Monday, May 25, 2026

‘आधे सूरज की धूप’- टीसती स्मृतियों में गुमशुदा स्त्री का चेहरा

परिवार के भीतर आपसी सबंधों के पेच एक अत्यंत संवेदनशील बच्चे को वयस्क बनाते हुए किन-किन और कैसी-कैसी जटिल व अंधेरी आंतरिक उलझनों-बिखरावों की दुनिया में ले जाते हैं जो उसके पूरे जीवन पर मंडराते रहते हैं, इसका टीसता हुआ मार्मिक वृतांत है नरेश गोस्वामी का पहला उपन्यास आधे सूरज की धूप लघु कलेवर (मात्र 83 पृष्ठ) का यह उपन्यास अपनी व्याप्ति में विराट है और पाठक को मथता चलता है। इसे पढ़ना अपने भीतर के अनेक गह्वरों में झांकते चलना भी है। अतीत की वे कौन सी चोट हैं, कौन सी अनुभूतियां हैं, जिनसे हम आजीवन छुटकारा नहीं पा पाते, जिनके प्रेत हमारे वर्तमान पर मंडराते रहते हैं?   

परिवार के सबसे छोटे बेटे अरविंद को पिता के फोन से चाचा की मृत्यु का समाचार मिलता है। पिता से भौतिक और मानसिक रूप से भी बहुत दूर जा चुके अरविंद की स्मृति-यात्रा के साथ उपन्यास शुरू होता है। कभी बालक अरु और कभी युवा आरवि होता हुआ वयस्क अरविंद मुख्य रूप से अपने पारिवारिक, विशेष रूप से माता-पिता के संबंधों की गांठों में झांकता है।

इस प्रक्रिया में उसके भीतर निरंतर आलोड़न-विलोड़न चलता है। वस्तुत: यह हालडोला उसके भीतर बचपन से ही शुरू हो गया था जिसने उसे न युवावस्था में प्रगतिशील राजनैतिक धारा में टिकने दिया और न बाद में किसी रिश्ते या नौकरी में। बचपन से आज तक वह भटकता ही रहा है। यह भटकन बाहरी से अधिक भीतरी है और उसके साथ इसका त्रास भी जुड़ा हुआ है। उसके वर्तमान पर अतीत के प्रेत मंडराते रहते हैं। हमें पता नहीं चलता कि बाहर से बिल्कुल सामान्य, चुस्त-दुरुस्त दिखता आदमी अपने भीतर किस यंत्रणा से गुजरता रहता है।

पिता (पितृसत्ता कह लीजिए) यहां अपराधी हैं, मां की घोर उपेक्षा करने का अपराधी, बच्चों की परवाह न करने का अपराधी, बड़े भाई का शोषण बर्दाश्त करने का अपराधी और अपने किए का बचाव करने के साथ मां को ही दोष देते रहने का अपराधी- ‘किसान परिवार से आई थी ... अनपढ़ और अनगढ़ थी, इसलिए जीवन भर भैंसों में उलझी रही ...पहले रिश्ते को नहीं भुला पाई ... समय के साथ नहीं चल पाई...।

रामरती (मां) पहले परिवार के बड़े लड़के शिवपाल से ब्याही गई थी। उस रिश्ते से एक पुत्र भी जन्मा था लेकिन न वह पुत्र बचा, न पति। तब वह दुत्कार और अपमान के बाद मायके भगा दी गई। जाते हुए वह अपने सबसे छोटे देवर से पूछती गई थी- बता, जिब तू बड़ा हो जावैगा तो मझे लैण आवैगा?’ वह बिना जाने-समझे जवाब देता है- हां, बड़ा होते ही लेने आऊंगा

और, मायके में ग्यारह वर्ष वैधव्य के काटने के बाद रामरती अपने से बारह वर्ष छोटे देवर की पत्नी बनकर फिर उसी घर में लौट आई। नए पति बने देवर ने उससे बच्चे पैदा किए लेकिन न कभी प्यार दिया, न पत्नी का मान-सम्मान। जेठ-जिठानियों ने भी उसे प्रताड़ना ही दी- या डंकिणी फेर आ गई! लेकिन वह हारी नहीं, मायके से एक गाय लेकर आई और उसके सहारे धीरे-धीरे कई भैंसों को पालकर परिवार चलाने वाली बनी, कमाऊ खेतों में खटी और खटते-खटते एक दिन मर गई।

