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Wednesday, April 17, 2019

बजरंगबली के नाम की सजा, बजरंगबली की शरण!


सन 2014 के लोक सभा चुनाव में भड़काऊ भाषण देकर आचार संहिता का उल्लंघन करने के कारण चुनाव प्रचार करने से रोके गये भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने माफी का हलफनामा देकर सजा माफ करा ली थी लेकिन 2019 में  उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी का ऐसा कोई इरादा नहीं है. वे तीन दिन तक प्रचार से दूर रहकर वास्तव में ‘बजरंगबली की शरण’ में हैं.

‘बजरंगबली’ के नाम पर मिली सजा बजरंगबली के दर्शन-भजन में ही काटने का उनका कार्यक्रम बहुप्रचारित है. उल्लेखनीय है कि योगी को उनकी टिप्पणी ‘उनको अली प्यारे हैं तो हमको बजरंगबली’ के कारण तीन दिन तक चुनाव प्रचार से दूर रहने की सजा चुनाव आयोग ने दी है.

सजा के पहले दिन, मंगलवार को वे लखनऊ के हनुमान सेतु मंदिर में हनुमान चालीसा का पाठ करने बैठे. मंदिर में हनुमान भक्तों के बीच उन्होंने कुछ समय गुजारा लेकिन किसी से बात नहीं की. बुधवार को वे अयोध्या में हैं, जहाँ रामलला के दर्शन करने के बाद उनका प्रसिद्ध हनुमान गढ़ी मंदिर में बजरंगबली से आशीर्वाद लेने का कार्यक्रम प्रचारित है. उसके बाद वे देवीपाटन मंदिर में पूजा-पाठ करेंगे. सजा के अंतिम दिन, गुरुवार को वे वाराणसी के प्रख्यात संकटमोचन मंदिर में बजरंगबली की आराधना करेंगे.

‘टाइम्स ऑफ इण्डिया’ में बुधवार को प्रकाशित एक समाचार में एक भाजपा नेता का यह बयान भी प्रकाशित हुआ है कि ”चूंकि योगी जी को बजरंगबली का नाम लेने पर चुनाव प्रचार से रोक दिया गया है इसलिए उन्होंने बजरंगबली के मंदिरों में दर्शन करने की ठानी है ताकि उनके समर्थकों तक यह संदेश पहुँचे. उन्हें चुनाव प्रचार करने से रोका गया है. हनुमान मंदिरों में जाने से उन्हें कोई नहीं रोक सकता.”

योगी भाजपा के स्टार प्रचारक हैं. मोदी और अमित शाह के बराबर ही वे दूसरे राज्यों में भाजपा का प्रचार कर रहे हैं. स्वाभाविक है कि भाजपा को तीन दिन उनकी कमी खल रही होगी. मंगलवार को नगीना और फतेहपुर सीकरी में उनकी चुनावी रैलियाँ स्थगित करनी पड़ीं. लखनऊ में राजनाथ सिंह के नामांकन जुलूस में भी योगी शामिल नहीं हो सके. बुधवार को उन्हें दक्षिण भारत का चुनावी दौरा करना था.

इसलिए भाजपा नेताओं ने दिल्ली में चुनाव आयोग से मिलकर योगी की सजा पर पुनर्विचार करने की अपील की है. तर्क यही दिया गया है कि योगी ने अपने भाषण में अपनी आस्था का जिक्र किया था. उनका कोई इरादा धर्म के नाम पर मतदान की अपील करना नहीं था. चूंकि आयोग ने यह कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट के सवाल उठाने पर की है, इसलिए लगता नहीं कि वह सजा पर पुनर्विचार करेगा.

प्रसंगवश बता दें कि पिछले दिनों एक एनआरई की पीआईएल पर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से पूछा था कि धर्म और जाति के आधार पर वोट मांग कर आचार संहिता का उल्लंघन करने वालों पर क्या कार्रवाई की जा रही है. तब आयोग की तरफ से कोर्ट को बताया गया कि उसके अधिकार सीमित हैं. वह सिर्फ नोटिस देकर जवाब मांग सकता है और एफआईआर दर्ज करा सकता है. इस पर मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई तनिक आक्रोश में कहा था कि अब हम चुनाव आयोग की शक्तियों पर कल सुनवाई करेंगे. इसी टिप्पणी के फौरन बाद आयोग ने उक्त चार नेताओं को दो-से तीन दिन तक प्रचार करने से रोक दिया .  

