Friday, March 18, 2022

कहानी/ सहभोज

रामदेई के पांव जमीन पर नहीं पड़ रहे। उड़ती-सी चल रही है। पहले वाली दबी-सकुची चाल में एक ठसक-सी आ गई है। चेहरे की झुर्रियां हंसती-सी मालूम पड़ती हैं। आंखों में गर्वीली चमक है। पिछले एक हफ्ते में उसने दो बार अपनी झोपड़ी की फर्श लीप दी है। फूस के छप्पर का वह चाह कर भी कुछ नहीं कर सकती। अपनी एक मात्र अच्छी धोती धोकर, सुखाकर, तह करके अपने बिछावन के नीचे दबा दी है। लाल छींट और काले बॉर्डर वाली चादर, जो कई साल हुए उसका बेटा सोनू मेले से खरीद लाया था, बक्से से निकाल कर, पूरी फैलाकर देखकर आश्वस्ति कर ली है। स्टील की थाली, गिलास और लोटा उसके सबसे अच्छे बर्तन हैं। संकोच हर बार सिर उठाता है लेकिन और क्या है उसके पास!

दिन में एक-दो बार वह ग्राम प्रधान की देहरी तक चली जाती है। वे घर के बाहर बैठे मिल गए तो पूछ बैठती है- ‘‘कछु पता लाग?”

‘‘प्रोगराम फाइनल होई तो आपै पता चलि जाई रामदेई, काहे हलकान होत हौ,” वे कभी हंसते हुए जवाब देते हैं। कभी चिढ़ जाते हैं और उसे दूर से देखते ही डांटने लगते हैं- ‘‘दिमाग फिरि गा तोहार। कहि दिया एक बार कि सरकार खुदै बताई। डीएम-वीएम, पूरा अमला दौड़ै अइहै। हमार खोपड़ी पै ना सवार हौ। गेहूं काटै काहै ना गई खेत परै?”

रामदेई क्या करे! काम में उसका मन ही नहीं लग रहा। गेहूं की फसल पककर तैयार है। कटाई चल रही है। बड़े चक में हार्वेस्टर मशीन लगी है। छोटे-छोटे खेतों में उसके जैसे खेतीहरों को मजूरी मिल जाती है। आजकल रोटी का यही सहारा है। परसों गई थी प्रधान के खेत में। ठीक से हाथ नहीं चले। बाकी कामगार उससे काफी आगे निकल गए थे और पीछे मुड़-मुड़कर हंस रहे थे। कुछ लोगों ने फब्तियां भी कसीं- ‘‘अब मजूरी मां जिया कइसन लागै! भाग जागे तौ रामदेई तनी!वह कुढ़कर रह गई थी। क्या कहे। गांव भर को खबर है। सभी ताना मारते रहते हैं। वह भीतर से बहुत खुश और उत्तेजित है लेकिन बेकल भी कि कब आवेंगे? जने आवेंगे भी? प्रधान कुछ बताते नहीं।

हफ्ते भर पुरानी बात। वह दोपहर में रोटी खाकर छप्पर पिछवाड़े बासन मांज रही थी कि बाहर कई लोगों के बोलने की आवाजें सुनाई दीं।

‘‘रामदेई!प्रधान जी की पुकार वह कैसे न पहचानती। जल्दी से बाल्टी में छल्ल-बल्ल हाथ धोकर बाहर आई। कई लोगों को देखकर वह डर गई। उसके दरवाजे पर इतने सारे और बड़े-बड़े लोग! प्रधान जी ही उसके द्वारे कब आए! आज सूट-बूट वाले साहब लोगों की टोली लेकर कैसे हाजिर हो गए? पुलिस वाले भी हैं। रामदेई का जिया धक्क-धक्क उछलने लगा, जैसे छाती फाड़कर बाहर निकल आएगा।

बरसों हुए, एक दोपहर इसी तरह उसके द्वारे भीड़ जुटी थी। तब के ग्राम प्रधान, सिपाहियों के साथ थानेदार और कुछ गांव वाले। पुलिस की जीप से उतार कर एक लाश उसके द्वारे धर दी थी। रामदेई को काटो तो खून नहीं!

