(पिछली किस्त से आगे-)
मुझे याद है कि ‘अमृत प्रभात’ जाने
वाले कुछ वरिष्ठ पत्रकार ‘स्वतंत्र भारत’ की तत्कालीन स्थितियों से खिन्न दिखायी देते थे जबकि हमें वे दिन अपनी
पत्रकारिता के स्वर्ण-काल के रूप में याद हैं. जाहिर है कि हालात बदल रहे थे. उन्होंने
और भी बेहतर स्थितियां देखी होंगी. हम सुनते थे उन दिनों के बारे में जब पत्रकारों
के लिए हाजिरी-रजिस्टर नहीं होता था, जब प्रबन्धन के किसी
अधिकारी का सम्पादकीय विभाग का रुख करना बड़ी घटना माना जाता था और सम्पादकीय
साथियों को वेतन लेने के लिए भी ‘मैनेजमेण्ट साइड’ जाने की जरूरत नहीं पड़ती थी. हर पत्रकार के वेतन का लिफाफा पहली तारीख को
समाचार-डेस्क पर आ जाता था.
हमारे समय में भी कुछ साल तक पहली तारीख को खजांची और उनका
सहायक कैश-बॉक्स लेकर वेतन बांटने सम्पादकीय विभाग में आया करते थे. सम्पादक और
उनकी टीम किसी मंदिर के गर्भ-गृह की तरह पवित्र मानी जाती थी. लेखकों का बड़ा सम्म्मान होता था. ‘स्वतंत्र भारत’
के रचनाकारों का पारिश्रमिक कम होता था लेकिन हर मास मनी-ऑर्डर से
भेजा जाता या फिर प्रूफ रीडर अग्निहोत्री जी सूची और रकम कुर्ते की लम्बी जेब में लेकर
घूमते थे. लेखक के कहीं भी दिख जाने पर वे उसे पारिश्रमिक थमाते और हस्ताक्षर लेकर
नमस्कार करते थे. उन्हें यह अतिरिक्त दायित्व अशोक जी ने दे रखा था, जिसे निभाने में अग्निहोत्री जी ने कभी कोताही नहीं की.
‘स्वतंत्र भारत’ में
सीखने-पढ़ने-लिखने का हमें अच्छा माहौल मिला. हमारी टीम के समाचार सम्पादक वयोवृद्ध
चंद्रोदय दीक्षित जी थे, स्वतंत्रता सेनानी और एम एन रॉय के
अनुगामी. वह गाम्भीर्य, धैर्य, अनुशासन
के प्रतीक और स्नेह-पुंज थे. वैचारिक चर्चा उनकी अशोक जी से ही होती थी और उन्हीं
की तरह हमें सिखाने को हमेशा तैयार. उप समाचार सम्पादक शम्भूनाथ कपूर को हमने अपने
वरिष्ठ पत्रकार के रूप में नहीं, संरक्षक ही के रूप में
पाया. डांटना, पुचकारना, समय पर घर
भेजना, किसी बीमार सहयोगी की मदद को दौड़ाना. खेल उनका प्रिय विषय था और जमन लाल शर्मा से पक्की यारी थी. दीक्षित जी और
कपूर साहब शाम को नियमित रूप से कॉफी हाउस जाकर बैठते.
अपने दो मुख्य उप-सम्पादकों से अलग-अलग कारणों से हमारा
विशेष लगाव था. सियारामशरण त्रिपाठी देश-दुनिया के अच्छे जानकार, खबर बनाने को देने से पहले उसका सार समझा देने वाले, नयी पीढ़ी से मुहब्बत करने वाले थे. कभी खैनी की चुटकी, यदा-कदा जिन का घूंट और चाय पीने के लिए दस का नोट भी वही देते.
आईएफडब्ल्यूजे में विक्रम राव के मुकाबिल वही खड़े होते और पराजित होते. नशे की बढ़ती
लत ने बाद में उन्हें कमजोर और बरबाद किया.
