
पिछले कुछ सालों से प्रशासनिक निर्देश जारी होते हैं कि रात दस बजे बाद पटाखे नहीं दागे जाएं. कोई सुनता है? इस बार राज्य सरकार ने सिर्फ दो घण्टे की समय-सीमा निर्धारित की है.आठ से दस बजे के बीच ही पटाखे दागे जा सकते हैं. उसमें भी तेज वाले पटाखों पर रोक है. रोक का पालन करने की ज़िम्मेदारी थानाध्यक्षों को दी गई है जो कोई भी ज़िम्मेदारी ईमानदारी से नहीं निभाते. उसमें वे अपने लिए वसूली का अवसर ढूंढते हैं. अतिक्रमण न हो इसकी ज़िम्मेदारी भी थानाध्यक्षों की है लेकिन पूरा शहर अतिक्रमण से पटा पड़ा है. सिर्फ वसूली के लिए.
सरकारें और उसके विभिन्न विभाग कागजी आदेश जारी करके मान लेते हैं कि उनका दायित्व पूरा हो गया. पर्यावरण विभाग की सचिव ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार एक आदेश-पत्र जारी कर दिया. उसका पालन हो, यह कौन सुनिश्चित करेगा? बाज़ार में दस-हजारी लड़ियां बिक रही हैं जबकि पटाखे की लड़ियों पर रोक है. भयानक आवाज़ वाले बम खूब मिल रहे हैं. सब पर ‘ग्रीन-क्रैकर’ का लेबल लगा है. थानेदार जांच करेगा कि त्योहारी वसूली?
अक्टूबर-मध्य से ही लखनऊ और प्रदेश के कई शहरों की हवा की गुणवत्ता देश में सबसे अधिक खराब होने लगी. वायुमण्डल में ‘स्मॉग’ यानी प्रदूषित हवा की मोटी पर्त जमा है. रातों को गिरती ओस उसे ऊपर नहीं जाने देती. हमारे फेफड़े ऑक्सीजन कम, जहरीली गैसें ज़्यादा भर रहे हैं. खेतों में पराली भी जल रही है. ‘स्मॉग’ कम करने के नाम पर सरकार निर्माण कार्यों पर रोक लगाएगी. कुछ उद्योगों को बंद करेगी. पर्यावरण इससे सुधरेगा क्या?
उग्र-हिंदुत्त्व के इस दौर में एक बड़ा वर्ग दीवाली मनाने की हिंदू संस्कृति और परम्परा से जोड़ कर पटाखों पर रोक का विरोध करता है. वह अधिक से अधिक धूम-धड़ाका मचाकर हिंदू-धर्म का झण्डा ऊंचा करके खुश होता है. कुछ मुहल्ले धूम-धड़ाके की होड़ में लगे रहते हैं. कई परिवार बहुत सारे पटाखे फोड़ कर अपनी सम्पत्ति और शान का प्रदर्शन करते हैं.
1990 के दशक के आर्थिक उदारीकरण के बाद मध्य-वर्ग के पास धन आना शुरु हुआ. धनिकों की सम्पत्ति कई गुना बढ़ती गई. वे सब नव-अर्जित सम्पदा का ओछा प्रदर्शन करने पर उतारू हैं. शर्मिंदा होने की बजाय वह अपने वैभव-प्रदर्शन में गर्व अनुभव करते हैं. दीवाली के पटाखे ही नहीं, धरती से पानी के अंधाधुंध दोहन, हरियाली के विनाश, अतिशय उपभोग और असीमित कचरा उगलने पर उन्हें कतई ग्लानि नहीं होती. उन्हें इस धरती और अपनी अगली पीढ़ियों की चिन्ता नहीं होती.
हर्ष और उल्लास के पर्वों को भी हमने भविष्य के भीषण संकटों की पैदाइश बना दिया. आखिर पर्व-त्योहारों पर हम एक-ऊदूरे को किस बात की बधाई देते हैं?
(सिटी तमाशा, नभाटा, 26 अक्टूबर, 2019)
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