आचार संहिता लोड़ने के कारण चुनाव प्रचार से रोके गये अन्य तीन नेता फिलहाल आराम कर रहे हैं. मायावती अपने घर में ही अगले चरणों की रणनीति बना रही हैं. मंगलवार को उन्हें नगीना में सपा-बसपा-रालोद की संयुक्त रैली को सम्बोधित करना था. उनकी जगह उनके भतीजे आकाश ने वहाँ भाषण दिया. इस तरह आकाश को अपना पहला राजनैतिक भाषण देने का मौका मिला. आकाश को वे अपने उत्तराधिकारी के रूप में बढ़ा रही हैं. उसके लिए अखिलेश यादव और अजित सिंह की संगत में यह प्रशिक्षण रैली साबित हुई.

आजम खान रामपुर के अपने घर में ही रहे, उनके बेटे अब्दुल्ला ने उनके लिए प्रचार किया. उसने सम्वाददाता सम्मेलन में कहा कि मेरे पिता के खिलाफ आयोग ने इसलिए कार्रवाई की है क्योंकि वे मुसलमान हैं. उनके इस बयान पर विवाद छिड़ना ही था.

ऐसा ही बयान एक दिन पहले मायावती ने भी दिया था. उन्होंने चुनाव आयोग पर पक्षपात का आरोप लागाते हुए कहा था कि दलित होने के कारण मेरे खिलाफ कार्रवाई की गयी है. चुनाव आयोग दलित विरोधी मानसिकता से काम कर रहा है.

चुनाव आयोग द्वारा प्रचार करने से रोके गये ये नेता दरअसल इस प्रतिबंध को भी अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश कर रहे हैं. इनमें से किसी भी नेता को अपने आपत्तिजनक भाषणों पर खेद नहीं है. ये सभी मानते हैं और कह भी चुके हैं कि उन्होंने आचार संहिता नहीं तोड़ी है. चुनाव आयोग को दिये जवाब में भी इन्होंने यही कहा है. मायावती और आजम खान क्रमश: दलित और मुस्लिम होने की बात कह कर सजा से सहानुभूति बटोरने की कोशिश कर रहे हैं तो योगी बजरंगबली प्रकारांतर से यह संदेश देना चाह रहे हैं कि मुझे तो बजरंगबली का नाम लेने पर सजा दी गयी है.

https://hindi.oneindia.com/news/india/lok-sabha-elections-2019-yogi-adityanath-offers-prayer-lord-hanuman-after-ec-bars-campaign-72-hours-502295.html

Tuesday, April 16, 2019

तो चुनाव आयोग सोया था!



तो, चुनाव आयोग सो रहा था और अब जाग गया है!

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी, पूर्व मुख्यमंत्री और बसपा अध्यक्ष मायावती, केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी और सपा नेता एवं पूर्व मंत्री आजम खान को दो से तीन दिन के लिए चुनाव प्रचार करने से रोकने के चुनाव आयोग के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि लगता है कि आयोग अब जाग गया है. इसलिए इस मामले में अब और कोई आदेश देने की जरूरत नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को चुनाव आयोग के एक ‘सक्षम प्रतिनिधि’ को भी तलब किया था ताकि चुनाव आयोग की शक्तियों पर विचार करते समय वह वहाँ मौजूद रहे. एक दिन पहले एक एनआरई की पीआईएल पर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से पूछा था कि धर्म और जाति के आधार पर वोट मांग कर आचार संहिता का उल्लंघन करने वालों पर क्या कार्रवाई की जा रही है. तब आयोग की तरफ से कोर्ट को बताया गया कि उसके अधिकार सीमित हैं. वह सिर्फ नोटिस देकर जवाब मांग सकता है और एफआईआर दर्ज करा सकता है. तभी मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने तय किया था कि मंगलवार को वह इसी बारे में सुनवाई करेगा.

