28 मई 2025, स्विट्ज़रलैण्ड के आल्प्स पर्वतमाला का एक विशाल हिमखंड अपनी आधार-चट्टान के साथ टूटकर नीचे लुढ़का। उसके पानी, हिमोड़ (मोरेन), मिट्टी, पत्थर और चट्टानों के मलवे ने पूरे ब्लैटन गांव को दफ़्न कर दिया। यह विकराल तबाही थी, लेकिन उसमें केवल एक व्यक्ति की मौत हुई। पूर्व चेतावनी, तैयारियों और त्वरित बचाव कार्यों के कारण यह सम्भव हुआ। वहां ऐसे खतरों के संकेत पढ़ लेने की व्यवस्था है।
अगस्त 2025 के अंतिम सप्ताह में तिब्बत व नेपाल में हिमखण्ड और ग्लेशियर-झील के टूटने से हुई जानमाल की क्षति का तो आकलन होने में अभी बहुत वक्त लगेगा। अब तक की सूचना के अनुसार एक हजार से अधिक मौतें हो चुकी हैं और करीब चार हजार लोग लापता हैं।
उच्च हिमालय में हाल के वर्षों में ऐसी कई आपदाएं हो चुकी हैं- 2013 में चोरबाड़ी-केदारनाथ, 2021 में ऋषिगंगा-चमोली, 2023 में ल्होनाक-उत्तरी सिक्किम, 2025 में क्षीरगंगा-धराली के भीषण हादसों की स्मृति रोंगटे खड़े कर देती है। सैकड़ों जानें गईं, कितने गांव और पनबिजलीघर बहे या दफ्न हो गए।
किसी भी हादसे की कोई पूर्व चेतावनी या संकेत नहीं। बचाव की तैयारियां क्या होतीं!
यह जानते हुए भी कि आल्प्स और हिमालय की संरचना और प्रकृति में काफी अंतर है, यह पूछना सामयिक है कि सुदूर संवेदन उपग्रहों, ग्लेशियर-विज्ञान, हिमालय-अध्ययन, भू-विज्ञान और इनसे सम्बद्ध विविध शोधों तथा आईआईटी एवं आईएससी के कई गहन अध्ययनों के बाद भी क्या ऐसे हादसों की तनिक पूर्व चेतावनी की व्यवस्था नहीं की जा सकती? या कि यह हमारी प्राथमिकता में ही नहीं है?
हिमालय की चोटियां, दर्रे और नदियां अंतरराष्ट्रीय सीमाएं बनाते हैं। कई कोनों से यह भी आरोप लगाया गया कि चीन ने हादसा हो जाने पर भी नेपाल को चेताया होता तो 3-40 मिनट में सैकड़ों जानें तो बच ही जातीं। चीन तो बंद समाज है, क्या भारत-नेपाल-पाकिस्तान में भी ऐसी कोई संधि या समझ है? या, क्या ऐसी व्यवस्था बनाने पर विचार भी कहीं हो रहा है?
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साढ़े छह हजार फुट की ऊंचाई पर तीन तरफ ऊंची-ऊंची चोटियों से घिरी बिरही घाटी (गढ़वाल, उत्तराखण्ड) के बीच से बहने वाली नदी भी बिरही कहलाती है। सन् 1893 के एक दिन किसी चोटी से एक विशाल चट्टान नीचे गिरी और बिरही नदी के उस मुहाने पर जा बैठी जहां से वह नीचे बहती थी। नदी का प्रवाह रुक गया। पहाड़ों के बीच झील बनने लगी। ब्रिटिश सरकार के अधिकारी-इंजीनियर खबर पाकर जब वहां पहुंचे, तब तक एक मील चौड़ी, पांच मील लम्बी और चार सौ गुट गहरी झील बन गई थी। एक गांव के नाम पर इसे ‘गौना लेक’ कहा गया।
अंग्रेज इंजीनियरों ने इस बहुत बड़ा खतरा मानते हुए वहां एक तार घर बनवा दिया ताकि जब भी झील टूटने को हो, नीचे घाटियों तक खतरे की घण्टी बजाई जा सके। एक दिन वह झील टूट गई। खतरे की घंटी से नीचे हरिद्वार तक जनता को सावधान कर दिया गया था।
उस साल यानी 1894 में गौना झील सौ फुट तक ही टूटी थी। तीन सौ फुट गहरी झील बाद तक बनी रही। 20 जुलाई 1970 को वह हरहराकर पूरी टूट गई। देश को आज़ाद हुए कई साल हो चुके थे लेकिन ढहते पहाड़, गिरते पेड़, लुढ़कती चट्टानों और मिट्टी के अथाह मलबे से जनता को आगाह करने के लिए तब न तार घर बचा था, न चेतावनी देने का कोई दूसरा इंतज़ाम। हरिद्वार तक मची तबाही का खौफनाक मंजर कागजों में दर्ज़ है।