‘‘तेरा सोनू है रे, रामदेई। बाबू लोग स्साले गोली मार दिहिन,” गुस्से में कहते-कहते जीतू रो पड़ा था।

‘‘चुप बे,” थानेदार से उसे घुड़का। टोले की औरतों की सिसकियां तेज हो गई थीं। रामदेई की कुछ समझ में नहीं आया। उसने जैसे कुछ सुना ही नहीं। उसका सोनू तो कल बाराती बनकर गया था।

‘‘बरात में सोनू कुर्सी-मेज में बैठ के खावै लागा। बाबू लोग चिल्लावै लागे, चमरवे तेरी ये हिम्मत! नीचे बैठ। सोनू नहीं मानिस तो सीधे गोली मार दिहिन! जीतू गुस्से में कांप रहा था। रामदेई का जेठ लगता है वह। वह भी बारात में गया था। थानेदार की घुड़की का उस पर कोई असर नहीं हुआ था। नीले झण्डे वालों के साथ घूमता है वह भी।   

‘‘भोसड़ी के, वहां फसाद खुद कराए और यहां भड़काने वाली कहानी बांच रहा है? क्या समझाए थे हम? अंदर कर साले को,” थानेदार ने एक तमाचा लगाया जीतू को। सिपाही उसे खींचकर ले गए। रामदेई सब देख रही थी लेकिन जैसे कुछ देख-सुन नहीं पा रही थी। दिमाग काम नहीं कर रहा था। उसका अकेला बेटा सोनू शहर में सफाई का काम करता है। कुछ साल से एक ठेकेदार के साथ लगा है। परसों ही तो गांव आया था। परले गांव के उसके दोस्त श्यामू की बारात थी। बड़े शौक से तैयार होकर कल सुबह बारात में गया था। जीतू क्या कह रहा है? ये कौन लेटा है नीचे? इतने सारे लोग मेरे द्वारे क्या कर रहे हैं?

किसी ने लाश के चेहरे से कपड़ा हटा दिया। लोगों ने अचानक एक हृदय विदारक चीख सुनी और दूसरे ही पल रामदेई जमीन पर थी। बेसुध। भीड़ में खलबली मच गई।

रामदेई को जब गांव के अस्पताल में होश आया, तब तक सब बराबर हो चुका था। पुलिस ने सोनू का अंतिम संस्कार कर दिया था। जीतू गिरफ्तार था। दक्खिन टोला के उसके पड़ोसी सहमे-डरे हुए थे। लोग खेतों में काम करते हुए कनबतिया कर रहे थे। पड़ोसी बच्चे उसे देखकर इधर-हो गए थे। सिर्फ जीतू की घरवाली उसके पास बैठी रोती रही थी।

रामदेई यंत्र चालित-सी प्रधान जी के घर गई थी। उन्होंने बिना किसी भूमिका के कहा था- ‘‘नीले झण्डे वालों के चक्कर में तुम्हारे लौंडों का दिमाग फिर गया है। वहां बारात में जरा-सी बात पर बावेला कर  दिए। सोनू की जान चली गई, बहुत बुरा हुआ। बड़ी मुश्किल से मामला निपटाया है वर्ना तुम्हारे सारे  लोग जेल जाते। जीतू को जल्दी छुड़ा लेंगे।वे भीतर गए। लौटकर कुछ रुपए रामदेई के सामने धर दिए–  ‘‘सरकार दिहिस है।

रामदेई कभी सामने पड़े नोट देखती, कभी प्रधान जी के चेहरे को। उसके बोल न फूटे लेकिन आंखों से धार बह चली। प्रधान जी ने अपने एक कारकुन को इशारा किया। उसने रामदेई का अंगूठा पकड़ा, स्याही वाले पैड पर उसे दबाया और एक कागज पर छाप ले लिए। उठते हुए उसने रुपए उठाए और रामदेई की हथेली में दबा दिए थे। कुछ दिन तक कभी-कभी नीले झण्डे वाले आते। वे भी रामदेई से कागज पर अंगूठा लगवाते। कभी रामदेई को लेकर थाने जाते। नारे-वारे लगाते। कुछ दिन बाद सब ठंडा पड़ गया था। रामदेई अकेली रह गई। उसका आदमी बरसों पहले हैजे से चल बसा था। 