सुप्रीम कोर्ट के यह कहते ही कि वह अगले दिन चुनाव आयोग की शक्तियों पर विचार करेगा, आयोग को अपनी शक्तियों की याद आ गयी. उसने उक्त चार नेताओं पर आचार संहिता उल्लंघन के मामलों में कार्रवाई कर दी. योगी और आजम खान को 72 घण्टे यानी तीन दिन और मेनका तथा मायावती को 48 घण्टे यानी दो दिन के लिए चुनाव प्रचार करने से रोक दिया.

इसी से साबित हो जाता है कि उसके पास पर्याप्त शक्तियाँ हैं और वह चाहे तो आचार संहिता उल्लंघन के मामलों पर कड़ा रुख अपना सकता है, बशर्ते कि वह सोया हुआ न हो. चुनाव आयोग सोया हुआ था या जानबूझ कर आंखें बंद किये हुए था, यह तो वही बता सकता है.

टीएन शेषन ने मुख्य चुनाव आयुक्त रहते साबित कर दिया था कि चुनाव आयोग क्या-क्या कर सकता है, बशर्ते कि उसकी आंखें खुली हों और वह किसी दवाब में न आये. देश में जब सत्रहवीं लोक सभा के चुनाव हो रहे हों और आचार संहिता उल्लंघन की शिकायतें लगातार आ रही हों, तब चुनाव आयोग आंखें कैसे मूँदे रह सकता है?

मामला सिर्फछुटभैय्ये नेताओं और प्रत्याशियों की ‘जुबान फिसलने’ या जानबूझ कर जातीय-धार्मिक अपीलें करने या व्यक्तिगत अशालीन टिप्पणियाँ करने का नहीं था. मामला था संविधान की शपथ लेकर महत्त्वपूर्ण पदों पर बैठे जिम्मेदार नेताओं द्वारा खुले आम आचार संहिता की धज्जियाँ उड़ाने का.

देखिए, देश के सबसे बड़े सूबे के मुख्यमंत्री पद पर बैठे ‘गोरक्षपीठाधीश्वर’ आदित्यनाथ योगी क्या कह रहे थे- ‘उन्हें अली प्यारे हैं तो हमें बजरंगबली प्यारे हैं.’ और ‘हरे वायरस’ से सावधान रहना है. चार बार राज्य की मुख्यमंत्री रह चुकीं मायावती कहती है- ‘मुसलमान अपने वोट का बंटवारा न करें और सिर्फ गठबंधन के उम्मीदवार को ही वोट दें.’ मेनका गांधी एक मुस्लिम बहुल गाँव में साफ-साफ कहती हैं- ‘जीत तो मैं रही हूँ लेकिन मुसलमानों के वोट के बिना जीती तो ऐसे में दिल खट्टा हो जाता है. फिर आपको मेरी जरूरत पड़ेगी तो मैं सोचूंगी कि रहने दो...’  और आजम खान तो विवादास्पद बयानों के लिए जाने ही जाते हैं. ‘खाकी अंडरवियर’ वाली टिप्पणी अमर सिंह के लिए हो या जया प्रदा के लिए, है तो अभद्र ही और अवांछित.

आचार संहिता उल्लंघन के इन मामलों का चुनाव आयोग को स्वत: संज्ञान लेना चाहिए था. वह तो नहीं हुआ लेकिन जब आयोग के पास शिकायतें पहुँचाई गईं तब भी वह टाल-मटोल वाले अंदाज में रहा. किसी मामले में वह नोटिस जारी करके बैठा रहा तो किसी में नोटिस का जवाब न आने पर भी चुप लगाए रहा. इससे पहले भी उसकी ‘सुस्ती’ या ‘नींद’ के लक्षण दिखाई दे रहे थे.

