
केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री
स्मृति ईरानी ने ‘झूठी खबरें’ देने वाले पत्रकारों पर अंकुश लगाने की पहल करके इस मुद्दे
को हवा दे दी. प्रस्ताव की जानकारी होते ही मीडिया जगत में हल्ला मच गया. इसे
पत्रकारों पर बंदिश लगाने के मोदी सरकार के कदम के रूप में देखा गया. मोदी सरकार
वैसे ही मीडिया को येन-केन-प्रकारेण अपने पक्ष में करने के आरोपों से घिरी है. कई
वरिष्ठ पत्रकारों ने इसकी तुलना राजीव गांधी के दौर में लाये गये अवमानना विधेयक और
इंदिरा गांधी के आपाकाल से करते हुए व्यापक आंदोलन की अपील की. गनीमत हुई कि वैसी
नौबत आने से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्मृति ईरानी की ओर से हुई पहल पर
रोक लगा दी.
इससे ‘चुनावी वर्ष में मीडिया को दबाने
के प्रयास’ से जनित आक्रोश तो शांत हो गया है लेकिन ‘फेक न्यूज’ या झूठी खबरों का मामला गर्म बना
हुआ है. यह मुद्दा आज पूरी दुनिया में जेरे बहस है. 2016 में अमेरिकी राष्ट्रपति
के चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी की तरफ से डॉनल्ड ट्रम्प के उतरने और अंतत: जीतने
के बाद अमेरिकी राजनीति और पत्रकारिता आये दिन ‘फेक न्यूज’ के आरोप-प्रत्यारोपों से घिरे रहे.
मीडिया ने ट्रम्प के रोजाना झूठ बोलने की पोल खोली तो ट्रम्प ‘फेक मीडिया’ को झूठी खबरों के लिए लताड़ने से
लेकर ‘पुरस्कृत’ करने की घोषणा तक गये.
अपने
देश में 2012 से नरेंद्र मोदी के उभार के बाद से मिथ्या समाचारों का मामला ज्यादा
बड़ा और गर्म होता गया. मोदी सरकार, भाजपा और उसके विभिन्न कट्टर हिंदू संगठनों से लेकर मीडिया
के बड़े वर्ग पर मोदी सरकार के पक्ष में झूठी या अतिरंजित खबरें देने तथा मिथ्या
प्रचार से प्रधानमंत्री की छवि चमकाने के आरोप लगे. ‘गोदी मीडिया’ जैसा जुमला गढ़ा गया. विपक्ष की तरफ
से उसी तर्ज पर जवाब देने की कोशिशें होती रही हैं.
‘मिथ्या समाचार’ क्या हैं, इस पर विवाद होते हैं. क्या वही खबरें झूठी हैं, जो बिना किसी आधार के किसी एक पक्ष
को लाभ पहुंचाने के लिए गढ़ी गयी हों? क्या वे समाचार इस श्रेणी में नहीं आते जो तथ्यों को
तोड़-मरोड़ कर किसी के पक्ष में पेश किये जाते हैं? बिना तथ्यों की जांच किये, मामले की गहराई में गये बिना, सभी पक्षों को सुने बिना, एकांगी दृष्टि से लिखे गये और
प्रायोजित समाचार क्या मिथ्या श्रेणी में
नहीं आते?
पत्रकारिता का मूल मंत्र है
निष्पक्ष होकर प्रत्येक कोण से समाचार की पड़ताल करना. सावधान रहना कि कोई भी गलत
या अपुष्ट सूचना न जाने पाये. किसी सूचना पर संदेह हो और पुष्टि न हो पा रही हो तो
उसे छोड़ देना. ऐसे समाचारों से परहेज करना जो सत्य होने के बावजूद समाज को तोड़ने, अविश्वास फैलाने और फसाद खड़ा करने
का कारण बनते हों. आज पत्रकारिता के ये मानदण्ड लगभग ध्वस्त हो गये हैं. मिशन से
धंधा बन गयी पत्रकारिता नैतिकता और सरोकारों से बहुत दूर चली गयी है. मीडिया
घरानों के अपने स्वार्थों से लेकर राजनैतिक निष्ठाओं के लिए पत्रकारिता इस्तेमाल
की जा रही है. कुछ वर्ष पहले तक बड़ा अपराध माने जाने वाले ‘पेड न्यूज’ आज स्वीकार्य जैसे हो गये हैं. धन
लेकर कुछ भी प्रसारित करने की कई बड़े मीडिया घरानों की स्वीकारोक्ति वाले हाल के ‘कोबरा पोस्ट’ स्टिंग ने इसीलिए बहुत सनसनी नहीं
मचायी.
