
खबरों के मुताबिक मुलायम सिंह ने योगी
जी को सुप्रीम कोर्ट के आदेश से बचने का रास्ता यह सुझाया कि उनकी और अखिलेश की
कोठियां राम गोविंद चौधरी और अहमद हसन के नाम कर दी जाएं जो क्रमश: विधान सभा में
नेता-प्रतिपक्ष और विधान परिषद में विपक्ष के नेता हैं. कागज में आवण्टी का नाम
बदल जाएगा. सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पालन हो जाएगा और कोठियों में दोनों पूर्व
मुख्यमंत्री काबिज रह जाएंगे. सांप मर जाएगा और लाठी भी नहीं टूटेगी.
ऐसा हुआ तो कागजी खानापूरी हो
जाएगी लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश की प्रकारांतर से अवहेलना ही होगी. उत्तर
प्रदेश में कई पूर्व मुख्यमंत्रियों के पास भव्य सरकारी बंगले हैं, जिनका किराया बहुत मामूली है जबकि
उनके रख-रखाव पर जनता की गाड़ी कमाई खर्च की जाती है. पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने
अंतिम रूप से फैसला दिया है कि राज्य में पूर्व मुख्यमंत्री सरकारी बंगले के हकदार
नहीं हैं. यह समानता के सिद्धांत का उल्लंघन है.
क्या यह हैरत की बात नहीं है कि
मुलायम जैसे बड़े कद के नेता सुप्रीम कोर्ट के फैसले को धता बताने की राह सुझाने के
लिए मुख्यमंत्री से मिलते हैं? ऐसा क्यों नहीं हुआ कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के सम्मान
में खुद ही सरकारी कोठी खाले कर देने का ऐलान किया? क्या उन्हें कोठियों और किसी दूसरी
चीज की कमी है? यह बात सिर्फ मुलायम पर ही नहीं लागू होती. भाजपा के पूर्व
मुख्यमंत्री और राजस्थान के वर्तमान राज्यपाल
कल्याण सिंह ही क्यों नहीं सरकारी कोठी खाली कर देते? वे संवैधानिक पद पर हैं. उन्हें
अवश्य ही शीर्ष अदालत का सम्मान करना चाहिए.
राजनीति में मर्यादा और नैतिकता की
बातें अब बेमानी लगती हैं लेकिन क्या यह पीड़ादायक नहीं है कि इतने बड़े नेता इस तरह
के अनैतिक रास्ते सुझाएं? जब कोई सरकारी कर्मचारी रिटायर होता है तो राज्य सम्पत्ति
विभाग उसे आवण्टित मकान खाली जल्दी कराने के लिए पीछे पड़ जाता है. किसी मजबूर
कर्मचारी को कुछ दिन की मोहलत भी नहीं दी जाती. पूर्व मुख्यमंत्रियों को किस
हैसियत से जीवन भर के लिए विशाल कोठी दी जाती
है? कोर्ट ने इसीलिए कहा कि इससे समानता के अधिकार का उल्लंघन
होता है.
सन 2016 में भी सुप्रीम कोर्ट ने
यही फैसला दिया था तो इससे बचने के लिए तत्कालीन अखिलेश यादव सरकार ने नियमों में
इस तरह परिवर्तन कर दिया था कि पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी बंगले खाली न करने
पड़ें. ‘लोक प्रहरी’ संगठन ने इस नियम परिवर्तन को चुनौती दी और इस बार सर्वोच्च
अदालत ने कह दिया कि पूर्व मुख्यमंत्रियों को बंगले खाली करने ही होंगे.
1997 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय
ने भी अपने आदेश में पूर्व मुख्यमंत्रियों को आजीवन सरकारी बंगले आवण्टित करने को
अवैध ठहराया था. तब मायावती की सरकार थी. उन्होंने भी उच्च न्यायालय के आदेश से
बचने का रास्ता निकाल दिया था. यानी इस मामले में सभी दल और उनके नेता परस्पर सहमत
और मिले हुए हैं.
सरकारी कोठियां जनता की सम्पत्ति हैं. उनका उपयोग कुछ नेता जीवन
भर जनता के खर्च से शान से रहने के लिए कैसे कर सकते हैं?
(सिटी तमाशा, नभाटा, 19 मई, 2018)
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