(पिछली किस्त से आगे-)
तो, वह रुक्का जब दूसरी बार पढ़ा तब जोहारदा
सामने आ खड़ा हुआ. आहा! यह जौहर राम पुत्र झुस राम तो हमारा
वही जोहारदा है. अच्छा, तो उसका नाम जौहर राम था, जैसा कि पं दया कृष्ण तेवाड़ी जी ने लिखा है! या हो सकता है उसका नाम जवाहर
राम हो, जो बोलचाल में जौहर राम या जोहार राम हो गया हो. यह
भी उसी दिन जाना कि अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ जिले की सीमा हमारे गांव को विभाजित करती
थी. नया जिला बनने पर हम पिथौरागढ़ जिले में आ गये और आधा किमी दूर जोहार दा का आमड़
अल्मोड़ा जिले में रह गया था. खैर.
सामान्यतया वह जोहारदा ही कहलाता था. ठेठ गंवई उच्चारण में उसके समवय लोग उसे ‘ज्वेहरी’ कहते थे. कम उम्र वाले कभी उसे ज्वेहरी कह बैठते तो सयाने लोग डांट देते थे- “जोहारदा नहीं कह सकते, तुम्हारे बड़बाज्यू सानिक है वह.’ लेकिन उसे जोहार बड़बाज्यू नहीं कहा जाता था, जैसा कि हम अपने दादा की उम्र के लोगों से कहते थे. बहरहाल, बड़े लोग भी उसका नाम सम्मान से लेते थे.
अच्छा, तो जोहारदा उस रुक्के से बंधा हुआ हमारा हलवाहा था! उससे पहले कोई जीतराम हमारा हलवाहा था, किसी बाहर गांव का, जो सारे रुक्के छोड़कर कहीं भाभर की तरफ चला गया था. उसकी बहुत धुंधली याद है. उसके जाने के बाद ही बाबू ने जोहार दा को इस रुक्के से बांध कर अपना हलवाहा बनाया होगा. जोहारदा का परिवार हमारे गांव का एक मात्र शिल्पकार परिवार था. छोटे-बड़े चार लड़कों, दो लड़कियों और अपनी पत्नी के साथ वह ऐसे कितने ही रुक्कों से बंधा हुआ होगा. उसके सभी लड़के हल चलाते थे. सिर्फ तीसरे नम्बर के लड़के ने शायद इण्टर तक पढ़ाई की थी और बाद में शहर जाकर नौकरी भी. बाकी सब गांव में रह कर हल चलाते, मजदूरी करते या कभी जंगलात की कटान-चिरान में चले जाते. मुझसे उनकी मुलाकात हर साल गर्मी की छुट्टियों में गांव जाने पर ही होती.
जोहारदा का सबसे छोटा लड़का बहादुर कुछ परिवारों के जानवर चराने जंगल ले जाता था. जब कभी मैं ग्वालों के साथ जंगल जाता तो देखता कि दूसरे ग्वाले उसे दिन भर खूब सताते थे. वे सब कहीं बैठ कर ताश खेलते या हुक्का-बीड़ी पीते और बहादुर को दौड़ाते रहते. वह सबके जानवरों को देखता. कभी उससे कहते- ‘ओ डूम, जा उस गांव से नाशपाती चुरा ला.’ कभी आड़ू मंगवाते. दिन भर वह उनके आदेशों पर दौड़ता रहता और पकड़ा जाने पर मार या गालियां खाता. एक दिन उसने किसी काम से मना कर दिया तो सबने मिलकर उसकी पिटाई की और गला दबा कर उसके खुले मुंह में बारी-बारी से थूका. बहादुर को रोता छोड़ वे सब एक गधेरे के पानी से शुद्ध होने गये थे.
-‘जोहरा!’ स्त्रियां उससे निवेदन करतीं- ‘एक-दो दिन बाद आना, लेकिन आना तू ही, हां! किसी लड़के को झन लगा देना.’
उसका कोई बेटा जुताई करने आ जाता तो लोग सतर्क हो जाते. ‘बैलों को ऐसे मत मार खिमुआ,’ उनको बार-बार कहना पड़ता- ‘तेरा बौज्यू बैलों को एक सिकड़ा नहीं लगाता. तूने सुबह से चार सिकड़े तोड़ डाले.’
