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Friday, January 30, 2026
उत्तराखण्ड में धर्मांतरण के फर्ज़ी मुकदमे, अधिकतर आरोपी अदालत से बरी
Thursday, January 22, 2026
साम्प्रदायिक घृणा फैलाने की होड़ में हैं न्यूज चैनल
निजी टी वी समाचार चैनलों और डिजिटल माध्यम अपनी आचार संहिता का खुला उल्लंघन कर रहे हैं। साम्प्रदायिक वैमनस्य और जातीय घृणा फैलाने में वे बहुत आगे हैं। इसके लिए वे 'लैण्ड जिहाद', 'लव जिहाद' और 'थूक जिहाद' जैसे अपमानजनक नारों का इस्तेमाल करते हैं। वे आबादी बढ़ने के आंकड़ों का एकतरफा व मनमाना उपयोग करते हैं। ये चैनल सत्ताधारियों का भोंपू बन गए हैं और इस प्रतियोगिता में एक-दूसरे को पछाड़ने की होड़ में लगे हैं।
निजी चैनलों के बारे में 'समाचार प्रसारण एवं डिजिटल मानक प्राधिकरण' तक पहुंची शिकायतों की जांच के निष्कर्ष और उसके आदेश यही बताते हैं। शिकायतों की जांच करने वाले इस प्राधिकरण का गठन स्वयं 'न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एंड डिजिटल एसोसिएशन' ने किया है, जो कि निजी टीवी चैनलों और डिजिटल माध्यम चलाने वालों की अपनी संस्था है।
जैसे प्रिण्ट मीडिया के लिए प्रेस काउंसिल है, वैसे ही इसे निजी टीवी चैनलों की परिषद समझा जा सकता है। उसने इन माध्यमों के लिए एक आचार संहिता बनाई है, जिसका पालन माध्यमों की आज़ादी बनाए रखने के साथ-साथ सामाजिक-नैतिक उत्तरदायित्व निभाने के लिए आवश्यक माना गया है।
Indian Express अखबार ने 22 जनवरी को प्रकाशित अपनी रिपोर्ट में विस्तार से प्राधिकरण तक पहुंची शिकायतों और उनकी जांच के बाद प्राधिकरण के आदेशों का विश्लेषण करते हुए विस्तार से रिपोर्ट प्रकाशित की। 23 जनवरी के अंक में उसने इस बारे में एक कड़ा सम्पादकीय भी लिखा है, जिसमें निजी टीवी चैनलों के इस गैर-जिम्मेदाराना रवैए की तीखी निंदा की है।
अखबार के अनुसार 01 जनवरी 2023 से 31 दिसम्बर 2025 तक प्राधिकरण ने 54 शिकायतों पर विचार के बाद आदेश पारित किए। 60 प्रतिशत शिकायतों में प्राधिकरण ने पाया कि चैनलों ने साम्प्रदायिक सद्भाव सबंधी आचार संहिता का उल्लंघन किया। जमीन कब्जे के मामलों को 'लैण्ड जिहाद', 'महिलाओं के मामलों को 'लव जिहाद' और खाने से सम्बद्ध खबरों मे 'थूक जिहाद' कहा गया।
जिन 32 शिकायतों में प्राधिकरण ने सम्बद्ध चैनलों के खिलाफ निंदात्मक कार्रवाई की वे साम्प्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने वाली, अल्पसंख्यकों के प्रति नफरत से भरी और आंकड़ों के मनमाना इस्तेमाल की हैं।
प्राधिकरण अपने सदस्य चैनलों/माध्यमों को आपत्तिजनक सामग्री पूरी तरह या आंशिक रूप से हटाने का आदेश देने से लेकर जुर्माना तक लगा सकता है। यह जुर्माना अधिकतम 25 लाख रु हो स्कता है।
प्राधिकरण के आदेशों का विश्लेषण करते हुए अखबार ने पाया कि शिकायतों से निपटने में प्राधिकरण काफी उदार रहा है। उसने शिकायतों की सुनवाई और उनके निपटारे में 11-12 महीनों का समय लिया और तब तक आपत्तिजनक सामग्री इन माध्यमों पर उपलब्ध रही। वैसे, शिकायतों का निपटारा 15 दिन से लेकर एक महीने तक हो जाना चाहिए।जुर्माना लगाने में भी काफी उदारता बरती गई।
