Friday, January 30, 2026

उत्तराखण्ड में धर्मांतरण के फर्ज़ी मुकदमे, अधिकतर आरोपी अदालत से बरी

उत्तराखंड में धर्म स्वतंत्रता अधिनियमका दुरुपयोग किया जा रहा है। पुलिस फर्ज़ी शिकायतें करवाकर इस कानून के तहत मुकदमे दर्ज़ कर रही है। इनमें से अधिकतर मामले अदालतों में साबित नहीं हो पा रहे। पिछले सात साल में जबरिया धर्म परिवर्तनकराने के जिन पांच मामलों में सुनवाई पूरी हुई, वे पांचों मामले खारिज हो गए और अभियुक्तों को अदालत ने बरी कर दिया। 75 फीसदी मामलों में अभियुक्तों की जमानत हो गई और पाया गया कि आपसी सहमति से सम्बंध बनानेके मामलों को आपराधिकबना दिया गया। 
 
उत्तराखण्ड में भाजपा सरकार आने के बाद 2018 में धर्म स्वतंत्रता अधिनियमबनाया गया। बाद में इसे और सख्त किया गया और सजा की अवधि बढ़ाई गई। तब से सितम्बर 2025 तक राज्य में इस कानून के तहत 62 रिपोर्ट (एफआईआर) दर्ज़ की गईं। Indian Express अखबार ने इनमें से 51 मामलों की विस्तृत जांच-पड़ताल की और 30 जनवरी के अंक में एक विस्तृत रिपोर्ट छापी है। अखबार ने इन मामलों की जांच के लिए सूचना के अधिकार का भी सहारा लिया।
 
यह रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि उत्तराखण्ड में मुख्यत: मुसलमानों के खिलाफ जबरन या लालच देकरधर्म परिवर्तन के मामले दर्ज़ किए जा रहे हैं लेकिन अधिकांश मामले अदालतों में टिक नहीं पा रहे। अब तक पांच ही मामलों में सुनवाई पूरी हुए एहै और पांचों के अभियुक्त बरी कर दिए गए। सात मामले अदालत पहुंचते ही खारिज कर दिए गए। 29 मामलों में अभियुक्तों को आसानी से जमानत मिल गई। सिर्फ तीन मामलों में जमानत नहीं दी गई। पांच अन्य मामलों में सुनवाई होना बाकी है। इस कानून के तहत अब भी गिरफ्तारियां हो रही हैं लेकिन न्यायिक परीक्षण में राज्य सरकार के अधिकतर दावे सही साबित नहीं हो रहे।
 
अगले दिन यानी 31 जनवरी के अंक में Indian Express ने सम्पादकीय लिखकर टिप्पणी की है कि राज्य में तथाकथित धर्मांतरण कानून पहली नज़र में ही एक काल्पनिक समस्या या डर के लिए विधायी और प्रशासनिक शक्तियों का उपयोग करके किसी वैचारिक उद्देश्य से बनाया गया लगता है लेकिन अभियुक्तों को बरी करने, मामलों को खारिज करने और अधिकतर मामलों में जमानत देने से साफ हो जाता है कि सतर्क न्यायपालिका किसी बुरे कानून के नुकसान को कुछ हद तक कम कर सकती है।   
 
रिपोर्ट बताती है कि पिछले महीने तक उत्तराखंड पुलिस ने उत्तराखंड धर्म स्वतंत्रता अधिनियम’, जिसे धर्मानतरण कानूनभी कहते हैं, के तहत 62 मामले दर्ज किए थे। अखबार ने राज्य के 13 ज़िलों से 51 मामलों के अदालती रिकॉर्ड हासिल किए। इनसे पता चला कि सितंबर 2025 तक केवल 5 मामलों में ही सुनवाई पूरी हुई। इन सभी 5 मामलों में आरोपियों को बरी कर दिया गया। इसके अलावा, कम से कम 7 मामले बीच में ही खारिज कर दिए गए। इसके मुख्य कारण थे: शिकायतकर्ताओं का अपने बयान से पलट जाना, किसी तरह की जबरदस्ती या लालच का सबूत न मिलना, अभियोजन पक्ष द्वारा आरोप साबित न कर पाना। बाकी जिन 39 मामलों की स्थिति पता चल सकी उनमें तीन-चौथाई में आरोपी ज़मानत पर हैं। 11 लोगों को उत्तराखंड हाईकोर्ट से ज़मानत मिली और एक को सुप्रीम कोर्ट से। 3 मामलों में ज़मानत नहीं मिली, 5 मामलों में ज़मानत की सुनवाई बाकी है, जबकि 2 मामलों में आरोपियों ने हाईकोर्ट से कार्यवाही पर रोक लगानी की माँग की जिस पर अदालत ने राज्य सरकार को जवाब देने का समय दिया है।
 
