Friday, May 15, 2026

अब तक अदृश्य 170 वर्ष पुराने हिमालय के चित्रों की नायाब दर्शनी

अगर आप आज-कल-परसों (18 मई की शाम तक) नैनीताल या उसके आसपास हों तो समय निकालकर मल्लीताल सी आर एस टी कॉलेज में लगी वह चित्र प्रदर्शनी देखने अवश्य जाएं, जो आपको 170 साल पहले के हिमालय में ले जाएगी। ये केवल उस काल के चित्र ही नहीं हैं, बल्कि इतिहास-संस्कृति-भूगोल-पर्यावरण-मानव जीवन स्थितियों-वनस्पतियों-आदि-आदि से भी रू-ब-रू कराएंगे। इस प्रदर्शनी को देखना अपने भूगोल और समाज को गहराई से देखने-जानने की मानवीय ललक और उसके लिए किए गए अथक श्रम व समर्पण को भी महसूस करना है।

मोटे तौर पर यह कहानी तत्कालीन प्रूशिया (आज का जर्मनी) के एक ख्यात फील्ड सर्वेक्षक अलेक्जेण्डर हम्बोल्ट के उस सपने से शुरू होती है जो लेटिन अमेरिका और यूरोप के पर्वतों का स्वयं फीड सर्वे कर चुकने के बाद भारतीय हिमालय का अध्ययन कराना चाहते थे ताकि विविध जानकारियों से समृद्ध एटलस तैयार किया जा सके। उन्होंने प्रूशिया के तत्कालीन राजा के माध्यम से ब्रिटिश महारानी और उनके जरिए ईस्ट इण्डिया कम्पनी से सम्पर्क साधा और भूगोल और भूगर्भशास्त्र के अध्येता दो भाइयों, हरमन श्लागिंटवाइट और एडॉल्फ श्लागिंटवाइट को इस काम के लिए तैयार किया कि वे भारतीय हिमालय का अध्ययन-सर्वेक्षण करने के लिए जाएं। दोनों भाई न केवल इस कार्य के लिए तैयार हुए बल्कि उन्होंने छोटे भाई रॉबर्ट को भी सहायक के रूप में साथ लिया। रॉबर्ट फोटोग्राफी का भी शौकीन था। कैमरे का आविष्कार हुए तब बहुत दिन नहीं हुए थे।

करीब दो साल की तैयारियों के बाद तीनों श्लागिंटवाइट भाई 1854 में भारत पहुंचे। उन्होंने विविध सहायकों की करीब एक सौ लोगों की टीम तैयार की और भारतीय हिमालयी क्षेत्र को तीन भागों में बांटकर तीनों अपने-अपने लिए निर्धारित रास्तों पर निकल गए। उन्होंने अलग-अलग मार्गों पर कोई 18,000 मील की यात्रा की, जो अधिकतर पैदल और कभी घोड़ों पर भी की गई। उन्होंने अपने यात्रा क्षेत्रों के चित्र बनाए, नक्शे बनाए, नदियों-पहाड़ों-झीलों-बस्तियों-पुलों-आदि-आदि के विविध विवरण एवं मानक दर्ज़ करते हुए अपनी डायरियां भरीं। अपने भूगोल अध्ययन और हमबोल्ट के निर्देशों के आधार पर उन्होंने खाके तैयार किए। सभी चित्र व नक्शे तत्काल फाइनल नहीं किए जा सकते थे, इसलिए अपने रफ स्केचों में छोटी-छोटी चीजें भी दर्ज़ कीं, यहां तक कि कौन सी चीज उस समय किस रंग में दिख रही थी।

उनकी इस यात्रा के दौरान ही भारत में 1857 का सैनिक विद्रोह हुआ। जब वे वापस लौटे तो उनके पास साढ़े सात सौ से अधिक नक्शे और चित्र तो मौजूद थे ही, यात्रा मार्ग से बटोरी गई तमाम चीजें भी थीं, जैसे- पत्थर, लकड़ी, वनस्पतियों, आदि के ढेरों नमूने। इनमें असम से लेकर बाल्टिस्तान और लद्दाख, हिमालय की तलहटियों, मिजोरम के खासी हिल्स से लेकर हिमालय-पार के तिब्बत और भूटान तक के चित्र, नक्शे और विविध वस्तुएं शामिल थीं।  