युवा और तेज-तर्रार वीरेंद्र सिंह यद्यपि वाम-विरोधी थे
लेकिन बहुत पढ़ाकू होने के कारण हमारे हीरो भी थे. वे सोवियत खेमे के विरुद्ध
अमेरिकी किस्से सुनाते हुए दफ्तर के बाहर घुमाने भी ले जाते लेकिन उनके साथ अपनी
चाय के पैसे खुद देने पड़ते थे. अमेरिकी ‘काउ-बॉय’ अंदाज में
रहने वाले वीरेंद्र सिंह अशोक जी समेत पुरानी पीढ़ी की खिल्ली उड़ाते. बाद में वे ‘स्वतंत्र भारत’ के सम्पादक बने, अमेरिकी सरकार के अतिथि बन कर वहां दौरे पर गये और उसकी प्रशस्ति में ‘अमेरिका-अमेरिका’ नाम से किताब लिखी. फिर नवभारत
टाइम्स ने उन्हें लखनऊ संस्करण निकालने के लिए नियुक्त किया लेकिन वह योजना अमल
में ही नहीं आयी. तब दिल्ली में फ्री-लांसिंग करते हुए एक दिन हृदयाघात से उनका
निधन हो गया. वाम-समर्थक गुरुदेव नारायण हमें शायरी और संगीत के अपने शौक से
प्रभावित करते. अश्विनी कुमार द्विवेद्वी संगीत कार्यक्रमों एवं आकाशवाणी की
साप्ताहिक समीक्षा लिखने के लिए आते थे. वे हमसे खूब बातें करते. सांस्कृतिक
रिपोर्टिंग का कुछ सलीका हमने उनसे सीखा.
राजनीति, साहित्य-संस्कृति, सामाजिक
एवं अन्य विविध क्षेत्रों में सक्रिय नामी लोग ‘स्वतंत्र
भारत’ के कार्यालय आते रहते. कमलापति त्रिपाठी, चंद्रभानु गुप्त, हेमवती नंदन बहुगुणा, क्रांतिकारी मन्मथनाथ गुप्त, पी डी टण्डन, कॉमरेड रुतम सैटिन, रमेश सिंहा, प्रताप भैया, अमृत लाल नागर, भगवती
चरण वर्मा, ठाकुर प्रसाद सिंह, शिवानी,
कृष्ण नारायण कक्कड़, प्रबोध मजूमदार, गिरिधर गोपल, मुद्राराक्षस, गोपाल
उपाध्याय, बीर राजा, रमई काका, अर्जुनदास केसरी, यमुनादत्त वैष्णव ‘अशोक’, परिपूर्णानंद पैन्यूली, सुंदरलाल बहुगुणा, और भी बहुत सारे लोग, शहर के और बाहर से लखनऊ आने वाले. के पी सक्सेना, उर्मिल
थपलियाल, योगेश प्रवीन तब युवा लेखक थे. रचनाकारों की एक बड़ी
पीढ़ी ‘स्वतंत्र भारत’ के ‘बाल संघ’ और ‘तरुण संघ’
से निकल कर पली-बढ़ी.
हमारी युवा टीम के अघोषित लीडर प्रमोद जोशी थे, जो हमसे करीब तीन साल पहले से ‘स्वतंत्र भारत’
में काम कर रहे थे. हजरतगंज के ‘जॉन हिंग’
में प्रवेश करना हो, मद्रास मेस का दोसा खाना
हो या आर्ट्स कॉलेज में आर एस बिष्ट, अवतार सिंह पंवार,
जयकृष्ण, पी सी लिटिल या योगी जी की संगत करनी
हो या चेतना बुक डिपो में दिलीप विश्वास से
किताबों के बारे में पूछना हो, अगुवाई प्रमोद जी की होती.
सीपीआई के कॉमरेड दुर्गा मिश्र प्रमोद जी के नाम ‘न्यू एज’
लेकर आते तो सीपीएम के कॉमरेड जाहिद अली ‘पीपल्स
डेमोक्रेसी’ तथा ‘सोशल सांइटिस्ट’
दे जाते. यह हमारी साझा सम्पति बन जाता. बहुत सारी चीजें समझ में
नहीं आतीं थी लेकिन पन्ने उलटते-पुलटते और अधकचरी बहस करते. देर रात अखबार का नगर
संस्करण छोड़ने के बाद ‘पायनियर’ के गेट
पर सुबह तक चाय पीते रहते या कभी सम्पादकीय विभाग की लम्बी मेज पर अखबारों का तकिया
बनाकर सो जाते. यह सब हमारी पत्रकारिता का परिवेश था, हमारा
स्कूल था.
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अक्टूबर 1978 में दिल का दौरा पड़ने के बाद जब अशोक जी दो
महीने बिस्तर पर थे तब भी मुझे हर सप्ताह ‘परिक्रमा’ लिख कर
राजभवन कॉलोनी के घर में उनके सामने मौजूद रहना पड़ता था. यह रगड़ाई खूब काम हिंदी संस्थान, स्वतंत्र भारतआयी. इस
कॉलम में चुटकियां भी खूब ली आती थीं. एक बार मैंने मुद्राराक्षस पर कटाक्ष कर
दिया था जब उन्होंने सूचना विभाग के सौजन्य से जनता पार्टी की उपल्ब्धियों पर एक
नाटक का मंचन किया था. नाराज मुद्रा जी ने मेरे खिलाफ अशोक जी को चिट्ठी लिखी और
खुद उसे देने आये थे. अशोक जी ने मुझसे सारी बात पूछी और समझाया कि चुटकी लो तो
व्यक्तिगत आक्षेप न हो. ‘परिक्रमा’
स्तम्भ लोकप्रिय हुआ और 1983 में ‘स्वतंत्र भारत’ छोड़ने तक करीब पांच साल मैं इसे लिखता रहा. मुद्रा जी बाद में मुझसे बहुत
स्नेह करने लगे थे.
