उत्तराखंड में ‘धर्म स्वतंत्रता अधिनियम’ का दुरुपयोग
किया जा रहा है। पुलिस फर्ज़ी शिकायतें करवाकर इस कानून के तहत मुकदमे दर्ज़ कर रही है।
इनमें से अधिकतर मामले अदालतों में साबित नहीं हो पा रहे। पिछले सात साल में ‘जबरिया धर्म परिवर्तन’ कराने के जिन पांच मामलों में
सुनवाई पूरी हुई, वे पांचों मामले खारिज हो गए और अभियुक्तों
को अदालत ने बरी कर दिया। 75 फीसदी मामलों में अभियुक्तों की जमानत हो गई और पाया गया
कि ‘आपसी सहमति से सम्बंध बनाने’ के मामलों
को ‘आपराधिक’ बना दिया गया।
उत्तराखण्ड में भाजपा सरकार आने के बाद
2018 में ‘धर्म स्वतंत्रता अधिनियम’ बनाया गया। बाद में इसे और सख्त किया गया और सजा की अवधि बढ़ाई गई। तब से सितम्बर
2025 तक राज्य में इस कानून के तहत 62 रिपोर्ट (एफआईआर) दर्ज़ की गईं। Indian Express अखबार ने इनमें से 51 मामलों की विस्तृत जांच-पड़ताल की और
30 जनवरी के अंक में एक विस्तृत रिपोर्ट छापी है। अखबार ने इन मामलों की जांच के लिए
सूचना के अधिकार का भी सहारा लिया।
यह रिपोर्ट स्पष्ट
करती है कि उत्तराखण्ड में मुख्यत: मुसलमानों के खिलाफ ‘जबरन या लालच देकर’ धर्म परिवर्तन
के मामले दर्ज़ किए जा रहे हैं लेकिन अधिकांश मामले अदालतों में टिक नहीं पा रहे। अब
तक पांच ही मामलों में सुनवाई पूरी हुए एहै और पांचों के अभियुक्त बरी कर दिए गए। सात
मामले अदालत पहुंचते ही खारिज कर दिए गए। 29 मामलों में अभियुक्तों को आसानी से जमानत
मिल गई। सिर्फ तीन मामलों में जमानत नहीं दी गई। पांच अन्य मामलों में सुनवाई होना
बाकी है। इस कानून के तहत अब भी गिरफ्तारियां हो
रही हैं लेकिन न्यायिक परीक्षण में राज्य सरकार के अधिकतर दावे सही साबित नहीं हो रहे।
अगले दिन यानी
31 जनवरी के अंक में Indian
Express ने सम्पादकीय लिखकर टिप्पणी की है कि ‘राज्य में तथाकथित धर्मांतरण कानून पहली नज़र में ही एक काल्पनिक समस्या या
डर के लिए विधायी और प्रशासनिक शक्तियों का उपयोग करके किसी वैचारिक उद्देश्य से बनाया
गया लगता है लेकिन अभियुक्तों को बरी करने, मामलों को खारिज करने
और अधिकतर मामलों में जमानत देने से साफ हो जाता है कि सतर्क न्यायपालिका किसी बुरे
कानून के नुकसान को कुछ हद तक कम कर सकती है।’
रिपोर्ट बताती है कि पिछले महीने तक उत्तराखंड
पुलिस ने ‘उत्तराखंड धर्म स्वतंत्रता
अधिनियम’, जिसे ‘धर्मानतरण कानून’
भी कहते हैं, के तहत 62 मामले
दर्ज किए थे। अखबार ने राज्य के 13 ज़िलों से 51 मामलों के अदालती रिकॉर्ड हासिल किए। इनसे पता चला कि सितंबर 2025 तक केवल 5 मामलों में ही सुनवाई पूरी हुई। इन सभी 5
मामलों में आरोपियों को बरी कर दिया गया। इसके अलावा, कम से कम 7 मामले बीच में ही खारिज कर दिए गए। इसके
मुख्य कारण थे: शिकायतकर्ताओं का अपने बयान से पलट जाना, किसी
तरह की जबरदस्ती या लालच का सबूत न मिलना, अभियोजन पक्ष
द्वारा आरोप साबित न कर पाना। बाकी जिन 39 मामलों की स्थिति
पता चल सकी उनमें तीन-चौथाई में आरोपी ज़मानत पर हैं। 11 लोगों
को उत्तराखंड हाईकोर्ट से ज़मानत मिली और एक को सुप्रीम कोर्ट से। 3 मामलों में ज़मानत नहीं मिली, 5 मामलों में ज़मानत
