
पुलिस की सम्वेदनहीनता
जगजाहिर है. लाशों के साथ ही नहीं, वे जिंदा या अधमरे मनुष्यों के साथ भी अमानुषिक व्यवहार
करते हैं. पुलिस का यह अमानवीय रूप ब्रिटिश काल में बनाया गया था ताकि गुलाम भारतीयों
पर जुल्म ढाए जा सकें. आजादी के 68 वर्ष बाद भी उसका यह चेहरा बदला नहीं है. इस बीच पुलिस सुधार, उसके मानवीकरण और
मित्र-पुलिस जैसे जुमलों पर बेशुमार बातें
हो गईं. लगता नहीं कि उसकी छवि और व्यवहार कभी सुधरेंगे.
सम्वेदनहीनता का अफसोसनाक
नजारा हमारे अस्पतालों के कर्मचारी भी पेश करते हैं. बीमार मरीज और तीमारदारों के
साथ नर्स, वार्ड बॉय, सफाई कर्मचारी आदि का व्यवहार ऐसा होता है जैसे उन्हें अपने शत्रुओं की देखभाल
में जबरन लगा दिया गया हो, हालांकि बीमार का
इलाज शत्रु या मित्र देखकर नहीं किया जाता. अस्पतालों के कर्मचारी मरीजों के हर
अनुरोध पर उन्हें झिड़कने और सामान्य सेवा के लिए भी रकम वसूलने की फिराक में रहते
हैं. चंद रोज पहले राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान के कर्मचारियों ने सम्वेदनहीनता की हदें पार कर दीं. हड़ताल तो डॉक्टर-कर्मचारी सभी करते रहते हैं लेकिन
लोहिया संस्थान के कर्मचारियों ने तेज आवाज वाला साउण्ड सिस्टम लगा लिया और
जोर-शोर से भाषणबाजी ही नहीं की, गाने भी फुल वॉल्यूम में बजाए. लोहिया संस्थान विशिष्ट
चिकित्सा के लिए जाना जाता है और वहां ज्यादातर गम्भीर मरीज भर्ती रहते हैं. कानफाड़ू
शोर से उन्हें कितनी यंत्रणा पहुंची होगी, यह सोचने की
सम्वेदनशीलता वहां किसी में नहीं थी. संस्थान प्रशासन ने भी तब जांच बैठाने की
औपचारिकता निभाई जब मामला मीडिया में उछला. अस्पतालों के भीतर ही नहीं, आस-पास भी शोर
करना सख्त मना होता है. पुराने अस्पतालों के करीब वाहन चालकों के लिए निर्देश लिखे
मिलेंगे कि यहां हॉर्न न बजाएं. अब अस्पतालों में डीजे बजने लगे हैं तो नए
अस्पतालों के आस-पास ऐसे संकेत पट लगाने का ख्याल भी कौन करे.
सम्वेदनहीनता हमारे समय
के बड़े संकटों में एक है. जरा सी बात पर पिस्तौल निकाल कर किसी की जान ले लेना हो
या सड़क पर छटपटाले घायल को तमाशबीन होकर देखना, इसी महामारी का किस्सा है. दरअसल, हमारी दुनिया और
जीवन के बेरहम अंदाज हमारे भीतर के मनुष्य की हत्या कर रहे हैं. धीरे-धीरे हम मशीन
में तब्दील हो रहे हैं और मशीन सम्वेदनशील नहीं हुआ करती.
(नभाटा, 11 मार्च, 2016)
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