तब अरविंद बहुत छोटा था लेकिन हर ओर से उपेक्षित वह मां, जो उसे भी बहुत स्नेह नहीं दे पाई, उसकी आत्मा में एक टीस बनकर बैठी रह गई- क्या उसकी ज़िंदगी उसी धुंए में धुंधवाती रही थी, जिससे बाहर आकर और आंखें पोछकर वह हमसे मिल लेती थी? क्या उसके भीतर कोई धागा नहीं बचा था जो बाहर फैले जीवन से जुड़ सके?’

नन्हे कलेवर के इस उपन्यास में वह मां सघन रूप से बसी हुई है। वह वाक्यों में है, पंक्तियों के बीच में है, घटनाओं में है, मौन में है। वह अरविंद की भटकन में टीसती है, खण्डहर हो रहे मकान की मिट्टी में महकती है, बुआ के किस्सों से झांकती है। मां के पीछे छिपी एक गुमशुदा औरतअरविंद के चेतन-अवचेतन में हमेशा बनी रहती है, इस कदर कि अरविंद जीवन भर किसी भी फिल्म में मां का जिक्र आने भर से भावुक हो जाता था और शर्मिंदा होना पड़ता था। इसीलिए उसने फिल्म देखना ही छोड़ दिया था।

उस मां को पति और परिवार का प्यार नहीं मिला लेकिन उसने सारा जग जीत लिया था, यह उसकी मौत के बाद पता चलता है जब शोक व्यक्त करने इतनी स्त्रियां आ जाती हैं कि घर के भीतर और दालान तक में उन्हें बैठाने की जगह नहीं बचती- कस्बे के अलग-अलग कोनों, कुम्हारों, लुहारों, छिप्पियों और मुसलमानों की गलियों से आई अनाम और अनजान औरतों का यह रेला देखकर मोहल्ले की परिचित ताई-चाचियां और घर के लोग हैरान थे... औरतों का यह तांता कई दिनों तक लगा रहा। कई तो महीनों बाद सिर्फ यह कहने आई कि घर में किसी काम की जरूरत पड़े तो खबर करवा दियो।

धरती-सी धैर्यवान और मजबूत यह मां अपने घर की नींव में ही नहीं थी, मामा की रखैलकही जाने वाली उस रसूलन के मान-सम्मान के लिए भी कमर बांध कर खड़ी रही, जिसने मामा के परिवार को बिखरने से बचा रखा था। और तो और, वह आततायी जेठ के हाथ का लट्ठ छीनकर उसके सामने चुनौती बनकर खड़ी हो गई थी। वह स्त्री उपन्यास से बाहर आकर पाठक के भीतर बैठ जाती है और वहीं बनी रहती है।

यह कथा एकरेखीय नहीं है और न इस तरह सिलसिलेवार कही गई है। अरविंद के अंतर में लगातार चलने वाले स्मृतियों के मोंताज में कथा के बिखरे-बिखरे तार उभरते और क्रमश: जुड़ते जाते हैं। उपन्यास पूरा होते-होते एक कसक गहरे उतर जाती है। शिल्प इतना प्रभावशाली और अलग किस्म का है कि कथा का कहीं विस्तार न होने, तारतम्य नहीं बनने, विवरणों में न जाने और कोई विशेष ढांचा खड़ा न किए जाने के बावजूद वह समग्रता में प्रवाहित होती है। भाषा में देशज छोंक इसे और आत्मीय बना देता है।  

जो पिता तीन चौथाई उपन्यास में अपराधी ठहरते हैं, वह वृद्धावस्था में जैसे बरी कर दिए जाते हैं, हालांकि इसका जवाब अरविंद के पास भी नहीं है कि क्या उसनें उन्हें सचमुच बरी कर दिया? ऐसा केवल अरविंद के साथ ही नहीं होता, वह फिलहाल जिस सबीना के साथ रिश्ते में बना हुआ है, वह भी अपने आरोपित पापा को बख्श देती है- यह महसूस करते हुए कि कि जो चोट मैंने अपने पापा को पहुंचाई थी, उसका घाव खुद मेरे अंदर हुआ था।