आचार संहिता लागू होने के बाद भी प्रधानमंत्री ने उपग्रह मार गिराने की क्षमता के सफल प्रदर्शन की घोषणा करने के लिए राष्ट्र के नाम संदेश प्रसारित किया. चुनाव आयोग से इसकी पूर्व अनुमति भी नहीं ली और शिकायत करने पर इसे आचार संहिता का उल्लंघन नहीं माना. आयोग के इस निर्णय पर सवाल उठे. चुनावों की घोषणा के बाद ‘नमो टीवी’ लांच किया गया. उस पर जारी नरेंद्र मोदी के प्रचार पर आयोग कई दिन तक चुप लगाए रहा. फिर उस पर ‘राजनैतिक प्रसारण’ पर रोक लगाने का फैसला हुआ भी तो बहुत देर से. अब भी ‘नमो टीवी’ विज्ञापन प्लेटफॉर्म के रूप में भाजपा और मोदी का प्रचार कर रहा है. मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने भारतीय सेना को ‘मोदी की सेना’ कहा और चौतरफा आपत्तियों के बाद चुनाव आयोग सिर्फ उन्हें यह ‘सलाह’ दे सका कि भविष्य में सावधान रहें.

यही नहीं, राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद पर बैठे कल्याण सिंह ने अपने को भाजपा कार्यकर्ता बतते हुए मोदी को जिताने की अपील की. इसे आचार संहिता का उल्लंघन मानते हुए चुनाव आयोग ने राष्ट्रपति को पत्र लिखा. राष्ट्रपति ने वह पत्र गृह मंत्रालय को भेज दिया और सरकार चुप लगाकर बैठ गयी. चुनाव आयोग ने जानने की कोशिश तक नहीं की कि उस पर क्या हुआ. ऐसे संगीन मामले में सरकार कैसे और क्यों चुप बैठी है, यह पूछने की जरूरत अब तक नहीं समझी है.

ये मामले बता रहे थे कि चुनाव आयोग, जिस पर निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव कराने का दायित्व है, सोया है या सोने का बहाना कर रह रहा है. इतना उनींदा हमारा चुनाव हाल के वर्षों में नहीं था.

सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी के बाद ही सही, चुनाव आयोग नींद से जागा है तो उम्मीद है कि वह फिर ऊंघने नहीं लगेगा. देश के लिए यह बहुत महत्त्वपूर्ण चुनाव है. इसे सम्पन्न कराने तक उसे बराबर सजग और सक्रिय रहना होगा.


Tuesday, June 26, 2018

एक साथ चुनाव के जटिल प्रश्न



देश में सभी चुनाव एक साथ कराने की चर्चा अक्सर छिड़ जाती है. कई कारणों से इस चर्चा को समर्थन भी मिलता रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने चार साल के कार्यकाल में इसे एक मुद्दे की तरह बार-बार उठाया. वे लोक सभा और विधान सभाओं के चुनाव एक साथ कराने की वकालत करते हैं. कुछ समय पहले उनके सुझाव पर केंद्रीय विधि आयोग ने तीन पेज का एक सार-पत्र तैयार किया है. उसका उद्देश्य इस बारे में जनता, बुद्धिजीवियों और राजनैतिक दलों की राय लेना है. पिछले दिनों विधि आयोग ने इस पत्र को सभी मान्यता प्राप्त राजनैतिक दलों के विचारार्थ भेजा है. उनसे इसी 30 जून तक आयोग के साथ चर्चा करने या अपनी राय लिखित रूप में भेजने का आग्रह किया गया है.

अब जबकि लोक सभा चुनावों को एक साल से भी कम समय रह गया है, भाजपा सरकार इस मुद्दे पर कुछ तेजी दिखाती लगती है. मोटा-मोटा प्रस्ताव यह है कि जिन राज्य विधान सभाओं के चुनाव आने वाले साल-दो साल में होने हैं, उन्हें 2019 के लोक सभा चुनाव के साथ करा दिया जाए. बाकी विधान सभाओं के चुनाव 2024 के आम चुनावों के साथ हों. कुछ लोग इसे नरेंद्र मोदी की चाल के रूप में देख रहे हैं कि वे अपनी छीझती लोकप्रियता को यथाशीघ्र अगले कुछ समय के लिए भुना लेना चाहते हैं या लोक सभा चुनाव में राष्ट्रीय मुद्दों के शोर में स्थानीय मुद्दों को भुला कर  लाभ उठाना चाहते हैं.