1977 में प्रदेश सरकार ने ‘हिंदी समिति’
और ‘हिंदी ग्रंथ अकादमी’ को मिला कर हिंदी संस्थान की स्थापना की थी. हजारी प्रसाद द्विवेदी जी
उसके कार्यकारी अध्यक्ष और ठाकुर प्रसाद सिंह निदेशक थे. संस्थान में ‘पत्रकारिता प्रकोष्ठ’ बनवाने में अशोक जी की बड़ी
भूमिका थी. उन्होंने ही इस प्रकोष्ठ से पराड़कर जी के अग्रलेखों का संकलन प्रकाशित
करवाया, जिसके ‘दो शब्द’ में अशोकजी ने लिखा है- “अंग्रेजी के मुहावरों के समतुल्य हिंदी मुहावरों
का प्रयोग उनकी दूसरी विशेषता थी. मुझे याद है कि सन 1944 में महात्मा गांधी के
जेल से छूटने के बाद उनसे बात करने के प्रस्ताव पर वाइसराय ने अपमानजनक शर्तें
लगायीं थीं. तब माननीय श्री श्रीनिवास शास्त्री ने इसकी आलोचना करते हुए लिखा कि
क्या वाइसराय चाहते हैं कि गांधी जी उनके सामने ‘सैक क्लाथ
ऐण्ड ऐसेज’ में जाएं. इस मुहावरे का अनुवाद अनेक अखबारों ने ‘टाट लपेट कर और राख पोत कर जाएं’ किया. किंतु पराड़कर
जी ने लिखा ‘क्या गांधी जी दांतों में तृण दबा कर’ वाइसराय के सामने जाएं.” भाषा के मामले में अशोक जी स्वयं भी इसी परम्परा
के अनुगामी थे. शब्दानुवाद की बजाय हिंदी में रूपान्तरण या भावानुवाद के पक्षधर
थे.
हजारी प्रसाद जी जब हिंदी संस्थान का कार्यकारी अध्यक्ष पद
छोड़ कर चले गये तो अशोक जी को कार्यवाहक उपाध्यक्ष बनाया गया. तब वे रोजाना कुछ
समय हिंदी संस्थान में बैठते थे और अपने कक्ष में ही छोटी गोष्ठियां कराया करते
थे. इनमें बोलने के लिए उन्होंने मुझे भी प्रेरित किया. मैं बहुत संकोची था और कुछ
कहने की इच्छा के बावजूद कतराता था. उन्होंने झिझक तोड़ने में मेरी मदद की.
उन्हीं दिनों अमृतलाल नागर का उपन्यास “नाच्यौ बहुत गोपाल’ प्रकाशित हुआ था. ‘स्वतंत्र भारत’ के लिए आई समीक्षार्थ प्रति अशोकजी ने मुझे पकड़ा दी थी. नागर जी के
उपन्यास की समीक्षा करने की मेरी क्या औकात थी, मगर मैंने
बहुत ध्यान से उसे पढ़ा. उपन्यास की ब्राह्मणी नायिका एक मेहतर से ब्याह करके उसकी
झोपड़-पट्टी में रहने लगती है, लेकिन वहां भी अपने ठाकुर जी
के विग्रह की स्थापना कर पूजा-पाठ करती है. मुझे लगा कि ब्राह्मणी के संस्कार तो
वैसे के वैसे रह गये, उसने दलित के जीवन को अपनाया ही कहां.
फिर इसे दलित-चेतना का उपन्यास कैसे कहें. मैंने ससंकोच अशोकजी से
चर्चा की. उन्होंने सुझाया कि नागर जी से ही मिल कर यह सवाल पूछो. दूसरी सुबह मैं
जा पहुंचा चौक. यूं, नागर जी बहुत सरल और उदार हृदय थे लेकिन
पता नहीं क्यों मेरे इस सवाल पर नाराज हो गये- ‘अभी तुम
बच्चे हो.’ मैं घबराया-सा लौट आया. अशोक जी को बताया तो
उन्होंने कहा था, कोई बात नहीं, तुम
लिखो. अब याद नहीं कि मैंने समीक्षा में अपना वह निष्कर्ष लिखा था या नहीं. वैसे,
मेरी राय आज भी बदली नहीं है. ‘नाच्यौ बहुत
गोपाल’ की तुलना में तब गोपाल उपाध्याय का उपन्यास ‘एक टुकड़ा इतिहास’ दलित चेतना के दृष्टिकोण से बहुत
सशक्त उपन्यास था. हिंदी में तब इस नारे के तहत लेखन शुरू नहीं हुआ था.