सिर्फ एक मामले में 'टाइम्स नाऊ नवभारत' पर मात्र एक लाख रुपए का जुर्माना लगाया गया। पांच अन्य मामलों में इससे कम जुर्माना लगाया गया। छह मामलों में कुल 3.2 लाख रु का जुर्माना हुआ। इसका कोई असर चैनलों पर नहीं पड़ा क्योंकि ये कार्रवाइयां ऐसी नहीं थीं कि चैनल अपने रवैये से बाज आते।
प्राधिकरण ने 11 शिकायतों पर कोई कार्रवाई इसलिए नहीं की कि उसे कोई खास या गम्भीर उल्लंघन नहीं लगा या चैनलों ने सुधार कर लिया या मामला अदालत पहुंच गया।
प्राधिकरण को ये शिकायतें किसी संस्था से नहीं बल्कि कुछ व्यक्तियों से मिलीं। मात्र एक शिकायत निर्वाचन आयोग से अग्रसारित हुई जो उसे 'न्यूज18इण्डिया' के बारे में भाकपा ने भेजी थी। प्राधिकरण ने पाया कि इस चैनल के एंकर ने यह कहकर गलत किया कि दिल्ली विधान सभा के चुनाव में भाजपा की जीत 'रामजी' के कारण हुई।
नौ शिकायतें टीवी चैनलों पर 'लैंड जिहाद' के मामले दिखाने के लिए आईं। नौ ही शिकायतें 'लव जिहाद' के मामले दिखाने और दो 'थूक जिहाद' की रिपोर्ट दिखाने के लिए आईं। विपक्ष के खिलाफ दुर्भावनापूर्ण प्रचार की कई शिकायतों पर प्राधिकरण ने विचार किया। जातीय समूहों एवं आदिवासियों के प्रति अपमानजनक प्रसारणों की शिकायतें भी थीं।
सबसे ज़्यादा शिकायतें और प्राधिकरण के आदेश (16) 'टाइम्स नाऊ नवभारत' के खिलाफ हुए। दूसरे नम्बर पर 'न्यूज18इण्डिया' है, जिसके खिलाफ आठ मामलों में सामग्री हटाने को कहा गया। 'जी न्यूज' को पांच मामलों में रिपोर्ट हटाने को कहा गया। ये आदेश शिकायतों के करीब एक साल बाद आए और तब तक वे प्रसारण अपना काम कर चुके थे।
प्राधिकरण के वर्तमान अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश ए के सीकरी हैं। आठ अन्य सदस्यों में चार पूर्व आईएएस व आईएफएस अधिकारी और चार टीवी न्यूज चैनलों के 'सम्पादक हैं। अखबार के पूछने पर जस्टिस सीकरी ने बताया कि शिकायतों का निपटारा सर्वसम्मति से किया जाता है और सर्वसम्मति हासिल करने में वक्त लग जाता है।
Indian Express ने 23 जनवरी के सम्पादकीय में इस प्रवृत्ति पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए इसे निजी टीवी चैनलों की भड़काऊ व भोण्डी प्रवृत्ति कहा है और लिखा है कि ये चैनल व डिजिटल माध्यम गैरजिम्मेदार होने में एक दूसरे को पीछे छोड़ने में लगे हैं। इसके अत्यंत खतरनाक नतीज़े हैं। मीडिया की विश्वसनीयता ही नहीं घट रही, समाज में अलगाव और विभाजन बढ़ रहा है। खुद ये चैनल अपनी दर्शक संख्या खोते जा रहे हैं।
- न जो, 23 जनवरी 2026
(अखबार की पूरी रिपोर्ट देखें-
https://indianexpress.com/article/express-exclusive/in-3-years-nearly-60-per-cent-orders-by-tv-digital-news-regulator-cite-communal-code-breach-10487789/
Wednesday, November 19, 2025
सेक्स, सोसायटी एंड शी - बहुत जरूरी मुद्दे पर 365 डिग्री चर्चा
जो महिलाएं ससुराल में टिकी रहीं, वे केवल बच्चे जनने की मशीन बनी रहीं। सेक्स-सुख जैसी कोई चीज उन्होंने नहीं जानी। कई बार खेतों-जंगलों से उनकी 'चरित्रहीनता' के किस्से हवाओं में बहते आते थे या फिर हिस्टीरिया के उनके बढ़ते दौरे देवता या भूत या जिन सवार हो जाने के अंधविश्वासों का शिकार बनते थे। आज भी ऐसा नहीं होता, कौन कह सकता है?
