथ हफीज़ जौनपुरी और शफीक जौनपुरी भी हैं ही। इन सबसे जौनपुर की वह पहचान कायम है, जिसे मिटाने की तमाम साजिशों का हम गवाह होना हमारा दुर्भाग्य है। 

जौनपुर का साहित्य, रंगमंच, संगीत और इत्र भी किताब में खूब महकता है। और कुछ रहे बचे या कहे को प्रमाणित करते हुए परिशिष्ट भी हैं ही।  और हां, यही वह जौनपुर है जहां जाकर हमारी गोमती गंगा मिलती है, जिनसे नदी का दर्ज़ा भी अब हम छीनते जा रहे हैं। 

'राग जौनपुरी' सचमुच ही जौनपुर की आत्मा का संगीत है। 

- नवीन जोशी, 04 अगस्त 2026, लखनऊ।

(राग जौनपुरी- अजय कुमार, नवारुण प्रकाशन, सम्पर्क- 9811577426, मूल्य- 300/- ) 

    

Monday, August 03, 2026

लेखक की बरसाती में रिश्तों का वैभव

आकाश में बादल छाए हुए हैं। कभी रिमझिम होने लगती है लेकिन शीघ्र थम भी जाती है। उमस और पसीने के बावजूद मेरे भीतर की रिमझिम जारी रहती है। दो-तीन दिन से मन भीगा-भीगा है। मेरे हाथ में अशोक अग्रवाल की पुस्तक है- 'लेखक की बरसाती'। 

संस्मरणों की किताब है। यादें हैं, यात्राएं हैं, अंतरंग रिश्तों का वैभव है और लिखने का अलग ही कौशल है। रचनाकारों के बीच ऐसे निर्मल-निश्छल रिश्ते अब नहीं दिखते। मन कलपता है। 

पहला संस्मरण निर्मल वर्मा पर है- 'एक लेखक की बरसाती'। किताब का नाम यहीं से लिया गया है। किताब पूरी पढ़ जाने के बाद लगता है कि निर्मल जी यहां नहीं भी हो सकते थे। वे किसी और किताब में जा सकते थे। तब किताब का नाम कुछ और होता। पर किताब यही बनती।  

इसे वास्तव में सौमित्र मोहन, जितेंद्र भाटिया, विनोद कुमार श्रीवास्तव, हिमा कौल और स्वयं लेखक अशोक अग्रवाल मुकम्मल बनाते हैं। जो दोस्ती, अंतरंगता, सहकार, प्रेम, चिंता और लम्बे दौर का संग-साथ इनके बीच है, वह किसी भी सबंध के परे जाता है। वह पाठक को भिगोता रहता है। निर्मल जी इनके बीच, प्रवेश द्वार पर सहजता से तो हैं लेकिन किसी कद्दावर लेखक की तरह थोड़ा दूर बैठे लगते हैं। 

पुस्तक के अंत में संकलित छोटे-छोटे रेखाचित्रों में भी निकटता और आत्मीयता का रसायन है। वे पाठक का अंतर्मन स्पर्श कर ले जाते हैं, लेकिन किताब की वास्तविक पूंजी तो वे चार संस्मरण ही हैं। अशोक अग्रवाल जी का लेखक इन्हीं में अपनी शान के साथ उपस्थित है।

सौमित्र मोहन का नाम हमने 'वह लुकमान अली है...' से जाना था। वह हिंदी की बहुचर्चित कविता है। यहां भी कवि का प्रवेश  लुकमान अली की मार्फत होता है लेकिन फिर कविता पीछे रह जाती है और लेखक इस  कवि के भीतर-बाहर का वह संसार दिखाता है, जहां इनसान किसी भी रचना से ऊपर हो जाता है। 

जितेंद्र भाटिया हिंदी में खूब पढ़े-लिखे-घूमे, विश्व साहित्य से लेकर विश्व सिनेमा तक में गहरे पैठे, यायावर, छायाकार, लेखक और विरले अनुवादक हैं। अब भी खूब सक्रिय हैं। उन्हें पढ़ना कई प्रकार समृद्ध होना होता है।  

विनोद कुमार श्रीवास्तव हिंदी कविताई की आत्म-मुग्ध दुनिया से दूर-दूर रहने वाले नायाब कवि हैं। कभी ज्ञानरंजन ने उनके लिए लिखा था कि उनकी कविताएं समुद्र में तैरता ग्लेशियर हैं, जिसका नब्बे प्रतिशत पानी के भीतर ओझल रहता है। अब तो वे मित्रों से भी दूर अपने बनाए किले में कैद हो गए हैं। दोस्तों से भी उनका संवाद नहीं होता। 

हिमा कौल का नाम मैंने सबसे पहले 1980 के दशक में राजीव मित्तल से सुना था। नवभारत टाइम्स लखनऊ के दिनों में कभी-कभार रम के दो पैग के बाद बाबा छाप तम्बाखू का पान चुभालते हुए वह हिमा कौल, उसके गढ़े शिल्पों और उसकी लाइलाज बीमारी के किस्से सुनाया करता था। 

'लेखक की बरसाती' के उल्लिखित चार संस्मरणों में लेखक चारों दोस्तों के साथ बराबर मौजूद है। सभी में सभी की आवाजाही है। चारों संस्मरण एक-दूसरे के कहे जा सकते हैं। हिमा आज दुनिया में मौजूद नहीं है, लेकिन वही यहां सबसे अधिक उपस्थित है । वह शेष चारों में बराबर उपस्थित है। अशोक जी की स्मृतियों में वह बेतरह छाई हुई है। कई बार आंखों की कोर नम हो आती है।

पांचों रचनाकार रिश्तों की ऐसी डोर में बंधे दिखते हैं, जो एक दूसरे को पूरा बनाती है। एक दूसरे की रिक्ति को भरती रहती है। ये रिश्ते भावनाओं से भरपूर हैं लेकिन शब्दों में भावुकता नहीं भरी है। लेखकीय वस्तुनिष्ठता का बेहतरीन संतुलन अशोक जी ने साधा है। लहरें पाठक के भीतर स्वयं ही बहने लगती है।