मोदी-विरोधियों की इस व्याख्या से इतर एक साथ चुनाव कराने का सुझाव नया नहीं है. 1983 में स्वयं निर्वाचन आयोग ने यह सुझाव रखा था. 1999 में केंद्रीय विधि आयोग ने अपनी 170वीं रिपोर्ट में इसकी वकालत की थी. दिसम्बर 2015 में संसद की  एक स्थायी समिति ने एक साथ चुनाव कराने के वैकल्पिक और व्यावहारिक मार्ग तलाश करने की सिफारिश की थी. पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने पिछले वर्ष संसद के संयुक्त सत्र में इस बारे में चर्चा की थी.

इस सुझाव के पक्ष में कुछ तर्क बड़े ठोस हैं. एक साथ चुनाव कराने से बार-बार चुनाव आचार संहिता लागू नहीं करनी पड़ेगी, जिससे विकास कार्यों में रह-रह कर रुकावट नहीं आएगी. चुनाव आयोग, प्रशासनिक तंत्र और सुरक्षा बलों से लेकर सरकारी कर्मचारियों एवं अध्यापकों तक को हर बार निर्वाचन कार्यों में व्यस्त नहीं होना पड़ेगा. चुनाव-नियमितता सुनिश्चित होगी तो सरकारें अपना ध्यान पूरी तरह विकास कार्यों की तरफ लगा सकेंगी. राजनैतिक स्थिरता रहेगी. चुनावों में खर्च कम होगा. सुशासन को बढ़ावा मिलेगा और राजनैतिक भ्रष्टाचार कम होगा, आदि.

1967 तक देश में लोक सभा और विधान सभाओं के चुनाव एक साथ ही हुआ करते थे. उसके बाद भारतीय राजनीति में नया दौर आया. कांग्रेस के वर्चस्व को चुनौती मिली, क्षेत्रीय राजनैतिक दलों का उदय हुआ, मध्य जातियों और दलितों के राजनैतिक उभार से नये समीकरण बने. दल-बदल और गठबंधन की राजनीति बढ़ने से संसदीय अस्थिरता का दौर आया. कई राज्यों में हफ्ते भर से लेकर साल-छह महीने की सरकारें बनीं. बार-बार राष्ट्रपति शासन और जल्दी-जल्दी चुनावों का सिलसिला शुरू हुआ.

73वें-74वें संविधान संशोधनों  के बाद त्रिस्तरीय नगर निकायों और पंचायतों के चुनाव शुरू हुए तो राज्यों में हर साल कोई न कोई चुनाव होने लगे. मतदाता सूचियां भी अलग-अलग हैं. सतारूढ़ दल से लेकर विपक्ष तक और पूरे प्रशासनिक तंत्र का ध्यान चुनावों पर रहता है. शिक्षकों का यह हाल है कि वे स्कूलों में कम, विभिन्न चुनावी कार्यों में  ज्यादा तैनात रहते हैं. इस सब ने एक साथ चुनाव कराने की चर्चा को बल ही प्रदान किया.

विधि आयोग के सार-पत्र के अनुसार 2019 के लोक सभा चुनावों के साथ कुछ विधान सभाओं के चुनाव कराने के लिए या तो उनका (मसलन, अभी राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़) कार्यकाल कुछ बढ़ाना होगा या कुछ (जिनका कार्यकाल 2020 या 2021 में खत्म हो रहा हो) का कार्यकाल घटाना होगा. बाकी विधान सभाओं को भी 2024 के आम चुनाव तक खींचना होगा. इसके लिए संविधान संशोधन की जरूरत होगी. निर्वाचन सम्बंधी कानून बदलने होंगे. उप-चुनाव लम्बे समय तक टालने होंगे. क्या कुछ क्षेत्रों की जनता को जन-प्रतिनिधि विहीन रखना लोकतंत्र की मूल भावना के विपरीत नहीं होगा? क्या गारण्टी है कि एक बार साथ-साथ चुनाव करा लेने के बाद कुछ राज्यों में मध्यावधि चुनाव की नौबत नहीं आएगी? केंद्र में भी चरण सिंह (1979) और अटल बिहारी बाजपेयी (1996) की सरकारों जैसी नौबत नहीं आएगी? कोई सरकार अविश्वास प्रस्ताव से गिर गई तो?