मैं समझता था, आज की नई पीढ़ी इस मामले में बहुत बिंदास है, भाग्यशाली है, क्योंकि उनकी बातचीत में ही नहीं, गीतों और लिबासों में भी 'सेक्सी' शब्द 'ब्रेकफास्ट', 'लंच' या 'डिनर' की तरह आता है।
अरशाना अजमत की किताब 'सेक्स, सोसायटी और शी' (ग्रे पैरट पब्लिशर्स, लखनऊ) ने मेरी यह धारणा ध्वस्त कर दी। नई से नई पीढ़ी 'सेक्स' और 'सेक्सी' धड़ल्ले से बोलती जरूर है मगर उसके बारे में उनकी समझ बहुत सतही और अनेक बार नासमझी भरी ही है। सेक्स शिक्षा जैसी किसी चिड़िया के पंख आज भी नहीं उगे। जो कुछ पाठ्यक्रम में है, वह सरकारी-तकनीकी हिंदी जैसा अबूझ है और टीचर उसे कभी साफ समझाते नहीं।
अरशाना अपनी किताब में बाल सुलभ जिज्ञासाओं पर माता-पिताओं के संकोच और नासमझी भरे जवाब की बात करती है। वह तरुणाई में शारीरिक परिवर्तनों, आशंकाओं-प्रश्नों व झिझक को खुलकर बताती है। वह लड़के-लड़कियों की दोस्ती, 'लव', सेक्स, वगैरह से जुड़ी भ्रांतियों को खोलकर रखती है। वह सेक्स के बारे में लड़कों के पहलू से भी बात करती है, यद्यपि इस पुस्तक का केंद्र 'शी' है।
यहां माहवारी की लड़कियों की समस्या और अंधविश्वासों (हां, वह आज के समय में भी बहुत हैं) पर हर कोण से चर्चा है। सेक्स-सुख और उससे वंचित स्त्रियों की अपूर्णता का मुद्दा है। इस आनंद को उनका हक ठहराते हुए अपने पार्टनर से उसकी स्पष्ट मांग करने की वकालत भी यहां है, बिना डरे कि यह 'चरित्रहीनता' का प्रमाण माना जाता है।
अरशाना की भेदती नज़र नए दौर में बहुप्रचलित 'डेटिंग', 'आउटिंग', 'रिलेशनशिप', 'हुक-अप', 'लव', 'सेक्स' के 'ऑनलाइन बिजनेस' और उसके धोखों के प्रति आगाह करती है। वह अनेक 'डेटिंग साइट्स' के खुद व सखियों के अनुभवों के आधार पर नई पीढ़ी को आगाह करती है कि कहां सच में 'फन' है, कहां सीमा है जिससे आगे बड़ा फंदा है। 'ए आर (ऑगमेंटेड रियलिटी) एवं वी आर (वर्चुअल रियलिटी) सेक्स' का नया प्रचलित फण्डा-फंदा तो अवश्य ही नई पीढ़ी को ठीक से समझ लेना चाहिए।
अरशाना अनचाही 'प्रेग्नेंसी' और 'अबार्शन' के कारण स्त्री-स्वास्थ्य के कम जाने गए खतरों को सामने रखती है। गर्भ निरोधकों के उत्पादकों ने स्त्री शरीर कि किस कदर प्रयोगशाला बना दिया है और इसका कितना दुष्परिणाम वे सहती है, इसकी तो चर्चा ही नहीं होती।
यह सब स्पष्ट करते हुए अरशाना पूछती है कि सबसे सुरक्षित गर्भ निरोधक 'कंडोम' को पुरुष आखिर क्यों इस्तेमाल नहीं करते। वह लड़कियों से आग्रहशील है कि उन्हें अपने पुरुष साथियों को इसके लिए बाध्य करना चाहिए, क्योंकि यह बेवजह बहाना है कि 'कंडोम' पुरुष के आनंद में बाधक है।
