Friday, October 16, 2026

'भक्त पत्रकार', 'सिकुलर पत्रकार' और प्रेस स्वतंत्रता

'प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला' होते ही पहले पत्रकार समुदाय एक स्वर में विरोध करता था। अब उनमें एकता नहीं दिखाई देती। साम्प्रदायिक राजनीति के इस खतरनाक दौर में पत्रकार भी इधर-उधर के खेमे में बंट गए हैं और उसी हिसाब से उनकी प्रतिक्रिया, समर्थन अथवा विरोध दिखाई देते हैं। 

यह मुद्दा कल (16-10-2026) लखनऊ प्रेस क्लब की एक गोष्ठी में उठा। 'साझी दुनिया' ने मशहूर पत्रकार और 'द वायर' के संस्थापक-सम्पादक सिद्दार्थ वर्दराजन को व्याख्यान के लिए बुलाया था। विषय था 'मीडिया से बचें या मीडिया को बचाएं।' जैसा कि वर्दराजन की पत्रकारिता बोलती है और इस संकटकालीन समय में आवश्यक और सार्थक हस्तक्षेप है, वैसा ही वे बोले। उन्होंने उस मीडिया की चर्चा की जिससे फिलहाल बचा जाना है और उस मीडिया को बचाने के कारण गिनाए, जिसको अवश्य ही बचाया जाना है ताकि लोकतंत्र सुरक्षित रहे।  

उसी क्रम में उन्होंने कहा कि मुम्बई, दिल्ली, बंगलूर, चन्नै आदि प्रेस क्लबों से समय-समय पर उस मीडिया के पक्ष में आवाज उठती रही है, जिसका आजकल दमन बढ़ गया है लेकिन उत्तर प्रदेश का हाल मुझे पता नहीं। इसी का संदर्भ देते हुए एक प्रश्नकर्ता ने बाद में पूछा कि सारे पत्रकार एक होकर इसके प्रतिरोध में क्यों खड़े नहीं होते, जैसा कि पहले हुआ करता था। 

इस प्रश्न पर एक जवाब यह आया कि पत्रकारों के बीच भी साम्प्रदायिक बंटवारा हो चुका है। कुछ पत्रकार मोदी सरकार विरोधी घोषित हो गए हैं और कुछ उनके अंध समर्थक। हाल में दिल्ली में  जंतर-मंतर और अन्यत्र हुए विरोध प्रदर्शनों में जब कुछ पत्रकारों को पुलिस ने रोका (डिटेन किया) और कुछ पर लाठी भी चली, तो उस खेमे के कई पत्रकारों ने इसकी निंदा करने की बजाय, सोशल मीडिया पर इस प्रकार की टिप्पणियां की- 'और ठोको, जमकर ठोको', 'दिल्ली पुलिस को सैल्यूट', 'पत्रकार नहीं, विदेशी एजेंट' वगैरह। 

सिद्दार्थ वर्दराजन ने इस पर एक किस्सा सुनाया- 'रिपब्लिक' चैनल के अर्णव गोस्वामी ने जब सोनिया गांधी के खिलाफ अभद्र टिप्पणी की थी तो कांग्रेस पार्टी ने उनके खिलाफ कई राज्यों में मुकदमे दर्ज़ कराए थे। हालांकि अर्णव मेरी निंदा करते हैं लेकिन मैंने इसे प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला मानते हुए उनके खिलाफ दर्ज़ मामलों को वापस लेने की मांग की। 

सिद्दार्थ ने कहा- 'द वायर' के मेरे कुछ साथी इससे सहमत नहीं थे। उन्होंने तर्क दिया कि अर्णव की भूमिका पत्रकार की नहीं रह गई है, वे सत्ता पक्ष का एजेण्डा चलाते हैं। मेरा जवाब था कि अर्णव की भूमिका विवादास्पद है लेकिन हैं वे पत्रकार के ही रोल में। इसलिए उनका साथ देना चाहिए। उस मामले में मैंने उनका साथ दिया लेकिन जब खबरें लिखने के लिए मुझ पर कई मुकदमे हुए तो अर्णव ने कभी एक शब्द इसके विरोध में नहीं कहा।  