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भूस्खलन से पहाड़ी नदियों में बनने वाली झीलों के फटने से आज भी बहुत तबाहियां और मौतें लगभग हर साल होती हैं। उनके खतरे से सचेत करने की मुकम्मल व्यवस्था आज भी नहीं है। तब उच्च हिमालय के विशाल ग्लेशियरों के भीतर हो रही हलचलों को पढ़कर चेतावनी देने के इंतज़ाम करने की अपेक्षा कैसे की जाए! ग्लेशियरों के बीच बनी-बढ़ती हुई झीलों के खतरों पर भी हम नज़र नहीं रख पा रहे।
विशेषज्ञ बताते हैं कि ऐसा कर पाना आसान नहीं है। हिमालय में ग्लेशियर करीब 48 हजार किमी क्षेत्रफल में फैले हैं और अध्ययनकर्ताओं के अनुसार उसमें 5000 से अधिक झीलें हैं। इनमें करीब 500 खतरनाक बताई गई हैं। हिमालय और काराकोरम पर्वतों के बीच ग्लेशियर-झीलों के टूटने की 388 घटनाएं रिकॉर्ड की जा चुकी हैं, जिनसे अचानक बाढ़ें आईं। केदारनाथ, चमोली, सिक्किम और धराली के हादसे ऐसी ही ग्लेशियर-झीलों के टूटने के कारण हुए।
ऐसे हादसे बढ़ते जा रहे हैं और विकराल भी हो रहे हैं। विशेषज्ञ कहते हैं कि नेपाल में जो भीषण आपदा आई, वैसा पिछले हजार साल में भी शायद ही हुआ हो।
ऊपर से शांत दिखते ग्लेशियरों के भीतर कई प्रकार की हलचलें होती रहती हैं। ध्यान रहे कि हमारा हिमालय नया यानी बच्चा पहाड़ है जो अब भी ऊपर उठ रहा है। इसीलिए इसे सबसे नाजुक पहाड़ कहा जाता है। ‘विकास’ की अनियंत्रित होड़ और मानव आबादी के दबाव भी इसे प्रभावित करते हैं। बढ़ता वैश्विक तापमान तो बड़ा खतरा है ही। ग्लेशियर गलते हुए पीछे सरक रहे हैं। कई ग्लेशियर हवा में लटके बम बन गए हैं।
आईआईटी, भुवनेश्वर और भारतीय विज्ञान संस्थान, बंगलूर का एक हालिया अध्ययन बताता है कि अकेले अलकनंदा घाटी के ऊपरी शिखरों पर 219 ‘हैंगिंग’ ग्लेशियरों की पहचान की गई है। इन पर सतर्क निगाह रखने की आवश्यकता है।
यह भूसे में सुई ढूंढने जैसा जरूर है लेकिन असम्भव नहीं है। इसके लिए काफी धन, तंत्र और इच्छा शक्ति चाहिए। इस पर खर्च बार-बार होने वाली मौतों, विनाश के बाद राहत और पुनर्वास में होने वाले खर्च की तुलना में बहुत कम होगा। अकेले उत्तरी सिक्किम में ल्होनाक ग्लेशियर-झील के टूटने से दो खरब 50 अरब रु के नुकसान का आकलन किया गया था।
भारत सरकार ने अंतरिक्ष अध्ययन केंद्रों की सहायता से ग्लेशियरों और उनके मध्य बनी झीलों का अध्ययन और चिह्नीकरण शुरू कराया है। असली काम चिह्नित ग्लेशियरों की सतत निगरानी का है। इसके लिए सुदूर संवेदन उपग्रहों से प्राप्त होने वाले संकेतों से मदद मिल सकती है। आल्प्स पर्वतमाला में जिस प्रकार अध्ययन, चिह्नांकन और निगरानी की जा रही है, उन देशों से सीखने और मदद लेने की जरूरत है।
और, जैसा कि एक अमेरिकी विज्ञानी और अध्ययनकर्ता ऑस्टिन लॉर्ड का सुझाव है कि स्थानीय समाजों, भेड़पालकों, गूजरों, मछुवारों को भी इसमें शामिल करना चाहिए, क्योंकि उनके पास खतरों के संकेत समझने का पीढ़ियों का अनुभवजन्य ज्ञान होता है।
- न जो,