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Tuesday, February 05, 2019

बिना गठबंधन की एकता



बीती 19 जनवरी को ही वे सब कोलकाता में एक मंच पर इकट्ठा हुए थे. ममता बनर्जी की बुलाई रैली के मंच से उन सबने मोदी के नेतृत्त्व वाले एनडीए को केंद्र की सत्ता से उखाड़ फेंकने का आह्वान किया था. बीते रविवार को कोलकाता में बड़े नाटकीय घटनाक्रम के बाद एक बार फिर वे सुर में सुर मिलाकर मोदी सरकार को कोसने,  उसे लोकतंत्र, संघीय स्वरूप और संवैधानिक संस्थाओं को नष्ट करने वाला बताने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे. वे सब ममता बनर्जी के पीछे खड़े होकर मोदी के खिलाफ एकजुट दिखने की कोशिश कर रहे हैं.

पिछले डेढ़-दो साल से ऐसी ही स्थिति बनी हुई है. कांग्रेस समेत भाजपा विरोधी कई क्षेत्रीय दल 2019 के आम चुनाव में मोदी को परास्त करने के लिए एकजुट होने की कोशिश करते रहे हैं. महागठबंधन बनाने की चर्चाएं जब-तब होती रहीं. विपक्षी नेताओं के दिल्ली डेरों से लेकर प्रांतीय राजधानियों के सरकारी बंगलों तक बैठकों के दौर चलते रहे. महागठबंधन बनाने की पहली बड़ी कोशिश लालू यादव की पहल पर डेढ़ साल पहले पटना रैली में हुई थी. उत्तर प्रदेश के दो धुर विरोधी दलों, सपा और बसपा के एक साथ आने की जमीन उसी पहल से बननी शुरू हुई थी. पटना रैली से बड़े-बड़े ऐलान हुए थे. उसके बाद से महागठबंधन बनने की चर्चाओं को गति मिली थी, हालांकि क्षेत्रीय दलों के अन्तर्विरोधों ने उसकी सम्भावनाओं पर सवाल भी खूब लगा दिये थे.

उसके बाद विपक्षी दलों को एक और बड़ा अवसर मई 2018 में मिला जब कर्नाटक चुनाव में भाजपा की सत्ता कब्जाने की कोशिश नाकाम हुई और कुमारस्वामी के नेतृत्त्व में कांग्रेस-जनता दल (सेकुलर) की सरकार बनी. कुमारस्वामी का शपथ ग्रहण समारोह भाजपा के खिलाफ विपक्षी दलों की सबसे बड़ी जुटान बना. वह मंच विपक्षी नेताओं के लिए न केवल अत्यंत उत्साहवर्धक था, बल्कि एकता के प्रतीक रूप में कुछ अद्भुत दृश्य  बहुत दिनों तक मीडिया में छाये रहे थे.

सोनिया और मायावती की स्नेहिल आलिंगन वाली बहुप्रचारित तस्वीर बंगलूर के उसी मंच की है. लग रहा था कि मायावती का पुराना कांग्रेस विरोध अब तिरोहित हो जाएगा. उसी मंच पर सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने बसपा नेता मायावती का बड़े आदर से स्वागत किया था. पटना से सांकेतिक रूप में शुरू हुई उनकी दोस्ती उसी दिन सार्वजनिक और व्यवहार में आयी थी. बंगलूर के उसी मंच पर बंगाल के पुराने राजनैतिक शत्रु माकपा नेता सीताराम येचुरी और तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी भी मौजूद थीं. एक-दूसरे को फूटी आंख न देखने वाले ये नेता उस दिन मुस्कराते हुए कुछ पल को आमने-सामने भी हुए. वहाँ और भी क्षेत्रीय नेता थे जिनका जोश बता रहा था कि उन्हें भाजपा को सताच्युत करने के लिए एकता का सूत्र मिल गया है.

जिस तरह पटना की रैली के बाद महागठबंधन की सम्भावना धूमिल होती गयी उसी तरह बंगलूर के विपक्षी जमावड़े से निकले एकजुटता के संदेश भी जल्दी से उलटे संकेत देने लगे. सोनिया गांधी के गलबहियाँ डालने वाली मायावती कांग्रेस पर हमलावर होती गईं. राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के चुनावों में तालमेल न हो पाने के बाद मायावती के लिए कांग्रेस साँपनाथहो गयी, भाजपा से कतई कम बुरी नहीं. माकपा और तृणमूल को तो खैर साथ आना ही नहीं था, सोनिया से ममता की बाद की मुलाकातें भी सुनिश्चित नहीं कर सकीं कि उनकी पार्टियों में तालमेल होगा.