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इतने बरस बाद आज फिर अपने द्वारे भीड़ देखकर रामदेई को सांप सूंघ गया। पुरानी स्मृतियों ने उस पर हल्ला बोल दिया। उछल-उछल कर बाहर आने को हो रहे कलेजे को थामे रखने के लिए उसने अपनी हथेली छाती पर कस ली। चेहरे की झुर्रियां सदमे के मारे गहरी हो आईं।

‘‘रामदेई नीक हौ?” प्रधान जी के स्वर में मिश्री-सी घुली थी- ‘‘डी यम सहिब आए हैं कछु बताने।

डी यम साहेब! उसने नाम खूब सुना है डी यम साहिब का। कभी-कभार सरकारी कार्यक्रमों के मंच पर दूर से देखा भी है। बहुत बड़े हाकिम। सरकार बहादुर। उसके हाथ अपने आप जुड़ गए मगर भीतर का डर और जोर मारने लगा। आज क्या जुर्म हो गया उससे!

‘‘रामदेई,” साहब काला चश्मा उतारकर हंसते हुए कह रहे हैं- ‘‘खाना खिलाओगी?”

रामदेई को अपने कानों पर भरोसा नहीं हुआ। वह शायद कुछ गलत सुन गई है।

‘‘हमको नहीं, मंत्री जी को,” साहब ने गम्भीर होते हुए बात साफ कर दी। ‘‘मंत्री जी तुम्हारे यहां भोजन करने आएंगे। जल्दी ही, ठीक है?”

रामदेई के साथ इससे तीखा मजाक क्या हो सकता है! लोग उसकी छाया से भी भागते हैं। मंत्री जी क्यों उसके घर खाना खाने आएंगे! उसका घबराया चेहरा और पीला पड़ गया।

‘‘घबराओ नहीं। तुमको परेशान नहीं होना है। सब इंतजाम हो जाएगा,” डी एम साहब ने उसकी घबराहट देखकर आश्वस्त किया।

‘‘बात ई है रामदेई,” प्रधान जी उसके करीब आ गए। “मंत्री जी और पार्टी तुम दलितन का खास ध्यान राखत है। छुआछूत नाहीं बरतत हैं। यहै खातिर तुमरे हियां खाना खहिहैं। अध्यच्छ जी भी अहिहैं।

‘‘सरकार!” रामदेई के मुंह से बहुत धीरे से इतना ही निकला। वह तबसे लगातार हाथ जोड़े खड़ी है।

इस बीच डी एम रामदेई की देहरी से भीतर ताक-झांक करने लगे। उनके मातहत दो-तीन अफसर पूरी कोठरी देख आए। फिर पुलिस वालों ने बाहर-भीतर-पिछवाड़े, छप्पर के चारों ओर मुआयना किया। वहीं खड़े-खड़े डीएम ने सबको कुछ निर्देश दिए। इस बीच मजमा जुट गया है। दक्खिन टोला के अलावा बाकी गांव से भी लोग खबर सुनकर चले आए हैं। बच्चे खेलना और हल्ला करना छोड़कर चुपचाप खड़े कौतुक से डीएम और उनकी टोली को देख रहे हैं। महिलाएं रामदेई की तरफ देखकर हंस रही हैं और इशारे कर रही हैं। उसके टोले की महिलाओं की आंखों में ईर्ष्या भी है।

‘‘मन्तरी जी एस सी हैं का!भीड़ में किसी ने जिज्ञासा की।

‘‘दुर, बांभन हुइहैं!

‘‘भग बुड़बक! जनते नहीं तो काहे बोलत हौ? राजपूत न हैं! ठाकुर लोग मूंछें खाली-मूली नाहीं ऐंठत ना!

