
प्रदेश के पहले प्रीमियर और बाद में मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत के योगदान
को पूरा देश-प्रदेश मानता आया है. अल्मोड़ा से उनके संगी रहे हरगोविंद पंत ने विधान
सभा के प्रथम संसदीय सचिव के रूप में विधायी कार्यों की नींव रखी. कई
मंत्रिमण्डलों में रहे गांधीवादी विचित्र नारायण शर्मा (उनियाल) ने आचार्य जे बी
कृपलानी और मास्टर सुंदर लाल के साथ मिलकर गांधी आश्रम की स्थापना की थी. 1973 में
मुख्यमंत्री बने हेमवती नंदन बहुगुणा को कई प्रशासनिक सुधारों के साथ विभिन्न
निगमों एवं प्रतिष्ठानों की स्थापना का श्रेय है. राजधानी में पहला हेलीकॉप्टर और
पहला एसी भी वे लाए थे. उनके बाद तीन बार मुख्यमंत्री बने नारायण दत्त तिवारी के
अनेक योगदानों में हॉट-मिक्स प्लाण्ट लाकर राजधानी
की सड़कें बनवाना भी शामिल है, जिसके निरीक्षण के
लिए वे आधी रात को लखनऊ का चक्कर लगाया करते थे.
रेलवे बोर्ड के चेयरमैन के रूप में
पद्मविभूषण घनानंद पाण्डे ने रेलवे के विख्यात अनुसंधान, अभिकल्प एवं मानक संगठन (आर्डीएसओ) की स्थापना की और उसके
लिए लखनऊ को चुना. 1949 से 1952 तक लोक निर्माण विभाग के मुख्य अभियंता रहे एम एस
बिष्ट ने लखनऊ में कई निर्माण कराए. गिरि विकास अध्ययन संस्थान के संस्थापक-निदेशक
प्रख्यात अर्थशास्त्री डॉ टी एस पपोला थे तो एसजीपीजीआई की स्थापना का प्रारम्भिक
कार्य निदेशक डॉ भुवन चंद्र जोशी ने किया.
मेडिकल कॉलेज में देश में अपनी तरह की अकेली मॉलीक्युलर बायोलॉजी प्रयोगशाला
की स्थापना डॉ एस एस परमार ने की थी. विज्ञानी पिता-पुत्र दीवान सिंह भाकूनी और
विनोद भाकूनी ने प्रतिष्ठित शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार पाया. सुदूर अंटार्कटिका
(दक्षिणी ध्रुव) में शोध करने वाले विज्ञानी दलों में उत्तराखण्डी मूल के कई
विज्ञानी रहे हैं.
लखनऊ को हाथी पार्क एवं बुद्ध पार्क की
सौगात देने वाले द्वारिका नाथ साह का नगर निकाय और लोक प्रशासन पर महत्वपूर्ण काम ‘कोलम्बो प्लान’ के तहत सम्मानित
हुआ. सरकारी दफ्तरों में भ्रष्टाचार के खिलाफ और पारदर्शिता की पहली लड़ाई आईएएस
धर्म सिंह रावत ने लड़ी. वायरलेस नेटवर्क के विकास और विस्तार में छत्रपति जोशी का
उल्लेखनीय योगदान रहा. 1971 के युद्ध में बांग्ला मुक्ति वाहिनी की सहायता के लिए
तुरत-फुरत वायरलेस नेटवर्क उपलब्ध कराने वाले वे ही थे.
साहित्य, पत्रकारिता, कला, संगीत-नृत्य, रंगमंच, आदि सांस्कृतिक
क्षेत्रों में उत्तराखण्डियों ने लखनऊ की विरासत को और समृद्ध किया. प्रसिद्ध कलाकार रणवीर सिंह बिष्ट और मूर्तिकार अवतार सिंह पंवार ने लखनऊ ही
नहीं देश का नाम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रोशन किया. सन 1902 में अमीनाबाद में परसी
साह ने ‘साह स्टूडियो’ खोला जो कलात्मक फोटोग्राफी के लिए मशहूर हुए. अमीनाबाद की वह गली आज भी परसी
साह लेन के नाम से जानी जाती है. बाद में कलाकर बुद्धि बल्लभ पंत ने लाटूश रोड में
पंत स्टूडियो खोला. तत्कालीन शासन-प्रशासन की लगभग सारी फोटोग्राफी साह और पंत
स्टूडियो से कराई जाती थी.
लोक-संस्कृति के क्षेत्र में उत्तराखण्डियों की उपस्थिति बहुत धमाकेदार है.
जितनी सांस्कृतिक संस्थाएं उनकी हैं और वर्ष भर जितनी प्रस्तुतियां होती हैं , उतनी शायद और किसी समाज की नहीं. शास्त्रीय रागों पर आधारित
गेय रामलीला का मंचन लखनऊ को उत्तराखण्डियों की देन है. 1948 से शुरू यह परम्परा
यहां क्रमश: विकसित और व्यापक हुई.
रंगमंच, साहित्य, शैक्षिक जगत और पत्रकारिता में यहां उत्तराखण्डियों की
उपस्थिति काफी पहले से दमदार रही और आज भी कायम है. यही बात सैन्य परम्परा के लिए
भी कही जा सकती है.
(अवध के समाज, नभाटा, 20 सितम्बर, 2017)
No comments:
Post a Comment