
अब जबकि लोक सभा चुनावों को एक साल से भी कम समय रह गया है, भाजपा सरकार इस मुद्दे पर कुछ तेजी दिखाती लगती है. मोटा-मोटा प्रस्ताव यह
है कि जिन राज्य विधान सभाओं के चुनाव आने वाले साल-दो साल में होने हैं, उन्हें 2019 के लोक सभा चुनाव के साथ करा दिया जाए. बाकी विधान सभाओं के
चुनाव 2024 के आम चुनावों के साथ हों. कुछ लोग इसे नरेंद्र मोदी की चाल के रूप में
देख रहे हैं कि वे अपनी छीझती लोकप्रियता को यथाशीघ्र अगले कुछ समय के लिए भुना
लेना चाहते हैं या लोक सभा चुनाव में राष्ट्रीय मुद्दों के शोर में स्थानीय
मुद्दों को भुला कर लाभ उठाना चाहते हैं.
मोदी-विरोधियों की इस व्याख्या से इतर एक साथ चुनाव कराने
का सुझाव नया नहीं है. 1983 में स्वयं निर्वाचन आयोग ने यह सुझाव रखा था. 1999 में
केंद्रीय विधि आयोग ने अपनी 170वीं रिपोर्ट में इसकी वकालत की थी. दिसम्बर 2015
में संसद की एक स्थायी समिति ने एक साथ
चुनाव कराने के वैकल्पिक और व्यावहारिक मार्ग तलाश करने की सिफारिश की थी. पूर्व
राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने पिछले वर्ष संसद के संयुक्त सत्र में इस बारे में चर्चा
की थी.
इस सुझाव के पक्ष में कुछ तर्क बड़े ठोस हैं. एक साथ चुनाव
कराने से बार-बार चुनाव आचार संहिता लागू नहीं करनी पड़ेगी, जिससे विकास कार्यों में रह-रह कर रुकावट नहीं आएगी.
चुनाव आयोग, प्रशासनिक तंत्र और सुरक्षा बलों से लेकर सरकारी
कर्मचारियों एवं अध्यापकों तक को हर बार निर्वाचन कार्यों में व्यस्त नहीं होना
पड़ेगा. चुनाव-नियमितता सुनिश्चित होगी तो सरकारें अपना ध्यान पूरी तरह विकास
कार्यों की तरफ लगा सकेंगी. राजनैतिक स्थिरता रहेगी. चुनावों में खर्च कम होगा. सुशासन
को बढ़ावा मिलेगा और राजनैतिक भ्रष्टाचार कम होगा, आदि.
1967 तक देश में लोक सभा और विधान सभाओं के चुनाव एक साथ ही
हुआ करते थे. उसके बाद भारतीय राजनीति में नया दौर आया. कांग्रेस के वर्चस्व को
चुनौती मिली, क्षेत्रीय राजनैतिक दलों का उदय हुआ,
मध्य जातियों और दलितों के राजनैतिक उभार से नये समीकरण बने.
दल-बदल और गठबंधन की राजनीति बढ़ने से संसदीय अस्थिरता का दौर आया.
कई राज्यों में हफ्ते भर से लेकर साल-छह महीने की सरकारें बनीं. बार-बार
राष्ट्रपति शासन और जल्दी-जल्दी चुनावों का सिलसिला शुरू हुआ.
73वें-74वें संविधान संशोधनों के बाद त्रिस्तरीय नगर निकायों और पंचायतों के
चुनाव शुरू हुए तो राज्यों में हर साल कोई न कोई चुनाव होने लगे. मतदाता सूचियां
भी अलग-अलग हैं. सतारूढ़ दल से लेकर विपक्ष तक और पूरे प्रशासनिक तंत्र का ध्यान
चुनावों पर रहता है. शिक्षकों का यह हाल है कि वे स्कूलों में कम, विभिन्न चुनावी कार्यों में
ज्यादा तैनात रहते हैं. इस सब ने एक साथ चुनाव कराने की चर्चा को बल ही
प्रदान किया.