इन रैलियों, मुलाकातों का विपक्ष की नजर से एक ही सुखद परिणाम निकला कि उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा का गठबन्धन हो गया. भाजपा को हराने की दिशा में यही एक महत्त्वपूर्ण बात हुई. इसके अलावा टीआरएस के नेता चंद्रशेखर राव और तेलुगु देशम के चंद्रबाबू नायडू ने विपक्षी एकता की जो पहल की वह किसी नतीजे तक नहीं पहुँची. तेलंगाना में तेलुगु देशम, कांग्रेस और वाम दलों ने मिलकर चुनाव लड़ा लेकिन बुरी तरह नाकामयाब रहे. इस प्रयोग की विफलता के बाद कांग्रेस तेलुगु देशम से दूरी बनाने में लगी है. संकेत हैं कि वह आंध्र में उसके साथ मिलकर लोक सभा चुनाव नहीं लड़ेगी.

अपने अंतर्विरोधों, क्षेत्रीय समीकरणों और कांग्रेस से पुराने बैर के कारण अब तक भाजपा विरोधी दल राष्ट्रीय स्तर किसी एकता का आधार तैयार नहीं कर सके. आम चुनाव सामने हैं. अब कोई गठबन्धन बन पाएगा , इसके आसार नहीं दीखते. इसके बावजूद इन दलों में  2019 के चुनाव में भाजपा को धूल चटाने की तीव्र लालसा दिखाई देती है. भाजपा सभी को अपने राजनैतिक अस्तित्त्व के लिए बड़ा खतरा दिख रही है. इसलिए वे एकजुटता दिखाने, एक मंच पर आने और भाजपा के विरोध के लिए सामूहिक मुद्दा तलाशने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहते.

ममता बनर्जी की विपक्षी रैली को एक महीना भी नहीं हुआ कि कोलकाता विपक्षी दलों के लिए फिर एक ऐसा अवसर ले आया जब वे मिलकर केंद की मोदी सरकार के खिलाफ अपनी मुद्दा आधारित एकजुटत दिखा सकते थे. शारदा घोटाले के सिलसिले में वहाँ के पुलिस कमिश्नर से पूछताछ करने सीबीआई क्या पहुँची कि ममता बनर्जी ने मोदी सरकार के खिलाफ नया मोर्चा खोल दिया. वे संघीय ढाँचे को ध्वस्त करनेका आरोप लगा कर धरने पर क्या बैठीं कि पूरा विपक्ष ममता के समर्थन में और मोदी सरकार के विरुद्ध एक सुर में बोलने लगा. कई दलों के बड़े नेता कोलकाता जाकर ममता के धरना-मंच में शरीक हो आये. कई ने अपने-अपने गढ़ों से मोदी सरकार के खिलाफ हुंकार भरी.     

करीब बाईस राजनैतिक पार्टियाँ मोदी सरकार के खिलाफ और ममता बनर्जी के समर्थन में इस समय बयान दे रही हैं. इनमें कांग्रेस समेत विभिन्न राज्यों के महत्त्वपूर्ण और बड़े दल शामिल हैं. ममता के मामले में बीजू जनता दल ने भी भाजपा विरोधी तेवर दिखाये हैं. लगता है कि भाजपा के विरुद्ध व्यापक मोर्चा तैयार है लेकिन वास्तव में कोई मोर्चा तैयार नहीं है. ममता के पक्ष में खड़े सारे नेता उन्हें अपना नेता मानने को कतई तैयार नहीं होंगे.

इस तथ्य के बावजूद भाजपा के लिए 2019 का संग्राम आसान नहीं है. उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के अलग मैदान में उतरने के बावजूद सपा-बसपा के गठबन्धन से लड़ाई बहुत कठिन हो चुकी है. बिहार में नीतीश के कारण एनडीए मजबूत भले दिखता हो, विरोधी गठबन्धन को कमजोर नहीं आंकना चाहिए. इसके अलावा कुछ राज्यों में भाजपा की कांग्रेस से सीधी लड़ाई है और उन राज्यों में 2014 के बाद से कांग्रेस मजबूत हुई है.

किसी संयुक्त मोर्चे या गठबंधन के बिना भी भाजपा विरोध के स्वर तीव्र हो रहे हैं. विपक्ष इन विरोधी सुरों को तेज से तेज बनाये रखना चाहता है. फिलहाल यही स्वर उनकी एकजुटता है.  