सभी रिश्तों की शुरूआत रचनाओं से ही होती है। वही उन्हें करीब लाती हैं। धीरे-धीरे वह करीबी रचनाओं के बाहर जाकर एक-दूसरे को समेट लेती है। दोस्ती, प्रेम, अंतरंगता एवं परस्पर सम्मान को पार करता हुआ रिश्ता रूहानी-सा भी बन जाता है। वे कई-कई दिन तक साथ रहते हैं, एक-दूसरे घर में और लम्बी यात्राओं में। समुद्र, पहाड़, जंगल, पक्षी, पगडंडियां, आकाश उनके रिश्तों में रंग भरते हैं। 

हिमा कौल को खतरनाक स्नायु रोग हुआ। मोटर न्यूरॉन डिजीज। इस बीमारी से वह हंसते-काम करते हुए लड़ी। कोई रोना-धोना, निराशा-हताशा नहीं। देश भर में कई जगह इलाज चला। ये दोस्त हर जगह साथ बने रहे। उसकी मां उद्विग्न हो जाती रही, लेकिन दोस्तों ने जो साथ दिया, वही दोस्ती की परिभषा है। किसी ने हार नहीं मानी। खुद हिमा अपने शिल्प गढ़ती रही। प्रदर्शनी भी हुईं। फिर एक दिन हिमा चली गई। नहीं, दोस्तियों में बची रह गई।   

दो वर्ष पहले अशोक जी के संस्मरणों की एक और पुस्तक पढ़ी थी- 'संग-साथ'। उसमें भी कुछ मित्रों के आत्मीय संस्मरण हैं। नवीन सागर, विश्वेश्वर, जितेंद्र कुमार, अमितेश्वर और प्रियदर्शी प्रकाश पर उनके स्मृति लेख विशेष रूप से याद रह जाते हैं। 'लेखक की बरसाती' के उपर्युक्त चार संस्मरण उनसे आगे निकल गए हैं। 

ये संस्मरण एक संवेदनशील लेखक होने के नाते ही नहीं लिखे जा सकते। इनके लिए एक रचनाकार की भटकन, अदेखे को देखने की और इस जीव-जगत को अनुभव करने की बेचैनी चाहिए। वह अशोक अग्रवाल में और उनके अंतरंग दोस्तों में रही है। यह किताब सबूत है।    

- नवीन जोशी, लखनऊ। 03 अगस्त, 2026

( लेखक की बरसाती- अशोक अग्रवाल, सम्भावना प्रकाशन, हापुड़, मूल्य- 300/-, सम्पर्क- 7017437410)  

 

  

 

 

Tuesday, July 28, 2026

'जिज्ञासु' जी की कुमाउँनी सेवा पर केंद्रित पुस्तक

बंसीधर पाठक 'जिज्ञासु' जी को मैं एक कवि के रूप में बहुत पहले से जानता रहा हूँ। उनकी कविताएँ पहाड़ से निकलने वाले साप्ताहिक अखबारों और कुमाउँनी पत्रिकाओं में पढ़ता आया हूँ। लेकिन कुमाउँनी-गढ़वाली साहित्य, संस्कृति और भाषा के लिए उन्होंने जो अपार कार्य किया, उसकी गहराई मुझे पहली बार वरिष्ठ साहित्यकार नवीन जोशी जी द्वारा संपादित पुस्तक ‘बंसीधर पाठक जिज्ञासु : कुमाउँनी का अप्रतिम सेनानी’ से पता चली।

उनका व्यक्तित्व और कृतित्व का वर्णन करने वाली यह पुस्तक अत्यंत रोचक है। उत्तराखंड से बाहर रहकर भी अपनी मातृभाषा और संस्कृति के लिए उनका योगदान वाकई कमाल का है। उन्हें ‘कुमाउँनी का अप्रतिम सेनानी’ कहना बिलकुल सटीक और उपयुक्त है। अंतिम समय तक जिस समर्पण से वे कुमाउँनी की सेवा में लगे रहे, ऐसे उदाहरण विरले ही मिलते हैं।

इस पुस्तक को पढ़ते हुए मुझे कुमाउँनी के प्रतिष्ठित साहित्यकार और ‘दुदबोलि’ के संपादक मथुरा दत्त मठपाल जी का स्मरण हो आया। उनमें भी भाषा-साहित्य के प्रति वैसा ही जुनून था। वे अपना धन खर्च कर अंतिम दिनों तक पत्रिका के अंक निकालते रहे।

हर लोक-भाषा प्रेमी को यह किताब अवश्य पढ़नी चाहिए। इसमें सिर्फ जिज्ञासु जी के योगदान को ही नहीं रेखांकित किया गया, बल्कि कुमाउँनी-गढ़वाली पत्रिका ‘आँखर’ के 23 अंकों में प्रकाशित रचनाओं का भी उल्लेख है। इस पत्रिका को प्रकाशित करने में उन्होंने कितने संघर्ष झेले, उसकी व्यथा-कथा भी विस्तार से वर्णित है।

एक संपादक को पत्रिका निकालने के लिए कितनी मेहनत करनी पड़ती है, लेखकों से रचनाएँ कैसे जुटानी पड़ती हैं—इन सबका जीवंत चित्रण इस पुस्तक में मिलता है। वे न केवल ‘आँखर’ के लिए, बल्कि आकाशवाणी के ‘उत्तरायण’ कार्यक्रम के लिए भी अथक परिश्रम करते थे। वक्ताओं के घर-घर जाकर उन्हें तैयार करना—यह भी एक अद्भुत कहानी है, जो पुस्तक में पढ़ने को मिलती है।

कितनी बड़ी बात है कि बचपन में ही पहाड़ छोड़कर बाहर चले गए एक व्यक्ति को कुमाउँनी ठीक से बोलना भी नहीं आता था, फिर भी मातृभाषा के प्रति लगाव के कारण उन्होंने उसे सीखा और उसके लिए ढेर सारा काम किया। वाकई गजब!

