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Sunday, March 03, 2024

क्या खूब जगमग है 'टूटते तारों तले'

योगेंद्र आहूजा की हाल ही में प्रकाशित पुस्तक 'टूटते तारों तले'  (नवारुण प्रकाशन) को पढ़ना अपने को समृद्ध करना तो है ही, यह आश्वस्ति भी होती है कि हिंदी जगत में ऐसे लेखक हैं जो विश्व साहित्य से भी न केवल अद्यतन रहते हैं, बल्कि उसकी धाराओं, प्रवृत्तियों एवं विचार पद्धतियों की दृष्टि से हिंदी साहित्य की बारीक पड़ताल भी करते हैं। यह पुस्तक, उन्हीं के शब्दों में "कुछ कथेतर गद्य, आलेख और टिप्पणियां, बेतरतीबी के ढांचे में बंधे हुए। कुछ सोच-विचार, सवाल-जवाब, असमंजस, ऊहापोह, दुविधाएं, संशय, यकीन, संस्मरण और आत्म संस्मरण, कुछ वक्तव्य और विवेचनाएं, दुखती धड़कनें, कुछ समय से बातचीत, कुछ अपने आप से" है। 

पहला आलेख ' उसके बारे में' वास्तव में योगेंद्र आहूजा का 'अपने बारे में' है, जिसे पढ़ते हुए उनकी वैचारिक एवं लेखकीय निर्मिति का पता चलता है, उस वैचारिक धरातल व निष्कर्षों का जहां वे पहुंचे, जिन पड़ाओं से होते हुए पहुंचे, और जिस चीर-फाड़ और गहन जांच-पड़ताल से गुजरते हुए पहुंचे। विज्ञान के विद्यार्थी योगेंद्र आहूजा की विज्ञान तथा विज्ञानियों में गहरी दिलचस्पी है, इस सतर्कता के साथ कि छद्म विज्ञान को फटककर बाहर किया जा सके और उन्होंने 'किताबों से कहीं ज़्यादा सिनेमा से पाया है।' निर्मल वर्मा की संगत और उनके लेखन का, बल्कि सही कहा जाए तो उनकी कुछ कहानियों का, उन पर शुरुआत से ही गहरा प्रभाव पड़ा लेकिन क्रमश: प्रखर होती गई सामाजिक-राजनैतिक चेतना ने उन्हें निर्मल वर्मा की वैचारिकी को खारिज करने में देर भी न लगाई। 

अपनी अलग तरह की कहानियों के लिए चर्चित योगेंद्र जी 'कविता के घनघोर पाठक' हैं और ' पिछली शताब्दी की विश्व कविता, उसके विलक्षण कवि लोर्का, ब्रेख्त, नाजिम हिकमत, नेरुदा, रिल्के, चेस्वाव मिवोश, पाल एलुआर, कवाफी, वास्को पोपा, होलुब, अर्नेस्तो कार्देनाल और तादायूश रोजोविच और तमाम अन्य वैसे ही उसकी संवेदना का हिस्सा हैं, जैसे दोस्तोयेवस्की, हेमिंग्वे, हावर्ड फास्ट, बोर्गेस और मार्खेज की कृतियां और मीर, गालिब की पंक्तियां।'  इस पुस्तक में विश्व साहित्य से और भी कितने ही नाम उनकी रचनाओं के सामयिक प्रसंगों-उद्धरणों के साथ उन्होंने उद्धृत किए हैं। कुछ नाम तो मेरे सुने हुए भी नहीं हैं। और हां, वे यह दर्ज़ करना नहीं भूलते कि 'मिलान कुंदेरा नाम के बाजारू लेखक को मैं बिल्कुल पसंद नहीं करता', हालांकि इसके विस्तार में वे नहीं जाते।

यानी योगेंद्र जी खूब पढ़ते हैं और उस पर मंथन करते रहते हैं। उनकी प्रखर विश्लेषण क्षमता ही है जो वे 'हिंदी की वर्तमान कहानी की उजली इबारत पर एक काला धब्बा' देख पाते हैं और यह चिंता प्रकट करते हैं कि 'हमारी कहानी जिन दुष्प्रवृत्तियों और कुरूपताओं के विरोध में है, वह आसानी से उनकी शिकार बनती भी नजर आ रही है।' एक अन्य आलेख में वे बहुत बड़ी बात कहते हैं कि "मेरी तमन्ना कहानीकार होने की नहीं, 'स्वप्नकार' होने की है" और चाहते हैं कि उनकी कहानियों को 'कोरी यथार्थपरक कहानियों की तरह न पढ़ा जाए, बल्कि कहानियों की तरह ही नहीं।' इस तरह वे पाठक के लिए ही नहीं, समीक्षकों के लिए भी एक चुनौती रख देते हैं।