इस किताब में बात मुख्यत: स्त्री के नज़रिए से कही गई है लेकिन लड़कियों एवं सेक्स के मामलों में लड़कों की भी नासमझी सवालों के घेरे में है। एक जगह वह लिखती है कि बाज लड़कियों को मां या दीदी या भाभी से कुछ टिप्स मिल जाया करते हैं लेकिन लड़कों को यह तनिक खुली खिड़की भी उपलब्ध नहीं होती।
समय पर वैज्ञानिक ढंग से सेक्स शिक्षा के अभाव में झूठी, मनगढ़ंत, सनसनीखेज किताबों या 'गूगल' से अर्जित अवैज्ञानिक यौन जानकारियां युवाओं को अंधी खाई की ओर ही धकेलती हैं। और, "बॉलीवुड ने जो सबसे खतरनाक काम किया, वो ये कि हमारे दिमाग में प्रेम और सेक्स के बीच विभाजक रेखा खींच दी... उसने इसे नैतिकता-अनैतिकता से जोड़ दिया।"
मुस्लिम समाज व मुस्लिम लड़कियों के कोण से भी तमाम बातें स्पष्ट की गई हैं। उन्हें लेकर बहुत सी सच्ची-झूठी चर्चाएं चलती हैं। 'हलाला' और कई अन्य मुद्दों पर तर्कों के साथ खूब खुलकर बात रखी है। अरशाना इस मामले में धर्मांधता को चुनौती देने की सीमा तक जाती है। कई भ्रांतियां और अंधविश्वास सभी समाजों में समान भी हैं।
अनुभव जुटाने के लिए लेखिका ने कुछ व्याहारिक प्रयोग भी किए, जैसे स्कूली बच्चों के बीच सेक्स-सर्वे, जिसमें उनसे खुलकर सवाल पूछे गए। कई बरस पहले स्त्री के यौन आनंद और सेक्स की उसकी 'च्वाइस' को मुद्दा बनाकर अरशाना ने मंच पर एक नाटक किया था। वे सभी अनुभव इस किताब का हिस्सा हैं और इसे प्रामाणिक बनाते हैं।
इस पुस्तक में 'करो-न करो' के उबाऊ निर्देश नहीं हैं। इसमें किसी काउंसिलर की सलाहों का पुलिंदा भी नहीं है। वास्तव में यहां कोई 'निषेध' नहीं है। सब कुछ आपकी मर्जी और आजादी पर निर्भर है, किंतु सजग विवेक एवं पूरी समझदारी के साथ।
तन आपका है, मन आपका है, दिमाग भी आपका होना चाहिए, क्योंकि बड़े खतरे हैं इस राह में। 'टेन कमाण्डमेंट्स' की तर्ज़ पर यहां दस ऐसी बातें भी दी गई हैं, जो हर बच्चे को पढ़ाई-सिखाई जानी चाहिए और जो एक व्यावहारिक-वैज्ञानिक सेक्स शिक्षा का आधार बन सकती हैं।
इस किताब के बहुत सारे पक्ष हैं जो इसे अत्यंत उपयोगी और अवश्य पठनीय बनाते हैं। यहां कई प्रकार के विमर्श भी हैं। मसलन, स्त्री-पुरुष बराबरी के प्रश्न पर अरशाना का स्पष्ट मानना है कि "खुदा ने सबको बराबर नहीं बनाया है, न जिस्म से न मन से। इसलिए बराबरी की लड़ाई लड़नी ही नहीं चाहिए। लड़ाई लड़नी चाहिए एक-दूसरे से अलग होते हुए भी एक-दूसरे का मान-सम्मान करने की।"
और, यह कि "भारत एक लोकतांत्रिक देश है और संविधान से चलता है। लिहाजा कानून की चलनी चाहिए, लेकिन एक समस्या है। देश तो लोकतांत्रिक है लेकिन समाज कतई लोकतांत्रिक नहीं है और न ही संविधान के अनुसार चलता है।"