सबीना का किस्सा यह है कि जब वह चौदह-पंद्रह की थी तो उसकी मम्मी की मौत हो गई थी और चार महीने भी नहीं बीते थे कि पापा ने दूसरी शादी कर ली थी। सबीना उनसे भाग आई और फिर नहीं लौटी थी। दोनों को लगता रहा था कि उनके पास लौटने के लिए कोई जगह नहीं है।

यहां पंकज बिष्ट का उपन्यास उस चिड़िया का नामयाद आता है, जहां नायक पिता की मृत्यु के बाद उनके जीवन को किसी अभियोजन की दृष्टि से देखता रहता है। वास्तव में यह सब अपने ही भीतर झांकने की कोशिश है, अपने को समझने का प्रयास है। अंतिम पृष्ठों में अरविंद और सबीना की बातचीत इसे स्पष्ट कर देती है। सबीना के बहुत छोटे से प्रसंग में मदर मेरी कम्स टु मी’ (अरुंधती राय) की स्मृति भी कोंध जाती है।

उपन्यास के शुरू में पिता का जो फोन आया था कि महेंद्र चाचा की मौत पर अवश्य घर आना क्योंकि तुम दुनिया से कट गए हो’, उसका जवाब अंत में मिलता है, चालीस वर्षों में फैले तमाम स्मृति-मोंताज़ों की उड़ती-भागती यात्रा के बाद, अपने भाई गोविंद से यह कहने में कि गोविंद भाई, पिता जी से मेरे न आने का कोई बहाना बना देना।

आधे सूरज की धूपके बैक कवर पर दर्ज़ है कि सामाजिक-सांस्कृतिक विमर्शों और साहित्य में एक साथ आवाजाही करने वाले नरेश गोस्वामी का यह पहला उपन्यास है जो पिछले दस बरसों में अलग-अलग दिशाओं में भटकने के बाद अंतत: इस ठौर पर पहुंचा है।

और क्या खूब पहुंचा है!मैं इतना और जोड़ना चाहता हूं। शानदार उपन्यास के लिए गोस्वामी जी को बधाई और प्रकाशित करने के लिए सम्भावना प्रकाशन को साधुवाद।

- नवीन जोशी, 25 मई 2026, रामगढ़  

(‘आधे सूरज की धूप’ (उपन्यास), लेखक- नरेश गोस्वामी। सम्भावना प्रकाशन, हापुड़, पृष्ठ 83, मूल्य- 200 रु।)    

      

             

Sunday, May 17, 2026

बहुत बेचैन करता है 'मुरदा घर'

 ‘मुरदा घर’ (जगदम्बा प्रसाद दीक्षित, 1974) ने रात भर सोने न दिया।

  
 
 
कितना कम जानते हैं हम! कितना कम पढ़ा है!
 
शैलेश मटियानी का ‘बावन नदियों का संगम’ पढ़ा था। ‘इब्बू मलंग’, ‘चील’, ‘मिट्टी’, जैसी उनकी कई कहानियां भी पढ़ी थीं। मटियानी जी कभी बम्बई के अपने शुरूआती दिनों के किस्से सुनाते तो कंपकंपी छूटने लगती थी। वे घर से भागकर दिल्ली-इलाहाबाद होते हुए बम्बई पहुंचे थे। 
 
बेटिकट पकड़े गए तो जेल हुई। जेल में जो भी था, कम से कम रोटी मिल जाती थी। रिहा हुए तो भिखारियों के बीच बैठकर भीख मांगी, कूड़े से बीनकर भी खाया। फिर एक ढाबे में जूठे बर्तन मांजते हुए लिखना शुरू किया। उनके उपन्यास-कहानियां इस सबकी गवाह हैं। सोचता था, कि हिंदी में वैसा विकट जीवन जीने और उसका भोगा हुआ लिखने वाला और कौन रचनाकार होगा! 
 