अशोकजी ही नहीं, नये पत्रकारों-रचनाकारों को प्रोत्साहित
करने में उस दौर के वरिष्ठ लेखक पर्याप्त रुचि लेते थे. काफी हाउस के एक कोने से,
दीवार पर लगी इस चेतावनी के बावजूद कि ‘लाउडेस्ट
व्हिस्पर इस बेटर दैन अ लो शाउट’, बहसों का शोर और ठहाके
बाहर बरामदे में भी हमें कुछ पाठ पढ़ा देते थे. ठाकुर प्रसाद सिंह के नेतृत्त्व में
सूचना विभाग, सूचना केन्द्र, हिंदी
संस्थान और शहर के कई मुहल्लों में कवि-गोष्ठियां हुआ करती थीं जिनमें नये
रचनाकारों को सुना और प्रोत्साहित किया जाता था.
एक बार मैंने अपनी एक कविता में ‘घड़े के तलवे से’ लिख दिया था. कविता सुना चुकने के
बाद नरेश सक्सेना जी ने पास आकर कहा था कि ‘घड़े के तले से’
होना चाहिए, तलवा तो जूते-चप्पल का होगा. इस
तरह सिखाने-समझाने का माहौल था. एक बार नरेश जी ‘स्वतंत्र
भारत’ में ‘तुगलक नाटक’ की रिपोर्ट पढ़कर लेखक न. जो. को ढूंढते हुए भी दफ्तर
आये थे. मैं तब इसी संक्षिप्त नाम से समीक्षा लिखता था. वह उनसे पहली मुलाकात थी.
मुझे याद है, उन्होंने कहा था कि तुम जरूर विज्ञान के
विद्यार्थी होगे. कुछ लिखे की तारीफ करना और लिखते रहने को प्रेरित करने का उनका
सिलसिला आज तक जारी है. बीर राजा, प्रबोध मजूमदार, राजेश शर्मा, गोपाल उपाध्याय, श्रीलाल
शुक्ल, जैसे रचनाकार नये लेखकों-पत्रकारों को पढ़ते और खूब
प्रोत्साहित करते थे. कभी यशपाल जी से मिलने जाते तो वे कहते थे कि चाहे कागज पर
गोले बनाते रहो लेकिन रोजाना कम से कम दो घंटे बैठ कर नियमित लिखने का अभ्यास करो.
........
कानपुर के, और देश के भी श्रमिक-आंदोलन के लिए छह
दिसम्बर 1977 काला दिन साबित हुआ. जयपुरिया परिवार में वर्चस्व की लड़ाई ने स्वदेशी
कॉटन मिल्स की हड़ताल को भयानक हिंसा में बदल दिया. एक हजार से ज्यादा हड़ताली
मजदूरों पर गोलियां चलीं, कई मारे गये, आगजनी और तोड़-फोड़ के बाद मिलें बंद हो गईं. स्वामित्व की इस जंग का असर लखनऊ
के ‘द पायनियर लिमिटेड’ पर भी पड़ा.
सम्पादकीय स्वतंत्रता पर प्रबंधकीय अंकुश की शुरुआत हो गयी. कॉटन मिल्स के एक
मैनेजर लखनऊ बैठने लगे. इमारत के प्रबंधकीय हिस्से से मैनेजिंग एडिटर सम्पादकीय
हिस्से में आ गये. पायनियर के पहले भारतीय सम्पादक और समूह के सम्माननीय संरक्षक व
सलाहकार, बुजुर्ग एस एन घोष को एक छोटे कक्ष में
स्थानान्तरित करके उनके विशाल कक्ष में मैंनेजिंग एडिटर की दमदार आवाज गूंजने लगी.
थोड़ी-थोड़ी देर में ‘चपरासीssss’ की
उनकी कर्कश चीख हमारे कानों को चीरती थी.
अशोकजी और मैनेजिंग एडीटर डॉ के पी अग्रवाल के अगल-बगल के कक्ष
एक नन्ही खिड़की से जोड़ दिये गये थे. सलाह-मशविरे होते रहते होंगे. एक सुबह डॉ
अग्रवाल सीधे सम्पादकीय विभाग में आ पहुंचे. जिला डेस्क के प्रभारी वीरविक्रम
बहादुर मिश्र से उन्होंने कहा- ‘गोण्डा से शिकायत आ रही है कि वहां की खबरें
कम छप रही हैं, क्या बात है? ध्यान दीजिए.’