की सुनवाई बाकी है, जबकि 2 मामलों में
आरोपियों ने हाईकोर्ट से कार्यवाही पर रोक लगानी की माँग की जिस पर अदालत ने राज्य
सरकार को जवाब देने का समय दिया है।
कई मामलों में अदालतों ने ज़मानत
इसलिए दी क्योंकि रिश्ता दोनों की सहमति से हुआ था, गवाहों के बयान आपस में मेल नहीं खाते थे या पुलिस या जाँच में कानूनी
प्रक्रिया की कमियाँ थीं
अमन सिद्दीकी का मामला तो खासकर गौरतलब
है क्योंकि यह दोनों परिवारों ने आपसी सहमति से शादी तय की थी। शादी करने वाले जोड़े
ने एक हलफनामा दिया था कि महिला अपना धर्म नहीं बदलेगी यानी शादी के बाद इस्लाम कबूल
नहीं करेगी। इसके बावजूद अमन सिद्दीकी उर्फ अमन चौधरी को धर्मांतरण कानून में गिरफ्तार
किया गया और उसे लगभग 6 महीने जेल में रहना
पड़ा।
19 मई 2025 को
सुप्रीम कोर्ट ने अमन को ज़मानत दे दी और कहा कि राज्य सरकार को उस अंतरधार्मिक
शादी पर कोई आपत्ति नहीं हो सकती जो लड़के-लड़की की अपनी मर्ज़ी और दोनों के माता-पिता
की सहमति से हुई हो।
इस मामले में लड़की के भाई ने 24 दिसंबर 2024 को रिपोर्ट दर्ज कराई जिसमें कहा गया कि
अमन ने अपनी पहचान छुपाई। अमन की माँ हिंदू हैं और पिता मुस्लिम। शिकायतकर्ता ने
कहा कि उसके पिता के धर्म की जानकारी नहीं थी। अमन के वकील ने सुप्रीम कोर्ट में जमानत
की अर्जी दी। अदालत को बताया कि शादी से पहले धर्म न बदलने का हलफनामा दिया गया था
और आपत्तियाँ शादी के बाद उठाई गईं। अमन को जमानत मिल गई लेकिन 6 महीने जेल में रहना
पड़ा। अमन ने हाईकोर्ट में पूरे मामले को खारिज करने के लिए याचिका डाली। चुनौती
दी। जुलाई 2025 में हाईकोर्ट ने मामले में कोई कार्रवाई करने
पर रोक लगा दी और राज्य सरकार से जवाब माँगा।
भाजपा के सत्ता में आने क एक साल बाद 2018
में उत्तराखंड में ध्रमांतरण कानून लागू किया गया। फिर 2022
में सज़ा की अवधि बढ़ाई गई। 2025 में सज़ा का प्रावधान
और बढ़ाकर 3 से 10 साल कर दिया गया। गंभीर
मामलों में 20 साल या आजीवन कारावास तक की व्यवस्था कए दी।
2025 का संशोधन अभी लागू नहीं हुआ है
क्योंकि राज्यपाल ने तकनीकी गलतियों को ठीक करने के लिए इसे सरकार को लौटा दिया था।
इस कानून का उद्देश्य यह बताया गया है
कि ज़बरदस्ती, धोखे, दबाव,
लालच या शादी के ज़रिए जबरन धर्म परिवर्तन को रोका जाए।
2022 में में कानून और सख़्त होने के
बाद मामलों की संख्या बढ़ी। सबसे ज़्यादा 20 मामले 2023 में दर्ज हुए। 2025 में सितम्बर माह तक 18 मामले दर्ज़ हुए थे।
इस पूरे मामले पर Indian Express के उत्तराखंड पुलिस
से बार-बार पूछने के बावजूद उसने कोई जवाब नहीं दिया।
जिन 5 मामलों में अभियुक्तों को बरी किया गया उनमें रिपोर्ट ऐसे व्यक्ति ने की
थी
जो खुद उस तथाकथित ‘धर्म परिवर्तन’मामले से सीधे प्रभावित नहीं था जबकि कानून कहता है कि शिकायत सिर्फ पीड़ित व्यक्ति या उसके माता-पिता, भाई, बहन कर सकते हैं। अगर ये लोग शिकायत न कर सकें, तब ही कोई नज़दीकी रिश्तेदार कर सकता है।
जो खुद उस तथाकथित ‘धर्म परिवर्तन’मामले से सीधे प्रभावित नहीं था जबकि कानून कहता है कि शिकायत सिर्फ पीड़ित व्यक्ति या उसके माता-पिता, भाई, बहन कर सकते हैं। अगर ये लोग शिकायत न कर सकें, तब ही कोई नज़दीकी रिश्तेदार कर सकता है।