जोहारदा की बात ही कुछ और थी. बैल उसके इशारे पर चलते थे और हल का फाल खेत को फर-फर ऐसे चीरता था कि मजाल है जो दो ‘स्यू’ के बीच अनजुती जमीन रह जाए. बड़े-बड़े मरकहे बैल गांव में थे, जिनको उनके किल (खूंटे) पर सिर्फ उनकी गुस्याणी बांध सकती थी और जिनके कंधे पर जुआ सिर्फ जोहारदा रख सकता था. कुछ बैल ऐसे पाजी थे कि जुते-जुते बीच खेत में बैठ जाते. जोहारदा जानता था कि किस बैल को सिर्फ पुचकार कर खड़ा किया जा सकता है और कौन ‘भ्यरहान’ नाक में मिर्च ठूंसे बिना उठता ही नहीं.
जोहारदा जानता था कि किसके खेत कहां-कहां हैं. वह हर ‘ओड़ा’ पहचानता था और यह भी किस खेत में किस जगह मिट्टी के नीचे बड़ा पत्थर है जो सावधान न रहने पर ‘नश्यूड़’ तोड़ डालता है.
दरअसल, जोहारदा सिर्फ हलवाहा नहीं, अनुभवी, निष्ठावान और समर्पित किसान था. खेत में बीज वह इस खूबसूरती से छिड़कता था कि पौधे बराबर दूरी पर सिलसिलेवार उगते. उसकी बोई फसल अलग से पहचान में आ जाती. वह मौसम का रुख और मिट्टी की तासीर पहचानता था.
-‘जोहारदा, मडुवा भाड़ने का समय नहीं हुआ अभी?’ स्त्रियां पूछतीं. प्रवासी पतियों की अनुपस्थिति में घर-गृहस्थी से लेकर खेती-बाड़ी तक सब उन्हीं की चिंता जो ठहरी. इसलिए वे जोहारदा से सलाह करती रहतीं. जोहारदा आसमान की तरफ देखने के बाद कहता- ‘पहा.. अभी जल्दी मत मचाओ, ये बादल तो चल-बसंत हुआ..’
-‘जोहारदा, धान पिछड़ रहे हैं, कब बोओगे?’ वह एक लकड़ी या अंगुली से खेत की मिट्टी खुरचता. नमी की गहराई जांचता, फिर सलाह देता. ‘पहा...दो-चार घाम खाने दो अभी मिट्टी को.’
‘पहा’ उसका तकिया कलाम था, जिसके बिना शायद ही एक वाक्य पूरा होता हो.
वर्षा पिछड़ जाती तो वह गांव भर के लिए परेशान होता. आसमान की ओर देख कर बुदबुदाता- ‘क्या मंशा है, पहा... नहीं खाने देता अबकी?’ रास्ते चलते वह खेतों की जांच करता रहता. अंगुली से खोद कर उगते बीजों के अंकुर खोजता और खेत मालिक के दरवाजे पर हाजिर हो जाता- ‘तुम्हारा बीज कुछ खराब लगता है... पहा... थोड़ा-सा अच्छा बीज मंगा कर भिगा देना. दन्याले के समय छिड़कना पड़ेगा.’ अच्छा बीज किसके यहां बचा है, यह सुराग भी वही देता- ‘यो, पहा... सुबदार ज्यू की बौराणी के पास बचा है बिलाड़ (धान की एक किस्म) का अच्छा बीज.’
उस उपराऊं और पथरीली जमीन पर फसल ससुरी अपनी ही जैसी होती थी मगर जोहारदा अपना सारा ज्ञान और अनुभव बांटता फिरता था. इसीलिए तो सब चाहते थे कि हल-दन्याला लगाने उनके यहां जोहारदा खुद आये. वह आता तो सारी चिंता मिट जाती.
परन्तु जोहारदा तो एक ही था न!
बस, एक चीज थी जहां जोहारदा बेईमानी कर बैठता था. वह खाने का बहुत शौकीन था और गुस्याणियों के हाथ का स्वाद पहचानता था. बुवाई के व्यस्त दिनों में जब हर घर से जोहारदा की मांग होती तो वह खुद किसके घर जाएगा, यह सम्बद्ध मालकिन की रसोई की प्रसिद्धि पर निर्भर होता. कुछ घरों के लिए वह नाक-भौं सिकोड़ कर खुश-पुश करता- ‘उनके यहां तो , पहा... मुझसे खाया नहीं जाता.’ ऐसे लोगों के खेतों में वह बेटों को लगा देता. कभी खुद फंस गया तो वहां खाने के बदले बैकर (अनाज) ले आता. रोटियां उसे पसंद नहीं थीं. ‘रोटियों की भी क्या खवाई’, वह कहा करता. स्त्रियां कहतीं- ‘जोहारदा को खिलाना आसान नहीं.’