जोर से बोलने वाले डॉ अग्रवाल की आवाज अपने कक्ष में बैठे
अशोक जी ने सुन ली. उस दिन दोनों कक्षों के बीच की खिड़की शायद नहीं खुली. अशोक जी
के कमरे से एक कागज सेवक के हाथों बगल के कक्ष में पहुंचा. थोड़ी देर में वही कागज
सेवक के ही हाथों डॉ अग्रवाल के कमरे से अशोक जी के कमरे में वापस आया. कुछ समय
बाद अशोक जी के निर्देश से वह कागज सम्पादकीय निर्देशों के रजिस्टर में नत्थी हो
गया.
अशोक जी ने लिखा था- ‘प्रिय डॉ अग्रवाल,
आपको सम्पादकीय विभाग के किसी सदस्य से कोई भी बात मेरे ही माध्यम
से कहनी चाहिए.’
डॉ अग्रवाल ने विनम्र शब्दों में अपने हाथ से लिखा था- “प्रिय
अशोकजी, आपका मान रहे, आगे
ऐसा ही होगा.’
हमने अशोकजी पर गर्व किया और मान लिया कि अब कोई हस्तक्षेप
नहीं होगा. वह हमारी भूल थी. वक्त करवट ले चुका था.
अक्टूबर, 1978 में इण्डियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग
जर्नलिस्ट्स का राष्ट्रीय सम्मेलन चित्रकूट में हुआ था. अशोक जी अतिथि के रूप में
उसमें शामिल होने गये थे. वहां उन्हें दिल का दौरा पड़ा. तत्कालीन पेट्रोलियम एवं
रसायन मंत्री हेमवती नन्दन बहुगुणा भी सम्मेलन में मौजूद थे. उनके हेलीकॉप्टर से
अशोक जी को लखनऊ लाया गया. जब वे हृदयाघात से उबरते हुए घर पर आराम कर रहे थे तभी
उन्हें बताया गया कि वे अब ‘स्वतंत्र भारत’ के सम्पादक का दायित्व उठाने की स्थिति में नहीं हैं. उन्हें हटाने का
रास्ता शायद कब से ढूंढा जा रहा था. फिर ऊपर जो भी घटित हुआ होगा, अशोकजी को ‘परामर्शदाता’ बना
दिया गया और उनके सम्पादन में ‘स्वतंत्र भारत सुमन’ साप्ताहिक निकालने का भी फैसला किया गया. अशोक जी ने ‘सुमन’ निकालने में भी अपने सम्पादकीय कौशल, अनुभव और सम्पर्कों का बढ़िया इस्तेमाल किया.
रवींद्रालय में ‘सुमन’ का लोकार्पण
कार्यक्रम था. अंत में अशोकजी ने मंच से घोषणा की कि ‘सुमन’
का प्रवेशांक हॉल के बाहर ‘श्री इंदु अग्रवाल’ से प्राप्त किया जा सकता है. इंदु अग्रवाल कार्यालय सहायक थीं. सुनने
वाले सभी चौंके थे और हमने सोचा था इंदु के लिए अशोक जी के मुंह से ‘श्री’ गलती से निकल गया होगा. बाद में हमने पूछा तो
उन्होंने बताया कि ‘कुमारी’ और ‘श्रीमती’ अंग्रेजी के ‘मिस’
और मिसेज’ के लिए प्रचलित हो गया है लेकिन
हिंदी में महिला-पुरुष दोनों के लिए ‘श्री’ उपयुक्त है. ‘कुमारी’ या ‘श्रीमती’ न लिखना हो तो ‘श्री’
और भी उपयुक्त है. तब तक ‘सुश्री’ का चलन शायद नहीं हुआ था.
साप्ताहिक पत्रिका ‘स्वतंत्र भारत सुमन’ अप्रैल,
1979 में शुरू हुई और पसंद की जाने लगी थी लेकिन अशोक जी का दोतरफा
घायल दिल ज्यादा बर्दास्त नहीं कर सका. 18 अगस्त, 1979 को 63
साल की अवस्था में उनका देहांत हो गया.
.........
अशोकजी का स्नेह-सानिध्य हमें दो साल ही मिल पाया. ये दो
साल बहुत महत्वपूर्ण और मजबूत नींव डालने वाले साबित हुए. उनका शिष्य होना कितना
मानी रखता है, यह हमें मई 1978 में दैनिक हिंदी ट्रिब्यून
के इण्टरव्यू में पता चला. चण्डीगढ़ से हिंदी ट्रिब्यून के प्रकाशन का विज्ञापन देख
कर मैंने और मनोज तिवारी ने आवेदन भेज दिया. वहां से इण्टरव्यू का बुलावा आ गया.
