Monday, August 03, 2026

लेखक की बरसाती में रिश्तों का वैभव

आकाश में बादल छाए हुए हैं। कभी रिमझिम होने लगती है लेकिन शीघ्र थम भी जाती है। उमस और पसीने के बावजूद मेरे भीतर की रिमझिम जारी रहती है। दो-तीन दिन से मन भीगा-भीगा है। मेरे हाथ में अशोक अग्रवाल की पुस्तक है- 'लेखक की बरसाती'। 

संस्मरणों की किताब है। यादें हैं, यात्राएं हैं, अंतरंग रिश्तों का वैभव है और लिखने का अलग ही कौशल है। रचनाकारों के बीच ऐसे निर्मल-निश्छल रिश्ते अब नहीं दिखते। मन कलपता है। 

पहला संस्मरण निर्मल वर्मा पर है- 'एक लेखक की बरसाती'। किताब का नाम यहीं से लिया गया है। किताब पूरी पढ़ जाने के बाद लगता है कि निर्मल जी यहां नहीं भी हो सकते थे। वे किसी और किताब में जा सकते थे। तब किताब का नाम कुछ और होता। पर किताब यही बनती।  

इसे वास्तव में सौमित्र मोहन, जितेंद्र भाटिया, विनोद कुमार श्रीवास्तव, हिमा कौल और स्वयं लेखक अशोक अग्रवाल मुकम्मल बनाते हैं। जो दोस्ती, अंतरंगता, सहकार, प्रेम, चिंता और लम्बे दौर का संग-साथ इनके बीच है, वह किसी भी सबंध के परे जाता है। वह पाठक को भिगोता रहता है। निर्मल जी इनके बीच, प्रवेश द्वार पर सहजता से तो हैं लेकिन किसी कद्दावर लेखक की तरह थोड़ा दूर बैठे लगते हैं। 

पुस्तक के अंत में संकलित छोटे-छोटे रेखाचित्रों में भी निकटता और आत्मीयता का रसायन है। वे पाठक का अंतर्मन स्पर्श कर ले जाते हैं, लेकिन किताब की वास्तविक पूंजी तो वे चार संस्मरण ही हैं। अशोक अग्रवाल जी का लेखक इन्हीं में अपनी शान के साथ उपस्थित है।

सौमित्र मोहन का नाम हमने 'वह लुकमान अली है...' से जाना था। वह हिंदी की बहुचर्चित कविता है। यहां भी कवि का प्रवेश  लुकमान अली की मार्फत होता है लेकिन फिर कविता पीछे रह जाती है और लेखक इस  कवि के भीतर-बाहर का वह संसार दिखाता है, जहां इनसान किसी भी रचना से ऊपर हो जाता है। 

जितेंद्र भाटिया हिंदी में खूब पढ़े-लिखे-घूमे, विश्व साहित्य से लेकर विश्व सिनेमा तक में गहरे पैठे, यायावर, छायाकार, लेखक और विरले अनुवादक हैं। अब भी खूब सक्रिय हैं। उन्हें पढ़ना कई प्रकार समृद्ध होना होता है।  

विनोद कुमार श्रीवास्तव हिंदी कविताई की आत्म-मुग्ध दुनिया से दूर-दूर रहने वाले नायाब कवि हैं। कभी ज्ञानरंजन ने उनके लिए लिखा था कि उनकी कविताएं समुद्र में तैरता ग्लेशियर हैं, जिसका नब्बे प्रतिशत पानी के भीतर ओझल रहता है। अब तो वे मित्रों से भी दूर अपने बनाए किले में कैद हो गए हैं। दोस्तों से भी उनका संवाद नहीं होता। 

हिमा कौल का नाम मैंने सबसे पहले 1980 के दशक में राजीव मित्तल से सुना था। नवभारत टाइम्स लखनऊ के दिनों में कभी-कभार रम के दो पैग के बाद बाबा छाप तम्बाखू का पान चुभालते हुए वह हिमा कौल, उसके गढ़े शिल्पों और उसकी लाइलाज बीमारी के किस्से सुनाया करता था। 