जगदम्बा प्रसाद दीक्षित बम्बई (अब मुम्बई) के सेंट जेवियर कॉलेज में अध्यापक थे। ठीक-ठाक जीवन जिया उन्होंने लेकिन ‘मुरदा घर’ कैसे लिख पाए वे! 
 
स्पष्ट है कि श्रेष्ठ लेखक कितनी ही आंखों से देखता और कितनी ही इंद्रियों से भोगता है! 
 
'मुरदा घर' में एक-दो रुपए और कभी-कभी तो अठन्नी के लिए भी सम्भावित ग्राहकों का हाथ पकड़कर खींचती औरतें, ताकि देह के बदले ही कुछ खाने को मिल जाए। होटलों के पिछवाड़े सड़ा-गला जूठा फेंके जाने का बेसब्री से इंतज़ार करते, उसके लिए आपस में लड़ते, कुत्तों-कौओं को भगाते बच्चे। छोटी-छोटी चोरियां करते, जरायम की दुनिया के सहारे ‘परिवार’ जोड़ने की कोशिश करते मर्द। भीख मांगने के लिए गिड़गिड़ाते एवं आपस में लड़ते भिखारी, अंधे-लूले-कोढ़ी और उनकी कभी क्रूर-कभी अति-मानवीय दुनिया … । इस ‘नर्क’ में सीझता-रिसता-घिसटता जीवन है, सपने हैं उनकी टूटन है और उनकी चुभती किरचें।
 
इन बस्तियों से लगी हुई अट्टालिकाएं और दौड़ती-भागती मोटरें और सभ्य दुनिया है। उनके लिए कलंक बने इस संसार को बार-बार उजाड़ने वाला शासन-प्रशासन है, जेलें हैं और उसके भीतर का दूसरा ही घोर नरक है। 
 
इस सब को प्रामाणिक बनाते दृश्य, बिम्ब, भाषा, संवाद और टूटे-फूटे किंतु मारक वाक्य हैं। शैली ऐसी की आप पढ़ते हुए सिहर-सिहर उठते हैं। 
 
यह 1960-70 के दशक की बम्बई का एक अनिवार्य चेहरा है, जिसका रोंगटे खड़े कर देने वाला वृत्तांत हम मटियानी जी के मुख से सुनते और उनकी रचनाओं में पढ़ा करते थे। जगदम्बा प्रसाद दीक्षित कैसे उसे इतना विश्वसनीय और धड़कता हुआ लिख पाए! 
 
ऐसी ही होनी चाहिए लेखक की संवेदना और जमीनी सत्य को इस बारीकी से पकड़ सकने की उसकी क्षमता।
 
‘मुरदा घर’ का ज़िक्र कुछ समय पहले गंगा शरण सिंह की एक पोस्ट में पढ़ा था लेकिन यह उपन्यास उपलब्ध नहीं हो पा रहा था। परसों नैनीताल में था तो मित्र Rajiv Lochan Sah/नैनीताल समाचार के पुस्तक संग्रह में अचानक इस पर निगाह गई तो तत्काल मांग लाया था। रामगढ़ के डेरे में जो इसे पढ़ना शुरू किया तो फिर रुका न गया। 
 
इससे उपजी बेचैनी लम्बे समय तक साथ रहने वाली है।
 
- न जो, 15 मई 2026, रामगढ़  

Saturday, May 16, 2026

'टनल' - हिमालय के सरोकारों का स्पर्श मात्र

महामाया’, ‘कालीचाट’, गाफिलसमेत कुछ अन्य उपन्यास लिख चुके सुनील चतुर्वेदी ने इस बार हिमालय की घुटती सांसेंको टनलउपन्यास का विषय बनाया है। नवम्बर 2023 में उत्तरकाशी जिले के सिल्क्यारा नामक स्थान में चार धाम राजमार्ग के लिए निर्माणाधीन सुरंग के भीतर भारी भू-स्खलन हो जाने से 41 मजदूर फंस गए थे। उन्हें बाहर निकालने के लिए कई दिन तक कई प्रकार के उपाय किए गए, भारी-भारी मशीनें मंगवाई गईं, देश-विदेश से विशेषज्ञ बुलाए गए लेकिन सब विफल रहे। अंत में रैट होल माइनर्सकी सहायता से सुरंग में फंसे श्रमिक 17 दिन बाद बचाए जा सके थे।  