हमने जाने से पहले अशोक जी को बताना ठीक समझा. उन्होंने कहा कि खर्चा दे रहे हैं
तो चण्डीगढ़ घूम आओ. इंटरव्यू बोर्ड में प्रेम भाटिया, मदन
गोपाल जैसे वरिष्ठ सम्पादक थे. उन्होंने हमारे बारे में कम, अशोकजी
के बारे में ज्यादा बातचीत की और हमें पूरे वेतनमान पर (जो करीब साढ़े छह सौ रु था)
उप-सम्पादक बनाने को राजी हो गये. ‘स्वतंत्र भारत’ में हमें तब चार-सौ रु मिलते थे. अशोक जी की बात मान कर हम एक दिन चण्डीगढ़
घूम कर वापस लौट आये.
अशोकजी के बारे में बहुत सी बातें हमने उनके निधन के बाद
जानीं. जैसे, यह कि वे अच्छे लेखक और अनुवादक, बल्कि श्रेष्ठ ‘रूपान्तरकार’ थे, कि हास्य-व्यंग्य उनका प्रिय
विषय था और ‘हजामत का मैच’ नाम से उनका
व्यंग्य-संग्रह प्रकाशित हुआ था, कि बच्चों के लिए उन्होंने
कुछ कहानियां लिखी थीं, कि संस्कृत महाकवि बाणभट की ‘कादम्बरी’ समेत संस्कृत से भी कुछ अनुवाद किये
(बच्चों के लिए ‘कादम्बरी’ का अत्यन्त
सरल अनुवाद केंद्र सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के प्रकाशन विभाग से 1974
में इसी शीर्षक से प्रकाशित हुआ था), कि ‘रणभेरी’ नाम से उनकी कविताओं का कविता संग्रह छपा था,
कि उन्होंने ‘हू इज कैलीडासा’ समेत कई व्यंग्य एकांकी लिखे, कि सत्रह साल भारत
सरकार की सेवा में रहते उन्होंने दूसरे नामों से ‘जनसत्ता’
समेत कई पत्रों में बहुत कुछ लिखा (1953-55 के
दौरान वेंकटेश नारायण तिवारी के सम्पादन में ‘जनसत्ता’
प्रकाशित हुआ था. प्रभाष जोशी के सम्पादन में ‘जनसत्ता 1984 में दोबारा निकला), कि उन्होंने रजनी
कोठारी की चर्चित पुस्तक ‘पॉलिटिक्स इन इण्डिया’ का हिंदी रूपांतरण (भारत में राजनीति) किया था
(कोठारी की ‘भारत में राजनीति’ पढ़ते हुए कहीं भी यह नहीं लगता कि यह हिन्दी की मौलिक पुस्तक नहीं है), कि हिंदी टेलीप्रिण्टर का की-बोर्ड बनाने में उनकी सहायता ली गयी थी,
कि आकाशवाणी से हिंदी में क्रिकेट का आंखों का हाल सुनाने वाले सबसे
पहले कमेण्टेटर वे ही थे, कि ‘चौका’
और ‘छक्का’ उनके दिये
हुए नाम हैं, कि केंद्र सरकार के सूचना विभाग में रहते हुए
उन्होंने हिंदी अखबारों की अंग्रेजी विज्ञप्तियों पर निर्भरता खत्म की थी, कि प्रकाशन विभाग में उप-निदेशक बनने के बाद उन्होंने ‘आजकल’ एवं ‘बाल-भारती’ पत्रिकाओं को स्तरीय बनाया था, आदि-आदि.
उनका ज्यादातर काम आज तक बिखरा पड़ा है. कुछ चीजों के
दस्तावेज ही उपलब्ध नहीं हैं. मसलन, यही ठीक-ठीक पता नहीं कि उन्होंने हिंदी में
पहली बार किस क्रिकेट मैच का आंखों देखा हाल आकाशवाणी से सुनाया था. अंग्रेजी
कमेण्टेटर विजी (महाराज विजयनगरम) के साथ
हिंदी में सुनाया अवश्य था, यह उन्होंने ‘स्वतंत्र भारत’ की रजत जयंती के अवसर पर लिखे लेख
में खुद भी बताया है –“आकाशवाणी से क्रिकेट का आंखों देखा हाल सुनाने का सुझाव
सबसे पहले ‘स्वतंत्र भारत’ ने दिया और
इन पंक्तियों के लेखक ने रेडियो पर पहली बार हिंदी में क्रिकेट के खेल का हाल सुना
कर नई परम्परा की शुरुआत की.” एक अनुमान
है कि वह 23 से 26 अक्टूबर, 1952 में भारत-पाकिस्तान
के बीच लखनऊ में खेला गया टेस्ट मैच रहा होगा. उधर, अशोकजी
के पुत्र अरविंद को ऐसा स्मरण है कि पिताजी एमसीसी (मेलबोर्न क्रिकेट क्लब,
इंग्लैण्ड की क्रिकेट टीम पहले इसी नाम से जानी जाती थी) के साथ हुए
मैच का हिंदी में आंखों देखा हाल सुनाने का जिक्र करते थे. उनके द्वारा हिंदी में
रूपांतरित कुछ अन्य पुस्तकों की पुष्टि होना भी बाकी है. माखनलाल चतुर्वेदी
पत्रकारिता विश्वविद्यालय की शोध वृत्ति के तहत अशोक जी पर हुआ अध्ययन भी
सुनी-सुनाई बातों और अपुष्ट जानकारियों तक सीमित रह गया.
