
आज वही नायडू न केवल तेलंगाना का चुनाव कांग्रेस के साथ गठबंधन करके लड़ रहे हैं, बल्कि 2019 के आम चुनाव में कांग्रेस को केंद्र में रख कर विपक्षी एकता की मुहिम छेड़े हुए हैं. यहां यह याद दिलाना जरूरी है कि तेलुगू देशम पिछले चार साल तक एनडीए की सहयोगी और मोदी सरकार में भागीदार रही. इतना धुर विरोधी रुख, बल्कि पार्टी की नींव ही खिसका देने वाला रवैया अपनाने का कारण स्पष्ट ही भाजपा से उनकी बड़ी नाराजगी है. उनका आरोप है कि आंध्र प्रदेश के साथ जो छल-कपट पहले कभी कांग्रेस करती थी, वही अब भाजपा कर रही है. कांग्रेस को हमने सजा दे दी, पिछले लोक सभा चुनाव में उसे एक सीट नहीं मिली. अब भाजपा को सजा देने का समय आ गया है.
यह घोषणा दोहराते हुए नायडू तेलंगाना और आंध्र प्रदेश से बाहर निकल कर भाजपा के विरुद्ध विपक्षी दलों का गठबन्धन बनाने के अभियान पर निकल पड़े हैं. उन्होंने पिछले दिनों कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, बसपा प्रमुख मायावती, सपा-बुजुर्ग मुलायम सिंह यादव, सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव, द्रमुक नेता स्टालिन, जनता दल (सेकुलर) के देवेगौड़ा और कुमारस्वामी, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के शरद पवार, ‘आप’ के अरविंद केजरीवाल और नेशनल कांफ्रेस के फारूख अब्दुल्ला से मुलाकात की है. ममता बनर्जी से भी वे सम्पर्क में हैं. आने वाले दिनों में वे दिल्ली में विपक्षी नेताओं की बैठक बुला रहे हैं. उन्होंने साफ कहा है कि 2019 में मिल कर नरेंद्र मोदी को हराने के लिए विपक्षी एकता जरूरी है. कांग्रेस के बारे में वे कह रहे हैं कि विपक्षी एकता के जहाज का लंगर वही बन सकती है, भले ही हमारे उससे मतभेद रहे हों. यह भी उन्होंने साफ कर दिया है कि वे गठबंधन के नेता होने के दावेदार नहीं, बल्कि भाजपा विरोधी दलों को एक करने में सहायक होना चाहते हैं.
तो, क्या
चन्द्रबाबू नायडू विपक्षी एकता के वह नाविक बन सकते हैं जो तमाम अंतर्विरोधों के
बावजूद भाजपा विरोधी दलों एक साथ खेने का काम कर सके? जब-जब
केंद्र में सत्तारूढ़ मजबूत दल एवं नेता को हराने की आवश्यकता पड़ी, विरोधी दलों को एकजुट करने के लिए किसी न किसी मध्यस्थ की भूमिका
महत्त्वपूर्ण हुई. कभी यह काम जयप्रकाश नारायण ने किया तो कभी हरकिशन सिंह सुरजीत
जैसे मंजे नेता ने. 2019 में यह भूमिका निभाने के लिए नायडू की राह बहुत आसान नहीं
होगी हालांकि उन्हें गठबंधनों को बनवाने और चलवाने का पर्याप्त अनुभव है.
आंध्र के नवाचारी और विकास-धर्मी मुख्यमंत्री
के रूप में उनकी देशव्यापी पहचान है. सूचना प्रोद्योगिकी के विकास और शासन-प्रशासन
में उसके सार्थक उपयोग की शुरुआत करने का श्रेय भी उन्हें है. सन 1996 और 1997 में
केंद्र में संयुक्त मोर्चा की तथा सन 1999 में एनडीए की सरकार बनवाने में उनकी
महत्त्वपूर्ण भूमिका रही. उन दिनों उन्हें ‘किंगमेकर’
नाम से जाना गया था. क्या एक बार फिर वे उस भूमिका को सफलतापूर्वक
निभा पाएंगे?