रैट होल माइनर्सपहाड़ या धरती के भीतर बहुत छोटे से छेद से घुसकर खनन का खतरनाक काम किया करते हैं, जो अवैध घोषित है। जब तमाम विशेषज्ञ और बड़ी-बड़ी मशीनें फेल हो गईं तब यही अवैध काम करने वाले दीन-हीन श्रमिक काम आए थे।

खैर, सुनील चतुर्वेदी ने सिल्क्यारा हादसे के बहाने हिमालय के विनाश और असंगत विकास नीतियों पर सवाल उठाने की कोशिश की है। सिल्क्यारा टनल के बाहर चाय की टपरी चलाने वाले एक बूढ़े की मुंहजबानी सुरंग में फंसे मजदूरों की कहानी शुरू होती है। बीच-बीच में बूढ़ा कभी चिपको आंदोलन के किस्से बयान करने लगता है, कभी टिहरी बांध के विरोध में हुए आंदोलन के बारे में बताता है। यह बूढ़ा कौन है, कोई नहीं जानता। सिल्क्यारा और आसपास के गांव वाले भी नहीं, जो उससे कहानी सुनते हैं और उसके खान-पान एवं सेहत का ध्यान भी रखते हैं।

धीरे-धीरे पाठक अवश्य जान जाता है कि वह बूढ़ा अपनी जवानी में संसार के दुखों से परेशान होकर बुद्ध के मार्ग पर चलने की ठान लेने के बाद हिमालय की ओर आया था। यहां उसे चिपको आंदोलन चलाने वाले सुंदरलाल बहुगुणा, चण्डी प्रसाद भट्ट, घनश्याम सैलानी, धूम सिंह नेगी जैसे लोग मिलते हैं। बूढ़ा विशेष रूप से सुंदरलाल बहुगुणा जैसे संतसे अत्यंत प्रभावित होकर उनके अभियान में शामिल हो जाता है और बाद में उनका विश्वस्त सहायक भी बन जाता है। लेखक भी बहुगुणा जी से बहुत प्रभावित है और यह उपन्यास उनको और उनके जैसे अन्य योद्धाओं को ही समर्पित भी है। 

तो, बूढ़े के मुंह से चंद ग्रामीण (और पाठक भी) सुरंग में फंसे श्रमिकों की कहानी के साथ-साथ चिपको आंदोलन और बाद में टिहरी बांध विरोधी आंदोलन के किस्से सुनते हैं। आप चकित हो सकते हैं कि सिल्क्यारा के निकटवर्ती गांवों में रहने वाले इन लोगों को तीन वर्ष पूर्व हुए उस हादसे के बारे में पता क्यों नहीं है और वे इसे सुनने के लिए अत्यंत लालायित क्यों हैं। खैर, सुरंग में फंसे मजदूरों की मुक्ति के साथ कहानी खत्म हो जाती है और कथा सुनने वालों को हैरत में डालते हुए बूढ़ा किसी रहस्य की तरह अचानक लापता हो जाता है।

यह उपन्यास बहुत उम्मीद के साथ पढ़ना शुरू किया था क्योंकि हमारे योजनाकारों और सरकारों ने विकास के नाम पर शुरू से ही हिमालय के साथ अत्यंत बर्बर व्यवहार किया है। सिल्क्यारा हादसा भी ऐसी ही प्रकृति-विरोधी नीतियों का दुष्परिणाम था। हिमालय ने कई तरह से योजनाकारों को चेताया है, बगावत भी उसने खूब की है लेकिन सरकारों और उनके नीति-निर्धारकों ने लगातार उसकी उपेक्षा की है, अनसुनी की है।

