Friday, April 10, 2026

भुतहा होते गांव

कथाकार नवीन जोशी का उपन्यास ‘भूतगांव’ उत्तराखंड के पहाड़ों के अकेलेपन और गांवों के भुतहा हो जाने की कथा है। केवल उत्तराखंड ही नहीं व्यवसाय और रोज़गार के अभाव में हिमाचल प्रदेश से लेकर उत्तर पश्चिम तक के गांव खाली हो रहे हैं तो सेठों की धरती शेखावाटी की बड़ी-बड़ी हवेलियों के बाहर चौकीदार हैं और अंदर कबूतर। शेखावाटी वह इलाका है जहां बिरला, पोदार, साहू जैन, सिंहानिया, पीरामल एवं खेतान इत्यादि का जन्म हुआ था लेकिन व्यवसाय के लिये वे बाहर निकले तो उनकी हवेलियां आज भी इंतजार कर रही हैं। नवीन जोशी उत्तराखंड के सतौर गांव के एक परिवार को उपन्यास के केंद्र में रखते हैं, जिनका एक भाई लखनऊ चला गया था तो दूसरा फौज से अवकाश ग्रहण कर गांव में अकेला रह रहा था। पूरे गांव में छुरमल ज्यू का मंदिर और आनंद सिंह तथा उसका कुत्ता शेरू हैं। अपने अकेलेपन में गांव शांत है लेकिन बाघ की आवाज़ का डर हमेशा गांव की शांति को भंग किये रहता है। नवीन जोशी पत्रकार हैं इसलिये अकेलेपन की समस्या को वैश्विक स्तर पर उठाते हैं। वैश्विक पूंजी ने गुड़गांव, बेंगलोर, पुणे एवं हैदराबाद जैसे महानगर व्यापार और टेक्नोलोजी के विस्तार के लिये चुने हैं, जहां सारे देश के युवक नौकरियों के लिये जा रहे हैं। लेकिन दूर-दराज के गांवों में अभाव हैं, न शिक्षा की व्यवस्था है और न रोजगार की, इसलिये पढ़ा-लिखा युवक रोज़गार की तलाश में बाहर जाता है और फिर वहीं का होकर रह जाता है। सरकार की उदासीनता के कारण गांव मूलभूत सुविधाओं के अभाव में अकेले और भुतहे हो गये हैं। अपने गांव के प्रति प्रेम कोरी भावुकता है, जंग खाये ताले लगे उन मकानों में रहकर या पहाड़ के सौंदर्य को देखकर पेट नहीं भरता इसलिये शहर की ओर जाना ऐसा यथार्थ है, जो सबके सामने है।

भूतगांव’ एक समय में हिल-मिलकर रहने वाला गांव था, जहां ब्राह्मण और राजपूतों के अलावा अन्य जातियां भी थीं, जो धीरे-धीरे उजड़ गईं। गांव सूने हो गये और अकेले मकान धीरे-धीरे खंडहर में तब्दील होते गये। गांव में अपने पालतू कुत्ते शेरू के साथ रह रहे आनंद सिंह बताते हैं कि ‘महाभारत के हस्तिनापुर जैसा ही ठहरा हमारा गांव। शापग्रस्त। गांधारी ने कृष्ण को शाप दिया था पूरे कुल के उजड़ जाने का। वैसे ही यह गांव शापग्रस्त लगता है मुझे। चल, आज भी किसी बंद दरवाजे और सूने गोठ की कहानी कहूंगा या किसी खंडहर की। खंडहरों की भी कहानी होती है डियर। बल्कि सच बात ये हुई कि खंडहरों के पास ज्यादा कहानियां होती हैं। टूटी दीवारों, ढही छतों, लुढ़के पाथरों, सड़ी बल्लियों और भीतों की कहानियां! गोठ की गाय और गोद का भाऊ जीते रहें, ऐसा आशीर्वाद देने वाले हुये ताकि जिंदगी चलती रहे। कहानी न बन जाये। द्वार पर ताला लटक गया और गोठ सूना हो गया तो फिर कहानी ही रह जाने वाली हुई।