किसी तीसरे पक्ष द्वारा रिपोर्ट लिखने
का मामला टिहरी गढ़वाल में हुआ। 2021 में टिहरी गढ़वाल सीताराम
रणकोटी ने विनोद कुमार के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज़ कराई कि फेसबुक में एक वीडियो में उसने
हिंदू धर्म और जाति व्यवस्था की आलोचना और ईसाई धर्म की तारीफ की। पुलिस ने 13
गवाह पेश किए, वीडियो और डिजिटल सबूत दिखाए कि
आरोपी ने अपनी जन्म कुंडली जलाई।
अदालत में क्रॉस एक्जामिनेशन में जाँच
अधिकारी ने कबूल किया कि किसी को पैसे या लालच देकर धर्म परिवर्तन कराने का कोई
सबूत नहीं मिला। अन्य सबूत भी नहीं भी नहीं टिके और वीडियो की भी पुष्टि नहीं हो सकी।
जनवरी 2024 में आरोपी बरी कर दिया गया। अदालत ने कहा कि हर इंसान को अपना धर्म मानने,
अपनाने और उसका प्रचार करने की आज़ादी है, जब
तक वह किसी और के अधिकार नहीं छीनता।
एक और मामला जिसमें तीसरे पक्ष ने रिपोर्ट
लिखाई और अभियुक्त बरी कर दिया गया यह है कि 2021 में रामनगर (नैनीताल) में पादरी नरेंद्र सिंह बिष्ट और उनकी पत्नी के खिलाफ
धर्मांतरण का आरोप लगाकर अंतराष्ट्रीय हिंदू परिषद के सदस्यों ने बाइबिल के संदेशों
वाले पोस्टर फाड-ए, उनके घर में तोड़फोड़ की। आरोप लगाया कि गरीब
और आदिवासी लोगों को लालच देकर ईसाई धर्म अपनाने को कहा जाता है।
17 सितंबर 2025 को उन्हें बरी कर दिया गया। अदालत ने कहा कि यह साबित नहीं हुआ कि कब,
कैसे और किसे धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर किया गया। बिष्ट को 7
दिन जेल में रहना पड़ा और गाँव छोड़कर 15 किमी
दूर रहना पड़ा क्योंकि गांव में रहना मुश्किल हो गया था।
एक और मामला 2023
में रानीखेत (अल्मोड़ा) का है। एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी की गुमशुदगी
की रिपोर्ट दर्ज कराई। बाद में पत्नी के कहने पर मोहम्मद चांद के खिलाफ ज़बरदस्ती
ले जाने, धर्म परिवर्तन कराने और यौन उत्पीड़न के मामले जोड़े गए।
लेकिन अदालत में उस स्त्री ने माना कि वह चांद के साथ अपनी मर्जी से गई थी और किसी
तरह का यौन उइपीड़न नहीं हुआ। उसने मेडिकल जांच कराने से भी मना कर दिया। अदालत ने पाया कि महिला ने भागने से पहले नए कपड-ए
भी खरीदे थे यानी मामला आपसी सहमति का था। अदालत ने चांद को बरी कर दिया।
ऐसे ही और भी मामले हैं, जिनमें अदालत को आरोपों में सत्यता नहीं मिली। अखबार की रिपोर्ट का निष्कर्ष
यह है कि कानून बहुत सख़्त है, गिरफ्तारियाँ फौरन क ली जाती
हैं लेकिन अदालतों में सबूत नहीं मिलते, गवाह पलट जाते हैं और
आरोपी बरी हो जाते हैं। यानी कानून का इस्तेमाल ज़्यादा हो रहा है, लेकिन अदालतों में वह टिक नहीं पा रहा।
रिपोर्ट के अनुवाद में AI की मदद ली गई है।
- - न जो, 31 जनवरी 2026
पूरी रिपोर्ट इस लिंक पर देखें-
https://indianexpress.com/article/express-exclusive/cases-under-uttarakhands-conversion-law-fall-in-court-7-years-5-full-trials-all-5-acquittals-10502378/
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