यह किताब लिखकर अरशाना ने एक बड़ी रिक्तता को भरने की कोशिश की है। सेक्स, समाज और स्त्री को लेकर इतनी स्पष्ट, बेबाक और विज्ञान-मनोविज्ञान सम्मत पुस्तक हिंदी में तो नहीं मिलेगी। अंग्रेजी में भी शायद ही लिखी गई हो।
इसीलिए यह हर पीढ़ी के लिए अनिवार्य रूप से पठनीय है। पुस्तक amazon पर उपलब्ध है।
-न जो, 20 नवम्बर 2025
Sunday, November 16, 2025
'डेटिंग' और 'हग' वाले हमारी कशिश न समझ पाएंगे
1970 के दशक की बात है। सूचना निदेशक और साहित्यकार ठाकुर प्रसाद सिंह के दफ्तर में अक्सर युवाओं का जमावड़ा लगा रहता था। युवा लेखकों-कवियों को वे खूब प्रोत्साहित करते थे। अपने खास अंदाज़ में रोचक किस्से भी सुनाया करते थे। एक दिन बताने लगे कि कहीं फोन करने के लिए जब उन्होंने चोगा उठाकर कान में लगाया तो रिसीवर से आवाज़ें आ रही थीं उन दिनों अक्सर ऐसा हो जाता था। आपकी फोन लाइन किसी दूसरी लाइन से अपने आप जुड़ जाती थी और आप उनकी बातचीत सुन सकते थे। तो, फोन पर एक लड़का किसी लड़की से किसी शांत और एकांत जगह में मिलने की बात कर रहा था। लड़का हर बार एक जगह सुझाता तो लड़की तुरंत मना कर देती कि वहां ऐसा है, वहां वैसा है, वहां पास में चाचा रहते हैं, वहां दीदी की ससुराल है, वगैरह।
ठाकुर साहब बता रहे थे- ‘बेचारा प्रेमी जोड़ा मिलने के लिए छटपटा रहा था। सो, थोड़ी देर बाद मैंने फोन पर कहा कि अगर चिड़ियाघर या दिलकुशा या रेजीडेंसी में न मिलना चाहो तो किसी लायब्रेरी में मिलो। वहां कोई देखेगा भी तो शक नहीं करेगा। यह कहकर फोन रख दिया मैंने।’
पता नहीं वे सच्चा किस्सा सुना रहे थे या किस्से की मार्फत हम युवाओं को मिलने की जगह सुझा रहे थे। वह उम्र ही ऐसी थी। इकतरफा प्रेम में सभी पड़े रहते थे। अगर किसी का किस्सा दोतरफा हो गया तो मिलने के अवसर और जगहें ढूंढना बोर्ड के इम्तहान पास करने से कठिन होता था। हो सकता है, ठाकुर साहब को हममें से किसी के इस संकट का पता चल गया हो।
बहरहाल, उस समय तो नहीं लेकिन चंद वर्ष बाद शहर के पुस्तकालय हमारा बढ़िया और गोपनीय मिलन केंद्र अवश्य बने। ठाकुर साहब की सलाह तो काम आई ही, किताबों की संगत में मुहब्बत भी ‘क्लासिक’ हुई! मोतीमहल स्थित आचार्य नरेंद्र देव पुस्तकालय और हजरतगंज के सूचना केंद्र वाले पुस्तकालय का आनन-फानन सदस्य बना-बनवाया गया। मेफेयर बिल्डिंग में ब्रिटिश काउंसिल लाइब्रेरी में बिना सदस्य हुए भी देर तक बैठा जा सकता था। वहां एसी चलता था और चंद ही पाठक होते थे। कोई-कोई तो सिर्फ ठंडी हवा में झपकी लेने आ जाया करते थे और एक पत्रिका सामने खोलकर ऊंघा करते थे। वहां निश्चिंत होकर देर तक बैठा और मंद्र स्वर में बतियाया जा सकता था। काउंटर पर बैठे हिंदुस्तानी सख्श की निगाह जरूर पीछा करती रहती थी।