यह ऐसी कहानियां हैं, जिन्हें सुनने वाला कोई आदमी गांव में नहीं है इसलिये गांव के उजड़ने की कहानियों को वे भारी मन से शेरू को सुनाते हैं। यह भी एक विडंबना ही है कि अकेले आदमी के पास अतीत की हरी-भरी स्मृतियां हैं लेकिन उन्हें सुनने वाला कोई आदमी नहीं बचा। वे दुखी मन से कहते हैं ‘इस गांव की ऐसी कौन-सी कथा है जो बार-बार कहने लायक हो। कोई ऐसे गया, कोई वैसे उजड़ा, कोई हमारी तरह टूटा । बचा यह सन्नाटा, चारों तरफ खंडहर, बंजर और इस सबके अकेले साथी छुरमल ज्यू।’ छुरमल ज्यू गांव के देवता हैं, पूरे गांव में अकेला मंदिर उन्हीं का है लेकिन ब्राह्मणों के पलायन करने के बाद अब कोई दीया जलाने वाला पुरोहित नहीं बचा है इसलिये आनंद सिंह ठाकुर होते हुये भी दीया जलाते हैं। गांव में हर जाति के काम बंटे हुये हैं इसलिये जो काम ब्राह्मणों का है, उसे ठाकुर नहीं कर सकता, अगर वह करता है तो यह परंपरागत काम की श्रेणी में नहीं आता है।

उपन्यास की मूल कथा सतौर गांव के वीरेंद्र सिंह नेगी और उसके छोटे भाई आनंद सिंह पर केंद्रित है, एक कथा लखनऊ जैसे महानगर पहुंचती है तो दूसरी सतौर में रहकर सुनाई जाती है- दोनों कथाएं मार्मिक हैं, दोनों के अपने-अपने दुख हैं, दोनों के अतीत और वर्तमान हैं, दोनों के भविष्य दारुण हैं। विडंबना यह है कि जो कथा लखनऊ में घटित हो रही है, उसका मुख्य पात्र जातिवाद से ग्रस्त है और जो कथा गांव में कही जा रही है, वह जातिवाद से मुक्त है। जो लोग पहाड़ों या अन्य दूसरी जगहों से महानगर में गये हैं, वे अपने साथ अपनी जातियों को भी ले गये हैं, वे आधुनिक बनने की कोशिश तो करते हैं लेकिन अपनी जड़ों से जुड़ने के नाम पर जाति की विभीषिका से मुक्त नहीं हो पाते हैं जिसका लाभ लोग कम राजनीतिज्ञ अधिक उठा रहे हैं। नवीन जोशी ने कथा को इस तरह बुना है कि यह एक व्यक्ति की कहानी न होकर बदलते हुये समाज की बृहत् कथा में रूपांतरित हो जाती है। इसलिये यह नहीं कहा जा सकता कि यह कहानी सतौर गांव के युवक वीरेंद्र सिंह नेगी और हलवाहे की बेटी हीरा की प्रेम कहानी मात्र है। उपन्यास में गांव की कथा आनंद सिंह अपने शेरू को सुनाते हैं तो लखनऊ में स्थापित वीरेंद्र सिंह नेगी की कहानी नेरेटर सुनाते हैं लेकिन ‘भूतगांव’ की कहानी साथ-साथ चलती है, जो दोनों कहानियों के अर्थ और गहरे करती जाती है। अपने हलवाहे चनरराम की बेटी हीरा के देह आकर्षण से विमोहित होकर वीरेंद्र उसे लखनऊ भगाकर ले गया था, पहाड़ से लेकर मैदान तक में इस तरह की घटनाएं होती रहती हैं, यह प्रेम का मामला है जिस पर दुनियाभर में खूब लिखा गया है और अब भी लिखा जा रहा है लेकिन नवीन जोशी जो बताना चाहते हैं, वह यह है कि वीरेंद्र सिंह नेगी से वी.एस.नेगी में जो मध्यवर्गीय युवा रूपांतरित हुआ था, वह महानगर में पक्की नौकरी और बड़े अधिकारी का संरक्षण पाकर अपनी जाति पर गर्व करने लगा। हीरा उसके हलवाहे की बेटी थी, वह उसकी जाति और सामाजिक जीवन में जातियों की विडंबनाओं से भलीभांति परिचित था लेकिन उसके युवा आकर्षण ने जाति और उसकी विभीषिका को भुला दिया था पर जीवन में स्थायित्व आने तथा सवर्ण मधुमिता गांगुली के संपर्क में आने के बाद हीरा में उसे दलितत्व नज़र आने लगा। यह अकेले वीरेंद्र की कहानी नहीं है बल्कि खाते-पीते सवर्ण मध्यवर्ग की कहानी है, जो अपनी हैसियत से अपना भद्र रूप चुनता है। यह इस रूप में अपनी जड़ों से जुड़ने की नहीं बल्कि सुविधानुसार बदलती व्याख्याओं की कहानी है।