‘‘भाग सब लोग इहां से!प्रधान जी ने सबको घुड़का। दो-चार कदम पीछे हटकर मजमा जुटा रहा और अपने-अपने कयास लगाता रहा। बस, रामदेई को जैसे काठ मार गया हो। उसे आवाजें सुनाई दे रही हैं लेकिन दिमाग में कुछ दर्ज़ नहीं हो रहा है।

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अगले दो दिन में रामदेई की झुग्गी में बिजली का लट्टू चमकने लगा। गांव में बिजली पहले से थी लेकिन रामदेई को कभी उसकी जरूरत महसूस न हुई थी। न किसी ने पूछा-गाछा था। आनन-फानन में पास के खम्बे से तार खींच कर लाया गया। उसकी झुग्गी रोशनी से भर गई। सामने बह रही नाली को पाटकर झोपड़ी के पीछे निकाला गया। बस्ती को आने वाले रास्ते और खुली नालियों पर चूने का छिड़काव हो गया। तब रामदेई को विश्वास हुआ कि डी एम और प्रधान जो कह रहे थे, वह गलत नहीं है।

तब उसे गर्व हुआ। लगा कि यह बहुत बड़ी बात है। बड़े गौरव की बात। सोनू कहा करता था- ‘‘देखि लिहो माई, इक रोज बहुजन समाज राज करिहै। बड़का जात सब सीधा रस्ते पै आइ जाई। बहुत अनियाय किए हैं न, सब बराबर हुइ जाई।वह अक्सर टोकती थी कि क्यों जीतू के साथ नीले झण्डे वालों के पीछे-पीछे भागा फिरता है। तब यही सब कहकर सोनू उसे चुप करा दिया करता था। आज उसे बेटे की बहुत याद आई। उसका गला भर गया। वह होता तो आंखें चमका कर कहता- ‘‘द्याखो, हम का कहिन रहे तोहसे!  

रामदेई की चाल में ठसक भर गई। गरदन तनिक तन गई। भीतर से खुशी की एक लहर उठी और उसके चेहरे को भिगो गई। सूखी, उदास आंखों में एक तरलता-सी आ गई। बदन उमगने लगा। जैसे, कुछ खास हुआ है, हो रहा है।

फिर उसे एक साथ कई चिन्ताओं ने घेर लिया। कहां बैठाएगी मंत्री जी को? क्या खिलाएगी? उसके पास न ठीक से बिछाने-बैठाने को है, न बर्तन-भांडे। अकेली प्राणी के लिए रोटी-भात का जुगाड़ हो जाता है। लेकिन मंत्री जी के सामने क्या परोसे? अपनी परेशानी लिए हुए वह प्रधान जी के यहां जाने को हुई। तभी भीतर से जैसे सोनू बोल उठा- हमारे यहां खुद से आ रहे हैं माई, छप्पन भोग लगाने थोड़ी न आ रहे। जो रूखा-सूखा होगा वही ठीक से धर देना सामने। वर्ना और कहीं जाते। वह कुछ आश्वस्त हुई। फिर भी कुछ तो व्यवस्था करनी होगी। मोटे-सूखे टिक्कड़ थोड़ी धर देगी उनके आगे! हैं तो पाहुन। कुछ तो करना होगा। छप्पर पर निनुआ की बेल चढ़ी है। तरकारी हो जाएगी। चार-छह पूड़ी तलने भर का तेल हो जाए तो उनका मान हो जाएगा। लाला उधार देने से रहा। दुकान के पास जाते ही दुरदुराने लगता है।

तब उसे अपने खजानेकी याद आई। दस-दस, बीस-बीस के चंद नोट और कुछ सिक्के उसने कभी एक हंडिया में रखकर कथरी के नीचे फर्श में गाड़ दिए थे। तब मन में क्या रहा होगा, पता नहीं। आज उस खजाने की याद कर वह उमंग से भर गई।

‘‘अच्छा, मंत्री जी की दावत का इंतजाम हो रहा!सेर भर आटा और बोतल भर तेल देते हुए लाला हंसा- ‘‘तुम्हीं लोगों का जमाना है, रामदेई! चुनाव नजीकै है। हम ऊंची जात वालों को कौन पूछ रहा अब।रामदेई सौदा लेकर चुपचाप चली आई। वोट पड़े वाले हैं, उसे भी पता है। इस बात का वोट से क्या मतलब। लाला को बर्दाश्त नहीं हो रहा कि कोई मेरे यहां आए!   