 उम्मीद थी कि सुनील चतुर्वेदी इन तमाम मुद्दों पर गहराई से विचार करेंगे, कथानक में उन विसंगतियों को उभारेंगे और एक विमर्श छेड़ेंगे। लेकिन टनलउपन्यास निराश करता है। सिल्क्यारा हादसा हो या चिपको आंदोलन या टिहरी बांध विरोधी आंदोलन, इसमें मात्र हलके-फुलके विवरणों के रूप में दर्ज़ हुए हैं। चिपको आंदोलन की चंद घटनाओं को छोड़कर उसके विविध आयाम या टिहरी बांध से हुए विस्थापन का विराट दर्द छुआ ही नहीं गया, इनकी गहराई में जाना दूर की बात रही। उन लोगों के जीवन में तनिक भी नहीं झांका गया है, जो विकास की क्रूर विसंगतियों की मार झेलते आए हैं और समय-समय पर कई आंदोलनों के माध्यम से अपना दर्द एवं आक्रोश व्यक्त करते रहे हैं। कहीं-कहीं हलके से यह उल्लेख भर कर दिया गया है कि मैदानों जैसी विकास योजनाएं हिमालयी क्षेत्र के लिए कतई उपयोगी नहीं हैं।

बूढ़े के मुंह से सुने जाते किस्से मात्र सामान्य किस्से बनकर रह गए हैं। जो ग्रामीण इन किस्सों के श्रोता हैं, वे मात्र श्रोता हैं। न ही उनका दैनंदिन जीवन, न उनके कष्ट व संघर्ष और न ही थोड़े सुख और जीवन-रस, कहीं से भी कथा का हिस्सा बन पाए हैं। एक-दो प्रसंगों में फुलदेईपर्व-गीत या एक लोक-कथा का उल्लेख तनिक आशा जगाता है, लेकिन वह भी पर्याप्त जानकारी या शोध के अभाव में प्रामाणिक नहीं बन पाया। रैट होल माइनर्सभी घटनास्थल की तरह ही कथा में भी आते हैं और काम पूरा करके चले जाते हैं। न उनकी बहादुरी और न उनका दयनीय-उपेक्षित जीवन लेखक की निगाह में आ पाया है। एक सचेत लेखक से इसकी उम्मीद नहीं की जाती।

लेखक ने उपन्यास की भूमिका में बताया है कि सिल्क्यारा सुरंग हादसे की खबर मिलते ही वे एक पत्रकार मित्र के साथ सिल्क्यारा पहुंचे और वहां तीन दिन तक रहे थे। इससे उम्मीद बंधी थी कि लेखक की आंख उस समाज और उसके हालात पर गहरी गई होगी। किंतु उपन्यास पूरा पढ़ लेने के बाद लगता है कि यह भी ऊपरी पत्रकारीय रिपोर्ट से आगे नहीं पहुंच सका। 

वे एक लाइन में यह सवाल तो उठाते हैं कि आखिर इस सुरंग वाली सड़क की आवश्यकता किसे है, लेकिन कहीं भी यह उल्लेख नहीं करते कि यह सुरंग प्रधानमंत्री के ड्रीम प्रोजेक्टकहे जाने वाले ऑल वेदर चार धाम रोड प्रॉजेक्टका हिस्सा है, जिसे तमाम मानकों, भू-विज्ञानियों और पर्यावरण विशेषज्ञों की गम्भीर आपत्तियों की अनसुनी करके एक सनक की तरह पूरा किया जा रहा है। और, यह अकेला प्रॉजेक्ट नहीं है, जो हिमालय की क्रमश: बर्बादी का कारण बन रहा है। बहुत पहले से, पहले की सरकारों ने भी हिमालय के साथ ऐसी ही बर्बरता की है। 

पहले कम से कम चिपको या बांध विरोधी या नशा विरोधी जैसे कई आंदोलन जनता ने आक्रामकता के साथ किए थे, अब तो ऐसी सम्भावना ही खत्म कर दी गई है। पहाड़ों के लोग चुपचाप विकास के नाम पर विनाश देखने-सहने को विवश हैं।

ऐसे वृहत्तर प्रश्नों से यह उपन्यास नहीं टकराता और कुछ किस्सों का बयान भर बनकर रह जाता है।

·        (‘टनल’ (उपन्यास), लेखक- सुनील चतुर्वेदी, पृष्ठ 116, मूल्य 225 रु., सम्भावना प्रकाशन, हापुड़।)

- न जो, रामगढ़, 17 मई 2026 

           