नवीन जोशी जी ने अपने विस्तृत संस्मरणात्मक आलेख में कुमाउँनी पत्रिकाओं के इतिहास का विहंगम अवलोकन भी किया है। उन्होंने वर्तमान में निकल रही कुमाउँनी-गढ़वाली पत्रिकाओं का परिचय देते हुए प्रकाशित सामग्री पर विचारणीय टिप्पणी की है, जिसे एक महत्वपूर्ण सुझाव के रूप में लिया जाना चाहिए। पुस्तक में आकाशवाणी लखनऊ केंद्र से लगभग 31 वर्ष तक प्रसारित ‘उत्तरायण’ कार्यक्रम, ‘शिखर संगम’ और ‘आँखर’ संस्था के इतिहास तथा उत्तराखंड की भाषा-संस्कृति के प्रसार में उनके योगदान का भी वर्णन है।

जिज्ञासु जी के छोटे भाई गणेश चंद्र पाठक जी, पुत्र दिव्य रंजन पाठक जी के संस्मरण तथा पत्नी देवकी जी के साक्षात्कार से पता चलता है कि उनकी अच्छी रचनात्मकता के पीछे एक बड़ा कारण उनकी गहन पढ़ने की आदत थी। घर पर वे या तो पढ़ते दिखते या लिखते। उनके पास ‘धर्मयुग’, ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’, ‘कादम्बिनी’, ‘नवनीत’, ‘सरिता’ जैसी अनेक साहित्यिक पत्रिकाएँ नियमित आती थीं।

उनके जीवन से प्रेरणा मिलती है कि अच्छा लिखने के लिए पढ़ाई कितनी आवश्यक है। पुस्तक में हिंदी और कुमाउँनी के प्रतिष्ठित साहित्यकारों—शेखर पाठक जी, बिना तिवारी जी, बहादुर बोरा ‘श्रीबंधु’ जी, गोपाल भट्ट जी, प्रयाग जोशी जी, रुक्मिणी शर्मा जी, आलोक जोशी जी, घनानंद पांडे ‘मेघ’ जी, धन सिंह मेहता ‘अनजान’ जी, एम. जोशी ‘हिमानी’ जी, पार्थ सारथी डबराल जी, त्रिलोचन पांडे जी और जगदीश जोशी जी—के लगभग डेढ़ दर्जन आलेख, संस्मरण तथा साक्षात्कार संकलित हैं। साथ ही जिज्ञासु जी की कुछ प्रतिनिधि रचनाएँ भी शामिल हैं।

लोक-भाषा और संस्कृति को बचाने में लगे एक व्यक्ति की क्षोभ, हताशा और निराशा भी पुस्तक में झलकती है। कुमाउँनी-गढ़वाली भाषा, साहित्य और संस्कृति के आंदोलन में सक्रिय लोगों के लिए यह पुस्तक न केवल पठनीय, बल्कि संग्रहणीय भी है। यह नए विचार देती है और प्रेरित करती है। यह 260 पृष्ठों की पुस्तक नवारुण प्रकाशन से प्रकाशित हुई है। मूल्य 400 रुपये है और छपाई काफी अच्छी है।

-महेश पुनेठा, पिथौरागढ़ (पेशे से अध्यापक पुनेठा जी हिंदी के प्रतिष्ठित कवि हैं और पुस्तक संस्कृति के विकास में निरंतर लगे रहते हैं)  

मुहब्बत और बगावत, रसोई और व्यंजनों का औपन्यासिक आस्वाद

अगर आप चॉकलेट का अर्थ भारत भर के बाजारों में बच्चों और युवाओं की पसंदीदा चॉकलेट से न लगाएं तो मैं आपको बताऊं कि उत्तरी अमेरिका का जगप्रसिद्ध चॉकलेट पेय  बनाने के लिए पानी को एकाधिक बार उबालना पड़ता है। किस चरण में कितना उबालना है, यह पाक-कला ही चॉकलेट का स्वाद तय करती है। 

मैक्सिको की विश्वविख्यात उपन्यासकार लॉरा एस्कीवेल के उपन्यास 'जैसे चॉकलेट के लिए पानी'  में चॉकलेट के पानी की ही तरह मुहब्बत का उबाल है, उसके दमन का उबाल है, विद्रोह का उबाल है और अंतत: मुहब्बत ज़िंदाबाद का उबाल है और  क्या स्वाद है! 

विश्व साहित्य में मुहब्बतों पर असंख्य उपन्यास लिखे गए हैं। किशोरावस्था में दीवानों की तरह पढ़े गए एरिक सीगल  के उपन्यास 'लव स्टोरी' से लेकर जादुई यथार्थवाद के लिए जाने गए गैब्रिएल गार्सिया मार्खेज के 'लव इन द टाइम ऑफ कॉलरा' तक। और भी तमाम।  किंतु, लॉरा एस्कीवेल का 'जैसे चॉकलेट के लिए पानी' इन सबमें अलग ही जगह रखता है। 

यहां मुहब्बत रसोई में दादी-नानियों के परम्परागत ज्ञान और अनुभवों से सराबोर विविध व्यंजनों की तैयारी और उनके पकने के साथ उबलती, भुनती, ठंडाती और स्वाद ग्रहण करती है। यहां वह प्याज काटने में निकलने वाले आंसुओं के साथ बहती है, आटे को बेकाबू गीला करती जाती है, खुबानियों के साथ लुढ़क पड़ती है, अंडों की ज़र्दी में फिंटती है, मामा एलेना के रोष में जलती-मुर्झाती है, बटेरों-बत्तखों के पंखों के साथ झड़ती है, मुर्गों की गर्दनों के साथ मरोड़ी जाती है और स्वाहा हो गए रैंच की राख के नीचे से नवजीवन पाकर असंख्य मोमबत्तियों के उजाले के बीच एक अनंत सुरंग में समा जाती है। 

मुहब्बत कथा का प्रधान तत्व है लेकिन उसमें तत्कालीन मैक्सिकी क्रांति, उस समाज की आंतरिक संरचना, परिवार में स्त्रियों की स्थिति, पुराने सामाजिक मूल्यों की जकड़न और टूटन, भाषाई सौंदर्य और मुहावरे और पर्मोअरागत पाक-कला, सभी का धड़कता स्पर्श अनुभव किया जा सकता है। 

प्यार, देह पर अपने अधिकार और मनचाहे विवाह की स्त्रियों की स्वतंत्रता की वकालत यहां नारे की तरह नहीं, बल्कि कथा में अनुस्यूत लहर की तरह अभिव्यक्त होती है। तीता और पेद्रो के प्यार की मुख्य धारा के समानांतर अन्य पात्रों के भी प्रेम के झरने फूटते हैं, जो कहीं मिलन और कहीं वंचना में रसोई में पकते व्यंजनों की भांति स्वादिष्ट या विषाक्त हो उठते हैं।   

