किसानों को जरूर यह खबर ठंढी हवा के झोंके की तरह लगी होगी कि इस बार बहुत
अच्छी बारिश होगी, सामान्य से ज्यादा.
पिछले दो-तीन साल से मानसून रूठा हुआ था. खेती सूख गई, किसान तबाह हुए और महंगाई बढ़ी. अच्छी बारिश की बड़ी जरूरत
है.

लेकिन डरना एक बात और कमर कसना अलग बात. सो, अभी भी वक्त है कि कुछ साज-सम्भाल कर ली जाए. नालों को खूब साफ किया जाए, तालाब कहीं बचे हैं तो उन्हें गाद निकाल कर गहरा-चौड़ा किया
जाए, बड़े-बड़े पार्कों में थोड़ी
खुदाई कर पानी के कुछ देर ठहरने की व्यवस्था हो, इतनी देर कि बारिश का पानी मिट्टी में सीझ सके. बड़ी-बड़ी सरकारी इमारतों में
बारिश के पानी को जमीन के नीचे डालने की आसान सी व्यवस्था दुरुस्त की जाए. जवाहर
भवन, इंदिरा भवन और पिक-अप जैसी
विशाल इमारतों में वर्षा जल संचयन प्रणाली पूरे तंत्र को मुंह चिढ़ा रही है. हुजूर, उसे ठीक करिए. और भी बड़ी इमारतों में उसे लगाइए. इलाहाबाद
उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ की आलीशान इमारत का हाल ही में उद्घाटन हुआ है. हमें
पूरी उम्मीद है कि वर्षा जल के साथ पूरा न्याय करने की व्यवस्था इस खूबसूरत भवन में होगी ही. यह न्याय शहर में यथासम्भव हर जगह पहुंचे.
छोटे-छोटे व्यक्तिगत स्तर तक यह काम हो. अधिक से अधिक नागरिक इस पुण्य कार्य में
योगदान करें. धरती की सूखती कोख इससे हरी
होगी, जल स्तर बढ़ेगा और बारिश से
जल भराव एवं बाढ़ की सम्भावना बहुत कम हो जाएगी.
बारिश जीवन दायिनी है. उसका सामान्य से कुछ अधिक होने की खबर शुभ होनी चाहिए.
उससे डर लग रहा है तो कारण हम हैं. हमने ही उसका सम्मान करना और उसके लिए पर्याप्त
जगह छोड़ना बंद कर दिया. कमर कसिए, खूब बारिश के लिए तैयार रहिए और उसका स्वागत कीजिए. पानी का संकट भी टलेगा और बाढ़ व जल जमाव के नुकसान भी न
होंगे. ठीक?
लेकिन मैं यह किससे कह रहा हूं?
(नभाटा, अप्रैल 15, 2016)
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