हमारे घर में एक बड़ी थाली थी, परातनुमा. उसका नाम ही ‘जोहारदा की थाली’ था. दोपहर में बैलों को चारा-पानी के लिए खोल कर, हाथ-मुंह धोकर, अंगोछे की लंगोटनुमा धोती बांध कर वह चाख का एक कोना लीपता और जीमने के लिए जम जाता. तब ईजा उसकी थाली में ढेर सारा भात और भटिया परोस कर रख देती. धिनाली होती तो थोड़ा-सा दही और घी भी, जिसका उसे बेसब्री से इंतज़ार रहता. भुटी खुश्याणी तो होती ही. कभी हम छुप कर उसका खाना देखते रहते. वह बहुत इतमीनान, चाव और श्रद्धा से खाता. रसोई में जब भात की तौली और भटिया का भदेला आधा हो जाता तो ईजा धीरे से कहती अब जोहारदा को एक डकार आएगा. ऐसा ही होता. फिर उसकी थाली में और खाना परोसा जाता.
-‘ पहा-पहा... आनंद हो गया’ वह कहता. खा कर वह फिर उस कोने को लीपता, बाहर जाकर थाली मांजता और चाख के उसी कोने में औंधी करके रख देता. ईजा पानी के छीटे डाल कर उन्हें वहां से उठाती और चमचमाती थाली को फिर से मांजती.
पानी के छींटे डालना और उसके मांजे बर्तनों को फिर से मांजना हमें विचित्र लगता लेकिन हर बार ऐसा ही होता. खेत में चाय जाती तो जिस गिलास में जोहारदा चाय पीता, उसके साथ भी यही होता. पानी के छींटे डाले बगैर, उसके मांज देने के बावजूद उसे छुआ नहीं जाता था. रास्ते चलते सामने से कोई आ जाता तो जोहारदा काफी दूर से ही पगडण्डी छोड़ कर ऊपर-नीचे हो जाता, चाहे उसे सिंसौण के भूड़ या कांटों पर ही पैर क्यों न टिकाने पड़ते. मगर जब गांव में किसी को छल-छितर लग जाता, कोई ‘झसक’ जाता तो इस अस्पृश्य जोहारदा ही को पुकारा जाता.
-‘ओ जोहारदा!...जोहारदा रे!.... ताल मोल परुली की इजा को छल-छितर ने झसका दिया, रे!... जल्दी आकर इसे झाड़ जा, रे’. जोहारदा अपना काम छोड़ कर आ जाता. नब्ज देखता और जोर की टुकाव छोड़ कर छल-छितर भगा देता. उसकी दो-चार टुकाव से ‘झसके मरीज’ कांपना बंद कर आंख खोल देते. जोहारदा चला जाता तो वहां मौजूद सब लोगों पर पानी के छींटे डाले जाते. कुछ औरतें गोठ जाकर गोमूत्र अपने सिर पर डालतीं.
जोहार दा एक और काम में उस्ताद था- बछड़ों को बैल बनाने में. जवान होते बछड़े के पैर बांध, उसे जमीन पर लिटाकर वह एक गंगलोड़े (नदी का गोल पत्थर) पर उसकी वृषण-थैली टिका कर दूसरे गंगलोड़े से उस पर सधी चोट मारता. बछड़ा तड़पता जिसे गांव के कई पुरुष जकड़े रहते. किसी नस-विशेष को वह पत्थर की चोट से काट देता और कटे वृषण-कोश में दाल व मसालों का लेप लगा देता. बछड़े की नसबंदी की यह बड़ी अमानवीय प्रक्रिया थी लेकिन गांवों में यही प्रचलन में था. उस दिन जोहारदा की दावत होती. उसके जाने के बाद सभी लोगों पर पानी व गोमूत्र के छींटे डालना नहीं भूला जाता.
वह सयाना था, सम्मानित था, गांव वालों का भूत-भय भी भगाता था, फिर भी उसका स्पर्श सवर्णों को पता नहीं कैसे गंदा या अपवित्र करता था कि पानी के छींटे हर बार जरूरी हो जाते थे.
मुझे जोहारदा की पत्नी की भी हलकी-सी याद है. शायद सरुली नाम था उसका. जोहारदा की तरह वह भी बहुत सीधी और विनम्र थी. बहुत मीठा था उसका बोलना. वह अक्सर बीमार रहती थी. ज्यादा बीमार होने की खबर मिलती तो गांव की औरतें घास-लकड़ी के लिए जंगल जाते हुए घर के आंगन से दूर रुक कर पूछतीं- ‘सरुली कैसी हो?’
-‘ऐसी ही हूं, गुस्याणी! तुम ठीक हो? बच्चों की चिट्ठी आयी? कैसे हैं, घर कब तक आ रहे हैं?’ वह अपना हाल भूल कर सबका हाल-चाल लेती.