सिद्दार्थ वर्दराजन ने कहा कि मैं आज भी यह मानता हूं कि पत्रकार को उसके काम से रोकना, उसके लिखे पर दमन करना, प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला है। उसका प्रतिकार करने के लिए कोई प्रेस कौंसिल या अदालत जा सकता है। किसी भी प्रकार उसकी प्रताड़ना नहीं की जानी चाहिए। 

सिद्दार्थ ने निश्चय ही सही कहा लेकिन आज का मीडिया बुरी तरह साम्प्रदायिक आधार पर बंटा हुआ है।  सोशल मीडिया पर उनकी भिड़ंत खूब होती है। तथ्यों के साथ सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकार सरकार-समर्थक पत्रकारों के निशाने पर हैं। एसआईआर के बारे में तथ्यात्मक रिपोर्ट लिखकर सवाल उठाने वालों को खूब ट्रोल किया जा रहा है। 

सिद्दार्थ ने बताया कि दिल्ली में 10 अक्टूबर वाले प्रदर्शन में 37 पत्रकारों को पुलिस ने डिटेन किया था। यह उन्हें अपना काम करने से रोकना और इसीलिए प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला था। उनमें उन संस्थानों के पत्रकार भी थे जो सामान्यतया सत्ता समर्थक बताए जाते हैं लेकिन इसकी निंदा में वे संस्थान या उनके पत्रकार भी शामिल नहीं हैं। 

इसे लिखते हुए यह ध्यान आ रहा है कि मीडिया में बहुत पहले से आरएसएस से सम्बद्ध पत्रकार काफी रहे हैं। 1977 में मोरार जी देसाई की सरकार में सूचना-प्रसारण पंत्री रहे लालकृष्ण आडवाणी ने अपने प्रभाव से कई पत्रकारों को विभिन्न अखबारों में रखवाया। उनकी निष्ठा संघ के साथ रही होगी, लेकिन वे पत्रकार के रूप में संघ या भाजपा के समर्थन में खुल्लमखुल्ला बैटिंग नहीं करते थे। कई बार वे अपनी ही सरकार के खिलाफ भी खबरें लिख देते थे। 

वरिष्ठ पत्रकार राजेश जोशी ने हाल में रामबहादुर राय के बारे में लिखे गए अपने एक लेख में उन पत्रकारों की 'संघ निष्ठा' को समय की कसौटी पर अच्छी तरह परखा है। आज इस निष्ठा वाले पुराने और नए पत्रकार तो खुलकर मैदान में हैं ही, कई अन्य पत्रकारों के भीतर बैठा कट्टर हिंदू-मन खबरों में खिलखिलाने लगा है। स्वाभाविक ही उन्हें कई 'सिकुलर' पत्रकारों में भारी खोट दिखाई देने लगा है। इसलिए 'प्रेस की स्वतंत्रता' पर पत्रकार गहरे विभाजित हैं।

कल की गोष्ठी में यह सवाल भी उठा कि एक नागरिक और एक पत्रकार में क्या फर्क है? संदर्भ सुप्रीम कोर्ट की उस टिप्पणी का है कि 'सभी नागरिक पत्रकार हो जाएंगे तो बड़ी मुसीबत हो जाएगी।' इस सवाल पर समयाभाव के कारण चर्चा नहीं हो सकी लेकिन यह प्रश्न है विचारणीय। सोशल मीडिया के इस दौर में सामान्य नागरिक भी पत्रकार की भूमिका में आ गए हैं। मोबाइल ने इसे आसान बना दिया है और कई नागरिकों ने अपने मोबाइल से अच्छी और जरूरी कवरेज की है। 

वैसे, अधिकतर नागरिक पत्रकार हो जाएं तो इसमें गलत क्या है? 'मीडिया' का एकाधिकार और संक्रेदण टूटना ही चाहिए। हमारे सामने कई कोणों से खबरें और विश्लेषण आएंगे। इसके खतरे में होंगे ही। इस पर फिर कभी। प्रतिक्रियाओं का स्वागत है। 

-न जो, 17 अक्टूबर 2026  (प्रतीकात्मक चित्र इंटरनेट से)  

 

  

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