हास्य-व्यंग्य के प्रति अशोक जी की सुरुचि ‘स्वतंत्र भारत’ के अत्यंत लोकप्रिय दैनिक स्तम्भ ‘कांव-कांव’ से भी पता चलती थी. शुरू में इसका नाम ‘काकभुशुण्डि उवाच” था और अशोक जी
स्वयं इसे लिखते थे. बाद में इसका नाम ‘कांव-कांव’ रखा गया और सम्पादकीय टीम के बलदेव प्रसाद मिश्र, योगींद्रपति
त्रिपाठी, अखिलेश मिश्र समेत बेधड़क बनारसी जैसे हास्य लेखक
भी इसमें योगदान करने लगे. खबरों के शीर्षकों, नेताओं के
बयानों और दैनिक घटनाओं पर छोटी किंतु चुटीली गद्य-पद्य टिप्पणियों वाला यह स्तम्भ
अखबार की पहचान बना, नई पीढ़ियां इससे जुड़ती गईं और शायद ही यह
स्तम्भ कभी बंद हुआ हो. 2002 में जब मैं ‘हिंदुस्तान’ का स्थानीय सम्पादक बनकर पटना गया तो जनरल मैनेजर के पी अग्रवाल के आग्रह
पर, जो 1975 में लखनऊ के पायनियर प्रेस में रह चुके थे,
‘कांव-कांव’ वहां भी शुरू किया, जिसे बिहार में बहुत पसंद किया गया. बाद में इसी तरह का दैनिक स्तम्भ लखनऊ
के ‘हिंदुस्तान’ में ‘लखनलाल के तीर’ नाम से चलाया.
अशोकजी पत्रकारों की आर्थिक और कार्य स्थितियों के लिए भी
चिंतित रहने वाले सम्पादकों में थे. 1948 में यूपी वर्किंग जर्नलिस्ट्स यूनियन की
स्थापना में उनका भी योगदान था. उन्होंने इसके पहले सम्मेलन में सक्रियता से भाग
लिया और उसका संविधान बनाने में मदद की थी. श्रमजीवी पत्रकारों के संगठनों के
सम्मेलनों मे वे अंत तक शिरकत करते रहे थे. एक सम्मेलन में ‘विश्वमित्र’ के सम्पादक फूलचंद्र अग्रवाल ने
पत्रकारों को श्रमजीवी कहने पर आपत्ति की तो अशोक जी ने उस पर व्यंगात्मक टिप्पणी
तक लिखी थी.
......
हमारे दौर के अशोकजी का ‘स्वतंत्र भारत’
यानी 1977-79 का अखबार अपनी राजनैतिक रिपोर्टिंग में शासन-प्रशासन
का निर्मम आलोचक नहीं लगता था. ‘स्वतंत्र भारत’ के शुरु-शुरु के अंक पलटते हुए उसकी खबरें तीखी लगती थीं. सन 1947 के
किसी अंक का पहले पेज का एक शीर्षक अभी तक याद है- ‘त्यागी
नेताओं को नवाबी ठाठ का शौक’. खबर यह थी कि देश की नयी
सरकार के मंत्री अपने बंगलों के लिए विदेशी कालीन और फर्नीचर मंगा रहे हैं. खबर
आक्रामक अंदाज़ में लिखी गयी थी. अखबार के यह तेवर अशोक जी के
दूसरे कार्यकाल में नहीं रह गये थे. 1977 में हम युवा ‘स्वतंत्र
भारत’ की राजनैतिक रिपोर्टिंग से बहुधा असंतुष्ट रहते थे,
जो हमें अक्सर सत्ता-मुखी लगती थी. एकमात्र विशेष सम्वाददाता
शिवसिंह ‘सरोज’ की खबरें अति सामान्य
और कभी मुख्यमंत्री की प्रशंसा में होतीं थी. हलकी-फुलकी आलोचना यदा-कदा ही छपती
थी. दूसरे सम्वाददाता भी उन्हीं की लकीर पर चलते थे. तब भी, स्थितियां
आज की तरह समर्पण या सौदे वाली कतई नहीं थी. सम्पादकों-पत्रकारों की ठसक कायम थी.