लॉरा एस्कीवेल का यह पहला ही उपन्यास छपने (1989) के साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लाखों प्रतियों में बिका और पुरस्कृत हुआ।  हिंदी में इसे हमारे प्यारे, 'लप्पूझन्ना' वाले अशोक पांडे ने सीधे स्पेनिश से अनूदित किया है। उनसे इस उपन्यास के बारे में एकाधिक बार सुना था, अनुवाद भी काफी पहले कर लिया गया था लेकिन कॉपीराइट के चक्कर में प्रकाशित हुए बिना पड़ा हुआ था। अब सम्भावना प्रकाशन के अभिषेक अग्रवाल ने प्रकाशन अधिकार हासिल कर इसे हिंदी पाठकों के लिए उपलब्ध करा दिया है। 

एक रैंच पर बेहद सख्त मां और उसकी तीन बेटियों  की यह कहानी सबसे छोटी तीता और एक युवक पेद्रो की मुहब्बत से शुरू होती है। कठोर मां उस परम्परा का हवाला देकर विवाह से इनकार कर देती है, जिसमें सबसे छोटी बेटी को मां के जीवित रहने तक उसकी सेवा करनी होती है और उसका ब्याह नहीं किया जाता। इसके बाद कहानी में यह मुहब्बत जो रास्ता पकड़ती है, वह तो चौंकाता ही है, उसके कहन, उसकी शैली और मैक्सिकी रसोई की पृष्ठ भूमि में उसके अद्भुत निर्वाह का अनुभव उपन्यास पढ़कर ही किया जा सकता है। 

जनवरी से शुरू करके साल के बारह महीनों  के बारह अध्याय हैं और प्रत्येक अध्याय का प्रारम्भ किसी मैक्सिकी विशिष्ट व्यंजन बनाने की सामग्री और विधि बताने से शुरू होता है। सामग्री और विधि के वर्णन में कब कथा पिरो दी गई, कब अपने अद्भुत स्वाद के साथ व्यंजन तैयार हुआ और कब कथा अगला सोपान चढ़ गई, यह इतने संश्लिष्ट और अंतर्गुम्फित रूप में रचा गया है कि पाठक ऐसी कोई आवाजाही अनुभव नहीं कर पाता।  सब कुछ कथा रस में भीगा-भीगा हुआ परोसा गया है। 

जादुई यथार्थ की लेखन शैली मुहब्बत और विद्रोह की कथा में अजब-गजब उड़ानें पैदा करती है, जिसमें न केवल पात्र बल्कि पाठक भी झनझनाने लगता है। यह मार्खेज के जादुई यथार्थ की तरह जटिल नहीं, बल्कि भिन्न और तरल-सा प्रतीत होता है।  

अगर हिंदी में भी यह उपन्यास अपनी समस्त खूबियों के साथ आया है तो इसे अशोक पाण्डे के अनुवाद का कमाल मानना चाहिए। किताब की परिचयात्मक भूमिका में अमित श्रीवास्तव ने इस बारे में लिखा है कि "एक अच्छा अनुवादक भाषाई तकनीशियन नहीं, बल्कि एक किस्म का सांस्कृतिक मध्यस्थ या फिर एक मौन सह-लेखक होता है, जो मूल रचना की आत्मा को संरक्षित करते हुए उसे दूसरी भाषा -संस्कृति की दुनिया में एक जैविक संरचना बना देता है।" 

अशोक पाण्डे ने सचमुच यह कमाल किया है। उनके अन्य अनुवादों में भी हम ऐसा मौलिक आस्वाद पाते हैं।  

हिंदी में प्रतिवर्ष असंख्य उपन्यास और कहानी संग्रह छपते हैं। कुछ अच्छी रचनाएं अलक्षित रह जाती हैं, कुछ औसत रचनाएं  चर्चा पा जाती हैं। 'जैसे चॉकलेट के लिए पानी' जैसी कमाल की रचनाएं कम ही सामने आती हैं। अच्छा लिखने-पढ़ने के इच्छुक और अनुवाद में हाथ आजमाने वालों के लिए यह उपन्यास अनिवार्य होना चाहिए। 

- नवीन जोशी, 28 जुलाई 2026, लखनऊ

(जैसे चॉकलेट के लिए पानी- लॉरा एस्कीवेल, अनुवाद- अशोक पाण्डे, सम्भावना प्रकाशन (7017437410), पृष्ठ-166, मूल्य- 285/- ) 

  

 

Sunday, July 26, 2026

ए भाई, हिंदी बरतो तो ऐसे बरतो!

जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारी युवाओं की भाषा के बारे में पूरा समाज उद्वेलित दिखाई दे रहा है। एक बड़े वर्ग के भाषाई संस्कार की जड़ें हिल गई हैं। अच्छा है, इसी बहाने भाषा पर, शब्दों पर चर्चा हो रही है। 

मैं यहां युवाओं के नारों-पोस्टरों की भाषा पर बात करने नहीं जा रहा हूं। इस समय मेरे हाथ में है भाषा विज्ञानी और भाषा/शब्दों के लिए सतत चिंतित रहने वाले डॉ सुरेश पंत जी की नई पुस्तक 'साधो, शब्द विचारो'।  किताब की भूमिका (कहे बिना रहा न जाए) में वे लिखते हैं- 'भाषा एक व्यक्ति की नहीं, पूरे समाज की सम्पत्ति होती है।' तो, जंतर-मंतर में जो गालियां थीं, वे भी पूरे समाज की सम्पत्ति हैं! शर्मिंदा होना है तो पूरा समाज हो। खैर। 

यह देखना सुखद और संतोषप्रद है कि पिछले कुछ वर्षों में सुरेश पंत जी ने सोशल मीडिया (विशेष रूप से फेसबुक और पहले ट्विटर, अब X) के सामान्यत: आत्ममुग्ध मंच पर भाषा को बहस-मुबाहसे का बड़ा मुद्दा बना दिया है। सोशल मीडिया और मुख्य धारा के मीडिया की भाषा और वर्तनी पर उनकी सतर्क टिप्पणियों ने बहुत बड़ा वर्ग तैयार कर दिया है जो अब शब्दों व व्याकरण के प्रयोग पर सावधान रहता है अथवा उनसे अपनी शंकाओं का समाधान चाहता है। 

इसी विमर्श और शंका समाधानों  के अब भी जारी सिलसिले का एक और सुखद परिणाम है, शब्दों के प्रयोग और व्याकरण सबंधी आम त्रुटियों/सावधानियों पर उनकी चार पुस्तकों का प्रकाशन। 'शब्दों के साथ-साथ' के भाग एक एवं दो, 'भाषा के बहाने' तथा अब 'साधो, शब्द विचारो'। वास्तव में ये चारों पुस्तकें एक ही सिलसिले की कड़ियां हैं। 