कई मामलों में अदालतों ने ज़मानत इसलिए दी क्योंकि रिश्ता दोनों की सहमति से हुआ था, गवाहों के बयान आपस में मेल नहीं खाते थे या पुलिस या जाँच में कानूनी प्रक्रिया की कमियाँ थीं
अमन सिद्दीकी का मामला तो खासकर गौरतलब है क्योंकि यह दोनों परिवारों ने आपसी सहमति से शादी तय की थी। शादी करने वाले जोड़े ने एक हलफनामा दिया था कि महिला अपना धर्म नहीं बदलेगी यानी शादी के बाद इस्लाम कबूल नहीं करेगी। इसके बावजूद अमन सिद्दीकी उर्फ अमन चौधरी को धर्मांतरण कानून में गिरफ्तार किया गया और उसे लगभग 6 महीने जेल में रहना पड़ा। 
 
19 मई 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने अमन को ज़मानत दे दी और कहा कि राज्य सरकार को उस अंतरधार्मिक शादी पर कोई आपत्ति नहीं हो सकती जो लड़के-लड़की की अपनी मर्ज़ी और दोनों के माता-पिता की सहमति से हुई हो।
 
इस मामले में लड़की के भाई ने 24 दिसंबर 2024 को रिपोर्ट दर्ज कराई जिसमें कहा गया कि अमन ने अपनी पहचान छुपाई। अमन की माँ हिंदू हैं और पिता मुस्लिम। शिकायतकर्ता ने कहा कि उसके पिता के धर्म की जानकारी नहीं थी। अमन के वकील ने सुप्रीम कोर्ट में जमानत की अर्जी दी। अदालत को बताया कि शादी से पहले धर्म न बदलने का हलफनामा दिया गया था और आपत्तियाँ शादी के बाद उठाई गईं। अमन को जमानत मिल गई लेकिन 6 महीने जेल में रहना पड़ा। अमन ने हाईकोर्ट में पूरे मामले को खारिज करने के लिए याचिका डाली। चुनौती दी। जुलाई 2025 में हाईकोर्ट ने मामले में कोई कार्रवाई करने पर रोक लगा दी और राज्य सरकार से जवाब माँगा।
 
भाजपा के सत्ता में आने के एक साल बाद 2018 में उत्तराखंड में धर्मांतरण कानून लागू किया गया। फिर 2022 में सज़ा की अवधि बढ़ाई गई। 2025 में सज़ा का प्रावधान और बढ़ाकर 3 से 10 साल कर दिया गया। गंभीर मामलों में 20 साल या आजीवन कारावास तक की व्यवस्था कर दी। 
 
2025 का संशोधन अभी लागू नहीं हुआ है क्योंकि राज्यपाल ने तकनीकी गलतियों को ठीक करने के लिए इसे सरकार को लौटा दिया था।
 
इस कानून का उद्देश्य यह बताया गया है कि ज़बरदस्ती, धोखे, दबाव, लालच या शादी के ज़रिए जबरन धर्म परिवर्तन को रोका जाए। 
 
2022 में में कानून और सख़्त होने के बाद मामलों की संख्या बढ़ी। सबसे ज़्यादा 20 मामले 2023 में दर्ज हुए। 2025 में सितम्बर माह तक 18 मामले दर्ज़ हुए थे।
इस पूरे मामले पर Indian Express के उत्तराखंड पुलिस से बार-बार पूछने के बावजूद उसने कोई जवाब नहीं दिया।
 