इतनी आत्मीयता के बावजूद सरुली अस्पृश्य थी. ब्राह्मणी उसके दरवाजे पर पड़े अपने ही घर के जैसे मैले-फटे बोरे पर बैठना तो दूर उसे छू भी नहीं सकती थी. दूर से खड़े-खड़े दु:ख-सुख पूछा जाता.
पता नहीं जोहारदा इस अपमान को महसूस करता था या नहीं, लेकिन मैं चाहता था कि उसे इस बात पर गुस्सा आये, जो कि उसे कभी आया नहीं. उसे तब गुस्सा आता था जब कोई बैलों को ठीक से खिलाये-पिलाये बिना हल में जोतने के लिए भेज देता था या जब कोई उसकी जुताई-बुवाई में बेवजह खोट निकालने लगता था. अपनी सामाजिक स्थिति पर उसे कभी गुस्सा नहीं आया.
बाद में एक समय ऐसा आया जब पड़ोस के गांवों के युवा शिल्पकारों ने ज्यादा मजदूरी मांगनी शुरू की और कुछ ने हल चलाना ही छोड़ने का ऐलान कर दिया. तब हलवाहे के संकट से त्रस्त उस इलाके के ब्राह्मणों को स्वयं हल की मूंठ पकड़नी पड़ी थी. तब भी जोहारदा में कोई परिवर्तन नहीं आया. न उसने ज्यादा मजदूरी मांगी, न ही हल चलाने से इनकार किया. बल्कि, परदेसी पतियों वाली स्त्रियों का, जो खुद हल चलाने में कतई असमर्थ थीं, वह मददगार बना रहा. अनाड़ी हाथों से हल चलाते किसी ब्राह्मण को देख कर वह निर्मल हंसी हंसता- ‘छोड़ो-छोड़ो... पहा... तुमसे नहीं होगा.’ कुछ पल देखते रहने के बाद वह किसी अनुभवी सुयोग्य प्रशिक्षक की तरह बिन मांगी सलाह देने लगता- ‘ऐसे-ऐसे... पहा.. . जरा तिरछा करो नश्यूड़ को...’ ब्राह्मण देवता के अनाड़ीपन पर उसके काले झुर्रीदार मुंह में एक स्मित नाच उठती. उस मुस्कान में परपीड़क संतोष नहीं, जमाने की रफ्तार पर अफसोस और कौतुक ही होता.
कभी-कभी गांव जाने पर जोहारदा से भेंट होती. उसका बड़ा लड़का भाबर जाकर बस गया. लड़कियां शादी होकर चली गईं. सबसे छोटा लड़का पढ़-लिख कर शहर में नौकरी करने चला गया और फिर लौटा नहीं. जोहारदा में विशेष फर्क नहीं आया था. उम्र उसके चेहरे पर जितनी छप सकती थी, छप चुकी थी. वह किसी उम्रदार पेड़ की तरह दिखायी देता. बीमार पत्नी उसे जीवन-समर में काफी पहले अकेला कर गयी थी.
मैं नहीं जानता कि मरने के पहले जोहारदा कैसा हो गया था- जर्जर और लाचार, या कि बूढ़े पेड़ की तरह एक रोज वह अचानक ही ढहा होगा. उसकी मौत के बरसों बाद, 1990 में अपने छूटते हुए गांव-घर के उसी चाख में बैठा था मैं, जिसके एक कोने में जोहारदा की बैठी जगह पर और उसके मांजे बर्तनों में ईजा पानी के छींटे डालती थी. मेरे हाथ में वही रुक्का था, जिस पर जोहारदा के अंगूठे की निशानी थी, ब. क. दया कृष्ण तेवाड़ी.
और, आदरणीय पं. दया कृष्ण तेवाड़ी जी, अपने बुजुर्गों की तरफ से लिखे गये मेरे इस माफीनामे पर द. ग. के लिए आप थोड़ी देर को भी उपलब्ध नहीं हो देंगे?
कहीं से कोई जवाब नहीं आता. अब गांव से कोई चिट्ठी भी नहीं आती. दो-चार परिवारों को छोड़ कर सारा गांव खाली हो गया. बंद पड़ी बाखलियां खन्यार हो रहीं, बल. जिन खेतों में जोहारदा जुताई करता था, वहां जंगल उग आया, बल. बन्दरों-सुअरों के आतंक के कारण वे चंद परिवार भी खेती नहीं कर पाते, बल. महीनों में कभी किसी से मोबाइल पर बात हो जाती है.
इस बातचीत में जोहारदा या उसके परिवार का कोई जिक्र नहीं आता. (समाप्त)
लेकिन यह
प्रसंग तो जोहारदा का है.