भाषा के प्रति घोर लापरवाही के इस दौर में यह जानना और भी सुखद है कि डॉ पंत की पिछली तीन पुस्तकें 'बेस्ट सेलर' का दर्ज़ा पा चुकी हैं और अब भी लोकप्रियता के पायदान पर बहुत ऊपर बनी हुई हैं। इसमें संदेह नहीं कि हाल में प्रकाशित चौथी पुस्तक भी शीघ्र उसी श्रेणी में शामिल हो जाएगी। इसे देखते हुए मेरा यह कहना संदेह के दायरे में रखा जाना चाहिए कि यह दौर भाषा के प्रति घोर लापरवाही का है। 

'साधो, शब्द विचारो' में मुख्यत: 'किसी शब्द विशेष की उत्पत्ति, अर्थ और व्यावहारिक प्रयोग पर ही चर्चा केंद्रित है कि यह शब्द आया कहां से, उसके प्रयोग में क्या भ्रम है और क्यों आदि। फिर भी इसमें पिछली पुस्तकों की अपेक्षा एक स्पष्ट अंतर भी है। पिछली पुस्तकों में व्याकरण विषयों को प्राय: नहीं उठाया गया, क्योंकि भाषा में शब्दों का प्रयोग मुख्य है, व्याकरण तो आते-आते आता है।'

डॉ पंत रूढ़ अर्थों में भाषा विद‍ नहीं हैं, जो भाषा एवं शब्दों को परम्परा और व्याकरण की लाठी से हाँकने में भरोसा करते हैं। शब्दों के निर्मल बहाव की तरह वे भी उदार और लचीले हैं।  उनका मानना है कि 'जीवित भाषाएं निरंतर नए शब्दों को ग्रहण करती रहती हैं और पुराने को भी नए-नए अंदाज़ में उलटती-पुलटती रहती हैं। व्याकरण भाषा के समकालीन प्रयोग को देख-परखकर उसके लिए कुछ नियम बनाता है, किंतु समय के साथ-साथ धीरे-धीरे भाषा का प्रवाह अपने कूल-कगारों को लांघता हुआ आगे बढ़ जाता है।'

पंत जी इतने उदार हैं कि प्रचलन में स्वीकार कर लिए कुछ गलत शब्दों को भी खारिज नहीं करते। जैसे, सही शब्द है 'धूमपान'। 'धूम्रपान' गलत है क्योंकि 'धूमपान' करने वाले 'धूम' (धुएं) का पान करते हैं, 'धूम्र' (धुएं के रंग) का नहीं। लेकिन लम्बे समय से प्रयोग में आते-आते 'धूम्रपान' का वही अर्थ ग्रहण कर लिया गया है जो वास्तव में 'धूमपान' का है। इसलिए वे इसे स्वीकार्य मानते हैं। 

वास्तव में यही व्यावहारिक है और पंत जी की पुस्तकें शब्दों और व्याकरण का व्याहारिक-तार्किक प्रयोग सिखाती हैं। वे समय में पीछे जाकर जमाने भर की अशुद्धियों को डंडा लेकर सुधारने में विश्वास नहीं करते। लेकिन अगर आप 'अज्ञान' के लिए 'अज्ञानता' लिखते हैं, तो पंत जी  उसे स्वीकार्य नहीं मानते क्योंकि 'अज्ञान' अपने आप में भाववाचक विशेषण है, उसमें 'ता' जोड़कर फिर से भाववाचक विशेषण बनाने की न जरूरत है, न ग्राह्य। 

पंत जी कहते हैं कि हिंदी संस्कृत से उपजी जरूर है लेकिन हिंदी का अपना व्याकरण है, जो संस्कृत व्याकरण से कई मायनों में फर्क है । उस पर जबरन संस्कृत का व्याकरण क्यों ठूंसना? संस्कृत' में 'दम्पती' सही हो सकता है, लेकिन हिंदी का व्याकरण 'दम्पती' को नहीं पचा पाता। उसमें 'दम्पति' ही सही ठहरता है। 

'साधो, शब्द' विचारो' सहित उनकी सभी पुस्तकें रोचक शैली और व्यंग्य व हास्य-पुट के साथ लिखी गई हैं। इसीलिए इन्हें पढ़ना भाषा और व्याकरण की बोझिल पुस्तकों की तुलना में बहुत आनंददायी भी है। अपनी फेसबुक एवं X पोस्टों में भी वे बड़ी चुटीली शैली का प्रयोग करते हैं। 'अरे, बाप रे', 'इन तिलों में तेल कहां!', 'कट्टी-बट्टी के दिन', 'ए भाई, जरा देख के चलो' जैसे शीर्षक पढ़ने की उत्सुकता जगाते हैं और बिल्कुल सहज-सरल ढंग से सही वर्तनी की चूक और व्याकरण की भूल समझा जाते हैं। 

क्या ही अच्छा हो कि प्रिंट और टीवी मीडिया के समाचार कक्षों में पंत जी की चारों पुस्तकें रखवा दी जाएं और सम्पादकों-पत्रकारों में इतनी विनम्रता आ जाए कि वे समय-समय पर उन्हें पढ़ते रहें। आज हिंदी की सर्वाधिक दुर्दशा मीडिया ही कर रहा है।

हमारे समय के न्यूज-रूम शब्दकोशों और संदर्भ ग्रंथों से समृद्ध रहते थे। सम्पादकों की ओर से भी लगभग प्रतिदिन भाषा और वर्तनी प्रयोग के निर्देश मिलते रहते थे।  

बहरहाल, पंत जी को बहुत-बहुत बधाई। शुभकामनाएं भी वे कि वे अस्थिर स्वास्थ्य और उम्र की बाधाओं पर विजय पाते हुए भाषा-विमर्श के मोर्चे पर सक्रिय बने रहें।   

- नवीन जोशी, 27 जुलाई 2026, लखनऊ।

'साधो, शब्द विचारो', पेंग्विन स्वदेश,2026, पृष्ठ-299, मूल्य- 399/- इस क्रम में उनकी अन्य पुस्तकें हैं- 'शब्दों के साथ-साथ, भाग 1 एवं भाग 2' -दोनों पेंग्विन स्वदेश और 'भाषा के बहाने' (नवारुण प्रकाशन)   

 

 

 

 

 

Saturday, July 25, 2026

'उर्फ कीड़ा' : जब पूरा तंत्र ख़ौफ़ खाने लगता है!