(प्रभात खबर, 6 फरवरी, 2019)

Monday, November 12, 2018

विपक्षी एकता के नाविक नायडू


हमारे देश में राजनैतिक दलों का पलटी मारना कोई नयी बात नहीं है. मुलायम सिंह यादव से लेकर नीतीश कुमार तक और ममता बनर्जी से लेकर स्व जयललिता तक कई बार आश्चर्यजनक रूप से पैंतरे बदलते रहे हैं. बिल्कुल हाल में चन्द्रबाबू नायडू का कांग्रेस से तालमेल करना कुछ ज्यादा ही चौंका गया. 1982 में जब तेलुगु देशम पार्टी बनाकर लोकप्रिय अभिनेता से राजनेता बने एन टी रामाराव ने राजनीति में कदम रखा था तो तेलुगू-स्वाभिमान को कुचलने और आंध्र प्रदेश के साथ लगातार अन्याय करने के लिए कांग्रेस को सबसे बड़ा शत्रु घोषित किया था. बाद में उनके दामाद चंद्रबाबू नायडू ने बगावत करके तेलुगु देशम पार्टी पर अपना कब्जा जमाया तब भी तेलुगू-स्वाभिमान और आंध्र-गौरव की अलग जगाये रखते हुए कांग्रेस और सोनिया गांधी पर कड़े प्रहार करना जारी रखा. उनका पूरा अस्तित्व कांग्रेस-विरोध पर टिका हुआ था.

आज वही नायडू न केवल तेलंगाना का चुनाव कांग्रेस के साथ गठबंधन करके लड़ रहे हैं, बल्कि 2019 के आम चुनाव में कांग्रेस को केंद्र में रख कर विपक्षी एकता की मुहिम छेड़े हुए हैं. यहां यह याद दिलाना जरूरी है कि तेलुगू देशम पिछले चार साल तक एनडीए की सहयोगी और मोदी सरकार में भागीदार रही.  इतना धुर विरोधी रुख, बल्कि पार्टी की नींव ही खिसका देने वाला रवैया अपनाने का कारण स्पष्ट ही भाजपा से उनकी बड़ी नाराजगी है. उनका आरोप है कि आंध्र प्रदेश के साथ जो छल-कपट पहले कभी कांग्रेस करती थी, वही अब भाजपा कर रही है. कांग्रेस को हमने सजा दे दी, पिछले लोक सभा चुनाव में उसे एक सीट नहीं मिली. अब भाजपा को सजा देने का समय आ गया है.

यह घोषणा दोहराते हुए नायडू तेलंगाना और आंध्र प्रदेश से बाहर निकल कर भाजपा के विरुद्ध विपक्षी दलों का गठबन्धन बनाने के अभियान पर निकल पड़े हैं. उन्होंने पिछले दिनों कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, बसपा प्रमुख मायावती, सपा-बुजुर्ग मुलायम सिंह यादव, सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव, द्रमुक नेता स्टालिन, जनता दल (सेकुलर) के देवेगौड़ा और कुमारस्वामी, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के शरद पवार, ‘आपके अरविंद केजरीवाल और नेशनल कांफ्रेस के फारूख अब्दुल्ला से मुलाकात की है. ममता बनर्जी से भी वे सम्पर्क में हैं. आने वाले दिनों में वे दिल्ली में विपक्षी नेताओं की बैठक बुला रहे हैं. उन्होंने साफ कहा है कि 2019 में मिल कर नरेंद्र मोदी को हराने के लिए विपक्षी एकता जरूरी है. कांग्रेस के बारे में वे कह रहे हैं कि विपक्षी एकता के जहाज का लंगर वही बन सकती है, भले ही हमारे उससे मतभेद रहे हों. यह भी उन्होंने साफ कर दिया है कि वे गठबंधन के नेता होने के दावेदार नहीं, बल्कि भाजपा विरोधी दलों को एक करने में सहायक होना चाहते हैं.  

तो, क्या चन्द्रबाबू नायडू विपक्षी एकता के वह नाविक बन सकते हैं जो तमाम अंतर्विरोधों के बावजूद भाजपा विरोधी दलों एक साथ खेने का काम कर सके? जब-जब केंद्र में सत्तारूढ़ मजबूत दल एवं नेता को हराने की आवश्यकता पड़ी, विरोधी दलों को एकजुट करने के लिए किसी न किसी मध्यस्थ की भूमिका महत्त्वपूर्ण हुई. कभी यह काम जयप्रकाश नारायण ने किया तो कभी हरकिशन सिंह सुरजीत जैसे मंजे नेता ने. 2019 में यह भूमिका निभाने के लिए नायडू की राह बहुत आसान नहीं होगी हालांकि उन्हें गठबंधनों को बनवाने और चलवाने का पर्याप्त अनुभव है.