लड़कियों के लिए भी ‘लाइब्रेरी जा रही हूं’ कहकर घर से निकलना कुछ आसान होता था। तब लड़कियों को आज जैसी आज़ादी नहीं थी। शाम को अंधेरा होने तक घर लौटना होता था। कोई दो-ढाई घंटे बाद हाथ में एक किताब लेकर घर लौटने पर सवालों से कुछ बचत हो जाती थी, हालांकि बाहर की किताबें भी शक के दायरे में आती थीं। नरेंद्र देव लाइब्रेरी बिल्कुल कोने में थी। जाड़ों में उसके हरे-भरे लॉन में धूप भी सेकी जा सकती थी, हालांकि इसमें ‘पकड़े’ जाने का खतरा रहता था। मोतीमहल सोसायटी कुछ छात्र-छात्राओं को साल भर के लिए निशुल्क पाठ्य पुस्तकें भी जारी कर देती थी। विश्वविद्यालय में टैगोर लाइब्रेरी का लॉन भी अच्छी जगह था लेकिन दोस्त चैन से बैठने दें तब तो! सूचना केंद्र शहर के बीच में होने से वहां आना-जाना कतई मुश्किल नहीं था। ‘शॉर्ट नोटिस’ पर मिलने के लिए वह अच्छी जगह थी।
लाइब्रेरी में मिलने का एक लाभ यह भी था कि अगर दोनों में कोई एक पहले पहुंच गया या दूसरे को देर हो जाय तो भी प्रतीक्षा असहज नहीं होती थी। तब लाइब्रेरी का वह लाभ उठाया जा सकता था जिसके लिए वे वास्तव में बनी होती हैं! सड़क पर साथ-साथ चलना अत्यंत दुस्साहस का काम था और रिक्शे पर साथ बैठना निश्चित रूप से खतरा मोल लेना होता था। तब सारा शहर घूरता था और बात कान-कान होते हुए लड़की को कटघरे में खड़ा कर देती थी। लड़की का भाई सबसे खतरनाक प्राणी हुआ करता था, भले ही वह स्वयं अपने लिए मिलने की जगह तलाशने में भटका फिरता हो। इसलिए लाइब्रेरी से कुछ समय के अंतराल पर अलग-अलग निकलना ही समझदारी होती थी।
हमारे एक मित्र और उनकी ‘वह’ कुछ अधिक ही दुस्साहसी थे। वे किसी मित्र की स्कूटर दो घण्टे के लिए उधार लेकर चार घंटे से पहले न लौटते। इधर मित्र से सचमुच का झग़ड़ा होता, उधर घर पर कन्या का मुंह सूज गया रहता। ऐसा सिर्फ रोने से ही नहीं होता था, उससे पहले पिटाई की रस्म भी निभाई दी गई होती थी। सीतापुर रोड पर कोई आठ-दस किमी दूर नया-नया खुला ‘पूरब-पश्चिम’ रेस्त्रां उनका पसंदीदा अड्डा हुआ करता था। कुछ ही दिन में उनका इश्क शहर भर में प्रसिद्ध हो गया। घायल खूब हुए लेकिन निकले वे प्रेमवीर चक्र विजेता ही। उनके किस्से हम बुढ़ापे में भी याद करते हैं, इस ताने के साथ कि ‘तुम बहुत दब्बू थे!’ सुनना ही मजबूरी है क्योंकि अब उस मोर्चे पर कुछ किया नहीं जा सकता!