 'तद्भव' पत्रिका में राजू शर्मा के नए उपन्यास 'उर्फ कीड़ा' का पाठ और जंतर-मंतर में जेन-जी के आंदोलन की (आंशिक) जीत मेरे लिए एक साथ ही हुए। क्या शानदार और आनंददायी संयोग रहा!

यह व्यवस्था, यह क्रूर तंत्र अपने समस्त अंगों के दमनात्मक व्यवहार से निर्दोष, सचेत और खरे नागरिकों को  कीड़ा बना देना चाहती है- अस्तित्वहीन, नगण्य। शासन-प्रशासन एवं न्यायतंत्र के वैभव को स्थापित करने के लिए उन्हें कठोरतम धाराओं में जेल में ठूंस देती है- वर्षों तक बिना सुनवाई, आरोप पत्रों के अम्बार में ही उसकी हस्ती खत्म कर देती है, उसका मजाक बनाती है। 

लेकिन वही व्यक्ति जब खत्म हो जाने से इनकार कर देता है, अपने विलीन होते अस्तित्व में, किंचित ठसक के साथ, और अधिक सिकुड़ने या पूरी तरह मिट जाने से इनकार कर देता है, तो वही अदना नागरिक इस तंत्र के लिए , इस सत्ता संरचना के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन जाता है।

यह 'उर्फ कीड़ा' उपन्यास की कथा का सार है और यही कल जंतर-मंतर में जेन-जी ने कर दिखाया। खुद को सबसे ताकतवर मानने वाले को, कभी न झुकने वाले को, बर्बर दमन से आतंक मचाने वाले इस तंत्र को 'कॉक्रोचों' ने हरा दिया!  कॉक्रोचों ने जब खत्म हो जाने से इनकार कर दिया, जब डर को झटक दिया तो तंत्र डर गया। 

'उर्फ कीड़ा' में भी यही होता है।  राजू शर्मा ने अपने समय की क्या खूब कथा कही है। 

एक निर्दोष, सामान्य व्यापारी को राष्ट्रद्रोह और कई अन्य खतरनाक अपराधों का मुल्जिम बनाकर जेल में ठूंस दिया गया है। पांच साल से ऊपर हो गए हैं, उसकी कोई सुनवाई नहीं होती। हजारों पृष्ठों का आरोप पत्र दाखिल किया गया है, उसमें और पन्ने जुड़ते जा रहे हैं, अदालत में पेशी के समय जज उसकी ओर देखते तक नहीं। जज, दोनों पक्षों के वकील, पूरा तंत्र अच्छी तरह जानता है कि वह निर्दोष है लेकिन उन्हें अपने न्यायतंत्र की उपयोगिता और शक्ति दिखानी है। तंत्र अपना काम पूरी शक्ति से करता है। 

एक दिन अपने निर्दोष साबित होकर रिहा होने की उम्मीद टूट जाने पर मुल्जिम सिकुड़ने लगता है। छह फुट का उसका कद रोज एक सेंटीमीटर की निश्चित दर से कम होने लगता है। यह नोटिस करने के बाद पूरे तंत्र में हड़कम्प मच गया है। हजारों करोड़ रु के बजट से और शासन-प्रशासन से लेकर सेना और समस्त विज्ञान शाखाओं के वरिष्ठ अधिकारी इस अलौकिक रहस्य का पता करने में जुट जाते हैं। 

राजू शर्मा मानव-विज्ञान की वास्तविकताओं, शोधों और कल्पनाओं की उड़ान से इस सब का विस्तार से जबर्दस्त आख्यान रचते हैं। इस पढ़ने के लिए तनिक धैर्य भी चाहिए ही। वे बार-बार काफ्का और उसकी रचनाओं का, विशेष रूप से 'द ट्रायल' का उल्लेख करते हैं, जिसका पात्र 'के' ऐसी ही मनस्थितियों से गुजरता है। काफ्का की विख्यात कथा 'मेटामॉर्फोसिस' का नायक एक सुबह नींद खुलने पर पाता है कि वह इनसान से एक बड़े कीड़े में बदल गया है। खैर। 

 'उर्फ कीड़ा' का नायक मुल्जिम धीरे-धीरे दो इंच तक सिकुड़ चुका है। छह फुट का आदमी दो इंच का रह गया है लेकिन उसकी समस्त संवेदनाएं एवं मानवीय चेतना जाग्रत हैं। वह पूरा का पूरा मनुष्य ही है, हालांकि तंत्र उसे घिनौना कीड़ा, छछूंदर, गिलहरी, और भी जाने क्या-क्या कहता है। उससे नफरत करता है लेकिन डरता भी है कि कहीं यह किसी शत्रु देश का जासूसी यंत्र-मानव तो नहीं, कहीं कुछ अनिष्ट न कर बैठे। तंत्र अपनी शंकाओं में सब कुछ मानने लगता है, लेकिन उसे मानव मानने को तैयार नहीं है।  

इस सिकुड़न को समझ पाने में असमर्थ और उससे निपटने से आज़िज़ आ चुके अधिकारी यह मनाने लगते हैं कि सिकुड़ते-सिकुड़ते एक दिन वह गायब ही हो जाए, तो जान छूटे। यद्यपि वे डरते भी हैं कि गायब होकर जाने वह कहां, किस रूप में प्रकट हो जाए और जाने क्या कर बैठे।  

कहानी तब और रोचक हो उठती है, जब मुल्जिम दो इंच के बाद सिकुड़ना बंद कर देता है। उसका कद यहां स्थिर हो गया है। उसकी मानवीय  चेतना, मेधा और संवेदनाएं और भी प्रखर हो गई हैं। वह अब परेशान नहीं है, बल्कि तंत्र के डर का, उसकी बेचैनियों, नींद-हर चिंताओं और दिन-प्रति दिन बढ़ते भय का आनंद ले रहा है। उसे सुदूर किसी द्वीप के गहन सुरक्षा-व्यवस्था से घिरे किले में हर वक्त की निगरानी में कैद कर दिया गया है। पूरा तंत्र उससे भय खाता है। चौकस रहता है।

उपन्यास के अंत का दृश्य है कि उस दो इंची 'कीड़े' के सामने विशाल सिंहासन पर उच्चस्थ पदधारक, तंत्र का शक्तिशाली मुखिया बैठा हुआ है। दो इंच का वह मुल्जिम (हालांकि अब वह मुल्जिम नहीं रहा, उसके विरुद्ध सारे अभियोग बंद या स्थगित कर दिए गए हैं।) एकटक उसे देख रहा है। उच्चस्थ व्यक्ति उसकी ओर देखने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा। बीच-बीच में चोरी से उसे देखता है और तुरंत अपना मुंह घुमा लेता है। उसके चहेरे पर हवाइयां उड़ रही हैं।

कीड़ा मुस्करा रहा है। शायद हंसने भी वाला है‍! 