जिन 5 मामलों में अभियुक्तों को बरी किया गया उनमें एक रिपोर्ट ऐसे व्यक्ति ने की थी जो खुद उस तथाकथित धर्म परिवर्तनमामले से सीधे प्रभावित नहीं था जबकि कानून कहता है कि शिकायत सिर्फ पीड़ित व्यक्ति या उसके माता-पिता, भाई, बहन कर सकते हैं। अगर ये लोग शिकायत न कर सकें, तब ही कोई नज़दीकी रिश्तेदार कर सकता है।
 
किसी तीसरे पक्ष द्वारा रिपोर्ट लिखाने का एक मामला टिहरी गढ़वाल में हुआ। 2021 में टिहरी गढ़वाल सीताराम रणकोटी ने विनोद कुमार के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज़ कराई कि फेसबुक में एक वीडियो में उसने हिंदू धर्म और जाति व्यवस्था की आलोचना और ईसाई धर्म की तारीफ की। पुलिस ने 13 गवाह पेश किए, वीडियो और डिजिटल सबूत दिखाए कि आरोपी ने अपनी जन्म कुंडली जलाई। 
 
अदालत में क्रॉस एक्जामिनेशन में जाँच अधिकारी ने कबूल किया कि किसी को पैसे या लालच देकर धर्म परिवर्तन कराने का कोई सबूत नहीं मिला। अन्य सबूत भी नहीं भी नहीं टिके और वीडियो की भी पुष्टि नहीं हो सकी। 
 
जनवरी 2024 में आरोपी बरी कर दिया गया। अदालत ने कहा कि हर इंसान को अपना धर्म मानने, अपनाने और उसका प्रचार करने की आज़ादी है, जब तक वह किसी और के अधिकार नहीं छीनता।
एक और मामला जिसमें तीसरे पक्ष ने रिपोर्ट लिखाई और अभियुक्त बरी कर दिया गया यह है कि 2021 में रामनगर (नैनीताल) में पादरी नरेंद्र सिंह बिष्ट और उनकी पत्नी के खिलाफ धर्मांतरण का आरोप लगाकर अंतराष्ट्रीय हिंदू परिषद के सदस्यों ने बाइबिल के संदेशों वाले पोस्टर फाड-ए, उनके घर में तोड़फोड़ की। आरोप लगाया कि गरीब और आदिवासी लोगों को लालच देकर ईसाई धर्म अपनाने को कहा जाता है। 
 
17 सितंबर 2025 को उन्हें बरी कर दिया गया। अदालत ने कहा कि यह साबित नहीं हुआ कि कब, कैसे और किसे धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर किया गया। बिष्ट को 7 दिन जेल में रहना पड़ा और गाँव छोड़कर 15 किमी दूर रहना पड़ा क्योंकि गांव में रहना मुश्किल हो गया था। 
 
एक और मामला 2023 में रानीखेत (अल्मोड़ा) का है। एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई। बाद में पत्नी मिल गई तो उसके नाम से मोहम्मद चांद के खिलाफ ज़बरदस्ती ले जाने, धर्म परिवर्तन कराने और यौन उत्पीड़न के मामले जोड़े गए। लेकिन अदालत में उस स्त्री ने माना कि वह चांद के साथ अपनी मर्जी से गई थी और किसी तरह का यौन उत्पीड़न नहीं हुआ। उसने मेडिकल जांच कराने से भी मना कर दिया।  अदालत ने पाया कि महिला ने भागने से पहले नए कपड़े भी खरीदे थे यानी मामला आपसी सहमति का था। अदालत ने चांद को बरी कर दिया।  
 
ऐसे ही और भी मामले हैं, जिनमें अदालत को आरोपों में सत्यता नहीं मिली। अखबार की रिपोर्ट का निष्कर्ष यह है कि कानून बहुत सख़्त है, गिरफ्तारियाँ फौरन कर ली जाती हैं लेकिन अदालतों में सबूत नहीं मिलते, गवाह पलट जाते हैं और आरोपी बरी हो जाते हैं। यानी कानून का इस्तेमाल ज़्यादा हो रहा है, लेकिन अदालतों में वह टिक नहीं पा रहा।
 