‘डेटिंग’ शब्द हमने दूर-दूर तक सुना न था। यह जन्मा नहीं था या हमसे बहुत दूर कहीं पाया जाता था, पता नहीं। मुहब्बतों की तासीर में लेकिन कहीं कोई कमी नहीं होती थी। आज के प्रेमियों को हम चुनौती दे सकते हैं कि तुम्हारी मुहब्बतों में क्या तड़प होगी जो हमने झेली। दिल इतना उछलता था कि बस दौरा ही नहीं पड़ता था। उसांसें भरने का तो आपको अर्थ भी पता न होगा। ‘डेटिंग’ वाले वह कशिश क्या जानेंगे जब मिलने का समय और स्थान एक दूसरे तक पहुंचाने के लिए भी समुद्र लंघन करना पड़ता था। ये नहीं कि फोन उठाया, कॉल किया या वहट्सैप भेजा और सज-धज के पहुंच गए। आप समझ ही नहीं सकते कि हफ्ते भर की मेहनत से एक चिट सही ठिकाने पर पहुंचा पाने की जद्दोजहद क्या होती है और जवाब का इंतज़ार तन-मन में कितनी हलचल मचाया देता था।
और, चिट लिखना क्या आसान होता था? हड़प्पा-युग की जैसी अबूझ कोड-भाषा खोजने और उसका अभ्यास कर लेने के बाद भी कभी ऐसा भ्रम हो जाता था कि आप सूचना केंद्र की लाइब्रेरी में इंतज़ार करते बेचैन हो रहे हैं और वो नरेंद्र देव लाइब्रेरी में कुछ भेदती निगाहों के बीच कसमसा रही हैं। हद यह भी हो जाती थी कि घंटे भर प्रतीक्षा के बाद आप नरेंद्र देव लाइब्रेरी का रुख करते हैं और उसी समय वही बेचैनी उन्हें सूचना केंद्र ले आती है। दोनों तरफ ‘कहीं ऐसा तो नहीं हो गया, कहीं वैसा तो नहीं हुआ होगा’ के अंदेशे प्राण सोखने लगते थे। वह कशिश, वह बेचैनी, वह नाराजगी मुहब्बत का ऐसा अदृश्य फैविकॉल बन जाती थी कि पीयूष पाण्डे के उर्वर विज्ञापनी दिमाग की पहुंच भी वहां न हो सकती थी। इश्क के इस मजे से ‘डेटिंग’ वाली पीढ़ी वंचित ही रहेगी।
लड़के तो लड़कों की तरह आज़ाद होते थे मगर लड़कियों के लिए हज़ार आपदाएं टूट पड़ने का इंतज़ार करती रहती थीं। आज की तरह यह नहीं कि सजे-धजे, परफ्य्यूम महकाया और मम्मी की ओर ‘सी, यू’ का जुमला उछालते हुए स्कूटी की चाबी घुमा दी। मिलने वाले दिन लड़की सुबह से सारे काम जल्दी-जल्दी निपटाकर घर के कुछ अतिरिक्त काम भी उत्साह से निबटा दिया करती थी ताकि ऐन मौके पर मां कोई काम न बता दे। और, अक्सर ऐन मौके पर ओले पड़ ही जाते थे। ‘मैं सहेली के घर से किताब लेकर आती हूं’ कहकर वे घर से निकलने वाली होतीं कि मां को गंदे कपड़ों के ढेर की याद आ जाती- ‘जल्दी से कपड़े फींच दे, फिर धूप चली जाएगी।’ मजाल जो मना किया जा सके। कुढ़न के मारे मुंगरी से कपड़ों की ऐसी चुटाई होती कि मां को कहना पड़ जाता- ‘कपड़े फाड़ डालेगी क्या? किस बात का गुस्सा दिखा रही है छोकरी, सहेली के यहां कल चली जाएगी तो क्या आसमान टूट पड़ेगा?’ उधर आप बेचैनी से टहल रहे हैं, बार-बार उस दिशा में देख रहे हैं, रूठने के दसियों तरीके इजाद कर रहे हैं और दो घंटे बाद युद्ध के मैदान में पराजित सिपाही की तरह लौट रहे हैं।
‘डेटिंग’ में जितनी आसानी से आप ‘हग’ कर लेते हो, उसमें वह बात कहां जब साड़ी या दुपट्टे का पल्लू छू लेने की मासूम ख्वाहिश भी बार-बार दम तोड़ दिया करती थी। दिल गुंथे रहते थे लेकिन बीच की भौतिक दूरी कम करते-करते युग बीत जाया करते थे। यह मोर्चा किसी तरह फतह कर लिया तो अंगुलियों का स्पर्श करना ऐवरेस्ट की चढ़ाई से कम नहीं था। ‘एक मुद्दत से तमन्ना थी तुम्हें छूने की’ जैसा गीत अब कोई क्या खाक लिख पाएगा! कशिश की हदों से गुजरना पड़ता था, बच्चो! ... और पहले स्पर्श का वह कम्पन, वह गुदगुदी, वह झुरझुरी, वह धुक-धुक ...शब्दातीत! ... आज तक उसकी महक दिल-दिमाग और सांसों में बसी हुई है! ‘हग’ करने वालों को इस अनुभव के लिए टाइम मशीन में बैठकर चालीस-पचास साल पीछे जाना होगा।
शायर को चीटी ने नहीं काटा था न कि वो कह गया- ‘दोनों तरफ हो आग बराबर लगी हुई।’ मतलब होता था इसका। ऐसी आग लगती थी कि ‘बुझाए न बुझे’। आज तक सुलग रही है। यहां ‘सुलगने’ का अर्थ-अनर्थ कर दिए जाने का खतरा है क्योंकि अब आग ठीक से लगती भी नहीं कि बारिश हो जाती है। मतलब कि किसी भी नुक्कड़ पर, फुटपाथ पर कहीं भी, किसी पार्क या मॉल में ‘मुदहुं आख कतहुं कछु नाहीं!’ तब सारे जमाने की आंख आप पर हुआ करती थी। मजाल जो कोई पलक भी झपका ले। यह तो अपना ही जिगरा था कि सौ तालों के बीच से आसमान का एक टुकुड़ा चुरा लिया करते थे।
मुहब्बत की परिभाषा ही बदल गई है ससुर। जमाने भर से जितनी शायरी कही-दोहराई जाती रही, सब बेकार हो गई हैं। ‘डेटिंग’ पर मुई एक मरियल सी कविता भी आज तक किसी से लिखते न बनी। विज्ञान और टेक्नॉलजी ने कितनी ही तरक्की कर ली हो, इश्क का जमाना तो हमारा ही अव्वल था। इसे बुढ़ापे का फलसफा समझकर हंसी में न उड़ा दिया जाए।
- न जो, 17 नवम्बर, 2025 के नवभारत टाइम्स यानी कि NBT में प्रकाशित