सामान्यतया वह जोहारदा ही कहलाता था. ठेठ गंवई उच्चारण में उसके समवय लोग उसे ‘ज्वेहरी’ कहते थे. कम उम्र वाले कभी उसे ज्वेहरी कह बैठते तो सयाने लोग डांट देते थे- “जोहारदा नहीं कह सकते, तुम्हारे बड़बाज्यू सानिक है वह.’ लेकिन उसे जोहार बड़बाज्यू नहीं कहा जाता था, जैसा कि हम अपने दादा की उम्र के लोगों से कहते थे. बहरहाल, बड़े लोग भी उसका नाम सम्मान से लेते थे.
अच्छा, तो जोहारदा उस रुक्के से बंधा हुआ हमारा हलवाहा था! उससे पहले कोई जीतराम हमारा हलवाहा था, किसी बाहर गांव का, जो सारे रुक्के छोड़कर कहीं भाभर की तरफ चला गया था. उसकी बहुत धुंधली याद है. उसके जाने के बाद ही बाबू ने जोहार दा को इस रुक्के से बांध कर अपना हलवाहा बनाया होगा. जोहारदा का परिवार हमारे गांव का एक मात्र शिल्पकार परिवार था. छोटे-बड़े चार लड़कों, दो लड़कियों और अपनी पत्नी के साथ वह ऐसे कितने ही रुक्कों से बंधा हुआ होगा. उसके सभी लड़के हल चलाते थे. सिर्फ तीसरे नम्बर के लड़के ने शायद इण्टर तक पढ़ाई की थी और बाद में शहर जाकर नौकरी भी. बाकी सब गांव में रह कर हल चलाते, मजदूरी करते या कभी जंगलात की कटान-चिरान में चले जाते. मुझसे उनकी मुलाकात हर साल गर्मी की छुट्टियों में गांव जाने पर ही होती.
जोहारदा का सबसे छोटा लड़का बहादुर कुछ परिवारों के जानवर चराने जंगल ले जाता था. जब कभी मैं ग्वालों के साथ जंगल जाता तो देखता कि दूसरे ग्वाले उसे दिन भर खूब सताते थे. वे सब कहीं बैठ कर ताश खेलते या हुक्का-बीड़ी पीते और बहादुर को दौड़ाते रहते. वह सबके जानवरों को देखता. कभी उससे कहते- ‘ओ डूम, जा उस गांव से नाशपाती चुरा ला.’ कभी आड़ू मंगवाते. दिन भर वह उनके आदेशों पर दौड़ता रहता और पकड़ा जाने पर मार या गालियां खाता. एक दिन उसने किसी काम से मना कर दिया तो सबने मिलकर उसकी पिटाई की और गला दबा कर उसके खुले मुंह में बारी-बारी से थूका. बहादुर को रोता छोड़ वे सब एक गधेरे के पानी से शुद्ध होने गये थे.
हर परिवार
चाहता था कि उसके खेतों की बुवाई जोहारदा ही करे.
-‘जोहरा!’ स्त्रियां उससे निवेदन करतीं- ‘एक-दो दिन बाद आना, लेकिन आना तू ही, हां! किसी लड़के को झन लगा देना.’
उसका कोई बेटा जुताई करने आ जाता तो लोग सतर्क हो जाते. ‘बैलों को ऐसे मत मार खिमुआ,’ उनको बार-बार कहना पड़ता- ‘तेरा बौज्यू बैलों को एक सिकड़ा नहीं लगाता. तूने सुबह से चार सिकड़े तोड़ डाले.’
जोहारदा की बात ही कुछ और थी. बैल उसके इशारे पर चलते थे और हल का फाल खेत को फर-फर ऐसे चीरता था कि मजाल है जो दो ‘स्यू’ के बीच अनजुती जमीन रह जाए. बड़े-बड़े मरकहे बैल गांव में थे, जिनको उनके किल (खूंटे) पर सिर्फ उनकी गुस्याणी बांध सकती थी और जिनके कंधे पर जुआ सिर्फ जोहारदा रख सकता था. कुछ बैल ऐसे पाजी थे कि जुते-जुते बीच खेत में बैठ जाते. जोहारदा जानता था कि किस बैल को सिर्फ पुचकार कर खड़ा किया जा सकता है और कौन ‘भ्यरहान’ नाक में मिर्च ठूंसे बिना उठता ही नहीं.
जोहारदा जानता था कि किसके खेत कहां-कहां हैं. वह हर ‘ओड़ा’ पहचानता था और यह भी किस खेत में किस जगह मिट्टी के नीचे बड़ा पत्थर है जो सावधान न रहने पर ‘नश्यूड़’ तोड़ डालता है.