आंध्र के नवाचारी और विकास-धर्मी मुख्यमंत्री के रूप में उनकी देशव्यापी पहचान है. सूचना प्रोद्योगिकी के विकास और शासन-प्रशासन में उसके सार्थक उपयोग की शुरुआत करने का श्रेय भी उन्हें है. सन 1996 और 1997 में केंद्र में संयुक्त मोर्चा की तथा सन 1999 में एनडीए की सरकार बनवाने में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही. उन दिनों उन्हें किंगमेकरनाम से जाना गया था. क्या एक बार फिर वे उस भूमिका को सफलतापूर्वक निभा पाएंगे?

बीती 27 अक्टूबर को मायावती से मिलकर ही नायडू को अनुभव हो गया होगा कि इस बार की राह बहुत कठिन होने वाली है. ममता बनर्जी से मिलकर भी उन्हें ऐसा ही लगे तो आश्चर्य नहीं. हालांकि दोनों ही नेत्री अभी मोदी सरकार के बहुत खिलाफ हैं लेकिन उनकी अपनी शर्तें है और महत्त्वाकांक्षाएं भी. मायावती ने नायडू को किसी तरह का आश्वासन नहीं दिया. उलटे, अजित जोगी ने मायावती को प्रधानमंत्री पद के लिए समर्थन घोषित कर नायडू की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. मायावती और अजित जोगी छातीसगढ़ में मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं. उधर, ममता बनर्जी ने बहुत पहले से जनवरी 2019 में कोलकाता में भाजपा-विरोधी दलों की बड़ी रैली करने का ऐलान कर रखा है. इसमें वे कांग्रेस से लेकर बसपा तक को बुला रही हैं. जाहिर है, उनकी अपनी महत्त्वाकांक्षाएं हैं.

नायडू की पहली बड़ी बाधा यही है कि नेता का नाम पहले तय करके कोई मोर्चा बनाना लगभग असम्भव होगा. दूसरी बड़ी समस्या नायडू का कांग्रेस को विपक्षी एकता का लंगर घोषित करना बनेगी. भाजपा विरोधी कई दल और नेता हैं जो कांग्रेस को साथ लेने पर भले राजी हो जाएं, उसे एकता की धुरी बनाने के नाम पर बिदक जाएंगे.

नायडू का एक फॉर्मूला काम कर सकता है. दिल्ली में राहुल समेत कुछ बड़े नेताओं से मिलने के बाद  उन्होंने जो कहा उससे इस फॉर्मूले के संकेत मिलते हैं. उनका कहना है कि ममता बनर्जी बंगाल में, स्टालिन तमिलनाडू में, देवेगौडा कर्नाटक में, मायावती-अखिलेश उत्तर प्रदेश में, शरद पवार महाराष्ट्र में, अब्दुल्ला कश्मीर में और वे खुद आंध्र एवं तेलंगाना में मजबूत हैं. इसमें बिहार में लालू यादव की पार्टी को जोड़ा जा सकता है. यानी क्षेत्रीय स्तर पर मजबूत भाजपा-विरोधी दलों को अपने-अपने राज्यों में मिलकर लड़ाया जाए. जहां भाजपा से कांग्रेस की सीधी टक्कर है वहां कांग्रेस का साथ दिया जाए. इस तरह राज्यवार अलग-अलग रणनीति से भाजपा को हराया जा सकता है. गठबंधन के नेता का सवाल चुनाव बाद के लिए छोड़ दिया जाए.

नायडू शायद इसी सूत्र पर काम कर रहे हैं. भाजपा-विरोध को एकता की डोर बना रहे हैं. उन्होंने साफ कर दिया है कि देश में इस समय दो ही प्लेटफॉर्म हैं. एक- भाजपा और दूसरा- भाजपा-विरोधी. जो हमारे साथ नहीं है, वह भाजपा के साथ माना जाएगा. भाजपा को हराना वे देश को बचानामान रहे हैं.

आम चुनाव में भाजपा को हराने की अनिवार्यता अनुभव करने के बाद भी कई क्षेत्रीय क्षत्रपों की दूसरी भी प्राथमिकताएं हैं. गठबंधन के सहारे कांग्रेस पुनर्जीवित हुई तो कई क्षेत्रीय दल उसे अपने लिए खतरा मानते हैं. इसलिए अपना राजनैतिक मैदान बचाये रखना भी प्राथमिकता है. चूंकि तत्काल बड़ा खतरा भाजपा दिख रही है, इसलिए नायडू की मुहिम आगे बढ़ सकती है. 