Friday, May 15, 2026

170 वर्ष पुराने हिमालय के चित्रों की नायाब प्रदर्शनी

अगर आप आज-कल-परसों (18 मई की शाम तक) नैनीताल या उसके आसपास हों तो समय निकालकर मल्लीताल सी आर एस टी कॉलेज में लगी वह चित्र प्रदर्शनी देखने अवश्य जाएं, जो आपको 170 साल पहले के हिमालय में ले जाएगी। ये केवल उस काल के चित्र नहीं हैं, बल्कि इतिहास-संस्कृति-भूगोल-पर्यावरण-मानव जीवन स्थितियों-वनस्पतियों-आदि-आदि से भी रू-ब-रू कराएंगे। इस प्रदर्शनी को देखना अपने भूगोल और समाज को गहराई से देखने-जानने की मानवीय ललक और उसके लिए किए गए अथक श्रम व समर्पण को भी महसूस करना है।

मोटे तौर पर यह कहानी तत्कालीन प्रूशिया (आज का जर्मनी) के एक ख्यात फील्ड सर्वेक्षक अलेक्जेण्डर हम्बोल्ट के उस सपने से शुरू होती है जो लेटिन अमेरिका और यूरोप के पर्वतों का स्वयं फीड सर्वे कर चुकने के बाद भारतीय हिमालय का अध्ययन कराना चाहते थे ताकि विविध जानकारियों से समृद्ध एटलस तैयार किया जा सके। उन्होंने प्रूशिया के तत्कालीन राजा के माध्यम से ब्रिटिश महारानी और उनके जरिए ईस्ट इण्डिया कम्पनी से सम्पर्क साधा और भूगोल और भूगर्भशास्त्र के अध्येता दो भाइयों, हरमन श्लागिंटवाइट और एडॉल्फ श्लागिंटवाइट को इस काम के लिए तैयार किया कि वे भारतीय हिमालय का अध्ययन-सर्वेक्षण करने के लिए जाएं। दोनों भाई न केवल इस कार्य के लिए तैयार हुए, बल्कि उन्होंने छोटे भाई रॉबर्ट को भी सहायक के रूप में साथ लिया। रॉबर्ट फोटोग्राफी का भी शौकीन था। कैमरे का आविष्कार हुए तब बहुत दिन नहीं हुए थे।

करीब दो साल की तैयारियों के बाद तीनों श्लागिंटवाइट भाई 1854 में भारत पहुंचे। उन्होंने विविध सहायकों की करीब एक सौ लोगों की टीम तैयार की और भारतीय हिमालयी क्षेत्र को तीन भागों में बांटकर तीनों अपने-अपने लिए निर्धारित रास्तों पर निकल गए। उन्होंने अलग-अलग मार्गों पर कोई 18,000 मील की यात्रा की, जो अधिकतर पैदल और कभी घोड़ों पर भी की गई। उन्होंने अपने यात्रा क्षेत्रों के चित्र बनाए, नक्शे बनाए, नदियों-पहाड़ों-झीलों-बस्तियों-पुलों-आदि-आदि के विविध विवरण एवं मानक दर्ज़ करते हुए अपनी डायरियां भरीं। अपने भूगोल अध्ययन और हमबोल्ट के निर्देशों के आधार पर उन्होंने खाके तैयार किए। सभी चित्र व नक्शे तत्काल फाइनल नहीं किए जा सकते थे, इसलिए अपने रफ स्केचों में छोटी-छोटी चीजें भी दर्ज़ कीं, यहां तक कि कौन सी चीज उस समय किस रंग में दिख रही थी।

उनकी इस यात्रा के दौरान ही भारत में 1857 का सैनिक विद्रोह हुआ। जब वे वापस लौटे तो उनके पास साढ़े सात सौ से अधिक नक्शे और चित्र तो मौजूद थे ही, यात्रा मार्ग से बटोरी गई तमाम चीजें भी थीं, जैसे- पत्थर, लकड़ी, वनस्पतियों, आदि के ढेरों नमूने। इनमें असम से लेकर बाल्टिस्तान और लद्दाख, हिमालय की तलहटियों, मिजोरम के खासी हिल्स से लेकर हिमालय-पार के तिब्बत और भूटान तक के चित्र, नक्शे और विविध वस्तुएं शामिल थीं।  