भारत तीन भाई आए थे लेकिन लौटे दो ही। बीच वाले भाई एडॉल्फ को 1857 में काशगर में जासूस होने के शक में मार डाला गया था। अनेक खूबियों वाली इस ऐतिहासिक सर्वे यात्रा का यह अत्यंत त्रासद पक्ष रहा।

खैर, जर्मनी लौटकर वे चित्र रंगों और अन्य विवरणों से पूरे किए गए। रॉबर्ट ने अपने कैमरे से जो फोटो खींची थीं, डेवलप करने के बाद उन्हें भी डायरी में चिह्नित विवरणों के आधार पर रंगीन बनाया गया। एक मूल्यवान ऐतिहासिक काम हो गया था लेकिन 1859 में हम्बोल्ट की मृत्यु हो जाने और फिर प्रूशिया के तत्कालीन राजा का भी पराभव होते जाने से उनके काम को वह मुकाम नहीं मिल सका, जिसकी योजना शुरू में बनाई गई थी।

श्लागिंटवाइट भाइयों के बनाए चित्र काफी समय तक उनके घर में पड़े रहे और फिर वे जर्मनी के अल्पाइन संग्रहालय में उन्हें सुरक्षित कर दिया गया।

दुनिया के सामने ये ऐतिहासिक चित्र पहली बार 2011 में आए जब बर्लिन में इनमें से कुछ चित्रों की पहली प्रदर्शनी लगाई गई। उस समय बर्लिन की फ्री यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और हिमालय अध्येता हरमन क्राइट्ज़मैन ने अपने परिचित हिमालयविद और पहाड़फाउण्डेशन के प्रोफेसर शेखर पाठक को बर्लिन आमंत्रित किया। प्रो पाठक इन चित्रों को देखकर स्वाभाविक ही उत्फुल्लित हुए और उन्होंने अल्पाइन म्यूजियम में रखी श्लागिंटवाइट भाइयों की तैयार की गई बाकी सामग्री भी देखी। उसी समय उनके मन में इन चित्रों की प्रदर्शनी भारत में लगाने का विचार आया था। आज कोई 15 वर्ष बाद उनका यह सपना साकार हुआ है। यह कैसे समभव हो पाया, क्या दिक्कतें आईं, कैसे उनका समाधान किया गया और कितने लोगों ने इसे समभव बनाया,  यह अलग से लम्बी कहानी है।

दिल्ली और देहरादून में प्रदर्शन के बाद श्लागिंटवाइट भाइयों के सैकड़ों चित्रों में से करीब एक सौ चुनिंदा चित्र फिलहाल नैनीताल में देखने के लिए उपलब्ध हैं। यह बताना भी जरूरी है कि ये मूल चित्र नहीं हैं। सुरक्षा और संरक्षण की अत्यावश्यक सावधानी के कारण मूल चित्रों की प्रतिकृतियां तैयार करके प्रदर्शित की गई हैं।

आप इन चित्रों में 1855 के नैनीताल की झलक देख सकते हैं, जब बहुत बड़े भूस्खलन से मल्लीताल का फ्लैट्सनहीं बना था और नैनीताल भी एक गांव हुआ करता था। उस समय के बदरीनाथ का चित्र देखकर आप चौंक जाएंगे और पहचान नहीं पाएंगे कि यही आज का बदरीनाथ है। नदियों पर किस मौलिक-प्राकृतिक तकनीक से तब पुल बनाए जाते थे, यह देखना कम रोमांचक नहीं है। बहुत से बौद्ध विहारों, मंदिरों, पठारों, चट्टानों, वनस्पतियों और नदियों के चित्र हमें 170 साल पहले के समय में ले जाते हैं।

 - नवीन जोशी, रामगढ़, 16 मई, 2026

       

         

No comments: