Wednesday, August 19, 2026

माननीयों के खिलाफ मुकदमे लटके ही रहते हैं!

हमारे वर्तमान और पूर्व सांसदों-विधायकों के खिलाफ, जिनमें कुछ मुख्यमंत्री भी शामिल हैं, 4192 मुकदमे अदालतों में लम्बे समय से लम्बित हैं। उनमें सुनवाई ही नहीं हो रही।  

519 मुकदमे दस साल से अधिक समय से लम्बित हैं, जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने जनप्रतिनिधियों के खिलाफ दर्ज़ मुकदमों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतें बना रखी हैं। समय-समय पर शीघ्र सुनवाई करने के लिए वह निर्देश भी जारी करता है। 

सर्वोच्च न्यायालय ने इससे सम्बद्ध एक जनहित याचिका में वरिष्ठ अधिवकता विजय हंसारिया कि 'एमिकस क्यूरी' अर्थात 'न्यायालय का मित्र' बना रखा है। सुप्रीम कोर्ट में पेश उन्हीं की एक रिपोर्ट में ये तथ्य सामने आए हैं। कुछ मुकदमों में मामले की तह तक जाने के लिए अदालतें 'एमिकस क्यूरी' की तैनाती करती हैं।  

श्री हंसारिया की रिपोर्ट के कुछ अंश अखबारों में प्रकाशित हुए हैं। इनके अनुसार जनप्रतिनिधियों के विरुद्ध 700 अन्य मामलों में जांच ही अटकी हुई है। 360 मामलों में तीन साल से ऊपर हो गए, आरोप पत्र तक अदालत में पेश नहीं किए गए हैं।  

रिपोर्ट बताती है कि माननीयों के खिलाफ लम्बित मुकदमों की यह संख्या (4192) उच्च न्यायालयों से मिली सूचना या उनकी वेबसाइटों से निकाली गई है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एमिकस क्यूरी को नेताओं के खिलाफ लम्बित मुकदमों की संख्या नहीं बताई। उसकी वेबसाइट में 2024 में यह संख्या 1171 बताई गई थी, जो देश भर में सबसे अधिक है। 

इस रिपोर्ट के अनुसार 28 राज्यों में से 14 के मुख्यमंत्रियों के विरुद्ध आपराधिक मुकदमे दर्ज़ हैं। तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी  के विरुद्ध सबसे अधिक 89 मुकदमे लम्बित हैं। उसके बाद बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेन्दु अधिकारी के खिलाफ 29, कर्नाटक के सी एम डी के शिवकुमार एवं आंध्र के सी एम चंद्रबाबू नायडू के विरुद्ध 19-19 और केरलम के सी एम सतीशन के खिलाफ 18 मुकदमे लम्बित हैं। 

मुकदमे तो यू पी के सी एम आदित्यनाथ योगी के खिलाफ भी थे लेकिन उन्होंने सत्ता में आने के बाद वे मुकदमे आदलत से वापस करवा लिए।  

माननीयों के विरुद्ध 4192 मुकदमों में से 754 मामले पांच से लेकर दस साल से लम्बित हैं। 562 मुकदमे तीन साल से अधिक और 1095 मुकदमे तीन साल से कम समय से अदालतों में अटके हैं।  

सबसे अधिक 1171 मुकदमे उत्तर प्रदेश में लटके हैं। उसके बाद केरलम (543), बिहार (373), महाराष्ट्र (364) और उड़ीसा (330) का नम्बर आता है। 

सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में 10 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में जनप्रतिनिधियों के खिलाफ लम्बित आपराधिक मुकदमों की शीघ्र सुनवाई के लिए 12 विशेष अदालतें बनाने का आदेश दिया था। 2018 में उसने निर्देश दिया था कि हर जिले में एक सेशन अदालत और एक मजिस्ट्रेट कोर्ट सिर्फ इन्हीं मुकदमों की सुनवाई के लिए तय किए जाएं ताकि मामलों का निपटारा प्राथमिकता से हो। 

नवम्बर 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाई कोर्टों को आदेश दिया था कि ऐसे मामलों के शीघ्र निपटारे के लिए स्वत: संज्ञान लें और त्वरित सुनवाई के लिए विशेष पीठों को अधिकृत करें।  

एक पूर्व न्यायालय मित्र ने जब अपनी रिपोर्ट में बताया था कि अधिकतर हाई कोर्टों में ऐसे मुकदमों की निगरानी की कोई प्रभावी व्यवस्था ही नहीं है तो यह मामला फरवरी 2025 में सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ को सौंपा गया। 

एमिकस क्यूरी की ताज़ा रिपोर्ट कहती है कि सुप्रीम कोर्टों के निर्देशों के बावजूद जनप्रतिनिधियों के खिलाफ लम्बित मुकदमे कम नहीं हुए हैं। 

श्री हंसारिया ने सुप्रीम कोर्ट से यह सिफारिश की है कि जनप्रतिनिधियों के विरुद्ध लम्बित मामलों को जल्द निपटाने के लिए डिजिग्नेटेड कोर्ट बनें यानी ऐसे कोर्ट जो इस केवल इन्हीं मुकदमों को सुनें और फैसला करें, तीन साल से अधिक समय से लम्बित मुकदमों की सुनवाई रोज हो और जो माननीय लगातार दो तारीखों में अदालत में पेश न हों, उनके विरुद्ध गैर जमानती वारण्ट जारी किए जाएं। 

यह भी सिफारिश की गई है कि जनप्रतिनिधियों के खिलाफ आरोप अप्त्र दाखित कर दिए जाने के बाद एक साल में सुनवाई पूरी हो जाए और उसकी मासिक निगरानी हो। 

- न. जो. 20 अगस्त 2026

(अखबारों में प्रकाशित रिपोर्टों के आधार पर)  

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