दरअसल, जोहारदा सिर्फ हलवाहा नहीं, अनुभवी, निष्ठावान और समर्पित किसान था. खेत में बीज वह इस खूबसूरती से छिड़कता था कि पौधे बराबर दूरी पर सिलसिलेवार उगते. उसकी बोई फसल अलग से पहचान में आ जाती. वह मौसम का रुख और मिट्टी की तासीर पहचानता था.
-‘जोहारदा, मडुवा भाड़ने का समय नहीं हुआ अभी?’ स्त्रियां पूछतीं. प्रवासी पतियों की अनुपस्थिति में घर-गृहस्थी से लेकर खेती-बाड़ी तक सब उन्हीं की चिंता जो ठहरी. इसलिए वे जोहारदा से सलाह करती रहतीं. जोहारदा आसमान की तरफ देखने के बाद कहता- ‘पहा.. अभी जल्दी मत मचाओ, ये बादल तो चल-बसंत हुआ..’
-‘जोहारदा, धान पिछड़ रहे हैं, कब बोओगे?’ वह एक लकड़ी या अंगुली से खेत की मिट्टी खुरचता. नमी की गहराई जांचता, फिर सलाह देता. ‘पहा...दो-चार घाम खाने दो अभी मिट्टी को.’
‘पहा’ उसका तकिया कलाम था, जिसके बिना शायद ही एक वाक्य पूरा होता हो.
वर्षा पिछड़ जाती तो वह गांव भर के लिए परेशान होता. आसमान की ओर देख कर बुदबुदाता- ‘क्या मंशा है, पहा... नहीं खाने देता अबकी?’ रास्ते चलते वह खेतों की जांच करता रहता. अंगुली से खोद कर उगते बीजों के अंकुर खोजता और खेत मालिक के दरवाजे पर हाजिर हो जाता- ‘तुम्हारा बीज कुछ खराब लगता है... पहा... थोड़ा-सा अच्छा बीज मंगा कर भिगा देना. दन्याले के समय छिड़कना पड़ेगा.’ अच्छा बीज किसके यहां बचा है, यह सुराग भी वही देता- ‘यो, पहा... सुबदार ज्यू की बौराणी के पास बचा है बिलाड़ (धान की एक किस्म) का अच्छा बीज.’
उस उपराऊं और पथरीली जमीन पर फसल ससुरी अपनी ही जैसी होती थी मगर जोहारदा अपना सारा ज्ञान और अनुभव बांटता फिरता था. इसीलिए तो सब चाहते थे कि हल-दन्याला लगाने उनके यहां जोहारदा खुद आये. वह आता तो सारी चिंता मिट जाती.
परन्तु जोहारदा तो एक ही था न!
बस, एक चीज थी जहां जोहारदा बेईमानी कर बैठता था. वह खाने का बहुत शौकीन था और गुस्याणियों के हाथ का स्वाद पहचानता था. बुवाई के व्यस्त दिनों में जब हर घर से जोहारदा की मांग होती तो वह खुद किसके घर जाएगा, यह सम्बद्ध मालकिन की रसोई की प्रसिद्धि पर निर्भर होता. कुछ घरों के लिए वह नाक-भौं सिकोड़ कर खुश-पुश करता- ‘उनके यहां तो , पहा... मुझसे खाया नहीं जाता.’ ऐसे लोगों के खेतों में वह बेटों को लगा देता. कभी खुद फंस गया तो वहां खाने के बदले बैकर (अनाज) ले आता. रोटियां उसे पसंद नहीं थीं. ‘रोटियों की भी क्या खवाई’, वह कहा करता. स्त्रियां कहतीं- ‘जोहारदा को खिलाना आसान नहीं.’
हमारे घर में एक बड़ी थाली थी, परातनुमा. उसका नाम ही ‘जोहारदा की थाली’ था. दोपहर में बैलों को चारा-पानी के लिए खोल कर, हाथ-मुंह धोकर, अंगोछे की लंगोटनुमा धोती बांध कर वह चाख का एक कोना लीपता और जीमने के लिए जम जाता. तब ईजा उसकी थाली में ढेर सारा भात और भटिया परोस कर रख देती. धिनाली होती तो थोड़ा-सा दही और घी भी, जिसका उसे बेसब्री से इंतज़ार रहता. भुटी खुश्याणी तो होती ही. कभी हम छुप कर उसका खाना देखते रहते. वह बहुत इतमीनान, चाव और श्रद्धा से खाता. रसोई में जब भात की तौली और भटिया का भदेला आधा हो जाता तो ईजा धीरे से कहती अब जोहारदा को एक डकार आएगा. ऐसा ही होता. फिर उसकी थाली में और खाना परोसा जाता.