नवीन जोशी पहाड़ और पहाड़ियों की उपेक्षा से आहत ऐसी कहानी लिख रहे थे, जो पहाड़, बर्फ, नदी, झरने और प्राकृतिक सौंदर्य से आकर्षित होकर जाने वाले सैलानियों के अनुभवों से अलग है। सैलानियों की मस्ती में पहाड़ का कठिन जीवन नहीं है, गरीबी और भूख भी नहीं है इसलिये उन्हें वहां सब कुछ अच्छा लगता है। जबकि पहाड़ सामाजिक बुराइयों और कुरीतियों से मुक्त नहीं है, वहां छुआछूत और जातिवाद जिस तरह व्याप्त है, वह भयावह है।

मुझे यह उपन्यास पढ़ते समय बार-बार यह अहसास हुआ कि उजड़ते गांवों की अनेक समस्याओं के साथ जातिवाद का दंश भी बड़ी समस्या रही है। उपन्यास जातिवाद पर नहीं है लेकिन उससे मुक्त भी नहीं है। सतौर गांव में अकेले रह रहे आनंद सिंह की अपनी पीड़ा है, जिसे वह कभी शेरू को सुनाता है तो कभी मन ही मन याद करके दुखी होता है। वह जब छोटा था, तब उसका बड़ा भाई वीरेंद्र हीरा को भगाकर ले गया था, इस घटना ने पूरे परिवार को तबाह कर दिया। उसका मानना है कि जो काम वीरेंद्र ने किया, उसका परिणाम भी उसे ही भुगतना चाहिये था लेकिन काम एक ने किया और परिणाम पूरे परिवार ने भुगता। उसकी बहन पत्थर बांधकर नदी में कूद गई और उसकी लाश पर सिर पटककर मां ने प्राण त्याग दिये, अपनी इज्जत के साथ जीने वाले पिता जीते जी ही मुरझा गये और पूरे घर को जाति बाहर कर दिया गया। आज भी इस तरह की घटनाएं खांप पंचायतों इत्यादि के माध्यम से सामने आ रही हैं, जिनका दंश पूरे परिवार को झेलना पड़ता है।

आनंद सिंह छोटा था, उसने अपने परिवार को बिखरते और घुटते हुये देखा था इसलिये वह कहता है ‘हमारे परिवार के साथ जो हुआ था, उसके बाद शादी की बात से ही मुझे चिढ़ हो गई थी। यह ख्याल कभी मन में आया ही नहीं। आज भी सोचता हूं क्या दोष था दीदी का? उसकी किसी अच्छे घर में शादी क्यों नहीं होनी चाहिये थी? न होता साला खानदानी खशिया! उसे क्यों अपमान सहना पड़ा? जान देनी पड़ी? इजा का गुमान क्यों इतना चूर-चूर हुआ कि उसने अपना सिर फोड़ डाला? और बाज्यू? गलती की थी तो ददा ने की थी। वैसे सोचो डियर शेरू, ददा की भी क्या गलती थी? इन खशियों की नाक इतनी ऊंची और नाज़ुक क्या हुई कि ज़रा-सा में जड़ से ही कट गई? धत्त साला, ये जात-बिरादरी और गोत्र-सोत्र ! ये लोग मुझे भी सुनाते वही सब। बार-बार ददा-भौजी, दीदी, इजा और बाज्यू के अपमान के किस्से दोहराये जाते। क्यों करता मैं शादी! इस समाज के खिलवाड़ के लिये? इनके तानों के लिये? आमा जब तक जिंदा रही, यही रट लगाती थी, हाथ जोड़ती थी- मेरे अन्नू रे शादी कर ले। छोटी जात में ही कर ले। एक घर चलाने वाली आ जायेगी। दो रोटी खिला देगी। कोई पानी देने वाला होगा। कब तक ऐसे रहेगा?’