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रामदेई को रात ठीक से नींद नहीं आई। रोज से पहले उठकर वह तैयार हो गई। डी एम साहब ने खुशबूदार साबुन-तेल-पाउडर भिजवाया था। कचहरी का कारकुन कल प्रधान के साथ खबर देने आया था। वह कहती रही कि साहब, साबुन से नहाते हैं हम। साफ-सफाई से रहते हैं लेकिन माने नहीं। कहने लगे, मंत्री जी और अध्यक्ष जी का मामला है। नहाकर उसने वही तेल बालों में लगाया। पाउडर का डिब्बा हाथ में लेते ही वह अपने आप से लजा गई। ज़िंदगी में जो कभी हाथ भी लगाया हो! सो, वापस धर दिया। तेल से ही कैसी खशबू आ रही! काम में जुटना ज्यादा जरूरी था। कोठरी से अपनी कथरी उठाकर पिछवाड़े रख आई। बक्से से चादर निकाल कर दो तह करके दीवार के सहारे बिछाई। छप्पर से लटक रहे तरह-तरह के कपड़े-पन्नियां-गठरियां भी कोठरी के पीछे ले गई। स्टील की दो पुरानी थालियां थीं जो मांजने से चमक गईं। पिचका गिलास और लोटा भी साफ करके रख दिया। मटकी में पानी भर कर कटोरी से ढांप दिया।

वैशाख की धूप सुबह से ही कटखन्नी हो जाती है लेकिन रामदेई का पसीना गर्मी से नहीं, उन सिपाहियों को देखकर छूट रहा था जिन्होंने दक्खिन टोला को आने वाले रास्ते और उसकी कोठरी को चारों तरफ से घेर लिया है। रामदेई कोठरी के पिछवाड़े बने चूल्हे के पास बैठी आटा गूंथ रही थी कि धूल उड़ाती गाडियां आईं और देखते-देखते चप्पे-चप्पे पर अफसर और पुलिस वाले छा गए। काली वर्दी में बंदूकें लिए सिपाही उसने पहली बार देखे। काला चश्मा लगाए अफसरों की फौज उसकी कोठरी के बाहर-भीतर आ-जा रही थी। वह उठकर कोठरी में जाने लगी कि देखे, क्या माजरा है। दरवाजे पर तैनात काले चश्मे ने कहा- ‘‘वहीं बैठो अभी। बुला लिया जाएगा।उसकी तरफ पीठ फेरकर वह प्रधान जी से बतियाने लगा।

रामदेई थोड़े गुस्से और ज़्यादा घबराहट में चूल्हा जलाने लगी। धुंए से उसकी आंखें पनीली हो आईं। बाहर हलचल बढ़ गई। पुलिस की सीटियां और गाड़ियों का टिऊं-टिऊं-टिऊंसायरन सुनाई देने लगे। अफसरों की दौड़-भाग और बातचीत तेज हो गए। लगता है मंत्री जी आ रहे हैं। रामदेई की हिम्मत नहीं हुई कि बाहर निकलकर देखे। उसने कढ़ाई में तेल डाला और मंद आंच में चूल्हे पर रख दिया कि धीरे-धीरे गरम होता रहे। दूसरे चूल्हे पर निनुवा की सब्जी तैयार थी। नमक चख कर देख लिया था। उत्सुकता बहुत बढ़ गई तो वह उठी और चूल्हे की तरफ से कोठरी में जाने वाले दरवाजे पर जा खड़ी हुई। पल्ले बंद थे। झिर्री से देखने की कोशिश की तो उसे सिपाही की पीठ दिखाई दी। आवाजों से लगा कि कोठरी में कुछ लोग आ-जा रहे हैं, बोल रहे हैं।

‘‘ए भैया, जब कहें त बताय दिहो। गरम-गरम पूड़ी सेक देव,” उसने सिपाही की पीठ को सुनाया जिस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई दी। वह वापस चूल्हे के पास बैठकर लोई बनाने और पूड़ी बेलने लगी। बेली रखी रहेंगी तो जब कहेंगे फटाफट सेक देगी। दिल की धड़कन सम्भाले रखने में उसे मुश्किल हो रही थी। कोठरी के भीतर गहमाहमी तेज हो गई। लगता है मंत्री जी आ गए हैं। वह बैठी न रह सकी। उसने दरवाजे की झिर्री पर आंख लगा दी। सिपाही की पीठ के उस पार तेज रोशनी हो रही थी। रह-रहकर बिजली जैसी कौंध रही थी। हंसी-ठट्ठा भी सुनाई दे रहा था। वह समझ गई कि मंत्री जी आ गए हैं। फोटो खींची जा रही हैं। उसका दिल सुबह से ही अपनी जगह नहीं था। अब और कूदने लगा। उसने आंच तेज की और कांपते हाथों से पूड़ी सेकने बैठ गई।