भारत तीन भाई आए थे लेकिन लौटे दो ही। बीच वाले भाई एडॉल्फ को 1857 में काशगर में जासूस होने के शक में मार डाला गया था। अनेक खूबियों वाली इस ऐतिहासिक सर्वे यात्रा का यह अत्यंत त्रासद पक्ष रहा।

खैर, जर्मनी लौटकर वे चित्र रंगों और अन्य विवरणों से पूरे किए गए। रॉबर्ट ने अपने कैमरे से जो फोटो खींची थीं, डेवलप करने के बाद उन्हें भी डायरी में चिह्नित विवरणों के आधार पर रंगीन बनाया गया। एक मूल्यवान ऐतिहासिक काम हो गया था लेकिन 1859 में हम्बोल्ट की मृत्यु हो जाने और फिर प्रूशिया के तत्कालीन राजा का भी पराभव होते जाने से उनके काम को वह मुकाम नहीं मिल सका, जिसकी योजना शुरू में बनाई गई थी।

श्लागिंटवाइट भाइयों के बनाए चित्र काफी समय तक उनके घर में पड़े रहे और फिर जर्मनी के अल्पाइन संग्रहालय में उन्हें सुरक्षित कर दिया गया।

दुनिया के सामने ये ऐतिहासिक चित्र पहली बार 2011 में आए जब बर्लिन में इनमें से कुछ चित्रों की पहली प्रदर्शनी लगाई गई। उस समय बर्लिन की फ्री यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और हिमालय अध्येता हरमन क्राइट्ज़मैन ने अपने परिचित हिमालयविद और पहाड़फाउण्डेशन के प्रोफेसर शेखर पाठक को बर्लिन आमंत्रित किया। प्रो पाठक इन चित्रों को देखकर स्वाभाविक ही उत्फुल्लित हुए और उन्होंने अल्पाइन म्यूजियम में रखी श्लागिंटवाइट भाइयों की तैयार की गई बाकी सामग्री भी देखी। उसी समय उनके मन में इन चित्रों की प्रदर्शनी भारत में लगाने का विचार आया था। आज कोई 15 वर्ष बाद उनका यह सपना साकार हुआ है। यह कैसे सम्भव हो पाया, क्या दिक्कतें आईं, कैसे उनका समाधान किया गया और कितने लोगों ने इसे सम्भव बनाया,  यह अलग से लम्बी कहानी है।

दिल्ली और देहरादून में प्रदर्शन के बाद श्लागिंटवाइट भाइयों के सैकड़ों चित्रों में से करीब एक सौ चुनिंदा चित्र फिलहाल नैनीताल में देखने के लिए उपलब्ध हैं। यह बताना भी जरूरी है कि ये मूल चित्र नहीं हैं। सुरक्षा और संरक्षण की अत्यावश्यक सावधानी के कारण मूल चित्रों की प्रतिकृतियां तैयार करके प्रदर्शित की गई हैं। इन प्रतिकृतियों को 'पहाड़' फाउंडेशन को दान कर दिया गया है। यानी अब ये भारत में ही रहेंगीए और समय-समय पर प्रदर्शित की जा सकेंगी। 

आप इन चित्रों में 1855 के नैनीताल की झलक देख सकते हैं, बहुत बड़े भूस्खलन से मल्लीताल का फ्लैट्स तब तक नहीं बना था और नैनीताल भी एक गांव हुआ करता था। उस समय के बदरीनाथ का चित्र देखकर आप चौंक जाएंगे और पहचान नहीं पाएंगे कि यही आज का बदरीनाथ है। नदियों पर किस मौलिक-प्राकृतिक तकनीक से तब पुल बनाए जाते थे, यह देखना कम रोमांचक नहीं है। बहुत से बौद्ध विहारों, मंदिरों, पठारों, चट्टान-शृंखलाओं, वनस्पतियों, नदियों और समाजों के चित्र हमें 170 साल पहले के समय में ले जाते हैं।

 - नवीन जोशी, रामगढ़, 16 मई, 2026