हां, अपने सम्पादकीयों में अशोकजी बहुत निर्मम, कटु आलोचक हो जाते थे.
अशोकजी स्वतंत्रता पूर्व की उस पीढ़ी के सम्पादक थे जिनका
अपने समय के राजनैतिक नेताओं से घनिष्ठ सम्पर्क, बल्कि दोस्ताना
रहा था. यह दोस्तियां अखबार में लगभग नहीं निभाई जाती थीं, यह
भी कहा जाता था. लेकिन सन 1947 से 1977 आते-आते बहुत कुछ बदल गया था.
सम्पादक-नेताओं के रिश्ते ही नहीं, अखबार मालिकों के अपने
स्वार्थ भी हावी हो रहे थे. यह संतुलन अशोकजी ने निश्चय ही साध रखा होगा यद्यपि
सता-प्रतिष्ठान से अपने लिए सीधे कोई लाभ उन्होंने नहीं लिया. तब भी प्रबंधन उनका
विकल्प तलाशने लगा था, यह बाद की स्थितियों ने साबित किया.
1947 से 1979 का समय हिंदी पत्रकारिता के मिशन से
व्यावसायिक बनने का दौर था. पत्रकारिता, अखबार घराने और उनके मूल्य सब क्रमश: बदल
रहे थे. पत्रकारिता कुछ नये औजार और कौशल पा रही थी तो कुछ मूल्य छूट रहे थे.
पत्रकारिता की भाषा के रूप में हिंदी विकसित हो रही थी तो विकृत भी बन रही थी. इस
क्रम में नयी-पुरानी पीढ़ी के टकराव भी हो रहे थे.
समाज भी इस दौरान बहुत बदला. मध्य-वर्ग और बाजार क्रमश:
बढ़ा. शिक्षा ने अन्तरराष्ट्रीय दरवाजे ज्यादा खोले तो भारतीय शहरों में यूरोप और
पश्चिमी दुनिया का प्रभाव बढ़ा. गांवों से शहरों की ओर पलायन बढ़ा. अखबारों का आकार
और प्रसार भी. बदलते भारत के इस दौर की पत्रकारिता में अखबार शहरी मध्य-वर्ग के
ज्यादा करीब होते गये. अखबारों ने उद्योग
का रूप लेकर मुनाफे की राह पकड़ी. इस प्रयास में समाज के पिछड़े वर्गों, दलितों, आदिवासियों, महिलाओं,
किसानों और गांवों को हिंदी के अखबार भी भूलते गये या हाशिये पर रखे
रहे. (स्वतंत्र भारत में 1979 तक प्रति सप्ताह छपने वाली ‘गांव
की चिट्ठी’ धीरे-धीरे गायब हो गयी). उन दिनों रघुवीर सहाय के
सम्पादन में टाइम्स ऑफ इण्डिया समूह का ‘दिनमान’ जरूर हमें महिलाओं एवं दलित-वंचित वर्गों को देखने की नयी दृष्टि दे रहा
था. ज्यादातर हिंदी अखबारों का इनके प्रति नजरिया दकियानूसी बना रहा.
आपातकाल के बाद, 1977 से हिंदी पत्रकारिता का पूरा परिदृश्य
बहुत तेजी से बदला. इमरजेंसी ने मध्य वर्ग की राजनैतिक चेतना को झकझोरा था जिससे
पत्र-पत्रिकाओं की पाठक संख्या में भारी वृद्धि होने लगी. कई नये अखबार और
पत्रिकाएं प्रकाशित हुए. लखनऊ में जहां, 1977 तक सिर्फ ‘स्वतंत्र भारत’ और ‘नवजीवन’ दैनिक प्रकाशित होते थे (आरआरएस से सम्बद्ध एक ‘तरुण
भारत’ भी था) वहीं 1980 आते-आते ‘दैनिक
जागरण’ और अमृत प्रभात’ ने भी अपने प्रेस
जमा लिये. उसके दो-तीन वर्ष बाद ‘नव भारत टाइम्स’ और ‘राष्ट्रीय सहारा’ भी आ
गये. पत्रकार और पत्रकारिता, दोनों की स्थितियों में बड़े
बदलाव दिखने लगे थे.
अशोक जी के साथ पराड़कर युगीन पत्रकारिता के अवशेष भी खत्म
हुए थे. नया दौर हर स्तर पर बड़े उलट-फेर करने की मुकम्मल तैयारी के साथ आ रहा
था. (समाप्त)
-नवीन जोशी
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