‘‘चलो,” पिछवाड़े का एक पल्ला खोलकर काले चश्मे ने पुकारा। वह यंत्रवत आंचल से हाथ पोछती उसके पीछे चल पड़ी।

‘‘आइए,” दिपदिपाते भव्य चेहरे ने उसकी तरफ हाथ जोड़े। वह आंख न उठा सकी। अफसर ने उसे दो   श्वेत खद्दरधारियों के बीच खड़ा कर दिया। कैमरों के फ्लैश दनादन चमकने लगे।

‘‘मंत्री जी और अध्यक्ष जी आपके यहां खाना खाने आए हैं। आपको कैसा लग रहा है?” सवाल के साथ कई माइक उसके सामने आ गए। तेज रोशनी से उसकी आंखें मुंद गईं। गरदन और नीचे झुक आई।

‘‘आपका क्या नाम है?”

‘‘रामदेई बाल्मीकि,” प्रधान जी ने जोर से बताया।

‘‘बताइए, आपको कितनी खुशी हो रही है?” माइक मुंह के और करीब आ गए। उसका गला सूख गया।

‘‘प्लीज, इन्हें और तंग न किया जाए,” यह रोबीली आवाज मंत्री जी की है या अध्यक्ष जी की, रामदेई नहीं बता सकती। उसे इतना ही होश रहा कि काला चश्मे वाला उसे दोनों हाथों से पकड़कर वापस चूल्हे पर बैठा आया। उसने पूरा लोटा पानी एक सांस में गटका और चेहरे से चूता पसीना पोछने की चिन्ता किए बगैर पूड़ी तलने लगी।

पीछे कोठरी में जोर-शोर से बोलना और हंसी-ठट्ठा जारी रहा। खाना तैयार था। रामदेई सतर्क बैठी रही कि कब आदेश आए और वह थाली परोसे। उसकी घबराहट काबू में नहीं आ रही थी। वह मना रही थी कि सब कुछ जल्दी से निपट जाए तो उसकी सांस लौटे।

कोठरी में एकाएक फिर गहमागहमी बढ़ती सुनाई दी। एक साथ कई लोगों की आवत-जावत। बाहर दूर तक सीटियां बजने लगीं। गाड़ियों के स्टार्ट होने की आवाज आईं और सायरन गूंजने लगे। रामदेई चौंकी। क्या मंत्री जी जा रहे हैं? लेकिन खाना?

उसने एक पल्ले को हलके से धकेल कर देखा। उस तरफ तैनात सिपाही नहीं था। बाहर कुछ लोगों के  बतियाने की आवाजें आ रही थीं लेकिन कोठरी में कोई नहीं था। दीवार के सहारे बिछाई उसकी चादर गायब थी। उसकी जगह साफ-सुथरे गद्दीदार आसन धरे थे जिनके नीचे दरी बिछी थी। आसनों के सामने पत्तलों पर अधखाया खाना और पानी के कुज्जे रखे थे।

रामदेई को अपनी आंखों पर उसी तरह भरोसा नहीं हुआ जैसे उस दिन अपने कानों पर भी नहीं हुआ था कि मंत्री जी तुम्हारे यहां खाना खाएंगे। एकाएक उसकी आंखों के सामने सोनू की लाश घूम गई। सोनू के सीने में गोली मार दी थी बाबू साहब लोगों ने। रामदेई का हाथ अपने सीने पर चला गया। वैसी ही गोली आज उसे भी लगी है।

--नवीन जोशी

('अक्सर' का समकालीन हिंदी कहानी विशेषांक, जनवरी-मार्च 2022)        

 

        

 

 

         

                    

          

                      

          

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