विधि आयोग का सार-पत्र कहता है कि अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान के साथ सांसदों अथवा विधायकों को वैकल्पिक सरकार के लिए भी मत देना होगा ताकि सदन भंग करने की नौबत न आए. यह कितना व्यावहारिक होगा? सुझाव यह भी है कि त्रिशंकु सदन होने पर सभी दलों के निर्वाचित सदस्य मिल कर एक नेता का चुनाव करें. जो हालत हमारे राजनैतिक दलों की है, उसमें यह कैसे हो पाएगा? फिर, इसमें दल-बदल कानून आड़े आ जाएगा. तो, क्या दल-बदल कानून भी बदला या रद्द किया जाएगा? केंद्र में राष्ट्रपति शासन का विकल्प भी रखना होगा. एक साथ चुनाव से खर्चे कम हो सकते हैं लेकिन बहुत बड़ी संख्या में ईवीएम एवं वीवीपैट मशीनों  की आवश्यकता होगी. उसके लिए भी बड़ी रकम चाहिए.

ब्रिटेन ने 2011 से अपने यहां हर पांच साल बाद संसदीय चुनाव की तारीख निश्चित की है. दक्षिण अफ्रीका और स्वीडन जैसे देशों में चुनाव एक साथ कराए जाते हैं किंतु ज्यादातर बड़े लोकतंत्रों में एक साथ चुनाव नहीं हो पाते. हमारे यहां राजनैतिक दलों में इस पर अलग-अलग राय हैं. कांग्रेस इसे व्यावहारिक मानती है. तृणमूल कांग्रेस ने इसे अलोकतांत्रिक कहा है तो भाकपा और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी मानते हैं कि इसे लागू करना ही सम्भव नहीं है. माकपा ने भी व्यावहारिक दिक्कतें गिनाई हैं. अन्नाद्रमुक और असम गण परिषद समर्थन में हैं.
एक साथ चुनाव कराने से कुछ समस्याएं दूर हो सकती हैं किंतु यह देखना ज्यादा जरूरी है कि कहीं इससे हमारे संघीय लोकतांत्रिक ढांचे में कुछ मूलभूत परिवर्तन तो नहीं हो जाएंगे? इतने विशाल और विविध देश में जनता के भिन्न-भिन्न स्थानीय मुद्दों की उपेक्षा तो नहीं होने लगेगी?

तमाम नकारात्मकताओं के बावजूद हमारा लोकतंत्र और संघीय स्वरूप कायम रहा है. जो बुराइयां आ गयी हैं क्या उनको दूर करने का उपाय दूसरा नहीं हो सकता? चुनाव सुधारों की बात क्यों भुला दी जा रही है? संवैधानिक संस्थाओं को और सुदृढ़ क्यों नहीं बनाया जा रहा है? राजनैतिक दल स्वयं अपने भीतर सुधार लाने की बात क्यों नहीं करते? बहुत सारी खामियां उन्हीं की पैदा की हुई हैं.

 (प्रभात खबर, 27 जून, 2018) 


Tuesday, May 29, 2018

ईवीएम नहीं, चुनाव आयोग की साख का सवाल



सोमवार को देश के दस राज्यों में चार लोक सभा और दस विधान सभा सीटों के उप-चुनाव के लिए मतदान समाप्त होते-होते ट्विटर पर दिग्गज राजनैतिक विश्लेषकों से लेकर नामी लेखकों-पत्रकारों की तीखी टिप्पणियां चुनाव आयोग पर बरसने लगीं.  किसी ने इस संवैधानिक संस्था का मजाक बनाया तो कोई उसे ज्यादा जिम्मेदार और जवाबदेह होने की सलाह देने लगा. विपक्षी राजनैतिक दल तो दिन भर साजिश के आरोप लगाते ही रहे.

हुआ यह कि लगभग सभी राज्यों में कई मतदान केंद्रों से दिन भर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) के गड़बड़ होने की शिकायतें आती रही थीं. कहीं ईवीएम ने काम नहीं किया तो कहीं ईवीएम के साथ लगी वह मशीन (वीवीपीएटी) ठप हो गयी जिसमें छपी पर्ची से मतदाता अपना वोट सही जगह पड़ने की पुष्टि करता है. कहीं-कहीं इन मशीनों को बदलने में डेढ़-दो घण्टे भी लगे. मतदाता लाइन लगाये इंतजार करते रहे. विपक्षी दलों से लेकर सत्तारूढ़ भाजपा तक ने चुनाव आयोग से शिकायत की.

