‘मुरदा घर’ (जगदम्बा प्रसाद दीक्षित, 1974) ने रात भर सोने न दिया।
कितना कम जानते हैं हम! कितना कम पढ़ा है!
शैलेश मटियानी का ‘बावन नदियों का संगम’ पढ़ा था। ‘इब्बू मलंग’, ‘चील’, ‘मिट्टी’, जैसी उनकी कई कहानियां भी पढ़ी थीं। मटियानी जी कभी बम्बई के अपने शुरूआती दिनों के किस्से सुनाते तो कंपकंपी छूटने लगती थी। वे घर से भागकर दिल्ली-इलाहाबाद होते हुए बम्बई पहुंचे थे।
बेटिकट पकड़े गए तो जेल हुई। जेल में जो भी था, कम से कम रोटी मिल जाती थी। रिहा हुए तो भिखारियों के बीच बैठकर भीख मांगी, कूड़े से बीनकर भी खाया। फिर एक ढाबे में जूठे बर्तन मांजते हुए लिखना शुरू किया। उनके उपन्यास-कहानियां इस सबकी गवाह हैं। सोचता था, कि हिंदी में वैसा विकट जीवन जीने और उसका भोगा हुआ लिखने वाला और कौन रचनाकार होगा!
जगदम्बा प्रसाद दीक्षित बम्बई (अब मुम्बई) के सेंट जेवियर कॉलेज में अध्यापक थे। ठीक-ठाक जीवन जिया उन्होंने लेकिन ‘मुरदा घर’ कैसे लिख पाए वे!
स्पष्ट है कि श्रेष्ठ लेखक कितनी ही आंखों से देखता और कितनी ही इंद्रियों से भोगता है!
'मुरदा घर' में एक-दो रुपए और कभी-कभी तो अठन्नी के लिए भी सम्भावित ग्राहकों का हाथ पकड़कर खींचती औरतें, ताकि देह के बदले ही कुछ खाने को मिल जाए। होटलों के पिछवाड़े सड़ा-गला जूठा फेंके जाने का बेसब्री से इंतज़ार करते, उसके लिए आपस में लड़ते, कुत्तों-कौओं को भगाते बच्चे। छोटी-छोटी चोरियां करते, जरायम की दुनिया के सहारे ‘परिवार’ जोड़ने की कोशिश करते मर्द। भीख मांगने के लिए गिड़गिड़ाते एवं आपस में लड़ते भिखारी, अंधे-लूले-कोढ़ी और उनकी कभी क्रूर-कभी अति-मानवीय दुनिया … । इस ‘नर्क’ में सीझता-रिसता-घिसटता जीवन है, सपने हैं उनकी टूटन है और उनकी चुभती किरचें।
इन बस्तियों से लगी हुई अट्टालिकाएं और दौड़ती-भागती मोटरें और सभ्य दुनिया है। उनके लिए कलंक बने इस संसार को बार-बार उजाड़ने वाला शासन-प्रशासन है, जेलें हैं और उसके भीतर का दूसरा ही घोर नरक है।
इस सब को प्रामाणिक बनाते दृश्य, बिम्ब, भाषा, संवाद और टूटे-फूटे किंतु मारक वाक्य हैं। शैली ऐसी की आप पढ़ते हुए सिहर-सिहर उठते हैं।
यह 1960-70 के दशक की बम्बई का एक अनिवार्य चेहरा है, जिसका रोंगटे खड़े कर देने वाला वृत्तांत हम मटियानी जी के मुख से सुनते और उनकी रचनाओं में पढ़ा करते थे। जगदम्बा प्रसाद दीक्षित कैसे उसे इतना विश्वसनीय और धड़कता हुआ लिख पाए!
ऐसी ही होनी चाहिए लेखक की संवेदना और जमीनी सत्य को इस बारीकी से पकड़ सकने की उसकी क्षमता।
‘मुरदा घर’ का ज़िक्र कुछ समय पहले गंगा शरण सिंह की एक पोस्ट में पढ़ा था लेकिन यह उपन्यास उपलब्ध नहीं हो पा रहा था। परसों नैनीताल में था तो मित्र Rajiv Lochan Sah/नैनीताल समाचार के पुस्तक संग्रह में अचानक इस पर निगाह गई तो तत्काल मांग लाया था। रामगढ़ के डेरे में जो इसे पढ़ना शुरू किया तो फिर रुका न गया।
इससे उपजी बेचैनी लम्बे समय तक साथ रहने वाली है।
- न जो, 15 मई 2026, रामगढ़
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