जब ये पंक्तियां पढ़कर मेरे होंठों पर तिर्यक मुस्कान तैर रही थी, उसी समय जंतर-मंतर में 'कॉक्रोच' जश्न मनाने लगे थे। 

इतना अच्छा, झिंझोड़ने वाला उपन्यास लिखने के लिए राजू शर्मा जी और 'तद्भव' में प्रकाशित करने के लिए अखिलेश जी को बधाई।  

- न जो, 26 जुलाई, 2026, लखनऊ  

Thursday, July 23, 2026

बुद्ध के जीवन, धर्मोपदेश और विचारों पर रोचक पुस्तक

 

भगवान बुद्धप्रसिद्ध इतिहासकार और पुरातत्वविद्‍ डॉ किरण कुमार थपल्याल की हाल में प्रकाशित पुस्तक है। बुद्ध के जीवन, धर्म-दर्शन तथा संघ पर उनके गहन अध्ययन और शोध का परिणाम है यह पुस्तक। लखनऊ विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्व विभाग के अध्यक्ष एवं छात्रों में लोकप्रिय शिक्षक रह चुके प्रो थपल्याल की सिंधु सभ्यता पुस्तक (डॉ संकटा प्रसाद शुक्ल के साथ सह-लेखन) चर्चित हुई थी। 1976 में पहली बार प्रकाशित इस पुस्तक के अब तक नौ संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं।

बुद्ध के जीवन और बौद्ध धर्म-दर्शन पर अनेकानेक पुस्तकें उपलब्ध हैं। अब भी उसके विविध पक्षों पर पुस्तक-प्रकाशन तथा विद्वानों के बीच विमर्श जारी रहता है। बुद्ध और उनके धर्म-दर्शन ने दक्षिण एशिया ही नहीं, सुदूर यूरोप और अमेरिका तक बहुत बड़ी आबादी को सदियों तक प्रभावित किया। आज भी उसकी विविध शाखाओं-मार्गों के अनुयायियों की काफी बड़ी संख्या इन देशों में है। कालांतर में विविध कारणों से, जिनमें भारतीय महाद्वीप में हिंदू धर्म का आक्रामक विस्तार भी शामिल है, बौद्ध धर्म का पराभव होता गया लेकिन उसकी जड़ें इतनी मजबूत और गहरी पड़ चुकी थीं कि उसकी सशक्त उपस्थिति सभी जगह जमी रह गईं। आज भी उसके प्रति आकर्षण अनुभव किया जाता है। हिंदू धर्म की अनेक जड़ताओं से परेशान लोग बुद्धम् शरणम् गच्छामिउच्चारते हुए उधर का रुख करते हैं। बाबा साहब भीमराव आम्बेडकर ने इसी कारण बौद्ध धर्म अपना लिया था। बहुजन समाज में बौद्ध धर्म के प्रति अतिरिक्त आकर्षण स्वाभाविक ही पाया जाता है।

प्रो थपल्याल की यह पुस्तक बुद्ध के प्रारम्भिक जीवन, मानव जीवन के दुख से दुखी होकर उनके गृह-त्याग और लम्बी भटकन, अंतत: ज्ञान प्राप्ति, प्रारम्भिक शिष्यों को प्रवचन, संघ की स्थापना, धर्म प्रचार, अंतिम दिन और परिनिर्वाण, धर्म के मूल आधार, उसके सैद्धांतिक पक्ष, बुद्ध के उपदेशों, बुद्धकालीन बौद्ध संघों, विभिन्न मुद्दों पर बुद्ध के विचार, आदि-आदि पर विस्तार से चर्चा करती है। नौ अध्यायों और पांच परिशिष्टों वाली यह पुस्तक बुद्ध के जीवन और उनके धर्म व संघ को सम्पूर्ण रूप में देखती है। कहीं-कहीं आलोचनात्मक निगाह से भी। बुद्ध को चूंकि बाद में भगवान का दर्ज़ा दे दिया गया था, इसलिए उनके बारे में अनेक किंवदंतियां प्रचलित हो गईं और बहुत सारे मिथक गढ़ लिए गए। पुस्तक में उन सबका जिक्र है, साथ ही उस संदर्भ में विभिन्न विद्वानों के अलग-अलग मत और कहीं-कहीं उसके संभावित कारणों का भी उल्लेख किया गया है।

बुद्ध के मांसाहार सबंधी विचार और विशेष रूप से स्त्रियों के बारे में उनकी बातें विवादास्पद भी रहीं। वे मांसाहार का निषेध करते थे लेकिन अगर भोजन मात्र के लिए जीव हत्या न की गई हो तो अनुमति भी देते थे, ऐसे प्रसंग मिलते हैं। स्त्रियों के बारे में उनके विचार अत्यंत विवादास्पद और स्त्री-विरोधी रहे हैं। हालांकि उन्होंने सुजाता और आम्रपाली को उपदेश दिया, उन्हें उपदेश देकर संघ में शामिल होने की अनुमति दी और भिक्षुणी संघ की भी स्थापना की, लेकिन वे भिक्षुणियां हमेशा और हर हाल में भिक्षुओं से निचले पायदान पर रखी गईं। बुद्ध का यह कथन बहूद्धृत है- एक बार उनके प्रिय शिष्य आनंद ने उनसे पूछा- स्त्रियों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए, बुद्ध ने कहा- स्त्रियों की ओर देखो ही मत, अगर दिख जाए तो उनसे बात मत करो, यदि वे बात करें तो सतर्क एवं सावधान रहो। वे स्त्रियों को आसक्ति का भण्डार मानते थे और कहते थे कि पत्नी का दायित्व हर प्रकार पति की सेवा करना है, वगैरह। यह विचार्णीय है कि क्या बुद्ध-पश्चात हिंदू धर्म में स्त्रियों की पुरुष की दासी जैसी स्थितियां बुद्ध के उपदेशों के प्रभाव के कारण बनीं!