-‘ पहा-पहा... आनंद हो गया’ वह कहता. खा कर वह फिर उस कोने को लीपता, बाहर जाकर थाली मांजता और चाख के उसी कोने में औंधी करके रख देता. ईजा पानी के छीटे डाल कर उन्हें वहां से उठाती और चमचमाती थाली को फिर से मांजती.
पानी के छींटे डालना और उसके मांजे बर्तनों को फिर से मांजना हमें विचित्र लगता लेकिन हर बार ऐसा ही होता. खेत में चाय जाती तो जिस गिलास में जोहारदा चाय पीता, उसके साथ भी यही होता. पानी के छींटे डाले बगैर, उसके मांज देने के बावजूद उसे छुआ नहीं जाता था. रास्ते चलते सामने से कोई आ जाता तो जोहारदा काफी दूर से ही पगडण्डी छोड़ कर ऊपर-नीचे हो जाता, चाहे उसे सिंसौण के भूड़ या कांटों पर ही पैर क्यों न टिकाने पड़ते. मगर जब गांव में किसी को छल-छितर लग जाता, कोई ‘झसक’ जाता तो इस अस्पृश्य जोहारदा ही को पुकारा जाता.
-‘ओ जोहारदा!...जोहारदा रे!.... ताल मोल परुली की इजा को छल-छितर ने झसका दिया, रे!... जल्दी आकर इसे झाड़ जा, रे’. जोहारदा अपना काम छोड़ कर आ जाता. नब्ज देखता और जोर की टुकाव छोड़ कर छल-छितर भगा देता. उसकी दो-चार टुकाव से ‘झसके मरीज’ कांपना बंद कर आंख खोल देते. जोहारदा चला जाता तो वहां मौजूद सब लोगों पर पानी के छींटे डाले जाते. कुछ औरतें गोठ जाकर गोमूत्र अपने सिर पर डालतीं.
जोहार दा एक और काम में उस्ताद था- बछड़ों को बैल बनाने में. जवान होते बछड़े के पैर बांध, उसे जमीन पर लिटाकर वह एक गंगलोड़े (नदी का गोल पत्थर) पर उसकी वृषण-थैली टिका कर दूसरे गंगलोड़े से उस पर सधी चोट मारता. बछड़ा तड़पता जिसे गांव के कई पुरुष जकड़े रहते. किसी नस-विशेष को वह पत्थर की चोट से काट देता और कटे वृषण-कोश में दाल व मसालों का लेप लगा देता. बछड़े की नसबंदी की यह बड़ी अमानवीय प्रक्रिया थी लेकिन गांवों में यही प्रचलन में था. उस दिन जोहारदा की दावत होती. उसके जाने के बाद सभी लोगों पर पानी व गोमूत्र के छींटे डालना नहीं भूला जाता.
वह सयाना था, सम्मानित था, गांव वालों का भूत-भय भी भगाता था, फिर भी उसका स्पर्श सवर्णों को पता नहीं कैसे गंदा या अपवित्र करता था कि पानी के छींटे हर बार जरूरी हो जाते थे.
मुझे जोहारदा की पत्नी की भी हलकी-सी याद है. शायद सरुली नाम था उसका. जोहारदा की तरह वह भी बहुत सीधी और विनम्र थी. बहुत मीठा था उसका बोलना. वह अक्सर बीमार रहती थी. ज्यादा बीमार होने की खबर मिलती तो गांव की औरतें घास-लकड़ी के लिए जंगल जाते हुए घर के आंगन से दूर रुक कर पूछतीं- ‘सरुली कैसी हो?’
-‘ऐसी ही हूं, गुस्याणी! तुम ठीक हो? बच्चों की चिट्ठी आयी? कैसे हैं, घर कब तक आ रहे हैं?’ वह अपना हाल भूल कर सबका हाल-चाल लेती.
इतनी आत्मीयता के बावजूद सरुली अस्पृश्य थी. ब्राह्मणी उसके दरवाजे पर पड़े अपने ही घर के जैसे मैले-फटे बोरे पर बैठना तो दूर उसे छू भी नहीं सकती थी. दूर से खड़े-खड़े दु:ख-सुख पूछा जाता.
नौकरी पर
जाते-आते लोगों का बोझा ढोने से लेकर पत्थर खोदने और लकड़ी चीरने के कामों में
जोहारदा का परिवार सर्व-सुलभ था. उनके साथ गांव के गरीब सवर्ण स्त्री-पुरुष भी
मजदूरी करते. सबको बराबर मजदूरी मिलती, परंतु जोहारदा के परिवार को पानी के छीटों का जो अतिरिक्त व्यवहार मिलता,
वह निश्चय ही अपमानजनक था.