'परे हट धूप आने दे', 'अनसुलझा प्रमेय' और 'टूटते तारों तले' शीर्षक आलेख पढ़ते हुए कुछ प्रसिद्ध कहानियों पर उनकी टिप्पणियां और उनकी परतें उघाड़कर रख देने की उनकी क्षमता ने मुझे विवश कर दिया कि उनमें से कुछ कहानियों को फिर से पढ़ूं और सचमुच मैं विस्मित हुआ। इनमें मुक्तिबोध की 'क्लॉड ईथरली', 'पक्षी और दीमक', 'जलना' एवं 'ब्रह्मराक्षस का शिष्य' और ज्ञानरंजन की 'पिता', 'बहिर्गमन', 'छलांग', 'रचना प्रक्रिया', 'हास्य रस' और 'घण्टा' जैसी कहानियां शामिल हैं। एक अन्य आलेख (एक चिट्ठी के बारे में एक चिट्ठी) में वे रवींद्र नाथ टैगोर की 1914 में प्रकाशित कहानी 'मृणालनेर चिठी' की मृणाल के चरित्र का कई कोणों से विश्लेषण करते और उससे अत्यंत प्रभावित दिखते हैं। लेकिन मुक्तिबोध और ज्ञानरंजन के कथा-कौशल, उनकी भाषा और कहे गए के भीतर छुपी, चीखती खामोशी को जिस तरह विश्लेषित करते हैं, वह मेरे लिए तो सीखने की चीज है।

'एक छुअन की याद'  शब्दों और ध्वनियों  से संगीत-सा रचने वाले प्यारे कवि वीरेन डंगवाल के अस्पताल में भर्ती रहने के समय का एक आत्मीय संस्मरण है। यहां भी दोनों के बीच दो कहानियों की जबर्दस्त उपस्थिति है। योगेंद्र अस्पताल में एक रात वीरेन जी को ब्राजील के लेखक जोआओ गाउमरास की कहानी सुनाते हैं- 'नदी का तीसरा किनारा', जिसे सुनकर वीरेन जी विगलित होते हैं और निष्कर्ष देते हैं कि उस कहानी के सारे मायने तो वाक्यों के बीच हैं। (यह कहानी मुझे जितेंद्र भाटिया के अनुवाद में एक संग्रह में मिल गई।) फिर उन्हें जो दूसरी कहानी सुनाई जाती है, वह है पोलैण्ड के लेखक फ्रिजेश कारिंथी की, जिसका नामोल्लेख नहीं हुआ है। वह एक डॉक्टर (सर्जन) और उसके दो सहायक सर्जनों की कहानी है। उसका अंत इतना मानवीय और हृदयस्पर्शी है कि वीरेन जी की आंखें चमकने लगी थीं और बोले थे - "इसकी फोटोस्टेट देना, यहां सारे डॉक्टरों और नर्सों को दूंगा।" अब मुझे योगेंद्र जी से ही उस कहानी का नाम और उपलब्धता के बारे में पूछना होगा।

इस पुस्तक में तीन और आलेख हैं - जो प्रबोध कुमार के उपन्यास 'निरीहों की दुनिया', रेणु जी के संकलन 'ऋणजल-धनजल' और नेत्र सिंह रावत की यात्रा पुस्तक 'पत्थर और पानी' के बारे में हैं। उसके बाद दो 'सवाल-जवाब' यानी बातचीत हैं, जिनमें कहानी के बारे में योगेंद्र जी के कड़े मानक सामने आते हैं और हिंदी कहानी के अतीत, वर्तमान और भविष्य के बारे में उनकी खरी-खरी भी। 

'टूटते तारों तले' निश्चय ही विचारोत्तेजक किताब है।

- न जो, 03 मार्च 2024

(पुस्तक के लिए नवारुण प्रकाशन से 9811577426 पर सम्पर्क किया जा सकता है।)