
इस अनतर पर हम ध्यान नहीं देते. ध्यान देते हैं गुड़गांव के
रेयान स्कूल की उस भयावह वारदात पर जिसमें ग्यारहवीं के एक लड़के ने अपने ही स्कूल
के नन्हे बच्चे को बाथरूम में मार डाला था. कारण सिर्फ इतना कि वह स्कूल में छुट्टी
कराना चाहता था. दु:ख और हैरत में कहते हैं कि देखो, कैसा समय आ गया.
बच्चों में इतनी क्रूरता कहां से आ गयी!
कुछ महीने ही बीते हैं कि ठीक ऐसी वारदात लखनऊ के एक स्कूल
में हो गयी. इस बार आरोपित सातवें दर्जे की एक छात्रा है, जिसने बताते हैं कि एक छोटे से बच्चे को स्कूल के बाथरूम में ले जाकर यह
कहते हुए चाकू मारे कि तुझे मारूंगी तभी तो स्कूल में छुट्टी होगी. हम सदमे में आ
जाते हैं और बेहद अफसोस के साथ कहते हैं कि आजकल के बच्चों को क्या होता जा रहा
है.
क्या हम इस पर भी ध्यान देते हैं कि हमारी आधुनिकता का सबसे
बड़ा शिकार बच्चे हुए हैं? बचपन कहते थे जिसे, वह
उनसे छिन गया है. भयानक वारदात करने वाले दोनों बच्चे स्कूल की छुट्टी कराना चाहते
थे. वजह जो भी रही हो, सच यह है कि आज बच्चों के पास किसी
दिन स्कूल नहीं जाने की आजादी नहीं है. हम कभी-कभार स्कूल से ‘जनरल फूटिंग’ करके कंचे-पिन्नी-पतंग में मशगूल हो
जाते थे. किसी दिन मन नहीं हुआ तो बस्ता
पेड़ पर टांग कर दिन भर गुल्ली-डंडा खेलने लग जाते थे. पकड़े जाते तो डांट पड़ती,
पिटाई होती मगर तनाव और अवसाद हमारे बचपन के शब्द नहीं थे.
आज के बच्चे बहुत कड़े अनुशासन में बांध दिये गये हैं.
नर्सरी क्लास से ऊंचे ‘टारगेट’ हैं. मुंह व
कपड़ों पर खाना पोतने और प्लेट गिराने का सुख नहीं, डायनिंग
टेबल के मैनर्स सीखने का खौफ है. बच्चे तितलियों के पीछे नहीं भागते, मां-बाप की महत्वाकांक्षा के पीछे हाँके जाते हैं. बच्चा किसी कारण स्कूल
नहीं जाना चाहता मगर उसे जबरन भेजा जाता है. वह एक दिन मां से चिपका रहना चाहता है,
अपनी बात कहना चाहता है मगर उसे उल्टियां करते-करते भी स्कूल बस में
ठूंस दिया जाता है. हमारी पीढ़ी की मां कहती थीं, मेरा बच्चा
बचा रहेगा तभी तो पढ़ेगा. आज की मम्मियों की प्राथमिकता भावनाएं नहीं, लालन-पालन-शिक्षण का ‘टारगेटेड प्लान’ है. ‘रेस’ के घोड़े को कतई
पिछड़ने नहीं देना है.
बच्चे बहुत अकेले हैं. स्कूल में भी और घर में भी. उनके पास
दादी-नानी की कहानियां नहीं हैं. उछल-कूद के लिए दोस्त नहीं हैं. भारी बस्ता है.
खेल के नाम पर एकांत कमरे के मुर्दा गैजेट हैं जो जीवन की कम, मौत की कलाबाजियां ज्यादा सिखाते हैं. मां की मीठी लोरियों के साथ आती
नींद नहीं है. अकेले बिस्तर पर सपने डराते हैं. नींद में चौंक कर जागते बच्चे
आत्मीय आलिंगन ढूंढते हैं. उनके दिमाग में संग्राम छिड़ा है जिसकी अभिव्यक्ति
खतरनाक ढंग से हो रही है.
और, हम हैरान हैं कि छोटे-छोटे बच्चे कैसे-कैसे
अपराध करने लगे हैं.
(सिटी तमाशा, नभाटा, 20 जनवरी, 2018 )
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