बीती 27 अक्टूबर को मायावती से मिलकर ही नायडू
को अनुभव हो गया होगा कि इस बार की राह बहुत कठिन होने वाली है. ममता बनर्जी से
मिलकर भी उन्हें ऐसा ही लगे तो आश्चर्य नहीं. हालांकि दोनों ही नेत्री अभी मोदी
सरकार के बहुत खिलाफ हैं लेकिन उनकी अपनी शर्तें है और महत्त्वाकांक्षाएं भी.
मायावती ने नायडू को किसी तरह का आश्वासन नहीं दिया. उलटे,
अजित जोगी ने मायावती को प्रधानमंत्री पद के लिए समर्थन घोषित कर
नायडू की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. मायावती और अजित जोगी छातीसगढ़ में मिलकर चुनाव लड़
रहे हैं. उधर, ममता बनर्जी ने बहुत पहले से जनवरी 2019 में
कोलकाता में भाजपा-विरोधी दलों की बड़ी रैली करने का ऐलान कर रखा है. इसमें वे
कांग्रेस से लेकर बसपा तक को बुला रही हैं. जाहिर है, उनकी
अपनी महत्त्वाकांक्षाएं हैं.
नायडू की पहली बड़ी बाधा यही है कि नेता का नाम
पहले तय करके कोई मोर्चा बनाना लगभग असम्भव होगा. दूसरी बड़ी समस्या नायडू का
कांग्रेस को विपक्षी एकता का लंगर घोषित करना बनेगी. भाजपा विरोधी कई दल और नेता
हैं जो कांग्रेस को साथ लेने पर भले राजी हो जाएं, उसे एकता
की धुरी बनाने के नाम पर बिदक जाएंगे.
नायडू का एक फॉर्मूला काम कर सकता है. दिल्ली
में राहुल समेत कुछ बड़े नेताओं से मिलने के बाद
उन्होंने जो कहा उससे इस फॉर्मूले के संकेत मिलते हैं. उनका कहना है कि
ममता बनर्जी बंगाल में, स्टालिन तमिलनाडू में,
देवेगौडा कर्नाटक में, मायावती-अखिलेश उत्तर
प्रदेश में, शरद पवार महाराष्ट्र में, अब्दुल्ला
कश्मीर में और वे खुद आंध्र एवं तेलंगाना में मजबूत हैं. इसमें बिहार में लालू
यादव की पार्टी को जोड़ा जा सकता है. यानी क्षेत्रीय स्तर पर मजबूत भाजपा-विरोधी
दलों को अपने-अपने राज्यों में मिलकर लड़ाया जाए. जहां भाजपा से कांग्रेस की सीधी
टक्कर है वहां कांग्रेस का साथ दिया जाए. इस तरह राज्यवार अलग-अलग रणनीति से भाजपा
को हराया जा सकता है. गठबंधन के नेता का सवाल चुनाव बाद के लिए छोड़ दिया जाए.
नायडू शायद इसी सूत्र पर काम कर रहे हैं.
भाजपा-विरोध को एकता की डोर बना रहे हैं. उन्होंने साफ कर दिया है कि देश में इस
समय दो ही प्लेटफॉर्म हैं. एक- भाजपा और दूसरा- भाजपा-विरोधी. जो हमारे साथ नहीं
है, वह भाजपा के साथ माना जाएगा. भाजपा को हराना वे
‘देश को बचाना’ मान रहे हैं.
आम चुनाव में भाजपा को हराने की अनिवार्यता
अनुभव करने के बाद भी कई क्षेत्रीय क्षत्रपों की दूसरी भी प्राथमिकताएं हैं.
गठबंधन के सहारे कांग्रेस पुनर्जीवित हुई तो कई क्षेत्रीय दल उसे अपने लिए खतरा
मानते हैं. इसलिए अपना राजनैतिक मैदान बचाये रखना भी प्राथमिकता है. चूंकि तत्काल
बड़ा खतरा भाजपा दिख रही है, इसलिए नायडू की
मुहिम आगे बढ़ सकती है.
( प्रभात खबर,13 नवम्बर, 2018)
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