पता नहीं जोहारदा इस अपमान को महसूस करता था या नहीं, लेकिन मैं चाहता था कि उसे इस बात पर गुस्सा आये, जो कि उसे कभी आया नहीं. उसे तब गुस्सा आता था जब कोई बैलों को ठीक से खिलाये-पिलाये बिना हल में जोतने के लिए भेज देता था या जब कोई उसकी जुताई-बुवाई में बेवजह खोट निकालने लगता था. अपनी सामाजिक स्थिति पर उसे कभी गुस्सा नहीं आया.
बाद में एक समय ऐसा आया जब पड़ोस के गांवों के युवा शिल्पकारों ने ज्यादा मजदूरी मांगनी शुरू की और कुछ ने हल चलाना ही छोड़ने का ऐलान कर दिया. तब हलवाहे के संकट से त्रस्त उस इलाके के ब्राह्मणों को स्वयं हल की मूंठ पकड़नी पड़ी थी. तब भी जोहारदा में कोई परिवर्तन नहीं आया. न उसने ज्यादा मजदूरी मांगी, न ही हल चलाने से इनकार किया. बल्कि, परदेसी पतियों वाली स्त्रियों का, जो खुद हल चलाने में कतई असमर्थ थीं, वह मददगार बना रहा. अनाड़ी हाथों से हल चलाते किसी ब्राह्मण को देख कर वह निर्मल हंसी हंसता- ‘छोड़ो-छोड़ो... पहा... तुमसे नहीं होगा.’ कुछ पल देखते रहने के बाद वह किसी अनुभवी सुयोग्य प्रशिक्षक की तरह बिन मांगी सलाह देने लगता- ‘ऐसे-ऐसे... पहा.. . जरा तिरछा करो नश्यूड़ को...’ ब्राह्मण देवता के अनाड़ीपन पर उसके काले झुर्रीदार मुंह में एक स्मित नाच उठती. उस मुस्कान में परपीड़क संतोष नहीं, जमाने की रफ्तार पर अफसोस और कौतुक ही होता.
जमाना गुजर
गया.
कभी-कभी गांव जाने पर जोहारदा से भेंट होती. उसका बड़ा लड़का भाबर जाकर बस गया. लड़कियां शादी होकर चली गईं. सबसे छोटा लड़का पढ़-लिख कर शहर में नौकरी करने चला गया और फिर लौटा नहीं. जोहारदा में विशेष फर्क नहीं आया था. उम्र उसके चेहरे पर जितनी छप सकती थी, छप चुकी थी. वह किसी उम्रदार पेड़ की तरह दिखायी देता. बीमार पत्नी उसे जीवन-समर में काफी पहले अकेला कर गयी थी.
मैं नहीं जानता कि मरने के पहले जोहारदा कैसा हो गया था- जर्जर और लाचार, या कि बूढ़े पेड़ की तरह एक रोज वह अचानक ही ढहा होगा. उसकी मौत के बरसों बाद, 1990 में अपने छूटते हुए गांव-घर के उसी चाख में बैठा था मैं, जिसके एक कोने में जोहारदा की बैठी जगह पर और उसके मांजे बर्तनों में ईजा पानी के छींटे डालती थी. मेरे हाथ में वही रुक्का था, जिस पर जोहारदा के अंगूठे की निशानी थी, ब. क. दया कृष्ण तेवाड़ी.
इस रुक्के के
लिए मैं बहुत शर्मिंदा हुआ था, उस दिन. आज भी उस रुक्के पर नजर पड़ जाती है तो अपराधग्रस्त
होता हूँ. क्षमा मांगता हूँ.
माफ करना
जोहारदा.
और, आदरणीय पं. दया कृष्ण तेवाड़ी जी, अपने बुजुर्गों की तरफ से लिखे गये मेरे इस माफीनामे पर द. ग. के लिए आप थोड़ी देर को भी उपलब्ध नहीं हो देंगे?
कहीं से कोई जवाब नहीं आता. अब गांव से कोई चिट्ठी भी नहीं आती. दो-चार परिवारों को छोड़ कर सारा गांव खाली हो गया. बंद पड़ी बाखलियां खन्यार हो रहीं, बल. जिन खेतों में जोहारदा जुताई करता था, वहां जंगल उग आया, बल. बन्दरों-सुअरों के आतंक के कारण वे चंद परिवार भी खेती नहीं कर पाते, बल. महीनों में कभी किसी से मोबाइल पर बात हो जाती है.
इस बातचीत में जोहारदा या उसके परिवार का कोई जिक्र नहीं आता. (समाप्त)
No comments:
Post a Comment