
हम यह मान रहे हैं, जैसा प्रदेश की योगी
सरकार जोर-शोर से दावे कर रही है कि उसने नकल विहीन परीक्षा कराने के लिए जो सख्त
कदन उठाए हैं, उनकी वजह से परीक्षा छोड़ने वाले छात्रों की
संख्या बढ़ी है. हर साल बडी संख्या में छात्र परीक्षा छोड़ते हैं. पिछले वर्ष कोई साढ़े
पांच लाख छात्र गायब रहे. इस बार उनकी संख्या सबसे ज्यादा है. नकल रोकने के उपायों
का असर हुआ लगता है.
पहले आंकड़ों की बात. बोर्ड परीक्षाएं छह फरवरी को शुरू
हुईं. पहली पारी में दसवीं के गृह विज्ञान का पर्चा था. दूसरी पारी में इण्टर के
हिंदी साहित्य का पर्चा था. पहले दिन जिन एक लाख 80 हजार छात्रों ने इम्तहान छोड़ा, उनमें एक लाख 27 हजार इण्टर के थे. यानी एक
लाख 27 हजार विद्याविद्यार्थियों ने इण्टर,हिंदी साहित्य का
पर्चा छोड़ दिया. दूसरे दिन, सात फरवरी को 10वीं और12वीं के
सवा दो लाख परीक्षार्थी अनुपस्थित रहे. इनमें से 99 प्रतिशत छात्र 10वीं के थे
जिन्हें उस दिन प्रारम्भिक हिंदी का पर्चा देना था. तीसरे दिन दो लाख 53 हजार
छात्र इम्तहान देने नहीं गये. इनमें दोनों कक्षाओं के दो लाख 34 हजार छात्रों को
हिंदी और सामान्य हिंदी का पर्चा देना था.
परीक्षा में अनुपस्थित होने के कई कारण होते हैं.
स्कूल-कॉलेज कई कारणों से परीक्षार्थियों का फर्जी पंजीकरण कराते है. प्रवेश-पत्र
न मिलने के भी हजारों मामले सामने आते हैं. नकल करने-कराने की सुविधा न मिलना बड़ा
कारण है.
तो, क्या यह निष्कर्ष सदमा नहीं पहुंचाता
कि हाई-स्कूल-इण्टर के बहुत सारे विद्यार्थी हिंदी में भी नकल करना चाहते हैं.
विज्ञान के विषय, गणित, अंग्रेजी, आदि कठिन माने जाते हैं लेकिन ‘अपनी’ हिंदी? हिंदी में भी नकल?
यह स्कूलों की पढ़ाई पर तो सवाल है
ही. उससे ज्यादा अपनी भाषा के मामले में भी हमारी नयी पीढ़ी की दरिद्रता का परिचायक
है. हिंदी भाषी प्रदेश के अधिकसंख्य बच्चों को हिंदी नहीं आती. हिंदी पढ़ने में भी
उनकी रुचि नहीं. 10वीं और 12वीं के हिंदी पाठ्यक्रम में क्या होता है? हिंदी साहित्य से कुछ कहानी, कविता, साहित्यकारों की जीवनी, व्याकरण, निबंध लेखन, आदि. सामान्य हिंदी का पाठ्यक्रम
और सरल होता है. नयी पीढ़ी को इसमें कोई रुचि नहीं. इसके अलावा और क्या निष्कर्ष
निकाला जा सकता है? स्कूलों में ठीक से पढ़ाई नहीं होती, मान लिया. मगर रुचि होती तो बच्चे
खुद भी हिंदी पढ़ते.
आम किस्सा है कि मध्यवर्ग के बच्चे
भी हिंदी की गिनती, पहाड़ा, आदि नहीं जानते. उन्हें ‘अट्ठाईस’ जैसी गिनती अजूबा लगती है. ‘ट्वैण्टी एट’ कहना पड़ता है. ऐसा नहीं, कि वे अंग्रेजी अच्छी तरह जानते
हों. अच्छी अंग्रेजी जानने वाले को भी हिंदी आनी ही चाहिए. वह अपनी भाषा है. यहां
तो अंग्रेजी-गणित तो छोड़िए, हिंदी में भी नकल का ही सहारा है.
अपनी भाषा से कटी और निरंतर दूर
होती यह कैसी पीढ़ी तैयार हो रही है? जड़ें खोखली हो जाएंगी तो वृक्ष कैसे पनपेगा-बढ़ेगा और कैसे
टिकेगा?
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