विधि आयोग के सार-पत्र के अनुसार 2019 के लोक सभा चुनावों
के साथ कुछ विधान सभाओं के चुनाव कराने के लिए या तो उनका (मसलन, अभी राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़) कार्यकाल कुछ
बढ़ाना होगा या कुछ (जिनका कार्यकाल 2020 या 2021 में खत्म हो रहा हो) का कार्यकाल
घटाना होगा. बाकी विधान सभाओं को भी 2024 के आम चुनाव तक खींचना होगा. इसके लिए
संविधान संशोधन की जरूरत होगी. निर्वाचन सम्बंधी कानून बदलने होंगे. उप-चुनाव लम्बे समय तक टालने होंगे. क्या कुछ क्षेत्रों की जनता को
जन-प्रतिनिधि विहीन रखना लोकतंत्र की मूल भावना के विपरीत नहीं होगा? क्या गारण्टी है कि एक बार साथ-साथ चुनाव करा लेने के बाद कुछ राज्यों में
मध्यावधि चुनाव की नौबत नहीं आएगी? केंद्र में भी चरण सिंह
(1979) और अटल बिहारी बाजपेयी (1996) की सरकारों जैसी नौबत नहीं आएगी? कोई सरकार अविश्वास प्रस्ताव से गिर गई तो?
विधि आयोग का सार-पत्र कहता है कि अविश्वास प्रस्ताव पर
मतदान के साथ सांसदों अथवा विधायकों को वैकल्पिक सरकार के लिए भी मत देना होगा
ताकि सदन भंग करने की नौबत न आए. यह कितना व्यावहारिक होगा? सुझाव यह भी है कि त्रिशंकु सदन होने पर सभी दलों के निर्वाचित सदस्य मिल
कर एक नेता का चुनाव करें. जो हालत हमारे राजनैतिक दलों की
है, उसमें यह कैसे हो पाएगा? फिर,
इसमें दल-बदल कानून आड़े आ जाएगा. तो, क्या
दल-बदल कानून भी बदला या रद्द किया जाएगा? केंद्र में
राष्ट्रपति शासन का विकल्प भी रखना होगा. एक साथ चुनाव से खर्चे कम हो सकते हैं
लेकिन बहुत बड़ी संख्या में ईवीएम एवं वीवीपैट मशीनों की आवश्यकता होगी. उसके लिए भी बड़ी रकम चाहिए.
ब्रिटेन ने 2011 से अपने यहां हर पांच साल बाद संसदीय चुनाव
की तारीख निश्चित की है. दक्षिण अफ्रीका और स्वीडन जैसे देशों में चुनाव एक साथ
कराए जाते हैं किंतु ज्यादातर बड़े लोकतंत्रों में एक साथ चुनाव नहीं हो पाते.
हमारे यहां राजनैतिक दलों में इस पर अलग-अलग राय हैं. कांग्रेस इसे व्यावहारिक
मानती है. तृणमूल कांग्रेस ने इसे अलोकतांत्रिक कहा है तो भाकपा और राष्ट्रवादी
कांग्रेस पार्टी मानते हैं कि इसे लागू करना ही सम्भव नहीं है. माकपा ने भी व्यावहारिक
दिक्कतें गिनाई हैं. अन्नाद्रमुक और असम गण परिषद समर्थन में हैं.
एक साथ चुनाव कराने से कुछ समस्याएं दूर हो सकती हैं किंतु
यह देखना ज्यादा जरूरी है कि कहीं इससे हमारे संघीय लोकतांत्रिक ढांचे में कुछ
मूलभूत परिवर्तन तो नहीं हो जाएंगे? इतने विशाल और विविध देश में जनता के
भिन्न-भिन्न स्थानीय मुद्दों की उपेक्षा तो नहीं होने लगेगी?
तमाम नकारात्मकताओं के बावजूद हमारा लोकतंत्र और संघीय
स्वरूप कायम रहा है. जो बुराइयां आ गयी हैं क्या उनको दूर करने का उपाय दूसरा नहीं
हो सकता? चुनाव सुधारों की बात क्यों भुला दी जा रही है? संवैधानिक संस्थाओं को और सुदृढ़ क्यों नहीं बनाया जा रहा है? राजनैतिक दल स्वयं अपने भीतर सुधार लाने की बात क्यों नहीं करते? बहुत सारी खामियां उन्हीं की पैदा की हुई हैं.
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