 रिपोर्ट के अनुवाद में AI की मदद ली गई है।
-    - न जो, 31 जनवरी 2026
 
पूरी रिपोर्ट इस लिंक पर देखें-
https://indianexpress.com/article/express-exclusive/cases-under-uttarakhands-conversion-law-fall-in-court-7-years-5-full-trials-all-5-acquittals-10502378/
 

Thursday, January 22, 2026

साम्प्रदायिक घृणा फैलाने की होड़ में हैं न्यूज चैनल

निजी टी वी समाचार चैनलों और डिजिटल माध्यम अपनी आचार संहिता का खुला उल्लंघन कर रहे हैं। साम्प्रदायिक वैमनस्य और जातीय घृणा फैलाने में वे बहुत आगे हैं। इसके लिए वे 'लैण्ड जिहाद', 'लव जिहाद' और 'थूक जिहाद' जैसे अपमानजनक नारों का इस्तेमाल करते हैं। वे आबादी बढ़ने के आंकड़ों का एकतरफा व मनमाना उपयोग करते हैं। ये चैनल सत्ताधारियों का भोंपू बन गए हैं और इस प्रतियोगिता में एक-दूसरे को पछाड़ने की होड़ में लगे हैं।

निजी चैनलों के बारे में 'समाचार प्रसारण एवं डिजिटल मानक प्राधिकरण' तक पहुंची शिकायतों की जांच के निष्कर्ष और उसके आदेश  यही बताते हैं। शिकायतों की जांच करने वाले इस प्राधिकरण का गठन स्वयं 'न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एंड डिजिटल एसोसिएशन' ने किया है, जो कि निजी टीवी चैनलों और डिजिटल माध्यम चलाने वालों की अपनी संस्था है। 

जैसे प्रिण्ट मीडिया के लिए प्रेस काउंसिल है, वैसे ही इसे निजी टीवी चैनलों की परिषद समझा जा सकता है। उसने इन माध्यमों के लिए एक आचार संहिता बनाई है, जिसका पालन माध्यमों की आज़ादी बनाए रखने के साथ-साथ सामाजिक-नैतिक उत्तरदायित्व निभाने के लिए आवश्यक माना गया है।

Indian Express अखबार ने 22 जनवरी को प्रकाशित अपनी रिपोर्ट में विस्तार से प्राधिकरण तक पहुंची शिकायतों और उनकी जांच के बाद प्राधिकरण के आदेशों का विश्लेषण करते हुए विस्तार से रिपोर्ट प्रकाशित की। 23 जनवरी के अंक में उसने इस बारे में एक कड़ा सम्पादकीय भी लिखा है, जिसमें निजी टीवी चैनलों के इस गैर-जिम्मेदाराना रवैए की तीखी निंदा की है। 

अखबार के अनुसार 01 जनवरी 2023 से 31 दिसम्बर 2025 तक प्राधिकरण ने 54 शिकायतों पर विचार के बाद आदेश पारित किए। 60 प्रतिशत  शिकायतों में प्राधिकरण ने पाया कि चैनलों ने साम्प्रदायिक सद्भाव सबंधी आचार संहिता का उल्लंघन किया। जमीन कब्जे के मामलों को 'लैण्ड जिहाद', 'महिलाओं के मामलों को 'लव जिहाद' और खाने से सम्बद्ध खबरों मे 'थूक जिहाद' कहा गया।  

जिन 32 शिकायतों में प्राधिकरण ने सम्बद्ध चैनलों के खिलाफ निंदात्मक कार्रवाई की वे साम्प्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने वाली, अल्पसंख्यकों के प्रति नफरत से भरी और आंकड़ों के मनमाना इस्तेमाल की हैं। 

प्राधिकरण अपने सदस्य चैनलों/माध्यमों  को आपत्तिजनक सामग्री पूरी तरह या आंशिक रूप से हटाने का आदेश देने से लेकर जुर्माना तक लगा सकता है। यह जुर्माना अधिकतम 25 लाख रु हो स्कता है।