( प्रभात खबर,13 नवम्बर, 2018)           
          

Wednesday, December 27, 2017

विपक्षी एकता के अंतर्विरोध


बीती 23 दिसम्बर को पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की जयंती के मौके पर जब समाजवादी, वामपंथी और कांग्रेस के नेता एक मंच पर जुटे तो किसानों और जाटों के उस बड़े नेता की प्रशस्ति से ज्यादा विपक्षी दलों के एकजुट होने की जरूरत पर ज्यादा चर्चा हुई. दिल्ली में इस मंच पर चार समाजवादी धड़े थे- समाजवादी पार्टी के रामगोपाल यादव, जनता दल (यू) के विद्रोही शरद यादव, जनता दल (एस) के दानिश अली, राष्ट्रीय जनता दल के अजित सिंह. साथ में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सीताराम येचुरी और कांग्रेस के आनंद शर्मा.
इन नेताओं के भाषणों के स्वर से लेकर आपसी बातचीत तक एक ही मुद्दा केंद्र में रहा कि 2019 के लोक सभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी का मुकाबला करने के लिए विपक्षी दलों की एकता हो जानी चाहिए. हालांकि यह पहली बार नहीं है. नरेंद्र मोदी की अजेय-सी लगने वाली छवि बनने के बाद से विपक्षी दलों को एकता की जरूरत ज्यादा ही लगने लगी है. यह अलग बात है कि उसे व्यवहार में उतारना उनके लिए मुश्किल बना रहा. विरोधी दलों के अंतर्विरोध, वैचारिक और क्षेत्रीय टकराव कम नहीं.

विपक्षी दलों की एकता की नयी चर्चा गुजरात चुनाव नतीजों के बाद छिड़ी है. इन नतीजों ने साबित किया कि भाजपा अजेय नहीं है. नतीजों के तत्काल बाद विरोधी दलों की प्रतिक्रियाओं से उनकी एकता की चाहत सामने आने लगी है. उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा कि 2019 में  भाजपा को हराने के लिए कांग्रेस को क्षेत्रीय दलों का साथ लेना चाहिए. स्पष्ट है कि अखिलेश अब भी कांग्रेस से गठबंधन करने के इच्छुक हैं, यद्यपि उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनावों में सपा-कांग्रेस गठबंधन पिट गया था. मुलायम सिंह यादव मानते हैं कि सपा की हार कांग्रेस की वजह से ज्यादा हुई लेकिन अखिलेश भाजपा को बड़ी चुनौती मानते हुए विपक्षी एकता के पक्षधर हैं. यहां तक कि वे धुर विरोधी मायावती से भी हाथ मिलाने के हिमायती हैं.

मायावती उत्तर प्रदेश में आज भी बड़ी राजनैतिक ताकत हैं. भाजपा ने उनके दलित वोट बैंक में सेंध लगाई है. भाजपा के खिलाफ किसी मोर्चे में उनके शामिल होने की सम्भावना तो बनती है और वे असहमत भी नहीं लेकिन जैसी उनकी राजनीति है, उसमें शर्तें और शंकाएं ज्यादा हैं. कुछ समय पहले उन्होंने कहा था कि वे भाजपा के खिलाफ किसी गठबंधन में शामिल हो सकती हैं लेकिन सीटों का बंटवारा पहले हो जाना चाहिए. दिक्कत यह है कि सपा-बसपा का मुख्य आधार उत्तर प्रदेश है. दोनों ही वहां अपनी जमीन दूसरे के लिए आसानी से नहीं छोड़ने वाले.

उत्तर प्रदेश में विपक्षी एकता का एक महत्त्वपूर्ण अवसर आगामी अप्रैल में आने वाला है जब राज्य सभा की 10 सीटों का चुनाव होगा. सपा एक और भाजपा आठ सीटें आसानी से जीत लेंगी. अगर सपा, बसपा और कांग्रेस एक हो जाएं तो वे दसवीं सीट भाजपा को नहीं जीतने देंगे. क्या ऐसा हो पाएगा?  

ममता बनर्जी भी गुजरात नतीजों से बहुत उत्साहित हैं. वे नरेंद्र मोदी की कट्टर विरोधी हैं. भाजपा बंगाल में पैर जमाने में लगी है. उसका वोट वहां लगातार बढ़ रहा है. इसलिए वे भाजपा के खिलाफ एक मोर्चे में आ सकती हैं लेकिन उनकी समस्या यह है कि उन्हें वाम दलों से भी बंगाल में  उतनी ही मजबूती से लड़ना है. भाजपा विरोधी मोर्चे में वाम-दल और तृणमूल कांग्रेस एक साथ कैसे फिट होंगे?