सतौर गांव का यह परिवार प्रतिष्ठित था या धनाढ्य था, यह प्रश्न बेमानी है। इसलिये कि गांव में इसके अलावा जातिगत सम्मान होता है, जिसको बचाये रखने के लिये परिवार का मुखिया हर समय चिंतित रहता है लेकिन वीरेंद्र की एक गलती के कारण पूरा परिवार जैसे खत्म ही हो गया। आनंद सिंह बचा तो किसके लिये, खंडहर और अकेले होते गांव के लिये, मंदिर से लेकर लोगों के घरों में दीया और धूप दिखाने भर के लिये। यह एक कहानी है, जो अपनी विभीषिका में दुखांत है इसलिये उपन्यास में उसका दुख बार-बार रिस-रिसकर बाहर आता है। पर नवीन जोशी की और भी चिंताएं हैं, जिन्हें बड़ी या छोटी कहकर नहीं आंका जा सकता। वे यह प्रश्न पूछते हैं कि अब गांवों में पानी के नल किसके लिये लग रहे हैं, जब पानी पीने वाले ही नहीं रहे, तब इन नलों की उपयोगिता किसके लिये है? वे पूछते हैं कि रोज़ी-रोटी के अभाव में गांवों में कोई क्यों रहना चाहेगा? उन जैसे तमाम लोगों की इच्छा थी कि ‘गांवों तक अच्छी सड़कें होतीं। अच्छी बसें चलतीं। छोटे-छोटे दफ्तर और लीसा-लकड़ी-जड़ी-बूटी-फल-फूल की फैक्टरी होती। मतलब गुजारे लायक नौकरियां होतीं।’ लेकिन पहाड़ के गांवों की ओर न किसी ने देखा और न गांवों के खाली होने से पहले किसी ने उनकी चिंता की। तब गांव खाली होने ही थे इसलिये हुये भी।

यह व्यापक चिंताएं हैं, जिन्हें नवीन जोशी एक-एक कर उपन्यास में उठाते हैं। उनकी चिंता यह भी है कि पहाड़ के आदमी की विश्वसनीयता को घर के नौकर तक सीमित करने की अवधारणा किसने प्रसारित की? ईमानदार और कर्मठ होने का मतलब उसके पंखों को कतर देना तो नहीं हो सकता?

पहाड़ी नदियों पर बांध बनाये जा रहे हैं, उनका पानी रोककर निजी कंपनियों को दिया जा रहा है, पेड़ काटे जा रहे हैं, पहाड़ काटकर चैड़ी सड़कें बनाई जा रही हैं, उजड़े गांवों की ज़मीन निजी स्कूल खोलने के लिये दी जा रही है यानी विकास के नाम पर पहाड़ों की आत्मा पर दुर्दांत प्रहार किये जा रहे हैं। पहले एक ही बाघ की चिंता रहती थी लेकिन ‘अब और भी भयानक बाघ आ रहे हैं। ये कंपनी हम सबके लिये बाघ ही तो हुई। और ये हमारी सरकार कैसी है यार? क्यों दे रही किसी कंपनी को हमारी ज़मीन? सरकार भी नरभक्षी बाघ नहीं हुई क्या? उसे हमने गांव बचाने के लिये चुना था या गांव बेच खाने के लिये?

इन स्थितियों में नवीन जोशी को उत्तराखंड राज्य की स्थापना के लिये दी गई कुर्बानियां याद आती हैं और वे अलग राज्य बनने के सपनों के बारे में सोचते हैं, जो धीरे-धीरे समाप्त कर दिये गये। कहना न होगा कि पहाड़ की स्थितियां अलग हैं, उनके सपने और संघर्ष अलग हैं लेकिन दुर्भाग्य से उन्हें समझने वाला कोई नहीं है। इसलिये पहाड़ के गांव उजड़ रहे हैं, चारों ओर भुतहा सन्नाटा है। इस उजाड़ और भुतहे सन्नाटे में बाघ का डर, उसकी आवाज़ जंग खाये तालों के अंदर तक सुनी जा सकती है। 

भूतगांव’ अतीत के साथ इक्कीसवीं सदी में देखे गये सपनों की भी कहानी है, यह कहने भर को उपन्यास नहीं है बल्कि इसका वितान औपन्यासिक है इसलिये सारी कथाएं सतौर गांव की हैं या सतौर गांव से संबंधित हैं।

उपन्यास के अंत में वीरेंद्र के बेटा और बेटी जो अमेरिका और जर्मनी में रह रहे हैं गांव आते हैं और बाघ के भय और आतंक से मनोरोगी बने अपने चाचा आनंद सिंह को देखते हैं तो उन्हें अपने पिता का मनोरोग याद आता है। अकेलेपन में तमाम तरह की ग्रंथियां भयावह रूप में व्यक्तित्व को खत्म करती हैं, इन ग्रंथियों का शिकार बने लोग धीरे-धीरे समाप्त हो रहे हैं। कहना न होगा कि उपन्यास को जिस भाषा में गढ़ा गया है, उसमें पहाड़ी छोंक है, जो इसे पठनीय बनाता है।

-सूरज पालीवाल 

(हंस’ अप्रैल 2026 में प्रकाशित) 

 

 

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