
राजा सोचता- गौड़म ने नींद में जो कहा, वह सही होगा. रियल फीडबैक. बस, उस बंदे का काम लग
जाता. पिछले हफ्ते जब राज्य सरकार ने पॉलीथीन पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की तो
हमें गौड़म की याद आ गयी. विष्णु शर्मा से लेकर हमारे जमाने तक हर सरकार में गौड़मों
की कमी नहीं. वे रात भर जुआ खेलें, न खेलें, हर साल-दो साल में एक बार पॉलीथीन पर प्रतिबंध लगाने की बात सरकार के कान
में फुसफुसा जरूर देते हैं.
हुआ तो उससे पहले भी है लेकिन दो वर्ष पूर्व सपा सरकार ने
पॉलीथीन पर रोक लगाने की जोर-शोर से घोषणा की थी. प्रदेश मंत्रिमण्डल ने बकायदा
फैसला लिया था, अधिसूचना जारी की गई थी. सख्ती से अमल के
लिए जिला प्रशासन, नगर निगम, प्रदूषण
नियंत्रण बोर्ड, आदि कुछ विभागों की कमेटी बना दी गई थी. फैक्ट्रियों
पर छापे पड़े थे. बड़ी-बड़ी दुकानों की तलाशी में जुर्माना वसूला गया था. खोंचे-ठेले
वाले पॉलीथीन के थैले छुपा कर रखने के लिए पीटे गये थे. लोग बाजार में घर से लाए
गए थैलों के साथ दिखने लगे थे. दुकानों में कागज के लिफाफों की आमद बढ़ गई थी. फैसले
को पलटवाने-बदलवाने के लिए पॉलीथीन लॉबी बड़ी सक्रिय रही थी.
फिर जल्दी ही हमने देखा कि धड़ल्ले से पॉलिथीन बनने-बिकने और
इस्तेमाल होने लगी. रोक पर अमल के जिम्मेदार विभाग एक-दूसरे पर टालते रहे. फिर सब शांत बैठ गए. कहा गया कि
प्रतिबंध को लागू करने के लिए जरूरी नियमवाली ही नहीं बनी. खैर, विधान सभा चुनाव भी नजदीक थे. फिर किसको याद रहता. क्यों याद रहता.
अब भाजपा सरकार ने पॉलीथीन पर प्रतिबंध की घोषणा दुगुने जोश
से की जा रही है. कहा जा रहा है कि इस बार और भी सख्त आदेश आएगा. पॉलीथीन बंद हो
कर रहेगी. अब पता नहीं, यह सिर्फ संयोग है कि इस बार फिर चुनाव
नजदीक हैं, लोक सभा के.
खैर, पंचतंत्र की उस कथा का अगला प्रसंग यह है
कि कुछ समय बाद गौड़म को लगता है कि मैने अमुक बंदे से पूरा बदला ले लिया है. वह
शरणागत हो गया है. तब वह अगली सुबह राजा के कान के पास उसकी तारीफ में फुसफुसा
देता है. राजा सोचता है, मैंने गौड़म की नींद में कही बात को
सच मान कर उस बेचारे पर बड़ा अन्याय किया. बस, स्थितियां
दूसरे दिन से ही बदल जाती हैं.
पंचतंत्र की कथाओं में ‘नीति-वाक्य’
भी खूब आते हैं. वनराज पिंगलक चतुर मंत्री दमनक की बुद्धिमानी से
खुश होकर यह नीति-वाक्य बोलता है- ‘गहरी पैठ वाले सरल-चित्त
और बुरी आदतों से बच कर रहने वाले, पहले से जांचे-परखे हुए मंत्री
राज्य को उसी तरह सम्भाले रहले हैं जैसे पकी, सीधी, बिना गांठ वाली आजमाई हुई लकड़ी का खम्भा छत को सम्भाले रहता है.’
विष्णु शर्मा ने उस काल के दरबारी मंत्री देखे थे. आज राज-काज
अफसर चलाते हैं. पद-प्रतिष्ठा बदली है, गौड़मों का स्वभाव नहीं. फिलहाल तो वह फिर गुस्से मेंंलगता है.
(सिटी तमाशा, नभाटा, 14 जुलाई, 2018)
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