सबसे महत्त्वपूर्ण सवाल विपक्षी मोर्चे के नेतृत्व का है. क्या कांग्रेस को मोर्चे का नेतृत्त्व सौंपने को सभी दल तैयार हो जाएंगे? यूपीए के दौर में सोनिया को नेता मानने में कोई बड़ी अड़चन नहीं थी. अब कांग्रेस की बागडोर राहुल के हाथ है और कांग्रेस बहुत कमजोर हो चुकी है.  क्या सोनिया की तरह राहुल भी सर्व-स्वीकार्य हो सकते हैं?

राहुल और कांग्रेस के पक्ष में एक बात जरूर है कि लगभग पूरे देश से सफाये के बावजूद वह जनता के बीच सुपरिचित पार्टी है. उसका प्रतिष्ठित इतिहास है. गुजरात के नतीजों ने राहुल और कांग्रेस को कुछ संजीवनी-सी दी है. मगर गुजरात ने एक सवालिया निशान भी खड़ा किया है. कांग्रेस की सेकुलर छवि को दबाते-छुपाते राहुल ने गुजरात में उदार हिंदुत्त्व का जो चोला ओढ़ा है, क्या उस पर समाजवादी और वाम दल सवाल नहीं उठएंगे? कांग्रेस ने यह नया चोला सिर्फ गुजरात के लिए पहना या आगे भी यही बाना धारण करने का उसका इरादा है?

महत्त्वपूर्ण यह भी है कि हमारे यहां विपक्षी एकता के लिए एक बड़े और स्वीकार्य सूत्रधार की जरूरत पड़ती रही है, ऐसा नेता जो तात्कालिक आवश्यकता के लिए विभिन्न दलों के अंतर्विरोधों को एक किनारे रखवा सके. लोहिया, जे पी या हरकिशन सिंह सुरजीत जैसा सूत्रधार अथवा मार्गदर्शक आज कौन है? तुलना की बात नहीं, लेकिन एक लालू यादव हैं जो भाजपा विरोधी विपक्षी मुहिम को साध रहे थे लेकिन वे अपने ही पाप-पंक में पूरी तरह घिरे हैं. नीतीश कुमार इस भूमिका में हो सकते थे लेकिन वे भाजपा के पाले में चले गये. शरद यादव एकता की पहल करते रहे हैं लेकिन आज उनके पीछे कोई पार्टी नहीं है. सीताराम येचुरी भी विपक्षी एकता के वकालती हैं मगर कांग्रेस से रिश्ते बनाने पर उन्हें अपनी ही पार्टी के भीतर मोर्चा लेना पड़ रहा है.

कुल मिलाकर आज जो परिदृश्य है, उसमें विपक्क्षी एकता का दारोमदार  राहुल के नेतृत्त्व में कांग्रेस पर ही आ ठहरता है. कांग्रेस की मुश्किल यह है कि वह ज्यादातर राज्यों में जनाधार खो चुकी है. उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे बड़े राज्यों में वह अस्तित्त्व के लिए लिए जूझ रही है. विपक्षी एकता के लिए स्वाभाविक ही उसे बड़ी कीमत चुकानी होगी. क्षेत्रीय दलों को साथ लेने के लिए उसे अधिकसंख्य सीटें उन्हें देनी होंगी. यूपी-बिहार जैसे बड़े राज्यों में उसकी खोई हुई जमीन वापस नहीं आने वाली.  यूपी के विधान सभा चुनाव यह साबित कर चुके हैं.

2019 के लोक सभा चुनाव से पहले आठ राज्यों के चुनाव होने हैं. इनमें कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ इस माने में महत्त्वपूर्ण हैं कि यहां भाजपा और कांग्रेस की सीधी लड़ाई है.  क्या गुजरात की तरह कांग्रेस यहां भी भाजपा को कांटे की टक्कर दे पाएगी? क्या कर्नाटक में अपनी सत्ता बचा पाएगी? इसी पर विपक्षी मोर्चे में कांग्रेसी नेतृत्त्व का फैसला निर्भर है. लेकिन पहले राहुल को तय करना होगा कि वे कांग्रेस को ही सीधे भाजपा के मुकाबले खड़ा करने का कठिन लक्ष्य साधना चाहते हैं या फिलहाल भाजपा को हराने के लिए विपक्षी एकता को महत्त्व देते हैं.
(प्रभात खबर, 28 दिसम्बर 2017) 
  
 