सोशल मीडिया प्लेटफार्मों ने हद कर
दी है. वहां ‘फेक न्यूज’ की बाकायदा फैक्ट्री चलती हैं. हर एक के हाथ में मोबाइल है
और झूठे समाचार त्वरित गति से प्रसारित हो रहे हैं. वहां पत्रकार होने की जरूरत भी
नहीं है. राजनैतिक दलों के आई टी सेल सही-गलत समाचार फैलाने में दिन रात लगे हैं.
जनता के लिए यह समझना कठिन होता है कि क्या झूठ है और क्या सच. डिजिटल मीडिया पर
प्रसारित होने हाले झूठ की पोल खोलने वाली कुछ साइटें भी सक्रिय हुई हैं. उनका
मानना है कि जिस गति से मिथ्या समाचार गढ़े और फैलाये जा रहे हैं, उस गति से उनका झूठ पकड़ना और जनता
तक पहुंचाना सम्भव नहीं है. तथ्यों की पड़ताल में समय लगता है. झूठ फैलाने में कोई
वक्त नहीं लगता.
इसका समाधान क्या है? स्मृति ईरानी जो करने जा रही थीं, क्या उससे इसे रोका जा सकता है? पूरी आशंका यह है कि इस बहाने
मीडिया पर सरकार का मनचाहा अंकुश लग जाता मगर झूठ की फैक्ट्रियां कतई बंद नहीं
होतीं. मीडिया संगठनों और विरोधी दलों ने इसीलिए इसका बड़ा विरोध किया.
हाल ही में राजस्थान की वसुंधरा
राजे सरकार ने सरकारी अधिकारियों को बचाने के बहाने मीडिया पर अंकुश लगाने की
कोशिश की थी. 2012 में राहुल गांधी की करीबी सांसद मीनाक्षी नटराजन ने राष्ट्रीय
सुरक्षा की आड़ में मीडिया को नियंत्रित करने की मंशा से एक निजी विधेयक तैयार किया
था. सन 1988 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और 1982 में बिहार
के मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा ने भी प्रेस पर सरकारी नियंत्रण की कोशिश की थी. ये
सभी प्रयास देश-व्यापी विरोध के बाद वापस लेने पड़े थे.
‘फेक न्यूज’ से लेकर अपुष्ट एवं एकपक्षीय समाचार पत्रकारिता के लिए तो
धब्बा हैं ही, हमारे समाज की बहुलता और लोकतंत्र के लिए बहुत बड़ा खतरा
हैं. इसकी रक्षा के लिए जिस मीडिया की स्वतंत्रता बहुत जरूरी है, वही अब इसके लिए खतरा भी पैदा करने
लगी है. मगर मीडिया पर बाहरी, खासकर सरकारी नियंत्रण के खतरनाक परिणाम होंगे. मीडिया को ही अपनी विश्वसनीयता के लिए
आत्मनिरीक्षण और सतर्कता के उपाय करने होंगे. पत्रकारिता को अपने पुराने मूल्य
पुन: स्थापित करने होंगे. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म संचालित करने वालों को झूठे
समाचार फैलाने का उत्तरदायी ठहराया जाना चाहिए ताकि वे सिर्फ धंधे पर ध्यान न दें, अपने प्लेटफॉर्म पर आने वाली
सामग्री पर भी नजर रखें और कुछ मानदंड बनाएं.
(प्रभात खबर, 5 अप्रैल, 2018)
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