'लेखक की बरसाती' के उल्लिखित चार संस्मरणों में लेखक चारों दोस्तों के साथ बराबर मौजूद है। सभी में सभी की आवाजाही है। चारों संस्मरण एक-दूसरे के कहे जा सकते हैं। हिमा आज दुनिया में मौजूद नहीं है, लेकिन वही यहां सबसे अधिक उपस्थित है । वह शेष चारों में बराबर उपस्थित है। अशोक जी की स्मृतियों में वह बेतरह छाई हुई है। कई बार आंखों की कोर नम हो आती है।

पांचों रचनाकार रिश्तों की ऐसी डोर में बंधे दिखते हैं, जो एक दूसरे को पूरा बनाती है। एक दूसरे की रिक्ति को भरती रहती है। ये रिश्ते भावनाओं से भरपूर हैं लेकिन शब्दों में भावुकता नहीं भरी है। लेखकीय वस्तुनिष्ठता का बेहतरीन संतुलन अशोक जी ने साधा है। लहरें पाठक के भीतर स्वयं ही बहने लगती है।

सभी रिश्तों की शुरूआत रचनाओं से ही होती है। वही उन्हें करीब लाती हैं। धीरे-धीरे वह करीबी रचनाओं के बाहर जाकर एक-दूसरे को समेट लेती है। दोस्ती, प्रेम, अंतरंगता एवं परस्पर सम्मान को पार करता हुआ रिश्ता रूहानी-सा भी बन जाता है। वे कई-कई दिन तक साथ रहते हैं, एक-दूसरे घर में और लम्बी यात्राओं में। समुद्र, पहाड़, जंगल, पक्षी, पगडंडियां, आकाश उनके रिश्तों में रंग भरते हैं। 

हिमा कौल को खतरनाक स्नायु रोग हुआ। मोटर न्यूरॉन डिजीज। इस बीमारी से वह हंसते-काम करते हुए लड़ी। कोई रोना-धोना, निराशा-हताशा नहीं। देश भर में कई जगह इलाज चला। ये दोस्त हर जगह साथ बने रहे। उसकी मां उद्विग्न हो जाती रही, लेकिन दोस्तों ने जो साथ दिया, वही दोस्ती की परिभषा है। किसी ने हार नहीं मानी। खुद हिमा अपने शिल्प गढ़ती रही। प्रदर्शनी भी हुईं। फिर एक दिन हिमा चली गई। नहीं, दोस्तियों में बची रह गई।   

दो वर्ष पहले अशोक जी के संस्मरणों की एक और पुस्तक पढ़ी थी- 'संग-साथ'। उसमें भी कुछ मित्रों के आत्मीय संस्मरण हैं। नवीन सागर, विश्वेश्वर, जितेंद्र कुमार, अमितेश्वर और प्रियदर्शी प्रकाश पर उनके स्मृति लेख विशेष रूप से याद रह जाते हैं। 'लेखक की बरसाती' के उपर्युक्त चार संस्मरण उनसे आगे निकल गए हैं। 

ये संस्मरण एक संवेदनशील लेखक होने के नाते ही नहीं लिखे जा सकते। इनके लिए एक रचनाकार की भटकन, अदेखे को देखने की और इस जीव-जगत को अनुभव करने की बेचैनी चाहिए। वह अशोक अग्रवाल में और उनके अंतरंग दोस्तों में रही है। यह किताब सबूत है।    

- नवीन जोशी, लखनऊ। 03 अगस्त, 2026

( लेखक की बरसाती- अशोक अग्रवाल, सम्भावना प्रकाशन, हापुड़, मूल्य- 300/-, सम्पर्क- 7017437410)  

 

  

 

 

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