
विकास के जिस रास्ते पर हमें लगातार धकेला जा रहा है, उसका सबसे बड़ा उदाहरण दिल्ली है. सर्दियां शुरू होते ही
वहां ‘स्मॉग’ का ऐसा आतंक छा जाता है कि स्कूल बंद करने पड़ते हैं. सांस
के रोगियों, बच्चों एवं
गर्भवतियों से कहा जाता है कि वे घर के बाहर न निकलें. घर के भीतर की हवा क्या
कहीं और से आ रही है? हां, एसी चलाकर बैठिए. अपेक्षाकृत बेहतर हवा मिल जाएगी लेकिन
बाहर की हवा और भी जहरीली होती जाएगी, उसका क्या?
दिल्ली का डरावना स्मॉग एक संकेत भर है. लखनऊ समेत अन्य शहरों की हालत भी लगभग
वैसी ही है. जल्दी ही बाकी शहर दिल्ली जैसे होते जाएंगे. इस बीच दिल्ली और भी घुटन
भरी हो चुकी होगी. शायद सलाह दी जाने लगे कि अब दिल्ली रहने लायक नहीं रही. हमारे
सभी बड़े शहर अभी से रहने लायक नहीं रह गये हैं. केंद्रीय प्रदूषण बोर्ड की ताजा
रिपोर्ट लखनऊ, मुरादाबाद और नोएडा को
देश का सर्वाधिक प्रदूषित क्षेत्र बता रही है. कोई नदी इस लायक नहीं रही कि उसका
पानी पीना तो दूर, उसमें नहाया भी जा
सके.
अच्छी तरह यह समझने के बावजूद कि विकास की वर्तमान धारा ही इस सबके लिए
जिम्मेदार है, हमें अब भी इसी
रास्ते पर दौड़ाया जा रहा है. दुनिया भर में व्यक्त की जा रही चिंताओं के बावजूद
हमारे जैसे देश इस विनाश के प्रति और भी लालायित हैं. शहर बेशुमार गाड़ियों, एसी और प्रदूषण बढ़ाने वाले यंत्रों से पटे जा रहे हैं.
आबादी की बाढ़ शहरों को लील रही है. गांव उजड़ रहे हैं. खेती रसायनों और कीटनाशकों
के दम पर हो रही है. कितनी तेजी से विनाश के औजार बढ़ाए हैं हमने!
सन 1974 तक लखनऊ समेत प्रदेश के किसी भी सरकारी दफ्तर और मंत्री निवास में एसी
नहीं लगा था (मात्र एक एसी देहरादून के उस सर्किट हाउस में था जहां कभी नेहरूजी
ठहरा करते थे. वही एसी लाकर 1974 में मुख्यमंत्री कार्यालय में लगाया गया था) गर्मियों
में सब जगह खस के पर्दे या टट्टियां लगती थीं. क्या ही सुगंधित शीतल हवा उनसे
मिलती थी. बाकी समय पंखे काफी होते थे. सुराहियों-घड़ों का ठंडा जल प्यास ही नहीं
बुझाता, मन को भी तृप्त करता
था. आज छोटे-छोटे घरों व मामूली दुकानों
में भी एकाधिक एसी और फ्रिज हैं, सरकारी व कॉर्पोरेट
कार्यालयों और वीआईपी बंगलों की बात छोड़ दीजिए. गाड़ियां इतनी हो गयी हैं कि सड़कों
पर ठौर नहीं. बेहिसाब निर्माण और अतिक्रमण ने हरियाली खत्म कर दी. हवा कैसे
प्राणदाई बनी रह सकती है?
स्मॉग होने पर स्कूल बंद करना और सम-विषम नम्बर की गाड़ियां चलाने का जतन इससे
बचने का कोई उपाय नहीं है. उपाय बड़ी उलट-फेर मांगता है. उसके लिए इच्छा शक्ति कहीं
दिखाई नहीं देती. ‘दम घुटे से मर जाऊं, ये मर्जी मेरे
जल्लाद की है’- किसी शायर का कथन
दूसरे ही संदर्भ में सच साबित हो रहा.
(सिटी तमाशा, नभाटा, 11 नवम्बर, 2017)
No comments:
Post a Comment