प्राधिकरण के आदेशों का विश्लेषण करते हुए अखबार ने पाया कि शिकायतों से निपटने में प्राधिकरण काफी उदार रहा है। उसने शिकायतों की सुनवाई और उनके निपटारे में 11-12 महीनों का समय लिया और तब तक आपत्तिजनक सामग्री इन माध्यमों पर उपलब्ध रही। वैसे, शिकायतों का निपटारा 15 दिन से लेकर एक महीने तक हो जाना चाहिए।जुर्माना लगाने में भी काफी उदारता बरती गई। 

सिर्फ एक मामले में 'टाइम्स नाऊ नवभारत' पर मात्र एक लाख रुपए का जुर्माना लगाया गया। पांच अन्य मामलों में इससे कम जुर्माना लगाया गया। छह मामलों में कुल 3.2 लाख रु का जुर्माना हुआ। इसका कोई असर चैनलों पर नहीं पड़ा क्योंकि ये कार्रवाइयां ऐसी नहीं थीं कि चैनल अपने रवैये से बाज आते। 

प्राधिकरण ने 11 शिकायतों पर कोई कार्रवाई इसलिए नहीं की कि उसे कोई खास या गम्भीर उल्लंघन नहीं लगा या चैनलों ने सुधार कर लिया या मामला अदालत पहुंच गया।

प्राधिकरण को ये शिकायतें किसी संस्था से नहीं बल्कि कुछ व्यक्तियों से मिलीं। मात्र एक शिकायत निर्वाचन आयोग से अग्रसारित हुई जो उसे 'न्यूज18इण्डिया' के बारे में भाकपा ने भेजी थी। प्राधिकरण ने पाया कि इस चैनल के एंकर ने यह कहकर गलत किया कि दिल्ली विधान सभा के चुनाव में भाजपा की जीत 'रामजी' के कारण हुई।

नौ शिकायतें टीवी चैनलों पर 'लैंड जिहाद' के मामले दिखाने के लिए आईं। नौ ही शिकायतें 'लव जिहाद' के मामले दिखाने और दो 'थूक जिहाद' की रिपोर्ट दिखाने के लिए आईं। विपक्ष के खिलाफ दुर्भावनापूर्ण प्रचार की कई शिकायतों पर प्राधिकरण ने विचार किया। जातीय समूहों एवं आदिवासियों  के प्रति अपमानजनक प्रसारणों की शिकायतें भी थीं।  

सबसे ज़्यादा शिकायतें और प्राधिकरण के आदेश  (16) 'टाइम्स नाऊ नवभारत' के खिलाफ हुए। दूसरे नम्बर पर 'न्यूज18इण्डिया' है, जिसके खिलाफ आठ मामलों में सामग्री हटाने को कहा गया। 'जी न्यूज' को पांच मामलों में रिपोर्ट हटाने को कहा गया। ये आदेश शिकायतों के करीब एक साल बाद आए और तब तक वे प्रसारण अपना काम कर चुके थे। 

प्राधिकरण के वर्तमान अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश ए के सीकरी हैं। आठ अन्य सदस्यों में चार पूर्व आईएएस व आईएफएस अधिकारी और चार टीवी न्यूज चैनलों के 'सम्पादक हैं। अखबार के पूछने पर जस्टिस सीकरी ने बताया कि शिकायतों का निपटारा सर्वसम्मति से किया जाता है और सर्वसम्मति हासिल करने में वक्त लग जाता है। 

Indian Express ने 23 जनवरी के सम्पादकीय में इस प्रवृत्ति पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए इसे निजी टीवी चैनलों की भड़काऊ व भोण्डी प्रवृत्ति कहा है और लिखा है कि ये चैनल व डिजिटल माध्यम गैरजिम्मेदार होने में एक दूसरे को पीछे छोड़ने में लगे हैं। इसके अत्यंत खतरनाक नतीज़े हैं। मीडिया की विश्वसनीयता ही नहीं घट रही, समाज में अलगाव और विभाजन बढ़ रहा है। खुद ये चैनल अपनी दर्शक संख्या खोते जा रहे हैं।  

- न जो, 23 जनवरी  2026

(अखबार की पूरी रिपोर्ट देखें-

https://indianexpress.com/article/express-exclusive/in-3-years-nearly-60-per-cent-orders-by-tv-digital-news-regulator-cite-communal-code-breach-10487789/