Thursday, July 27, 2017

भाजपा की 2019 की राह के कांटे विपक्षी पैरों तले


बहुत दिन नहीं हुए जब नीतीश कुमार को 2019 के लोक सभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के मुकाबिल भाजपा-विरोधी खेमे का नायक माना जा रहा था. बिहार विधान सभा चुनाव में भाजपा का विजय-रथ रोक कर महागठबंधन को निर्णायक जीत दिलाने के नाते नीतीश कुमार को यह महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय दर्जा मिला था.
अभी हाल तक राष्ट्रपति चुनाव में राजग प्रत्याशी के मुकाबले संयुक्त विपक्ष का उम्मीदवार उतारने के लिए नीतीश कुमार पहल कर रहे थे. इसके लिए 18 दलों का जो मोर्चा बन रहा था, नीतीश कुमार को उसका संयोजक बनाया गया था. भाजपा ने राष्ट्रपति प्रत्याशी का दांव कुछ ऐसा चला कि नीतीश कुमार को विपक्षी खेमा छोड़ कर भाजपा प्र्त्याशी के पक्ष में वोट डालना पड़ा. इसके बाद भी वे उप-राष्ट्रपति के चुनाव में विपक्ष के संयुक्त प्रत्याशी के पक्ष में खड़े थे.
अब यह परिदृश्य पूरा उलट गया है. बुधवार की शाम पटना में जो कुछ घटा उसने भाजपा-विरोधी राजनीति को सबसे बड़ा झटका दिया है. भाजपा-विरोधी खेमे के सबसे बड़े और विश्वसनीय नेता के रूप में नीतीश कुमार की हैसियत खत्म हो गयी. अब वे नरेंद्र मोदी के प्रबल प्रतिद्वंद्वी नहीं हैं. बल्कि, नरेंद्र मोदी और अमित शाह अब उनके नेता हैं.
लालू के कुनबे के भ्रष्टाचार के दाग से अपने को बचाने के लिए नीतीश कुमार ने जो दांव चला उसने ईमानदार नेता की उनकी छवि तो बनाये रखी लेकिन उनका नेता का दर्जा घटा दिया. इसी के साथ भाजपा को बड़ा लाभ भी हो गया. जिस बिहार को भाजपा चुनावी मैदान में हार गयी थी, वह उसकी झोली में आ गया. बिहार की जनता का स्पष्ट जनादेश महागठबंधन के पक्ष में था. नीतीश ने महागठबंधन ही नहीं तोड़ा, जनादेश को भी पलट दिया. चुनाव में पराजित भाजपा बिहार की सत्ता में भागीदार बन रही है.
यह भारतीय राजनीति का विद्रूप है. करीब दो साल पहलेसाम्प्रदायिक शत्रु भाजपा और हिटलर नरेंद्र मोदीको हराने के लिए नीतीश कुमार ने अपने धुर विरोधी और भ्रष्टाचार में गले-गले तक डूबे लालू यादव को गले लगाया था. वह गलबहियां अब सीबीआई के छापों और एफआईआर के बाद असह्य रूप से कलंकित हो गयीं. वह केर-बेर का संगसाबित हुआ. लालू-कुनबा मस्ती में डोल रहा था और नीतीश कुमार की साफ-सुथरी छवि के चीथड़े उड़ रहे थे. भई गति सांप-छछूंदर केरी’. न उगलते बने, न निगलते. इस स्थिति से बाहर निकलने के लिए कुछ तो करना था. और, करना इस तरह था कि बिहार अपने हाथ में रहे और छवि पर भ्रष्टाचार का दाग न लगे. तभी राजनीति में जगह बची रहेगी.
भाजपा ने पूरी तैयारी कर ही रखी थी.  नीतीश ने वही रास्ता चुना जिस पर पहले चल चुके थे. भाजपा के साथ 2008 से 2013 तक वे सरकार चला चुके हैं. सुशासन बाबूकी छवि तभी बनी थी. यह अवसर-देखी राजनीति ही है. लालू का साथ भी एक अवसर ही था.
सबसे बड़ा नुकसान लेकिन 2019 के लिए भाजपा-विरोधी संयुक्त मोर्चा बनाने की पहल का हुआ है. नीतीश ने जो रास्ता चुना, या उन्हें चुनना पड़ा, उससे भाजपा की एक बड़ी चुनौती खत्म हो गयी है. एक बड़ा विरोधी ढेर हुआ है, बल्कि शरणागत है. नरेंद्र मोदी और अमित शाह का कांग्रेस-मुक्त भारतअभियान विपक्ष-हीन भारतकी तरफ और आगे बढा है.