शाम को आयोग की ओर से बयान आया कि राजनैतिक दल शिकायत को बढ़ा-चढ़ा कर बता रहे हैं. कहीं-कहीं ईवीएम और वीवीपीएटी मशीनें खराब हुई जिन्हें बदल दिया गया. पर्याप्त संख्या में वैकल्पिक मशीनें रखी रहती हैं. भीषण गर्मी, मतदान कर्मियों की अनुभवहीनता और लापरवाही को आयोग ने मशीनें खराब होने का कारण बताया. ट्विटर पर आयोग को इसी बयान के कारण हमले झेलने पड़े.

यह सचमुच हास्यास्पद बयान था. हमारे देश में अब तक ज्यादार चुनाव मार्च से जून तक होते रहे हैं, जो भीषण गर्मी के महीने होते हैं. 2019 का आम चुनाव भी, समय से पहले नहीं हुआ तो अप्रैल-मई में ही होगा. क्या गर्मी वास्तव में मशीनों के खराब होने का कारण है? मतदान कर्मियों की अनुभवहीनता के लिए भी स्वयं आयोग ही जिम्मेदार ठहरता है. ईवीएम से चुनाव कराते काफी समय बीत चुका और वीवीपीएटी मशीनें भी नयी नहीं रहीं. बहरहाल, 2019 के आम चुनाव से पहले के ये महत्त्वपूर्ण उप-चुनाव विपक्षी एकता बनाम भाजपा की चर्चा की बजाय चुनाव आयोग तथा ईवीएम का विवाद बन कर रह गये.

हारे हुए प्रत्याशी और दल अक्सर ईवीएम में गड़बड़ी की शिकायत करते हैं. 2009 के आम चुनाव में पराजय के बाद भाजपा ने ईवीएम की बजाय बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग की थी. कई और दलों ने भी उसके स्वर में स्वर मिलाया था. 2014 में भाजपा के भारी बहुमत से जीतने के बाद से कांग्रेस समेत कई क्षेत्रीय दल भाजपा और आयोग पर ईवीएम से छेड़छाड़ के आरोप लगाते रहे हैं. यहां तक कहा गया कि ईवीएम को इस तरह तैयार किया गया है कि कोई भी बटन दबाने पर वोट भाजपा के ही खाते में जाता है. इस पर चुनाव आयोग ने राजनैतिक दलों को चुनौती दी थी कि वे ईवीएम से छेड़-छाड़ करके दिखाएं. 

ईवीएम से किसी तरह की छेड़-छाड़ के कोई सबूत आज तक नहीं मिले हैं. आखिर है तो टेक्नॉलॉजी ही, इसलिए माना जाता है कि कहीं दो-एक मशीनों में छेड़छाड़ सम्भव हो सकती है. विशेषज्ञ मानते हैं कि बड़े पैमाने पर ऐसा कर पाना लगभग असम्भव है. चूंकि मशीनें हैं, इसलिए वे कभी अचानक काम करना बंद कर सकती हैं. उन्हें संचालित करने वाले इंसान हैं, इसलिए कहीं-कहीं उनसे भी गड़बड़ी  हो जा सकती है. इसके लिए वैकल्पिक व्यवस्था की जाती है. ज्यादा गड़बड़ी होने पर पुनर्मतदान की व्यवस्था है ही. इसलिए कोई कारण नहीं होना चाहिए कि ईवीएम और आयोग को निशाने पर रखा जाए.