खैर, बुद्ध के उपदेशों की विस्तार से चर्चा करते हुए प्रो थपल्याल विभिन्न विद्वानों द्वारा की गई व्याख्याएं तथा स्पष्टीकरण भी प्रस्तुत करते हैं। पुस्तक के मुख्य अध्यायों के अंत में संलग्न पाद टिप्पणियां इस संदर्भ में उल्लेखनीय हैं। यहां वे बौद्ध साहित्य के विपुल भण्डार से विविध मत-सम्मत उद्धृत करते हैं और पाठक के सामने विकल्प छोड़ देते हैं कि वह इन मत-मतांतरों से गुजरने के बाद अपनी स्वतंत्र धारणा बना सके।

बुद्ध के उपदेशों और धर्म के मूलाधारों का वर्णन करते हुए प्रो थपल्याल स्पष्ट कह्ते हैं कि –“यह पूर्णतया निश्चित करना कठिन है कि बौद्ध ग्रंथों में बुद्ध के नाम से जो उपदेश उपलब्ध हैं, उनमें से कौन वास्तव में उन्हीं के द्वारा दिए गए थे और कौन बाद में जोड़े गए। इस कृति में यथासम्भव उन्हीं को स्थान दिया गया है, जिन्हें अधिकांश विद्वान उनके द्वारा दिए गए मानते हैं।”

बुद्ध ने अपने प्रथम प्रवचन में चार आर्य सत्यबताए थे- दुख है, दुख का कारण है, कारण है इसलिए दुख का निवारण भी सम्भव है, और ऐसा अष्टांगिक मार्गों पर चलने से सम्भव है। ये अष्टांगिक मार्ग हैं- सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाक् (वाणी), सम्यक कर्मांत, सम्यक आजीव, सम्यक व्यायाम, सम्यक स्मृति और सम्यक समाधि। प्रो थपल्याल इन सब की विस्तार से व्याख्या करते हैं और तत्पश्चात बौद्ध धर्म के सैद्धान्तिक पक्ष की विवेचना करते हैं। इसमें दस शीलों का वर्णन है- प्राणियों की हिंसा से विरति, जो न दिया गया हो उसे न लेना, काम में मिथ्याचार से विरति, झूठ बोलने से विरति, सुरा-मैरेय-मद्य आदि नशीले पदार्थों से विरति, असमय भोजन से विरति, नृत्य-गीत-वादित और तमाशे से विरति, माला-सुगंधित पदार्थ का लेपन-धारण और अलंकरण से विरति, आरामदेह बिछावन से विरति तथा सोने-चांदी के परिग्रहण से विरति। अहिंसा पहला शील है लेकिन बुद्ध के अनुसार अनजाने में हुई हिंसा, यहां तक कि हत्या भी, अपराध नहीं है।

बौद्ध भिक्षु के लिए निर्वाण की प्राप्ति सर्वोच्च आदर्श है। यही उसकी आध्यात्मिक यात्रा का अंत है। निर्वाण का अर्थ है- तृष्णा का अंत। जैसे दीपक की लौ बुझने पर समाप्त हो जाती है, इधर-उधर या ऊपर-नीचे नहीं जाती, उसी तरह निर्वाण होने पर जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति मिल जाती है। तात्विक दृष्टि से यह अहम् का अंत है और नैतिक दृष्टि से लोभ, घृणा और अज्ञान का नाश करने वाला है।बुद्ध यह भी कहते थे कि केवल मेरे उपदेश सुनने से ही दुख का निरोध और निर्वाण की प्राप्ति नहीं हो सकती। उसके लिए मेरे बताए हुए मार्ग पर चलने का निरंतर प्रयास करना होगा। मेरा काम मार्ग बताना है, उस मार्ग पर चलना लोगों का काम है।

अनात्मवाद, अनित्यवाद और अनीश्वरवाद बौद्ध धर्म के प्रमुख सिद्धांत हैं। वे मानते हैं कि आत्मा की स्वतंत्र सत्ता नहीं होती। अनित्यवाद यह है कि सभी वस्तुएं अनित्य हैं यानी शाश्वत नहीं हैं। उनमें हर पल परिवर्तन होता रहता है और बुद्ध की शिक्षाओं में ईश्वर के लिए कोई स्थान नहीं है। मनुष्य अपने कर्मों के लिए स्वयं उत्तरदायी है और अपना आप भाग्यविधाता है।

यह त्रासदी ही कही जाएगी कि अनीश्वरवादीबुद्ध के भक्तों/भिक्षुओं ने बुद्ध को ही भगवान का दर्ज़ा दे दिया! बुद्ध को भगवान बनाने में हिंदू धर्मों के मठाधीशों का भी बड़ा हाथ है। जब बौद्ध धर्म तेज़ी से चारों ओर फैलने लगा तो उसकी लोकप्रियता से चिंतित हिंदू मठाधीशों ने बुद्ध को भगवान विष्णु का अवतार घोषित कर दिया और बौद्ध धर्म को हिंदू धर्म का ही एक अंग बता दिया।  

पुस्तक में बुद्ध के आचरण, उनसे जुड़ी दंतकथाओं, उनके उपदेशों की व्याख्या, उनकी यात्राओं, मुलाकातों, उनके निर्वाण से लेकर निर्वाण पश्चात अस्थियों के वितरण और स्तूपों के निर्माण, आदि के विवरण भी रोचक शैली में दिए गए हैं। पुस्तक में बुद्धकालीन संघों और भिक्षुओं से आचरण की अपेक्षाओं के अलावा परिशिष्ट में विभिन्न सामाजिक-आर्थिक मुद्दों पर बुद्ध के विचार व्याख्या सहित शामिल हैं।

भगवान बुद्धपुस्तक बहुत परिश्रम और अध्ययन के साथ लिखी गई है। इसीलिए वह पठनीय और रोचक भी बन पड़ी है। किताब के अंत में बुद्ध के जीवन के विविध अवसरों को दर्शाते 20 प्राचीन मूर्तिशिल्पों के चित्र भी परिचय सहित दिए गए हैं। ये चित्र अजंता, सारनाथ, भरहुत, सांची, आदि में प्राप्त हुए थे।

-    नवीन जोशी

(पुस्तक- भगवान बुद्ध, लेखक- प्रो किरण कुमार थपल्याल, प्रकाशक- उ प्र हिंदी संस्थान, पृष्ठ- 350। मूल्य- 445/-)