भाजपा के खिलाफ आज कौन ताकतवर नेता मैदान में बचा है? भाजपा की साम्प्रदायिक राजनीतिसे लोहा लेते-लेते मौलानाबन गये मुलायम सिंह आज भाजपा के प्रति परम नरम हैं. अपनी ही पार्टी में बेटे के हाथों हाशिये पर धकेल दिये गये मुलायम सिंह को आज भाजपा का डर सबसे ज्यादा सता रहा है. आय से अधिक सम्पत्ति के जिन मामलों में लालू-परिवार बुरी तरह फंस गया है, उनका भूत मुलायम को दिन-दहाड़े न दिखता होगा तो भाजपाई इशारे से जता देते होंगे.
उनके खिलाफ ऐसे ही जो मामले किसी तरह दफन हैं, वे कभी भी खोले जा सकते हैं. बेटे से सत्ता-संघर्ष के दिनों में मुलायम कबूल कर चुके हैं कि अमर सिंह ने मुझे जेल जाने से बचाया था. आज अमर सिंह भी साथ नहीं हैं. होते भी तो वह तेज अब अमर सिंह में कहां रहा! लिहाजा मुलायम कभी नरेंद्र मोदी के कान में कुछ फुसफुआते हैं, कभी राष्ट्रपति प्रत्याशी को वोट देने के बहाने नजदीकी बढ़ाते हैं.
भाजपा-विरोधी मोर्चे के अगुवा लालू यादव कम न थे मगर कभी आडवाणी का राम-रथ रोकने वाले लालू का खुद का पांव आज कीचड़ में इस तरह धंसा हुआ है (या धंसा दिया गया है) कि वे शत्रु की तनी प्रत्यंचा के सामने निहत्थे और आसान निशाना बने खड़े हैं. सत्ता-च्युत होने के बाद लालू-परिवार की मुसीबतें और बढ़ेंगी.
वाम दल लगातार पस्त होते आये हैं. उनका संख्या-बल ही नहीं छीजा, नेताओं का प्रभाव-बल भी पराभूत है. वाम नेता आज इतने सामर्थ्यवान भी नहीं कि बचे-खुचे क्षेत्रीय क्षत्रपों को भाजपा के खिलाफ एकजुट कर सकें.
ममता बनर्जी जरूर भाजपा-भगाओ का नारा बुलंद कर रही हैं. ऐसा करना उनकी मजबूरी है क्योंकि भाजपा ने पश्चिम बंगाल में भी दंगे-फसाद के बहाने ध्रुवीकरण की राजनीति को अच्छी-खासी हवा दे रखी है. बंगाल को बचाने के लिए ममता को आज वामपंथियों से लड़ने से कहीं ज्यादा ताकत भाजपा को दूर रखने के लिए करनी होगी. इसलिए ममता बनर्जी का भजपा-विरोध बंगाल तक सीमित रह जाएगा.
प्रमुख विपक्षी दल कहलाने वाली कांग्रेस अपना बचा-खुचा शिविर ही नहीं सम्भाल पा रही. गुजरात में शंकर सिंह वाघेला ने बड़े नाजुक मौके पर अपना तम्बू अलग कर लिया है. राहुल बाबा लाख कोशिश कर लें, चुटकुलों से आगे उनका योगदान बन नहीं पा रहा. सोनिया बीमार हैं और लाचार भी. परिवार से बाहर किसी सामर्थ्यवान को वे पार्टी की बागडोर थमा नहीं सकतीं. न ही कांग्रेसी ऐसा स्वीकार कर पाएंगे.
अपने दलित आधार के अपहरण से बेचैन मायावती ने इस बीच जरूर भाजपा-विरोधी तेवर तीखे किये हैं. उन्होंने कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के साथ मोर्चा बनाने के संकेत भी दिये हैं लेकिन इसे बिहार के महागठबंधन ही का विस्तार होना था. वह सम्भावना अब बहुत कमजोर हुई है.
मायावती का दामन भी भ्रष्टाचार के आरोपों से साफ नहीं. भाजपा-विरोधी ज्यादातर क्षेत्रीय नेता इस मामले में दागी हैं. भाजपा ने इसे उनके खिलाफ प्रमुख हथियार बना लिया है. इसीलिए नरेंद्र मोदी समेत सभी भाजपाइयों ने भ्रष्टाचार के मामले में समझौता न करने के लिए नीतीश की बढ़-चढ़ कर प्रशंसा की है.
भाजपा की 2019 की राह के कांटे क्रमश: साफ होकर विपक्ष के पांवों तले बिछ रहे हैं.
-नवीन जोशी, 27, जुलाई 2017
(http://hindi.firstpost.com/politics/nitish-kumar-form-nda-government-in-bihar-with-the-help-of-bjp-now-whats-happen-to-opposition-coalition-modi-opposition-is-tough-now-43553.html )