निर्वाचन आयोग की बहुत बड़ी जिम्मेदारी है कि वह निष्पक्ष और स्वतंत्र मतदान सुनिश्चित कराये. मतदान केंद्रों पर कब्जे, मतपेटियों की लूट तथा फर्जी एवं खून-खराबे वाले मतदान के दौर से हम बहुत आगे निकल आये हैं. टी एन शेषन ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त रहते आम मतदाता के बीच आयोग की जो साख स्थापित की और जिसे उनके बाद के कई आयुक्तों ने बरकरार रखा, उसे बनाने-बढ़ाने में ईवीएम का योगदान निर्विवाद रहा है. हमारे जैसे विशाल देश में बैलेट पेपर की ओर वापस जाना कतई बुद्धिमानी नहीं होगी. ईवीएम की विश्वसनीयता के लिए उनकी तकनीकी श्रेष्ठता और मतदान कर्मियों के बेहतर प्रशिक्षण पर ध्यान देना होगा.

निर्वाचन तंत्र की साख बनी रहे, यह सुनिश्चित करना वर्तमान निर्वाचन आयुक्तों की जिम्मेदारी है. उन्हें सतर्क रहना चाहिए कि उनके किसी बयान या निर्णय से इस संवैधानिक संस्था की विश्वसनीयता पर आंच न आये. दुर्भाग्य से पिछले कुछ समय में ऐसे वाकये हुए हैं जिनसे आयोग की तरफ उंगलियां उठी हैं. बाढ़-राहत के नाम पर गुजरात विधान सभा चुनावों की तारीख की घोषणा को टालना, कर्नाटक विधान सभा चुनाव की तारीख का लीक हो जाना, जैसे कुछ प्रकरण आयोग की प्रतिष्ठा के अनुकूल नहीं रहे.

विपक्षी दलों की इस प्रवृत्ति की भी निंदा की जानी चाहिए कि वे बिना सोचे-समझे फौरन सत्तापक्ष के लाभार्थ ईवीएम से छेड़-छाड़ का आरोप लगाने लगते हैं. ऐसा करके न केवल वे चुनाव आयोग की प्रतिष्ठा को धूमिल करते हैं, वरन्‍ जनता के मन में ईवीएम के प्रति अनावश्यक संदेह पैदा करते हैं. ईवीएम के साथ वीवीपीएटी मशीनें इसी सन्देह को दूर करने के लिए लगायी जा रही हैं. 2013 में एक याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने इन मशीनों को लगाने का निर्देश दिया था ताकि मतदाता आश्वस्त हो सके कि उसका वोट उसी के पक्ष में गया है जिसे उसने चुना है.

आने वाला आम चुनाव इस दृष्टि से और भी महत्त्वपूर्ण है कि भारी बहुमत से केंद्र में और बीस से ज्यादा राज्यों की सत्ता में विराजमान भाजपा के खिलाफ विपक्ष एकजुट होने की कोशिशों में लगा है. उत्तर प्रदेश के उप-चुनावों के बाद कर्नाटक के नाटक ने विपक्षी एकता की सम्भावना बढ़ा दी है. मुकाबले के लिए भाजपा और भी जोर-शोर से तैयार हो रही है. जाहिर है कि संग्राम घनघोर होगा. आरोप-प्रत्यारोपों में निजी और अनपेक्षित हमले अभी से शुरू हो चुके हैं. चुनावी युद्ध में मर्यादा का सीमोल्लंघन हमारे यहां होता रहता है. पूरी आशंका है कि इस बार कुछ और सीमाएं ध्वस्त होंगी. पहले से ही घायल हमारे लोकतंत्र की कड़ी परीक्षा तय है.

ऐसे में अत्यावश्यक है कि संवैधानिक प्रक्रियाओं की विश्वसनीयता यथा सम्भव बनी रहे. कर्नाटक के ताजा मामले में सुप्रीम कोर्ट का निर्देश हमारे विश्वास की रक्षा करने वाला साबित हुआ. चुनाव आयोग से भी ऐसे ही राहत के झौंकों की प्रत्याशा है. मतदान तंत्र की चुस्ती, चौकसी और आश्वस्ति दायक भूमिका अनिवार्य है. ईवीएम की गड़बड़ियां न्यूनतम हों, शिकायतों पर त्वरित विश्वास बहाली वाली कार्रवाई हो , न्याय हो ही नहीं, होता हुआ 
भी दिखे, यह चुनाव आयोग ही को सुनिश्चित करना होगा.
(प्रभात खबर, 30 मई, 2018)